भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Wednesday, April 01, 2009
समीक्षा श्रृंखला-३ गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोशपर- उदय नारायण सिंह "नचिकेता"
अंग्रेजी जेना एकरा हम आइ देखैत छी, भाषाक वैश्विक इतिहासमे एकटा सापेक्षतया नूतन घटना अछि संभवतः मैथिलीसँ किछुए पुरान। ई एहि लेल किएक तँ जखन मैथिलीक सभसँ पुरान उपलब्ध ग्रन्थ ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखल जा रहल छल ओ समय रहए अंग्रेजीमे चौसरक। पाश्चात्य कोशमे सभसँ पुरान कोश तखुनका अक्कादी साम्राज्यमे रचित भेल जाहिमे सुमेरी-अक्कादी शब्द सूची रहए (आधुनिक सीरियाक एबलामे प्राप्त) आ एकर समय छल लगभग २३०० ई.पू.। मुदा सभसँ प्राचीन ग्रीक कोश एपोलोनियश द सोफिस्ट प्रथम स्शताब्दीक, ई होमरयुगीन शब्दपरिभाषा आ अर्थ सूचीबद्ध करैत अछि आ एकटा उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। द्वितीय सहस्राब्दी ई.पू. उर्रा= हुबुल्लु शब्दार्थसूची जे एहने द्विभाषी शब्द सूचीक संग पुरान कोशीय लेखाक उदाहरण एकटा आर उदाहरण अछि जेकर तुलना तेसर शताब्दीक चीनी परम्परे सँ कएल जा सकैत अछि। प्रारम्भिक जापानी प्रयास ६८२ ई.क चीनी अक्षरक नीना ग्लॉसरी आ सभसँ पुरान उपलब्ध जापानी कोश तेनरेइ बान्शो मैगी (८३५ ई.) सेहो महत्त्वपूर्ण प्रयास छल। भारतमे वैदिक साहित्यक संरक्षण व्याकरण आ कोशीय रचनाक लेल सभसँ पैघ उत्प्रेरक छल। संस्कृतक पाणिनीय आ दोसर वैयाकरणिक परम्परामे ई एकटा सामान्य आ पूर्णतः आधारभूत कार्य रहए- वैदिक वाक्यकेँ शब्दमे खण्ड-खण्ड करब आ शब्दकेँ खण्ड करब धातु-प्रत्ययगघतकमे। एहि क्रममे शाब्दिक संरचना, भाषायी ध्वनि तन्त्रक संग संरचनात्मक-ध्वन्यात्मक सिद्धांत सभ सेहो विकसित भेल। ई विश्वास कएल जाइत अछि जे निघण्टु (७०० ई.पू.) पर यास्क एकटा निरुक्त नाम्ना भाष्य लिखलन्हि जे आइ सभसँ पुरान ज्ञात कृति अछि आ ई परम्परा सेहो पाली परम्परा धरि चलल। ओ सभटा कोशीय सामग्रीकेँ समानार्थी आ समानह्रिजए-ध्वनि अनुसार सजेलन्हि। शास्त्रीय संस्कृतमे सभसँ लोकप्रिय कृति अछि अमरसिंहक अमरकोष (६ठम धताब्दी)। कटालोगस कैटालोगोरम मात्र अमरकोषपर कमसँ कम ४० टा भाष्यक सूची दैत अछि जे प्राचीन भारतमे एहि समानार्थी कोशक महत्व आ लोकप्रियता देखबैत अछि। एहि तरहक आर कोश जे कम-बेशी अमरकोषक आधारपर रचित भेल आ एहिमे सम्मिलित अछि (संदर्भ मल्हार कुलकर्णी- TDIL अन्तर्जालपर):-
१. भोजक कृत नाममालिका (११म शताब्दी)
२. सहजकीर्तिक सिद्धशब्दार्नव (१७म शताब्दी)
३. हर्षकीर्तिक शारदीयाख्यानाममाला (१७म शताब्दी)
४. धनन्जय भट्टक पर्यायशब्दरत्न
५. कोशकल्पतरु
६. नानार्थरत्नमाला- इरुगप दण्डाधिनाथ (१४म शताब्दी)
७. राघवक नानार्थमञ्जरी
८. धरनीदासक धरणीकोश (१२म शताब्दी)
९. शिवदत्त मिश्रक शिवकोश
१०. सौभरीक एकार्थनाममाला-द्वक्षारनभमाला
११. मकरन्ददासक परमानन्दीयनाममाला
पहिल अधुनातन युगक संस्कृत कोश जे पाश्चात्य सिद्धांतकेँ प्रयुक्त कए बनाओल गेल से अछि प्रोफेसर एच.एच.विल्सन द्वारा संगृहीत आ १८१३ ई. मे प्रकाशित संस्कृत-अंग्रेजी कोश। दू टा भारतीय कोश तकर बाद आएल पं. सर राजा राधाकान्त देवक शब्दकल्पद्रुम आ पं. ताराकान्त तर्कवाचस्पतिक वाचस्पत्यम् ।
हमर विचारमे प्रयुक्त शब्दकोशशास्त्र आकि कोश संग्रहक विज्ञान वा कला जे अछि कोश सभकेँ विभिन्न कार्यक लेल लिखब आ संपादन करब आ ई सेहो ततबे महत्वपूर्ण अछि जतेक सैद्धांतिक कोशशास्त्र महत्वपूर्ण अछि। शब्दकोशशास्त्र शब्द एकटा कथ्यक रूपमे १६८० ई.मे आबि कए प्रयुक्त भेल जखन कि कोश शब्द अंग्रेजी भाषामे १५२६ ई. मे आबि कए प्रयुक्त भेल जेनाकि मेरिअम-वेब्सटर कोश कहैत अछि। हमरा सभकेँ कहल जाइत अछि जे कोशमे ई सभ सम्मिलित होएबाक चाही:-
१. प्रिंत वा इलेक्ट्रॉनिक रूपमे संदर्भ स्रोत जाहिमे वर्णमालाक आधारपर सजाओल शब्द रहए, जाहिमे ओकर रूप, उच्चारण, कार्य, व्युत्पत्ति, अर्थ आ वाक्य रचना आ कहबी युक्त प्रयोग होअए।
२. एकटा संदर्भ ग्रंथ जाहिमे संबंधित कार्य-विषयक महत्त्वपूर्ण पदबंध आ नामक वर्णानुसार सूची होअए- संगमे ओकर अर्थ आ अनुप्रयोगक चर्चा सेहो रहए।
३. एकटा संदर्भ ग्रंथ जाहिमे एक भाषाक शब्दक लेल दोसर भाषामे समानार्थ देल रहए।
४. एकटा संगणकीय संशोधित सूची (दत्तांशशब्द वा शब्द पदक) जे सूचना प्राप्ति वा शब्द संसाधकक लेल संदर्भक रूप उपयोग कएल जा सकए।
एहि असाधारण आ समय साध्य कलाक अनुप्रयोगमे सम्मिलित कार्य सभमे ई सभ आवश्यक रूपमे सम्मिलित अछि:-
*प्रयोक्ताक निर्धारण आ ओकर आवश्यकताक निर्धारण
*सामान्यजनक शब्दशक्तिक आधारपर भाषिक शब्दक संख्याक निर्धारण आ एकटा निश्चित सीमित परिधिमे ओकर निर्णय
*परिभाषा आ विवरणक सज्जाक विषयमे निर्णय
*कोशक संदर्भमे सूचना संचरण आ विचार-क्रियाक निर्धारण
*कोशक विभिन्न अंगक निर्धारण दत्तांशक संग्रह आ प्रदर्शनक लेल उचित संरचनाक चयन (जेना आवरण-संरचना, संवर्गीकरण, वर्गीकरण, प्रसारण आ एकसँ दोसर अंशमे सन्दर्भ-संकेत)
*प्रधान शब्द आ जोड़एवला शब्दक चयन- पारिभाषिक शब्द बनएबाक लेल
*समानधर्मिता आ संधिकेँ चिन्हित करब
*अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आइ.पी.ए.) आ ब्लॉच एण्ड ट्रैगर चिन्हक प्रयोगसँ शब्द उच्चारणक निर्देश
*सुरुचिपूर्ण आ वर्ग-स्थान-विशेष बोली स्वरूपक योग
*बहुभाषिक कोशक लक्ष्य भाषाक लेल समानार्थी शब्दक चयन
*छपल आ इलेक्ट्रॉनिक दुनू तरहक कोशमे उपयोक्ताक लेल प्रवेशमार्ग बटन आ आन सुविधा
बिहारक गंगाक मैदान आ नेपालमे हिमालयक निचुलका पहाड़ीक तराइ क्षेत्र मिलि कऽ मैथिली आ मिथिलाक सांस्कृतिक क्षेत्रक निर्धारण करैत अछि, जे बहुत पहिने १९०८ ई. मे जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा चर्चित भेल, ओना ओ मुख्यतः भारतमे स्थित मिथिला क्षेत्रपर केन्द्रित रहल। एहि क्षेत्रमे बहुत रास परिवर्तन आ सीमाक पुनर्निर्धारण भेल। २०म शताब्दीक प्रारम्भमे ग्रियर्सन मैथिली भाषाक क्षेत्र सम्पूर्ण दरभंगा आ भागलपुर जिलाकेँ मानलन्हि। एकर अतिरिक्त ओ मैथिलीकेँ मुजफ्फरपुर, मुंगेर, पूर्णियाँ आ संथाल परगनाक बहुसंख्यक लोक द्वारा बाजल जाएवला भाषाक रूपमे चिन्हित कएलन्हि। मुदा आइ-काल्हि एहिमे सँ किछु अंश झारखण्ड राज्यक अंग भऽ गेल अछि।
एतए ई तथ्य आनब सेहो समीचीन होएत जे एहि बीच राज्यक मान्यताक क्रममे मात्र १७ मे सँ ५ जिला (ई अछि भागलपुर, पूर्णियाँ, सहरसा, दरभंगा आ मुजफ्फरपुर) बिहारक मैथिली भाषी क्षेत्रक रूपमे सामान्य रूपमे अभिहित भेल। पॉल ब्रास (१९७४) मैथिली आन्दोलनक अपन वृहत् अध्ययन उत्तर भारतमे भाषा,धर्म आ राजनीति मे एकरा सामान्य रूपमे परिभाषित भौगोलिक क्षेत्रक रूपमे लेलन्हि। १९८० क दशकमे बिहारक ३१ जिलामे भेल विभाजनक बाद एकटा प्रोजेक्ट रिपोर्टमे (द मैथिली लैंगुएज मूवमेन्ट इन नॉर्थ बिहार: अ सोशियो लिंगुइस्टिक इन्वेस्टीगेशन नामसँ) संयुक्त रूपसँ हमरा आ एन.राजाराम आ प्रदीप कुमार बोस बनाओल गेल, हम सभ एहि निर्णयपर पहुँचल छलहुँ जे ३१ मे सँ ई सभ १० जिलाकेँ मैथिली भाषी क्षेत्र मानल जएबाक चाही: भागलपुर, कटिहार, पूर्णियाँ, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर आ वैशाली। से एहि भौगोलिक सीमाक परिवर्तन प्राकृतिक परिवर्तन (कोशी धार २०० बरखमे सात बेर अपन दिशा बदलने अछि) आ जिलाक पुनर्गठनक परिणामस्वरूप भेल अछि।
ई ककरो लेल एकटा पैघ चुनौती होएत जे मैथिलीक एकटा भीमकाय कोश बनेबाक प्रयास करताह जेना गजेन्द्र ठाकुर कएने छथि। ई परिस्थिति आर ओझरा जाइत अछि कारण मैथिलीक शब्द चयन अंशतः वा अधिकांशतः एहि सांस्कृतिक क्षेत्रमे बाजल जाएवला १२ टा आन भाषासँ संभवतः प्रभावित होइत अछि। एतए एहि लगभग १२ टा दोसर भाषाक वर्णन सेहो वर्णन योग्य अछि। मैथिलीक आस-पड़ोसमे भोजपुरी आ मगही अछि आ हिन्दी एहि सभपर ऊपरसँ आच्छादित अछि जे एहि तीनू भाषा समूहक लोक द्वारा बाजल जाइत अछि। मुदा बिहार एकटा बहु-भाषी राज्य अछि आ नेपाली आ बांग्ला भाषी सेहो एतए प्रचुर मात्रामे देखल जा सकैत छथि। एकर अतिरिक्त किएक तँ मैथिली भाषी झारखण्ड क्षेत्रमे सेहो पर्याप्त मात्रामे छथि, ई बुझबाक थिक जे ओराँव, मुण्डारी, हो, बिरहोर, धांगर, संथाली आ संख्यामे कम ऑस्ट्रिक भाषा समूहक वक्ता सेहो हुनका संग निवास करैत छथि। ओना तँ मिथिला क्षेत्रक बहुत रास मुस्लिम अपन मातृभाषा मैथिली देखबैत छथि मुदा बहुत रास एहनो छथि जे अपनाकेँ उर्दूभाषी घोषित करैत छथि। एहि सभ भाषामे मात्र चारि टा केँ सांवैधानिक मान्यता भेटल अछि- हिन्दी, उर्दू, बांग्ला आ नेपाली (पछाति संथालीकेँ सेहो)। हमरा विचारेँ मैथिलीक वाक्य-रचनापर ऑस्ट्रिक भाषा समूह सहित विभिन्न कोणसँ प्रभाव पड़ल अछि। मुदा कोशीय स्तरपर योग आ अनुकूलन सीमित स्रोतसँ भेल अछि जेना उर्दू, हिन्दी, भोजपुरी आ मगहीसँ। कोश आत्मसात करैत अछि देशी शब्दावलीकेँ देशज शब्दावलीक संग। ई एहि कारणसँ कारण हमरा विचारेँ बेशीसँ बेशी २५-३०% वक्ता मैथिलीकेँ एकभाषीय रूपमे बजैत छथि। कारण शेष दोसर भाषामे सेहो नीक पइठ रखैत छथि। ओ मथिली भाषी जे बिहारक पश्चिमी सिमानपर रहैत छथि, भोजपुरी सेहो बजैत छथि आ पटना-राँची-गया-मुंगेर-क्षेत्रमे रहनिहार मगही जनैत छथि आ सेहो हिन्दीक अतिरिक्त। मुदा एकटा अत्यल्प प्रतिशत कहू जे ३-५ % सँ कम्मे, एहन मैथिल छथि जे अंग्रेजीमे सेहो प्रभावी रूपमे बाजि सकैत छथि। मुदा अंग्रेजीसँ मैथिलीमे शब्दक आगम ततबे वृहत अछि जेना ई कोनो दोसर नव भारतीय भाषा (न.भा.भा.) सभमे अछि।
