भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Wednesday, December 17, 2008

११ टा कथा- १.मराठी,२.थेथर,३.हिजड़ा, ४.बेटी ,५.गोरलगाइ,६.इंटेलीजेन्ट,७.जाति,८.कम्पेशनेट अप्वाइन्टमेन्ट,९.डकैती,१०. उद्योग,११.उद्योग-२










११ टा कथा- गजेन्द्र ठाकुर











1.मराठी

“ऐँ यौ ई की देखैत छी , ऑफिसमे अफसर सेहो मिथिलाक आ बिहारक आ रिक्शाबला, खेनाइ बनबए बला सेहो सभ मिथिलाक आ बिहारक । से कोन गप भेल”।

पुणे मे सिंहजी केँ एक गोट मराठी सज्जन पुछलखिन्ह। बात सेहो ठीक रहए मुदा बाहरी लोककेँ बुझबामे नहि आबए ।

सिह साहेब भारतीय पुलिस सेवा मे रहथि आ हुनकर सहोदर भिखना-पहाड़ीमे प्रिंटिंग प्रेसमे क-ट सभ जोड़ैत छलाह, से हुनका कनेको अनसोहाँत नहि लागलन्हि। मैथिली साहित्यमे देखैत आएल छथि मात्र मैथिल ब्राहाण आ कर्ण कायस्थक लेखनीकेँ चमकैत। रिक्शाबला तँ दरभंगाक होए आकि कटिहारक, खेनाइ बनबएबला झौआ रहबे टा ने करैत अछि।ई मराठी सभकेँ पता नहि किएक अनसोहाँत लगैत छैक।

बड्ड जातिवादी सभ अछि ई मराठी सभ।

 2.थेथर

 

दू दिनसँ परबा असगरे बैसल रहए । ओकर कनियाँ उढ़रि कए कतहु चलि गैलैक । बच्चा सभ कतेको बेर ओकर खोपड़ीमे पानि आ दाना दऽ आएल रहए । मुदा आइ भोरे ओ खोपड़ी उजारि कतहु चलि गेल”।

“किए यै नानी । ओहो किएक नहि दोसर बियाह कऽ लेलक । बेशी प्रेम करैत रहए कनियाँसँ”।

“अहाँ नेना छी । ई कोनो थेथर मनुक्ख थोड़े छी जे कनियाँ मरए, माय-बाप मरए , बेटा-पुतोहु मरए , सर-समाज मरए , चारि दिन मुँह लटकाएत आ पाँचम दिनसँ फेर थेथर मऽ जाएत “।

 3.हिजड़ा

 

मरि गेलि बेचारी “। गौआँ सभ फलना बाबूक तेसर कनिआँक मुइलापर कहलन्हि ।

“फलना बाबू तेसर कनियाँक गरदनि काटि लेलन्हि “। एक गोटे कहलान्हि ।

“से ठीके कहैत छी । पहिल कनियाँमे बच्चा नहि भेलैक तँ दोसर बियाह कएलक । मुदा जखन दोसरोमे बच्चा नहि भेलैक तँ बुझबाक चाही छलए ने”।- दोसर गोटे कहलन्हि ।

“हँ आ उनटे तेसर कनियाँकेँ कहैत रहथि जे भातिज सभकेँ नहि मानैत छिऐक तेँ भगवान बच्चा नहि देलन्हि । बुझू”?-तेसर गोटे कहलन्हि ।

“हिजड़ासार”।- चारिम गोटे सभा समाप्त  करैत बाजल ।

मुदा चारि गोटेक ई महा-सम्मेलन एहि गपपर सहमति मे छल जे पहिल दू टा बियाह करब उचित रहए।

 4.बेटी

“बाबूक संगे खाएब”।-बुचिया बाजलि ।

“हे आब तूँ छोट नहि छेँ, एम्हर बैस”। माए कहलन्हि ।

फेर भाए सभ खेनाइ खेलक आ आब बुचिया आ बुचिया माएक बेर आएल । तरकारी सठि जेकाँ गेल रहए , दूध तँ बाबू आ भाएकेँ  मात्र भेटलैक । माए बुचियाकेँ सठल जेकाँ तरकारी लोहियामेसँ छोलनीसँ जेना –तेना निकालि ए देलन्हि आ अपने भात आ नून –तेल लए बैसलीह। दूधक बर्तनसँ दाढ़ी खखोड़ि कए बादमे बुचिया खेलक।


 - ई खिस्सा सुनबैत मनोहर बजलाह जे हमरा सभ आब ई कऽ सकैत छी की ?

