भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Monday, May 04, 2009
एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी(आठम कड़ी)
जाहि दिन हमर विवाह भेल छलs ओहि समय हमर बडकी दियादिन केर सेहो द्विरागमन नहि भेल छलैन्ह। आ ओ राँची अपन नैहर मे छलिह। दोसर दिन साँझ मे इ कहलाह जे काल्हि भौजी सs भेंट करय लेल जयबाक अछि आ ओकर बाद परसु मुजफ्फरपुर चलि जायब। आजु चलु राँची(राँची केर मुख्य बाज़ार मेन रोड के लोग राँची कहैत छैक) दुनु गोटे घूमि कs अबैत छी। बरसातक मास आ बादल सेहो लागल छलैक तथापि हम सब निकलि गेलहुँ। रिक्शा किछुएक दूर आगू गेला पर भेंट गेल। घर सs मेन रोड जयबा मे करीब आधा घंटा लागैत छलैक। हम सब आगू बढ़लहुं ओकर १५ मिनट केर बाद सs पानि भेनाइ आरम्भ भs गेलैक। विष्णु सिनेमा हॉल सs किछु पहिनहि हम दूनू गोटे पूरा भीजि गेलहुँ। सिनेमा हॉल लग पहुँची इ कहलाह, भीजि गयबे केलहुं,चलू सिनेमा देखि लैत छी तs आपस घर जायब, कपड़ा सिनेमा हॉल में सुखा जायत।
राति में अचानक माथक दर्द आ प्यास सs नींद खुजि गेल, बुझायल जेना हमर देह सेहो गरम अछि। उठि कs पानि पीबि फेर सुति गेलहुँ। भोर में मोन ठीक नहि लागैत छलs मुदा हम किनको सs किछु कहलियैन्ह नहि, भेल कहबैक तs बेकार में सब के चिंता भs जयतैन्ह। मोन बेसी खराब लागल तs जा कs सुति रहलहुं। जखैन्ह आँखि खुजल तs देखैत छी डॉक्टर हमरा सोंझा मे अपन आला लेने ठाढ़ छलथि। हमरा ततेक बुखार छल जे चादरि ओढ़ने रही तथापि कांपति छलहुँ।डॉक्टर की कहलैथ से हम किछु नहि बुझलियैक। हमरा थोर बहुत बुझय मे आयल जे कियो हमर तरवा सहराबति छलथि, आ कियो गोटे पानिक पट्टी दs रहल छलथि , मुदा हम बुखारक चलते आँखि नहि खोलि पाबति छलहुँ, हम बुखार मे करीब करीब बेहोश रही। जखैन्ह हमरा होश आयल आ आँखि खुजल तs प्यास सs हमर ओठ सुखायत छल, मुदा साहस नहि छलs जे उठि कs पानी पिबतहुं। जहिना करवट बदललहुं तs हिनका पर नजरि गेल। हिनका हाथ मे एकटा रुमाल छलैन्ह आ बिना तकिया सुतल छलथि। हमरा इ बुझैत देरी नहि भेल जे इ हमरा रुमाल सs पट्टी दैत दैत सुति रहल रहथि। हमरा हिम्मत तs नहि छल तथापि हम चुप चाप उठि जहिना हिनकर माथ तर तकिया देबय चाहलियय इ उठि गेलाह। हमरा बैसल देखि तुंरत कहि उठलाह अहाँ कियाक उठलहुं अहाँ परल रहु। इ सुनतहि हम फेर तुंरत परि रहलहुं।
भोर मे उठलहुं त कमजोरी तs छलs मुदा बुखार बेसी नहि छल। मौसी सs पता चलल जे चाय पिबय के लेल जखैन्ह मधु उठाबय गेलीह तs हम बुखार सs बेहोश रही। इ देखि तुंरत डॉक्टर के बजायल गेलैक। डॉक्टर के गेलाक बाद बड राति तक माँ आ इ दूनू गोटे बैसल रहथि आ ठंढा पानी सs पट्टी दs बुखार उतारबाक प्रयास मे लागल रहथि। माँ के बाद मे इ सुतय लेल पठा देलथि आ अपने भरि राति जागल रहथि कियाक तs बुखार कम भेलाक बादो हम नींद में बड़ बड़ करैत छलियैक। दोसर दिन सs हमर बुखार कम होमय लागल मुदा हमरा पूर्ण रूप सs ठीक होयबा में एक सप्ताह लागि गेल। हिनका कतबो कहलियैन अहाँ चलि जाऊ, क्लास छूटैत अछि मुदा इ कहलाह, अहाँ ठीक भs जाऊ तखैन्ह हम जायब।
एक सप्ताह इ कतहु नहि गेलाह हमरे कोठरी में बैसि कs अपन पढ़ाई करथि। साँझ में काका लग बैसि कs खूब गप्प होयत छलैन्ह। ओहि एक सप्ताह में काका सेहो हिनका सs बहुत प्रभावित भs गेलथि आ इहो काका के स्वभाव सs परिचित भेलाह। साँझ में परिचित सब हिनका सs भेंट करय लेल आबथि। एहि तरहे पूरा सप्ताह बीमार रहितहुँ हमरा खूब मोन लागल।
आइ भोर सs हमरा एको बेर बुखार नहि भेल। काल्हि भोर मे हिनका मुजफ्फरपुर जयबाक छैन्ह भरि दिन इ हमरा सँग गप्प करैत रहलाह। साँझ मे काका ऑफिस सs अयलाह तs इ हुनका लग बैसि हुनका सs गप्प करय लगलाह आ हम अपन कोठरी मे छलहुँ। माँ मौसी जलखई के ओरिआओन करैत छलिह बाकी भाई बहिन सब बाहर खेलाइत छलैथ। हमरा इ सोचि कs एको रति नीक नहि लागैत छलs जे काल्हि इ चलि जेताह आ ओकर किछु दिनक बाद माँ सेहो चलि जयतीह।
राति मे सुतय काल इ कहलाह भोरे तs हम जा रहल छी मुदा हमर ध्यान अहीं पर ता धरि रहत, जा धरि अहाँक चिट्ठी नही भेंटत जे अहाँ पूरा ठीक भs गेलहुँ अछि। एहि बेर माँ के जाय काल नहि कानब, ओ बड दूर रहति छथि हुनको अहिं पर ध्यान लागल रह्तैन्ह। अहि बेर रोज एकटा कs चिट्ठी अवश्य लिखब, आ हमरा दिस देखैत आ मुस्की दैत कहलाह आब तs अहाँ के चिट्ठी लिखय मे सेहो कोनो तरहक दिक्कत नहि हेबाक चाहि। हमहु हिनकर मुस्कीक जवाब मुस्की सs दs देलियैन्ह।
क्रमशः ......
