भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Friday, February 20, 2009

असोथकित-कथा-अनलकान्त

प्राइवेट वार्डक बिस्तर पर पड़ल-पड़ल ओ सामनेक टेबुल पर राखल एक मात्र
खाली गिलास मे बड़ीकाल सँ ओझरायल छल। काँचक ओ मामूली सन गिलासओकरा देखैत-देखैत रूप बदल' लागल छलै। एक बेर ओकरा लगलै जे ओहि खाली गिलास मे नीचाँ सँ अनायास पानिक सतह ऊपर उठ' लगलै आ अगिले क्षणगिलासक चारूभर पानि खसैत सेहो ओकरा प्रत्यक्षे जेना बुझेलै! ओ झट आँखि मूनिलेलक। बड़ीकाल पर आसते-आसते फेर ओ आँखि खोललक। गिलास पूर्ववत खाली छलै। ओ फेर निश्चेष्ट गिलास पर नजरि गड़ा देलक। कोठली मे देबालघड़ीक टिक्-टिक् केर हल्लुक-सन आभास छलै।
किछुए क्षण बीतल हैत कि ओ देखलक गिलासक आकृति एक लय-क्रम मेपैघ होअय लगलै! एक बेर ओकरा लगलै, ई तँ कुंभकरणक पेट थिक! तत्क्षणे फेरबुझेलै, ई विशाल बखारी थिक!...भरि पेट भात लेल रकटल मोन-प्राण मे पेटक
संग बखारीक स्मृति ओकरा नेनपने सँ खेहारने आबि रहल रहै। परेशान जकाँ भ'क' ओ अपन नजरि ओकहर सँ हटाब' चाहलक कि ओकरा बुझेलै जे माथ मे किछु चनकि रहल छै आ देह मे तागति सन किछुओ ने रहि गेल छै। ओ अपना केँ बड़असहाय-असोथकित बुझि फेर आँखि मूनने रहय कि तखने एक टा सर्द-सन हाथओकरा माथ पर बलबला आयल घाम पोछ' लगलै। कोठली मे तखन ओकर पत्नीमात्र छलि, मुदा ओकर हाथ ओहन सर्द हेबाक अनुमान नइँ छलै ओकरा। ई फराक जे ओकर आत्मा मे खरकटल खरखर हाथक धन्नी-हरदि वला गमक आँखि नइँ खोल' देलकै।
हठात् हल्लुके सँ केबाड़ ठकठका क' ककरो भीतय अयबाक आभास भेलै,तँ नइँ चाहैतो ओ आँखि खोलि देलक। नर्स छलि। नर्सक आगू-आगू ओकर मुस्कीछलै। ओकरा मन मे स्फूर्ति जकाँ अयलै। नर्सक मुस्कीक उतारा मुस्किए सँ देलक।एक नर्से टा तँ छलै जकर आयब ओकरा बड़ सोहाबै छलै। डाकटरो सँ बेसी। एक टामधुर-सन धुन ओकर धिरछायल मोन केँ छुबलकै। एक खास किसिमक निसाँ मेआँखिक पल झपा गेलै।
कनेकाल बाद 'मनोहर कहानियाँ' मे डुबलि पत्नीक पन्ना पलटबाक स्वरओकरा कर्कश जकाँ लगलै। भीतर सँ कचकचा गेल छल। पत्रिका मे डुबलि पत्नीदिस तकबा सँ बचैत, नइँ चाहैतो फेर सामनेक टेबुल पर राखल खाली गिलास दिसताक' लागल।
किछुए क्षण बीतल हैत कि गिलास फेर रंग-रूप बदल' लगलै। ओकराअपन दिमाग पर बेस दबाव बुझेलै। ओ नइँ चाहैतो बाजल, ''टेबुल पर सँ एहिगिलास केँ हटाउ!...''
पत्नी पछिला तीन दिन सँ बेसी खन ओकरा संग छलि। पहिल दिन तँ मारतेफजहति करैत भरि दिन ओ बड़बड़ाइते रहि गेल छलि। कतेको केओ बुझारति कि अनुनय-विनय कयलकै, ओकरा पर तकर असरि नइँ भेलै। एकदमे झिकने जाइतरहलि, ''सब हमरे घर बिलटाबै पर लागल यए। धियापुता केँ के देखतै? अयँ! जकरा कपार पर दू-दू टा अजग्गि बेटी रहतै तकर ई किरदानी?... काज-धंधाक चिंते ने! हरखन दोसे-मीत! सब दिन नाटके-साहित्य आ दरुबाजीक मोहफिल! देखौ, आइ केओ ताकहु अयतै!...'' एहने-सन मारते रास बात! मुदा ओ एको बेरमुँह नइँ खोललक। दोसर दिन पत्नीक बाजब स्वाभाविके रूपेँ कने कम भेलै, मुदा ओकर मुँह सिबले रहलै। तेसरो दिन ओकरा ओहिना गुमसुम देखि पत्नीक भीतरआतंक जकाँ किछु पैस' लगलै। से ओहि दिन गुकमी जकाँ लधने ओ ओकराबजबाक बाटे ताकि रहल छलि। एहन खन पतिक आदेश ओकरा नीक लगलै। ओ उठलि आ गिलास हटा बगलक अलमारी मे रखै सँ पहिने पानि लेल पूछलक। ओमुड़ी डोला नासकार कयलक।
पत्नीक भीतर किछु कचकि जकाँ उठलै। आँखि डबडबा गेलै।...
एकरा एहि अस्पताल मे भर्ती दोसे-मित्र सभ करौने छलै। ओकरे सभक समाद पर ओ बताहि जकाँ छोटकी बेटीक संग भोरे-भोर भागलि आयलि छलि।ओकर लाख फजहति आ बड़बड़ाहटिक बादो इलाजक सभ टा व्यवस्था वैह सभ क' रहल छल। ओकरा बेसी बजबाक साफल ई भेलै जे कैक गोटे बाहरे सँ हालचाल ल', सभ टा व्यवस्था बुझि-गमि, घुरि जाइ छल। से थाह पाबि गेलि छलि ओ।
क्षण भरिक लेल तँ ओकरा अपन कड़ैती आ बजबाक प्रभाव पर गौरवे जकाँ
भेलै। ओकरा लगलै जे एहि तरहेँ ओ अपन घरवला केँ मुट्ठीमे क' सकै अछि। मुदापतिक पीयर चेहरा देखिते ओकरा भीतर पैसल अदंक आशंकाक झड़ी लगा देलकै। ओ चोट्ïटे उठलि। पयर मारि आस्ते सँ बाहर भेलि।
पैघ सन गलियारा पार क' ओ रिसह्रश्वशनक आगूक गुलमोहर लग ठाढ़ भेलि।
अस्पताल प्रांगणक सामनेवला छोर पर बेरू पहरक रौद मे बैसल किछु गोटे पर ओकर नजरि गेलै। ओ दूरे सँ चिन्हैक प्रयास क' रहलि छलि कि ओकहर सँ दू गोटेलपकि क' ओकरा लग अयलै, ''की, कोनो बात?" ई दुनू ओकरा पतिक सब सँ
पुरान मित्र छलै। ओकरा बियाहो सँ पहिनेक सहमना, लंगोटिया!...जकरा सभक
ताधरि किछुओ फराक नइँ छलै। बियाहक बादो चौदह-पंद्रह वर्ष धरि प्राय: ओहिनारहलै। शुरूक पाँच साल तँ आश्रमो संगे रहलै जावत्ï अलग-अलग ठाम चाकरी नइँ भेटलै। एहि मे पहिल ओ छल जे ओकरा 'कनियाँ गै' कहै छलै आ 'वर बाबू' कहैत जकरा सँ ओ हँसी-मजाक मे सदति साँय-बौहुक अदला-बदली करबाक गपशप करै छलि। मुदा तखन ओकरा मुँह सँ बहरायल वाकय संबोधनहीन छलै। दोसर, छात्र-जीवन मे भनसाघरक इंचार्ज रहबाक कारणेँ शुरूहे सँ ओकरा सौतिन कहै छल। मुदा तखन तीनूक संबंधक कोनो टा पहिचान नइँ छलै। ई स्थिति ओकराबड़ दारुण जकाँ बुझेलै। एक बेर ओकरा मोन मे अयलै जे वैह ओहि संबोधन सँ पुकारय, मुदा से भेलै नइँ। ओ अपन भावना पर कठोरता सँ लगाम लगौलक, ''की करबै आब, हमर तँ घरे बिलटि गेल। तै पर सँ ओकर गुमसुम रहब!..." सेरायलआ घबड़ायल सन स्वर बहरेलै। कनेक असमंजसक बाद पहिल दोस्त जे कह' चाहैत छल, से नइँ कहिओहिना किछु बाजि देलक, ''ठीक भ' जयतै। डॉकटर सँ हमरा गह्रश्वप भेल यए।"
''नइँ! ...कोनो चिंताक बात नइँ!" दोसर तोस देब' चाहलक।
एहन जवाब ओ नइँ सुन' चाहने छलि। मुदा ओकरा बस मे किछु ने छलै।आब ओ पहिनेक स्थिति मे नइँ घुरि सकै छलि जकरा सँ कहियो पिण्ड छोड़बैतनीक लागल छलै। ओकरा मुँह सँ बहरेलै, ''घुटनाक अलावा डॉकटर तँ कहै छै,
सब कुछ नॉर्मल है!

''हँ, सैह तँ! ..." पहिल जल्दी सँ जवाब ताकलक, ''रसेरस सब ठीक भ' जयतै।'
''हँ! हँ!..." दोसरक चेहरा पर टार'क भाव बेसी साफ छलै।

