भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Monday, February 18, 2008

आस्था या अंधविश्वास

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

करेड़ी वाली माँ

जिनकर मूर्ति स निकले छैन अमृतधारा ....
आस्था आर अंधविश्वास के इ कड़ी म हम आहा के बिच पैन निकले के चमत्कारक चर्चा करब ! जी हाँ, मध्य प्रदेश के शाजापुर जिला स आठ किलोमीटर दूर स्थित करेड़ी गाम म देवी माँ के मूर्ति स लगातार पैन निकैल रहलैन य ! ग्राम वासि के मानब छैन की इ पैन नै अमृत छिये ! हमर किछ दोस्त लोकेन के मुलाकात ओई गाम के सरपंच इन्द्र सिंह स भेलेंन ओ बतेलखिन जे माँ के मूर्ति बहुत प्राचीन छैन ! सरपंच के दावा एता तक छैन कि ओ मूर्ति महाभारत कालीन छिये ! हुनकर कहब छैन कि मूर्ति आराध्य देवी कर्णावती के छियेंन ! कहल्खिन जे माँ कर्णावती दानवीर कर्ण क रोज सौ (१००) मन सोना दैत रहथिन ! जकरा कर्ण प्रजा के भलाई के लेल दान करेत रहथिन ! ओई गामक लोक के कहब छैन कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य सेहो माँ के भक्त रहथिन ! आई कैल इ मंदिर क गाम के नाम स करेड़ी वाली माता के मंदिर कहल जै छैन ! जखन मूर्ति आर पैन के बबाद पूछताछ करल गेलेंन त चंदर सिंह (मास्टर जी) कहल्खिन कि किछ दिन पहिने माँ के मूर्ति स एकाएक पैन निकले लगलैन ! पहिने सभक मानब रहैंन की पैन मूर्ति के स्नान के समय भैर जैत छले जे बाद म निकले छैन, सब मिल क ओई जगह क साफ करलाखिन जै जगह पैन भैर जैत रहे ! मुदा देखल गेल की माँ के बांह के पास बनल एक छेद स वापस पैन भैर गेल ! बहुत बेर पैन साफ करल गेलेंन मुदा दुबारा किछ समय म भैर जैत छालेंन ! तखने स पूरा गाम वासी के कहबाक छैन की ओ पैन नै माँ के प्रसाद माँ के अमृत छिये ! बाद म मंदिर के अन्दर पहुच के देखल गेल की मंदिर के बहार एक बावड़ी (गढा) अछि ओहीठा माँ के मूर्ति के पास बनल एक छेद म पैन भरल अछि ! मंदिर के पुजारी कहलाखिन किछ दिन पहिने आई छेद स अपने आप पैन बहा लागले आर देखते देखैत पास के बावड़ी पैन स भैर गेले ! तखन स लगातार मूर्ति स पैन निकेल रहल छई ! फेर की बात काने कान इ बात पूरा ग्रामीण क पता चललाई तखन स श्रद्धालु के ताता लगातार मंदिर म बैढ़ रहलेंन या ! सभक मानब इ छई जे इ पैन नै अमृत छिये ! जकरा पीने स सब दुःख दूर होइत अछि, सभक कहब छैन जे गाम म बहुत प्राचीन मंदिर छैन ! गाम म जखन जखन नवनिर्माण हेतु खुदाई होई छई त प्राचीन मूर्ति के भग्नावशेष निकले छई !लेकिन पुरातत्व विभाग के ध्यान ओई तरफ नै छैन !मंदिर म खरा रैह क सामने देखल गेल की पुजारी मूर्ति स निकले बाला जल क वितरित केलखिन किछ देर म जल पुनः भैर गेले ! मंदिर पहुचे बला हर श्रद्धालु के कहब छैन की इ माँ के चमत्कार छियेंन ! माँ के मूर्ति बेहद पुरान छैन, आर जमीन म सेहों धसल छथिन! आब सच्चाई की अछि इ त विज्ञाने बतेता ! आई समबंध म अहक सोचब की अछि हमरा बताबू

Monday, February 11, 2008

केहेंन हुए आहा के जीवन साथी.....


मिथिला बहिन लोकेन के लेल खाश"

एक लड़की के लेल हुनकर विवाह बेहद महत्वपूर्ण क्षण होइत छैन ! अपन माँ - बाबूजी के साथ जीवन बिताबैं के पश्चात जखन ओ दोसर के जीवन संगिनी बैन क हुनकर घर जैत छैथ त निश्चित रूप स हुनका स किछ अपेक्षा रखैत छैथ ! जेय पर खरा उतरे के लेल हुनका एक आदर्श 'जीवन - संगनी ' के दायित्व निभाबे परेत छैन ! हुनकरे भूमिका पर घर के समृधि आर सुख - शान्ति काफी हद तक निर्भर करैत छैन ! कहल गेल अछि की सफल व्यक्ति के सफलता के पीछा स्त्री के हाथ होइत छैन ! अतः आहा एक आदर्श 'जीवन - संगिनी' भो साकेत छ्लो यदि आहा हर कदम पर अपन हम सफर के साथ दियेन आर परिवार म यदि सामंजस्य बनेना राखी ! आबू देखि कोना बनल जैय एक आदर्श 'जीवन - संगिनी'

* आर्थिक आधार पर अपन पति के ओरो स तुलना करब आहाके जीवन म जहर घोइल सके य ! अतः कखनो पाई क सुख आर समृधि के आधार नें समझे के गलती करू ! पाई स सोना के महल खरीद सके छी मुदा निंद नें ! बेहतर हेत यदि आहा अपन पति के जिम्मेदारी आर मज़बूरी क समझे के प्रयाश करी ! हुनकर काम म हाथ बटाबियोंन, अगर आहा पढ़ल - लिखल छी त आर्थिक सहयोग दे क हुनकर तनाव कम करे के प्रयाश करी ! आहक भावनात्मक नैतिक आर आर्थिक सहयोग हुनका आश्वस्त करतेंन की हुनकर जीवन-संगिनी दुःख - सुख म हुनकर साथ दें छैन ! बहिन सब स पैघ सहयोग होई छै भावनात्मक संबल जे एक पति क हुनकर जुझारू ऐवं सुलझल पत्नी के सिवा कियो नै दे सकेत छथिन ! माँ, बहिन के रिश्ता अपन जगह अत्यन्त महत्वपूर्ण होई छै ! खाली अहि के उपस्थिति हुनकर रिश्ता के पूर्ति नै करे छैन ! आहा क इ नै भुल्बाक चाही की हुन्करो अपन माँ - बाबूजी, भाई - बहिन छैन ! जिन्करो देखभाल हुनके केनेय छैन ! एहेंन स्थिति नै आबे दीयोंन की हुनकर परिवारक सदय्श अपना आप क उपेक्षित महसूस करैत !

* वर्तमान युग म संयुक्त परिवार के विघटन होई के एक बहुत बड़ा कारन इ छलें की विवाह के उपरांत अलग गृहस्थी बनाबे के बिचार मस्तिष्क पर हावी भेल जे रहल अछि ! भौतिक प्रतिस्पर्धा, आधुनिक चकाचौध आर अधिक स अधिक वस्तु के संग्रह के क आरामदायी जीवन व्यतीत करे के चाह हमरा सब क रहे या आई पाछा हम सब अपन सब सम्बन्ध क भूले दैत छलो ! हमरा सब क इ सोच्बाक चाही की विवाह के उपरांत अपन सास - ससुर के प्रति उपेक्षा के भावे आई वृधाश्रम के संख्या बढे रहल अछि ! ताहि लेल निक हेत की आहा अपन सब आवश्यकता म संतुलन बनेना राखी ! परिवार क बिखरे स बचाबी !


* अपन पति के योग्यता आर हुनकर क्षमता के तुलना दोसर स नै करबाक चाही ! किये की हुनकर तुलना दोसर स केने स हुनकर स्वाभिमान क ठेस पहुचतैन ! एक बात क सदैव गाठ बैंध क चलुकी आहा के पति चाहे जेहेंन हुवे , हुनका ओही रूप म स्वीकारी ! आपसी सामंजस्य, बुद्धिमत्ता आर सूझबूझ स गृहस्थी के गाड़ी क आगा बढाबी ! हुनकर मेहनत के प्रशंसा कारियोंन आर कन्धा स कन्धा मिले क गृहस्थी के सुख एश्वर्य बनाबे म हुनकर साथ दीयोंन ! याद रहे जिम्मेदारी म साझापन आर विचार म सामंजस्य बनेना राखब पति - पत्नी दुनु के जिमेदारी छी ! आहा यदि इ गुण अपनाबी त कैल अपन मिथिला समाज के दोसरो बहिन आहा स प्रेरित हेती ! उम्मीद करेत छलो हमर ब्लोग आहा सब पसंद करब !


हम जीतमोहन जी के तहे दिल स आभारी छियेंन जे ओ इ मैथिली" ब्लोग बनेलेथ आर ओई पर हमरा किछ लिखे के आग्रह केलेथ !

Saturday, February 09, 2008

डॉ0 जनक किशोर लाल दाश जीक मैथिली भाषा कविता

प्रिय बंधू कविता पढे लेल कविता के पन्ना पर क्लीक करू !


१, मैथिली (कविता) सुपैन धार

२ , मैथिली (कविता) प्राचीन ऋण
३,मैथिली (कविता) नव साल आरे

४,मैथिली (कविता) मेघ दुत

५,मैथिली (कविता) मीत कीएक चुप छी

६,मैथिली (कविता) हमर पुतोहू


७,मैथिली (कविता) कोईलिक व्यथा



८,मैथिली (कविता) जुहू तट



९,मैथिली (कविता) जिद्दी चिरई

१०,मैथिली (कविता) गामे म रहैत छी



११,मैथिली (कविता) डायरिक पन्ना सं




१२,मैथिली (कविता) हम बूढ़ लोक छी

१३,मैथिली (कविता) बलिदान अहाँ के


उम्मीद करे छी कविता अपने पसंद करब !!

Wednesday, February 06, 2008

रिश्ता नै दोस्त बनाबू


हम जै समाजक परिवेश म रहेत छलो ! ओय म किछ रिश्ता के बंधन जन्म के साथे जुरल होईया ! पारिवारिक रिश्ता के साथ - साथ हमरा सभक जीवन म जे एक महत्वपूर्ण भूमिका अछि ओ छी दोस्ती के रिश्ता, जकरा हम सब अपन विवेक के द्वारा बनाबे छी ! जकरा सदा निम्हाबे के प्रयाश करे छी ! दोस्त के मुसीबत और दुःख म हम सदा हुनकर साथ दै के प्रयाश करे छी ! हुनकर दुःख क बांटे के भावना हमरा सभक मन क हमेशा प्रेरित करैत अछि ! सही मायने म अहि तरहक इंशान सच्चा दोस्त होई या दोस्त बनेनैय आर दोस्ती करब इ मानवीय स्वाभाव अछि ! हम सब जिम्हर नज़र घुमाबी ओही ठाम देखब की अई दुनिया म छोट बच्चा से लेके बुजुर्ग तक सब के दोस्त होइत अछि ! हमर मानू त बिना दोस्त के हमर सभक जीवन नीरस होई या ! सामाजिक वातावरण म बिना दोस्तक जिंदा रहब मुश्किल अछि !
आबू देखि किछ दोस्त बनाबे के टिप्स आर रिश्ता निम्हाबे के किछ टिप्स, जकरा अपने अपन दैनिक जीवन म उपयोग के क बने सके छी सच्चा दोस्त !

* अगर अपने अंग्रेजी म बातचीत करे के आदि छी आर यदि सामने वाला क अंग्रेजी समझ म नै आबे छैन त अपन अहं क एक तरफ छोइर क सामान्य भाषा म बातचीत शुरू करी !