संबंध- श्यामल सुमन
साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।
वेदना अछि हृदय मे सुनावैत छी।।
साँच जिनगी----------
कहू माता के आँचर मे सुख जे भेटल।
चढ़ैत कोरा जेना सब हमर दुख मेटल।
आय ममता उपेक्षित कियै राति दिन।
सोचि कोठी मे मुँह कय नुकाबैत छी।।
साँच जिनगी----------
खूब बचपन मे खेललहुँ बहिन भाय संग।
प्रेम सँ भीज जाय छल हरएक अंग अंग।
कोना संबंध शोणित के टूटल एखन?
एक दोसर के शोणित बहाबैत छी।।
साँच जिनगी----------
कटत जिनगी सुमन के बगीचे के बीच।
बात घर घर के छी इ सोचब ध्यान सँ।
स्वयं दर्पण स्वयं केँ देखाबैत छी।।
साँच जिनगी----------
Sunday, May 03, 2009
पंचसती - पंचउपसती- आशीष अनचिन्हार
इ कविता समस्त स्त्री लोकनिक स्वतंत्रता के समर्पित छैक। स्त्रीक अस्तित्व कतए छैक से विचार करबाक समय आब आबि गेल छैक। अंठेने कोनो काज नहि होइत छैक। स्त्री ( मैथिलानीक जय हो)। इ कविता दू खंड मे बाँटल गेल अछि। प्रत्येक खंड मे पाँच-पाँच गोट चरित्र लेल गेल अछि। त करू आस्सवादन एहि कविताक।
कविता
पंचसती - पंचउपसती
सती खंड
१
अहिल्या
सूनू गौतम
ओहि भोर जखन अहाँ
चल गेल छलहुँ स्नान करबाक लेल
आ आएल छलाह इन्द्र अहाकँ रूप धए
हमर देहक लेल
ओही क्षण बूझि गेल छलहुँ हम
इ इन्द्र छथि
मुदा इ मोने छैक
सूनू गौतम
हम भासि गेल रही
अहाँक नजरि मे
मुदा
इ अर्धसत्य थिकैक
सत्य त इ थिक
आत्माक सर्मपण आ देहक सर्मपण
दूनू फराक- फराक गप्प छैक
सूनू गौतम
हम आहाँके देहक सर्मपण नहि कए सकलहुँ
अहाँ पाथर बना सकैत छी फेर सँ
आब हमरा रामक पएरक कोनो मोह नहि
सूनू गौतम ध्यान सँ सूनू ॰
२
तारा
इ सत्य थिकैक सुग्रीव जे हम
बालिक कनियाँ छलहुँ
आ
बालिक पश्चात अहाकँ
इहो सत्य छैक
जतबे हम
बालि सँ प्रेम प्रेम करैत छलियैक
ततबे अहुँ सँ करैत छी
मुदा ताहू सँ बेसी इ सत्य छैक
जे
अहाकव मृत्युक पश्चात
हम तेसरोक कनियाँ हेबैक
ओकरो ओतबे प्रेम करबैक जतेक
अहाँ सभ के केलहुँ करैत छी.
आ
इहए चक्र चलैत रहत हमरा संग
त्रेतायुग
सतयुग
द्वापर
आ कलियुग
सभ युग मे ॰
३
मंदोदरी
राज्यक संग-संग
विजेताक
रनिवासक सेहो विस्तार होइत छैक
मुदा एकर इ अर्थ नहि जे हम
विभीषणक कनियाँ भए गेलियैक
हँ
एकर अर्थ जरूर भए सकैत छैक
जे
हमरा
अर्थात मंदोदरी के
ढ़ेप बनेबा मे कोनो कसरि बाँकी नहि छैक
जँ बाँकी होइक
त ओकरो स्वागत छैक हमरा दिस सँ
मुदा
तैओ हम विभीषणक कनियाँ
नहि भए सकैत छियैक
विभीषणक संग
संभोगरत रहितो ॰
४
कुंती
योनि हरदम योनि होइ छैक
चाहे ओ
अक्षत हो वा क्षत
लिंग लग इ ज्ञात करबाक कोनो
साधन नहि छैक जे
योनिक की अवस्था छैक
इ त पुरुषक मोन छैक
जे
योनि के क्षत-अक्षतक खाम्ह मे बान्हि
स्त्री के गुलाम बना लेलकै
कर्ण के त्याग करैत काल मे हमरा लग
लोक लाज छल
मुदा आब नहि
संतान हरदम संतान होइत छैक
चाहे ओ कुमारिक होइक वा बिआहलक
आब लोक लाज भय सँ मुक्त छी हम
मने कुंती
अर्थात
कर्ण आ पांडवक माए
५द्रौपदी
जखन कोनो जीवक
जिनगी
पंचतत्व सँ बनि सकैत छैक
त हमर सोहाग
पंचपति सँ किएक नहि ?
उपसती-खंड
१
सीता
राम विश्वामित्रक संग मिथिला अएलाह। धनुष तोरलाह। हमरा संग बिआह कएलाह।
अयोध्या जा निर्वासित भेलाह। हमहू संग धेलिअन्हि। हमर अपहरण भेल। हम अग्नि-परीक्षा
देलहुँ(अनावश्यक रुपेँ)। अयोध्या अएलहुँ। पुनः हमर निर्वासन भेल ( मजबूरीवश)। धरती फाटल,
हम असमय प्राण त्यागलहुँ।
ने त आब मिथिला अछि ने अयोध्या आ ने रामे । मुदा हम अदौ सँ निर्वासित होइत रहलहुँ । अग्नि-परीक्षा दैत रहलहुँ आ धरती मे घुसि जाइत रहलहुँ। केखनो अनावशयक रुपेँ केखनो मजबूरीवश।॰
२
अनूसूया
नाम थिक हमर अनूसूया
मुदा
एकटा गप्प सँ हमरा असूया होइत रहल
आर्यगण शूद्र स्त्री पर
किएक मोहित होइत रहलाह
घरक स्त्री उपेक्षित
रक्त-शुद्धताक तराजू बनल बैसल
इ बड्ड बादक गप्प थिक जे
आर्य ललना अपन स्त्रीतत्वक
रक्षाक लेल
शूद्र पुरुषक सहारा लेलथि
मुदाहाय रे हमर कपार
हम
महासती त बनि गेलहुँ
मुद स्त्री नहि ॰
३
दमयंती
जंगल मे नल हमरा छोड़ि
पड़ा गेलाह
इ कोनो बड़का गप्प नहि
जखन ओ नाङट रहथि
हम अपन नूआ फाड़ि
हुनक गुप्तांग झाँपल
मुदा इहो कोनो बड़का गप्प नहि
बड़का गप्प त इ छैक जे की
मात्र पुरुषे स्त्रीक इज्जतक रक्षा कए सकैत अछि
स्त्री पुरुषक नहि
जँ नहि
त हम कोना केलियैक ?