बहुत गोटे ई शंका व्यक्त कऽ सकैत छथि जे कतेक गोटे एहन होएताह जिनका गजेन्द्र जी सनक प्रयाससँ लाभ भेटतन्हि ? ओना तँ मैथिली भाषीक संख्याक आधिकारिक आँकड़ा स्थिर नहि रहल अछि मुदा एहि तथ्यक विस्तारसँ वर्णन आवश्यक अछि। जनसंख्याक आँकड़ा वास्तविक नहि अछि जेना २००१ ई.क जनसंख्याक ई आँकड़ा: १,२१,७९,१२२. एकरापर अविश्वास पक्का अछि। जखन हम देखैत छी जे मैथिली भाषीक संख्याक संदर्भमे दस बरखक अंतरालमे लेल जनसँख्या आँकड़ामे बहुत बेशी परिवर्तन अछि। ई १८९१ सँ दस बरखक अंतरालमे जनसंख्याक आँकड़ामे बढ़ल आ घटल संख्याक तुलनासँ स्पष्ट अछि:
१९०१-११: +३.१२%
१९११-२१: -०.७७%
१९२१-३१: +७.६८%
१९३१-४१: +९.१३%
१९४१-५१: गणना नहि भेल
१९५१-६१: +२२.३५%
१९६१-७१: +२०.८९%
१९७१-८१: +२४.१९%
तार्किक रूपेँ वास्तवमे मैथिली वक्ताक संख्या स्थिर रूपेँ बढ़ल अछि। हमर अनुमानसँ किछु संकेत देल जा सकैत अछि जे अनिमानित ४ करोड़ धरि पहुँचैत अछि। १८९११ मे ग्रियर्सन (१९०८) अनुमान कएलन्हि जे मैथिली भाषीक संख्या ९२,८९,३७६ अछि। एकर विरुद्ध १९६१क जनसंख्या आँकड़ा एकरा ४९,८२,६१५ कऽ दैत अछि। निश्चयरूपेण १९६१ क जनसंख्या आँकड़ा वास्तविक नहि अछि। ओना ग्रियर्सनक (१९०९) जनसंख्या आकलन जे हुनकर १८९१ ई. मे कएल सर्वेक्षणपर आधारित अछि, सभक द्वारा सम्मति प्राप्त नहि अछि। वर्तमान शताब्दीक प्रारम्भमे मैथिली निम्न क्षेत्रमे बाजल जाइत छल:-
(i) सम्पूर्ण दरभंगा आ भागलपुर
(ii) मुजफ्फरपुरक ६/७ भाग
(iii) मुंगेरक १/२ भाग
(iv) पूर्णियाँक २/३ भाग
(v) संथाल परगनाक ४/५ भाग जे जनगणना आँकड़ामे वर्णित हिन्दी भाषी छथि।
१८१६ ई. मे उत्तर दिसुका भाषायी क्षेत्र नेपाल राजशाही द्वारा स्थायी रूपसँ नेपालमे सम्मिलित कए लेल गेल। ताहि द्वारे भाषा बजनिहारक संख्या पर पहुँचबाक लेल नेपालक जनसंख्याक १४% हिस्सा आर जोड़ए पड़त। पॉल ब्रास (१९७४:६४-६) गेटक गणना (जनसंख्या वर्ष १९०१ ई.) १८८५ ई.सँ उपलब्ध विभिन्न दस्तावेजक आधारपर करैत छथि आ १,६५,६५,४७७ संख्यापर पहुँचैत छथि। ई गणना ग्रियर्सनक आकलनकेँ आधार लए आ तकर बादक ८ दशकमे बिहारमे जनसंख्या वृद्धिकेँ आधार लए कएल गेल अछि। १९८१ क जनसंख्या आँकड़ाक आधारपर आ मिथिला क्षेत्रक बाहर पसरल मैथिलक संख्याकेँ जोड़ि कऽ आ १० जिलाक जनसंख्याकेँ (३१ जिलामेसँ) ध्यानमे राखि हम आ हमर सहयोगी १९८० क दशकक मध्यमे २,२९,७२,८०७ (सिंह, राजाराम आ बोस १९८५) क संख्यापर पहुँचलहुँ। ई संख्या हमर विचारमे जनसंख्याक दसवर्षीय वृद्धिकेँ ध्यानमे रखैत ४ करोड़ धरि पहुँचल अछि आ ताहि द्वारे बहुत रास लोक कोशक एहि भीमकाय प्रयाससँ लाभान्वित होएताह। ई सामान्यतः मानल जाइत अछि जे मैथिली मिथिला क्षेत्रक ब्राह्मण द्वारा बाजल जाइत अछि। ई एकटा पहिलुका कुप्रचार छल जे एकरा हिन्दीक बोलीक रूपमे सिद्ध कए चाहैत रहथि मुख्यतः हिन्दी भाषीक आधिकारिक संख्यामे वृद्धिक उद्देश्यसँ। मुदा उत्तरी बिहारक जाति संरचनाकेँ देखैत मैथिलीक जनसंख्या संबंधी आँकड़ा एकर सत्य कथा कहत। सापेक्षतया मैथिलीक बेस संख्या जे जनगणना रिपोर्टमे आएल, केँ एहि तथ्य मात्रसँ व्याख्यायित कएल जा सकैत अछि जे ओना तँ मैथिली भाषी जिलाक कतोक क्षेत्रमे ४६.८४% धरि मुस्लिम आ ३१.०६% धरि हिन्दू निवास करैत छथि, मैथिलीक लेल जे सहयोग आएल अछि से एहिमे सँ एकटा पैघ संख्या द्वारा मैथिलीकेँ अपन मातृभाषा घोषित कएने बिना संभव नहि छल।
मिथिलामे भाषा प्रयोगक एकटा सर्वेक्षण ई देखा सकैत अछि जे ओना तँ भाषाक औपचारिक क्षेत्र सभमे प्रयोग कम भेल अछि मुदा ई सेहो सत्य अछि जे एकर साहित्यिक उत्पादकता आ उपलब्धि आइ अखिल भारतीय स्तरपर बेशी नीक जकाँ सोझाँ आबि रहल अछि तुलनात्मक रूपेँ जतेक ई आइसँ २० बरख पूर्व अबैत छल। मधुबनी चित्रकला वा मिथिला कला आइ भरि भारतमे सुप्रसिद्ध भऽ गेल अछि आ विश्व-बजार धरि पहुँचि गेल अछि। मात्र तखने जखन मैथिली भाषी नव-पीढ़ी अपन सांस्कृतिक भाषायी बोधसँ हटबाक निर्णय करताह तखने एकरा कोनो खतरा सोझाँ अएतैक। हमरा विचारेँ सांवैधानिक अधिकार नहि भेटनाइ अप्रत्यक्ष रूपमे मैथिलीक लेल वरदान साबित भेल कारण ई साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधिकेँ बल देलक। ई पहिनहियेँ बहुत रास सांवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषा सभकेँ पाछाँ छोड़ि देलक, जेना मणीपुरी, कोंकणी, नेपाली आ सिन्धी सेहो। आ आब जखन की ई अष्टम सूचीमे अछि एकरा सभटा आधिकारिक आ आन तरहक संरक्षण भेटबाक चाही जकर ई अधिकारी अछि। एकरा एकर उपयोगकर्ताक सहयोग सेहो भेटबाक चाही जे आब आधुनिक अओजार सभक ताकिमे छथि जेना ऑनलाइन पत्रिका, ई-कोश, सुविधाजनक जंगम परिभाषा-कोश सभ आ स्वचालित प्रश्नोत्तर प्रणाली इत्यादि। ताहि स्तरपर ई मैथिली कोश जे अन्तर्जाल आ छपल दुनू संस्करणमे उपलब्ध होएत, से संग्रहकर्त्ता द्वारा एकटा महत्वपूर्ण योगदान होएत। मैथिली भाषी समुदाय आ आन भाषाक अनुवादक-विद्वान द्वारा गजेन्द्र ठाकुर आ प्रकाशक विशेष प्रशंसाक पात्र छथि। ई सत्य अछि जे मैथिली कोश-विज्ञान बहुत बादमे विकसित भेल, म.म. दीनबन्धु झाक प्रयासक बहुत बाद आ आब जा कए हमरा सभक सोझाँ महत्त्वपूर्ण कार्य सभ आएल अछि जेना पं गोविन्द झा द्वारा कल्याणी कोश वा जयकान्त मिश्रक वृहत् मैथिली शब्दकोश, मतिनाथ मिश्र ‘मतंग’ क मिथिला शब्द प्रकाश वा अलाइस डेविसक बेसिक कलोक्विअल मैथिली : अ मैथिली-नेपाली-अंग्रेजी वोकाबुलरी। संक्षिप्त मैथिली शब्दकोश आ द्विभाषी मैथिली शब्दकोश जे मैथिली अकादमी द्वारा संकल्पित अछि, अयनाइ एखन बाकी अछि। राष्ट्रीय अनुवाद मिशन द्वारा संकल्पित (देखू www.ntm.org.in) लांगमैन- सी.आइ.आइ.एल. बेसिक इंगलिश- इंगलिश- मैथिली जे कॉर्पोरापर आधारित अछिसेहो एकटा रुचिगर उत्पाद होएत। मुदा सभटा कहला आ केलाक बाद एहि कार्यक महत्त्व समय बितलाक संगे अनुभूत कएल जाएत।
२८.०२.२००९ प्रोफेसर उदय नारायण सिंह
मैसूर
निदेशक
केन्द्रीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.)
हम लिखैत छी कविता- उदय चन्द्र झा "विनोद"
हम लिखैत छी कविता
सूर्यकेँ अर्घ्य दैत छी
ककरो किछु फर्क भने नइँ पड़ौक
हमरा पड़ैत अछि
अहाँ पढ़ू वा नहि
हमरा लिखय पड़ैत अछि
हमरा लेल कविता लिखब
आइयो अछि आवश्यक
परमावश्यक अछि जीवाक लेल।
गजल- आशीष अनचिन्हार
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गजल
रचना कतेक टका लगतै सपना किनबाक लेल
जूटल घर सरदर अँगना किनबाक लेल
हम मुक्त छी राग-विराग प्रेम-घृणा सँ
रचना कतेक टका लगतै भावना किनबाक लेल
सत्त मानू हम काज करै छी लोकतंत्रक पद्धतिए
रचना कतेक टका लगतै पटना किनबाक लेल
पत्रकारिता गुलाम छैक टी.आर.पीक
रचना कतेक टका लगतै घटना किनबाक लेल
बाल कविता-३ माटिक बासन- जीवकान्त
लाल-लाल अछि
गोल-गोल अछि कटगर
माटिक छाँछी दही जमओलनि
उज्जर, कठगर, सोन्हगर
छथि कुम्हार ओ धन्य-धन्य
जे भारी चाक घुमाबथि
माटि-पानिसँ चाकक ऊपर
नाना रूप बनाबथि
आंगुर छुआ, इशारा देलनि
माटि धयल नव रूप
लाल सुराहीमे जल झाँपल
घरमे छोटकी कूप
माटिक मुरुत बनइ सल्हेसक
कहबइ गामक देब
बड़ पवित्र अछि
माटिक बासन
सुन्दर आर सुरेब
Tuesday, March 31, 2009
मैथिली मे चित्रकथा श्रृंखलाक शुरुआत
'मैथिल आ मिथिला' से जुडलाक बाद दशकक दबल कामना पूर हेबाक लेल हिलकोर लेबै लागल अछि. अहि क्रम मे 'नताशा' केर मूल मैथिलीक अलावे एकर हिंदी संस्करणक अनुवाद मे लागल छी. अहि कार्य मे अनुज मित्र कुमार सौरभक सहयोग उल्लेखनीय अछि.
अगला सप्ताह सं दर सप्ताह अहि श्रृंखलाक एक गोट चित्रकथा प्रस्तुत कयल जायत. अहि सन्दर्भ मे दू टा बिंदु स्पष्ट क' देब आवश्यक अछि-
१. श्रृंखलाक चित्रकथा मे किछु प्रचलित चुटक्काक अलावे किछु मौलिक कथ्यक उपयोग कयल गेल अछि.
२. अहि श्रृंखलाक अनेको चित्रकथा बालहंस, चकमक, बच्चों का देश, प्रभात खबर, अंग्रेजी पत्रिका TINKLE आ रविवारीय जनसत्ताक यात्रा क' चुकल अछि.
हमर प्रयास सकारथ होयत जं' किछुओ धीया-पुता अहि माध्यमे मातृभाषाक साहित्यिक पक्ष सं जुड़ता.
एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (चारिम कड़ी)

चतुर्थी आ दहनयी कs बाद सब गोटे चलि गेलाह। हिनको कॉलेज खुजल छलैन्ह, इहो( हमर घर वाला) मुजफ्फरपुर, अपन कॉलेज चलि गेलाह। आन के गेला पर ओतेक सुन नय लागल, मुदा जहिया इ गेलाह ओहि दिन बड़ सुन लागल। इ कियाक होइत छैक नहि जानि, विवाह होइते कs संग एतेक प्रगाढ़ सम्बन्ध कोना भs जायत छैक जे एक दोसरा सs अलग रहनाइ निक नय लागैत छैक। दादी हिनका सs करार करवा लेलथिन जे मधुश्रावणी में अवश्य अओताह। दादी कs तs हँ कहि देलैथ मुदा हमरा सs कहलैथ ओ नहि आबि सकताह। हमर मोन तs छोट भs गेल मुदा फेर सोचलौं हमर तs क्लास छूटिये रहल अछि हिनकर कियाक छूटैंह। हम कहलियैन्ह किछु नय, ओहि समय में हम हिनकर बात कs हँ वा नय में जवाब दैत रहियैन्ह। ओनाहुं हम कम बाजति रहि, आ हिनका सs तs निक जकां बाजय में हमरा एक साल लागि गेल।
गाम पर बाबा दादी के छोरिकs घर में, हमर माँ बाबुजी आ हम छहु भाय बहिन रहि। ओहि समय में असगरो जे सभ गाम पर रहैत छलाह वा छलिह, किनको इ नय बुझैन्ह जे असगर छथि । आ हमर घर में तs विवाह भेल छलs। रोज भोर साँझ गाम घरक लोकक अयनाइ गेनाइ लागल रहैत छलैक। एक तs अहुना जहिया जहिया हम सब गाम जाइ, लोक सबहक एनाइ गेनाइ लागल रहैत छलैक आ अहि बेर तs हमर विवाह भेल छलs। अहि बेर कनि बिशेष लोकक एनाइ गेनाइ रहैत छलs, आ हमर कनि विशेष मान दान सेहो होइत छलs। कहियो कतो सs खेनाइ आबय कतो सs खोइंछ भरय कs लेल कियो कहय लेल आबथि , सभ कियो एतबा अवश्य कहैथ, ठाकुरजी बड़ जल्दी चलि गेलैथ। दादी सभ कs कहथि फेर जल्दिये अओताह, पंचमी सs मधुश्रावणी धरि रहताह। हुनका सभ कs की बुझल जे ठाकुर जी नय आबि रहल छथि, हम सुनि कs चुप रहि, किनको किछु नय कहियैन्ह, माँ तक कs नय कहने रहि, मुदा जखन हिनकर एनाइ गेनाइ कs गप्प सुनि मोन उदास भs जाय।
हमर जहिया विवाह भेल हम ओहि समय फ्राक या स्कर्ट ब्लाउज पहिरति रहि। अचानक हमरा साड़ी पहिरय परि गेल। जहाँ कियो आबैथ, ख़ास कs मौगी महाल महक तs हमरा बजायल जाय। हमर बहिन सभ दौड़ कs हमरा लग अबैथ कहय कs लेल, ओकर बाद हम जल्दी सs ककरो सs साड़ी ठीक करवाबी आ तखैन्ह हम हुनका सभ लग जाइ। दियादि महक काकी पीसी सभ गोटे में सs बराबरि कियो नय कियो रहैत छलिह, ओ सभ ठीक कs देथि, तइयो कैक बेर हमर पैर साड़ी में फँसल होयत आ हम खसल होयब । जे कियो आबथि एतवा अवश्य कहथि, " देखिये कुसुम केहेन लागति छथि"। आ देखलाक बाद कहथि "बड़ सीरी चढ़ल छैक"। कतेक निश्छल भावना आ कतेक अपनापन रहैत छलैक हुनका लोकनि में।
हमर दु तीन टा पीसी सेहो ओहि समय में ओतहि रहति छलिह, जिनकर सबहक विवाह ओहि बरख भेल छलैन्ह आ ओ सभ हमर संग तुरिया छलिह। भरि दुपहरिया घर भरल रहैत छलs हुनका सभ संग ओहिना समय बीति गेल आ पंचमी आबि गेल। पंचमी सs एक दिन पहिने भोरे भोर हमर सासुर सs भार आयल, ओहि में सब किछु बिधक ओरिओन सs आयल छलs। भरि गामक लोक के दादी हकार दियवा देलथिन, सभ भार देखैक लेल आबथि आ जे देखथि से कहथि, एतेक निक भार किनको ओतहि सs नय आयल छलैक, गाम पर सभ गोटे भार देखि कs बड़ प्रशंसा करथि, हमरा इ सुनि बड़ निक लागय। जिनका हम कहियो देखने सुनने नय हुनकर प्रशंसा सुनि हम खुश होइ। हमर दादी सेहो खुशी सs सबके कहथि अरे महादेव झा ओतय सs भार आयल अछि। हमरा ओहि समय में किछु नय बुझाय, हम सोचि हमर ससुरक नाम तs हीरानंद ठाकुर छैन्ह, दादी बेर बेर कियाक कहैत छथि महादेव झा ओतय सs आयल अछि। हम पुछs चाहि किनको सs मुदा एम्हर ओम्हर में बिसरी जाइ।
कॉलेज सs हमरा इ प्रतिदिन एकटा चिट्ठी लिखैथ, ओहि में सब दिन जवाब देवाक लेल लिखैत छलैथ, मुदा हमारा जवाब देबय में लाज होयत छल।एक दिन हमर भाय आ बाबुजी कोनो काज सs मुजफ्फरपुर जायत छलाह। ओहि दिन हम पहिल चिट्ठी लिखि कs भाय के देलियैन्ह जे हुनका दs देबाक लेल।
पंचमी सs एक दिन पहिनहि भोर में भार आयल छलs, साँझ में बाबुजी सब के सेहो अयबाक छलैन्ह। हमरा अपन संगी आ पीसी सब संगे फूल लोढ़य लेल जयबाक छलs। दादी सब ट्रेन सs हिनकर बाट ताकथि अंत में हमर बहिन सब सs कहि पुछौल्थिन, हम बहिन सब कs कहि देलियैन्ह हमरा किछु नय लिखने छथि। दादी तकर बाद सs निश्चिंत भs गेलिह आ तखनि सs कहथि जे तोहर बाबुजी सब संग अवश्य अओताह।
साँझ में सब घान्जि बांधि कs हमरा ओतहि आयल देखलियय सबहक हाथ में फूल डालि आ पथिया छलैक कियो कियो अपन खबासिनी कs सेहो संग में लs लेने छलथि किछु कुमारि सब सेहो संग में छलथि । हमरो संग हमर एकटा पितिऔत बहिन छलीह, ओ हमर फूल डालि आ पथिया लs लेलथि।हमसब पूरा टोलक सब गोटे गीत गाबति हँसी मजाक करैत अपन अपन फूल डालि पथिया लेने पहिने गाछी दिस गेलौन्ह। दादी हमरा हिदायति देने रहथि, जे बाँस वा अन्य पैघ गाछक पात कियो तोरय, जाहि जूही कs पात आ फूल सभ हम अपने तोड़ी। हमरा बड़ पोल्हा कs कहलथि "हे मधुश्रावणी लोक के एकय बेर होयत छैक जहिना कहैत छी कयने जाउ"। हमहु निक बच्चा जकां मुरी हिला कs हँ कहि देलियनि।
हम सब, सब सs पहिने बंसबट्टी दिस बिदा भेलौंह। बाँसक पात तोरलाक बाद हम सब जाहि जूही आ अन्य अन्य पात आ फुलक खोजि में सबहक बाड़ी बाड़ी जाइ आ सभ तरि सs फूल सभ बटोरति जाइ। हमरा तs बुझलो नय छलs जे कोन - कोन फूल आ कोन-कोन पात चाहि। जेना जेना सभ कियो तोरथि हमहु तोरति जाइ। दादी कs हिदायति हमरा मोन छलs। हम पथिया टा नहि उठा पाबति रहि सेहो हमर पितिऔत बहिन, देयादि महक छलिह से उठा दैथ। जखैन्ह हमरा सभ गोटे कहलथि जे आब भs गेल, हमहु हुनका सभ संगे आपस हेबाक लेल चलि देलियैन्ह। हमरा देखि कs ततेक आश्चर्य भेल, हमसभ एक एक पथिया भरि कs पात जाही जूही लs लेने रहि।
आब ओ हमरा बसक नहि छलैक जे ओ हम उठा कs एको डेग आगू बढितौंह। हमर पितिऔत बहिन ओकरा अपन माथ पर लs कs चललिह। रास्ता भरि हँसी मजाक होइत छलैक, ओही में सs बेसि मजाक हम नहि बुझति रहि। बिच बिच में बटगभनी सेहो होयत छलैक। इहो गप्प होयत छलैक जे किनकर सभहक वर आयल छथि आ किनकर सभहक बाद में अर्थात मधुश्रावणी सs पहिने अओताह। हमारो सs सब पुछथि, हम किछु नय बाजि हमरा लाज होइत छलs। नहि बजला पर सभ हमर आर मजाक उराबथि, हम अहिना दुखी छलौंह ताहि पर इ सभ मजाक करथि। कखनो मोन होयत छल बेकारे सभ संग अयलौन्ह। हमरा होयत छलs हम कहुना घर पहुँची, हम मजाक सs तंग आबि कs अपन बहिन सs जे पथिया लेने रहथि, कहलियैन्ह अपना सब आगु चलु। हम सभ आगु जल्दी जल्दी बढि रहल छलियैक मुदा कथि लेल हमरा कियो जल्दी जाय देत पकरि कs बिच में हमरा सभ गोटे कs लेलथि।
ओहिना करैत हम सब मुखिया बाबा कs घर लग पँहुची गेलौंह। हमर घर ओकर बाद छलैक हम हाथ में फुलक डालि लेने सभ संग बिच में चलति रहि। घर लग पहुँच सभ गोटे जोर जोर सs हंसैथ हमरा इ कहि आगु कs देलथि जे आब हमर दादी देख लितथि तs हुनका सभ कs डाँटि परतैंह। हम आगु आबि जहिना बरामदा दिस बढलौंह देखैत छी कुर्सी पर बाबा आर बाबुजी कs संग इ बैसल छथि आ तिनु गोटे चाय पीबि रहल छथि। हम लाज सs जल्दी-जल्दी आँगन दिस भागि गेलौंह।
आँगन पहुँचि देखैत छि दादी आ माँ व्यस्त छथि। एक तs पाबनि कs ओरियोनि होयत छलैक, दोसर जमाय विवाहक बाद पहिल बेर आयल छलैथ, तेसर समधियोनि सs पाहुन भार लs कs से आयल छलखिन्ह। हमरा देखितहि दादी कहय छथि "यै अहाँ बिना माथ झपने अहिना बाबा आ बाबुजी कs सोंझा सs आबि गेलौंह"। हम किछु नय बजलियैन्ह, हम आ हमर बहिन चुप चाप कोहबर घर जाय कs फुल डालि आ पथिया राखि देलियैक। ओहि समय में हमरा माथ झांपय में बड़ लाज होयत छलs। हम बाहरि आबि कs माँ सs पुछलियैक," बाबुजी मुजफ्फरपुर सs कखैन्ह एलैथ" जकर जवाब दादी सs भेटल, "अहांक बाबुजी कॉलेज सs ठाकुर जी कs पकरि कs लs अनलैथ "।
साँझ में किछु किछु बिधक ओरिओन आ गीत भेलैक आ दादी कहलथि सब गोटे जल्दी सुतय जो भोरे उठय परत। राति में सुतय काल पता नय हमरा कोना मोन छलs, हम हिनका सs पुछलियैन्ह "भार कतय सs आयल छैक "? हिनका किछु बुझय में नय अयलैन्ह, हमरा कहलाह "मतलब... कोन भार"? फेर मुस्कुरैत हमरा कहलाह "अहाँ के हमारा देखि कs खुशी नय भेल जे अहाँ हमारा सs भारक विषय में पुछैत छी "। हम मुरी हिला कs हाँ कहि देलियैन्ह मुदा फेर धीरे सs कहलियैन्ह " दादी सब सs कहति छथि महादेव झा ओतय सs भार आयल छैक। इ सुनतहि जोर सs ठट्ठा कs हँसैथ हमरा कहलाह "ओ.., अच्छा..., ओ महादेव झा, ओ हमर सबहक पाँज़ि अछि ताहि लेल बाजति होयतिह"। तकर बाद हमरा पाँज़ि कs विषय में सेहो बता देलैथ। हमरा अपना पर हँसी लागल कहु तs भोर सs हम इ सोचि कs परेशान छलौंह जे महादेव झा के छथि।
क्रमशः ..............