* आदमी जखन खुद अपन दोस्त बैन जैत छैथ त हुनका दोस्त अपनेआप मिल जैत छैन ! कियेकी हुनकर स्वभाव हुनकर दोस्तक गिनती बढाबेत छैन !

* दोस्ती करैत समय सामने वाला स बातचीत म झिझकपन नै राखी !

* दोस्त स बातचीत के दोंरान अपन रुतबा या हैसियत के रोब देखबे के बजाय सामान्यजन बैन क बात करू !

* अपन परिचय के बाद हुनको बाजे के मौका दीयोंन !

* हमेशा एक दोसर के रूचि के बारे म जाने के प्रयाश करबाक चाही किये की इ दोस्ती के सब स पैघ नुस्खा अछि !

* अपन मन म हमेशा सहयोग के भावना राखी इ आगा जै क बहुत काम आबैत अछि !

* दोस्ती केला के बाद दोस्ती निम्हाबे के प्रयाश करी और छल - कपट, द्वेष भाव स हमेशा दूर रही !

* सब स आखिर आर महत्वपूर्ण बात इ की अगर अपने के दोस्त अपने के सामने किनकरो बुराई करा त बजाय हाँ म हाँ मिलबे के सरल शब्द म हुनका नै कैह दीयोंन !
अई तरहक टिप्स ध्यान म रैख क करल दोस्ती बहुत गहरा होई य ! आहो दोस्ती करे स पहिने इ टिप्स पर ध्यान जरुर देब !!

Tuesday, February 05, 2008

बड़ी मुश्किल स दोस्त मीलैत अछि !!


चाहूँगा मैं तुझे शाम सवेरे, फिर भी कभी अब नाम तो तेरे आवाज़ मैं न दूंगा !!


आहा के साथ किछ एहेंन भेल या की आहा अपन दोस्त क दिन - रैत याद करेत छलो मुदा कुनू मन मुटाव के कारन हुनका स बात नै करे चाहे छी ! आहा क अपन गहरी दोस्ती जरुर याद आबेत हेत , ओ मस्ती भरल शरारत, एक साथ बीतल ओ पल ॥ लेकिन जखन दोस्ती टूटे के याद आबेत हेत त फेर स मन कड़वाहट स भैर जैत हेत ! श्रीमान एहेंन के हेता जिनका अपन दोस्त स झगड़ा नै भेल हेतेंन ! दोस्ती त एहेंन चीज छिये की झगरा के बाद दोस्त स दूर रहेत एक पल चैन कहा होई छई ! मुदा इ हकीकत आइछ की जतेक दोस्ती गहरा होई य ओतेक मुश्किल बढे य ! झगरा के बाद दोस्त स कोना सुलह करबाक चाही जै स की दोस्तक" रिश्ता के मधुरता क बरक़रार राखी आर ओकरा फेर स जीवित करे के लेल आबू किछ बात करी किये की बड़ी मुश्किल स दोस्त मीलैत अछि !

दोस्ती म अहम क भूले दियो.......

अगर अपने अहम क हमेशा तवोज्जा देबेय त कुनू भी रिश्ता कायम राखब मुश्किल हेत ! दोस्ती म अपने क हमेशा पहला कदम बढ़बे के लेल तैयार रहबाक चाही ! यदि अपने स कुनू गलती हुए त ओकर स्थिति समझे के प्रयाश करबाक चाही आर अपन गलती महशुस करबाक चाही ! ऐहेन नै होबाक चाही की छोट - मोट बात पर टूटल दोस्ती के वजह स जिंदगी के कुनू मोड़ पर अपने एक खास दोस्त के कमी हमेशा महसूस करी ! यदि गलती हुनको स होइन त इ नै भुलू की ओहो अहि जाका एक इंसान छैथ ! इ बात यदि आहा जैन जाय त आहा के लेल सॉरी कहब सुलह के पहला कदम बधैब बहुत आसान भो जायत !


एकांत म खुद स किछ सवाल ......

एकांत म याद करी की झगरा के कारन की आइछ ? गलती किंकर छैन ? गलती यदि आहा स भेल आइछ त की आहा वाकई म गलती मनैत माफी मांगे चाहे छी ! आर यदि गलती अपने के दोस्त स भेल छलेन् त की अपने हुनकर गलती क भूले क हुनका माफ के सकैत छी ? अई तरहक सवाल पर बिचार के क सुलह के तरफ कदम बधाइल जे सके य !

बताबियोंन की दोस्ती आहा के लेल मायने राखै य .....


जखन आहा झगड़ा के बाद सुलह करै के लेल अपन दोस्त स मिलेय ल जाय छी त हुनका जताबियोंन की हुनकर दोस्ती आहा के लेल कतेक मायने रखे य आर आहा क हुनकर कतेक परवाह आइछ !

अपन गलती हुनका लग मानियोंन.....


अगर आहा अपन गलती मानेय लय तैयार छी त जखन आहा क दोस्त स मिले के मोका मिला त हुनका कहियोंन की अपने हुनका स माफी मांगे ल चाहे छी ! आर हुनका समझाबे के प्रयाश करू की अपने स ओ गलती कुन परिस्थिति म भेल छले !

दोस्ती चाहे छी ........


आहा दोस्त स कहियोंन की आहा हुनकर दोस्ती छोड़ब नै चाहे छी ! अई तरहक गलती दुबारा आहा स नै हेत ! तखन देखु आहा के दोस्ती कतेक परवान चढ़े य !

Monday, February 04, 2008

सात फेरा के सात वचन


इ ब्लॉग हमरा तरफ स हमर

मिथिला युवा बंधू के लेल खाश !!
हर साल अपन मिथिला म हजारो जोरा विवाह के अटूट बन्धन स बनधैत छैथ ! अई शुभ अवसर पर हम सब मिथिला वासी अपन होई बला (जीवन - शाथी) क एक स बैढ़ क एक अनोखा उपहार दैत छलो ! प्रेम आर विश्वास के इ बंधन पवित्र रिश्ता स शुरू होई या ! हमरा सब क़ सोचबाक चाही की अगर हम सब अपन नव विवाहिता क उपहार स्वरुप दी अनोखा सात फेरा के सात वचन जे हुनका बनाबें किछ खाश त कते निक हेत ? सात फेरा हम सब लगबे छी ! अहू आइ नै त कैल लगेबे करब त आओ मन म ठेंन लिया की जहिया आहा सात फेरा लगेब तहिया अपन जीवन शाथी क देवै उपहार स्वरुप सात फेरा के सात वचन ! आहक उपहार स्वरुप सात फेरा के सात वचन अई तरह के भो सके या ?
वचन - १, जीवन पथ पर चलैत - चलैत कखनो अगर कुनू तरहक तकरार पत्नी स हेत त पत्नी क मनाबे के लेल आहा अपन पुरुष अहं दूर रखैत हुनका मनाबे के पूरा कोशिश और अपन गलती माने के बरप्पन देखाबी ! अई स आहा दुनु के बिचक प्रेम दुगुनित हेत !
वचन - २, विवाह के दिन (Wedding Annivarsary) निक जका याद राखी अई स हुनकर (पत्नी) मन जीते म आसानी हेत ! फेर आहा साल भैर जे चाही के सके छी, अनायास आहा क आजादी मिल जेत !
वचन - ३, हम (पति) कखनो इ नै भूली की हम आर हमर नौकरिये सब किछ छी ! योजी महाराज अहाक खाली समय और छुट्टी पर हुनके (पत्नी) के अधिकार छैन !
वचन - ४, एक बात के ख़याल राखल करू की पत्नी के और हुनकर परिवारक सम्मान कारियोंन हुनका किनको सामने अपमानित नै कारियोंन !
वचन - ५, पत्नी आहाके परमेश्वर मनेथ इ उम्मीद नै करेत स्वयं निक इंसान हुनकर दृष्टि म बने के प्रयास करी, ओ अपने के हर ख़ुशी क़ अपन ख़ुशी मनेथ तयो इ कोशिश राखी की हुनका कुन बात स ख़ुशी मिलैत छैन जाने के प्रयाश करी !
वचन - ६, पत्नी अगर अर्धाग्नी कहलाबेत छैथ त हुनका सच्चा दोस्त मानेत हमराज़ बनाबे के प्रयाश कारियों, हुनका स कुनू बात, दुःख, परेशानी नै छुपाबियोंन ! इ कसम अग्नि क साक्षी मानेत खेबाक चाही !
वचन - ७, प्रेम आर विश्वास के इ बंधन एक पवित्र रिश्ता स शुरुवात होइत आइछ, जाकरा सवारे के दायित्व दुनु के होई या अतः कुनू तरहक अहं नै राखेत हुनका सदैव दोस्त मनैत अधिकार आर सम्मान बराबर देबाक चाही !
हम जाने छी इ बात हमर किछ युवा बंधू क पसंद नै हेत तयो अपने स अनुरोध जे इ बात क अपन जिन्दगी म उतैर क देखब ? बाद म देखियो आहा के जिन्दगी कतेक अनमोल बने या !!

Saturday, February 02, 2008

महा कवि विद्यापति मैथिली भाषा रत्न

(महा कवि विद्यापति क जन्म स्थान !)



आय स करीब 740 वर्ष पहिलॆ मिथिलाक आकाश‌ मॆं एकटा एहन तारा कॆ उदभव भॆल छल जिनका ल क आइय तक हम सब गौरव कॆ अनुभव क रहल‌ छी बंगाली लॊक कॊनॊ कसर नैय छॊड़लक हुनका बंगाली घॊषीत करवा मॆं लॆकिन धन्यबाद कॆ पात्र छैथ ग्रियर्सन बाबुअ जॆ कि ई तारा कॆ बिहारी मैथील घॊषीत/मान्यता कैला
आहाँ प्राय; बुझी गॆल हैबैय जॆ हम किनका बारॆ मॆं गप क रहल छी जी हम विद्यापती कॆ बारॆ मॆं गप क रहल छी विद्यापती कॆ जन्म 1360 ई. मॆं वर्तमान मधुबनी कॆ विष्फी प्रखंड मॆं भॆल छलैन हिनकर‌ पिता कॆ नाम गणपती ठाकुर और माता कॆ नाम हासिनी दॆवी छलैन हिनकर प्रांरंभीक शिक्षा मिथिलाक महान पण्डित हरिमिक्षक दॆख रॆख मॆं भॆलैन कपिलॆश्वर महादॆव कॆ कृपा स विद्यापति कॆ एक टा पुत्र रत्न‌ सॆहॊ प्राप्त भॆल‌ भैलैन विद्यापति जी कॆ पिता राजा गणॆश्वरक दरवार मॆं दरबारी छला ताही ल क विद्यापती सॆहॊ बचपन स हुनकर राज दरवार मॆं जाइत आबैत छला किछु समय बाद राजा गणॆश्वरक पुत्र क्रीर्ति सि‍ह राजा भॆलाह विद्यापति कॆ पहिल पुस्तक जॆ की क्रीर्तिकला अछी ऒ राजा राजा क्रीर्ति सिंह स काफी प्रभावित अछी या इ कही सकैत छियै जॆ ई पुस्तक हुनकॆ पर लिखल गॆल अछी एकर भाषा संस्कृत और प्राकृतिक भाषा दुनू मॆं मिलल जुलल अछी ऒकर बाद विद्यापति क्रीर्तिपुकार कॆ रचना कॆलाह




दॆसिल बयना सब जन भिट्ठा
तॆंहिसन जम्पऒ अभट्ठा (विद्यापति कॆ रचना क्रीर्तिपुकार स )