हारिक' ओ वार्ड दिस घुरलि, ''आउ ने, कनेकाल हुनके लग.."
गाछ ओकरा लगीच अयलै। सिरमा लग। दुनूक नजरि मिललै। ओ निहालभ" गेल।
ओ किछु बाज' चाहलक, तँ ओकरा अपन पत्नीक उपस्थितिक भान भेलै।
गाछ सेहो किछु बाज' चाहलक, मुदा कोठली मे ओकरा मीतक कयाहता छलि। गाछओकरा बेडे पर सटिक; बैसि रहल। दुनूक हाथ एक-दोसराक हाथ मे छलै। दुनूक हाथ गरम छलै।
''चाह-ताह बाहर सँ एत' आबि सकै छै ने?" दोसर बुदबुदायल।
तखने ओकर पत्नी उठलि, ''लगले अबै छी"' आ कोठली सँ बाहर भ'गेलि। ओकरा पाछाँ लागल दोसर मीत सेहो बहरायल।
किछु पल बीतल कि ओ पड़ले-पड़ल फुसफुसायल, ''ककर्यू मे ढील बुझाइ
छौ!.."
''नइँ-नइँ!... अपना सब घर-परिवार लेल सही समय पर किछु ने सोचलौं।तकर सब टा दु:ख एकरे सब केँ भेलै।" गाछ आब झुकि जकाँ आयल छल।
ओ किछु क्षण चुपचापे रहल। फेर एकहर-ओकहर ताकि बाजल, ''रौ बुडि़!
हमरा सभक लेल अपने टा घर कहिया घर छल? हमसभ तँ सभक घर-परिवार केँ अपने बुझैत रहलौं।" बेड पर पड़ल देह जेना मोन संग उड़' चाहै छल।
''जँ सैह रहि जाइत शुरू सँ अंत धरि तँ कोनो दु:ख नइँ छल मीत! मुदा एक
एहन मोड़ पर आबि हम सभ अपन आरि बेराब' लगलौं जत' पछिलुको कयलधयल सभ टा पर पानि फिरि गेल। ने घरक रहलौं ने घाटक।..." आब गाछ साक्षात मनुकख भ' गेल छल।
''ई तों की कहै छें?... हम तँ एखनो एकरे पाछू सब किछु न्योछावर कयनेछी। के अछि आइ हमरा सँ बेसी कयनहार?'
''यैह!... यैह भेलौ सीमा! दोसर केओ तोरा सँ बढि़ नइँ किछु करै यए तेँ तों आगू किएक बढबें!... आ ई त्याग-न्योछावर-कथा मंचे टा सँ शोभै छै। हम-तों जतेक ने न्योछावर करबाक गपशप करै छी, से सब वास्तव मे आब कैरियर चमकाबैक
साधन भ' गेल यए। जेँ केओ दोसर हमरा सब सँ आगू बढि़ सक्रिय नइँ अछि, ते हमरासभक ई अधकचरा प्रयास पैघ अभियान कहाबै यए। मुदा ई जानि ले जे हमरासभक ई प्रयास एक टा बिजुका सँ बेसीक ओकाति नइँ रखै अछि जकरा सँ बड़ीकाल पर ओ आँखि फोललक। सामनेक खाली टेबुल पर ओकर नजरि गेलै, तँकिछु चिड़ै-चुनमुनी डराइत होइ तँ होइ, सुग्गर-हरिन आकि नीलगाय पर कोनोओकरा टेबुलक सतह सहाराक रेगिस्तान बुझेलै। टेबुलक पार बैसल लोकक आकृति असरि नइँ पड़ै छै।' मीत आवेश मे आबि गेल छलै।रेगिस्तानक छोर परक गाछ लगलै। ओ ओहि गाछक हरिअरी पर नजरि टिकौलक। जवाब मे एखनो ओ बहुत रास तर्क द' अजेय रहि सकै छल। यैह तँ ओकरआँखि तृप्त भ' गेलै। शकित छलै। मुदा एक तँ ओहि बातक कने असरि पड़ल छलै आ दोसर, पत्नीक घुरिक' आब' सँ पहिने ओकरा किछु आर जरूरी बात पूछबाक छलै। से शांत होइतमद्धिम स्वर मे बाजल, ''एखन से सब बतायब जरूरी नइँ छै। कहले बात कते कहबौ? ...सुन, एक टा जरूरी बात!..."आ फुसफुसायल, ''ओत' रंगशालाक
हॉल मे हमर किछु भेटबो कयलौ?"
''की?" गाछक पात-पात खिलखिला क' हँसल।
''हमर कुञ्जी?"
''हँ! ...ओ कत' जायत? मंचक काते मे छल।"
''दे!..."
''बाकस मे बंद क' राखि देने छियौ। पहिने ठीक तँ हो!"
''शहर मे कोनो चर्चा?"
''हँ, कल्पना मंचक छौंड़ा सब एक टा रीमिकस तैयार कयलक अछि—
कुञ्जी हेराय गेल भाँगक बाड़ी मे..." क्षणभरि बिलमि फेर नहुँए बाजल, ''आचार्यक 'मुसल आ मुसलमान" कथाक मंच प्रस्तुति आइ मुजकफरपुर मे छिऐ जत' सहरसा सँ जनकपुर धरिक लोक जमा भ' रहल छै। एत' सँ कल्पनो वला सभ गेल छै!.."
ओकरा पर तनाव जकाँ बढि़ गेलै। क्षणेभरि कोठली मे भारीपन रहलै! तखने
चाहक ट्रे लेने एक टा छौंड़ाक संग ओकर पत्नी आ दोसर मीत घुरि अयलै।
रसेरस फेर टेबुल पर रेगिस्तान पसरि गेलै आ गाछ तकर ओहि पार चलि
गेल।
ओ दोसर मीतक मदति सँ गेड़ुआक सहारें ओठङि गेल छल। पत्नीक हाथ सँ
कप पकड़लक। फेर एक टा बिस्कुट ल' नहु-नहु कुतरैत कतहु हेरा गेल छल।
चाहक घोंट लैत ओत' शुरू भेल बाल-बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइ, कयाह-दान आमहँगाइक संग-संग क्रिकेटक गह्रश्वप ओकरा जोडि़ नइँ पाबि रहल छलै।
साँझक अन्हार जखन बाहरक वातावरण केँ गाढ़ कर' लागल छलै आ साँझुक
राउण्ड पर आयल डॉकटर देखिक' जा चुकल छलै, घर सँ टिफिन बॉकसवला झोड़ानेने एक टा नवोदित कवि मित्र आबि गेल छलै। राति मे ओहि नवतुरिए केँ रुकबाक छलै।
किछु काल बाद ओकरा पत्नीक संगे ओकर दुनू मीत घर विदा भेल।नवतुरिया कवि सेहो पानिक बोतल आन' लेल बहरायल छल कि पहिल मीत गेटक बाहर सँ घुरिक' ओकरा लग अयलै आ एक टा कने पैघ सन कुञ्जी हाथ मे दैत कहलकै, ''ले! ...एकरा बिना तोरा नीन नइँ हेतौ!" आ झट बहराय गेल।
ओ एक बेर ठीक सँ ओहि कुञ्जी केँ देखलक। बड़ पुरान होइतो सब तरहें नव छलै। पुलक सँ भरि तुरंत जेब मे राखि लेलक। पानि ल'क' घुरल नवतुरिया प्रेम सँ भोजन लगौलकै। नवतुरियाक आवेशभोजन मे रुचि बढ़ा देलकै। तेँ खाय क' पड़ल तँ नवतुरियाक दू गोट कवितोसुनलक। चाबसी द' सब चिंता सँ ध्यान हटा आगू मे जे फिल्म छलै तकरसफलताक कल्पना मे झिहरि खेलाय लागल। नीन किछु जल्दिए आबि गेलै।
ओ देखलक जे ओकर किताब लोकसभ लाइन लगाक' कीनि रहल छै।मारते रास चैनलवला सभ घेरने छै। ओ जल्दी-जल्दी किछु बाजि एक टा उज्जररंगक कार मे बैसि जाइ अछि। कार अज्ञात दिशा मे जा रहल छलै कि नीन टूटि गेलै।
ओ फेर आँखि मूनि जल्दी सँ जल्दी ओहि सपना मे जयबाक चेष्टा कर' लागल।
एहि बेर ओ देखलक जे ओकरा ढाइ लाखक कोनो पुरस्कार भटलै। ओकरासकमान मे पुरस्कार प्रदाता नौकरशाह सभक दिस सँ रंगमंडलक समस्त सदस्यक संगहि वरिष्ठ पत्रकार आ साहित्यकार लोकनिक बीच भव्य पार्टी चलि रहल छै।...अचानक ओहि बीच ठाढ़ एक टा अद्र्धविक्षिह्रश्वत सन युवक चिचिया लगै छै, ''अहाँ सभ अवसरवादी छी! पूजीपतिक दलाल छी!..." कि तमसाक' ओत' जमा सभ केओ अपना-अपना गिलासक दारू ओहि युवक पर फेकि दैत छै।... आ ततेक दारू ओकरा पर खसै छै जे ओ युवक बगलक नाली मे बहि जाइ छै!...
अचानक फेर ओकर नीन टूटलै। एहि बेर ओकर छाती जोर-जोर सँ धड़कि
रहल छलै।कनेकाल मे ओकर मोन स्थिर भेलै, तँ ओ नवतुरिया कवि दिस ताकलक। ओओकरा बेडक दहिना कातक सोफा पर नीन छलै।
ओकर बामा हाथ अनायास पेंटक जेब मे गेलै आ अगिले पल कुञ्जी ओकरा आँगुरक बीच छलै। बड़ीकाल धरि ओ ओहि कुञ्जी केँ देखैत रहल। कुञ्जीदेखैत-देखैत ओकरा अपन वियारंगक ओ अन्हार मोन पडि़ अयलै जे ओकर कुञ्जी तँ गिडऩहि छलै, ओकरा एहि बेड धरि पहुँचा देलकै। वियारं ओहि विद्यापति यात्रीरंगशालाक संक्षिह्रश्वत नाम छलै जकर ओ अध्यक्ष आ निर्देशक छल। जत' पछिला दससाल मे सभ सँ बेसी नाटक ओकरे निर्देशन मे भेल छलै। जत'क ओ सभ सँ सकमानित आ सर्वेसर्वा छल। जत' पहिल मंजिल पर ओकरा एक टा पैघ सन कक्ष भेटल छलै। ओहि कक्ष सँ नइँ मात्र वियारंक सभ टा गतिविधि संचालित करैत छलओ, ओकर समस्त हित-मीतक चौपाल वैह छलै। मुदा ओहि रातुक अन्हार!...
...असल मे ओइ दिन बेरू पहर अशोका मे बालीबुडक एक टा पैघ प्रोड्यूशरसंग ओकर मीटिंग सफल भेल छलै। भूमि समस्या आ सशस्त्र आन्दोलन सन विषय
पर ओ एक टा मसालेदार फिल्मक लेल स्क्रीह्रिश्वटंग आ सह-निर्देशनक एग्रीमेंट साइन कयने रहय। तकरा बाद शैकपेनक दौर जे शुरू भेलै से प्रोड्यूशरक उड़ान-समयक कारणें सँझुका आठे बजे धरि चललै। ओत' सँ ओ बाहर भेल तँ ऑटो मे बैसैतअपन सभ सँ करीबी कॉमरेड दासक मोबाइल पर पहिल सूचना देलक। दास नगरक सभ सँ बेसी प्रसार संकयावला दैनिक समाचार पत्रक कयूरोचीफ रहय। ओ तत्कालओकरा अपन दकतर बजा लेलकै। दासक केबीन मे ओकरा पहुँचिते तय भेलै जे एहि उपलकिध केँ खास दोस्तसभक बीच सेलिब्रेट कयल जाय। से ओतहि सँ फोन क' चारि-पाँच गोट 'हमह्रश्वयाला'साहित्यकार-पत्रकार-रंगकर्मी केँ साढ़े दस बजे धरि वियारं पहुँचबाक सूचना देल गेलै। फेर ओ दासेक खटारा एलएमएल वेस्पा पर पाछाँ बैसि विदा भेल छल। रस्ता मे महात्मा गांधी चौक पर चारि-चारि ह्रश्वलेट चिकन आ पनीर फ्राइ पैक करबौलक। काजू, मूँगफली आ दालमोटक संगे सलादक व्यवस्था क' चारि डिकबासिगरेट सहित दू टा पैघ-पैघ पॉलिथीन पैकेट मे लेलक। दासक डिककीक झोड़ा मेरमक बड़का-बड़का बोतल रखैत आधा सँ कमे बचल अद्धा टकरेलै। ओकराबगलक जूस दोकानक पाछाँ दुनू मीलि खाली करैत अमेरिकन पॉलिसीक चर्चा कर'लागल छल। अपन-अपन सिगरेट जराय जखन ओत' सँ विदा भेल, तँ साहित्यअकादेमी आ मनुवादक व्याकया शुरू भेल छलै।
कनेक तेज सन चलैत बसात जाड़क प्रभाव बढ़ाब' लागल छलै। मुदा ओ दुनूमौसम केँ ठेङा देखबैत वियारं दिस जाइत अपना मे मस्त छल। तेहन मस्त जे साँझेसँ शुरू झिस्सी केँ 'इन्जॉय क' रहल छल।
तखन ओ सभ वियारं सँ किछुए दूर नेहरू स्टेडियम वला मोड़ पर छल कि दूटा घटना एक संग घटलै। एक, बुनिआयब तेज हेबाक संगे बसात बिहाडि़ जकाँ रूपल' लेलकै आ दोसर, दासक जेब मे राखल मोबाइल अंग्रेजी धुन पर चिचियाब' लगलै। कात मे स्कूटर रोकि दास एको मिनट सँ कमे गह्रश्वप कयलक आ पाछाँ घुमिबाजल, ''रौ, समान सभ ल'क' तों जो वियारं। एखन साढ़े नौ भ' रहल छौ। हम एक घंटा मे अयबौ। संपादकक आदेश छै, की क' सकै छी?... चल गेटक बाहरछोडि़ दै छियौ।"
खराब मौसमक बादो गेट सँ दूरे पॉलिथीन पैकेट आ झोड़ा थमा दास स्कूटरमोडि़ फुर्र भ' गेलै। ओ वियारं बिल्डिंग दिस तकलकै। सभ किछु अन्हार मे डूबल
छलै। गेटक दुनू कात स्थित विद्यापति आ यात्री बाबाक प्रतिमा धरि देखा नइँ पडि़ रहल छलै, तँ कालिदास-शैकसपीयर सन-सन मारते रास नाटककारक देबाल मेजड़ल छोट-छोट पाषाण मूर्ति कत' लखा दैतै। हवा प्रचंड भ' गेल रहै आ बुन्नीआर तेज। ओ धतपत आगू बढ़ल। ग्रील-गेट फोलि अन्हार पैसेजक मुँहथरि परठमकल। चिकरिक' रमुआ चौकीदार केँ दू-तीन बेर शोर पाड़लक। मुदा कोनो
उतारा नइँ भेटलै। एहन मौसम मे राति-बिराति ककरो नइँ अयबाक अनुमान क' ओसरबा साइत घर पड़ा गेल रहय! बिजली नइँ रहै आकि स्वीचे लग सँ काटि देनेछलै ढोहरीक सार, से नइँ कहि। ओकरा अपना हाथक पॉलिथीन पैकेट धरि नइँ सुझि रहल छलै। आखिर कहुनाक' सीढ़ी तकबाक साहस क' ओ एक टा पयर आगू बढ़ौनहि रहय कि गेटक सटले कतेको युग सँ ठाढ़ बडग़ाछक एक टा पैघ सनडारि टूटिक' हड़हड़ाइत गेट पर खसलै। ओकरा लगलै, पृथ्वी दलमलित भ' गेलैआकि ओहि गाछ संग पूरा वियारं बिल्डिंग भरभराक' खसि पड़लै! कत' गेलै पॉलिथीन पैकेट सभ, कत' खसलै झोड़ा आ कोकहर अपने ढनमनायल; तकर कोनो ठेकान नइँ रहलै!...बड़ीकाल बाद होश अयलै, तँ ओ कराहि जकाँ रहल रहय। ओकरा पयरलग भीजल सन किछु डारि-पात बुझेलै आ माथ लग सर्द देबाल। देबाल टोब'क क्रम मे ओकर हाथ अपना माथ पर गेलै। ओत' लसलस सन किछु सटल जकाँ बुझेलै। ओ ओकरा रगडि़क' पोछबाक प्रयास कयलक, तँ भीतर सँ पातर सन दर्दहुल्की मारलकै।
तखन ओकरा ई बुझबा मे भाँगठ नइँ रहलै जे ओकर कपार फुटि गेलै आताहि पर शोणितक थकका जमि गेल छै। मुदा तैयो ओकरा ई भान नइँ भ' रहल रहैजेे ओ कत', किऐ आ कोन परिस्थिति मे पड़ल छलै।...
किछु क्षण आरो बीतलै तखन ओकरा नीचाँ सीमेंटक सतहक भान भेलै। कि पयर मोडि़ हड़बड़ाक' बैसल आ घबड़ाक' चारूकात हथोडिय़ा मार' लागल।अचानके ओकरा हाथ मे काँचक एक टा चोखगर टुकड़ी गड़लै आ दर्द सँ सिसिया उठल। मुदा क्षणे बाद ओ फेर हथोडिय़ा द' रहल छल। हथोडिय़ा मारैत ओबदहवाश छल। कि एक ठाम फर्श पर किछु तेजगंधवला तरल पदार्थ बुझेलै। ओहि गंध केँ परख' मे थोड़ समय लगलै, मुदा जहिना ओकरा गंधक पहिचान भेलै कि सभ किछु स्मरण भ' अयलै।आब ओ जल्दी-सँ-जल्दी सीढ़ी ताकबा लेल व्यग्र छल। ओकरा कोनोहालति मे शीघ्र पहिल मंजिल पर स्थित अपन कक्ष मे पहुँचबाक छलै। ओहि कक्षमे जत' इजोतक कैक टा वैकल्पिक साधन रखने छल ओ। ओकर कुञ्जी ओकराजेब मे छलै। बामा जेब मे हाथ द' कुञ्जी छूबिक' ओ आश्वस्त भेल। कि ओकरा कोना क्षण अपन संगी सभक आबि जयबाक आशंका भेलै। अन्हार मे घड़ीअकाजक छलै, से झट ओ दहिना जेब मे राखल मोबाइल निकाल' चाहलक जाहिसँ अन्हारो मे समयक ज्ञानक संग क्षीण-सन इजोत सेहो भेटि सकै छलै। मुदा जेबसँ बहरेलै दू-तीन भाग मे अलग-अलग भेल मोबाइलक पार्ट-पुर्जा! आब ओकरघबड़ाहटि आरो बढि़ गेल छलै। अन्हारक सोन्हि मे ओ तेना भुतिया गेल जे दिशाक कोनो ज्ञाने ने रहि गेल छलै। आरो किछु काल धरि बौअयलाक बादो जखन थाह नइँ लगलै, तँ अन्हारक कोनो अज्ञात स्थल पर ओ सुस्ताब' लागल छल। सुस्ताइत-सुस्ताइत ओकरा भीतरहँसी जकाँ किछु फुटलै। ओकरा मोन पड़लै जे एतबे टा जिनगी मे ओ कतेक बिहडि़धाँगि आयल छल। लगभग एक दशक तँ अण्डरग्राउण्डे रहल छल। केहन-केहन कठिन ऑपरेशन सफल कयने छल। कतेक मुठभेड़, कतेक काउन्टर मे बमगोलीक बीच सँ निकलि आयल छल ओ!... ओकर ई इतिहास आइयो कतेको युवा केँ प्रेरणा दैत छलै।अपन स्वर्णिम अतीतक स्मरण सँ ओकरा भीतर साहसक संचार भेलै।उठिक' सावधान मुद्रा मे ठाढ़ भेल आ दृढ़ निश्चय क' एक सीध मे थाहि-थाहिक' बढ़' लागल। किछुए क्षण बाद सहसा ओकरा ठेहुन सँ किछु टकरेलै। हाथ सँ छूबिक' ओ परखलक—आगू मे कुर्सी छलै। फेर हाथ बढ़ाय क' ओ एकहर-ओकहर टटोललक—कुर्सीक पतियानी लागल छलै। तत्काल ओकरा बुझबा मे आबि गेल छलै जे ओ फुजले रहि गेल दुआरि सँ मेन हॉल मे आबि गेल छल। तखन कुर्सीदर-कुर्सी पकड़ैत ओ बीचक रस्ता ध'क' सभ सँ आगूक कुर्सी धरि पहुँचि गेल।एत' पहुँचि ओकरा सब किछु सुरक्षित जकाँ बुझेलै। से ओ ततेक आश्वस्त भ' गेलजे आराम सँ ओहि कुर्सी पर बैसि पयर पसारि देलक।आब ओकरा मेहमान मित्र सभ सँ पकड़ेबाक कोनो चिंता नइँ रहलै। तेँ धीरे धीरे ओ ओकरा सभ केँ बिसरय लागल छल। कि तखने सेलिब्रेट करबाक अवसरक महकाा मोन पड़लै। मोन मे कनेक कचोट भेलै। मुदा एते पैघ नाट्य-अनुभव ओकरासभ स्थिति मे तालमेल बैसायब सिखा देने छलै।
आब ओ सहज भ' जयबाक स्थिति मे आबि रहल छल कि ठीक तखने मंचक बीचोबीच खसैत प्रकाशक एक फाँक मे ओकर प्रतिरूप ठाढ़ देखा पड़लै।क्षणभरि मुरुत जकाँ ठाढ़ रहलाक बाद प्रतिरूप अचानक बाजल, ''रौ मीत, किऐदु:खी छें?
''अयँ!... तों के?" ओ अकचकाइत पूछलकै।
''नइँ चिन्हले हमरा?... कोनो बात ने! चिंता नइँ करय, दुनिया एहिना चलै छै!" प्रतिरूप मुस्किआइत कहलकै।
''मुदा छें के तों?" ओ फटकारैत पूछलकै आ उठिक' ठाढ़ भ' गेल।
''हमरा चिन्हि क' की करबें? दुनिया तोरा चिन्है छौ! दोसर खेमाक लोक के गरियाबैत रह! ओ सभ पतीत छै, कुपमंडुप छै, समाज केँ पाछाँ ल' जायवला छै।ओकरा ई सभ कहला मात्र सँ समाज बदलि जयतै आ तों महान भ' जयबै! फेरअंग्रेजी बोहु-बेटी घर अयतौ। स्टेटस बदलि जयतौ! बेचारी बहिन हिंदी बड़अलच्छी, बाड़हनि झाँट!... प्रतिरूपक स्वर संयत छलै।
''तों हमरा पर व्यंग्य करै छें?" ओ फेर बिगड़लै।
''व्यंग्य?... एहि सभ पर तँ तोरा महारत छौ। बस लिखैक फुर्सति नइँ छौ। नेतँ आलोचक जीक गुरुद्वारा मे माथ टेकिते कोर्स मे लागि गेल रहितौ। आचार्यक प्रसाद पबिते साहित्य अकादेमी भेटि गेल रहितौ!"
''हम कोर्सक भूखल नइँ छी। आचार्य आ आलोचक जी केँ ठिठुआ!...
साहित्य अकादेमी चाहबे ने करी हमरा! हम ओहि पर थुको फेक' नइँ जायब। हमतँ व्यापक सामाजिक परिवर्तनक आकांक्षी छी। समातामूलक वैज्ञानिक सोचक आग्रही। सदिखन जनते टा हमरा नजरि मे रहै अछि।" ओ आक्रोश सँ भरल स्वर मे गरजलक।
प्रतिरूप थपड़ी पाडय़ लगलै, ''वाह! वाह! कतेक कर्णप्रिय लगैत अछि ईसब! अद्ïभूत!... जँ सरिपहुँ एना होइतय!...सय मे निन्यानबे टा मैथिली भकत दुमुँहेबहराइतय?..."
ओ छड़पि क' मंच पर चढि़ गेल छल, ''तोरा बुझल नइँ छौ, मंच परडायरेकटरक इच्छाक विरुद्ध केओ एको क्षण ने रहि सकै अछि! जल्दी भाग! हम
की क' सकै छी से बुझले ने छौ तोरा!"
''डायरेकटर छें तों?... धुर्र! अपन कोठलीक ताला तँ खोलिए ने सकै छें! जोतँ अपन कोठली?..." प्रतिरूप ओहिना ठाढ़ रहलै।
ओ तामसे कँपैत कुञ्जी निकालि लेलक, ''देख, देख कुञ्जी हमरा हाथ मेअछि। देख!..." कि तखने ओरा हाथ सँ छिटकि क' दर्शकदीर्घा दिस गेल कुञ्जीअन्हारक समुद्र मे डूबि गेलै।
अचानक प्रतिरूप जोर-जोर सँ हँसैत ठहाका लगब' लागल।
अपमान सँ माहुर होइत ओ प्रतिरूप केँ मारै लेल दौड़ल। प्रतिरूप अलोपित भ' गेलै। मुदा अन्हार मंच पर ओ बताह जकाँ दौडि़ रहल छलै। कि हठात चारि फुटनीचाँ मंचक आगू मे ओ अरर्रा क' खसल—धड़ाम! ...  
अस्पतालक बेड पर पड़ल-पड़ल ओकरा लगलै, भीतर सँ ओ खुकख भ' गेल,
एकदम कोढि़ला!...
देह पसेना-पसेना छलै! कंठ सुखाय लागल छलै। बामा हाथक कुञ्जी दहिना जेब मे नुकबैत बड़ प्रयास क' ओ बगलक सोफा पर सूतल नवतरिया कवि केँ आवाज देलक।
अकचकाइत जागल ओ कवि ओकरा संकेत पर गिलास मे पानि भरि आनलक।ओकरे सहारा पाबि माथ अलगा क' ओ दू घूट पानि पीबि असोथकित जकाँ पडिऱहल।
नवतुरिया दया भरल नजरिएँ एकटक ओकरा देखैत रहलै। सामनेक खिड़कीक
साफ होइत काँच भोरक आभास द' रहल छलै।