४
राधा
अच्छर-कटुआ हमरा
कृष्णक घरवाली बुझैए
साक्षर कुमारि
आ हम राधा
एहि बिआहल आ कुमारि दूनूक अवरुद्ध धारा मे
फसँल
एकटा नारि मुदा अबला नहि
कलियुग जँ कहिओ कदाचित् मुक्त संभोग व्यवहार मे हेतैक
सादर हम स्वागत लेल तैआर रहबै
ओनाहुतो इ जरुरी नहि छैक जे
बिआहक बादे संभोग कएल जाए
आ ने इ जरुरी छैक जे संभोगक बाद बिआह कएल जाए
बिआह आ संभोग मे की संबंध छैक से
विवेचना मिमांसक करताह
मुदा एतबा कहबा मे कोनो संकोच नहि
जकरा संग मोन नहि मानैत हो
ओकरा संगक संभोग
बलात्कार सँ कम नहि ॰
५
गांधारी
हमरा एक सए एक पुत्र छल
अर्थात
लोकक नजरि मे
हमर पति हमरा संग
एक सए एक बेर संभोग कएने हेताह
मुदा हम जनैत छी
ओ संभोग नहि
बलात्कार छल
एहन बलात्कार जाहि मे ने त
स्त्री चिचिआ सकैत अछि
आ ने केकरो कहि सकैत अछि
सुनिगबाक अतिरिक्त
लोक हमरा सती बुझैए एहि लेल
आनहर पतिक संग बनि गेलहुँ आन्हर
मुदा
पट्टी बान्हल हमर आँखि मे
अबैत रहल कतेक रास सपना
इ केओ कोना देखत ?
Saturday, May 02, 2009
कॉलेज देखलक बौआ -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

अपने छी हम मैट्रिक
गरीबीक चक्की मे पिसा क'
फेल भेल हमर बैटरी
चिंता सं हम पेरायल छलहुं
मुदा तइयो भरोस भेल
कॉलेज देखलक बौआ
टिभी केबल छल कटल
घरक राशन छल घटल
बुझि सकै छी, की कहू ?
अभावो कें देखि ओ
फैशनक हिसाबे
कीनलक जींस झमकौआ
किछु दिन कॉलेज क'
बढौलक ओ हिप्पी
अप्पन उमेर देखि
सधलहुं हम चुप्पी
खा गेल ओ हमरो तहिये
जहिया ओकर मोंछ कटलकै नौआ
एकदिन छागुनता लागल
ओकर जेंसक पतलून सं गुटखा बहरायल
बुझय मे आबि गेल
करैत होयत ई कत्ते
नशाक सेवन नुकौआ
घींच-घाचि क' थर्ड ईयर मे अछि
हे उच्चैठक महरानी, अहीं पर लगबियौ
भरोस एक्को रत्ती नहि अछि
मैया अहीं कें गोहरबै छी
जं भेल ई पास त'
चढायब छागर हम जौआ
खर्चक पहाड़ सं देलक ई नमरा
बेचीं घरारी आ की बेचीं हम डबरा
कर्जो नहि भेटै छै , कहियौ हम ककरा
ई त' कुपात्र भेल, ठेस लागल हमरा
एकरा सं किछु छुटल नहि छै
कए खेप ई चिखने होयत पौआ
फैशन सं लैस भ'
जेबी मे किछु कैश ल'
चलैए अनबिसेख एना
हो शाहरुख़ , सलमान जेना
आब ने उजियाएत ई
हमर मोन भेल कौआ
आब हम नियारल
बियाह करा दी एकर
घट्टक अबैए ढेर -ढाकी
कनिया हम चिक्कन ताकी
दिन-दुनिया ठीक करबा वास्ते
दहेज़ लेबै मोटकौआ
Blog : http://www.rkjteoth.blogspot.com/
बहुत गलत बात अछि --

हम आए से कुछ दिन पहिने एकटा रचना '' '' बहुत महत्त्व अछि ""
से पाठक गन के सामने उपस्थित केने रही , एकटा फेर छोट छीन
शब्द कोष डिक्सनरी से लके हम आय मैथिल और मिथिला में पुनः
"" बहुत गलत बात अछि "" से लके पाठक गन के सामने हाजिर छि ,
प्रेम सं कहू जय मैथिल जय मिथिला ---
"" बहुत गलत बात अछि ""
दूध में पैन के , दुश्मनी में आईंन के , गाम में डैन के ,
बहुत गलत बात अछि --------
बर्बाद करै में मुस के , नोकरी मे घुस के , बनिया में मखीचूस के ,
बहुत गलत बात अछि --------
भाई में बैमान के , कर्म में अभिमान के , मनुष्य में सैतान के ,
बहुत गलत बात अछि --------
नशा में दारू के , आदमी में भारू के , मिया - बीबी संग झारू के ,
बहुत गलत बात अछि --------
मेला में जेवर के , डैविटिज में मिठाई घेवर के , बदमाशी में देवर के ,
बहुत गलत बात अछि --------
पूजा -पाट बिना पीपल के ,श्रधकर्म बिना पीतल के , बरी -भात बिना जूरी शीतल के ,
बहुत - गलत बात अछि ---------------
नारी गर्दन बिना अठन्नी के, समान बेचनाय बिना पन्नी के , पेंटिंग बिना मधुबनी के ,
बहुत - गलत बात अछि ---------------
डिगरी बिना ईग्न्नु के , खिसा -पिहानी बिना गन्नू के , लेन - देन में भीख मग्न्नु के
बहुत - गलत बात अछि ---------------
आदमी में दुराचारी के , फल में मह्कारी के , इंडिया में बेरोजगारी के ,
बहुत गलत बात अछि --------
समाज में काम चोर के , आदमी में सुईद खोर के , लराई में लातखोर के ,
बहुत गलत बात अछि --------
ब्यबसय में मन मर्जी के , सिग्नेचर में फर्जी के , फोज में बिना बर्दी के ,
बहुत गलत बात अछि --------
बस में जेब कत्तर के , हर बात में अक्तर के , गंदगी में बत्तर के ,
बहुत गलत बात अछि --------
सरक पर भीख माँगा के , सहर में लफंगा के , शरीर में बिना अंगा के
बहुत गलत बात अछि --------
चलें में मटकैत के , जंगली एरिया में डकैत के , गाम में लठैत ,
बहुत गलत बात अछि --------
नशा में सिकरेट के , हर बात में डारेकट के , आदत में क्रिकेट के ,
बहुत गलत बात अछि --------
इंडिया में बिना टेक्स के , दफ्तर में बिना फेक्स के , फॉरनर में सेक्स के ,