पहिने खेनाइ-पिनाइसँ लऽ कऽ पढ़नाइ-लिखनाइ धरि बेटीक संग अन्याय होइत रहए। अपाला-गार्गी-मैत्रेयीक समय तँ आब जाऽ कऽ फेरसँ आएल अछि ।

 5. गोरलगाइ

जमाय पएर छूबि कए प्रणाम कएलन्हि तँ ससुर सए टका निकालि एक टाकाक नोटक सिक्काक लेल कनियाँकेँ सोर केलन्हि। खूब खर्च-बर्च कएने छलाह बेटीक बियाहमे पाइ अलग गनने छलाह आ नगरक चारि कठ्टा जमीन सेहो बेटीक नामे लिखि देने छलाह।

“नञि बाबूजी। ई गोर-लगाइक कोन जरूरी छैक”?

तावत कनियाँ आबि गेल रहथिन्ह, एक टकाक सिक्का लऽ कए।

एक सए एक टाका जमायक हाथमे रखैत ससुर महराज बजलाह- –

“राखू-राखू । ई तँ पहिनहियो ने सोचितियैक”।

6.इंटेलीजेन्ट

मसूरीमे आइ.ए.एस. आ आइ. पी. एस. प्रोबेशनर सभक दारु पार्टी चलि रहल छल ।

“हम सभ एतेक तेज छी एक सय प्रश्नक सेट बना कऽ तैयारी कएलहुँ तखन जा कए सफल भेलहुँ । के अछि हमरासँ बेशी तेज?”।

“रौ दिनेसबा । सतमामे तूँ पास नहि भेलँह , अठमामे सेहो एक बेरे पास नहि भेलँह । दसमामे द्विती श्रीणी भेलापर तोरा स्कूलसँ निकालि देलकऊ। प्रश्नक पैटर्नक हम आ तूँ प्रैक्टिस केलहुँ आ सफल भेलहुँ तँ एहिमे तेजी केर कोन बात आएल”।

7.जाति

 

हैदराबाद पुलिस एकेडमीमे दारूक पार्टी चलि रहल छल ।

“क्यो किछु नहि बाजत, बस हमही टा बाजब”।

छाती पिटैत- “राजपूतक छाती छी ई, क्यो किछु नहि बाज “।

“:भाइ यैह तँ अंतर छैक, दुनू गोटे आइ.पी.एस.छी , दुनू गोटे पीने छी। मुदा की हम ई कहि सकैत छी छाती पीटि कए- जे हम डोम छी, क्यो किछु नहि बाज”!: 


8.कम्पेशनेट अप्वाइन्टमेन्ट

 “बड्ड दर्द भऽ रहल अछि बाबू, आब बर्दास्त नहि भऽ रहल अछि” ।

पता नहि कोन घाव रहैक । पुकार कुहरि रहल छथि । पिता स्वतंत्रता सेनानी रहथि, जखन डाक्टर आ कम्पाउन्डर मना कऽ देलक घाव छुबएसँ तँ अपने हाथे सेवा कऽ रहल छथि । उजरा पाउडरकेँ नारिकेरक तेलमे मिला कऽ घावक खपलौया हटा कऽ ओहिमे लगाबथि। पीजकेँ पोछथि। बाप आ छोट भाए दुनू सेवामे लागल रहथि ।

परूकाँ प्रथम श्रेणीमे उत्तीर्ण भेल छलखिन्ह पैघ बेटा, सत्यनारायण भगवानक पूजा भेल रहए।