मतलब की दॆशी, अप्पन भाषा सब भाषा स मधुर हॊइत छैय ताहि ल क हम अप्पन रचना एहि भाषा मॆं कॆनौअ
एही दुनू ग्रन्थ कॆ अलाबा विद्यापति संस्कृत मॆं विद्यासागर, दानवाक्यावली, पुऱूषपरीक्षा, गंगावाक्यावली, दुर्गाभक्ति तरंगमिणी इत्यादी ग्रन्थ कॆ रचना कॆलैथ गॊरक्षविजय और मणिमच्चरि हुनक लिखल बहुत प्रसिद्य नाटक अछी ई सब पुस्तक विभंत्र तथ्य जॆना कि भुप्ररिक्रमा मॆं विभीत्र तिर्थस्थान कॆ त, लिखनावली मॆं पत्र लॆखन शैली कॆ विवरण कॆल गॆल अछी, तहिना पुऱूषपरीक्षा ललितकला कॆ रुप मॆं धार्मिक और राजनैतिक वर्णन अछी एहि प्रकार स हम सब कही सकैय मॆं सामर्थ‌ छि जॆ की विद्यापति एकटा गितकातकारॆ टा नैय अपितु ऒ कथाकार, निबन्धकार, पत्रलॆखक और नाटककार सॆहॊ छला लॆकिन हुनका सबस बॆसी प्रसिधी गितकार कॆ रुप मॆं भॆटलैन और ऒ ऒही रुप मॆं अमर भ गॆला विद्यापति कतॆकॊ राजा महाराजा कॆ दरवार मॆं रहला यथा गणेश्वर, भवॆश्वर, क्रीर्ति सिंह, दॆवी सिंह, शिव सिंह, पद्य सिंह, विश्वास दॆवी, रत्न सिंह, तथा धिर सिंह
विद्यापति कॆ गित ऒही समय कॆ समाज कॆ जॆ ज्वलंत मुद्दा रहैत छल ऒही पर लिखल अछी जैना की ऒही समय मॆं मिथिला समाज मॆं बहुविवाह कॆ प्रथा चलैत छल स्त्रि भॊग कॆ वस्तु मानल जायत छल कतॆक व्यक्ति बुढापा मॆं सॆहॊ विवाह कॆ इच्छुक रहैत छला एहि वृतांत‌ पर विद्यापति लिखैत छैथ

गॆ माइ हम नहिरहब ऎही आँगन मॆं
जौन बुढ हॊइत जमाय

तॆहिना ऒही समय मॆं दॆखल जायॆत छल जॆ पति सँ रुठी क पत्नि अप्पन बच्चा कॆ काँखी मॆं राखी क अप्पन नैहर बिदा भ जायत‌ छलैथ एहि चित्र पर विद्यापति लिखैत छैथ

चलती भवानी तॆजिअ मॆहरा
कॊर धए‌ क्रातिक गॊद‌ गणॆश

अर्थात विद्यापति कवि मात्र नैय ऒ त महाकवि छलाह हुनका जॆ प्रसिधी और सम्मान भॆटलैन सॆ बहुतॊ कवि कॆ सपना हॊइत छैयक विधी कॆ विधान त कियॊ नैह काटी सकैत छैयक मिथिलाक इ तारा 1450 ई मॆं परलॊक सिधाइर गॆल किछु इ गित गावैत

बढ सुख पाऒल तुअ तिड़ॆ
छॊड़ति निकट बह नीड़ॆ









चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सु-स्वागतम.....मैथिल आर मिथिला मैथिली भाषा ब्लॉग

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मैथिल और मिथिला ब्लॉग

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प्रिय बंधू इ नया "मैथिल और मिथिला" ब्लॉग क मैथिली लेखक और कवी लोकेन के जरुरत अछि ! सदस्यता के लेल खाली अपन (ईमेल आईडी) हमरा
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(मैथिली पुत्र प्रदीप)
१, जगदम्ब अहीं अबिलम्ब हमर (मैथिली पुत्र प्रदीप)


जगदम्ब अहीं अबिलम्ब हमर

हे माय आहाँ बिनु आश ककर

जँ माय आहाँ दुख नहिं सुनबई

त जाय कहु ककरा कहबै

करु माफ जननी अपराध हमर

हे माय आहाँ बिनु आश ककर

हम भरि जग सँ ठुकरायल छी

माँ अहींक शरण में आयल छी

देखु हम परलऊँ बीच भमर

हे माय आहाँ बिनु आश ककर

काली लक्षमी कल्याणी छी

तारा अम्बे ब्रह्माणी छी

अछि पुत्र-कपुत्र बनल दुभर

हे माय आहाँ बिनु आश ककर

जगदम्ब अहीं अबिलम्ब हमर !!!


२, लाले-लाले अर्हुल के माला बनेलऊँ


लाले-लाले अर्हुल के माला बनेलऊँ

गरदनि लगा लिय माँ

हे माँ गरदनि लगा लिय माँ

हम सब छी धीया-पूता आहाँ महामाया

आहाँ नई करबै त करतै के दाया

ज्ञान बिनु माटिक मुरति सन ई काया

तकरा जगा दिया माँ

लाले-लाले अर्हुल के माला बनेलऊँ

गरदनि लगा लिय माँ

कोठा-अटारी ने चाही हे मइया

चाही सिनेह नीक लागै मड़ैया

ज्ञान बिनु माटिक मुरुत सन ई काया

तकरा जगा दिया माँ.....

आनन ने चानन कुसुम सन श्रींगार

सुनलऊँ जे मइया ममता अपार

भवन सँ जीवन पर दीप-दीप पहार भार

तकरा हटा दिय माँ.....

लाले-लाले अर्हुल के माला बनेलऊँ

गरदनि लगा लिय माँ

सगरो चराचर अहींकेर रचना

सुनबई अहाँ नै त सुनतै के अदना

भावक भरल जल नयना हमर माँ

चरनऊ लगा लिय माँ.....

लाले-लाले अर्हुल के माला बनेलऊँ

गरदनि लगा लिय माँ


प्रेम स कहू जय मैथिली, जय मिथिला

Sunday, January 06, 2008

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य:http://www.videha.co.in/

मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर

पसीधक काँट: मीत भाइक दिल्ली यात्रा आऽ आगाँ

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटलाक स्थितिमे अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। बुधि जेना हेरा हेल छलन्हि, वा अपनासँ बेशी बुधियार लोकनिसँ सोझाँ-सोझी भए जाइत छलन्हि। अहाँ कहब जे पहिने की भेल से तँ कहबे नञि कएलहुँ तखन हमरा सभ कोना बुझब जे की भेल। तँ सुनू, एकर उत्तर सेहो हमर लग अछि। हम एहि कठाक कथाकार छी से हमरा सभटा बुझल अछि जे की होएबला अछि। ओना यावत हम कथा सुनबैत रहब तावत बीचोमे पुरनका प्लॉटसँ हटि कए हम कथा कहए लागब। मुदा विश्वास करू जे कठा चहटगर बनाबए लेल हम ई करब। हमर अपन कोनो स्वार्थ एहिमे नहि रहत।

तँ आगाँ बढ़ी। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ मीत भाइक सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलखिन्ह तँ कहए लगलीह -

“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।

तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह-,

“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।

आऽ बूढ़ी फेर मीत भाइकेँ सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।

मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आऽ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। चेकिंग किदनि होइत छैक से। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए मीत भाइक कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह, लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ एहिपर लोकि लेलकन्हि।

”ई की छी”।

”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।

”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।

” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।

”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।

”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”

” लऽ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।

मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।

दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगाऽ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा लऽ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।

मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचाऽ जाइत छलन्हि आऽ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। मीत भाइ लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भऽ गेलाह। मुदा लालकाकी दिल्ली घुमि लिअ, लाल किला देखि लिअ, ई कहि दू-चारि दिनक लेल रोकि लेलखिन्ह। मुदा असल गप हमरा बुझल अछि। लालकाकी हुनकासँ गामघरक फूसि-फटक सुनबाक लेल रोकने छलखिन्ह।

Sunday, April 09, 2006

मैथिली भाषा SAHASRABADHANIhttp://www.videha.co.in/

अप्पनसभक गप्प करबा लेल हमरा लगमे समयक अभाब रहय लागल।किछु त  एकर कारण रहल हम्मर अप्पन आदति आ किछु एकर कारण रहल ह्म्मर एक्सीडेंट, जकर कारणवस हम्मर जीवनक  डेढ साल बुझा पडल जेना डेढ दिन जेकाँ बीति गेल।किछु एहि बातक दिस सेहो  हमारा ध्यान गेल जे डेढ सालमे जतेक समयक नुकसान भेल तकर क्षतिपूर्ति कोनाकय होयत। किछु त  भोरमे उठि कय समय बचेबाक विचार आयल मुदा आँखिक निन्द ताहि मे बाधक बनि गेल।तखन सामजिक संबंधकेँ सीमित करबाक विचार आयल। एहिमे बिना हमर प्रयासक सफलता भेटि गेल छल। कारण एकर छल हमर न हि खतम प्रतीत होमयबला बीमारी। एहिमे विभिन्न डॉक्टरक ओपिनियन,किछु गलत ऑपरेशन आ एकर सम्मिलित इम्प्रेसन ई जे आब हमरा अपाहिजक जीवन जीबय पडत। आनक बात त  छोडू हमरा अपनो मोनमे ई बात आबय लागल छल। लगैत छल जे डॉक्टर सभ फूसियाहिँक आश्वासन दय रहल छल। एहि क्रममे फोन सँ ल  कय हाल समाचार पूछ्नहारक संख्या सेहो घटि गेल छल। से जखन अचानके बैशाखी फेर छडी पर अयलाक बाद हम कार चलाबय लगलहूँ तँ बहूत गोटेकेँ फेर सँ सामान्य संबंध सुधारयमे असुविधा होमय लगलन्हि। जे हमरा सँ दूर नहि गेल रहथि तनिकासँ त   हम जबर्दस्तीयो संबंध रखलहूँ, मुदा दोसर दिशि गेल लोक सँ हमर व्यवहार निरपेक्ष रहि कय पुनःसंबंध बनेबासँ हतोत्साहित करब रहय लागल। दुर्दिनमे जे हमरापर हँसथि तनिकर प्रति ई व्यवहार सहानभूतिप्रदहि मानल जायत। एहिसँ समयधरि खूब बचय लागल।

शुरुमे त’  लागल जेना ऑफिसमे क्यो चिन्हत की नहि। मुदा जखन हम ऑफिस पहुँचलहुँ त’  लागल जेना हीरो जेकाँ स्वागत भेल हो। मुदा एहिमे ई बात संगी-साथी सभ नुका लेलक जे हमर छडी सँ चलनाई हुनका सभमे हाहाकार मचा रहल छन्हि। सभ मात्र हमर हिम्मतक प्रशंसा करैत रहैत छलाह। जखन हम छडी छोडि कय चलय लगलहुँ आ जीन्स शर्ट-पैंट पहिरि कय अयलहुँ, तखन एक गोटे कहलक जे आब अहाँ पुरनका रूपमे वापस आबि रहल छी। एहि बातकेँ हम घर पर आबि कय सोचय लगलहुँ।अपन चलबाक फोटोकेँ प्तनीक मदति सँ हैण्डीकैम द्वारा वीयोडीग्राफी करबयलहुँ।एकबेर तँ सन्न रहि गेलहुँ। चलबाक तरीका लँगराकय दौरबा सन लागल। बादमे घरक लोक कहलक जे ई त’  बहुत कम अछि, पहिने त’  आर बेसी छल। तखन हमरा बुझबामे आयल जे संगीसभ आ ओ’  सभ जे हमरासँ लगाव अनुभव करैत छलाह, तनिका कतेक खराब लगैत होयतन्हि। तकराबाद हमरा हुनकरसभक प्रोत्साहन आ’  हमर हिम्मतक प्रशंसा करैत रहबाक रहस्यक पता चलल । अपन प्रारम्भिक जीवनक एकाकीपनक बादमे नौकरी-चाकरी पकड़लाक बाद सार्वजनिक जीवनमे अलग-थलग पड़ि जयबाक संदेह , आशा , अपेक्षा किंवा अहसास-फीलिंगक बाद जे एहि तरहक अनुभव भेल से हमर व्यक्तित्वक भिन्न विकासकेँ आर दृढ़ता प्रदान केलक।