बहुत गलत बात अछि --------
विराद्धा अबस्था में बिना लाठी के , चिता पर बिना काठी के , सीरियल में बिना मराठी के ,
बहुत गलत बात अछि -----
शरक पर क्च्चरा के , बारादरी में झगरा के , कागज - पत्तर में लफरा के ,
बहुत गलत बात अछि -----
गाम में बिना भोज के , मजदूरी में बिना रोज के , साइंस में बिना खोज के ,
बहुत गलत बात अछि -----
यात्रा बिना मंगल के , प्रोग्राम बिना दंगल के , व्रत में अंजल के ,
बहुत गलत बात अछि -----
विदियार्थी बिना मास्टर के , हॉस्पिटल बिना डाक्टर के , फिल्म बिना डारेक्टर के ,
बहुत गलत बात अछि -----
उग्रवादी बिना तालिवान के , कुस्ती बिना पहलवान के , अतिथि के बिना जलपान के,
बहुत गलत बात अछि -----
मनोरंजन बिना खेल के , बिजनेस बिना सेल के , कैदी बिना जेल के ,
बहुत गलत बात अछि -----
रेड लाइट बिना अक्सिडेंट के , हॉस्पिटल बिना पेशेंट के , दाँत बिना पेप्सोडेंट के ,
बहुत गलत बात अछि -----
जनौऊ संस्कार बिना बरुवा के , मैथिल भोजन करेनाय बिना तरुवा के , आराम केनाय बिना गेरुवा के ,
बहुत गलत बात अछि ---------
अध्ययन बिना कम्पूटर के , पंखा बिना रेगुलेटर के , नियूज बिना प्रेशरिपोटर के ,
बहुत गलत बात अछि ---------
भगवन पूजा बिना माला के , घर छोरी बिना ताला के , सासुर जेनाय बिना साला के ,
बहुत गलत बात अछि ---------
शहर में बिना लाइट के , लराई में बिना फाइट के , जींस पेंट बिना टाईट के ,
बहुत गलत बात अछि -----
नागरिकता बिना मतदान के , जिनगी बिना कन्यादान के , परोपकर बिना रक्तदान के ,
बहुत गलत बात अछि -----------
महाभारत में शोक्न्नी के , शहर में बिना पत्त्नी के , आ रचना में बिना टिप्पणी के ,
बहुत गलत बात अछि -----
पट्टीटोल , भैरव स्थान , झंझारपुर ,मधुबनी , बिहार - ८४७४०४
Mo - 9312460150 ,E-mai - madanjagdamba@yahoo.com
अन्हरिया- कांचीनाथ झा ‘किरण’
की रविकर प्रहार पीड़ित धराक
निवास धूम भरि रहल व्योम?
की रविपतिक अस्त
लखि, भयें त्रास्त
ल’ तिमिर चीर
झाँपल शरीर
अवनी अनाथिनी
की रवि दूर गेल
शशि अन्ध भेल
बुझि, अन्धकार
पटकेर ओहार
लगा, व्योम संग विहार
करैत अछि वसुधा भ’ एकाकार?
की कारी कोसी अछि उत्फाल भेल
तकरे जलसँ करैछ
भू-नभकें एकाकार?
की निसि रमैत अछि कलिक संग
तें भेल एकर अछि कृष्ण रंग?
झड़ैत खुदिया खद्योत भास
उड़ैत चमकी उडुगण प्रकास?
मानव समाजमे वर्ण भेद
सुरुहेसँ अनलक अहंकार
करैत आएल अछि अनाचार अत्याचार
तेंॅ तकरा मेटबै लेल
दलित उपेक्षित मानव जातिक हृदय-वह्नि गिरिसँ
समुभूत तामस तमोपुंज
बढ़ि रहल भरैत अम्बर दिगदिगन्त?
की कांग्रेसी शासनगत अनाचार
अन्धकार बनि अछि व्यक्त भेल?
की अणुबमक पहाड़
देखि मानव जातिक भविष्य
साकार थिक ई अन्धकार?
माँ मिथिला ताकय संतान- दयाकान्त
माँ मिथिला ताकय संतान
ससरी गेल कतेको टाट
खसि परल कतेको ठाठ
नहि अछि कतहु पर्दा टाट
नहि राखल दलान पर खाट
कतेको घर साँझ-प्रात सं बंचित
कतेको घर ताला सं संचित
जतय रहै छल जमाल दलान
आई बाबा बिन सुन्न दलान
माँ मिथिला ताकय संतान
सगर देश मे भय रहल पलायन
मिथिला सन नहि दोसर ठाम
बी०ए०, एम०ए० घर बैसी के
कहिया धरि देता इम्तिहान
जीबिकाक नहि बचल कोनो साधन
नहि रोजगारक कोनो ठेकान
गाम बैसी करता की बैउया
कोना बचेता घरक प्राण
माँ मिथिला ताकय संतान
पढ़ल लिखल बौक बनल अछि
धुरफंदी सब मौज करैत अछि
एक आध जे पोस्ट निकलैत अछि
भाई-भतीजा छापि लैत अछि
सबतरि बन्दर बाँट मचल अछि
कोनो विभाग नहि आई बांचल अछि
बिना पाई कियो बात नहि करताह
कतेक सहत सज्जन अपमान
माँ मिथिला ताकय संतान
हमर बुद्धि-विवेकक लोहा
देशे नहि विदेशो मानैया
हमर मेहनत-लग्नक वल पर
आई कियो बाबु कह्बैया
हमर उन्नति देखि के आई
सब प्रांत हमरा सं जरैया
करितहु प्रतिभाक सदुपयोग
रहिता जँ मिथिलामे ओरियान
माँ मिथिला ताकय संतान
दयाकान्त
Friday, May 01, 2009
सृजन- अंतिम खेप- सतीश चन्द्र झा
Thursday, April 30, 2009
घसल अठन्नी- काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’
जेठक दुपहरि
बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला
आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि
पछबा प्रचण्ड
बिरड़ो उदण्ड
सन सन सन सन
छन छन छन छन
आगिक कण सन
सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल।
खोंतामे पक्षी संच मंच
हिलबए न पाँखि
खोलए न आँखि
तरुतर पशु हाँफै सजल नयन
चरबाह भागि घर गेल विमन
इनहोर बनल पोखरीक पानि
जलचर-थलचर काँपए थर थर
टाटी, फड़की, खिड़की, केवाड़ लागल घर-घर
ई अग्निवृष्टि!
