भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Saturday, October 11, 2008

कान्तिपुर, नेपालक तुलजाभवानी मंदिरक शिलालेख पर अंकित प्रतापमल्लक मैथिली गीत





कवीन्द्र प्रतापमल्ल(१६४१-७४)- नरसिंहमल्लक पश्चात् कान्तिपुरक राजसिंहासनपर बैसलाह। हिनकर भक्तपुर, पाटन आऽ मधेसपर धाक छलन्हि। हिनकर वैवाहिक सम्बन्ध कूचबिहारक राजा वीरनाराय़णक पुत्री रूपमती, कर्णाट-कन्या राजमती, महोत्तरी राज्याधिप कीर्तिनारायणक पुत्री लालमीत ओ अनन्तप्रिया, प्रभावतीक सग छलन्हि। संस्कृत, नेवारी, मैथिली आऽ नेपालीक संग आन भाषा सभक विद्वान् छलाह आऽ तिरहुता समेत पन्द्रह तरहक लिपिक सूचना हुनकर शिलालेखमे प्राप्त होइत अछि।

हेरह हरषि दूष हरह भवानि।
तुअ पद सरण कएल मने जानि।।

मोय अतुइ दीन हीन मति देषि।
कर करुणा देवि सकल उपेषि॥

कुतनय करय सहस अपराध।
तैअओ जननि कर वेदन बाध॥

परतापमल्ल कहए कर जोरि।
आपद दूर कर करनाट किशोरि॥

जनकपुरक सनेस ३ कवि हिमांशु चौधरी/ रेवतीरमण लाल/ वृषेश चन्द्र लाल/ निमिष झा/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि/ रूपा धीरू कविता-प्रस्तुति जितेन्द्र झा जनकपुर


हिमांशु चौधरी


विष-वृक्ष

धरतीमे आबि
आकाश दिश ताकऽ बला
स्थितिसँ
काँपि रहल छी
हसोन्मुख प्राप्तिकँ लऽ कऽ
दुःखक अन्तिम परीक्षा भऽ रहल अछि
देवता रहितौ
देवता मरि गेलाक कारणें
आस्था
मन्दिरमे सूतल अछि
सुषुप्त आस्थाकेँ
जगओनाइ कठिन भऽ रहल अछि
दिनानुदिन आ उपचारहीन
युगक अवैध घाओक
पीजमे पिछड़ि कऽ
हरेक अंगकेँ
क्यान्सर कहि
नियतिमे दिन बिताबऽ पड़ि रहल अछि
घाओक टनकनाइसँ बेसी
घाओक परिकल्पनासँ
अवरुद्ध अछि- कण्ठ आ छाती
आड़ि-आड़िमे
शरीरक अंग भेटऽ लागल अछि
हर जोतबाक
सहास नहि भऽ रहल अछि
मानचित्रसँ
हिमालक छाह भागल जा रहल अछि
पहाड़ आ मधेशमे
अन्हार बढ़ल जा रहल अछि
पीयर गजुरक नीचाँ
हवाक वेगसँ
बुर्जाक घण्टीमे
सेहो घृणा चिचिया रहल अछि
उड़ैत परबाक पाँखिमे
सेहो बारुद बान्हल अछि
फरिच्छेमे
मृत्युदण्डक क्रम बढ़ैत गेलासँ
मृत्युक खातामे
मूल्यवान छाती
छाउर भेल जा रहल अछि
भोर आ राति
गर्भाधान कएनाइ
छोड़ने जा रहल अछि
छीः छीः
एहनेमे विष वृक्ष रोपनाइ नहि
बन्द भऽ रहले अछि।

डा. रेवतीरमण लाल

मधुश्रावनी

मधुश्रावनी आएल
मन-मन हर्षए
चहुँदिस साओन
सुन्दर घन वर्षए
काँख फुलडालि
मुस्कथि कामिनी
मलय पवन
सुगन्धित शीतल
दमकए दामिनी
नभ मंडलमे घनघोर
मानू जल नहि वर्षए
ई विरही यक्षक नोर
झिंगुर बेंङ्ग गुञ्जए
जल थल अछि चहुँओर।


वृषेश चन्द्र लाल


नजरि अहाँक चितकेर जूड़ा दैत अछि।
घुराकए एक क्षण जिनगी देखा दैत अछि।
धँसल डीहपर लोकाकए फेर स्वप्न महल
पाङल ठाढ़िमे कनोजरि छोड़ा दैत अछि॥