बूढ़ बापक पैघ आश रहथि बड़का बेटा। छोटका बेटा कोनो तेहन तेजगर नहि रहथिन। मुदा रोग एहन रहए जे एक दिन बड़का बेटाक प्राण लए लेलक अंग्रेजसँ लड़ैत खुशी-खुशी जेल गेल रहथि मुदा तखन युवा रहथि। बुढ़ारीमे ई शोक हुनका तोड़ि देलकन्हि । गुमशुम आ अपनेमे मगन रहए लगलाह । स्वतत्रता सेनानी पेंशनसँ घर चलाबथि । हँ छोटका बेटा पैघ भाएक सटिर्फिकेट लऽ कलकता गेलाह आ ओहि सटिर्फिकेटक आधारपर हुनका एकटा प्राइवेट कम्पनीमे नीक नोकरी भेटि गेलन्हि। माने मात्र नाम बदलि गेलन्हि।

लोककेँ बाप मरलापर नोकरी भेटैत छैक , हुनका भाएक मरलापर भेटलन्हि । 


9.डकैती

नगरमे डकैतीक घटना भेल । नूतन मीडिया अपन-अपन चैनलमे सर्वप्रथम ओकरे चैनलपर एकर सूचना देल जा रहल अछि ई ब्यौरा दैत, दू-दिनमे एकोटा गिरफतारी नहि होएबाक आ पुलिसक अक्षमताक-चर्च करैत गेलाह।

पुलिस हेडक्वार्टरमे बैठकी भेल । सभ टी.वी. चैनल कहि रहल छल जे चारि गोटे मिलि कए डकैती केलन्हि मुदा एखन धरि एको गोटेक गिरफतारी नहि भेल अछि। एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट बजाओल गेलाह। जेना सभ बेर होइत रहए एहि बेर सेहो ओ एक गोटेँ पकड़ि कए अनलन्हि। चारि डाँग पड़बाक देरी छल आकि ओ अपन डकैत होएबाक गप स्वीकार कए लेलक। फेर एनकाउन्टर स्पेशलिस्टक संग ऑफिसर लोकनि कैमराक सोझाँ  फोटो खिचबेलन्हि। ओ डकैत अपन डकैत होएबाक गप सेहो स्वीकार कएलक।

चारि दिन आर बीतल। सभ दिन तरह-तरह सँ ओहि कथित डकैतकेँ पीटल जाइत रहल,

-“बता अपन तीन संगीक नाम जकरा संगे डकैती कएने छलह”।

-“सरकार चारिए डाँगमे अपन डकैत होएबाक गप स्वीकार कए लेलहुँ, हम डकैत रहितहुँ तँ ई करितहुँ। मुदा आर तीनटा संगीक नाम कतए सँ आनू आ ककरा फुसियाहींकेँ फसाऊ”।

सप्ताह भरिक बाद मीडिया एकटा बम विस्फोटक अन्वेषणमे बाँझि गेल । मुख्य डकैत तँ पकड़ाइये ने गेल से आब डकैतीक कॉवरेज दर्शक नहि ने देखए चाहैत छथि! पब्लिक डिमान्ड नहि छैक से ओहि डकैतकेँ बेल भेटलैक आकि नहि से कोनो समाचार नहि आएल।


  10.उद्योग

गममे चौधरीजीक बड्ड रूतबा, डरे सभ सर्द रहैत छल । ककर दीन अछि जे हुनकर गम्हरायल धान काटि लेत आकि ... ।

ओ एकटा बस खोललन्हि-

“दरभंगासँ गाम धरि चलत । सेकेंड हैंडमे भेटल अछि । पुरनका मालिकक लाइसेंस काज देत। संगमे बसक पुरनका मालिक तीन मासक लेल अपन ड्राइवर आ खलासी सेहो देलक अछि, तकर बाद अपन ताकि लेब”

चौधरीजी मन्दिरपर बसक पूजा करैत काल गौआँ सभ़सँ बजलाह ।

“सुनैत छिऐक बस-स्टैण्डमे बड़ बदमस्ती करैत जाइत छैक”। एक गोटे गौआँ बजलाह

“धुर, चौधरीजीक बस आ आदमीकेँ के छुबाक साहस करत”। दोसर गोटे प्रसाद लैत बजलाह।

 

बसक रूट आकि रस्ता यात्रीगणक लेल सुभितगर रहैक से ओहि गाड़ीमे पैसेन्जर भरि जाइत रहए। दोसर बसबला सभ दबंग सभ। शाहीजी आ मिश्राजीक स्टाफ सभ बड़ सञ्जत! से चौधरीजीक स्टाफकेँ गरगोटिया दऽ बस स्टैण्ड सँ बाहर निकालि देलकन्हि।