नहि कतउ बाटमे बटोहीक हो एखन दृष्टि
संहार करत की प्रकृति सृष्टि-
ई अग्निवृष्टि!
श्री मान लोकनि
जे तुन्दिल बनि
मसलंगमे ओंगठल
शरबत छनि-मिसरी बदाम बरफें घोरल
नर्तित बिजुली पंखा तर छथि
सेहो अशान्त बाजथि हरि! हरि!!
की कथा सजीवक
छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि
जेठक दुपहरि!
ई समय यदपि
बुचनी घर आँगन छोड़ि तदपि
गिरहस्थक कोड़ए खेत एखन
की करति बेचारी!
आठ पहर दुर्दैवक डाँगें अछि पीटलि
विधवा परिवारहीन बिलटलि
छौ मासक एके टा बच्चा
भाविक सम्बल
जे कानि रहल छै धूर उपर
परिबोध कोना क’ करति तकर?
शोणितोक आब नहि छैक शेष
पुनि दूधक हएत कोना सम्भव?
सहि तीनि सांँझ ई आइ आएल
बनि मजदुरनी अठ अन्नी पर
सूर्योदयसँ सूर्यास्त तक्क
करतैक काज
नहि पनिपिआइयो पाबि सकति!
सन्ध्याक समय
संसार अभय
उगि चान सदय
शीतल ज्योत्सनासँ कएल मुदित ब्रह्माण्ड सकल
नेरूक हित दौड़लि हुँकरि गाय
टुन-टुन-टुन-टुन
टन-टन-टन-टन
घण्टीक शब्द
घर-घरसँ बाहर भेल धूम
तैयो भूखलि-प्यासलि बुचनी
आँचल तर झपने पुत्रा अपन
कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन
हड्डी जागल
सौन्दर्य गरीबीसँ दागल
भूखक ज्वालासँ जरक डरें
तारुण्य जकर अबितहिं भागल
पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल
पीयर ओ दूबर-पातर तन
फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर
आमक फाड़ा सन नयन
खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर
चिन्ता-चुड़ैल केर चढ़ल कोर
झरकाइ रहल छै आंग जकर
प्रतिपल हा! आशा बनि अंगोर
दे कने अन्न-जल प्राण जकर
अछि बाजि रहल छलसँ नोरक,
से बनि कातरि
कहुना क’ डरि
कर जोरि कहल:
ओ घसल अठन्नी चलि न सकल
हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि
छी आबि रहलि
करु कृपा अठन्नी द’ दोसर
एसकरुआ हम
भ’ गेल राति
गिरहत, न आब देरी लगाउ
भूखें-प्यासें हम छी मरैत
लेबै बेसाह
कूटब-पीसब
बच्चा भोरेसँ कानि-कानि
छट-पट करैत अछि जान लैत।
ई फेर आएल भुकब’ कपार
कहुँ असल अठन्नी अदलि-बदलि
क’ रहलि चलाकी साफ-साफ
रौ! ठोंठ पकड़ि क’ कर न कात
ई डाइनि अछि
देखही न आँखि
अछि गुड़रि रहलि
अबिताहिं बुधना सन स्वामीकें
चट चिबा गेलि
लक्ष्मीक बेरिमे महाजनी
अछि चुका रहल
क्यो अछि नहि ?
एहन अलच्छीकें क’ देत कात ?
मालिक!
हम कर्ज न छी मँगैत
अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु
उपजले बोनि टा देल जाए
हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत
कै बेरि एलउँ
टुटि गेल टाँग
अन्नक मारल अछि हमर आँग
जरलहा दैव मरनो न दैछ
की समय भेल
हा! देह तोड़ि क’ कएल काज
सुपथो न बोनि अछि भेटि रहल
तें जगमे ई पड़लै अकाल
उठबितहिं डेग लागए अन्हार
मरि जाएब एतइ
ककरा कहबै?
हित क्यो ने हमर
अनुचितो पैघ जनकें शोभा
भगवान! आह!
गै छौक न डर?
कै खून पचैलनि ई बण्डा
रोइयों न भंग
युग-युग दारोगाजी जीबथु
क’ देबौ खून
गै भाग भाग
बनिहारकें द’ क’ उचित बोनि
कुलमे लगाएब की हमहिं दाग?
ई अपन भभटपन आनक लग
तों देखा
थिकहुँ हम काल नाग
ई ओना जाएत?
यम माथ उपर छै नाचि रहल
रौ, की तकैत छें मूँह हमर
छोटका लोकौक एते ठेसी?
चट-चट-चट-चट
कुलिशहँुसँ कर्कश भीमकाय
मखनाक चाटसँ निस्सहाय
भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत
भ’ गेलि बेहोश
तैयो सरोष
क’ बज्रनाद
भुटकुनबाबू उठलाह गरजि:
मखना! मखना!
केलकौक भगल
ला बेंत हमर
नारिक चरित्रा तों की बुझबें?
जीवने बितौलहुँ ऐ सबमे।
दन-दन-दन-दन
मूचर््िछतो देह पर बेंत वृष्टि
बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन
शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि!
सविषाद हासमे चन्द्रमाक
ओ घसल अठन्नी बाजि उठल:
हम कत’ जाउ
अवलम्ब पाउ
के शरण?
घसल जनिकर अदृष्टि!
Wednesday, April 29, 2009
नेताजी के हाल (कविता)-मनीष झा "बौआभाई"
चम-चम धोती चम-चम कुर्ता
देल लील आ टिनोपाल
हाथ जोडि क' हाज़िर भेला
पुरितहि पाँचम साल
प्रथम निवेदन केलन्हि वृद्ध स'
अपनेंक आशीर्वाद हम लेमय एलहुँ
मोन स'दियौ ओहिना जहिना
पहिल चुनाव में देने छलहुँ
सुनि एतबहि गप्प बाबा कुदलाह
भेलाह आगि बबुल्ला
तमाकुलक सिट्ठी मुहँ स' फेकैत
उगलय लगलाह विषगुल्ला
हाथ जोडै छ'?की छल करै छ'?