Sunday, March 29, 2009
Saturday, March 28, 2009
समीक्षा श्रृंखला---२। रुपकांत ठाकुर पर आशीष अनचिन्हार।
शीर्षक पढैते देरी पाठक लोकनि एकर रचियता के निराशावादी घोषित कए देताह आ फतवा देताह जे समाज के एहन -एहन वकतव्य सँ दूर रहबाक चाही।मुदा हमरा बुझने पाठक लोकनि अगुता गेल छथि,आ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि। मुदा इहो एकटा सुपरिचित तथ्य थिक जे लोक के जतेक उपदेश दिऔक ओ ओतबे तागति सँ ओकर उन्टा काज करत।मुदा तैओ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि आ ता धरि नहि अगुताथि जा धरि शीर्षक पूर्ण वाक्य नहि भए जाए।आब अहाँ सभ टाँग अड़ाएब जे शीर्षक त अपना आप मे पूर्ण छैहे तखन अहाँ एकरा अपूर्ण कोना कहैत छिऐक ? मुदा नहि, कोनो वस्तु बाहर सँ पूर्ण होइतो भीतर सँ अपूर्ण होइत छैक। इहए गप्प एहि शीर्षकक संग छैक। अच्छा आब हम अपन विद्वताक दाबी छोड़ी आ आ अहाँ सभ के पूर्ण वाक्य के दर्शन कराबी - "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि, सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"।
मैथिली साहित्य मे बहुत रास बिडंबना छैक, प्रवंचना छैक, वंदना छैक अर्थात सभ किछु छैक मुदा तीन गोट वस्तु के छोड़ि--
१) मैथिली मे व्यंग प्रचुर मात्रा (गुण एवं परिमाण) मे नहि लिखाइत अछि,
२) जँ झोंक- झाँक मे लिखाइतो छैक त स्तरीय आलोचना नहि होइत छैक ,
३) आ जँ भगवान भरोसे स्तरीय आलोचना अबितो छैक त हरिमोहन झा के शिखर मानि सभ के भुट्टा बना देल जाइत छैक ।
एहि तीन टा के छोड़ि एकटा आर महान बिडंबना छैक जे आलोचक आलोचना करताह फल्लाँ बाबूक अथवा हुनक कृति के मुदा समुच्चा मैथिली अलोचना मे हरिमोहन बाबू तेना ने घोसिआएल रहता जे पाठक एहन आलोचना के हरिमोहने बाबूक आलोचना बूझैत छथि।
आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "ली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि--1) मोमक नाक (कथा संग्रह)
2) धूकल केरा (कथा संग्रह)
3) लगाम (नाटक)
4) वचन वैष्णव (नाटक)
5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक।
आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । इ शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मतलब जे लेखक भविष्यक संकेत कए गेल छथि।
आब किछु गप्प करी मैथली व्यंग मे राजनीतिक व्यंग पर। कोन चिड़ियाक नाम छैक राजनीतिक व्यंगइ हमरा जनैत मैथिली व्यंगकार नहि जनैत छथि। ओना व्यंग केकरा कहल जाइत छैक सेहो बूझब कठिन। हमरा जनैत मैथिली मे 93% व्यंग लिखल जाइत छैक मुदा 93% आलोचक ओकरा हास्य मानि आलोचना करैत छथि। सभ व्यंगकार ओहीक मारल छथि, चाहे शिखर-पुरुष हरिमोहन बाबू होथि वा रुपकांत ठाकुर। सुच्चा व्यंग लिखला पछातिओ हरिमोहन बाबू कहेलाह हास्य-व्यंग सम्राट। अर्थात हास्यकार पहिने आ व्यंगकार बाद मे। बाद बाँकी 7% हास्य लिखाइत अछि जकर प्रतिनिधि छथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" ।
हँ त फेर आबी हम राजनीतिक व्यंग पर। हमरा जनैत जाहि व्यंग मे अपन समकालीन अथवा पूर्वकालिक राजनीति, शासन-व्यवस्था, ओकर संचालक आदि पर निशाना साधल गेल हो ओकरा राजनीतिक व्यंग कहाल जाइए। ओना इ अकादमिक परिभाषा नहि अछि।
त फेर हम अहाँ सभ के रुपकांत ठाकुर लग लए चली, आ हुनक एक गोट पोथीक परिचय करा हुनक राजनीतिक चेतना के देखाबी। जाहि पोथी सँ हम अहाँ के परिचय कराएब ओकर नाम छैक "मोमक नाक"। एहि व्यंग-संग्रह मे नौ गोट कथा थिक। परिचय शुरु करेबा सँ पहिनहि कहि दी जे इ कोनो जरुरी नहि छैक जे हम अहाँ के नओ कथा कहब आ ने जरूरी छैक जे संग्रहक पहिल कथा सँ हम शुरू करी। इ निर्णय हमर व्यत्तिगत अछि आ अहाँ एहि सँ सहमत भइओ सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। हँ त हम शुरू करी संग्रहक अंतिम कथा "मर्द माने की" सँ। जेना की शीर्षके सँ बुझाइत छैक लेखक अवस्स एहि मे मर्दक परिभाषा देने हेथिन्ह। से सत्ते, लेखक जखन शुरुए मे कहैत छथिन्ह जे " लोटा ल' क' घरवालीक लहटगर देह पर गदागद ढोल बजौनिहार एहन सुपुरुष कत' भेटत?"। त सभ अर्थ स्पष्ट भए जाइत छैक। मुदा लेखक एतबे सँ संतुष्ट नहि भए आगू कहैत छथि " मर्द माने कमौआ, आ कमौआ माने वियाहल,आ वियाहल माने बुड़िबक आ बुड़िबक माने बड़द"। सुच्चा मैथिल अभिव्यत्ति। एखनो अर्थात 2009 धरि मैथिल समाजक इ धारणा छैक जे कमौए मर्द होइत अछि, आ जहाँ कहीं कोनो मर्द देखाइ पड़ल लोक ओकर विआह करबाइए कए छोरैए। आ जहाँ धरि गप्प रहल बियाहल माने बुड़िबक से त हम नहि कहब मुदा बुड़िबक माने बड़द अवश्य होइत छैक। खाली खटनाइ सँ मतलब। अधिकारक प्रति निरपेक्ष। आब हम एहि सँ बेसी नहि कहब एहि कथाक प्रसंग। बस एतबे सँ लेखकक चेतनाक अनुमान कए लिअ।
"ठोकल ठक्क" मे लेखक ओहन भातिज आ जमाएक दर्शन कराबैत छथि जनिकर काजे छन्हि कमीशन खाएब आ एहि लेल ओ अपन पित्ती एवं ससुरो के नहि छोड़ैत छथिन्ह। आ जँ एही कथाक माध्यमे अहाँ तात्कालीन रजनीतिक देखए चाहब त रुपकांत एना देखेताह-"सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"। अर्थात बेशर्म, निर्लज्ज, हेहर,थेथर सरकार।
भारतक समकालीन विकास जँ अहाँ देखबाक इच्छा होइत हो त रुपकांत ओहो देखेताह। कनेक पढ़ू "जय गंगा जी" जतए रेलगाड़ी के बढैत देखि लेखक टिप्पणी करैत छथि-"कांग्रेसी नेता जकाँ लोक के अपन पेट मे राखि क' ओकर सुख-दुख अथवा उन्नति-अवनति के बिसरि गाड़ी मात्र आगू बढब जनैत छल। अपना बले नहि कोइला आ पानिक बलें। परन्तु पवदान पर चढ़ल यात्री कतऽ छलाह?" ई सवाल जतेक भयावह लेखकक समय मे छल ततबे भयावह एखनो अछि। लेखक सरकारक डपोरशंखी योजनाक लतखुर्दन एही कथा मे करैत छथि-" कोन टीसन केखन बितलैक से मोन राखब पंचवर्षीय योजना सभ मे उन्नतिक कागजी आकड़ा मोन राखब थिक"।
बेसी प्रशंसात्मक उद्धरण देब हमरा अभीष्ट नहि मुदा तैओ एकटा उद्धरण देबा सँ हम अपना के रोकि नहि पाबि रहल छी। एही संग्रहक दोसर कथा थिक "फूजल ऊक"।बेसी अपन वक्तव्य नहि कहि उद्धरण सुनाबी-"मात्र सुधारवादी दृष्टि रखला मात्र सँ सुधार कथमपि नहि भए सकैछ"। जँ लेखकक भावना के बचबैत हम लिखी जे "प्रगतिशील विचार लिखला मात्र सँ प्रगतिशीलता कथमपि नहि आबि सकैछ" त इ स्पष्ट भए जाएत जे रुपकांत कतए व्यंग कए रहल छथिन्ह आ केकरा पर कए रहल छथिन्ह।
ठाकुर जी एकपक्षीय व्यंगकार नहि छथि। ओ दूनू पक्ष के हूट सँ मानसिक आ बूट सँ शारिरिक प्रताड़ाना दैत छथिन्ह। तकर प्रमाण ओ एहि संग्रहक पहिल कथा जे पोथीक नामो छैक अर्थात " मोमक नाक" मे देखेलैन्ह अछि। हुनकहिं शब्द मे " आजुक युग मे भला आदमीक परिभाषा उनटि गेल छैक। जनता जनता अछि जे से सभ मोमक नाक जकाँ लुजबुज। जखन जाहि दिस नफगर रहै छैक तिम्हरे लोक घूमि जाइछ" स्वतंत्रे भारत नहि हमरा विचारे जम्बूदीपक जनता सँ लए कए एखुनका भारतीय जनताक चारित्रिक विशेषता ई उद्धरण देखबैत अछि। आ एतेक देखेलाक पछातिओ आलोचक रुपकांतक नाम बिसरि गेल छथि।
भने आलोचक नाम बिसरि गेलखिन्ह मुदा पाठकक मोन मे एखनो धरि रुपकांत ठाकुरक रचना खचित छैन्ह। हमरा जनैत कोनो लेखकक प्रथम आ अंतिम सफलता इएह छैक। आ रुपकांत इ सफलता अपन रचनाक माध्यमें प्राप्त केलन्हि ताहि मे संदेह नहि।
विदेह ई पत्रिकामे http://www.videha.co.in/ पर पूर्वप्रकाशित।
सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा : मैथिली अनुवाद रमानन्द झा 'रमण' : भाषा सम्पादन गोविन्द झा
UNIVERSAL DECLARATION OF HUMAN RIGHTS
MAITHILI TRANSLATION
(राष्ट्रसंघक साधारण सभा 10 दिसम्बर, 1948 के ँ एक सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा स्वीकृत आ‘
उद्घोषित कएलक जकर पूर्णपाठ आगाँ देल गेल अछि। एहि ऐतिहासिक घोषणाक उपरान्त साधारण
सभा समस्त सदस्य देशसँ अनुरोध कएलक जे ओ एहि घोषणाक प्रचार करए तथा मुख्यतः, अपन देश
आ‘ प्रदेशक राजनैतिक स्थितिक अनुरूप बिनु भेदभावक, स्कूल आ‘ अन्य शिक्षण संस्था सभमे एकर
प्रदर्शन, पठन-पाठन आ‘ अनुबोधनक व्यवस्था करए।)
एहि घोषणाक आधिकारिक पाठ राष्ट्रसंघक पाँच भाषामे उपलब्ध अछि-अंग्रेजी, चीनी, फ्रांसीसी, रूसी आ,
स्पेनिश। एहिठाम एहि घोषणाक मैथिली रूपान्तरण प्रस्तुत अछि।)
उद्देश्यिका
जे ँ कि मानव परिवारक सकल सदस्यक जन्मजात गरिमा आओर समान एवं अविच्छेद्य अधिकारके ँ
स्वीकृति देब स्वतन्त्रता, न्याय आ‘ विश्वशान्तिक मूलाधार थिक,
जे ँ कि मानवाधिकारक अवहेलना आ‘ अवमाननाक परिणाम होइछ एहन नृशंस आचरण जाहिसँ मानवक
अन्तःकरण मर्माहत होइत अछि आओर अवरुद्ध होइत अछि एक एहन विश्वक अवतरण जाहिमे
अभिव्यक्ति आ‘ विश्वासक स्वतन्त्रता तथा भय आ‘ अकिंचनतासँ मुक्ति जनसामान्यक सर्वोच्च आकंाक्षा
घोषित हो;
जे ँ कि विधिसम्मत शासन द्वारा मानवाधिकारक रक्षा एहि हेतु परमावश्यक अछि जे केओ व्यक्ति
अत्याचार आ‘ दमनसँ बँचबाक कोनो आन उपाय नहि पाबि, शासनक विरुद्ध बागी नहि भए जाए;
जे ँ कि राष्ट्रसभक बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बढ़ाएब परमावश्यक अछि;
जे ँ कि राष्ट्रसंघक लोक अपन चार्टर मध्य मौलिक मानवाधिकारमे, मानवक गरिमा आ‘ मूल्यमे तथा स्त्री
आ‘ पुरुषक बीच समान अधिकारमे अपन निष्ठा पुनः परिपुष्ट कएलक अछि आओर व्यापक स्वतन्त्रताक
संग सामाजिक प्रगति आ‘ जीवन स्तरक समुन्नयन हेतु कृत संकल्पित अछि;
जे ँ कि सदस्य राष्ट्रसभ राष्ट्रसंघक सहयोगसँ मानवाधिकार आ‘ मौलिक स्वतन्त्रताक सार्वभौम आदर
तथा अनुपालन करबाक हेतु प्रतिबद्ध अछि;
जे ँ कि एहि प्रतिबद्धताक पूर्ति हेतु उक्त अधिकार आ स्वतन्त्रताक सामान्य बोध परम महत्त्वपूर्ण अछि,
ते ँ आब,
साधारण सभा
निम्नलिखित सार्वभौम मानवाधिकार घोषणाके ँ सभ जनता आ‘ सभ राष्ट्रक हेतु उपलब्धिक सामान्य
मानदण्डक रूपमे, एहि उद्देश्यसँ उद्घोषित करैत अछि जे प्रत्येक व्यक्ति आ‘ प्रत्येक सामाजिक एकक
एहि घोषणाके ँ निरन्तर ध्यानमे रखैत शिक्षा आ‘ उपदेश द्वारा एहि अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक प्रति
सम्मान भावना जगाबए तथा उत्तरोत्तर एहन उपाय-राष्ट्रीय आ अन्तरराष्ट्रीय-करए जाहिसँ सदस्य