की हमहूँ रहबै कुमार - मदन कुमार ठाकुर

यौ पाठक गण की कहू अपन मिथिला राज्य चौपट भ' गेल ( से कोना यौ ) एक त कमला कोशीक दहार आ दोसर दहेज़ प्रथाक व्यवहार ! कमला कोशी लेलक पेटक आहार त दहेज़ प्रथा केलक आर्थिक लाचार ! कन्यादान से कतेक पिता लोकनि सेहो भेला बीमार आ कतेको बर छथि ओही बाधा सँ सेहो कुमार आ बीमार ! ओही सभ बात के लs क' हम नब युबक संघक बाधा कs ल'क' पाठक गणक समक्ष मैथिल आर मिथिला पर हाजिर छी.......


जय गणेश मंगल गणेश, सदिखन रटलो मंत्र उचार !
सभ बाधाक हरय बाला, कते गेलो अहाँ छोड़ि संसार !!
अपना लेल अगल - बगल मे, हमरा लेल किए दूर व्यवहार !
आब कहू यो गणपति महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार... !!


बरख बीत गेल देखते देखते, जन्म कुंडली मे थर्टी ! (३०)
दहेजक आस मे हम नै बैसब, हमरो उम्र भो जेत सिक्सटी !! (६०)
गाम - गाम मे जे के बाजब, बाबू हमर छथि दुराचार !
आब कहू यो बाबू - काका, की हमहूँ रहबै कुमार... !!


ब्रह्म बाबा के सभ दिन गछ्लो, लगाबू अहि लगन मे बेरापार !
ओही खुशी मे अहाँ के देब, हम अपन गाय के दूधक धार !!
हे कुसेश्वर हे सिंघेश्वर, अहाँक महिमा अछि अपरम पार !
अहि लगन मे पार लगाबू, हम आनब दूध दही आ केराक भार !!
आब कहू यो भोले दानी, की हमहूँ रहबै कुमार .......


सौराठ सभा मे जे के बैसलों, सातों दिन आ सातो राति !
कियो नै पुछलक नाम आ गाम, की भेल अपनेक गोत्र मूल बिधान !!
घर मे आबी के खाट पकरलो, नै भेल आब हमर कुनू जोगार !
आब कहू यो बाबा - नाना, की हमहूँ रहबै कुमार !!


दौर - दौर जे पंडित पुर्हित, सभ दिन पूछी राय बिचार !
पंडित जी के मुहँ से फुटलैन ई बकार ..........
जेठ अषाढ़ त बितैते अछि, अघन से परैत अछि अतिचार !!
आब कहू यो पंडित पुर्हित, की हमहूँ रहबै कुमार .....


नै पढ़लो हम आइये - बीए, छी हमहूँ यो मिडिल पास !
डॉक्टर भइया - मास्टर बहिया, ओहो काटलैथ एक दिन घास !!
ओही खान्दानक छी यो हमहूँ, जून करू आब हमर धिकार !
आब कहू यो बाबू - भैया, की हमहूँ रहबै कुमार !!


गोर - कारी सभ के रखबै, लुल्ही - लंगरी से घर के सजेबई !
बौकी पगली के दरभंगा में देखेबाई, कन्ही कोतरी से करब जिन्दगी साकार !!
आब कहू यो संगी - साथी, की हमहूँ रहबै कुमार ..........


अघन के लगन देख हम झूमी उठलो, जेना करैत अछि नाग फुफकार !
लगन बीत गेल माघ फागुन के, गुजैर रहल अछि जेठ अषाढ़ !!
अंतिम लगन ओहिना बितत, नैया डूबत हमरो बिच धार !
आब कहू यो मैथिल आर मिथिलाक पाठक गन, की हमहू रहबै कुमार !!

नब युवक के बातक रखलो मान, शादी.कॉम में लिखेलो अपन नाम !
नै कुनू भेटल कतो से मेल, लागैत अछि जे ईहो भेल फैल !!
कतेक दिन करब मेलक इंतजार........
आब कहू यो कम्पूटर महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार !!

भोरे उठी गेलो खेत खलिहान, उम्हरे से केना एलो कमला स्नान
देखलो दुई चैर आदमी के, बात करैत छल कन्यादान !
पीड़ी छुई हम भगवती के, पहुँच गेलो हम अपन दालान !!
हाथ जोरी हम सबके, विनती केलो बारम् बार !
आब कहूँ यो घटक महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार !!





मदन कुमार ठाकुर,
कोठिया पट्टीटोला,
झंझारपुर (मधुबनी)
बिहार - ८४७४०४.