ऐँ हौ!लाज नै होई छ' गत्तर में
पाँच साल धरि घुरि नै एलह
जे गेलौं कोन निखत्तर में
बाबाक क्रोध देखि सब ससरल आयल
भेल एकत्रित संपूर्ण समाज
तरे-तर विचारल सब केयो
आउ एकजुट भय उठाबी आवाज़
हमरा लोकनि मताधिकार बूझि क'
दै छी अहींके वोंट
हम सब कछ्छर काटि रहल छी
आ अहाँ छपै छी नोंट
बंगला, गाड़ी सब सरकारी
खूब करै छी भोग विलास
बाढि सुखार स'त्रस्त हम जनता
आब की करब कप्पार विकास
मतदान करक हम करबे करब
ओ थिक हम्मर फ़र्ज़
अहाँ ज' दल बदलि सकै छी त'
हमरा नेता बदल' में की हर्ज़
हमरा चाही हमर अधिकार तैं
सूझ-बूझ स' करब मतदान
मूर्ख, गँवार बूझि बड़ दिन ठकलहुँ
जुनि बूझू आब ककरो अज्ञान
नेताजी गुम्मे रहि गेला
प्रतिक्रया सुनि हक्का-बक्का
आब कोना संबोधित करता
कियो ने भैया कियो ने कक्का
जनता केर आक्रोश देखि क'
मूडी गोंतने ससरल चललाह
कमेन्ट पठाउ "मनीषक" रचना पर
ज' नै लागय गप्प अधलाह
मनीष झा "बौआभाई"
http://jhamanish4u.blogspot.
Monday, April 27, 2009
कहिया धरि- कविता- रमानन्द रेणु
एकटा-चादरि ओढै़ छी
हमरा सभ
आ नेरा दै छी
आ दोसर चादरि ओढ़ि लै छी
सभ दिनसँ
बर्खक चादरि ओढ़ि
आइयो
समयक प्रवाहमे
अपन नाह खेबने जा रहल छी
जखन ओढ़ल चादरि नेरबै छी
तँ देखै छी
अपन देह
सर्वत्रा लुधकल घोड़न सदृश असंख्य जन्तु
चाहियो क’ नोचि नहि
फेकि पबै छी
आ पीड़ा सहैत हमरा सभ
दोसर चादरि ओढ़ि
अपनाकें नुका लै छी
पूर्ववत्।
हमर नैतिक मूल्य
हमर आस्था
हमर आचरण
एक्के संग सभ किछु भ’ गेल अछि खाक
आ मनुष्यताक गरदनिमे
बान्हल दोष/ बेनिहाइत
पिटने जा रहल छी/ अनवरत।
चादरि तँ एहिना बदलैत रहत
आ हमरा सभ एहिना देखैत रहब
किन्तु
कहिया धरि
हमरा सभ माँसु एना गलबैत रहब
कहिया धरि? ... कहिया धरि? ...
कथा- कालरात्रिश्च दारुणा- साकेतानन्द.
“ कानू नंइ त’ की करू यौ ? घर देने धार बहैयै...अहां कहै छी कानू नंहि ?” बंटू झाक हाथ मे एकटा हरवाही पैना रहनि. दू टा जोडल चौंकी, जाहि पर दुनू गोटे बैसल छला, तै पर स’ हाथ लटका क’ पैना पानि मे देलखिन ! कत्तौ नंहि ठेकलनि. ” सांझ स’ डेढ फीट बढि गेलै! निचला चौंकी बुझू डूबि गेल !” ” दैब हौ दैब ! आब हम कोन उपाय करबै ?” ओ विलाप कर’ लगै छथि. घौना करैत बांधक ठीकेदार, इंजीनियर के सराप’ लगै छथिन. बंटूझा नंहि रोकै छथिन. रोकैक आब एकदम इच्छा नंहि छनि.हुनकर पत्नी; बरसाम बालीक घौना आ अई कोठली, ओई कोठली देने बहैत कोसीक कलकल, एकटा अद्भुत स्वर_ श्रृष्टि क’ रहल छलै. जं’ जं’ सांझ गहराय लागल छलै___तौं_तौं कोसीक हाहाकार बढ’ लागल छलै. एत्ते तक जे बगल मे बैसल पत्नी स’ आब चिकडि क़’ गप्प’ कर’ पडै छलनि. ओ कानिये रहल छली__ ” कत्त’ पडेलें रे ठीकेदरबा सब ? कत्त’ छ’ हौ सरकार साहेब ? बान्ह तोडबाक छलौ त’ कहितें ने रे डकूबा सब...पडा क’ चल जैतौं डिल्ली ! अपन बौआ लग चल जैतौं...कहिते किने रे ... आब के बचेलकै हमरा सब के रौ दैब ?” ओ बच्चा सब जेकां भोकाडि पाडि क’ कान’ लागल रहथि. “ आइ तेसर राति छियै... आब की हेतै रौ दैब !” ” हे, कहने रही ने, कनै छी त’ मोन सुन्न भ’ जाइये.” ” कियैक ने भागि क’ वीरपुर चल गेलौं, किछु छियै त’ शहर छियै; ओइ ठाम स’ कत्तौ भागि सकै छलौं...माथपर कोन गिरगिटिया सवार भ’ गेल रहय यौ...गाम स’ कैक बेर ट्रैक्टर गेलै.” हुनका ई नहि बूझल छलनि जे वीरपुर आब वैह रहलै ? ओ आब सुन्न, मसान, भकोभन्न भ’ गेल छै. ओहि ठाम भरि छाती पानि बहि रहल छै. सब किछु के उपर देने, सब किछु के चपोडंड करैत कोसी बहि रहल छै. ओत्तुक्का लोक ? ओत्ते टा कस्बाक ओत्ते लोक कत’ गेलै ? कत’ गेल हेतै लोक सब हौ भोलेनाथ ? बंटूझा के किछु नहि बूझल छनि, किछु नहि. लोक त’ बेर पडला पर चिडैयो स’ बेसी उडान भरि सकैये...मखानक लाबा जकां छिडिया सकैये, देश्_विदेश पडा सकैत अछि.वीरपुर मे आब ध्वंस हेबाक प्रक्रिया मे सब किछु छै.