पोखरिक महारपरसँ चौधरीजीक बस खुजए लागल तँ ओतहु यात्री पहुँचए लगलाह।

 

आब तँ बस-स्टैण्डक दादा सभकेँ बड्ड तामस उठलन्हि । दुनु ड्राइवर आ खलासीकेँ पुष्ट पीटल गेल आ ईहो कहल गेल जे फेर एहि रूटपर चलताह तँ बसक एक्सीडेन्ट करबा देल जएतन्हि। शाही आ मिश्रा जीक तँ पचासो टा गाड़ी छन्हि एकटा थानामे एक्सीडेन्टक बाद पड़ले रहत तँ की।

 

गामक रोआब –दाब बला कौधरीजी बस-स्टेण्डक दादा सभक सोझाँ जेना बकड़ी बनि गेलाह। गाममे मन्दिरपर गाड़ी ठाढ़ छन्हि, ओहि पर कदीमाक लत्ती चढ़ि गेल अछि पैघ-पैघ कदीमासँ बस झपा गेल अछि।खूब फड़ल छैक। गौआँसभ हँसीमे कहि रहल छथि-

“चौधरीजीक बसक पाइ तँ एहि बेर कदीमा बेचिये कऽ उप्पर भऽ जएतन्हि”।

दरभंगाक इन्डस्ट्रीयल स्टेटमे सेहो फैक्ट्री सभ एहिना बन्द अछि आ ओकर देबाल सभपर एहिना तर-तीमनक लत्ती सभ भरल छैक”।- दोसर गौआँ कहलक।

 

11.उद्योग-२

मिथिलाक बोनमे रहनिहार जीव-जन्तु सभ आपसमे विचार कएलक- –

“अपन क्षेत्रक दादा सभ उद्योगक विनाश कएने अछि ओतुक्का भीरू लोक सभ उद्योग लगेबासँ परहेज करैत अछि”।- गीदड़ बाजल।

“तखन अपनहि सभ किएक नहि फैक्टरी खोलैत छी , कोन दादाक मजाल जे हमरा सभ लग आओत”।-बाघ कड़कल।

प्रस्ताव पास भेल जे आब जंगलमे फैक्ट्री खुजत आ नगर जा कए उद्योग विभागसँ एकर पंजीकरण करबाओल जाएत। ओतय भीरू मैथिल सभक राज अछि जे बड्ड ओस्ताज होइत अछि। गीदड़, बानर , लोमड़ि, नीलगाय संग गदहा सेहो पंजीकरण लेल अपन सेवा देबाक लेल अगू बढ़लाह। सभसँ पहिने लोमड़िकेँ मौका भेटल कारण ओ सेहो जंगलक ओस्ताज अछि।

किछु दुनुका बाद भागि,–दौग-बड़हा केलाक बाद ओ हारि मानि लेलक।

“यौ बाघ महाराज। बड्ड कोन-कोन तरहक दस्तावेज मँगैत अछि नहि भऽ सकत हमरा बुते”।

 

फेर एक – एक कए सभ जाइत गेलाह आ घुरि कए अबैत गेलाह । गदहा कहैत रहल जे एक मौका हमरो देल जाए मुदा सभ सोचथि जे बुझू एहेन पेंचीला सभ विफल भऽ आबि गेलाह मुदा फैक्टरीक पंजीकरण नहि करबाए सकलाह आ ई गदहा जे मूर्खताक लेल आ बोझ बहबाक लेल प्रसिद्ध अछि की कऽ सकत ?

“ठीक छैक”। अन्तमे हारि कए बाघ कहलन्हि- –

“जाउ अहूँ देखि आउ एक बेर”।

मुदा ई की ? साँझ होइत देरी गदहा महाराज जे छलाह से फैक्ट्रीक पंजीकरण प्रमाणपत्र लऽ सोझाँ हाजिर भऽ गेलाह।

बाघ पुछलन्हि- –“औ जी गदहा महाराज ! एतेक कलामी जन्तु सभ जतए विफल भऽ गेलथि ओतए अहाँक सफलताक मंत्र की”?