राष्ट्रसभक लोक बीच तथा अपन अधीनस्थ अधिक्षेत्रहुक लोक बीच एहि अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताके ँ
सार्वभौम आ‘ प्रभावकारी स्वीकृति प्राप्त भए सकैक। ष्
अनुच्छेद 1
सभ मानव जन्मतः स्वतन्त्र अछि तथा गरिमा आ‘ अधिकारमे समान अछि। सभके ँ अपन-अपन बुद्धि आ‘
विवेक छैक आओर सभके ँ एक दोसराक प्रति सौहार्दपूर्ण व्यवहार करबाक चाही।
अनुच्छेद 2
प्रत्येक व्यक्ति एहि घोषणामे निहित सभ अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक हकदार थिक आओर एहिमे नस्ल,
लिंग, भाषा, धर्म, राजनैतिक वा अन्य मत, राष्ट्रीय वा सामाजिक उद्भव, सम्पत्ति, जन्म अथवा अन्य
स्थितिक आधार पर कोनहु प्रकारक भेदभाव नहि कएल जाएत। आओर ओ व्यक्ति जाहि देशक थिक
तकर राजनैतिक अधिकारितामूलक वा अन्तरराष्ट्रीय आस्थितिक आधार पर कोनो भेदभाव नहि कएल
जाएत-भनहि ओ देश स्वाधीन हो, ट्रस्ट हो, परशासित हो वा सम्प्रभुताक कोनो अन्य परिसीमाक अधीन
हो।
अनुच्छेद 3
सभके ँ जीवन-धारण, स्वातन्त्र्य आ‘ व्यक्तिगत ़सुरक्षाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 4
केओ व्यक्ति दासता वा बेगारीमे नहि रहत आओर सभ प्रकारक दासप्रथा आ‘ दासक खरीद-बिकरी
वर्जित होएत।
अनुच्छेद 5
ककरहु क्रूर, अमानुषिक वा अपमानजनक दण्ड नहि देल जाएत आ‘ ककरोसँ एहन व्यवहार नहि कएल
जाएत।
अनुच्छेद 6
प्रत्येक व्यक्तिके ँ सभठाम कानूनक समक्ष एक मानव रूपमे अपन मान्यताक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 7
सभ केओ कानूनक समक्ष समान अछि आ‘ बिना कोनो भेदभावक कानूनक संरक्षणक हकदार अछि।
अनुच्छेद 8
सभके ँ एहन कार्यक विरुद्ध जे संविधान वा विधि द्वारा प्रदत्त ओकर मौलिक अधिकारक हनन करैत हो
सक्षम राष्ट्रीय न्यायालयसँ उचित उपचार (न्याय) पएबाक हक छैक।
अनुच्छेद 9
केओ स्वेच्छासँ ककरो गिरफ्तार, नजरबन्द वा देश निर्वासित नहि करत ।
अनुच्छेद 10
सभ व्यक्तिके ँ अपन अधिकार आ‘ दायित्वक अवधारणार्थ तथा अपना पर लगाओल गेल कोनो
आपराधिक आरोपक अवधारणार्थ कोनो स्वतन्त्र आ‘ निष्पक्ष न्यायालय द्वारा पूर्ण समानताक संग उचित
आ‘ सार्वजनिक विचारणक हक छैक।
अनुच्छेद 11
1. दण्डनीय अपराधक आरोपी प्रत्येक व्यक्ति ताधरि निर्दोष मानल जएबाक हकदार अछि जाधरि
कोनो सार्वजनिक विचारणमे, जाहिमे ओकरा अपन समुचित सफाइ देबाक सभ गारंटी प्राप्त
होइक, विधिवत् दोषी सिद्ध नहि कए देल जाए।
2. जँ केओ व्यक्ति एहन कोनो दण्डनीय कार्य वा लोप करए जे घटनाक कालमे प्रचलित कोनो
राष्ट्रीय वा अन्तरराष्ट्रीय कानूनक दृष्टिमे दण्डनीय अपराध नहि थिक तँ ओ व्यक्ति एहि हेतु
दण्डनीय अपराधक दोषी नहि मानल जाएत।
अनुच्छेद 12
केओ व्यक्ति कोनो आन व्यक्तिक एकान्तता, परिवार, निवास वा संलाप (पत्राचारादि) मे स्वेच्छया हस्तक्षेप
नहि करत आ‘ ने ओकर प्रतिष्ठा आ‘ ख्याति पर प्रहार करत। प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन हस्तक्षेप वा
प्रहारसँ कानूनी रक्षा पएबाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 13
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन राष्ट्रक सीमाक भीतर भ्रमण आ‘ निवास करबाक स्वतन्त्रता छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन देश वा आनो कोनो देश त्यागबाक आ‘ अपना देश घूरि अएबाक
अधिकार छैक।
अनुच्छेद 14
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ उत्पीड़नसँ बँचवाक हेतु दोसर देशमे शरण मङबाक अधिकार छैक।
2. एहि अधिकारक उपयोग ओहि स्थितिमे नहि कएल जाए सकत जखन ओ उत्पीड़न वस्तुतः
अराजनैतिक अपराधक कारणे ँ भेल हो अथवा राष्ट्रसंधक उद्देश्य आ‘ सिद्धान्तक विरुद्ध कोनो
काज करबाक कारणे ँ े।
अनुच्छेद 15
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ राष्ट्रीयताक अधिकार छैक।
2. कोनो व्यक्तिके ँ राष्ट्रीयताक अधिकारसँ अथवा राष्ट्रीयता -परिवर्तनक अधिकारसँ अकारण
वंचित नहि कएल जा सकत।
अनुच्छेद 16
1. सभ वयस्क स्त्री आ‘ पुरुषके ँ नस्ल, राष्ट्रीयता वा सम्प्रदायमूलक केानो प्रतिबन्धक बिना, विवाह
करबाक आ‘‘ परिवार बनएबाक अधिकार छैक। स्त्री आ पुरुष दूनूके ँ विवाह, दाम्पत्य-जीवन
तथा विवाह-विच्छेदक समान अधिकार छैक।
2. विवाह, तखनहि होएत जखन इच्छुक पति आ‘पत्नीक स्वच्छन्न आ पूर्ण‘ सहमति हो।
3. परिवार समाजक एक सहज आ‘ मौलिक एकक थिक आओर एकरा समाजक आ‘ राज्यक
संरक्षण पएबाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 17
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ एकसरे आ‘ दोसराक संग मिलि सम्पत्ति रखबाक अधिकार छैक।
2. केओ स्वेच्छया ककरहु सम्पत्तिसँ वंचित नहि करत।
अनुच्छेद 18
प्रत्येक व्यक्तिके ँ विचार, विवेक आ धर्म रखबाक अधिकार छैक। एहि अधिकारमे समाविष्ट अछि धर्म आ
विश्वासक परिर्वतनक स्वतन्त्रता, एकसर वा दोसराक संग मिलि प्रकटतः वा एकान्तमे शिक्षण, अभ्यास,
प्रार्थना आ अनुष्ठानक स्वतन्त्रता।
अनुच्छेद 19
प्रत्येक व्यक्तिके ँ अभिमत एवं अभिव्यक्तिक स्वतन्त्रताक अधिकार छैक, जाहिमे समाविष्ट अछि बिना
हस्तक्षेपक अभिमत धारण करब, जाहि कोनहु क्षेत्रसँ कोनहु माध्यमे ँ सूचना आ‘ विचारक याचना, आदान
प्रदान करब।
अनुच्छेद 20
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँशान्तिपूर्ण सम्मिलन आ संगठनक स्वतन्त्रताक अधिकार छैक।
2. कोनहु व्यक्तिके ँ संगठन विशेषसँ सम्बद्ध होएबाक लेल विवश नहि कएल जाए सकैछ।
अनुच्छेद 21
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन देशक शासनमे प्रत्यक्षतः भाग लेबाक अथवा स्वतन्त्र रूपे ँ निर्वाचित
अपन प्रतिनिधि द्वारा भाग लेबाक अधिकार छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपना देशक लोक-सेवामे समान अवसर पएबाक अधिकार छैक।
3. जनताक इच्छा शासकीय प्राधिकारक आधार होएत। ई इच्छा आवधिक आ‘ निर्बाध निर्वाचनमे
व्यक्त कएल जाएत आओर ई निर्वाचन सार्वभौम एवं समान मताधिकार द्वारा गुप्त मतदानसँ
होएत अथवा समतुल्य मुक्त मतदान प्रक्रियासँ।
अनुच्छेद 22
प्रत्येक व्यक्तिके ँ समाजक एक सदस्यक रूपमे सामाजिक सुरक्षाक अधिकार छैक आओर प्रत्येक
व्यक्तिके ँ अपन गरिमा आ‘ व्यक्तित्वक निर्बाध विकासक हेतु अनिवार्य आर्थिक, सामाजिक आ‘
सांस्कृतिक अधिकार-राष्ट्रीय प्रयास आओर अन्तरराष्ट्रीय सहयोगसँ तथा प्रत्येक राज्यक संघठन आ‘
संसाधनक अनुरूप-प्राप्त करबाक हक छैक।
अनुच्छेद 23
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ काज करबाक, निर्बाध इच्छाक अनुरूप नियोजन चुनबाक, कार्यक उचित आ‘
अनुकूल स्थिति प्राप्त करबाक आ‘ बेकारीसँ बँचबाक अधिकार छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ समान काजक लेल बिना भेदभावक समान पारिश्रमिक पएबाक अधिकार छैक।
3. काजमे लगाओल गेल प्रत्येक व्यक्तिके ँ उचित आ‘ अनुरूप पारिश्रमिक ततबा पएबाक अधिकार
छैक जतबासँ ओ अपन आ‘ अपन परिवारक मानवोचित भरण-पोषण कए सकए आओर प्रयोजन
पड़ला पर तकर अनुपूरण अन्य प्रकारक सामाजिक संरक्षणसँ भए सकैक।
4. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन हितक रक्षाक हेतु मजदूरसंघ बनएबाक आ‘ ओहिमे भाग लेबाक अधिकार
छैक।
अनुच्छेद 24
प्रत्येक व्यक्तिके ँ विश्राम आ‘ अवकाशक अधिकार छैक जकर अन्तर्गत अछि कार्य-कालक उचित सीमा
आ समय-समय पर वेतन सहित छुट्टी।
अनुच्छेद 25
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन जीवन-स्तर प्राप्त करबाक अधिकार छैक जे ओकर अपन आ‘ अपना
परिवारक स्वास्थ्य एवं कल्याण हेतु पर्याप्त हो। एहिमे समाविष्ट अछि भोजन, वस्त्र, आवास आ
चिकित्सा तथा आवश्यक सामाजिक सेवाक अधिकार आओर जँ अपरिहार्य कारणवश बेकारी,
बीमारी, अपंगता, वैधव्य, वृद्धावस्था अथवा अन्य प्रकारक दुरस्था उपस्थित हो तँ, ओहिसँ सुरक्षाक
अधिकार ।
2. परसौती आ‘ चिल्हकाके ँ विशेष परिचर्या आ सहायताक अधिकार छैक। प्रत्येक बच्चाके ँ, चाहे
ओ विवाहावधिमे जनमल हो वा ताहिसँ बाहर, समान सामाजिक संरक्षणक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 26
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ शिक्षा प्राप्तिक अधिकार छैक। शिक्षा कमसँ कम आरम्भिक आ‘ मौलिक
अवस्थामे निःशुल्क होएत। आरम्भिक शिक्षा अनिवार्य होएत। तकनीकी आ व्यावसायिक शिक्षा
सामान्यतया उपलभ्य होएत तथा उच्चतर शिक्षा सेहो सभके ँ योग्यताक आधार पर भेटतैक।
2. शिक्षाक लक्ष्य होएत मानव व्यक्तित्वक पूर्ण विकास आओर मानवाधिकार आ‘ मौलिक स्वतन्त्रताक
प्रति आदरभाव बढ़ाएब। शिक्षा राष्ट्रसभक बीच तथा जातीय वा धार्मिक समुदायसभक बीच
पारस्परिक सद्भावना, सहिष्णुता आ‘ मैत्री बढ़ाओत तथा शान्तिक हेतु राष्ट्रसंधक प्रयासके ँ गति
देत।
3. माता पिताके ँ ई चुनबाक तार्किक अधिकार छैक जे ओकर सन्तानके ँ कोन प्रकारक शिक्षा देल
जाए।
अनुच्छेद 27
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ समाजक सांस्कृतिक जीवनमे अबाध रूपे ँ भाग लेबाक, कलाक आनन्द लेबाक
तथा वैज्ञानिक विकासमे आ‘ तकर लाभमे अंश पएबाक अधिकार छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन सृजित कोनहु वैज्ञानिक, साहित्यिक अथवा कलात्मक कृतिसँ उत्पन्न,
भावनात्मक वा भौतिक हितक रक्षाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 28
प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन सामाजिक आ अन्तरराष्ट्रीय आस्पद प्राप्त करबाक अधिकार छैक जाहिसँ
एहि घोषणामे उल्लिखित अधिकार आ‘ स्वतन्त्रता प्राप्त कएल जाए सकए।
अनुच्छेद 29
1. प्रत्येक व्यक्ति ओहि समुदायक प्रति कत्र्तव्यबद्ध अछि जाहिमे रहिए कए ओ अपन व्यक्तित्वक
अबाध आ‘ पूर्ण विकास कए सकैत अछि।
2. प्रत्येक व्यक्ति अपन अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक उपयोग ओहि सीमाक अभ्यन्तरे करत जकर
अवधारण दोसराक अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक आदर आ‘ समुचित स्वीकृतिके ँ सुनिश्चित करबाक
उद्देश्यसँ तथा नैतिकता, विधिव्यवस्था आ जनतान्त्रिक समाजमे सामान्य जनकल्याणक अपेक्षाक