Wednesday, February 18, 2009

पहिल डेग-उपेन्द्र दोषी

आ तीनू गोटे बड़ी काल धरि चलैत रहल। चुपचाप। नि:शब्द। आगू-आगू मङर मने सुक्कल मङर, बीच मे चिना माय, सुक्क्लल मङरक घरनी आ तकरा पाछू कल्लर ठाकुर – गामक अधलाह काज मे बाँहि पुरनिहार।
पीच रोडक दुबगली घर सभ रेखैत कल्लर चौंकल –आरे तोरी के! मङर, थुम्हा आबि गेलै हो।
मङर हँ हूँ किछु नहिं बाजल। बस, खाली डेग दैत बढैत रहल। निसाभाग राति मे अनठिया लोक आ लोकक बोली सुनैत दोकानक आगू मे ओङहाइत मोर पाँचेक कुकूर दौड़लै झाँऊ-झाऊँ करैत्। चिनिया माय डरे सहमि गेलि आ मङरक लग चलि आएल। ओकरा कुकूर आ चोर दुनूक बड डर होइत छैक्। लगै जेना ओ जोर स चिचिआय लागति। ओकरा थरभस लागि गैलै आ मङरक लग ठाढि जकाँ भ गेलि। ओकर जाँघ जेना लोथ भ गेलैक आ पायर बान्हल सन बूझना गैलैक। पाछू-पाछू चलैत कल्लर ताबत लग आबि गैलैक –“चलू ने मङराइन चलू! कुकूर तँ एहिना भूकत! हाथी चलय बजार कुकूर भूकय हजार! चलू!”
मुदा पसेना स तीतलि चिनिया-माय की बाजौ? ओकर कंठ जेना फुजबे ने करैक। ताबत किछु आर कुकूर संग भ क तीनू गोटेक आगू पाछू भूक लगलै। कुकूर सभ भूकैत-भूकैत जखन आसमान माथपर उठाब चाहलकै त मङर अपन ठेंङा रोड पर पटकैत – फट-फट क कुकूर के डाँट लगलै, मुदा कथी लै कुकूर सभ गुदानतैक। तहन कल्लर उसाहलक अपन ठेंङा आ झटहा जका फेक क चाहलक कि कुकूउर नांङरि सुटका भागल दोकान दिस। थोड़ेक फरा कजाक फेर भूक लागल। चिनिया-माय के जेना जान मे जान अयलै। ओ फक द निसास छोड़लक। खा पोसनिहार सब के! चिनिया माय डेराइते बाजलि।
-- चुप रह चल चुपचाप। मङर धोपि देलकै।
-- मौगि कथु जाति, अपन सोभाव नहि बिसरति। मङरक स्वर मे सह दैत कल्लर समर्थन कयलकै।
-- सैह न कह्। कहलकै जे चालि, प्रकृति, बेमाय, तीनू संगहि जाय। त अनेरे तखनी स घाठि फेनने छै। चिनिया माय खौंझाइत कहलकै।
-- रौ बहिं…हमरे धोपै-ए! कल्लर? सुनहक! कहलकै जे अहीर बुझाबय से मर्द। गै, अखनी जे तू गारि पड़लीही से जँ सुनितौ रहे, आ आबि क चारि सटका पोनपर ध दितौ त केहन लगितौक।“मङर फेर चिनिया माय के रेवाड़लक।
--छोड़ि दहक मङर, तोंहि चुप भ जाह। कथी लै लगैत छह मौगी स। मौगी होइ-ए धीपल खापड़ि। एक मुट्ठी बातक तीसी जहाँ पड़ल की लागल चनचनाय।“ कल्लर स्थितिके सम्हारैत बाजल।
--मर, हम त कुकूर के कहलिएक। लोक के कहलिएक थोड़े! कहलकैक जे –घेघ छल तोरा, उछटे गेल मोरा – चिनिया माय साँचे चनचना उठल।
-- खैनी खेबहक मङर? – गप्प आ स्थिति के दोसर दिस मोड़ैत कल्लर पुछलकै।
--ओह बहिं। कुकूरो सभ किछु आँखि देखलक-ए! देख ने कोना हवाइ लुटने अछि। मङर कुकूर दिस फेर ठेङा उसाहलक।
कुकूरक अनवरत भूकब सूनि एकटा दोकानदार बल स उकासी आ खखास कैलक। सड़कक दोसर कातक दोकानदार टार्चक रोशनी एहि तीनू गोटेपर फेकलक आ पुन: सूति रहबाक उपक्रक कर लागल। पानवाला झाजीक निन्न सेहो टूटि गेलैक।
--की छिऐ हौ सुमरित? कुकूर बड़ लगै छै? झाजी ओंङ्घायल स्वर मे पुछलकै।
--नै कुच्छो! बटोही बाबा। सुमरित बातके अनठबैत कहलकै।
--एते रातिक बटोही? झाजी फेर टोकारा देलकै। खौंझा गेल सुमरित्। इह! इहो बुढबा जे है। सुतत से नै, त कथी है करै-ए। मुदा झाजी के मुँह पर की कहौ? तह दैत बाजल – हौतै कोई, साथमे एकटा जनानियो हई।
--आँय! जनानियो है? – झाजी जेना के जेना धरती पर स्वर्ग भेटि गेलनि। जरूर ई उढरा-उढरी होयत। जरूर ककरो ल क पड़ायल होयत। झाजी फनिक क गुमटी सँ आबि गेल। कुकूर सभक आ झाजीक कोरस सूनि लगभग पूरा थुम्हा बजार जागि गेलै। बजारे कोन? गोट तीसेक घर कुल मिला क। पीच रोडक दुबगली। धिया-पूताक धरिया जका पसरल।
से झाजी सङ झटकल चारि गोटे आर। दौड़ल तीनू के रोकय लेल। कल्लर पाछू तकलक आ सहमि क ढाढ भ गेल।
--कहाँ रहै छ? ढाढ रह – झाजी डपटि क बाजल। चिनिया माय आसन्न भय स प्रकम्पित भेलि मोने-मोन गोहारि कर लागल -- जय हो खेदन बाबा, जय कारू बाबा!
--कहाँ रहै छह? – चाहबला छौड़ा बाजल।
-- रामनगर। -- कल्लर बाजल।
-- कोन रामनगर? – झाजी डपटैत पुछलकै।
-- हरदी-रामनगर। मङर पाछू घुनैत उत्तर देलकै।
-- जेब कहाँ? – सुमरित चिनिया माय के मुँह पर टार्च बारि क रोशनी फेकैत पुछलकै।
-- सुपौल जयबै बाबू। -- कल्लर मिरमिराइत बाजल।
सुमरित आ झाजी चिनिया माय के देखलक आ सोचऽ लागल। गोर अदक देह। छाती आ बाँहि गोदना सँ छाड़ल। नाक मे करीब एक भरिऽक लोलक निचला ठोर पर लटकैत। करीब चालीसक वयस, मुदा शरीर कटगर। झाजी जखन-जखन एहन लोक के दैखैत अछि – लोलऽक लेल सोचऽ लगैत अछि। सैह, ई मौगी खाइत होयत तँ लोलक मुँहमे नहिं चल जाइत होयतैक? थूक फैकैत होयत तँ लोलक पर सभाटा लटकि जाइत होयतैक? मुदा झाजी एखन किछु नहिं सोचलक। बाजल – सो सभ कुछ नहीं होगा। हम निगरानी समिति का सेकरेटरी है। रात भर तुम लोग हियाँ रुक जाव। भोर मे जहाँ जाना है चला जाव। एतना रात को जाने नहीं देगा। रात को औरत लेके चलेगा? की हौ छब्बू?
--हँ मालिक! – चाहबला छौंड़ा हुँकारी भरलकै।
-- से की हम कोनो अनकर मौगी लऽ कऽ जाई छियै? अपन घरनी के लऽ कऽ जाइ छी।
-- चोप! तामस चढाता है, घरनी का भरुआ। एतना रात को चलेगा? झाजी फेर दबारलक।
मुदा बाह रे कल्लर! दिमाग मे जेना प्रश्नऽक सही उत्तरि भेट गैलै। ओ कने एकांत भऽ गेल। आ एक दू गोटे के अपना दिस बहटारि लेलक। बाजल – असल मे मङराइन के केन्सर के बीमारी भेल छै। ब्लाकऽक डाकटर कहलकै जे पटना मे जल्दी देखा ले। सम्भव आगूओ जाय पड़त। तेँ बाबू भोरका गाड़ी पकड़ऽ लेल धड़फड़ायल छिए। नहिं त रामनगर आ सुपौल कोन दूर? दू-अढाई घंटाक रास्ता।
-- केन्सर? – सभ फुसफुसायल अपना मे। सुमरित पहिने हनछिन-हनछिन करैत रहय। भारी बीमारीक नाम सुनि छौंड़ो सभ पाछू हटऽ लागल। तखन झाजी बेचारे की करत? – अच्छा रमनगर के गंगाधर झा के चिन्हैत छहका?
-- ओ तऽ हम पड़ोसिये छथि! – कल्लर बाजल।
-- आ राजीन्दर बाबू के?
-- ओ हम्मर पड़ोसी – मङर बाजल। हबैन तक हम हुनके हऽर जोतैत छलियैन।
बड़ बेस, जाह। मुदा देखऽ रातिकऽ चलै छह, नीक नहिं करै छह। -- झाजी हारल जुआरी जकाँ बाजल।
-- की करबै मालिक! कोनो की सऽखसँ रातिकऽ चलै छी? जाउ आहाँ सुतू गऽ। परनाम! कल्लर पिण्ड छोड़बैत बाजल।
-- अच्छा, सुनऽ, गाँजा-बाजा तऽ ने छऽ संग मे? – फेर झाजी पुछ्लकैक।
-- नहिं मालिक, जाउ निचैन भेल।
झाजी अपन गुमटी मे फिरि आयल आ अंङैठी-मोड़ देबऽ लागल। हाँफी। हाँफी पर हाँफी।
कुकूरो सभ अपना सीमान सऽ टपल बूझि चुप भऽ गेल। थुम्हा बजारा से इहो तीनू टपि गेल। आब कारी स्याह पीच रोड आ रोडक दुबगली बबूरक बोन। रातुक अन्हार मे कारी सड़क आर कारी लागऽ लगलैक। भारि अकास जनेरक माबा जकाँ तरेगन छिड़िआयल रहैक आ भिखमंगाक फाटल कंबल सन सहस्त्राक्ष लगैक।
बबूरोबोनि जखन टपि गेल तऽ तीनू कने आफियत अनुभव कयलक्। भीड़ स बेदाग निकलि कऽ चलि आयल तकर प्रसन्नता सबऽ सऽ बेसी कल्लर के छलैक। कारण स्थितिक गंभीरताके वैह बुझने रहैक। मङर- मङराइनक हेतु धन-सन। जेना अदना सन गप्प भेल होइक। कल्लर प्रसन्नता सँ उठौलक पराती – तीन देखहुँ जात, सखि हे तीन देखहुँ जात! कमल नयन, विशाल मूरति, सुन्दरी एक साथ! सखि हे! इह! बरगाही भाइ, ठकुरबो जे है, अतत्तह करैए। अरे दुपहरिया राति मे पराती गबै-ए चलऽ की चुपचापे! – मङर अकछाइत बाजल।
-- आब की राति धयले छै? भोर त भऽ गेलै। -- कल्लर बाजल।
-- “रौ बहिं, डंडी-तराजू माथ सऽ कनिये हठ भेलै आ भोर भऽ गेलै? कम सऽ कम एखन एक पहर राति आर छै। देखहक—“ मङर कल्लर के बहटारलक आ आकास मे उगल त्रिशंकु दिस इशारा करऽ लगलैक।
-- अच्छा छोड़ऽ -- कल्लर अनठबैत कहलकै।
-- ‘तखन तेजू मिसर की सभ केलक मङराइन?”
-- मङराइन जे मानसिक रुपे गाम आ बथान मे ओझड़ायल छलि, साकांक्ष होइत बाजलि – ओना परोछक बात छै, लेकिन हमरा तेजू मालिक किछु नै कहलक। हमर हाथो नै धयलक। बाटे धयने आयल, बाटे धयने गेल।“
-- सुनलहक मङर? भऽ गेलऽ! लड़ि लेलऽ मोकदमा? हम तऽ पहिने कहलियऽ, मौगीक विसबास नहिं।“ – कल्लर स्पष्ट कऽ देलकै।
मङर अपन फराठी सम्हारैत लागल रेड़ऽ -- गय मौगी, तेजुआ…! गय, हाकीम पुछतौ तऽ इहे कहबही। गाम आ सुपौल सभ घिनाओत ई मौगी। देखि ले डांङ। ठीक-ठीक जे कल्लर सिखौलकौ, हाकिम लग कहऽ पड़तौक। ने तऽ देखि ले। एही डाङ सऽ डेंङा देबौ। सुक्कल मङर के तों एखन चिन्हले कहाँ? – मङर हकमि जकाँ गेल।
-- कुच्छो करऽ, हमरा लाज होइ-ए। ई बात हमरा हाकिम लग कहल पार नहिं लागत्। हम गामे सऽ कहैत अबै छियऽ। मारि देबऽ तऽ मारि दऽ। चढा दऽ चाँपे। मुदा हमरा बुते ककरो आगि उठाओल पार नहिं लागत। बेचारा हमर किछु बिगाड़बो नै केलक तऽ हम अनेरे कथी लेल दोख दियौक। झूठ बाजि कऽ की?” – चिनिया माय घनघनाइत कहलकै।
-- गय, सोनाक टुकड़ी खेत कबुआ लेलक। मालक बथान लेल मोंछ पिजबै-ए आ तों कहै छे हमर कुच्छो नै बिगाड़लक? दही न अथी कराकऽ ओकर रुप्पैया, जे करजा सधाकऽ खेत छोड़ायब।“—मङर चिनिया माय के गरिअबैत बाजल।
-- “दौक ने देह बेचिकऽ टाका जहाँ सँ होई छै तहाँ से। करजा खेलकै ई, एकर बाप, आ देबै हम?” – चिनिया माय बिक्ख होइत लोहछैत बाजल।
-- “गय, तों हमरा बापके कहबे?” फटाक- फटाक। -- आ मङर बैसा देलकै दू डाङ चिनिया माय के पोन पर।
-- “मङर, हम पहिने कहलियऽ। एकरा बूते नहि होएतऽ। ई तऽ तेजुएक राज़ी छऽ। ओकर सिकैत बजतऽ? ई तऽ गोटे दिन तोरे माहुर खोआ देतऽ।“ – कल्लर ललकारा देलकै।
-- “रै कोढिया! पुतखौका ! तोरे घरनी सन सभ छै? तोरे घरनी जेना जुगल सिंह सङे फँसल छौ, तहिना बुझै छिही। बड़ पूर बनऽ चलला-हे। हम जेना जनिते नहि छियनि?” – चिनिया माय कसिकऽ कल्लर ठाकुर पर प्रहार कयलकै।
कल्लर ठाकुर एहन प्रहारक कल्पनो नहिं कयने छल। तिलमिला गेल। “तखन लिहऽ खेतक साँती बाप बलाऽ…।“ – कल्लरो ताव मे आबिकऽ बाजल। “मङर एहिसँ नीक तँ चिनिया। तोहर बातो मानैत छह। फट फट जबाबो दितैक हाकिम के। इह। पौ बारह!”
-- रौ कलरा, किछु भऽ जाउ, हम अपना बेटी के बजार नहिं चढायब। एखन ओकर गौना करबाक अछि। ओकरा हाकिम लग ठाढ करबै तऽ हम रहब कहीं के? गौना होयतैक? कुटुम की कहत? नहिं ई नहिं होएत। ओ तऽ पाहुन थिक। हमर लोक थिक थोड़े? ई जे हमर लोक अछि तकर ई हालति …।“ --- कहैत कहैत मङर पित्ते लह-लह करऽ लागल।
बेटीक मादे सुनैत देरी चिनिया माय जेना उग्र भऽ गेलि। ओकर सौंसे देह काँटो-काँट भऽ गेलैक। उनटि कऽ ओ कोन फुर्ती सऽ कल्लरक पेट हबकि लेलकै से कल्लरो के पता नहिं चललैक। कल्लर बफारि तोड़ऽ कानऽ लागल। आ, पेट मे दाँत गड़ौने चिनिया माय संज्ञा शून्य भऽ गेलि। बड़ी का पर होश भेलै तऽ तर मे कलराक ऊपर सऽ स्वयं के पड़ल देखि हड़बड़ा गेलि चिनिया माय। उठलि आ लागलि बड़बड़ाय – हम अनकापर पाथर नहिं फेकबै, नहिं फेकबै। किन्नहु नहिं, किन्नहुं नहिं। बताहि भऽ गेलि चिनिया माय। मङर बामा हाथे फराठी आ दहिना हाथे माथ पकड़ि बैसि गेल। खन कल्लर के देखय, खन चिनिया माय के। डंडी तराजू पछिमा अकास मे लटकि गेल रहैक। त्रिशंकुक निचला तारा जका मङर लटकि गेल रहय। की करौ? की करौ ओ?