गदहा महाराज उत्तर देलन्हि,

“महाराज एकर मंत्र अछि जातिवाद आ भाइ-भतीजावाद। उद्योग विभागमे हमर सभ सरे-सम्बन्धी लोकनि छथि ने”!    

कथा- पता नहि डोमा पढ़लक आकि नहि-गजेन्द्र ठाकुर

“हे हम डोमाकेँ पढ़ा लिखा कए किछु बनबए चाहैत छी” । बुधन पासवान बाजल । चण्डीगढ़मे ओ रिक्शा चलबैत छथि । आब गाममे खेती बारीमे किछु नहि बचलैक ।

छोटका भाएय सभ जनमिते मरि जाइत रहए। से बुधनक एकटा छोटका भाएकेँ माए-बाप जनमलाक बाद डोमक हाथसँ बेचलन्हि आ  फेर पाइ दऽ कए किनलन्हि । ई सभटा काज ओना तँ सांकेतिक रूपेँ भेल मुदा एहिसँ ग्रह कटित भऽ गेलैक। आ छोटका भाय जे बुधन पासवानसँ १२ बरिख छोट रहन्हि बचि गेलाह ।

आ ताहि द्वारे ओकरा सभ डोमा कहि सोर करए लागल ।

बुधन अपन बाप-माएक संग हरवाही करथि मुदा भाएकेँ पढ़ेबाक बड्ड लालसा रहन्हि ।

“सुनैत छिअए जे हमरा सभमे कनिओ पढ़ि-लिखि लेलासँ नोकरी भेटि जाइत छैक। एकरा जरूर पढ़ाएब, चाहे ताहि लेल पेट काटए पड़य आकि भीख माँगय पड़य”।

भीख तँ नहि माँगलन्हि मुदा चण्डीगढ़क रस्ता धेलन्हि बुधन। भरि दिन रिक्सा चलाबथि आ साँझमे जखन दोसर संगी-साथी सभ देसी ठेकामे अपन ठेही दूर करबाक लेल जाथि तखन दस तरहक गप सुना कए बहन्ना बना कए बुधन अपन घर दिस घुमि जाथि।

“की रे मीता। बामा-दहिना करै छेँ, निन्द नहि होइ छौ”।

“नञि रौ भाइ। भरि दिन तँ बाइ मे रिक्सा घिचैत रहैत छी मुदा साँझ होइते अंगक पोर-पोर दुखाए लगै-ए”।

“रौ भाइ। कहैत छियौक जे ठेकापर चल तँ दस बहन्ना बना कए घुरि जाइ छिहीँ। देख हमरा आउर केँ, पीबि कए फोँफ कटैत रहैत छी। एक्के निन्नमे भोर आ सभ ठेही खतम”।

कोरइलाक सभ गप सुनि कऽ गुमकी लाधि दैत छथि बुधन। मोनमे ईहो होइत छन्हि जे किंसाइत डोमा पढ़ए आकि नहि पढ़ए।

तखन जे आइ सभ गप पेटसँ निकालि देतथि तँ यैह सभ संगी-साथी सभ काल्हि भेने अही गपकेँ लऽ कऽ हँसी करतन्हि। दू चारि-टा पाइ जे बचत तकरा गामपर पठाएब। आ ताहिसँ डोमा पढ़त।

 

 

मुदा गाममे जे स्कूल रहए ओतय किओ टा दलित आकि गरीबक बच्चा नहि पढ़ैत रहथि।

सरकार एकटा योजना चलेलक , दलितक बच्चा सभकेँ बिना पाइ लेने किताब बाँटबाक । किताब लेबाक लेल घर-घर जा कए यादव जी मास्टर साहेब स्कूल बजेलन्हि बच्चा सभकेँ। नाम लिखलन्हि, बिना फीसक , मासूलक । सभ हफता-दस दिन अएबो कएल स्कूल। दुसधटोलीसँ , चमरटोलीसँ , धोबिया टोलीसँ सभ। डोमा सेहो। सभकेँ किताब भेटलैक आ सभ सप्ताह-दस दिनक बाद निपत्ता भऽ जाइ गेल । देखा –देखी कमरटोली आ हजामटोलीक बच्चा सभ सेहो अएलाह पढ़ए, किताब मँगनीमे भेटबाक लोभे । मुदा ओतए ई कहल गेल जे अहाँ सभ पैघ जातिक छी, मुफ्त किताब योजना अहाँ सन धनिकक लेल नहि छैक ।