अही बीच लक्ष केलखिन त’ पत्नीक कपसनाइ बन्द बुझेलनि. शाइत सुति रहली की...जं सूति रहल होथि..त’ हुनका नल राज जकां छोडि क’ गेल हेतनि ? छिः छिः की सोचि रहल छथि ओ ? मुदा बात मोन मे घुमडैत रहै छनि जे ई नंहि रहितथि त’ बंटूझा के पडाइक कैक टा बाट रहनि. अगल_बगलक कैकटा उंच स्थान सब मोन पडलनि...नेपाले भागि जैतथि. डेढ_दू किलोमीटर दूर परहक कैक टा ऊंच डीह सब मोनमे चमकि उठलनि. असकर रहितथि त’ कैक टा उपाय रहै... तैं तीन दिन स’ यैह चौंकी भरि सुखायल स्थान पर लटकल छथि दुनू व्यक्ति ! सत्ते माया चंडाल होई छै. मुदा ककरो की पता रहै जे एत्ते भरबा क’ ऊंच पर बनल घरक ई गति हेतै ! हे एकरा क्यो बाढिक पानि नहि कहै जेबै कहियो, ई प्रलयक प्रबल प्रवाह छियै, बलौं स’ बान्हल बान्ह तोडि क’ निकलल पानि छियै कोसिक, सब के रिद्द_छिद्द कइयेक’ छोडतै, बेरबाद क’ देतै सबके, अइ बेर नहि छोडतै. बंटूझा के साफ
लागि रहल छलै जे कोसी अइ बेर नहि मानतै, बदला लइयेक’ रहतै .
“ सुनै छियै, कत्ती राति भेल हतै ? भूख नहि लागल अछि ?” ”लागल त’ अछि, त’ देब खाइलय ?” हुनकर स्वर खौंझायल रहनि, जेना चैलेंज क’ रहल होथिन. ” कने ज’ साहस करी, त’ भंसाघरक ताख पर चाउरक टिन धैल छै, ताख डूबल छै की ?” ”ओह, चुप रहूने, जँ नहियो डूबल छै त’ भंसाघर गेल हेतै, अइ अन्हार रातिमे जखन घर देने कोसी बहि रहल हो...” ”घर कहाँ रहलै यौ, अपन घर देने त’ कोसी बहैये आब.” ”बीच नदी मे यै ?” ”हँ यौ, नदीक गुंगुएनाइ नहि सुनै छियै ?” ”सब सुनै छियै, तखन कहै छी जाइ लए ?” ”चाउरक टिन ज’ नहि आनब... आइ तेसर दिन छियै. टिन टा आबि जाय ने कोनो तरहे, दैब हौ दैब !
वेगो बढल जा रहल छै... एहन ठोसगर पक्को घर के तोडि सकयै कोसी ?” ”किछु घंटा लगतै ओकरा, डीह पर घर नहि सौ दू सै ट्रक राबिश पडल रहत.” ई कहि ओ चुप भ’ गेला. दुनू वेकती बडी काल तक चुप छला. ”अच्छा, नहि आनब त’ खायब की ?”
“अहीं उतरू ने.” ”नै हौ बाप, वेग देखै छियै ? हम त’ एक्के डेग मे लटपटा_सटपटा क’ चपोडंड.... देखियौ, दरबज्जे_दरबज्जे, कोठलिये_कोठलिये कोना खलखला क’ बहि रहल छै !” ”नै उतरब त’ दुनु गोटे भूखे मरब!” ”मरि जायब, अही कोसी मे भांसि जायब! भांसि क’ कोपरिया कुर्सेला मे लहास लागत...गिध्ध_कौआ खायत!!”
“ओह, चुप रहू ने!” बंटूझा बडी कालक बाद चौंकी आ छतक बीच हवा के संबोधित करैत बजला_” आइ तेसर दिन छियै ! आइ तक पटनां_डिल्ली के हमरा सबहक सुधि नहि एलै ?”
“अहूं त’ हद करै छी...अहि बोह मे बौआ अबिते हमरा सबके बचबैलय ?” हुनका दिल्ली सुनिते अपन बेटा टा मोन पडै छनि, आर किछु नहि.सत्ते, हुनका लोकनि सनक हजार_दस हजार नहि लाखों लोक, आइ तीन__दिन स’ फंसल अछि, एकर खबरि ककरो नहि लगलैयै ? एहनो कत्तौ होई ? ओ जेना पत्नीक बात नहि सुनने होथि, भोर मे आंटा सानि क’ ओकर गोली खेने रहथि. आइ, तेसर बेर राति गहरा रहल छनि. हिनका दुनू व्यक्तिक अतिरिक्त कोनो चिडियो_चुनमुनीक आवाज़ कहां सुनै छियै ? एखन त’ कुसहा मे बान्ह तोडि क’ बहैत कोसियेक आवाज़ छै चारू भर...बान्ह, छहर, नहर, सडक, रेल, गाछी_बिरछी के मटियामेट करबाक स्वर ! सब किछु के ध्वस्त करबाक घुमडल मौन स्वर__गडर_गडर_गडर...ह’ ह’ ह’..हहा_हहा_हहा; विजयिनी कोसीक अट्टहास स’ हिनका दुनूक कान तीन दिन तीन राति स’ बहीर भेल छनि ! …मोबाइल. इंटरनेटक युगमे तीन दिन बीत गेल आ क्यो सुधि लै बला नंहि ? ..... काल्हि तक त’ दुनू व्यक्ति छत पर चादरि टांगि क’ रहथि . जखन सोपाने बरिस’ लगलनि, आ ओत्ते मेहनति स’ उपर आनल सब वस्तु जात भीज’ लगलनि; अपनो दुनू गोटे सनगिद्द भ’ गेला त’ भगि क’ कोठली मे एला त’ अपन कोठरी मे भरि जांघ रहनि.. चौंकिक ऊपर चौंकी धयलनि; त’ तखन स’ ओही पर बैसल छथि. आब त’ निचला चौंकी डूब’ लागल छलनि ! “दैब रौ दैब ! काल्हि मंचेनमाक नाव के की हाल भेलै हौ दैब...सत्तरि अस्सी गोटे, बाले बच्चा व्मिला क’ हेतै, नाव पलटिते कोना हाक्रोश करैत बेरा_बेरी डुबैत....हौ दैब, कोना हाथ उठाउठा जान बचेबाक गोहारि करैत रहै यौ !” ओ पुक्का फाडि क नेना सब जेकां कान’ लगली. पानिक हहास मे हुनकर रुदन बडा भयौन लगैत रहै. ” जुनि मोन पाडू यै... असहाय लोकके डुबबाक दृष्य नहि मोन पाडू !” ”मोन होति रहय ओत्तेटा कोनो रस्सा रहिते की आने कोनो ओत्तेटा वस्तु__त’ फेक दितियै...मुदा किछु नहि क’ भेल... ओत्ते लोक चल गेलै आ जा रहल छै, से छै ककरो परवाहि...