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सन~~ 1885 ई.। झिंगुर ठाकुरक घरमे एक बालकक जन्म भेल।एहि वर्षमे कांग्रेस पार्टीक स्थापना बादक समयमे एकटा महत्त्वपूर्ण घटनाक रूपमे वर्णित होमयवला छल। अंग्रेजी राज अपनाकेँ पूर्णरूपसँ स्थापित कए चुकल छल।राजा-रजवाड़ासभ अपनाकेँ अंग्रेजक मित्र बुझवामे गौरवक अनुभव करैत छलाह।शैक्षिक जगतमे कांग्रेस शीघ्रअहि उपद्रवी तत्वक रूपमे प्रचारित भय गेल। मिलाजुलाकेँ कांग्रेसी लोकनि अंग्रेजीराज आभारतीय रजवाड़ा सभक सम्मिलित शासनकेँ स्थायित्व आयथास्थिति निर्माणकर्त्ताक रूपमे स्थान भेटि चुकल छल। कांग्रेस अपन यथास्थितिवादी स्वरूपकेँ बदलबाक हेतु भविष्यमे एकटा आन्दोलनात्मक स्वरूप ग्रहण करयबला छल। संस्क़ृतक रटन्त विद्याक वर्चस्व छल। परंतु सरकारी पद बिना आङ्ल-फारसी सिखलासँ भेटब असंभव छल।सरकारी पदक तात्पर्य राजा-रजवाड़ाक वसूली कार्यसँ संबंधित आओतबहि धरि सीमित छल। मुदा किछु समयापरान्त अंग्रेजक किरानीबाबू लोकनि सेहो अस्तित्वमे अयलाह।

     तखन बालककेँ संस्क़ृत शिक्षाक मोहसँ दूर राखल गेल। मैथिल परिवारमे फारसी आअंग्रेजीक प्रवेश प्रायः नहियेक बराबर छल आताहि कारणसँ अधिकांश परिवार एक पीढ़ी पाछू चलि गेल छल। मुदा झिंगुर बाबू अपन पुत्रक हेतु मौलवी साहबकेँ राखि शिक्षाक व्यवस्था कएल। तदुपरांत दरिभङ्गामे एकटा बंगालीबाबू बालककेँ अंग्रेजीक शिक्षा देलखिन्ह। बालक कलित शनैः शनैः अपन चातुर्यसँ मंत्रमुग्ध करबाक कलामे पारंगत भगेलाह। जाहि बालककेँ झिंगुरबाबू अन्यमनस्क पड़ल आमात्र सपनामे हँसैत देखलखिन्ह, तकर बाद ठेहुनिया मारैत, फेर चलैत से आब शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करहल छथि। हुनका अखनो मोन पड़ि रहल छलन्हि जे कोना ठेहुनिया दैत काल, नेनाक हाथ आगू नहि बढैक आबेंग जेंकाँ पाछू सँ सोझे आगू फाँगि जाइत छलाह। पूरा बेंग जेकाँ-अनायासहि ओमुस्कुरा उठलाह। पत्नी पूछि देलखिन्ह जे कोन बात पर मुस्कुरेलहुँ, तँ पहिने तँ ना-नुकुर केलन्हि फेर सभटा गप कहि देलखिन्ह। तखनतँ गप पर गप निकलय लागल।
     “एक दिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ मारने आगू जारहल छथि। आँगनसँ बाहर भेला पर जतय अंकर-पाथर देखल ततय ठेहुन उठा कय, मात्र हाथ आपैर पर आगू बढ़य लगलाह, पत्नीकेँ मोन पड़लन्हि।
     “एक दिन हम देखलहुँ जे ओदेबालकेँ पकड़ि कय खिड़की पर ठाढ़ हेबाक प्रयासमे छथि। हमरो की फूड़ल जे चलू आइ छोड़ि दैत छियन्हि। स्वयम प्रयास करताह। दू बेर प्रयासमे ऊपर जाइत-जाइत देवालकेँ पकड़ने-पकड़ने कोच पर खसि गेलाह। हाथ पहुँचबे नहि करन्हि। फेर तेसर बेर जेना कूदि गेलाह आहाथ खिड़की पर पहुँचि गेलन्हि आठाढ़ भगेलाह, झिंगुर बाबूकेँ एकाएक यादि पड़लन्हि।
     “एक दिन हम ओहिना एक-दू बाजि रहल छलहुँ। हम बजलहुँ एक तँ ई बजलाह, हूँ। फेर हम बजलहुँ दू तँ ई बजलाह, ऊ। तखन हमरा लागल जे ई तँ हमर नकल उतारि रहल छथि
     “ एक दिन खेत परसँ एलहुँ आनहा-सोना भोजन कय खखसि रहल छलहुँ। अहाहाकेलहुँ तँ लागल जेना कलित सेहो अहाहाकेलथि। घूरि कय देखलहुँ तँ ओगेंदसँ बैसि कय खेला रहल छलाह। दोसर बेर खखसलहुँ तँ पुनः ई खखसलाह। हम कहलहुँ किछु नहि, ई हमर नकल कय रहल छथि। दलान पर सभ क्यो हँसय लागल। फेर तँ जे आबय, कलित ऊहुहूँ, तँ जवाबमे ईहो ऊहूहूँ दोसरे तरीकासँ कहथि। उम्र कतेक हेतन्हि, नौ-वा दस महिना
     “ हम जे सुनेलहुँ ताहि समय कतेक वयस होयतन्हि, छकि सात मास। पत्नी सासु-ससुर वा बाहरी सदस्य नहि रहला पर सोझे-गप सुनलहुँवाई करू वाकरू बजैत छलीह। मुदा सासु- ससुरक सोझाँ तृतीया पुरुषमे-सुनैत छथिन्ह, फलना कहैत छलैक-। आफेर झिंगुर बाबू की कम छलाह. ओहो ओहिना गीताक काजक लेल काजक अनुकरणमे तृतीया पुरुषमे जवाब देथि। मुदा एकांतमे फेर सभ ठीक। पुनः मुस्कुरा उठलाह झिंगुर बाबू, ई प्रण मोने-मोन लेलथि जे कलितकेँ एहि जंजालसँ मुक्त करेतथि, ओहो तँ बूझताह जे पिता कोनो पुरान-धुरान लोक छथि। पनी पुनः पुछलथिन्ह जे आब कोन बात पर मुस्की छूटल। मुदा एहि बेर झिंगुर कन्नी काटि गेलाह। मुस्की दैत दलान दिशि निकलि गेलाह, ओतय किछु गोटे अखड़ाहाक रख-रखाबक बात करहल छलाह। भोरहाकातक अखड़ाहाक गपे किछु आर छल। भोरे-भोर सभ तुरियाक बच्चा सभ, जवान सभ पहुँचि जाइत छल। एकदम गद्दा सन अखड़ाहा, माटि कय कोड़ि आचूरि कय बनायल। बालक कलितकेँ छोड़ि सभ बच्चा ओतय पहुँचैत छल। झिंगुर बाबू कचोट केलन्हि तँ आन लोक सभ कहलखिन्ह जे से की कहैत छी। अहाँ हुनका कोनो उद्देश्यक प्राप्ति हेतु अपनासँ दूर रखने छी, तँ एहिमे कचोट कथीक। एकौरसँ ठाकुर परिवार मात्र एक घर मेंहथ आयल आआब ओहिसँ पाँचटा परिवार भगेल अछि। डकही माँछक हिस्सामे एकटा टोलक बराबरी ठकुरपट्टीकेँ भेट गेल छैक। कलितक तुरियाक बच्चाकेँ लकय आठटा परिवार अछि ठकुरपट्टीमे। अखनेसँ बच्चा सभकेँ मान्यता ददेल गेल छैक। तखने एकौरसँ एकटा समदी एलाह आभोजपत्रमे तिरहुतामे लिखल संदेश देलखिन्ह। झिंगुर बाबू अँगनासँ लोटा आएक डोल पानि हुनका देलखिन्ह आपत्र पढ़य लगलाह। प्रायः कोनो उपनयनक हकार छलन्हि। परतापुरक सभागाछी देखि कय जायब, ई आदेशपूर्ण आग्रह झिंगुर बाबू समादीकेँ देलखिन्ह, एकटा पूर्वजसँ मूल-गोत्रक माध्यमसँ जुड़ल दियादक प्रति अनायासहि एकत्वक प्रेरणा भेलन्हि। फेर आँगन जाय पत्र पढ़ब प्रारंभ कएल।
                         ॥श्रीः॥
     स्वस्ति हरिवदराध्यश्रीमस्तु झिंगुर ठाकुर पितृचरण कमलेषु इतः श्री गुलाबस्य कोटिशः प्रणामाः संतु। शतम~ कुशलम। आगाँ समाचार जे हमर सुपुत्र श्री गड़ेस आचन्द्रमोहनक उपनयन संस्कारक समाचार सुनबैत हर्षित छी। अहाँक प्रपितामह आहमर प्रपितामह संगहि पढ़लथि। अपन गोत्रीयक समाचार लैत-दैत रहबाक निर्देश हमर पितामह देने गेल छलाह। हर्षक वाशोकक कोनो घटना हमरा गामसँ अहाँक गाम आअहाँक गामसँ हमरा गाम नहि अयने अशोचक विचार नहि करबासँ भविष्यक अनिष्टक डर अछि। संप्रति अपने पाँचो ठाकुर गुरुजनक तुल्य पाँच पांडवक समान समारोहमे आबि कृतार्थ करी। अहींकेँ अपन ज्येष्ठ पुत्रक आचार्य बनेबाक विचार कएने छी। परतापुरक सभागछीक पंचकोशीमे अपने सभ गेल छी, तेँ बहुत रास लोक गप-शपक लालायित सेहो छथि। अगला महीनाक प्रथम सोमकेँ जौँ आबि जाइ तँ सभ कार्य निरन्तर चलैत रहत। बुधसँ प्रायः प्रारम्भिक  कार्य सभ शुरु भजायत। इति शुभम~
     बलान धारक कातमे परतापुरक चतरल-चतरल गाछ सभ आतकर नीचाँ सभागछी। बलानक धार खूब गहींर आपूर्ण शांत। ई तँ बादमे हिमालयसँ कोनो पैघ गाछ बलानमे खसल आहायाघाट लग सोझ रहलाक बदला टेढ़ भएकर धारकेँ रोकि देलक आएकटा नव धार कमलाक उत्पत्ति भेल। बलान झंझारपुर दिशि आकमला मेंहथ , गढ़िया आनरुआर दिशि। बलान गहींर आशांत, रेतक कतहु पता नहि; मुदा कमला फेनिल, विनाशकारी। बाढ़िक संग रेत कमला आनय लगलीह। ग्रीष्म ऋतुमे बलान पूर्वे रूप जेकाँ रहैत छथि, बिना नावक पार केनाइ कठिन, किंतु कमलामहारानीकेँ  पैरे लोक पार करैत रहथि। सभटा सभागछीक चतरल गाछ बाढ़िक प्रकोपमे सुखा गेल। चारूदिश रेत आसभागाछी उपटि गेल। चलि गेल सभटा वैभव सौराठ। मुदा झिंगुर बाबूक कालमे परतेपुरक ध्रुवसँ पंचकोशी नापल जाइत छल, से बादहुमे परम्परारूपमे रहल।
     कलित दरिभङ्गासँ परसू आबि जयताह