“बाबू ई काटए बला गप छैक की, छोट-छोटे होइत छैक आ पैघ-पैघे । स्टेटक आइ धरिक सभसँ नीक चीफ-मिनिस्टर कर्पूरी ठाकुर भेल छैक, की नञि छै हौ असीन झा” । जयराम ठाकुर अपन खोपड़ीक टूटल चारसँ हुलकैत सूर्यक प्रकाशक आसनीपर असीन जीक केश कटैत बजलाह।

“से तँ बाबू ठीके”। असीन बजलाह ।

 

से गाममे फेर ब्राहाण आ भूमिहारके छोड़ि आर क्यो स्कूलमे पढ़एवला नहि बचल । अदहरमे सभटा किताब ई लोकनि किनैत गेलाह ।

“हे अदहरसँ बेसीमे नहि देब , मानलहुँ किताब नव अछि, मुदा अहाँ सभकेँ तँ मँगनीयेमे ने भेटल अछि”। आ दुसध टोली, चमरटोली आ धोबिया टोलीसँ सभटा किताब सहटि कऽ निकलि गेल ।

आ पता नहि डोमा पढ़लक आकि नहि।

Sunday, December 14, 2008

किछु गद्य कविता-आशीष अनचिन्हार

१) सीमा

अर्थ मास्टरमाइन्ड भए सकैत छैक । मास्टरपीस भए सकैत छैक । मास्टर नहि ।

२ ) काटब

पेट भरबाक लेल घेंट कटैत छी आ घेंट ऊँच रखबाक लेल पेट

३ ) दोसराति

जखन भए जाइत छी हम अपने अशक्त ।
तखने जरूरति परैत अछि दोसरातिक ।

४ )

प्रगति १.

शंख । महाशंख । डपोरशंख । हराशंख ।

प्रगति २.

कनिया देशी । पिया परदेशी । बच्चा विदेशी ।

५) मूलमंत्र

अपन कनियांक हाथ पकड़ू आ दोसरक कनियांक करेज । चिन्हारक गरिदन पकरू आ अनचिन्हारक पैर । कहियो कोनो काजमे असफलता नहि भेटत ।

६ ) मोश्किल काज

कोनो कनैत जीव के चुप्प करब ओतबे मोश्किल काज छैक , जतेक की अपन आँखिक नोर के रोकब ।

७ ) सुआद

सोहारी आ गप्प दूनू नून मरचाई लगेला सं सुअदगर भए जाइत छैक ।

Friday, December 12, 2008

जीवनक सार्थकता - कथा सागर - जितमोहन झा (जितू)

एक बेर महात्मा बुध्द अपन शिष्य आनंदक संग कतहु जाइत छलाह ! अचानक रस्ता मे हुनका बहुत जोर प्यास लगलैन ! आनंदसँ कहलखिन 'वत्स' कतहुसँ कनेक जल आनू हमरा बड जोरक प्यास लागल अछि ! आनंद नदीक किनार पहुँचला, एतबे मेs एक बैलगाड़ी नदीसँ गुजरलनि जाहिसँ नदीक जल दुषित भ' गेलनि ! आनंद वापस लौट गेलाह ! बुध्दसँ कहलखिन "गुरुदेव नदी सँs जा हम जल भरितहुँ ताबे s एक बैलगाड़ी ओहि से गुजरल जाहिसँ नदीक जल पूरा दुषित भ' गेल ! हम कतहु आर जगह सँ जल आनबा केs प्रयास करैत छी !" मुदा महात्मा बुद्ध हुनका फेर ओही नदीक तट पर जाय लेल कहलखिन ! नदीक जल एखनो धरी साफ नञि भेल छलनि, आनंद फेर लौट गेलाह ! गुरुदेव फेर हुनका ओही जगह भेजलखिन चारिम बेर आनंद जखन नदीक तट पर पहुँचलाह तँ नदीक जल शीशा के सामान चमकैत रहनि ! गंदगी के नामों निसान नञि रहनि ! जखन जल भरिकेँ लौटलाह तँ गुरुदेव (महात्मा बुद्ध) हुनका कहलखिन, "हमर सबहक जीवनक विचारकेँ बैलगाड़ी दिन - प्रतिदिन दुषित करैत अछि ! आर हम सब भागयs लागए छी ! यदि भागय के बजाय नदी केँ स्वच्छ होई केs प्रतीक्षा करी तँ जीवन सार्थक भ' जाएत .....