पूर्तिक उद्देश्यसँ कानून द्वारा कएल जाएत।
3. एहि स्वतन्त्रता आ‘ अधिकारक प्रयोग कोनहु दशामे राष्ट्रसंधक सिद्धान्त आ‘ उद्देश्यक प्रतिकूल
नहि कएल जाएत।
अनुच्छेद 30
एहि घोषणामे उल्लिखित कोनो बातक निर्वचन तेना नहि कएल जाए जाहिसँ ई घ्वनित हो जे कोनो
राज्यके ँ वा जनगणके ँ एहन गतिविधिमे संलग्न होएबाक वा कोनो एहन काज करबाक अधिकार
छैक जकर लक्ष्य एहि घोषणाक अन्तर्गत कोनो अधिकार वा स्वतन्त्रताके ँ बाधित करब हो।
Thursday, March 26, 2009
महाभारत- बिलट पासवान 'विहंगम'
आ महत्त्वाकांक्षा
जखन
विवेकक सीमामे नहीं अँटैछ,
महाभारत-
तखने मचैछ।
पुत्र-मोहमे पड़िक'
आनक हिस्सा हड़पैए
जखन आन्हर धृतराष्ट्र
द्रोपदीक अपमानसँ
लज्जित होइत अछि;
जखन सम्पूर्ण राष्ट्र;
सम्पत्ति
आ शक्तिक मदमे
जखन दुर्योधन
नँगटे नचैछ;
महाभारत-
तखने मचैछ।
समीक्षा श्रृंखला-1 विनीत उत्पलक मैथिली कविता संग्रह "हम पुछैत छी"- समीक्षक डॉ.गंगेश गुंजन
विश्व बजारी एहि समाज मे, भाषा-साहित्य सभक संसार मे सेहो बजारे जकां मंदी पसरल अछि। लगभग इएह परिस्थिति बेसी कला-विधाक बुझाइछ। साहित्यमे किछु आर विशेषे। ताहू मे कविताक विधा आओरो अनठिआएल अछि, किछु स्वयं कात करोट भेल आ किछु कएल जा रहल अछि। प्रकाशके टा द्वारा नहि, स्वयं संबंधित भाखा-भाखी अधिसंख्य लोक समाज द्वारा सेहो। जतए स्वयं कविक द्वारा, से अवश्य खेद करवाक विषय। कविता व्यक्ति कें अपन समाज मे एकटा आओर प्रतिष्ठा मात्र दिअयबाक मूल्य पर बेशी दिन जीवित नहि रहि सकैत अछि। अर्थात् कोनो सम्भ्रान्त व्यक्तिक भव्य ड्र्ाइंग रूम मे एक टा आओर इम्पोर्टेड दामी वस्तुक प्रदर्शनीय नमूनाक माल कविता नहि बनाओल जा सकैत अछि, जे कि दुर्भाग्य सं भ’ रहल अछि। भाषा वैह टा ओतबे जीवित अछि वा रह’वाली बुझा रहल अछि जे मात्र अपन भाषिक उपयोगिता बा कही अपन क्रय-विक्रय-मूल्यक बलें जीवित रहि सकय। ग्लोबल बजार मे भाषा अपन प्रवेश- जतेक दूर आओर गंहीर धरि करवाक क्षमता रखने अछि, ताही सामर्थ्यक उपयोगिते पर, ओतवे दुआरे जीवित राखल जा रहल अछि, कोनो अपन काव्य-सम्पत्ति, सांस्कृतिक अस्मिता आ भाषाक प्राचीनता बा महानताक जातीय स्वाभिमानक आधार पर नहि। तें दुर्भाग्यवश ई समय अपन-अपन भाषाक महानता ल’ क’ आत्म गौरव सं भरब तं फराक, जे मुग्ध पर्यन्त होयबाक समय नहि बांचि गेल अछि। हॅं, भाषाक ‘दाम’ ल’ क’ निश्चिन्त रहवाक बा कम बिकाएब ल’ क’ चिन्तित होयबाक समय अछि। मुदा कविता मे भाषाक आशय आ अस्तित्व कें एहन तात्क्षणिक बूझि लेब कोनो भाषा-साहित्यक मूल सं छूटि क’ आगां बढ़वाक बुद्धि कें अवसरवाद छोड़ि, दोसर किछु ने मानल जा सकैत अछि। समकालीन समस्त कवि कें, नवागन्तुक के तं अनिवार्यतः बजार आ कविता भाषाक बीचक एहि भेद कें नैतिक बुद्धियें बूझि’ए क’ एकर बाट चलवाक प्रयोजन । अन्यथा ई कविता सेहो एक टा नव पैकेटक नव उत्पाद बनि क’ दोकान मे रहत। पोथीक दोकान मे नहि। साज-शृंगारक कोनो मॉल मे, जत’ जनसाधारण लोकक पहुंचबो दुर्लभ! आब से बजार आ कविताक भाषाक एहि द्वन्द्व सं निकलैत भाषाक ई यात्रा कोन नीति-बुद्धि सं कएल जयवाक प्रयोजन ताहि विषय पर गंभीरता सं मंथन कर’ पड़त। स्वविवेक। ई त्वरित चाही। उत्पल जीक एहि कविता-पाण्डुलिपिक लाथें, ई चर्चा हमरा अभीष्ट भेल आ संभव, एकर श्रेय तें हम हिनके दैत छियनि। कारण बतौर काव्य-प्रवेशार्थी भाषा-व्यवहारक ई दायित्व हिनको वास्ते प्राथमिकताक डेग छनि। कविता भाषाहिक सवारी पर लोक धरिक अपन यात्रा करैत छैक। जेहन सवारी, जेहन सवार तेहन यात्रा। ताही मे गन्तव्य, काव्यबोध, युग आ जीवन-दर्शन समेत बहलमानी कही, कोचमानी कही, बा ड्र्ाइभरी-पॉयलटी तकर कर्म कुशलता, ई सभ तत्व अंतर्निहित छैक। बल्कि कएटा अन्यान्यहुं विषय जे कोनो कवि अपना साधनाक प्रक्रिया आ स्वविवेक सं निरन्तर अपने विकसित करैत जाइत अछि। मुदा तकरा यथावत “शब्द मे कहि सकब, प्रायः एखनो हमरा बुतें संभव नहि। कए दशक सं कविता लिखि रहल छी।
हिन्दी सन व्यापक भाषाक स्थापित नीक-नीक स्वनामधन्य कवि पर्यन्त अपन कविता-पोथी अपने छपा रहल छथि। बिकाइ छनि तं बेचि रहल छथि। कोनो ब्रांड प्रकाशक सं खामखा छपवहि चाहैत छथि तं ओकरा पुष्ट मात्रा मे धन दैत छथिन। सरकारी पुस्तकालय सभ मे थोक मात्रा मे ‘खपबा’ देबाक वचन दैत छथिन, तखन अपन गुडविल दैत छनि। वा अपने अर्थ सक्षम कवि-लेखक अपना पुस्तकक संपूर्ण प्रकाशन-व्यय स्वयं करैत छथि। तें पाठक आइ धनिके कवि टा कें, ब्रांड प्रकाशन सभ मे पढ़ि सकवाक सौभाग्य पबैत अछि । मैथिलीक स्थान निरूपण तं सहजहिं कएल जा सकैए। मैथिली मे तं ओहिना प्रायः सभ टा साहित्ये लेखक-कवि कें अपना अपनी क’ अपने छपबाव’ पड़ैत छैक। महाकवि यात्रीजी पर्यन्त विशय आबहु जीवित अति पुरना किछु लोक आ यात्रीजीक स्नेही-श्रद्धालु पाठक समेत हमरा खाढ़ीक हुनक स्नेह-समीपी किछु रचनाकार कें बिसरल नहि हेतनि। पोथीक प्रसार आ विक्रय सं मैथिल लेखकक केहन उद्यम जुड़ल रहलैक अछि! प्रकाशक कत’? अर्थात् कविता आ साहित्य कवि आ साहित्यकारहिक संसार मे जीवित अन्यथा मृत नहियों तं अनुपस्थित तं अनुभव कएले जा रहल अछि। ई युग यथार्थ एकदम देखार अछि।
एहना मे क्यो एक टा मैथिल युवक अपन समस्त ऊर्जा-उत्साहक संग दिल्ली मे कोनो संध्या बा प्रात अपन मैथिली कविताक पाण्डुलिपि दैत अपने कें ‘भूमिका’ लिखि देवाक आग्रह करथि तं केहन लागत ? मतलब जे प्रथम दृष्टया केहन अनुभव हएत? हमरा तं युवक दुस्साहसी आ किंचित गै़रजवाबदेह बुझयलाह। ओना जकरा साहस नहि हेतैक से कविताक बाट धइयो कोना सकैये !
अपन कुल अड़तालीस पृष्ठक अड़तीस कविताक पाण्डुलिपि दैत श्री उत्पल विनीत जखन से कहलनि तं किंचित असमंजस तं भेवे कएल। भूमिका-लेखन-काज सेहो एहि युग मे अपन धर्मान्तरण कए लेलक अछि। हमर प्राथमिकता सं तें बाहरे अछि। तथापि यदि कोनो मैथिली कविताक भविष्य एना सोझां उपस्थित हो तं स्वागत कोना नहि हो ! ताहू मे भागलपुरक नवतूर !
पाण्डुलिपि पढ़वाक क्रम मे हमरा कचकोही कविता ;मैथिली कवि विनोद जीक “शब्द मे कंचकूहद्धहोयवाक अनुभव भेलाक बादहु-कवि प्रतिभाक छिटकैत सूक्ष्म किरणक सेहो अनुभव, प्रिय आ आश्वस्तिकारक बुझाएल। स्वागत तें कहल अछि। उत्पलजीक प्रतियें उद्गार मे।
कविक प्रस्तावना हिनक कविताक संसार कें बुझबा मे विशेष सहायक अछि जे ई बड़ स्पष्ट बुद्धियें आ पूर्ण मनोयोग सं लिखलनिहें। हिनकर रचनाक बुनियादी वर्तमान आ सरोकारक उद्घोश जकां छनि। से मात्र वयसोचित उच्छ्वास नहि, बल्कि अपन वचनबद्धताक स्वरूप मे कहल गेल छनि।
सभ समयक नवीन पीढ़ी रचनाकारक सम्मुख अपन वर्तमाने प्रायः सब सं प्रखर चुनौती रहैत छैक। अतीत आ भविष्य तं अ’ढ़ मे रहैत छैक। रचनाकारक रूप मे अतीतक वास्ते ओकर नीक-बेजायक वास्ते ओकरा उत्तरदायी नहि बनाओल जा सकैए। यद्यपि ताही तर्क सं भविष्यक लेल ओकरा छोड़ि सेहो नहि देल जा सकैए। कारण समाजक भविष्य निर्माणक प्रक्रिया मे अन्य सभ सामाजिक कारण आ प्रेरक परिस्थिति सभ समेत, समकालीन रचनाकारहुक परोक्ष मुदा प्रमुख भूमिका रहबे करैत छैक। तें कविक दायित्व ल’ द’ क’ अपन समकालीनताक ज्ञान आओर अनुभव के विवेक सम्मत सम्वेदनाक रूप मे विकसित करैत अग्रसारितो कर’ पड़ैत छैक। जाहि सघनता आ व्यापकता सं कवि युगक “अतीत-ताप अर्थात् जीवनक दुःख-द्वन्द्व आ यथार्थ कें बूझि-पकड़ि पबैत अछि आ तकरा अपन रचना मे दूरगामी प्राणवत्ताक कलात्मक शिल्प द’ पबैत अछि, सैह ओकर प्रतिभाक सामर्थ्यक रूप मे दर्ज कएल जाइत छैक। कोनो रचनाकार अपना कृति मे बहुत युग धरि रहवाक सहज आकांक्षी होइतहिं अछि। तें हमरा जनैत मनुक्खक जिजीविशा आओर कविताक जिजीविशा मे तात्विक किछु भेद नहि। कवि जे अंततः मनुक्खे होइत अछि। तें दुनूक “आशक्ति अन्योनाश्रित होइछ।
विनीतजीक कविता मोटामोटी हमरा तीन अर्थछाया सं वेष्ठित अनुभव भेल। कविता मे अपन कथनक कोटि, तकर पकड़ आ प्रयोगक विधि। कएटा रचना तें कंचकोह जे कहल, से छैक एखन। कएटा भावानुभूति मे संवेदनशील मुदा कथन मे अपेक्षाकृत बेजगह। “कविताक विषय कथात्मक सांच मे कहि देल गेलैक अछि, जे स्वाभाविके, ओ कविता विशेष अपन जाहि अनुभव-निष्पत्तिक योग्य सक्षम रहैक आ उपयुक्तो, से नहि भ’ सकलैक अछि। से आगां सकुशल सफलता पाबि जाइक तकर सामर्थ्य कविता मे अवश्ये झलकैत छैक। से साफ-साफ। तें ओतहु निराशा नहि, आस्वस्ति छैक। कवि आ कविता दुनू अपना प्रकृतियें बनिते-बनिते बनैत छैक। तेसर जे अति ज्वलंत अतः कविताक प्राणानुभूति वला अनुभव कें पर्यन्त कवि किछु तेहन अंदाज मे कहि जाइत छथि जे ओकर वांछित प्रभाव पाठकक मन पर ओएह नहि पड़ैत छैक जे स्वयं कविक अभीष्ट छनि। अगुताइ मे कहल गेल सन आभास होइत छैक। कारण जे कविता मात्र कन्टेंटे नहि, कहवाक छटा आ व्यंजनाक कलात्मक स्तर पर काज करवाक कविक समुचित भाषिक क्षमता सेहो थिक।
बहुत सोचला उतर आधार भेटल जे, तकर यदि कोनो एकटा कारण देखल जाय, तं भाषाक अवरोध बुझाएल। कोनो भाषा स्वयं मे मात्र ओ भाषा टा नहि अपितु पूरा संस्कृति होइत छैक। भाषा मात्र ओकर बोध बा ज्ञाने नहि, ओकर संवेदना सेहो होइत अछि। अर्थात कोनो प्राचीन समृद्ध संस्कृतिक अभिव्यंजना लेल ओहि संस्कृतिक भाषाहुक प्रवाह मे प्रवेश चाही। से प्रवेश हमरा बुद्धियें भाषाक नाव टा सं संभव होइत छैक। नाव एकहि संग खेबैया सं ओकर स्वस्थ बल समेत कएटा अन्यान्य कुशलताक मांग करैत छैक। कवि सं कविता-विषय, तहिना। तें भाषाक साधना, कोनो कविक काव्य-यात्रा कें सुगम बनवैत छैक।सुचारु करैत छैक। दोसर जे, जेना जीवन आओर युग यथार्थ परिवर्तनशील होइत अछि , तहिना भाषाक भूमिका सेहो बदलैत छैक। अर्थात् भाषाक मिज़ाज।
उत्पल विनीतजी कें भाषाक रूप मे एखन मैथिलीक संग बहुत बेशी आयन-गेन करवाक प्रयोजन। तखनहि मैथिलीक सहज स्वाभाविक “शक्ति सं आत्मीयता आ परिचय विकसित भ’ सकतनि। भाषा कें अपन काव्य प्रयोगी अभियान मे विश्वसनीय संगी बनब’ पड़तनि। सभ कें बनब’ पड़ैत छैक। मातृ भाषा हएब, कविक सामर्थ्य तं होइछ मुदा काव्य सामर्थ्यो सेहो भ‘ जाइक, से आवश्यक नहि। तें कोनो कविक वास्ते काव्यभाषाक सिद्धि अभीष्ट।अनुभव तं जीवनक निरंतर अंतरंगता आओर सरोकार सं अपना स्वभावें चेतनाक अंग बनैत चलैत छैक। सैह रचनाकार कें श्रेय तथा प्रेयक विवेक भरैत रहैत छैक।