चिनबारक दीप–उषा किरण खान

समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक। नबका अटैची के राग तर नीक जऽका दाबि लेलकै। डिब्बा मह’क सभटा यात्री तऽ भरि दिनुक चीन्हले-जानल छैक। भतीजीक विवाह छैक से गाम जाइत छैक। ओ अगिले टीसन पर उतरि जयतैक। ताहि सऽ बगलबला बाबू कोनो लड़िकाक उदेस मे पटना गेल छलैक्। आ गेट लग ठाढ बाबू भारी गुम्मा छैक। टोकलो पर नै बजै छैक। कोन टीसन जैतै, की करतै। एक्को बेर मुँह पर मुसकियो ने अयलै। ठोरो नै पटपटौलकै। “बाप रे बाप, एतीकाल धरि जौं हम चुप रहि जाई त मुंहे फरि जायत। गे दाई!” मोने-मोन विचारलक। मोन भेलै कहै – “हो बाबू, निम्मन से बैठू ने, हबा नै लगइये”। मुदा चुप्पे रहल।

महेसरीक घरबला एकटा कुमारि आ एकटा बियाहलि बेटी लऽ कऽ गामे मे रहै छलै। जवानी समय मे रिक्शा चलबैत रहै आ महेसरी दाइक काज करैत रहय। सुख सऽ रहय। ससुर मुइलैक तखन जमीन बाँट-बखरा भेलै आ बिगहा डेढक एकरो हिस्सा भेलैक। ससुर जा जिबैत छलै एकटा खुद्दियो नई परि लागऽ देलकै। नबकी बहु संग सभटा जमीन लऽ कऽ आतरि-चातरि भेल रहैक। मुइला पर कामति गाम नहिं छोड़ैत छल। एकटा बेटीक बियाह तऽ पहिने कयने रहे, दोसर बेटिक बियाहक सरंजाम जुटबऽ लेल महेसरी गाम छोड़ि पटना सेवने छल। पटना मे मारे इतियौत-पितियौत भाइ-बहिन सभ रहैत छैक। तकरे संगे रहि छौ डेरा मे चौका-बर्तन करैत अछि महेसरी।

“हे गे बहिन, अपन समान सब ठीक सऽ रखिहैन आब। अइ गाम जाएबला गाड़ी मे ने बिजली छै ने बत्ती”। -- सगबे भाइ कहकै।
“ठीक से हय हमर समान”। -- महेसरी घोकरी लगा लेलक।
“है तऽ सेहे”। -- दोसर भाइ बजलै।
“रे बाबू गरीब आदमी छी, डेरा मे कमा कऽ जमा कैली इ सब सरंजाम के लेत हमर समान?”
“की सभ समान? तोरा सभ के तऽ बेसी लगै छऽ नहिं” – सामनेबला बाबू पुछलखिन।
“यौ बाबू, हमर जे जमाय हय ने, से दमकल के मिस्तिरी हय। तनी-मनी जमीनो-जाल है मरदाबा के। से ओक्कर मुंह बड़का गो है। घड़ी-साइकिल-रेडियो। लत्तो-कपड़ा खपसूसरत कहै छै”।
“तऽ देबही से सब?” – दोसर यात्री पुछलखिन।
“हँ सरकार, एगो मलकीनि है, से हरदम डिल्ली जाइत रहै छै, कल-पुरजा के कारबार हई। ओकरे से घड़ी आ रेडियो मंगबेलियै। पटना से आधा दाम मे हो गेलै”।
“बाह, तखन तऽ लेलहक समान”।
“त ए सरकार, एगो मलकिनिया हय मरबारिन। तऽ ओकर बक्सा मे कोंचल हय रंग-बिरंग के सरिया। ऊहे हमरा एगो जरी के काम कएल साड़ी देलक। पीयर टूह। हम कहली जे होली-दसहारा के साड़ी न दिऊ, ई साड़ी दे दिऊ। आ बाकी मलकिनियाँ सब से साड़ी ले-ले कऽ रखले रही से सब ले जाइ छी। बेटी के सांठे के न परबाह हय”।
आ लड़का के कपड़ा? से तऽ कीनने हेबहऽक”? --- बाबूक जिज्ञासा रास्ता कटबाक साधन सेहो छलनि।
“लड़िका के कपरा किन लेलियै। बेटी के लेल एगो पायल आ बालचानी के किनलियै। बड़ा महग हो गेलै…”।

दरबज्जा लग ठाढ अरुणक कान मे सभटा पड़ैत छैक आ कनपट्टी पर धम-धम होमय लगैत छैक। आइ तीन बरख पर गाम जा रहल अछि अरुण। बाबू बीमार छथिन आ बहिनक द्विरागमन हेतै। बाबू बड़ कलपि कऽ लिखने छथिन आबऽ लेल। सरंजामक ओरियान कऽ नेने छथिन, खाली घड़ी आ रेडियो तों नेने अबिहक --- से बाबू लिखने छलखिन। अपना जेबी के टेबलक अरुण। मात्र डेढ सै टाका छैक। एकटा निसास छोड़लक। गाम मे बीए पास कऽ क बैसल रहय तखन बाबू केहन-केहन कटुक्ति सब कहि मोन बताह कैने रहथिन। एत्तुका लोक के नोकरी भेटै छै कि नय? अरुण सबटा बर्दाश्त कऽ खेत-पथार जाइते रहल। एक्केटा पुत्र रहथिन। बूझथि बाबू स्नेह सऽ कहैत छथि। कनियाक द्विरागमन भेला पर अरुण के कटुवचन अखरय लगलनि। बाबू दिनानुदिन बेसी कटु भेल जाइत छलखिन। माय सेहो थारी संग पहिने उपदेश पाछा उलहन आ आब गारि परसऽ लागल छलथिन। तखन अरुण हारि कऽ गाम छोड़ि देलक। तीनटा ननदि सबहक बीच एकटा भाउजि अरुणक कनिया नैहर चल आयलि छलीह। आ एमहर-ओमहर एँड़ी घसैत अरुण कोनो खानगी व्यापारी ओतय टाइपिस्ट भऽ गेल छलाह। कनिया सेहो संगे रहय लागल छलखिन। छौ मास पहिने कनिया के एकटा बच्चा नष्ट भऽ गेल छलनि। ओ अत्यन्त रुग्ण भऽ गेल छलखिन। अरुणक सीमित आमदनी ओही मे स्वाहा भऽ जाइत छलनि। कतेक पाइ हथपैंच भऽ गेल छलनि।

“दुनू परानी मिलि कऽ कमयली ए बाबू, तब न बेटी के आइ साँठ-राज करै छी। की बरक-बरका लोक करत ऐसन साँठ-राज”। --- महेसरी जोर-जोर सऽ बजै छल। आ अरुणक कान मे अपना कनियाक कुहरनाइ धमकऽ लगलनि। कोनो काजक नहिं छथि। अरुण मोनेमोन विचारय लागल। गामक साधारण घरऽक बेटी छथि, मुदा दुनू बेकतीक काजो नै सपरै छनि। मोनेमोन खौंझाहटि उठलनि। फेर विचारय लगलाह। ओहि मे हुनकर कोन दोख। जेहने शिक्षा-दीक्षा भेटतनि तेहने बुद्धि-अक्किल हेतनि। बिसरल-भटकल कत्तहुँ सऽ कहियो कोनो चिट्ठी अबै छलनि। परसू चिट्ठी भेटलनि बाबूक तऽ बड्ड अचरज भेलनि। क्षणहि मे अचरज बिला गेलनि। छोटकी बहिन प्रमिलाक द्विरागमन मे बच्चा आ कनियाँ के बाबू बजौने छथिन। अरुण पत्र पढि चिन्तित भऽ उठल छल। कतऽ सऽ ओ बाबूजीक फरमाइश पूरा करथिन?

“ई पहिले पहिल बाबू मुँह खोलि कऽ किछु मंगलनि अछि। की करबैक”? – पत्नी सारगर्भित विचार प्रकट कैलथिन।
“हुनका मंगबाक आवश्यकता की छलनि?” – अरुण कहने छलखिन।
“तें ने, आब भेलनि अछि तऽ मंगैत छथि। जैयौ, सर सरंजाम सेहो करऽ पड़त” – कहलखिन पत्नी। अरुण सक किछु पार नै लगलै तऽ अपने पेटी मे सऽ नूआ बहार कऽ ननदि लेल देलखिन आ नोर पोछैत विदा कयलखिन।
“लोक की कहत? अन्तिम ननदिक दुरागमन छल” --- भरल कंठ सऽ बजली।
“की कहत? हम नै लऽ जाएब। हमहीं जाइ छी से बहुत करै छी” – डपटि देने छलखिन अरुण।

आ डेढ सै टाका जेबी मे नेने जाइ छथि। जिद्द करथिन तऽ अपना हाथऽक घड़ी दऽ देथिन। आर की? लोक की कहतै? गामक लोकक सोझाँ कोन मुँह देखौथिन। ई साधारण दाइ-खबासिनी घड़ी आ रेडिओ नेने जाइ छै। मुदा अरुण की करतै। एकर पत्नी तऽ परिवार मे दाइक पाइ बचौतैक ताहू जोग नहिं छैक। बाबू गामहि रहऽ दितथि …तऽ की? कोना रहय दितथि, लोक की कहितैन। फेर ओएह गाम, समाजक लोक आ लोकापवाद चारुकात सऽ घेरि लैत छैन। बीए पास कऽ कऽ गाम मे घरुला बनल छथि। आ लैह। रहऽ शहर मे। करह नोकरी। एकटा बेटा, माय-बाप कतहु, अपने कतहु। ऐ बेर तऽ बाबूक चिट्ठी मे स्वर बड़ कमजोर बुझना गेलनि। रुग्ण छथि, आब होएत होतनि बेटा संगे रहितौं। किंवा बेटेक संगे अपने रहथि।

महेसरीक गर्वोक्ति सुनि-सुनि अरुणक खून गरम होबय लगैत छनि। दृष्टि महेसरीक राग तर दाबल अटैची पर जाइत छनि – नव ललौन अटैचीक चमकैत हैन्डिल एम्हरे छैक। ओइमे घड़ी आ रेडियो छैक, चानीक पायल आ दोसर बस्तु-जात सभटा छैक। के जानय महेसरी ई सब मालिक-मलिकाइन सबहक ओतय से चोरा कऽ जमा केने हो, के जानए। ई सब बड्ड चालाक होइत अछि। विचारलनि अरुण – फुसिये ठकि रहल अछि जे छौ-छौ डेरा मे काज करैत छी। खाली फाजिल गप्प। जरुर ई चोरौने जाइ छैक। कहुना लऽ जाइ छै। अरुण तऽ कहुनो नय नेने जाइत छथि। गाम मे माय-बाप आ बहिन रास्ता तकैत हेतैनि – अरुण औताह आ सबटा दुःख दूर कऽ देता। स्वर तऽ तेहने रहनि पिताक पत्रक। एकटा छोट-सन स्टेशन आर तकर बाद अरुणक स्टेशन । वस्तुत: दुनू स्टेशनक बीचहि मे अरुणक गाम पड़ै छनि। एक बेर फेर अरुणक दृष्टि महेसरीक अटैचीक हैन्डिल पर पड़लनि। एक झटका मे अटैची घीचि तेज होइत गाड़ी स अरुण उतरि कऽ पड़ा जाथि तखन की? विचारैत काल शरीर मे रक्त तेजी सऽ दौड़य लगलनि। स्टेशन पर सऽ गाड़ी ससरऽ लगलै। अरुण अझक्के अटैची घीचि लेलखिन। महेसरी मुंह बौने रहि
गेल। छि: ई की करै छी हम? एकटा चौका-बरतन करऽवाली स्त्रीक सामग्री चोरबै छी? ई विचारि मोन मे अबिते अरुणक आगू बढल पैर ठमकि गेलनि। मुँह बौने महेसरी आ आगू बढैत ओकर संगबे अन्हार मे तकित रहलै आ अरुण अटैची महेसरीक कोरा मे पटकि एकटा खाली हँसी हँसऽ लागल।

“एह, हम तोरा ई बुझबा लेल अटैची घिचलिअऽ जे खाली बात पर नहि रहऽ समानक रक्षा सेहो करऽ।“
“ए बौआ, हमर तऽ जिउए हाथ हेरा गेल। बड़ कठिन कमाइ के है” – महेसरी कँपैत स्वर मे कहलकै।
“नहिं नहिं, डेरै के बाते नै छै, बाबू देखतहिं सुधंग लगै छथिन” – ठिसुआएल एकटा संगबे बजलै महेसरी सऽ।