आदर्शवादी शिक्षक - कथा सागर - जितमोहन झा (जितू)

प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन बंगालक एक स्कुल मे अध्यापक रहथिन ! ओहि समय स्कुल मे वार्षिक परीक्षा चलैत छल ! जै रूम मे सूर्यसेनक ड्यूटी लगलनि ओहि रूम मे प्रधानाध्यापकक बेटा सेहो परीक्षा दैत छल ! सूर्यसेन हुनका नक़ल करैत पकड़लखिन परीक्षा सँ बाहर केँ देलखिन ! जखन परीक्षाक परिणाम आयल तँ प्रधानाध्यापकक बेटा फेल छल ! स्कुलक सभ अध्यापक s लगलनि जे आब सूर्यसेनक नौकरी गेलनि ! एक दिन अचानक सूर्यसेनकेँ प्रधानाध्यापकक बुलाबा एलनि !

प्रधानाध्यापक सूर्यसेन s स्नेह पूर्वक कहलखिन "हमरा जैनकेँ ख़ुशी भेल जे हमर स्कुल में आहा जेहेंन कर्तव्यनिष्ठ आदर्शवादी अध्यापक छैथ ! जे हमर (प्रधानाध्यापकक) बेटोकेँ दंड दै मेंs संकोच नञि केलैथ ! यदि अपने ओकरा नक़ल केला के बादो पास s देतो तँ हम अपनेक बर्खास्त क's देतहु" तहि पर सूर्यसेन तपाकसँ कहलखिन "यदि अपने हुनका पास करै केs लेल मजबूर करतो s हम इस्तीफा द् देतो!" सूर्यसेन अपन जेब s त्यागपत्र निकैल केs हुनका (प्रधानाध्यापक) केँ देखबैत कहलखिन, आय हम एकरा अपन संग आनने छलो ! तहि दिन सेs प्रधानाध्यापक महोदय सूर्यसेनक प्रशंसक बैन गेलाह ......

Friday, December 05, 2008

दू गोट कविता- ब्रज मोहन झा "सोनी” बनौटा - नेपाल

1.हम
ब्रज मोहन झा ”सोनी”
हम पत्रकार छि,
कुडा के ढेर पऽ पडल,
बिन तारऽक सितार छि ।

हम कथाकार आ
गित गजलकार छि
आगुमे डा. होइतो अर्थऽक बिमार छि

बन्‍द आ हडतालमे
अर्जुनऽक ढाल घटोतकच बनल
नेताके हथियार छि ।

हम गामघरऽक अकला
घरऽक फुटल तसला
मसोमातऽक भतार हम
नाटकऽक अचार छि ।

कियक त हम यूवा
पैघ बेरोजगार छि ।
कियक त हम यूवा
पैघ बेरोजगार छि ।



2.उदासी
ब्रज मोहन झा ”सोनी”
डेग डेग पऽ गाम सहरमे
सगरो नोर भोकासी अछी,
नोर बहा लोक सुती रहल
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

ओइ दिन ओकरा घर चोर गेलै,
कयलौ हल्‍ला होशीयारी लेल,
डरे चोरबऽक हनलक गब्‍दी ,
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

चोरबो पिटलक दोसरो डटलक
कानुनमे हमरा फँासी अछी ।
घुस खाऽ जज छोडी देलक,
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

चुप रहने संरक्षण भेटत
बाजब बडका बदनामी अछी ।
ई बात हमर गुरुजन कहलक,
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

आइ फेर देखलीयै सेन्‍ह पडैत,
”सोनी” सोनाके गाछी अछी ।
ई देखी सब केव भेल प्रशन्‍न,
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