एहि टटका, उूर्जावान-संवेदनशील कविक पथ प्रशस्त हेतनि से विश्वास अछि। बहुत-बहुत स्नेह-“शुभाशंसाक संग, कालजयी कविताक आशा मे।
Tuesday, March 24, 2009
एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (तेसर कड़ी)

ओही समय में बेसी विवाह सभा सs ठीक भेलहा सब रहैत छलैक जाहि कारणे हरबरी वाला विवाह हमरा देखय कs ओतेक इच्छा नय होयत छल, मुदा दादी केs मोन रखबाक लेल हुनका संग कतो कतो चलि जायत छलौंह। ओहि समय हम परीक्षा फलक प्रतीक्षा में रही आर कोनो काजो तs हमरा नहि छलाह ।
एक दिन हम, माँ आ दादी आंगन में बैसल छलियै कि एकटा खबासनी आयल आ दादी के कहलकैन्ह " मलिकैन कनि एम्हर आयल जाओ "। ई सुनतहि दादी ओकरा लग चलि गेलिह, पता नय ओ हुनका कि कहलकैन्ह। कनि कालक बाद दादी हमरा कहलैथ "चलs हम तोरा एकटा सोलकनि सबहक विवाह देखाबैत छियौक"। हमरा आश्चर्य
भेल जे आई दादी केs की भेलछैन्ह जे ओ हमरा सोलकनि कs विवाह देखय लेल कहैत छथि। हम आश्चर्य सs पुछलियैन्ह "अहाँ सोलकनि कs विवाह देखय लेल जायब "? दादी मुसकैत हमरा कहलैथ "चलहि नय अहि ठाम, ब्रम्ह स्थान लग बरियाती छैक, दूरे सs खाली बरियाती देखि चलि आयब दूनू गोटे"।
हमारा मोन तs नहि होइत छलय बरियाती देखबाकs, मुदा हम दादी कs संग जएबाक जयबाक लेल तैयार भs गेलियैन्ह। ब्रम्ह स्थान लगे छलय, हम दुनु गोटे जखन ओतहि पहुँचलौं तs देखलियय जे ओतहि बीच में पालकी राखल आ ढोल पिपही बाजैत छलैह, जों आगु बढ़लौं तs देखैत छी जे ओहि पालकी में वर मुंह पर रूमाल देने बैसल छैथ आ एकटा बच्चा हुनका आगू में बैसल छलैन्ह, बरियाती सब सेहो बैसल छलैक। खैर हम सब आगू बढिकs बरियाती लग पहुँच गेलिये। हमरा निक भलहि नय लागैत छल मुदा पहिल बेर अहि तरहक बरियाती देखैत रही। हम आश्चर्य सs बरियाती देखैत रही कि कनिये कालक बाद सब बरियाती ठाढ़ भs गेलैथ आ पिपही ढोल जोर स बाजय लगलय। हम सब कनि पाछू भs गेलौं, जहिना पालकी उठलय कि हमरा माथ पर कियो पानी ढ़ारि देने छलs। हम त हक्का बक्का भs कs एम्हर ओम्हर ताकय लगलौं, त देखैत छी दादी कs हाथ में गिलास छलैन्ह। हम कानय लगलियय। ई देखि कs दादी हमरा तुंरत हँसैत कहलैथ गर्मी छलैक ताहि द्वारे ठंढा क देलियौक। हमरा
बड़ तामस भेल।
हम सब जखैन घर पहुँचलौं, हम कानैत माँ सs कहलियय हम कहियो दादी संग विवाह देखैक लेल नय जायब। हमर एकटा पीसी ओहि ठाम बैसल रहैथ, कहि उठलीह, " नय कानि तोहरे निक लेल केलथुन"। हमरा किछु नय बुझय में आयल आ बकलेल जकां हुनकर मुंह देखैत पुछलियैन्ह "कि निक भेल, सभटा कपड़ा भीजि गेल"? ई सुनि कs ओ कहलैथ "गय बरियाती कs जेबा काल पानि माथ पर देला सs लोकक विवाह जल्दि होयत छैक ताहि लेल तोरा पानि देलथुन "। हम आर जलि भुनि कs ओतहि सs चलि गेलौंह। ओकर कनिये दिनक बाद हमर विवाह भs गेल।
जहिया हमर विवाह भेल ओहि समय हमर घरवाला श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर इंजीनियरिंग के अन्तिम बरख में पढैत छलाह। हम मैट्रिक के परीक्षा देने रहि आ परीक्षा फल सेहो निकलि गेल छलs। हमर विवाह आषाढ़ मास में, (दिनांक १३ जुलाई) भेल छलs। विवाहक तुंरत बाद मधुश्रावणी छलैक ताहि द्वारे हम गाम पर रही गेलौं आ हमर काका मधु(हमर पितिऔत बहिन) के संग रांची चलि गेलाह । काका हमरा कहैत गेलाह जे ओ हमर परीक्षा फल आदि स्कूल सs लs कॉलेज में हमर नाम लिखवा देताह। तैं हम निश्चिन्त रही। हमर काका नाम लिखवेलाक बाद हमरा खबरि सेहो कs देलाह। हमर नाम "निर्मला कॉलेज रांची" में लिखायल छल।
दादी के आग्रह पर हमरा गाम पर रहि मधुश्रावनी करवा के छलs, बहिनक विवाह सs अपन विवाह आ मधुश्रावनी धरि करिब दू मास सs बेसी रहय परल छलs। हम पहिल बेर अपना होश में एतेक दिन गाम पर एक संग रहल रहि। ओना तs हम सब, सब साल गाम जायत रही, मुदा एक संग एतेक दिन नय रहैत रहि। ओ पहिल आ अन्तिम बेर छलs जे हम गामक मजा निक जकां लs सकलियैक।
-कुसुम ठाकुर-
क्रमशः ........
Monday, March 23, 2009
RECESSION यानि मंदी
मंदी जे नए कराबे...सुनए में बर आसान शब्द लागे ये मुदा बर खतरनाक शब्द छी इ RECESSION.
अमेरिकी आर्थिक मंदी (US recession) के असर भारत पर भी भ गेल आ धीरे-धीरे जटिल भा रहल ये । अखबार, न्युज चैनल (हिन्दी, अंग्रेजी) सब में अए सा जुरल न्युज के भरमार ये। अही कारण कतेक रास कंपनी सब बंद भ रहल ये, सब सा बेस छेाट कंपनी के मंदी झटका लागल ये। कतेक युवा छन में रेाजगार साँ बेरेाजगार भ गेल आ भ रहल ये, कतेक चुल्हा बंद हेाए के कगार पर ये, कतेक लाखपति धरातल पर आबि गेल ये । देश के अरबपति के कमाई पर मंदी जबरदस्त सेंध लगालक ये आ लगभग सब के संपत्ति में करीब 61 परसेंट तक के गिरावट आएल ये। रेाज कुनु नए कुनु कंपनी पींक स्लीप या रिलेाकेशन थमा रहल ये । सच पुछु ता हमरेा डर लागे ये, आए के समय में किछ भी भा सके ये अखन तक ता बिरला ग्रुप आ किछ ढंग के कंपनी एहि तरह के एकसन ने ल रहल ये लेकिन भबिस्य के नए पता। एही मामले में सरकारी नेाकरी बाला बृन्द सब ठीक अैछ ।
हमर दू टा कविता 1.नाव आ जीवन 2.मौनक शब्द -सतीश चन्द्र झा
नाव नदी मे चलल सोचि क’
दूर नदी के अंत जतय छै।
देखब आई ठहरि क’ किछु छण
नदी समुद्रक मिलन कतय छै।
छै संघर्ष क्षणिक चलतै जौ
जल धारा विपरीत दिशा मे।
चलब धैर्य सँ भेटत निश्चय
छै आनंद मधुर आशा मे।
कखनो अपने पवन थाकि क’
मंद भेल चुपचाप पलटतै।
फेक देब पतबार अपन ई
जल धारा के दिशा बदलतै।
छोट नाव के एतेक घृष्टता
सुनि क’ भेल नदी के विश्मय।
नाचि रहल अछि जल मे तृणवत
बुझा रहल छै जीवन अभिनय।
की बुझतै ई नाव नदी मे
जीवन पथ धारा अवरोधक।
केना चीर क’ निकलि जाइत अछि
नहि छै भय ओकरा हिलकोरक।
तेज धार छै प्राण नाव के
जीवन छै सागर अथाह जल।
नदी किनारक छाँह मृत्यु छै
जल विहीन जीवन के प्रतिपल।
नहि होइ छै किछु भय जीवन मे
मृत्यु देखि सोझा मे प्रतिक्षण।
अपने चलि क’ नाव मनुख के
सिखा रहल छै जीवन दर्शन।
क्रुद्ध नदी के जल प्रवाह मे
उतरि गेल जे ‘तकरे जीवन’।
भय संघर्ष,निराश,कष्ट सँ
ठहरि गेल ओ ‘जड़वत जीवन’।
2. मौनक शब्द
हेरा गेल अछि शब्द अपन किछु
तैं बैसल छी मौन ओढ़ि क’।
वाणी जड़वत, जिह्वा व्याकुल
के आनत ग’ ह्नदय कोरि क’।
के बूझत ई बात होइत छै
मौन शब्द,वाणी सँ घातक।
राति अमावश के बितला सँ
जेना इजोत विलक्षण प्रातक।
अछि सशक्त जीवन मे एखनो
ई अभिव्यक्तिक सुन्दर साध्न।
एकर चोट छै प्रखर-उचय अग्नि सन
शीतलता चंदन के चानन।
नहि छै आदि -उचयअंत मे समटल
अंतर मे विश्राम वास छै।
आनंदक अतिरेक ह्नदय मे
नव अनुभूतिक महाकाश छै।
अछि अव्यक्त मौन अक्षर सँ
ज्ञान दीप के प्रभा प्रकाशित
दृष्टिबोध् सँ दूर मौन अछि
शब्द अर्थ सँ अपरिभाषित।
वाणी अछि ठहराव झील के
मौन नदी के निश्छल धार।
उठा देत हिलकोर हृदय मे
जखने बान्हब धार किनार।
छै संगीत मधुर स्वर झंकृत
नै छै अर्थ मौन के जड़ता।
कोलाहल सँ दूर मौन के
वाणी सँ छै तिव्र मुखरता।
कतेक विवस अछि शब्द जगत के
वर्तमान के व्यथा देखि क’।
असमर्थ अछि सत् चित्राण मे
की लिखू हम शब्द जोड़ि क’।
Sunday, March 22, 2009
जागू आब -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'
चारू दिस अन्हार अछि ।
मूर्ख अछि गद्दी पर बैसल ,
पढ़ल-लिखल बेकार अछि ।
जतय देखू मारि - फसाद ,
होइत लूट - पाटक काज अछि ।
विकास त' सपनेहुँ नहि देखू ,
शैतानक भेल राज अछि ।
हिंसा आ बेईमानी केर ,
भेल सउँसे आधिपत्य अछि ।
आजुक गाँधी-नेहरू सभ,
बजैत खाली असत्य अछि ।
एम्हर, ओम्हर, जेम्हर देखू ,
दानव करैत किलोल अछि।
उजरा खादी कुरता पाछा,
दबल बहुत रस पोल अछि ।
बन्न पडल अछि बुद्धिक ताला,
मूर्खक शासन ई लोकतंत्र अछि।
फुइस फसाद अछि फुला रहल ,
ई लोकतंत्रक मूल मंत्र अछि ।
नवक्रान्तिक छथि मांग करैत भू ,
सबहक मति आइ मारल अछि ।
सत्य अहिंसा आइ काल्हि,
एहि समाज सं बारल अछि ।
Saturday, March 21, 2009
डॉ विजयकांत मिश्र

डो. विजयकांत मिश्रक जन्म मंगरौनी गाम - जे नव्य न्याय आ तांत्रिक साधनाक जन्म-स्थली अछि- (जिला मधुबनी) मे
भेलन्हि।
ओ 1948 मे प्राचीन भारतीय इतिहास आ संस्कृति विषयमे एलाहाबाद विश्वविद्यालयसँ सनात्तकोत्तर उपाधि कएलाक बाद कतेक बरख धरि बिहार सरकार आ पटना विश्वद्यालयसँ सम्बद्ध रहलाह आ 1957 ई. सँ भारतीय पुरात्तत्व विभागमे काज कएलन्हि आ ओकर शिशुपालगढ़, कौशाम्बी, वैशाली, हस्तिनापुर, कुम्हरार, पाटलिपुत्र, करियन, सोनपुर, बिलावली, नालन्दा, राजगीर, चन्द्रवल्ली, आ हम्पी खुदाइमे विभिना भूमिकामे भाग लेलन्हि।
हिनकर लिखल-सम्पादित पोथी सभमे अछि:
1.वैशाली,1950
2.कुम्हरार एक्सकेवेशंस: 1950-1957
3.पुरातत्व की दृष्टिमे वैशाली
4.नागेश भट्टाज पारिभाषेन्दुशेखर
5.मिथिला आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर (सम्पादित)
6.कल्चरल हेरिटेज ऑफ मिथिला
7.श्रृंगार भजनावली- एक अध्ययन
8.क्षेत्र पुरातत्वविज्ञान -
9.पुरातत्व शब्दावली
जुल्मी- मंत्रेश्वर झा
अपना पर बजरत तखन बुझवै जे की।
काल्हियो छलहुँ हमारा आ काल्हियो रहब,
बीतत वर्तमान तखन बुझबै जे की।
फूसि फासि ठूसि ठासि भरलहुँ जिनगी,
अंतकाल पछताके बुझबै जे की।
बजौलहुँ इनाम ले बदनामी खातिर,
नाम जुटत अपनो त' बुझबै जे की।
नुका नुका पर्दा मे बाँचब कते दिन,
खोलब जौं भेद तखन बुझबै जे की।
जागि गेल छी- महेन्द्र नारायण राम
मोटगर-मोटगर
सादा कागत पर
रे अन्यायी,
हमारा अऊँठा निशान लगा गेल छी,
तकरे प्रभावे
आइ धरि
देख! कतेक हमारा सुखा गेल छी।
रक्त, हाड़-माँसु समर्पित क' तोरा
शोषण उत्पीड़नक बीच
भावनाक चिक्कस बनि पीसा गेल छी।
जरि गेल अछि आब मुदा
अन्हार घरक दीया
पढ़ब, लिखब, गुनब
मोन मे
गड़ि गेल अछि
आब हमारा खुश भ' रहल छी
आखर-आखर पढ़ि रहल छी
कुशल भ' रहल छी
साक्षर भ' रहल छी
हमारा जागि गेल छी।
आब क्यो अऊँठा निशान नहीं लगबाओत
रक्त-हाड़-माँसु केँ नहीं चिबाओत
सुन्दर हृष्ट-पुष्ट शरीर केँ नहीं तड़पाओत॥
बाल कविता-२ गाछ मे -जीवकांत
पात मे बसात
पात मे फूल
गाछ झूल-झूल
पात मे छाह
गाछ वाह! वाह!