अपन अशुद्ध मोन पर संस्कारी शुद्ध मोनक विजय बड़ सुखकर लगलै अरुण के। जाड़ो मे पसीना छुटि गेलै। तरहत्थी भीज गेल छलै। कंठ सुखा गेलै। मुदा माथ एखन खाली छलै। एकदम्म शून्य। किछु नै छलै। गाड़ी दोसर स्टेशनऽक लग आबि गेल छलै। पुक्की पारय लगलै। अन्हार दिस तकैत अरुणक आँखि एकटा खोपड़ीक चिनवार पर चलि गेल। चिनवार पर दीप जरै छलै।

कतेक डारिपर पुरस्कृत



जितेन्द्र झा. १७ फरबरी २००९ । नयाँ दिल्ली
मैथिली भाषाक कतेक डारिपर संस्मरण कृतिके एहिबेरके साहित्य एकेडमी पुरस्कार 2008 देल गेल अछि । भारतक राजधानी नयाँ दिल्ली स्थित साहित्य एकेडमीद्वारा आयोजित एक समारोहमे विभिन्न 23 भारतीय भाषाक कृतिके पुरस्कृत केएल गेल अछि । साहित्य एकेडमी पुरस्कार अन्तर्गत 50 हजार भारतीय नगद आ ताम्रपत्रसं सर्जकके सम्मान कएलक । मैथिली भाषाक संस्मरण कृति कतेक डारिपरके लेखक मन्त्रेश्वर झा के इ सम्मान देल गेलन्हि । एहि पोथीमे झा अपन प्रशासनिक जीवनक अनुभव सहेजने छैथ । झा मैथिली साहित्यिक, सांस्कृतिक अभियानमे सक्रिय छैथ ।
झा मैथिली साहित्य समृद्धिक लेल पाठक संख्या बढएबापर ध्यान देल जएबाक चाही कहलनि । मन्त्रे·ार झा पटनावि·ाविद्यालयसं स्वर्ण पदक आ राजनीतिमे स्नातकोत्तर कएने छैथ । हिनक अन्चिन्हार गाम, बहसल रातिक इजोत, कांटक जंगल आ पलाश, चाही एकटा नोकर जेहन कृति प्रकाशित छन्हि । हिनक जन्म सन् 1944 मे बिहारक मधुवनी जिलामे भेल छन्हि ।
सन 1972 में झाक प्रथम कृति खाधि कविता संग्रह प्रकाशित भेल रहनि । एखनधरि हिनक 25 टा कृति प्रकाशित भ चुकल छन्हि । पुरस्कृत पोथी मैथिलीमे नव आयामक पहिल आत्म कथा मानल गेल अछि ।

Tuesday, February 17, 2009

मॉं मिथिले त कनिते रहती: प्रवीण झा जीक एक गोट अतुकांक कविता ।

मॉं मिथिले त कनिते रहती, जाबए नै करब सब मिली हुंकार
अधिकार त बलिदाने सॅ भेटत, सब मिली के होउ तैयार ।
घर-घर जरै छै धू-धू के आगि, तैयो सब जाइ छै मिथिला के त्‍यागी,
माई के ममता के पैर सॅ कुचलि क, छोडि जाउ नै अहॉ अपन घर-द्वारि ।
बाढि रूपी दानव अबैछ हर साल,
विनाशलीला सॅ करैत पूरा मि‍थिला के बेहाल ।
मॉ मिथिला क उठै छथि चित्‍कार,
जनमानस में मचि जाइत अछि हाहाकार,
सामग्री राहतक गटकि क नेता सभ होइछ मालामाल ।
एहि दानव सभक त्रास सॅ मॉ मिथिले भ गेली कंगाल ।
के साजिश क दबौलक मिथिलाक अधिकार ?
की मातृद्रोही नहि अछि अपन मिथिलेक कर्णधार ?
जमाना बदलि क भ गेल छैक नवीन,
किया मिथिला अछि एखनो साधन विहीन ?
मिथिलाक नेता सॅ हमरा जवाब चाही,
तथाकथित विकासक हमरा हिसाब चाही ।
पॉंच साल पर छलै अपन दरश देखौने,
फुसियाहा छलै केहन भाषण सुनौने ।
“अलग मिथिला राज्‍य बनायब,
घर-घर में खुशहाली लायब.....
-से कहि क ओ ठकबा भ गेल फरार ।
ल-ल के वोटे समेटै टा नोटे,
मॉ मैथिली के पहुंचाबै टा चोटे
मिथिला के संतान बेईमान बडका,
करू एकरा सब के अहॉ बहिष्‍कार ।
की थिक इ उचित जे परदेश जा क मात्र मिथिला के कोसी ?
की नै इ उचित जे संगठित भ हम सब आब मिथिला लेल सोची ?
धन्‍य छथि ओ मैथिल नहि जिनका अपन संस्‍कृति पर नाज,
अपन समृद्ध भाषा बाजए में जिनका होई छनि एखनहु बड लाज ।
बंगाली हुए वा मराठी, मद्रासी हुए वा गुजराती,
स्‍वयं निज भाषा पर कियो नै करै छै प्रहार ।
एहन सुकर्म क क अपन दामन के बनाउ नै अहॉ दागदार ।
अपन भाषा ओ संस्‍कृतिक पतन हेतु स्‍वयं नै बनु अहॉ जिम्‍मेवार ।
मातृभूमिक लेल जे काज नै आबए, ओ जिनगी के थिक शत-शत धिक्‍कार ।
मॉ मिथिला पुकारि रहल छथि, अश्रुपूरित नेत्र सॅ निहारि रहल छथि ।
अपन भाषा ओ संस्‍कृतिक करू अभिमान, तखनहि भेटत विदेशो में मान ।
कटि क अपन माटी सॅ, के पओलक अछि एखन तक सम्‍मान ?
किया बनब आन भाषा के दास,
कान में अमृत घोरैछ अपन मैथिलीक मिठास ।
चलू निज धाम, करू प्रस्‍थान,
आब नै हेतै मिथिलाक अपमान ।
कर्ज बहुत छैन मातृभूमि के सब पर, निज माटी के करू सब मिली नमस्‍कार ।
लिय प्रतिज्ञा हाथ उठा क, मॉ मिथिला के करब हम सब उद्धार ।
अपन श्‍वास सॅ अहॉ गिरि के खसाउ, पैरक धमक सॅ जग के हिलाऊ ।
करू भैरव नाद आ नभ के गुंजाऊ,
मिथिलाक खंडित गौरव के सब मिली क वापस लाऊ ।
सहलौ बहुत, आब नै सहब हम सब तिरस्‍कार,
याचना ओ प्रार्थना सॅ नै भेटल एखन तक, आब धरू अहॉ तरूआरि
सौम्‍य रूप मैथिलक देखलक एखन तक रौद्र रूप आब देखत संसार
उग्र पथ पर आब बढि क अहॉ आब, छीनू अपन अतिक्रमित अधिकार ।
मॉ मिथिले त कनिते रहती जाएब नै करब सब मिली हुंकार,
अधिकार त बलिदाने सॅ भेटत सब मिली क होऊ तैयार ।।

पाँच पत्र-हरिमोहन झा

पाँच पत्र
एक
दड़िभङ्गा १-१-१९
प्रियतमे
अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ। परन्तु हमरा ओ अहाँक बीचमे भारी भदबा छथि। अहाँक बाप-पित्ती, जे दू मासक बाद फगुआमे हमरा आबक हेतु लिखैत छथि। साठि वर्षक बूढ़केँ की बूझि पड़तनि जे साठि दिनक विरह केहन होइत छैक !
प्राणेश्वरी, अहाँ एक बात करू माघी अमावस्यामे सूर्यग्रहण लगैत छैक। ताहिमे अपना माइक संग सिमरिया घाट आउ। हम ओहिठाम पहुँचि अहाँकें जोहि लेब। हँ एकटा गुप्त बात लिखैत छी जखन स्त्रीगण ग्रहण-स्नान करऽ चलि जएतीह तखन अहाँ कोनो लाथ कऽकऽ बासापर रहि जाएब। हमर एकटा संगी फोटो खिचऽ जनैत अछि। तकरासँ अहाँक फोटो खिचबाएब देखब ई बात केओ बूझए नहि। नहि तँ अहाँक बाप-पित्ती जेहन छथि से जानले अछि।
हृदयेश्वरी हम अहाँक फरमाइशी वस्तु –चन्द्रहार- कीनिकऽ रखने छी। सिमरियामे भेट भेलापर चूपचाप दऽ देब। मुदा केओ जानए नहि हमरा बापके पता लगतनि तँ खर्चा बन्द कऽ देताह। हँ एहि पत्रक जबाब फिरती डाकसँ देब। तें लिफाफक भीतर लिफाफ पठारहल छी। पत्रोत्तर पठएबामे एको दिनक विलम्ब नहि करब। हमरा एक-एक क्षण पहाड़सन बीतिरहल अछि। अहाँक प्रतीक्षा मे आतुर।
पुनश्च : चिट्ठी दोसराके छोड़क हेतु नहि देबैक। अपने हाथसँ लगाएब रतिगरे आँचरमे नुकौने जाएब आओर जखन केओ नहि रहैक तँ लेटरबक्समे खसा देबैक।
दू
हथुआ संस्कृत विद्यालय १-१-२९
प्रिय,
बहुत दिनपर अहाँक पत्र पाबि आनन्द भेल। अहाँ लिखैत छी जे ननकिरबी आब तुसारी पूजत, से हम एकटा अठहत्थी नूआ शीघ्र पठा देबैक। बंगट आब स्कूल जाइत अछि कि नहि? बदमाशी तँ नहि करैत अछि? अहाँ लिखैत छी जे छोटकी बच्चीके दाँत उठि रहल छैक, से ओकर दबाइ वैद्यजीसँ मङबाकऽ दऽ देबैक। अहूके एहिबेर गामपर बहुत दुर्बल देखलहुँ जीरकादि पाक बनाकऽ सेवन करू। जड़कालामे देह नहि जुटत तँ दिन-दिन ह्रस्त भेल जाएब। ओहिठाम दूध उठौना करू। कमसँ कम पाओभरि नित्य पिउल करब।
हम किछु दिनक हेतु अहाँकें एहिठाम मङा लितहुँ। परन्तु एहिठाम डेराक बड्ड असौकर्य। दोसर जे विद्यालयसँ कुल मिला साठि टका मात्र भेटैत अछि। ताहिमे एहिठाम पाँचगोटाक निर्वाह हएब कठिन। तेसर ई जे फेर बूढ़ीलग के रहतनि ! इएहसभ विचारिकऽ रहि जाइत छी। नहि तँ अहाँक एतऽ रहने हमरो नीक होइत। दुनू साँझ समयपर सिद्ध भोजन भेटैत बंगटो के पढ़बाक सुभीता होइतैक। छोटकी कनकिरबीसँ मन सेहो बहटैत। परन्तु कएल की जाए ! बड़की ननकिरबी किछु आओर छेटगर भऽ जाए तँ ओकरा बूढ़ीक परिचर्यामे राखि किछु दिनक हेतु अहाँ एतऽ आबि सकैत छी। परन्तु एखन तँ घर छोड़ब अहाँक हेतु सम्भव नहि। हम फगुआक छुट्टीमे गाम अएबाक यत्न करब। यदि नहि आबि सकब तँ मनीआर्डर द्वारा रुपैया पठा देब।
अहींक कृष्ण
पुनश्च : चिट्ठी दोसराकें छोड़क हेतु नहि देबैक अपने हाथसँ लगाएब। रतिगरे आँचरमे नुकौने जाएब आओर जखन केओ नहि रहैक तँ लेटरबक्समे खसा देबैक।


तीन

हथुआ संस्कृत विद्यालय १-१-३९
शुभाशीर्वाद

अहाँक चिट्ठी पाबि हम अथाह चिन्तामे पड़ि गेलहुँ। एहिबेर धान नहि भेल तखन सालभरि कोना चलत। माएक श्राद्धमे पाँच सए कर्ज भेल तकर सूदि दिन-दिन बढ़ले जा रहल अछि। दू मासमे बंगटक इमतिहान हएतनि। करीब पचासो टका फीस लगतनि। जँ कदाचित पास कऽ गेलाह तँ पुस्तकोमे पचास टका लागिए जएतनि। हम ताही चिन्तामे पड़ल छी। एहिठाम एक मासक अगाउ दरमाहा लऽ लेने छियैक। तथापि उपरसँ नब्बे टका हथपैंच भऽ गेल अछि। एहना हालतिमे हम ६२ टका मालगुजारी हेतु कहाँसँ पठाउ? जँ भऽ सकए तँ तमाकू बेचिकऽ पछिला बकाया अदाय कऽ देबैक। भोलबा जे खेत बटाइ कएने अछि, ताहिमे एहिबेर केहन रब्बी छैक? कोठीमे एको मासक योगर चाउर नहि अछि। ताहिपर लिखैत छी जे ननकिरबी सासुरसँ दू मासक खातिर आबऽ चाहैत अछि। ई जानि हम किंकर्तव्यविमूढ़ भऽ गेल छी। ओ चिल्हकाउर अछि। दूटा नेना छैक। सभकेँ डेबब अहाँक बुते पार लागत? आब छोटकी बच्ची सेहो १० वर्षक भेल। तकर कन्यादानक चिन्ता अछि। भरि-भरि राति इएहसभ सोचैत रहैत छी, परन्तु अपन साध्ये की? देखा चाही भगवान कोन तरहें पार लगबै छथि!
शुभाभिलाषी
देवकृष्ण
पुनश्च : जारनि निंघटि गेल अछि तँ उतरबरिया हत्ताक सीसो पंगबा लेब। हम किछु दिनक हेतु गाम अबितहुँ किन्तु जखन महिसिए बिसुकि गेल अछि तखन आबिकऽ की करब?
अहाँक देवकृष्ण