मैथिली भाषा BHALSARIhttp://www.videha.co.in/

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1.इच्छा-मृत्यु


हे भीष्म अहाँक कष्टक बखान,सुनल छल खाइत पान-मखान,मुदा बुझलहुँ नहि ई बात ,ईच्छा-मृत्यु किए कै तात!
          भीषणताककथा नहि थोड़,          भूख,अत्यचार गरीब पर जोड़,          हरिजन शोलकन्ह थोड़हि-थोड़,
          केलन्हि भयावह क्षत्रिय तोर,          घोषनि-ब्राह्मण सभ मोर,          केलन्हि रटन्ता विद्या तोर।          एक युधिष्ठिरपर छोरिकय राज,          छोड़ल अहाँ निसास।
          हमर युधिष्ठिर पाँच सय चालीस,          पहिरथि खादी-रेशमी खालिस,          बुझल भीष्म हम आब ई बात,          पेलहुँ इच्छे-मृत्युएँ अहाँ निजात।






















2.वार्ड नं 29     बेड नं. 32 सँ
सफदरजंग हॉस्पीटलसँ,आइ देखल हम मीत,डॉक्टर-पेशेंट फ्री इलाजक,दंभ भरइ छथि,हाइष्ट।     साबुन-तेल सभपर टैक्स,     भरइ छथि सभ वासी,     लैटरीन गंदा अछि पुछने,नर्स बिगरि देखबइ छथि अपोलोक पगपाती।जाऊ अपोलो गंदगी जौँ लागय,टैक्सक बात फिनान्स मिनिस्टरेकेँ जाऊ बूझाबय।
                    

























3.ट्रेन छल लेट

जायब दिल्ली कोना,अस्पतालक भर्ती कक्ष,ट्रेन अछि लेट,डॉक्टर अछि व्यस्त।पहुँचलहुँ दिल्ली,दिल्ली दूर अस्त,दिल्लीक सरकारी डॉक्टर,आइ,काल्हि,परसू,भेलहुँ पस्त।युग बदलल,गणतंत्र आयल,मुदा ट्रेन दिल्ली जायबला,आडॉक्टर दूनू फुर्र,दिल्ली अखनहुँ अछि दूर।


























4.सूर्य-नमस्कार

ॐ मित्राय नमः।।1॥
आँखि करताह ठीक मह,हिनकर लालीकत्था-पान,दाँतक तरमे जखन चबान,हनूमानक सूर्यक ग्रहण पड़ल मोन,लाली देखल चढ़िकय मचान।सूर्य-ग्रहणक वर्ण अछि,नहि ई राहुक ग्रास,विज्ञानक छैक सभ बात,कहलन्हि कुलदीप काक।पृथ्वी घुमैछ पश्चिम सँ पूर्व,आÝ,सूर्य केँ घूमबैत अछि पूर्व सँ पश्चिम।मुदा कहू जे गर्मीमे उत्तर-पूर्व आÝ
जाड़मे उत्तर-पश्चिम कियै छथि सूर्य।

की नहीं चलैत छथि अपन अक्ष,ग्रहणक हेतु राहुक नहि काज,चन्द्रमा बीचमे किरणक करै छथि ग्रास।सभ गणना कय ठामे देल,बूड़ि पंडित केलक अपवित्रक खेल।
खेल-खेलमे देश गेल पाछू,आबहुतँ सभ आगू ताकू।
पुनि-पुनि करि दण्ड हम देल,स्थिरचित्त नेत्र ई सभक लेल;राहू-केतु सभक दिन आब गेल।
गंगामे गोदावरी तीरथमे प्रयाग,धन्यभाग कौशल्यामायकेँ राम लेल अवतार।स्नानक बादक मंत्रक ई भाग,खोलत भरत प्रगति-एकताक द्वार।
शक्ति देहु हे भानु मामहः;ॐ रवये नमः।।2॥

मेरुदण्ड-पग होयत सबल,सूर्य-नमस्कारक परञ्च पाठ प्रबल।सूर्यवंशीयोक अहह अभाग,कर्ण-तर्पणक नहि करू बात।जाति-कर्मक ज्ञानक ओर,छल ओतय, नहि किएक पकड़ल।राहू-ग्रासक बातक मर्म, अहह;ॐ सूर्याय नमः॥3॥
सात अश्व-रथक उमंग,रथमूसल अजातशत्रूक संग,महाशिलाकंटकक जोड़,केलक मगध काज नहि थोड़।जर्मनी-इटलीक एकताक प्रयास,दुइ सहस्त्राब्दी पहिनहि काश,रश्मिक सात-अश्वक रहस्य,बूझल मगध ताहिये पहर।छोड़ल भाव पकड़लहूँ अर्थ,हाÝ भरतपुत्र केलहुँ अनर्थ।
     भरु शक्ति हे सूर्य अहाँ;     ॐ भानवे नमः।

श्वासक-कुंभक केलहूँ अभ्यास,यादि पड़ल कुन्तीक अनायास।सूर्यमेल सुफल भÝ गेल,कवच-कुण्डल भेटल,सेहो इन्द्रहि संगे गेल।एकलव्य पहिनहि द्रोण केलन्हि फेल,अर्जुन, कर्ण-विजय कय लेल?अखनहुँ ई प्रतियोगितामे अछि भेल,प्रतिभाक रूप छय विकृत कैल,अखनहूँ धरि की तू ई सहबह !!     ॐ खगाय नमः॥5॥
सूर्या आश्विन गमनमे फेर,अछि परस्पर द्वंदक देरि,गुरु बृहस्पति ठाढ़े-ठाढ़     ,करतथि ई सभक उद्धार।
अखनहुँ गुरु छथि गूड़,शूल दैत जोड़ पर हमारा ऋणी,कहैत जे बनओताह हमरा चिन्नी,रहताह स्वयं कुसियारक गूड़,गुरुक-गुरुत्व उष्ण-सुड्डाह हह,     ॐ पूष्णे नमः॥6॥
जकर अंकसँ निकलल विश्व
     विश्वक प्राण,Ýh तकर श्वासोच्छवास,गुरुत्वक खेलकेँ बनेलहूँ अहाँ,काछुक, सहस्त्रनागक फनि जानि कि-की?एकटा रहस्य आर गहिरायल,भरत-पुत्र गेल हेरायल।
तकर ध्यान हेयास्तदवृत्तयः;     ॐ हिरण्यगर्भाय नमः॥7।।
सूर्यकिरण पसरि छय गेल,कतेक रहस्य बिला अछि गेल,तिमिरक धुँध भेल अछि कातर,मुदा ई की अद्भुत भेल।रात्रि-प्रहर देखलहुँ सप्त-ऋषिगण,दिनमे सभ-किछु स्वच्छ अछि भेल,मुदा नहीं तरेगणक लेल ई भेल।सत्यक परत तहियायल बनल खेल,हाÝ विश्ववासी शब्दक ई मेल,अहाँक दर्शनक स्तंभ किए भेल।ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः।     ॐ मरीच्ये नमः॥8।।
अहँक तेजमे हे पतंग प्रभाकर,सागराम्बरा अछि जे नहायल,सौर ऊर्जाक नव-सिद्धांत,नहीं की देलक कनियोटा आस,मेघा-मास नहि अहाँक अछि जोड़,तखन मनुक्खक बात की छोड़।पढ़ल ग्रंथ ब्रह्मांडक बात,तरणि सहस्त्र एकरा पार,अंशुमाली तपनसँ पैघगर गाल।तकर ऊष्णता की हम सहब;
               ॐ आदित्याय नमः॥9॥

पिताक बात अछि आयल मोन,बिना सावित्रीक गायत्रीक की मोल,दुइ वस्तुक मेल कखनहुँ नीक,कहुखन परिणाम भेल विपरीत।कटहर-कोआ खेलाह तात,देलन्हि ऊपर पानक पात।पेट फूलल भेल भिसिण्ड,परल मोन रसायन-शास्त्र।तीव्रसंवेगानामासन्नः;ॐ सवित्रे नमः॥10॥

मोन पड़ल चोरी केर बात,चोरक आँखिमे आकक पात,पातक दूध पड़ला संता चोर,सोचलक आब आँखि गेल छोड़ि।कहलक मोने बुद-बुद्काय,करु तेल नहि देब मोर भाय।अर्कक दूधक संग करु तेल,बना देत सूरदासक चेल।गौवाँ केलन्हि बुरबकी एहि बेर,चोरक बुनल जालक फेर।तेल ढ़ारि पठौलन्हि चोरकेँ गाम।
मुदा रसायन भेल विपरीत,चोरक आँखि बचि गेल हे मीत।गौआँक काजक हम लेब नहि पक्ष,बस सुनायल रटन्त विद्याक विपक्ष।ध्यान धरह आई कहह;ॐ अर्काय नमः॥11॥
     पोथीक भाष्य आभाष्यक भाष्य,     अलंकारक जाल-जंजाल,     विज्ञानक पाखंड,     ऋतम्भरा बुद्धि कतय छल गेल।     योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः;     ॐ भास्कराय नमः॥12।।
करु स्वीकार हमर ई कविता,हे दुःखमोचन हे, हे सविता।दूर करू विकार संपूर्ण;केलहुँ सूर्य-नमस्कार हम पूर्ण।












































5.सनT सत्तासीक बाढ़ि

कमलामहारानीकेँ पार कएल पैरे,     बलानकेँ मुदा नाउक सहारे।     मुदा आइ ई की भेल बात,     दुनू छहरक बीच ई पानि,     झझा देत किछु कालमे लियÝ मानि।
चरित्रक ई परिवर्तन देलक डराय,
नव विज्ञानक बात सुनाय।बाँध-बाँधि सकत प्रकृति की?भीषण भेल आर अछि ई।     हृदयमे देलक भयक अवतार,     देखल छल हम गामक बात।बड़का कलम आफुलवारीमे,बड़का बाहा देल छल गेल;पानिक निकासी होइत छल खेल।नव विज्ञानी ई की केलथि,बाहा सभटा बन्न भÝ गेल।फाटक लागल छहरक भीतर,बालु मूँहकेँ बन्न कय देल।एक पेड़िया पर छलहुँ चलल हम,आरिये-आरिये, देखल रुक्ष।पहिने छल अरिया दुर्भिक्ष,आब दुर्भिक्ष अछि छुच्छ।सिल्ली, नीलगाय सभटा सुन्न,उपनयनमे शाही काँट अनुपलब्ध।जूड़िशीतलक भोगक छल राखल,गाछक नीचाँ सप्ताह बीतल।नहि क्यो वन्यप्राणी आयल खाय,चुट्टीक पाँत पसरायल जाय।
छहरपर ठाढ़ अभियन्ताक गप,छलहुँ सुनैत हम निर्लिप्त।मुदा जाहि धारकेँ कएल पैर पार,तकर रूप अछि ई विस्तार।नवविज्ञानिक चरित्रानुवाद होयत एहन नहि छल हम जानल,मुदा देने छल ओकरा दुत्कार,कुसियारक किछु गाछ,पानिक बीचमे ठाढ़।माटिक रंगक पानि,हरियर कचोड़ गाछ,छहरक ऊपरसँ झझायल पानि,लागल काटय छहरकेँ धारक-धार।ठाम-ठाम क़टल छल छहर,ऊपरसँ बुन्नी परि रहल।सभटा धान-चारु,भीतक कोठी,टूटि खसल,पानिक भेल ग्रास।हेलिकॉप्टरसँ खसल चूड़ा-गूड़,जतय नहि आयल छल बाढ़ि,किएकतँ पानिमे खसाकय होयत बर्बाद।हेलीकॉप्टरक नीचाँ दौड़ैत छल भीड़,भूखल पेट, युवा आवृद्ध।
बूढ़ खाÝ रहल छथि चूड़ा-गूड़,बेटा-पुतोहुक शोक की करि सकत पेटक क्षुधा दूर?