गाछ मे आम
गमकैए गाम
गाछ मे मेघ
भीजैए खेत
पातमे उछाह
गाछ वाह! वाह!
बुढ़ी माता- कथा- अमित कुमार "गोपाल",
बुढी माता - Source of inspiration
ई बात जनवरी १९९५ के छी, मेडिकल केाचिगं क्लास ५.३० बजे भेार साँ हेायत रहै, हम घर साँ अन्हारे ४.३० - ४.४५ में निकलैत रही, पटना में जनवरी मास में बहुत ठंढा परैत छै। वेा समय में आई काल साँ बेसी ठंढा परैत रहे। ठंढा उपर साँ सुनसान रास्ता बहुत डर लागैत रहै, लेकिन इक नया जोश में सब किछ बिसेर जाईत रही, ११ जनवरी के कोचिंग में मेाडयुल टेस्ट रहै ई कारण हम ४.०० बजे भेारे घर साँ निकल परलु जे ठंढा के कारन लेट ने हुए। हम जहिना पुनाईचक-हरताली मेार के बीच रेलवे लाईन लग पहुँच लु, अचानक इक टा घेाघ तानने , करिया कंबल अेाढने एक टा मनुख सामने आबि गेल, डर साँ हम साईकिल सा गिर परलु, वो बहुत बुढ आ कमर लग साँ झुकल लागल। हम ऊठ के ठाढ भेलु...गरदा सब झार कऽ जहिना चले लाऽ भेलु तहिना आबाज देलक सुन...अ....बैाआडर साऽ हालत खराब भ गेल....चारेा तरफ सा सन..सन जकाऽ अवाज महसुस हुए लागल, डरल-डरल आेकरल लग गेलु...पुछलक कताऽ जाए रहल छै...हमरा सा पुछलक (ता तक अपन घेाघ नए हटाने रहे)..डर साँ आवाज जल्दी नेऽ निकलल..लेकिन हिम्मत कऽ के जबाब देलु...केाचिगं जा रहम छी।फेर पुछलक कथी के पढाई करे छैहम कहलु... डाक्टरी के तैयारी करे छी.. अच्छा बेस.देासर पढाई में मेान नेऽ लागे छेा...कनि देर रूक तखन जाभियेता तक टाईम लगभग ४.४५ भऽ गेल रहे, एक..दु टा आदमी सब सडक पर सेहेा नजर आबे लागल, लेट हेाएत रही ए कारन हि्म्मत कऽ के कहलेा.. हमरा लेट भ रहल ये..हमर आइ परीक्षा छी ।कुनु बात नेऽ । जबाब भेटलबर असमंजस में पैर गेलु..की करी नइ करी, एक मेान हेाए रहे राह चलैत लेाग के अवाज दी लेकिन रेाड फेर सुनसान भऽ गेल lतखन वेा अपन घेाघ हटालक हुनकर चेहरा के देखते लगभग बेहोश भऽ गेलु...बुढ झुरीदार चेहरा आ उपर साँ मर्द जका मुछ दाढी..हे भगवान आई तक एहन नेऽ देखने रहु ।हमर हाउ भाउ के देख बाजल - हमरा देख क डर लागे छेा.. नए डर हम देासर कियेा नए छियेा ।पता नए किए वेा किछ अपन जकाँ लागल, ता तक लगभग ५ साँ उपर टाईम भ गेल रहे, रेाड पर दुध बाला, पेपर बाला सब नजर आबे लागल, किछ देर के बाद आवाज भेटल आब तु जेा...घुरेत काल आभये।हम हवा के भाति तीर सा भे बेसी तेज साँ निकलु..बहुत लेट भा गेल रहु साईकिल के अपन क्षमता सा भी तेज स्पीड सा चलाएब सुरु का देलु, जहिना गाँधी मैदान-सब्जी बाग के मुह पर पहुचलु ..देखलु जे जबरदस्त एक्सीडेंट भेल रहे, पुरा रास्ता पुलिस बंद क देने रहे, एक्सीडेंट लगभग १५-२० मिनट पहले भेल रहे जही में ४ टा आउर १ टा चाई बाला दुकानदार मारल गेल रहे.. उ ४ टा हमरे केाचिगं के छात्र रहे, जे चाए पीबा के खातिर रुकल रहे लेकिन ?हमहु अेाहि चाई वाला के दुकान पर रेाज रुकेत रही ( अगर बुधी माता नए भेटतिए ता हमहु उ टाईम चाए के दुकान पर रहतु...फेर पता नए )चाए पीबे के आदत नए रहे लेकिन ठंढा के चलते पीब लेत रही ।कहुना केाचिगं पहुच लु...उ ठाम घटना के सुचना पहुच गेल रहे.. केाचिगं २ दिन के वास्ते बंद भा गेल, छात्र के घर वाला के सुचना द देल गेले, हमहु बुझल मेान साँ घर वापस हुए लागलु घर घुरेत काल वेा बुढिया फेर वही ठाम भेटल वेाहिना घेाघ तानने, लग जा के सब घटना सुनाले के बाद भी हमर जबाब नए देलक...किछ देर के बाद कहलक - बेाआ हमरा भुख लागल ये,कि खेबे - हम पुछलुचुरा आ सकर जबाब भेटल।संयेाग एहन रहे ताबि तक ई सब तरह के समान खरीदे के वास्ते दुकान पर नेए गेल रहु (कारन जे घर मे काज करे लेल ढेर आदमी रहे, आउर हम सब साँ छेाट रही)फिर भी दुकान जा कऽ चुरा सकर किनि काऽ आनलु,किछ देर के बाद हम पुछलु - कतेऽ जेभी हम पहुंचा देबेाकतेा नेऽ - जबाब भेटलरह भी कतऽ - हम पुछलुए जगह - सीधा जबाब भेटलखाना कतऽ खेवी, पुछला पर जबाब भेटल - तु खुआ, बेसी बक-बक ने कर खाए ले दे फेर पुछए जे पुछे के छेा (बिल्कुल रुखल जबाब भेटल)संग ही स्नेह साँ कहलक - तुहेा खेा ।हम ता अजीब मु्स्किल मे पर गेलु, अेाकराअकेले छेाएर के जाए के मेान सेहेा नए करेत रहे..बहुत सोचला के बाद डिसिजन ले लु जे एकरा अपन संग लऽ जाइल जाए ।रिक्सा पर बुढिया माता आ साईकिल साँ हम घर पहुच लु, अेाकरा गेट के बाहर ठाढ कऽ हम घर गेलु, सब कहानी अपन माता जी के बतालु, बुढी माता बाहर ठाढ छे सेहेा कहलु, माता जी के आज्ञा भेल नीचा में एकटा रुम खाली छै अेाए में हुनका जगह देल जाए सब ब्यबस्था (बिछेाना, कंबल ,साफ सारी) कऽ क घर में बेसालु, शाम में बाबु जी आफिस सा एला ता हुनकेा सब कहानी बतालु, बाबु जी पुछला - कहिया तक इ रहतेा, नए पता हम कहलेा, फेर माता जी सब संभाल लेली आ बाबु जी के समझा देलखिन । बुढी माता के सेवा करब हमर रेाज के ड्युटी भ गेल, केाचिग जाए सा पहिने आ आबे के बाद १ सा १.३० घंटा हमर टाईम बुढी माता लग बीते लागल । खाना के अलग-अलग फरमाइश हेाएत सब किछ पुरा करेत १ ह्फता बीतल, एक दिन अपना लग बेसा हमरा बारे में पुछे लागल (जेना अपन दादी, बाबा,अग्ज) अतिंम में कहल गेल देासर पढाई (मेडकल छेार क) कर बहुत नाम हेतेा, बहुत पैसा कमाबे, माइ-बाबु जी के नाम सेहेा हेतेा । १० वाँ दिन रात में बिना कीछ बताने पता नए कतऽ चैल गेली..आइ तक नेऽ भेटली..हम इंतजार करे छी बुढी माता इक दिन जरुर भेटती । बुढी माता के बात बिल्कुल सही निकलल जखन १४-१५ घंटा पढाई केला के बाबजुद सी०बी०एस०सी० मेडिकल मे वेटिगं आबी गेलु, बी०सी०इ०इ० में डेयरी टेडॄ भेटल, एम०डी०ए०टी० में १०० परसेंट चांस रहे(९० परसेंट सही रहे, सलेक्सन ६०-७० परसेंट पर हेाएत रहे) मगर सेंटर केंसिल ब गेल, एही सब कारन साँ हम फरस्टरेसन में रेहा लागलु, पढाई-लिखाइ बंद कऽ देलु जे एतक मेहनत करे के बाद जखन नए सफल भेलु ता आब कहियेा नेऽ हेाएब। हमरा बुढी माता के बात याद आबि गेल..संग ही बाबु जी सेहेा कहला - अपन टेॄक चेंज करु, लगभग वही समय यु०जी०सी० सा ३ टा नया केासॅ पटना युनिवसिटी एवं मगध युनिवसिटी के भेटल ((१) Bio Tecnology (२) Water & Enviromental Management & (३) BCA)। प्रतियेागिता परीक्षा के आधार पर एडमिसन के प्रेासेस सुरु भा गेल, बी०सी०ए) हमर किछ ढंग के क्रेास बुझाएल हमहु प्रतियेागिता परीक्षा में बेसलु आ पास कऽ गेलु, यु०जी०सी० बी०सी०ए० के पहलुक बैच के पहलुक छात्र हम रही जे फाइनल परीक्षा में ८९ परसेंट सा पास करलु, बाबु जी कहला आब यु०पी०एस०सी या ढंग के सरकारी नैाकरी के तैयारी कारु लेकिन हमर सेाच किछ आउर रहे / अखन तक ये । “अगर अपन मेरिट / एविलिटी के युज करना ये ता सरकारी नैाकरी नए करना चाही" फेर पटना बेलटान साँ साफ्टवेयर मे पेास्ट ग्रेगुएट डिप्लोमा करलु, फेर एम०सी०ए० करलु, मैान भेल जे एम०बी०ए० करल जाए (बहुत कठिन रहे आइ० टी० सा एम०बीए०ए० करब) बुढी माता के क्रपा सा एम०बीए०ए० भी कऽ ले लु अपन खचा चलबे लेल पाट टाइम नैाकरी सेहेा करलु, केम्पस सलेक्सन में रिलांयस इनफेाकाँम के आफर भेटल ज्वाइन करलु, फेर एच० डी० एफ० सी० बैंक साँ आफर भेटल ता बैंक ज्वाइन करलु.. दिल में इच्छा रहे टाटा , बिरला में नैाकरी करी बुढी माता कर क्रपा साँ इच्छा पुरा भेल आ बिरला ग्रुप सा निक पेाजिसन के आफर आइब गेल ज्वाइन सेहेा करलु आ अखन तक एही जगह छी ।..आब इच्छा यऽ दि्ल्ली, मुंबई के बहुत सेवा करलु आब अपन बिहार - मिथिला के सेवा करल जाए..बुढी माता के दया साँ सेहेा भा जेते.....लेकिन सबसाँ पैघ इच्छा बुढी माता के दशन के पता नए .................।
Friday, March 20, 2009
कुंडलिया- आशीष अनचिन्हार
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कुंडलिया
डेग-डेग पर छाल्ही भेटै डेग-डेग पर गूँह
लूझए बला लुझबे करतै जकर जेहन मूँह
जकर जेहन मूँह धोधि पोन बेसी अछि चतरल
प्राण मुदा अछि टूटल फूटल काटल कतरल
कह अनचिन्हार कविराय एहने छैक संसारक रीति
सगरो दुनिया बजि रहल स्वार्थक गीति
Thursday, March 19, 2009
कृतघ्न मनुख बेमार आलोचना.
नाम गिनेबा लेल जं भिडि जाइ त' असमाप्य श्रृंखला शुरू भ' जायत.
मुदा कृतघ्नता में हमर सबहक जोर नहि. भाषा संस्कृतिक नाम पर भरि जीवनक होम क' देनिहार कें हम सब बेर-बेर मोन तक पारब उचित नहि बुझैत छी. जीबैत काल धरि किछु गोष्ठीक अध्यक्षता आ छोट छिन सम्मानक अलावे हुनका सबहक हिस्सा किछु नहि अबैत छैन्हि. अहि दुर्भाग्य पूर्ण प्रसंग सं अपना सबहक सौन्दर्यबोध आ संस्कृतिबोधक इयत्ता संदेहक वस्तु
बनि गेल अछि. अतीतक तीत अनुभव नवतुरिया सबकें सहज नहि होमय द' रहल छैक. अहि सन्दर्भ में युवा रचनाकार अखिल आनंदक ई गप उल्लेख करबा योग्य अछि – “ मैथिली सं पाइक आस तं नहिये रहैत छैक कम सं कम सही मूल्यांकन त' होए’’. गुणगान आ निंदाक बीच फंसि दम तोइर रहल मैथिली आलोचनाक सधल इलाज़ बहुत जरूरी छैक
Help Alexa Learn Maithili
Helping Alexa Learn Maithili: Cleo Skill: Amazon has a skill called "Cleo" that allows users to teach Alexa local Indian lang...
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"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
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जेठक दुपहरि बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि पछबा प्रचण्ड बिरड़ो उदण्ड सन सन सन सन...
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उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...