चारि
हथुआ संस्कृत विद्यालय १-१-४९
आशीर्वाद
हम दू माससँ बड्ड जोर दुखित छलहुँ तें चिट्ठी नहि दऽ सकलहुँ। अहाँ लिखैत छी जे बंगट बहुकें लऽकऽ कलकत्ता गेलाह। से आइकाल्हिक बेटा-पुतहु जेहन नालायक होइत छैक से तँ जानले अछि। हम हुनकाखातिर की-की नहि कएल! कोन तरहें बी।ए। पास करौलियनि से हमहीं जनैत छी। तकर आब प्रतिफल दऽरहल छथि। हम तँ ओही दिन हुनक आस छोड़ल, जहिया ओ हमरा जिबिते मोछ छँटाबऽ लगलाह। सासुक कहबमे पड़ि गोरलग्गीक रुपैया हमरालोकनिकेँ देखहु नहि देलनि। जँ जनितहुँ जे कनियाँ अबितहि एना करतीह तँ हम कथमपि दक्षिणभर विवाह नहि करबितियनि। १५०० गनाकऽ हम पाप कएल, तकर फल भोगिरहल छी। ओहिमेसँ आब पन्द्रहोटा कैँचा नहि रहल। तथापि बेटा बूझैत छथि जे बाबूजी तमघैल गाड़नहि छथि। ओ आब किछुटा नहि देताह आर ने पुतहु अहाँक कहलमे रहतीह। हुनका उचित छलनि जे अहाँक संग रहि भानस-भात करितथि, सेवा-शुश्रुषा करितथि। परञ्च ओ अहाँक इच्छाक विरुद्ध बंगटक संग लागलि कलकत्ता गेलीह। ओहिठाम बंगटकें १५० मे अपने खर्च चलब मोश्किल छनि कनियाँकें कहाँसँ खुऔथिन। जे हमरालोकनि ३० वर्षमे नहि कएल से ईलोकनि द्विरागमनसँ ३ मासक भीतर कऽ देखौलनि। अस्तु। की करब? एखन गदह-पचीसी छनि। जखन लोक होएताह तखन अपने सभटा सुझतनि। भगवान सुमति देथुन। विशेष की लिखू? कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।
देवकृष्ण
पुनश्च: जँ खर्चक तकलीफ हो तँ छओ कट्ठा डीह जे अहाँक नामपर अछि से भरना धऽकऽ काज चलाएब। अहाँक हार जे बन्धक पड़ल अछि से जहिया भगवानक कृपा होएतनि तहिया छुटबे करत!
पाँच
काशीतः
१-१-५९
स्वस्ति श्री बंगटबाबूकें हमर शुभाशिषः सन्तु।
अत्र कुशलं तत्रास्तु। आगाँ सुरति जे एहि जाड़मे हमर दम्मा पुनः उखरि गेल अछि। राति-रातिभरि बैसिकऽ उकासी करैत रहैत छी। आब काशी-विश्वनाथ कहिया उठबैत छथि से नहि जानि। संग्रहणी सेहो नहि छूटैत अछि। आब हमरालोकनिक दबाइए की? औषधं जाह्नवी तोयं वैद्यो नारायणो हरिः। एहिठाम सत्यदेव हमर बड्ड सेवा करैत छथि। अहाँक माएकें बातरस धएने छनि से जानिकऽ दुःख भेल परन्तु आब उपाये की? वृद्धावस्थाक कष्ट तँ भोगनहि कुशल! बूढ़ीकें चलि-फीरि होइत छनि कि नहि? हम आबिकऽ देखितियनि, परञ्च अएबा जएबामे तीस चालीस टका खर्च भऽ जाएत दोसर जे आब हमरो यात्रा मे परम क्लेश होइत अछि। अहाँ लिखैत छी जे ओहो काशीवास करऽ चाहैत छथि। परन्तु एहिठाम बूढ़ीके बड्ड तकलीफ होएतनि। अपन परिचर्या करबा योग्य त छथिए नहि, हमर सेवा की करतीह? दोसर जे जखन अहाँ लोकनि सन सुयोग्य बेटा-पुतहु छथिन तखन घर छोड़ि एतऽ की करऽ औतीह? मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा! ओहिठाम पोता-पोतीके देखैत रहैत छथि। पौत्रसभके देखबाक हेतु हमरो मन लागल रहैत अछि। परञ्च साध्य की? उपनयनधरि जीबैत रहब तँ आबिकऽ आशीर्वाद देबनि। अहाँक पठाओल ३० टका पहुँचल एहिसँ च्यवनप्राश कीनिकऽ खा-रहल छी। भगवान अहाँके निकें राखथु। चि। पुतहुके हमर शुभाशीर्वाद कहि देबनि। ओ गृहलक्ष्मी थिकीह। अहाँक माए जे हुनकासँ झगड़ा करैत छथिन से परम अनर्गल करैत छथि। परन्तु अहाँकेँ तँ बूढ़ीक स्वभाव जानले अछि। ओ भरिजन्म हमरा दुखे दैत रहलीह। अस्तु कुमाता जायेत क्वचिदपि कुपुत्रो न भवति, एहि उक्ति के अहाँ चरितार्थ करब।
इति देवकृष्णस्य
पुनश्च : यदि कोनो दिन बूढ़ीके किछु भऽ जाइन तँ अहाँलोकनिक बदौलति सद् गति होएबे करतनि जाहि दिन ई सौभाग्य होइन ताहि दिन एक काठी हमरोदिस सँ धऽ देबनि।

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी( प्रथम कड़ी)


एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन करबाक अछि।


हम सदिखन अपना के हुनकर शिष्या सहचरी आ नही जानि कि सब बुझैत रही। हुनक कि एकोटा एहन रचना छलैन जकरा कि हम पूरा होम स पहिने कैएक बेर नहि सुनैत रही। हम त हुनक एक- एक रचना के ततेक बेर सुनैत रही जे करीब करीब कंठस्त भ जैत छल। एक एक संवाद आई धरि ओहिना हमर कान में गूंजैत रहित अछि। हम त हुनक सबस पैघ आलोचक, सबस पैघ प्रशंसक रही। अद्भुद कलाकार छलाह, एक कलाकार में एक संग एतेक रास गुण भैरसक नहि होइत छैक। लेखक, निर्देशक, अभिनेता,गीतकार, संगीतकार, सब गुण विद्यमान छलैन्ह। हमारा कि बुझल जे नीक लोकक संग बेसी दिनक नहि होइत छैक। भगवनोके नीक लोकक ओतबे काज होइत छैन्ह जतबा कि मनुष्य के। हमत भगवान् स कहियो किछु नै मान्गलियैन, बस हुनक संग सदा भेंटय
यैह टा कामना छल। मुदा एक टा बात निश्चित अछि जे, जओं भगवान छैथ आ कहियो भेंटलैथ त अवश्य पुछ्बैन्ह जे ओ हमारा कोन गल्तिक सजा देलैथ, हम त कहियो ककरो ख़राब नै चाहलिये।


एतेक कम दिनक संग परंच ओ जे हमरा पर विश्वास केलैंह आ हमारा स्नेह देलैंह शायद हमरा सात जन्मों में नहि भेंट सकैत छल। एखनो जं हम हुनक फोटो के सामने ठाढ़ भ जैत छी त बुझैत अछि जे ओ कहि रहल छैथ हम सदिखैन अहाँक संग छी।

Monday, February 16, 2009

अनिलचन्द्र ठाकुर १३ सितम्बर 1954- 2 नवम्बर 2007


स्व. अनिलचन्द्र ठाकुर जीक जन्म 13 सितम्बर 1954 ई.केँ कटिहार जिलाक समेली गाममे भेलन्हि। 1982 ई.मे हिन्दी साहित्यमे स्नातकोत्तर केलाक बाद नवम्बर '93 सँ नवम्बर '94 धरि "सुबह" हस्तलिखित पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन कएलन्हि आ कोशी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकमे अधिकारी रहथि। मैथिली, अंगिका, हिन्दी आ अंग्रेजीमे समानरूपेँ लेखन।
मृत्युक पूर्व ब्रेन ट्यूमरसँ बीमार चलि रहल छलाह।
प्रकाशित कृति:
आब मानि जाउ(मैथिली उपन्यास)- पहिने भारती-मंडन पत्रिकामे प्रकाशित भेल, फेर मैलोरंग द्वारा पुस्तकाकार प्रकाशित भेल।
कच( अंगिकाक पहिल खण्ड काव्य,1975)
एक और राम (हिन्दी नाटक,1981)
एक घर सड़क पर (हिन्दी उपन्यास, 1982)
द पपेट्स (अंग्रेजी उपन्यास, 1990)
अनत कहाँ सुख पावै (हिन्दी कहानी संग्रह,2007)

आब मानि जाउ(मैथिली उपन्यास)- एहि उपन्यासमे एक एहन युवतीक संघर्ष-गाथा अंकित अछि जे अपन लगनसँ जीवन बदलैत अछि। असंख्य गामक ई कथा, कुलीनताक अधःपतनक कथा, संस्कारविहीनताक उद्घाटन आ भविष्यक पीढ़ीकेँ बचएबाक चेतौनी छी ई कथा।
click on the link : अनिलचन्द्र ठाकुर

बतहिया पुछै छै सवाल. दयाकान्त ‘‘दीपक‘‘

सगर नगर अछि मुह लटकौने
“शर्म सॅ सबकिया सिर झुकौने
कोन दोश हमर अछि अहिमे
पति के म़त्यु भेल अकाल
बतहिया पुछै छै सवाल
चैदह बितल चढिते पंद्रह
भ गेल हमर विवाह
सोलह बरख के मुॅह नहि देखलहु
भ गेल जीवन बदहाल
बतहिया पुछै छै सवाल
नाम अलच्छी सासु पुकारैथ
ससुर सदिखन कुलबोरनी
ननौद, दिअर मुॅह देख भागैथ
बितत कोना जीवन बेतरनी
बतहिया पुछै छै सवाल
सगर समाज मे चर्चा एकेर्टा
अबिते खेलकै “ाुषील बेटा
हमरा देखि रस्ता सब काटय
भ जाय किया यात्रा खराब
बतहिया पुछै छै सवाल
माय बाप नहि घुरी के ताकय
भौया-भौजी मुॅह नुकावय
नोर सुखायल नींद हरायल
एक-एक पल भेल पहाड
बतहिया पुछै छै सवाल
सास-ससुर सेट छिरकैया
ननद-दिअर परफ्रयुम लगबैया
कुकुरो साबुन रोज लगबैया
हमरा बेर में हैया बबाल
बतहिया पुछै छै सवाल
कनियॉ मरत बरत नहि दोश
वर मुर्हला पर कनियेक दोश
बर चाहे कतेको विवाह करताह
किया नहि होयत विधवा विवाह
बतहिया पुछै छै सवाल

दयाकान्त ‘‘दीपक‘‘

Saturday, February 14, 2009

कम्प्युटरसं मैथिली जोडबाक प्रयास


जितेन्द्र झा
मैथिली भाषासं सेहो कम्प्युटर अपरेट कएल जाए ताहिलेल प्रयास शुरु भेल अछि । परिष्कृत आ समृद्ध भाषा मैथिली एखनो आन भाषाक अपेक्षा कम्प्युटर प्रविधिमे पाछुए अछि ।
पटनामे फ़्युल प्रोजेक्ट अन्तर्गत मैथिली कम्प्युटरीकरण शब्दावलीक मानकीकरणलेल दु दिवसीय कार्यशाला सम्पन्न भेल अछि । फ़्युल (फ़्रिक्वेन्टनली युज्ड एन्ट्रीज फ़र लोकलाईजेशन) एक ओपन सोर्स प्रोजेक्ट अछि । ई विभिन्न प्लेटफ़र्मके लेल प्रयोग कएल जाएबला कम्युटर शब्दावलीके मानकीकरणके काज विभिन्न भाषाक लेल कएल करैत अछि ।
एहि अवसरपर मैथिलीक विद्वान पण्डित गोविन्द झा कम्प्युटरलेल विशेष रुपे शब्द गढल जएबाक चाही मुदा एखन सामान्य शब्दसं काज चलि जाए त नीक । मैथिली एकेडमीक निर्देशक रघुवीर मोची जमीनी शब्द प्रयोग करबापर जोड दैत कहलनि जे मैथिलीके अपन क्षेत्र विस्तार करबाक चाही । कम्प्युटरमे मैथिलीक लेल कएल जारहल काजके दूरगामी प्रभाव रहल ओ कहलनि ।
प्रोजेक्ट संयोजक राजेश रंजन फ़्युलक कम्प्युटर मानकीकरणके कार्यविधिके विषयमा जनतब दैत कहलनि जे इ समुदाय आधारित प्रोजेक्ट अछि । कार्यक्रममे कम्प्युटरमे बेशी प्रयोग होब' बला 5 सय 78 शब्दपर गहन विचार क" मानक पर आम सहमति बनाओल गेल । मैथिली कम्प्युटक लेल शब्द गढबालेल ई पहिल प्रयास छल ।
कार्यक्रम एएन सिन्हा इन्स्टिच्युट अफ़ इन्स्टीच्युट अफ़ सोसल स्टडिजमे भेल छल जाहिमे रामानन्द झा रमण, मोहन भारद्वाज, सुधीर कुमार, जयप्रकाश, राकेश रोशन, संगीता सहितक विद्वान, अनुवादक आ कम्प्युटर उपभोक्ता सहभागी छल ।

Thursday, February 12, 2009

‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिकाक २७-२८-२९-३० म अंक

अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भऽ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका केर ३० टा अंक http://www.videha.co.in/
पर ई-प्रकाशित भऽ चुकल अछि। "वि दे ह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका मासक १ आ १५ तिथिकेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि, ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। विदेहक २५ म अंक (०१ जनवरी २००९) प्रिंट फॉर्ममे सेहो शीघ्र आएत।
अहाँसँ सेहो "विदेह" लेल रचना आमन्त्रित अछि। यदि अहाँ पाक्षिक रूपेँ विदेहक हेतु अपन रचना पठा सकी, तँ हमर सभक मनोबल बढ़त।
२.कृपया अपन रचनाक संग अपन फोटो सेहो अवश्य पठायब। अपन संक्षिप्त आत्मकथात्मक परिचय, अपन भाषामे, सेहो पठेबाक कष्ट करब, जाहिसँ पाठक रचनाक संग रचनाकारक परिचय, ताहि प्रकारसँ , सेहो प्राप्त कए सकथि।
“विदेह” पढबाक लेल देखू-
http://www.videha.co.in/

आ अपन रचना-सुझाव-टीका-टिप्पणी ई-मेलसँ पठाऊ-
ggajendra@videha.com पर।

संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १३ फरबरी २००९) ७८ देशक ७८० ठामसँ १,६५,४५९ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।




(c)२००४-२००९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक १ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि, आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। विदेहक नवीन अंक सभ मासक ०१ आऽ १५ तिथिकेँ ई-प्रकाशित कएल जाइत अछि। ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।http://www.videha.co.in/

"विदेह" ई- पत्रिका डाटाबेसक आधारपर प्रकाशित पोथी सभ:-

१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन

२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह

३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन

४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव

५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर

६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर

७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल

८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”

९/१०/११ 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-15 ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा ।


स्पॉनसर केनिहार प्रकाशक : श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com

मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि:
http://www.videha.co.in/ "विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.