एकटा बी.डी.ओ.क बेटा छल मित्र,कहलक ई सरकार अछि क्षुद्र,ओकरा पिताकेँ शंटिंग केलक पोस्टिंग,गिरीडीह सँ झंझारपुरक डिमोशन, कनिंग।मुदा भाग्यक प्रारब्ध अछि जोड़,आयल बाढ़ि पोस्टिंग भेल फिट।सोचलहुँ जे हमरेटा प्रारब्ध अछि नीच,शनियो नीच, सरस्वती मँगेतथि की भीख?पहुँचलहुँ गाम, पप्पू भाइक मोन छोट,विकासक रूपरेखा, जल-छाजन,निकासी..,...
बात पर बात फेर सरकारक घोषणा,बाढ़ि राहत, एक-एक बोरा अनाज,सभ बोरामे पंद्रह किलो निकाललथि ब्लॉकक कर्मचारी।बूरि छी पप्पू भाई अहूँ,मँगनीक बरदक गनैत छी दाँत,पिछला बेर ईहो नहीं प्राप्त।हप्ता दस दिनक बादक बात,क्यो गेल बंबई,क्यो धेलक दिल्लीक बाट;गाममे स्त्री,वृद्ध आबच्चा,बंबईमे तँ तरकारी बेचब,बोझो उठायब;सभ क्यो केलक ई प्रण,मायक स्वप्न अछि कोठाक होय घर,अगिलहीक बाद फूस आ’’ खपड़ा,पुनः बनायल बखाड़ी जखन भेल बखड़ा।भने भसल बाढ़िमे भीत,बनायब कोठाक घर हे मीत।खसल लागल ईंटा गाममे,कोठा-कोठामे भेल ठाम-ठाममे।पुरनका कोनटा सभ गेल हेराय,जतय हेरयबाक नुक्का-छिप्पी खेलायल हम भाय।आब सुनु सरकारक खटरास,आर्थिक स्थिति सुधारल हम मेहथमे कखास।आदर्श ग्राम प्रखंडक एकरा बनाओल,कहैत छी जे हम बंबई दिल्लीमे कमाओल,
सुनु तखन ई बात,जौं रहैत अस्थिर सरकार,तँ रहैत नहीं दिल्ली नहि बम्मई,विजयनहरम साम्राज्यक हाल,पुरातात्विककेँ अछि बूझल ई बात।धन्यभाग ई मनाऊ, हमरा जितबिते रहू हे दाऊ।प्रगति-परिश्रम अहाँ करू,हमर समस्यासँ दूर रहू।बाढ़ि आयल सत्तासीमे,तबाही देखलहूँ,मुदा कहैत छी हम,देखू आबाजाहीकेँ।

धन्यभाग हे नेता भाई,अहीसँ तँ मनोरंजन होइत अछि,मेला-ठेला खतम भय गेल,हुक्कालोली भेल दिवाली,आजूड़िशीतलक थाल-कादो-गर्दा भेल होली।तखन अहूँक बात सुनने दोष नहि ,कमायलेल हमहूतँ दिल्ली-बंबई आयल छी,कमसँ कम अहाँक ई बड़कपन,जे गामकेँ नहि छोड़ल,मनोरंजनो करैत छी,कमाइतो छी,खाइतो छी।आदिल्ली बंबइ सेहो घुमैत छी।












6. महाबलीपुरममे
असीम समुद्रक कातक दृश्य,हृदय भेल उमंगसँ पूरित।सूर्य-मंदिर पांडव-रथ संग,आकश-द्वीपक दर्शन कयल हम।नूनगर पानि जखन मुँह गेल,भेलहुँ आश्चर्यित,गेलहुँ हमारा हेल।लहरिक दीवारिसँ हमारा टकराय,अंग-अंग सिहरि-सिहराय।देखल सुनल समुद्रक बात,बिसरल मन-तन लेलहुँ निसास।सुनेलक मणिगाइड ई बात,एलथि विदेशी खोललथि ई सत्य,पल्लव वंशक ई छल देन,भारतवसी बिसरल तनि भेर।मोन पडल अंकोरवाटक मंदिर,राजा खतम भेल बिसरल जन,हरि-हरि।टूटल इतिहासक तार जखन,स्वाति भेल ह्रास अखन;कास्पियन सागरक पानिक भीतरक मंदिर,भारतीय व्यापारीक द्वारा निर्मित।
आब एखन अछि हम्मर ई हाल,गामक बोरिंग पम्पसेट अमेरिकन इंजीनियरक खैरात।छोडू भसियेलहुँ कतय अहाँ फेर,प्रीति,पत्नी,हँसि-हँसि भेलथि भेड़।










7.स्मृति-भय
शहरक नागरिक कोलाहल्मे,बिसरि गेलहुँ कतेक रास स्मृति,आएकरा संग लागल भय,भयाक्रांत शिष्यत्व-समाजीकरणक।समयाभाव,आकि फूसियाहिंक व्यस्तता,स्मृति भय आकि हारि मानब,समस्यासँ,आभय जायब,स्मृतिसँ दूर,भयसँ दूर,सामाजिकरणसँ दूर-खाँटी पारिवारिक।
               मुदा फेर भेटल अछि समय,युगक बाद,               बच्चा नहि,भगेलहुँ पैघ;               फेरसँ उठेलहुँ करचीक कलम,               लिखबाक हेतु लिखना,मुदा               दवातमे सुखायल अछि रोशनाइ,               युग बीतल,स्मृति बिसरल,भेलहुँ एकाकी।
सहस्त्रबाढ़नि जेकाँ दानवाकार,घटनाक्रमक जंजाल,फूलि गेल साँस,
हड़बड़ाकÝ उठलहुँ हम,आबि गेल हँसी,स्वप्नानुशासन,लट्पटाकेँ खसलहुँ नहि,धपाक;भÝ गेलहुँ अछि पैघ।
     बच्चामे कहाँ छल स्वप्नानुशासन,     खसैत छलहुँ आउठैत छलहुँ,     शोनितसँ शोनितामे भेल,     उठिकय होइत घामे-पसीने नहायल,     स्मृति-भयक छोड़ नहि भेटल,     ब्रह्मांडक कोलाहल, गुरुत्वसँ बान्हल,     चक्कर कटैत,करोड़क-करोड़मील दूर सूर्य,     आÝ तकर पार कैकटा सूर्य।     के छी सभक कर्ता-धर्ता,     आÝ जौं अछि क्यो,तÝ ओकर
     निर्माता अछि केÝ, ओह! नहि भेटल छोड़।     लेलहुँ निर्णय पढ़िकेँ दर्शन,     नहि करब चिन्तन,तोड़ल कलम,     करची आÝ दवात।
के छी ई सहस्त्रबाढ़नि,घूमि रहल अछि एकटा परिधिमे,
शापित दानव आकि कोनो ऋषि,ताकैत छोड़ समस्याक,आÝ समस्यातँ वैह,के ककर निर्माता आÝ तकर कतय अंतिम छोड़,के ककड़ स्वामी आÝ सभक स्वामी के?आÝ तकरो के अछि स्वामी!
     भेटल स्वप्नानुशासन,टूटल शब्दानुशासन,     तकबाक अछि समाधान,     फेर गेलहुँ स्वप्नमे लटपटाय,     खसब नहि धपाक,तकबाक अछि छोड़।
शंका-समाधान ल,
डगमग होमय लागल अपना पर विश्वास।
जेना कोनो भय,कोनो अनिष्ट,बढ़ा देलक छतीक धरधरी,आÝकि नेनत्वक पुनरावृत्ति!जन्म-जन्मांतरक रहस्य,आत्माक डोरी?आÝकि किण्वन  आविज्ञान केलक सृष्टिक निर्माण!
पीयूष आविषक संकल्पना,स्वाद तीत,कषाय,क्षार,अम्ल कटु की मधुर!खाली बोनमे उठैत स्वर,षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद!खोजमे निकलि गेलथि अत्रि, अंगिरा, मरीचि,संग लेने पुलऋतु,पुलस्त्य आवशिष्ठ।प्राप्त करबालेल अष्टसिद्धि अण्मिक,महिमाक, गरिमाक, लघिमाक, प्राप्तिक, प्राकाम्यक,ईशित्व आकि वशित्व,सप्तऋषिक अष्टसिद्धि।नौ निधिक खोज-पद्म,महापद्म,शंख,मकर,कच्छप, मुकुन्द,कुन्द, नील आखर्व,बनल आधार दशावतारक।मत्स्यावतार बचेलन्हि वेद, सप्तर्षिकेँ,आसंगे मनुक परिवार।कूर्मावतार संग मंदार-मेरु आवासुक व्याल, आनल सुधा-भंडार।वाराहावतार आनल पृथ्वीकेँ बाहर,चारि अंबुनिधिक कठोर छल जे पाश,मारल हिरण्याक्ष।
नरसिंह भगवान बचाओल प्रह्लाद,मारिकय हिरण्यकश्यप,
वामन मारल बालि नापल,दू पगमे पृथ्वी आतेसरमे दैत्यराज।परशुराम, राम आकृष्ण;केलन्हि असुरक संहार,आबुद्धि बदललन्हि तकर विचार।तैं की जे हुनक प्रतिमा,खसौलक देवदत्तक संतान।छिः।क्यो रोकि नहि सकल बामियान।नहि कल्कि नहि मैत्रेय,जल्दीसँ आऊ श्वेत-सैंधव सवारि,चौदह भुवन आतेरह विश्वक,अनबा युग-कलधौत।अर्णवक कोलाहलमे जाय छल,नेनत्व डराय।
मुदा अखन विज्ञान टोकलक मोन,ई तँ अछि किण्वनक सिद्धांत।दशावतारे तँ छथि,उत्पत्तिक आधुनिक सिद्धांत।मत्स्य, कूर्म, तखन वाराह,फेर नरसिंह, तखन वामन।एकसँ दोसर कड़ी मनुष्यक रंग-रूपक,ताकय लेल छल निकलल।दÝ देलन्हि अवतारक नाम,भरत-तनय रोकलन्हि वैज्ञानिक सोच,कड़ी गेल टूटि, ताकयमे कल्कि,ताहि द्वारेतँ नहीं एलाह मैत्रेय।लागि रहल अछि भेटल सूत्रक ओर आर,फूसिये छलहुँ डरायल करब षोडषोपचार।
वेद, पुराण, महाभारत,रामायण,अर्थशास्त्र ओ,आर्यभट्टीय,लीलावती, भामती,राजनीति,गणित,भौतिकी केर समग्र चरित्र।कर्मक शिक्षा गेल ऊधियाय, बिहारिमे अंधविश्वासक।दर्शन भेल जतय अनुत्तरित,आविज्ञान देलक किछु समाधान,तँ पकरब छोर एकर गुरुवर,जे केलक समस्या दूर।एकर परिधि भने अछि छोट,यदि परिधि करब पैघ,तँ फेर बदलताह दर्शनक कांट्रेक्टर,दर्शनकेँ धर्ममे आधर्मकेँ          नरक-स्वर्गक प्रकार-प्रकारंतरमे।

भौतिकी आएस्ट्रोनोमीकेँ बनेलथि एस्ट्रॉलोजी
                        विज्ञान बनल अंधविश्वास।