ब्रज मोहन झा ”सोनी”
,बनौटा – ५ (महोत्तरी)

गामक गप

एक युग मे होइत छैक बारह बरख
आउर एक बरख मे होइत तीन सौ पैसंठ दिवस
एक दिवस मे होइत छैक चौबीस घंटा
एक घंटा मे होइत साठ मिनट

हम कोनो अहां के
गणित आ समयक
हिसाब-किताब नहि
बुझा रहल छी

हम जोइर रहल छी
कतेक समय सं
गाम नहि गेलहु
आधा युग बीत गेल गाम गेला

जहि दिवस स
बाहरि अलों
शहर के रंग-ढ़ंग मे
रंगहि गेलों

सोचैत छी
हम एतहि बदलि गेलों
तहि गाम
कतेक बदलल होइत

छोटका काकाक द्वार पर
आबो लागैत हेतै घूर
दलान पर बैठकी मे
होइत हेत सभ शामिल

सूर्य उगलाक स पहिल
केए सभ जाइत हेतै लोटा लकए
दतमैन स मुंह
आबो धोइत हैत कि नहि गामक लोक

पांच बरख मे
सरकार बदलि जाइत छैक
गामक लोकक मे
सेहो परिवर्तन भेल हेता

लकड़ी-काठी से चूहलि
जलैत हेतै कि नहि
बभनगमा वाली भौजी
चायपत्ती मांगइलै आबैत हेतै कि नहि

गोबर स घर-द्वार
नीपैत हेतै कि नहि
दरवाजा पर माल-जालक
टुन-टुन बाजैत हेतै कि नहि

ई सभ सोचैत काल
हम एक-एक गप पर तुलना करैत छी शहर से
गाम आउर शहर मे फ़र्क भ गेल छैक
जमीन आ आसमानक

मुदा,
सब कुछ गाम मे
बदैल गेल
नहि बदलल छैक त आत्मीयता.

निरीक्षण - श्यामल सुमन - जमशेदपुर

निरीक्षण


अपने सँ देखब दोष कहिया अपन।

ध्यान सँ साफ दर्पण मे देखू नयन।।



बात बडका केला सँ नञि बडका बनब।

करू कोशिश कि सुन्दर बनय आचरण।।



माटि मिथिला के छूटल प्रवासी भेलहुँ।

मातृभाषा विकासक करू नित जतन।।



नौकरीक आस मे नञि बैसल रहू।

राखू नूतन सृजन के हृदय मे लगन।।



खूब कुहरै छी पुत्री विवाहक बेर।

अपन बेटाक बेर मे दहेजक भजन।।



व्यर्थ जिनगी अगर मस्त अपने रही।

करू सम्भव मदद लोक भेटय अपन।।



सत्य-साक्षी बनू नित अपन कर्म के।

आँखि चमकत फुलायत हृदय मे सुमन।।




श्यामल सुमन, प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर - झारखण्ड,

सम्बन्ध - श्यामल सुमन - जमशेदपुर

सम्बन्ध


साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।

वेदना हम ह्रदय के सुनाबैत छी॥



कहू माताक आँचर मे की सुख भेटल।

चढ़ते कोरा जेना सब हमर दुःख मेटल।

आय ममता उपेक्षित कियै रति-दिन,

सोचि कोठी मे मुंह कय नुकाबैत छी।

साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।

वेदना हम ह्रदय के सुनाबैत छी॥



खूब बचपन मे खेललहुं बहिन-भाय संग।

प्रेम साँ भीज जाय छल हरएक अंग-अंग।

कोना सम्बन्ध शोणित कय टूटल एखन,

एक दोसर के शोणित बहाबैत छी।

साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।

वेदना हम ह्रदय के सुनाबैत छी॥



दूर अप्पन कियै अछि पड़ोसी लगीच।

कटत जिनगी सुमन के बगीचे के बीच।

बात घर घर के छी इ सोचब ध्यान साँ,

स्वयं दर्पण स्वयं के देखाबैत छी।

साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।

वेदना हम ह्रदय के सुनाबैत छी॥




श्यामल सुमन, प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर - झारखण्ड,

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