विदेह २६ म अंक १५ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २६)-part 2

विदेह २६ म अंक १५ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २६)-part 2

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥

१०.विश्वक प्रथम देशभक्त्ति गीत
(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
५. मानक मैथिली
इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष

इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ।

मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ।
मैथिलीक मानक लेखन-शैली

1. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आऽ 2.मैथिली अकादमी, पटना

1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा
2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६



आब 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आऽ 2. मैथिली अकादमी, पटनाक मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू।

ग्राह्य / अग्राह्य

1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए
61. भाय भै
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
68. तका’ कए तकाय तकाए
69. पैरे (on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे

71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे’
81. से/ के से’/के’
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा’
94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग ल’ग
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (to test)चिखइत
126. करइयो(willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग ल’ग
141. खेलाइ (for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो
145. केश (hair)
146. केस (court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो ड’रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के’
169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
193. से से’
194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा’
201. देखाय देखा’
202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब
204.गेलैन्ह/ गेलन्हि
205.हेबाक/ होएबाक
206.केलो/ कएलो
207. किछु न किछु/ किछु ने किछु
208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ
209. एलाक/ अएलाक
210. अः/ अह
211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन)
212.कनीक/ कनेक
213.सबहक/ सभक
214.मिलाऽ/ मिला
215.कऽ/ क
216.जाऽ/जा
217.आऽ/ आ
218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)
219.निअम/ नियम
220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़
222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
223.कहिं/कहीं
224.तँइ/ तइँ
225.नँइ/नइँ/ नञि
226.है/ हइ
227.छञि/ छै/ छैक/छइ
228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
229.आ (come)/ आऽ(conjunction)
230. आ (conjunction)/ आऽ(come)
231.कुनो/ कोनो

६. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
६.1.Original Maithili short story of Devshankar Naveen translated into English by GAJENDRA THAKUR

Maithili short-story written by Sh. Devshankar Naveen translated into English by Gajendra Thakur.
Renaissance

From a distance came a crow and sat on top of a two pronged tree of the state road. Disciplined, a peace of bread in his beak…may be that he is tired while constantly flying or may be that he might have procured the bread after meticulous attack…was sitting and resting. In front was the parliament house, bright like some young women’s bare and muscled body bathed in milk. The crow was looking towards it with angry eyes. And at that time a healthy dog passed thereby. Looking bread in the mouth of the crow he spoke – O brother ! How many days have passed, I have not heard you sing. I often remember . Please have a song ! The crow looked seriously towards him, keeping bread in his claws he spoke thunderously- boy ! while lying in that cave how you will hear the song of outside world ? What you’ll do after hearing ? Now even while speaking, my bread won’t fall in front of you.
७.
VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR

SAMSKRIT संस्कृत मैथिली
FILM चलच्चित्रम् सिनेमा
Did you see the latest film? तत् नूतनं चलच्चित्रं दृष्टवती किम्? अहाँ नबका सिनेमा देखलहुँ?
We saw it the day before yesterday. परह्यः एव वयं दृष्टवन्तः। हम सभ परसूए देखलहुँ?
The theatre was full. चित्रगृहं पूर्णम् आसीत्। हॉल भरल रहए।
We couldn’t even get the tickets. वयं प्रवेशकानि अपि न प्राप्तवन्तः। हमरा सभकेँ तँ टिकटो नहि भेटि सकल।
The photography is very beautiful. छायाचित्रणं बहु सुन्दरम् अस्ति। फोटोग्राफी बड्ड सुन्दर अछि।
The story is ordinary. कथा सामान्या एव। कथा साधारण अछि।
Hero’s acting is fantastic. नायकस्य अभिनयः अद्भुतः अस्ति। नायकक अभिनय अद्भुत अछि।
Music is very melodious. सङ्गीतं श्रुतिमधुरम् अस्ति। संगीत कर्णप्रिय अछि।
I am seeing this for the fourth time. अहम् एतत् चतुर्थवारं पश्यन् अस्मि। हम एकरा चारिम बेर देखने छी।
He is a very famous director. सः ब् प्रसिद्धः दिग्दर्शकः। ओ बड्ड प्रसिद्ध निर्देशक अछि।
There was nothing new. नूतनं किमपि न आसीत्। किछु नव नहि रहए।
It was very boring. बहु जामितकारकम् आसीत्। बड्ड उबाऊ रहए।
She got the best actress award for this film. एतस्य चलच्चित्रस्य कृते सा सर्वोत्तम-अभिनेत्री इति पुरस्कारं प्राप्तवती। हुनका एहि सिनेमाक लेल सर्वोत्तम अभिनेत्रीक पुरस्कार भेटलन्हि।
I like comedy or suspense films. मह्यं विनोदपूर्णम् अथवा रहस्यमयं चलच्चित्रं रोचते। हमरा हास्य अथवा रहस्यपूर्ण सिनेमा नीक लगैत अछि।
This is my favourite actor. एषः मम प्रियतमः अभिनेता। ई हमर प्रिय अभिनेता अछि।
All her films are science fictions. एतस्याः सर्वाणि चलच्चित्राणि काल्पनिक-विज्ञानकथाः भवन्ति। हुनकर सभटा सिनेमा विज्ञान कथा होइत अछि।
A very interesting film on martial-arts will be released next month. युद्धकलाविषयकं बहु आकर्षकं चलच्चित्रम् अग्रिममासे आगमिष्यति। अगिला मास मार्शल-आर्टपर आधारित एकटा आकर्षक सिनेमा आबि रहल अछि।
I will certainly see that. अहम् अवश्यं तत् द्रक्ष्यामि। हम ओ अवश्य देखब।

सज्जाः भवन्तु। वयम् संस्कृतं संभाषणस्य अभ्यासं कुर्मः। वर्णानाम् पञ्चम् प्राप्तवन्तः। एदानीम् तयैव अधिकम् अभ्यासम् कुर्मः।
पुष्पस्य वर्णः कः।
पुष्पस्य वर्णः रक्तः।
पर्णस्य वर्णः हरितः।
सञ्चिकायाः वर्णः पीतः।
ध्वजे के के वर्णाः सन्ति।
भवत्याः शाटिकायाः वर्णः कः।
प्रधानतया एते वर्णाः-
ईदृश कीदृश तादृश इत्येतेषाम् शब्दानाम् अभ्यासम् कृतवन्तः।
इदानीम् तस्यैव अधिकम् अभ्यासम् कुर्मः।
मम समीपे ईदृश पुस्तकं/ पाञ्चालिका/ क्रीडनकं/ पुष्पं/ कङ्कतम्/ आसन्दः अस्ति।
इत्येतेषाम् उपयोगं कृत्वा वाक्यं वदतु।
के वदन्ति?
वस्त्रं/ अङ्गुलीयकम्/ घटी/ पुस्तकं/ तिलकम्/ वनितास्यूतः/ उपनेत्रम्
लेखनी अस्ति किन्तु न लिखति।
धनस्यूतः अस्ति किन्तु धनम् नास्ति।
उपनेत्रम् अस्ति किन्तु न धरामि।
वाहनस्य कुञ्चिका अस्ति किन्तु न ददामि।
विद्युत अस्ति किन्तु दूरदर्शनं कार्यं न करोति।
पिपासा अस्ति किन्तु सः जलं न पिबति।
धनिकस्य समीपे बहु धनम् अस्ति किन्तु दानं न करोति।
तस्य बुभुक्षा अस्ति किन्तु भोजनं न करोति।
तस्याः शिरोवेदना अस्ति किन्तु गुलिकां न स्वीकरोति।
शिरः अस्ति किन्तु बुद्धिः नास्ति।
किन्तु उपयोगं कृत्वा वाक्यं वदतु।
मम समीपे लेखनी वर्तते किन्तु अहं न लिखामि।
मम समीपे उपनेत्रम् अस्ति किन्तु अहं द्रष्टुं न शक्नोमि।
मम इदानीं पिपासा भवति किन्तु न पिबामि।
अस्माकं देशे जनसंख्या अधिका अस्ति किन्तु साक्षरता न्यूना अस्ति।
किन्तु- अव्यय
पुस्तकं वृहत्/ लघु अस्ति।
यानं वृहत्/ लघु अस्ति।
यानं कथम् अस्ति?
पर्णम्/ भावचित्रम्/ कन्दुकम्/ पात्रम्/ वेङ्गलुरुनगरम्/ वृहत्/ लघु अस्ति।
भारतस्य सेना अत्यंतं वृहत् अस्ति।

सुभाषितम्
चिन्तनीया हि विपदाम् आदावते प्रतिक्रिया।
न कूपखननं युक्तम् प्रदीप्ते वह्णिना गृहे॥
विपत्तिनाम् आगमनात् प्रतिक्रिया चिन्तनीया तदन्तरं चिन्तनेन् प्रयोजनं नास्ति। यथा यदा गृहम् अग्निना ज्वलति तदा जलसंग्रहार्थम् कूपखननम् उचितं ना। पूर्वमेव जलस्य संग्रहः करणीयः। अतः पूर्वमेव चिन्तनीयम्।

कथा

एकं कथां वदामि।
कश्मिंश्चित् अरण्ये कश्चन् व्याधः आसीत्। सः प्रतिदिनं मृगयां कृत्वा प्राणीनां मांसं चर्मं च विक्रीय जीवनं करोति स्म। एकदा सः अरण्यं गतवान् । तत्र मार्ग भ्रष्टः अभवत्। तदा इतस्तः अटनीव सायंकालः जातः। तदा कश्चन् व्याघ्रः अकस्मात् पुरतः आगतः। सः व्याघ्रस्य मार्गम् अवरुद्धवान्। भीतः व्याधः तत्रैव विद्यमानं कञ्चित् वृक्षं आरुढ़वान्। वृक्षस्य शाखायाम् कश्चन् भल्लुकः उपविष्टः आसीत्। तम दृष्ट्वा व्याधः कंपितः। तदा भल्लुकः उक्तवान्। भयं मा भवतु। अहं भवतः रक्षणं करोमि। इति। तदा व्याधः तत्रैव शाखायाम् उपविष्टवान्। भल्लुकः पुनरपि उक्तवान्- इदानीम् भवान् निश्चिन्ततया निद्राम् करोतु- अहं रक्षणं करोमि। एकस्य यामस्य अनन्तरम् अहं निद्रां करोमि, भवान् रक्षणं करोतु- इति। व्याधः निद्राम् कृतवान्। वृक्षस्य अधः व्याघ्रः व्याधस्य प्रतीक्षायाम् एव आसीत्। तदा व्याघ्रः भल्लूकम् उक्तवान् – मित्र। आवां मृगौ। एषः व्याधः अस्माकम् वैरी। इदानीं भवन् तस्य रक्षण करोति चेदपि। श्वः सः भवन्तं मारयति। अतः तम् अधः पातयतु। तदा भल्लुकः उक्तवान्। भोः मित्र। यदि अहं तम् मुञ्चामि तर्हि इहलोके अपख्यातिः परलोके दुर्गतिः च भवेत्। अतः एतं न मुञ्चामि। कश्चन् कालः अतीतः व्याधः जागरितवान्। भल्लुकः निद्रां कृतवान्। तदा व्याघ्रः उक्तवान्- भवान् भवतः शत्रु अस्ति भल्लुकः- अतः तस्य जागरणात् पूर्वम् एव तम् अधः पातयतु- तदा व्याधः निद्रामग्नम् भल्लुकम् अधः पातितवान्। पातनसमये जागरितः भल्लुकः काञ्चित् शाखाम् अवलंब्य वृक्षं यथापूर्वम् आरुढ़वान्। तदा पुनः स्वस्थानं गत्वा उपविष्टवान्। तम् दृष्ट्वा व्याधः कंपितः अभवत्। तदा व्याघ्रः भल्लुकम् उक्तवान्। भवान् एतस्य रक्षणं करोति चेत् अपि भवन्तं मारयतु- सः उद्युक्तः। अतः एतम् अधः पातयतु इति। तदा भल्लुकः समाधानेन् उक्तवान्- मित्र। दुर्जनेभ्यः अपकारिभ्यः च विवेकिनः न कुप्येयहु। अपकारिभ्यः उपकारः करणीयः इति नीति अस्ति। अतः एतं न मुञ्चामि। बहुधा व्याघ्रेन् प्रार्थितः चेदपि भल्लुकः व्याधम् प्रभातपर्यन्तं रक्षितवान्। एवं भल्लुकः दुर्जने अपि व्याधे औदार्यं दर्शितवान्।



महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com
महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।१.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)
महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे - कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर
महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत।
महत्त्वपूर्ण सूचना (५):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary


अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें
सजिल्द

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00
राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00
पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 225.00
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उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00


कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.125.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 180.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00


कविता-संग्रह



या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00
जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 300.00
कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 225.00
लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.190.00
लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00
फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00
दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00
कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00
मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00
संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00
दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष 2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 165.00
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मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

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आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
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बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन


अंतिका प्रकाशन
सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II
गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
फोन : 0120-6475212
मोबाइल नं.9868380797,
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ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in,
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श्रुति प्रकाशनसँ
१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन
२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव
५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर
६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर
७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल
८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”
९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर , नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)
श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८
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