जखन नेति-नेति बनत उत्तर। तखन भने रहय दियौक प्रश्ने अनुत्तरित।
सभ गेलथि आगू, मुदा भरत-तनय छथि पाछू।लीलावतीयोमे,भानुमतीयोमे कोना तकताह जातिगत भेद,एकलव्यक प्रशंसामे व्यासजीक लेख मुदा कार्य नहि क्यो बढ़ेलक आगू।सहस्त्राब्दीक अंतराल देलक जातिगत करताल।विज्ञान आकला,भूख आअन्न;भेलाह जातिगत छोड़ताह की स्वाछन्न।यादि पड़ल गामक भोज,ब्राह्मण आशोलहकन्हक फराक पाँति,पहिल पाँतिमे खाजा-लड्डू परसन पर परसन,दोसर पाँतिमे एक्के बेर देल।रोकल कला-विज्ञानक भागीरथीक धार,भेटल राहूक ग्रास।यादि पड़ैछ पिताक श्राद्धकर्म,भरि दिन कंटाहा ब्राह्मणक अत्याचार,आसाँझमे गरुड़ पुराणक मारि।
सौर-विज्ञानक रूपांतर आग्रहणक कलन,दक्षिणाक हेतु भेल कलुषित।रक्षा-विज्ञानक रामायणक पाठ,कखन सिखेलक भीरुताक अध्यात्म।ब्यास्जीक कर्ण-एकलव्य-कृष्णक पाठ सामाजिक समरसताक;अखनहु धरि अछि जीवंत, नहीं भेल खतम;दू-सहस्त्राब्दी पहिनेक उदारवादी सोच;सुखायल किएक विद्या,सरस्वती-धार जेकाँ भेल अदिन;
तखनहि जखन विद्या-देवी छोड़लन्हि,सुखा गेलीह बिनपानिक बिन बुद्धिक।फेर अओतीह कि घुरि कए बदलि भेष,एतय, हम्मर भारत देश?
हजार बर्षक घोँघाउज,कि होयत बंद?आकि एकलव्य-कर्ण-कृष्णक पाठ छोड़ि,युधिष्ठिर-शकुनिक एक्का-दुक्का-पंजा-छक्काक पढ़ब पाठ।कच्चा बारहकेँ शकुनि बदलताह पक्का बारहमे,आकरताह अपन पौ-बारह।तीनटा पासा आचारि रंगक सोरे-भरि गोटी,     करत भाग्यक निर्माण?चौपड़क चारि फड़ आएक फड़मे चौबीस घर,की ई फोड़त भारतक घर?युधिष्ठिर जौं भेटताह तँ कहितियन्हि,जे चारि लोकक सोझ केला पासाक,खेलयतहुँ जकर नियम होइछ हल्लुक।

दू व्यक्तिक रंगबाजी खेलकेँ अहाँ ओझरेलहुँ,खेला खेलक संग नहि वरनT खेलेलहुँ देश आप्त्नीक संग।तैं दैत छी हम ई उपराग,शकुनियोसँ पैघ कैल अहँ अपराध।
जकरे नाम लालछड़ी सैह चलि आबय ठोकर मारि पड़ाय,सतघरिया;ती-ती तीतार तार मेना बच्चा अंडा पार;
बच्चामे खेलाय छलहुँ आमक मासमे ई खेला;
पासाक खेल सेहो खेलेलहुँ द्विरागमनक बाद भड़फोड़ी तक कनियाक संग।वासर-रैन हे युधिष्ठिर-रूपी भरत-तनय नहि खेलाऊ ई खेल,सभकेँ दियÝ ई शिक्षा,दिअऊ संगीतक मेल;स्मृति भय तोड़ल सुर,दियह सुमति वर हे अय गोसाञुनि,गाबि सकी हमारा गीत।कज्जल रूप तुअ काली कहिअए,मात्र ईएह नहि सत्य हे मीत,उज्जल रूप तुअ वाणी कहिअए;सएह होयत हमर परिणीत।झम्पि बादर दूर भेल भय,गगन गरजि उठेलक हुतासन कए,हृदय मध्य बाउग कए,मौलि-मउल छाउर दए।शंख-फूकब वीर रससँ,करब शुरु भय-भंजन;स्मृति-स्वप्नक दंडसँ,खनहि तोड़ब खन-खन, करब मंथन।
सागर-द्वारि पर आनब भुजदंडसँ,गामक दूटा पाँतिक भोजनक आस्वादन।खोलब बंद बुद्धि-विवेक, रुण्डमालमसानीसँ,तोड़ब पाँति नहितँ करब नगरकेँ पलायन।गाम गाम रहत नहितँ,डुबायब भागीरथीक धारसँ;जे रोकलथि एकर धार प्रलय-सन,डूबताह-डूबेताह दू पाँतिबला गामकेँ अपन कुकर्मसँ।
भेल भूमि विलास कानन,निविल बोन विहसि आनल;कण्टक मध्य कुसुम विकल छल,दर्शन-घोषनि-ब्राह्मण ओझरल।धरणि विखिन छल,गंगा-तनु झामर,नहि कल-कल।विज्ञान गणितक कोमल-गल,अभाग्य तापिनि केलक छल।
बुद्धक नगर बसायब हम भल,अहाँ देव रहब स्वर्ग करि-केलि,गामक लोकहि बजायब ठाम,सोंपलि गाम,पाँति तोहाऊ,चलब दर्शन-अद्वैत मोहाऊ,गामेमे रहब हम मीत,गायब नव-दर्शनक गीत।अपन दर्शनक लेल जे देलक,अहाँकेँ गामक वनवास,लेब तकर बदला हमारा जा कय,कष्ट सहब देब अहाँकेँ निसास।
अपन दर्शनक लेल,दुइ सहस्त्राब्दिक खेल केलेलन्हि जे,तनिकर गामक स्वरूप हम करब कानन,बुद्धक नगर बनेलन्हि जे कण्टक,कुसुम ततय आनब हम आनब।सयमे दूटा दर्शनलेल फाजिल,पासा फेकब सहस्त्राब्दीक चौपड़ चारि युग पर,जे अज्ञात तकरो ताकब हमारा तात,परञ्च जे ज्ञात,तकर तकरए दियÝ हिसाब-किताब।


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पाराशर पुत्र भगवान व्यासकेँ,नमन-नमन शत नमन।केलन्हि चारू वेद लिपिबद्ध,आजय संहिता सम्मिलन॥धकय ध्यान ब्रह्माकेँ पूछल,पूछल के करत आब निबद्ध।ई नव ग्रंथ जे आयल अछि,अछि आयल मानस पटल समक्ष॥ब्रह्मा अति प्रसन्न भय कहल,करू प्रसन्न अहँ प्रसन्नवदनकेँ।वैह लिखि सकैत छथि पल,पल नित पल एहि ग्रंथ सकलकेँ॥केलन्हि ऋषि ध्यान गणेशक,आग्रह कएल प्रसन्नवदनकेँ।लिपिबद्ध करू भारतकेँ देववर,जाहिने छूटल किछु एहि जगकेँ॥कहल विनायक करब हम लिपिबद्ध ई,करू मुदा ई काज।रुकय नहि अहाँक वाणी हमर शर्त्त ई,नहि तँ रुकत ई काज॥व्यास से स्वीकारि कहल,मुदा राखू हमरो ई बात।लिखू अनवरत हे विनायक,मुदा बूझि सभ बात॥हँसि विनायक कहल फेर,शुरु करू ई भारत।बढ़ैत-बढ़ैत जे भेल जे,महा-महा महाभारत॥
गणेशक गति अति तीव्र,देखि व्यास कएल श्लोक जटिल।
श्लोकक भाष्य बूझि शीघ्र,विघ्नकर्ता लिखल सकल।।

               वैदिक प्रार्थना
ॐ संगच्छध्वं संवदध्यं संवो,मनांसि जानताम~~
। देवा भागं यथा पूर्वेसंजानाना उपासते॥समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वःसमानमस्तु वो मनो यथ वः सुसहासति॥

व्यास सुनाओल कंठस्थ कराओल,पुत्र शुकदेव आअन्य शिष्यकेँ।देवगण सुनल नारदमुनिसँ,गंधर्व राक्षस यक्ष सुनल शुकसँ॥व्यास शिष्य वैशंपायन,केलन्हि एकर प्रसार।कहि सुनाओल यज्ञ बिच,जे परीक्षित पुत्र जनमेजय कएल निस्तार॥पौराणिक सूतजी रहथि,तत मध्य।करि ऋषिसभा नैमिषारण्यमे,महर्षि शौनक अध्यक्ष॥सूतजी कएल शुरु,संहिता सतसहस्त्र।जय-भरत आमहाभारत,ऋषि-गणक मध्य॥



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हस्तिनापुर सम्राट शांतुनु,गंग तट भ्रमण करि रहल।युवती बनि देवि गंगा,तट जकर छलि ठाढ़ निश्चल॥भय अभिभूत कहल हे सुन्दरि,करु प्रेम स्वीकार हमर।पत्नी बनि करु राज,राज्य-धन-प्राण पर।।अछि समर्पण सभ अहाँ पर,किंतु अछि किछु बंधन हमर।क्यो पूछय नहि परिचय हमर,नहि रोक-टोक करय हमर कार्य पर।।प्रेम-विह्वल शांतुनु,करि स्वीकार बंधन सकल।आनल महल मानव-गंगाकेँ,समय बितल बितिते रहल॥भेल बात विचित्र ई जे,सात पुत्र शांतुनुकेँ भेल।युवती फेकल सभकेँ गंगधारमे,राजाने किछु पुछि सकल॥ई युवती के अछि जे,बुझि परैछ क्षण कोमल।क्षण क्रूर-क्रूरतम जे,अबोध बालक केर प्राणक हेतु विकल॥पूछल राजन् अपन शर्त्त तोड़ि,आठम बेर अपनाकेँ रोकि नहि सकल।देलक युवती परिचय सकल,हम गंग आ’  ई आठ वसु छल॥देलन्हि महर्षि वशिष्ठ शाप तनिका,मर्त्यलोकक जन्म लेबक।आठम पुत्रकेँ राखब हम किछु दिन,देवव्रत देब स्वरूप सेवक॥महर्षि वशिष्ठक नन्दिनीकेँ,देखि केलक प्त्नी वसु प्रभासक।
अपन मर्त्यलोकक सखी हेतु,नन्दिनीकेँ हरण तकर परु संग॥ऋषि ताकल गौ-देविकेँ,ज्ञान-चक्षुसँ।देलक शाप वसुगणकेँ भय-क्रोधित,कएल प्रार्थना वसुघ्राण शापित॥हमर शाप नहि घूरि सकत परञ्च,सात वसु भय जायत मुक्त तुरन्त।प्रभासकेँ रहय परत ततय,किछु दिन धरि मर्त्यलोकक शरण॥
होयत यशस्वी ई बहुत,घुरि आयल वसुगण गंग पास।हे देवि बनू माता हमरा सभक,दियमुक्ति तखन अछि आस॥शांतुनु भय गेल विरक्त,
छूटि गेल गंगक सानिध्य।समय बीतल गेल एकदिन,तट, धारक समक्ष॥दिव्य बालककेँ देखल तत,करि रहल केलि ततय।रोकि रहल वाणक धारसँ,गंगधारकेँ जतय॥प्रस्तुति भेलि गंग तखन,सौंपि देल देवव्रतकेँ कहल।महर्षि वशिष्टसँ लय शिक्षा,वेद-वेदांगक निखिल॥शास्त्र-ज्ञान शुक्रचार्य सन,शस्त्रमे परशुराम खल।