बज्जर खसतौ रे पपियाहा सरकार बज्जर !” ”यै ई कयैक ने सोचै छी जे हमरा सब जीविते छी, जं मंचेनमाक नाव पर हमरो सब चढि गेल रहितौं त’ आइ कोन गति भेल रहिते ? अपना सब नहि चढलहुं त’ प्राण बांचि गेल ने !” ”देखैत रहियै, लोक कोना छटपटाइत रहै...? छत पर स’ त’ स्पष्ट देखाइ पडैत रहै!” ”सब टा देखैत रहियै ! बगल मे चुनौटी हैत दिय” त’ !” ”कत्ते खैनी खायब ?” ”भूख लागल यै.” ”तैं त’ कहैत रही... कनी साहस करू. भंसाघर मे घुसिते, सामने ताख पर चाउरक टिन छै; बगल मे नोनो छै.” ”अहां आयब पीठ पर ?” ”नै यौ, हमरा बड डर लगैये. हे ओ भीतर बला चौकठि के देखियौ त’... देवाल छोडने जाइ छै ?” ”हँ यै बरसामबाली! ई त’ देवाल छोडि देलक.” ”त’ आब घर खसतै की यौ ?” ..चुप्पी, संगहिं नदीक हहास! पानि मे कोनो जीव के कुदबाक छपाक ध्वनि ! ने त’ सगरे पसरल पानि... तै पर अन्धकार. ”किछु बजै कियैक ने छी ? सुनू , आब हमरो बड्ड भूख लागि गेल अछि...” ”देखै छियै, करेंट स’ आब चौंकीक पौआ सब दलकै छै; एखनो हम चाउरक टिन आनि सकैत छी. आयब हमर पीठ पर, उतरी हम ?” फेर चुप्पी. दुनू चुप छथि. बीच मे वैह अलगटेंट हरजाइ बाजि रहल अछि__कोसी बाजि नहि डिकरि रहल अछि !
“ठीक छै, हम उतरै छी...आब जे हुए, आब नहि सहल जाइये...!” ”नै यौ! हम अहांके ऐ अन्हार राति मे पानि मे नहि पैस’ देब. सांझ मे ओ सांप के देखने रहियै...मोन अछि कि नहि ?” ”ओ एत्तै हेतै ? नहि हम उतरै छी, किछु भेल हुए, आखिर अपने घर ने छियै यै ?” ”उतरबै ?”कहि बरसामबाली कनी काल चुप भ’ जाइ छथि; फेर कहै छथिन__”बुझलौं यौ, मोन होइयै गरम_गरम चाह पिबितौं; एकदम भफाइत.” “अच्छा, कत्ते राति भेल हेतै ?” ”देवाल पर घडी त’ लटकले छै, देखियौ ने.” ”एंह, ओहो साला बन्द भ गेल छै.” ”ठहरू, कने पानि के देखियै ! अरौ तोरी के, निचला चौंकी त’ डूबल बरसामबाली.” ”हे यौ, कने एम्हर आउ, हमरा डर लागि रहल अछि. हमरा लग आउ ने.” ”छीहे त’ ?” ”नै हमर लग आउ सब चिंता_फिकिर बिसरि क’ दुनू गोटे सूति रही. जे हेतै से परात देखल जेतै.!” ”भने कहै छी, दलकैत चौंकी आ भसकैत घर मे निश्चिंत भ’ क’ सुतै लए कहै छी...नीचा कोसी बहि रहल अछि ! भने कहैत छी.” ”खिडकी स’ देखियौ, भोरुकवा उगलै ? घडियो जरलाहा के बन्द भ’ गेलै....” ”कथी लए कचकचाइ छी, ई कालरात्रि छियै, अइ मे क्यो ने बचत...” ”ठीके कहै छियै यौ; ऐ बेर क्यो ने बचतै.” ”मारू गोली. जत्ते बजबाक हेतै, बाजल हेतै. सुनै छियै?सुति रहलियै ?” ”धुर जो, एहन परलय मे पल लगतै ? हम कहैत रही डिल्ली ठीक छै ने ? ओकरा खबरि भेल हेतै ? ओत्त’ बौआ अंगुनाइत हेतै...हे अइ बेर नहि अनठबियौ, अगिला सुद्ध मे करा दियौ. नहि करब आड्वाल; नहि गनायब. मुदा पुतहु चाही हमरा पढलि_लिखलि. एकदम स्मार्ट, अपन बौए जेकां.” बंटूझा के लगलनि जे एहन समय आ ताहि मे बियाहक गप, जरूर हिनकर दिमाग भांसि रहल छनि. कल्हुका भोर देखती की नहि तकर ठेकाने ने, चलली है बेटाक बियाह नेयार करै लए.मुदा बरसामबालीक त’ टाइम पास रहनि__बेटाक बियाहक प्लैन बनायब. हुनको मोन भेलनि जे ओ कथाक मादे कहथिन जे हाले मे यार अनने रहथिन. मुदा ओ चौंकी आ छतक दूरी के एकटक देखैत रहला. पानिक स्वर हुनकर कान के बहीर बना रहल छलनित त’ माथ मे कोनो धुंध, कोनो धुआं सन भरल बुझाइ छलनि. बरसामबालीक बुद्धि ठीके भांसि गेल छलनि, नहि त’ एहन मे बेटाक बियाहक नेयार करब ! ”से चाहे जे हुए, पुतहु हमरा सुन्नरि आ पढल चाही.” ”अहां के बड्ड भूख लागि रहल अछि की ?” ”हं यौ !” ”सुनू, अहां घबडायब नहि ! हम यैह चाउरक टिन नेने अबै छी ! ”नै जाउ यौ...नै उतरू यौ...नै जाउ यौ !”बरसामबाली अनघोल करिते रहली, जाबे तक हुनकर मुंह मे गर्दा नहि उडियाय लगलनि. मुदा बंटूझा फेर कोनो उतारा नहि देलखिन.
Help Alexa Learn Maithili
Helping Alexa Learn Maithili: Cleo Skill: Amazon has a skill called "Cleo" that allows users to teach Alexa local Indian lang...
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"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
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जेठक दुपहरि बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि पछबा प्रचण्ड बिरड़ो उदण्ड सन सन सन सन...
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उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...