     3
पाबि पुत्र तेजस्वी घुरि अयलाह शान्तनु,देवव्रतकेँ बनाय राजकुमार,दिन बितय लागल तनिक।कैक वर्ष बीतल एना,पुनि एक दिन आयल;
शान्तनु देखलन्हि जतय।यमुना तट तर अद्भुत सुवास,
आबि रहल तरुणी तनय॥
तरुणी छलि सत्यवती तनिक,सुवास छल वरदान मुनिक,परासर जिनकर नाम।
     गंगा-वियोग-विराग भेल दूर,     मोनमे आयल ब्याहक विचार,     प्रेम-याचना केल रज्यवर।     तरुणी छलि, पिता जनिक,     रहथि मल्लाहक सरदार।
कहलन्हि, हे राजा जायब,पिता जदि अनुमति देताह,तखनहि हम पत्नी बनब।
     केवटराज रहथि चतुर मुदा,     लगेलन्हि एकटा शर्त्त जे,     बनय हमर नातियेटा,     हस्तिनापुरक राजा एतय।
शान्तनु ई वचन दितथि कोना,से घुरि अयलाह अपन नगर।चिन्ता घून बनि काटय लागल,शरीर-कान्ति सकल तनय॥
     देवव्रत पूछल पितासँ,     हे बताऊ की बनल,     चिन्ताक कारण अहाँ कय,     शरीरकेँ दुबरा रहल।हे पुत्र की कहू, अहँकेँ,एकटा चिन्ता हमर,की होयत जदि अहाँकेँ,होयत युद्धमे किछु, ककर आशहम करब बढ़ायत, वंश हस्तिनापुरक हमर।।

कुशाग्र देवव्रत पूछि सारथीसँ,बात सभटा बूझि गेलाह,गेलथि केवटराज लग आ
राजपाट त्यागि अयलाह।केवटराज परञ्च राखल एकटा शंका,की होयत जौँ अहाँक,पुत्र जौँ छीनि लय,हमर नातिक राज्य जौँ॥

अप्रत्याशित प्रश्नक उत्तर,
अप्रत्याशित जौँ हुअय।बुझू जे इतिहास बनत,ई प्रतिज्ञा के करय।देवव्रत पितृ भक्तसँ,ई प्रतिज्ञा भेल तखन।
नहि करब हम विवाह आजन्म,गार्हस्थ्य आश्रम छोड़ि कय।
रहब आजन्म ब्रह्मचारी,छोड़ब वानप्रस्थ आश्रम,हस्तिनापुर सिंहासनक मात्र रक्षा,करब हम आजन्म।

संन्यास आश्रम सेहो छोड़ब,संतान बूझब हस्तिनापुर सिंहासनकेँ।क्यो नहि छूबि सकत तकरा,हमरा जिबैत-जीबैत जतय।
धन्य-धन्य दिगान्त बाजल,पुष्प वर्षा कएलन्हि देवतागण,भीष्म-भीष्म धन्य-धन्य,बाजि उठल लोक सभ।
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केवटराज केलन्हि विदा,सत्यवतीकेँ सानन्द कएल ई कार्य।कालांतरमे पुत्र दू,पाओल चित्रंगद आविचित्रवीर्य।
     भेल देहावसान शांतुनुक,     चित्रंगद पओलाह राजा आसन,     गति पाओल युद्ध् मध्य एक,     विचित्रवीर्यकेँ भेटल शासन।     तनिक दूटा रानी छलन्हि,     अम्बिका ओअम्बालिका।     अम्बिकाक पुत्र धृतराष्ट्र रहथि,     काल छिनलक आँखि जनिकर,     पाण्डु रहथि अम्बालिका पुत्र,     पौण्ड्र रोग ग्रसित तनिक छल।
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सत्यवती-पुत्र चित्रांगदक मृत्यु,गंधर्व-युद्धमे भेल जखन।विचित्रवीर्यकेँ हस्तिनापुर,राज्य छल भेटल तखन।छलाह छोट आयुक ओ,से राज्य-काजक भार सभ।भीष्मकेँ भेटल सम्हारय,से उठओलन्हि तात सभटा।भेलथि विवाह-योग्य विचित्रवीर्य जखन,भीष्मकेँ होबय लगलन्हि चिंता।समाचार सुनि स्वयंबरक खबरि,कशीराजक कन्या सभक भेटल प्रसन्नता।विदा भेलाह कशी भीष्म,जतय पहुँचल छलाह सौभदेश राजा शल्व,काशीराजक ज्येष्ठ पुत्री,अम्बा छलीह अनुरक्त जनिक।अम्बा,अम्बिका,अम्बालिका,दृष्टि फेरल भीष्म दिशि।बढि गेलीह आगू तखन,भीष्म क्रोधित भय दहोदिश,ललकारिकेँ कहलन्हि तखन ओसमस्त राजा सुनि लिअह ई,जौँ पराजित कय सकी तौँ,स्वयंबरक भगी बनू सौँ।सभकेँ हराकए भीष्म जखन,चललाह भीष्म कशीराजक कन्याँ समेत।शाल्व रथक पाछू पड़ल आ,ललकारि कएँ कहलक विशेष।घोर युद्ध मचि गेल तकरा,बादक ई गप्प सुनु जन।धनुष-विद्या धनी भीष्म,कएलन्हि पराजित शाल्वकेँ तखन।काशीराजक कन्यासभ कएलन्हि,प्रार्थना भीष्मसँ जखन,छोड़ि देलन्हि प्राण शल्वक,पहुँचलाह भीष्म हस्तिनापुर तुरंत।विचित्रवीर्यक व्याहक तैयारी,जखन भगेल पूर्ण छल।अम्बा कहलन्हि भीष्मसँ एकांतीमे,हे गंगेय अहँ धर्मज्ञ छी।हमरा मोनमे अछि एक गोट शंका,करू अपने दूर ई।मानि लेल सौभ देश राजाकेँ,पति हम अपना हृदय-बिच।धर्मात्मा, महात्मा छी अहाँ,उद्धार करू हमर सोचि ई।भीष्म-निर्णय भेल ई जे,जाथु अम्बा शल्व लग खन।कराओल विवाह विचित्रवीर्यक,अम्बा-अम्बालिकाक संग तखन।अम्बा गेलीह शल्व लग आसुनाओल सभ वृतांत सभ।मानि हृदयमे पति अहाँकेँ,कएल अनुरोध भीष्मसँ हम।भीष्म छथि पठओने अहाँ लग,करु हमरा स्वीकार अहाँ।शास्त्रोक्त विधिसँ कए विवाह,पत्नी बनाऊ हमरा अहाँ।
शाल्व छलाह वीर किंतु,कहल हे अम्बे सुनू।भीष्म हराओल लोक सभ विच,जीति लए गेल अहाँकेँ सुनू।एहि अपमानक बाद की ई,बात हमरा स्वीकार हो?ई उचित अछि जाऊ अहाँ,पुनि भीष्म दरबार ओ।घूरि कय अम्बा गेलीह,भीष्म लग ई गप कहल।भीष्म कहल-बुझाओल विचित्रवीर्यकेँ,ओह्ठी छल नहि बुझल।कहल हे भाई ई सुनू जे,दोसराकेँ पति मानि चुकल।क्षत्रियोचित नहि होयत जौँ,हम विवाह करू तखन।अम्बा कहलन्हि भीष्मकेँ हे,गंग-पुत्र सुनू तखन।अहाँ हरि अनलहुँ जखन।विवाह करू हमरासँ तखन।ई परम कर्त्तव्य होयत,स्वयंबर जीतल छलहुँ अहीं,हमर वर्त्तमानक हेतु,अहीं जिम्मेवार छी।
भीष्म कहल, छी प्रतिज्ञ हम,कएलन्हि अनुरोध विचित्रवीर्यसँ,नहि बनल गप जखन पुनि,सुझव देल शाल्वक सुनि,शल्व नहि भेलाह तैयार किंतु।बीतल छह वर्ष हस्तिनापुर-सौभ,एनाई-जेनाईमे जखन,अम्बा भरि उठलीह प्रतिशोधसँ,भीष्मे छलाह हुनक दुर्दशाक कारण।कएलन्हि कतबा राजासँ ई आग्रह,भीष्मक विरुद्ध, परंतु नहि पाबि,कोनोटा उत्तर गेलीह शरण,युद्धदेव कार्तिकेयक।हे मोरक सवारी केनिहार,युद्धक देवता कार्तिकेय।नहि क्यो पृथ्वी पर आर,भेल भीष्म अजेय।कमल नयनी अम्बाक घोर तपस्या, केलन्हि कार्तिकेयकेँ प्रसन्न।देलन्हि नहि मौलायबला कमलक माला।कहलन्हि हे अम्बे!लियह ई शस्त्र,जकर गार पहिरायब सैह करत भीष्मकेँ नष्ट।भीष्मक भय परञ्च छल ततेक,नहि क्यो तैयार भेल पहिरय माला एक।सुनलन्हि छथि द्रुपद वीर पांचाल,सेहो तैयार नहि भेलाह पहिरय ई माल।निराश हताश लटकाय ई माला,द्रुपदक महलक द्वारि।घुरलीह अम्बा अंतमे हारि,गेलीह ब्राह्म्ण तपस्वीक शरण।सभ तपस्वी कए विचार कहलन्हि,जाऊ अहाँ परुशरामक आश्रम।क्षत्रिय-दमन छथि ओदेथिन्ह द्ण्ड भीष्मकेँ,जे कष्ट देलन्हि अहाँकेँ अकारण।परशुराम लग पहुँचि केलन्हि प्रार्थना,सुना कय अपन अभ्यर्थना।पुछलन्हि परशुराम, कहू की करू हम,हे काशीराज कन्या।शल्व अछि प्रिय हमर बात नहि काटत,विवाह  शल्वसँ करक हेतु की छी तैयार अहाँ।अम्बा कहलन्हि,हे परशुरामजी,हम आब विवाह नहि करय चाहैत छी।अछि हमर आब ई इच्छा मात्र,करू भीष्मसँ युद्ध अहाँ।भीख माँगय छी हे तात,वध दुष्टक करू अहाँ।परशुराम कए स्वीकार ई प्रार्थना,देलन्हि भीष्मकेँ ललकारा,जितेन्द्रीय,ब्रह्मचारी छलाह दुनू,धनुर्धारी-योद्धा मध्य युद्धघोष बरु।
हारि-जीतक प्रश्न नहि छल जौँ,अनिर्णायक युद्ध बनल पुनि।
अम्बा हारि भीष्मक छल सौँकैलाशक दिशि प्रयाण कएल तौँ,अम्बा गेलीह शम्भूक शरणमे।भए प्रसन्न भोला देलन्हि वर हर-हर,होयत पुनर्जन्म अम्ब सुनू अहँक,भीष्मक मृत्यु अहींक हाथ होयत।अम्बाक संयमक सेहो छल सीमा,नहि रुकि सकलीह तखन ओ,लाल आँखि अग्निक समान,कूदि पड़्लीहचितामे।मृत्यु पाबि जन्म लेल तखन ओ,कन्या बनि द्रुपदक राजमहलमे।खेल-खेलमे माला पहिरल ओ,दय कय जखन गरामे।कार्तिकेय देखल अम्बकेँ फेर,पहिरैत अपन ई माला।द्रुपद देखल होयत ई फेर ,वैर भीष्मक आयत झमेला।निकालि राजमहलसँ कन्याकेँ,विदा कएल जंगल दिशि।यादि छल सभटा कन्याकेँ,पुनर्जन्मक कथन सकल ई।कएल तपस्या पाओल पुरुष रूप,नाम धरल शिखण्डी।

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A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [Series ISBN Number: 978-93-5812-486-6] गद्य पद्य भारती खण्ड १ आ २ (विदेह सदेह २८ & विदेह सदेह ३७) [खण्ड १ ISBN No: 978-93-341-0402-8; खण्ड २ ISBN No: 978-93-5890-150-4]

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