बजाकए बेर-बेर सोझे घुराओल छी हम
हँसाकए सदिखन हँसीमे उड़ाओल छी हम
बैसाकए पाँतिमे पजियाकए लगमे अपन
लतारि ईखसँ उठाकए खेहारल छी हम
सङ्केत एखनो एक प्रेमक बजा लैत अछि
जरए लेले राही जड़िसँ खरा दैत अछि
उठाकए उपर नीच्चा खसाओल छी हम
जड़ाकए ज्योति अनेरे मिझाओल छी हम
लगाकए आगि सिनेहक हमर रग-रगमे
बिना कसूर निसोहर बनाओल छी हम
झोंक एक आशकेर फेरो नचा दैत अछि
उमंगक रंगसँ पलकेँ सजा दैत अछि


निमिष झा

हाइकू

चाँदनी राति
नीमक गाछ तर
जरैछ आगि।

गरम साँस
छिला गेलैक ठोर
प्रथम स्पर्श।

परिचित छी
जीवनक अन्तसँ
मुदा जीयब।

बहैछ पछबरिया
जरै उम्मिदक दीया
उदास मोन।

पीयाक पत्र
किलकिञ्चत् भेल
उद्दीप्त मोन

श्रम ठाढ़ छै
श्रमिक पड़ल छै
मसिनि युग।

मृत्युक नोत
जीबाक लेल सिखु
देब बधाइ।

धीरेन्द्र प्रेमर्षि

चहकऽ लागल चिड़िया-चुनमुन
पसर खोललकै चरबाहासुन
नव उत्साहक सनेस परसैत
करै कोइलिया सोर
उठह जनकपुर भेलै भोर
दादीक सूनि परातीक तान
तोड़ल निन्न सुरुज भगवान
सूतलसभकेँ जगबऽ लए पुनि
गूँजि उठल महजिदमे अजान
कहैए घण्टी मन्दिरक
मनमे उठबैत हिलोर
उठह जनकपुर भेलै भोर

हम्मर-तोहर इएह धुकधुक्की
फैक्ट्रीक साइरन, ट्रेनक पुक्की
खालि कर्मक जतऽ भरोसा
दुख-सुख जिनगीक चोरानुक्की
घरसँ बहरैहऽ पाछाँ जा
ता मन करह इजोर
उठह जनकपुर भेलै भोर

अन्यायक संग लड़बालए तोँ
प्रगतिक पथपर बढ़बालए तोँ
मिथिलाकेर अम्बरपर बिहुँसैत
चानक मुरती गढ़बालए तोँ
गौरवगाथा सुमिरैत अप्पन
हिम्मत करह सङोर
उठह जनकपुर भेलै भोर


रूपा धीरू


अङ्गेजल काँट


नहि जानि बहिना किएक
आइ तोँ बड़ मोन पड़ि रहल छह
आ ताहूसँ बेसी तोहर ओ
छहोछित्त कऽ देबवला
मर्मभेदी वाण।

बहिना तोँ कहने रहऽ हमरा
ऐँ हइ बहिना!
एहन काँट भरल गुलाबकेँ
अपन आँचरमे एना जे सहेजने छह
तोरा गड़ैत नहि छह?
तोँ उत्तर पएबाक लेल उत्सुक छलह
मुदा हम मौन भऽ गेल रही
आ तोँ मोनेमोन गजिरहल छलह।
हँ बहिना, ठीके
हमरो तोरेजकाँ
अपन जिनगीमे फूलेफूल सहेजबाक
सपना रहए
आ अगरएबाक लालसा रहए तोरेजकाँ
अपन जिनगीपर
मुदा की करबहक...!
मोन पाड़ह ने
छोटमे जखन अपनासभ
ती-ती आ पँचगोटिया खेलाइ
बेसी काल हमहीँ जीतैत रही
मुदा जिनगी जीबाक खेलमे
हम हारि गेल छी बहिना।
काँट काँटे होइ छै बहिना
गड़ै कतहु नहि
मुदा हम काँटेकेँ अङेजि लेने छी
मालिन जँ काँटकेँ
नइ अङेजतै बहिना तँ फेर गुलाब महमहएतै कोना?

जनकपुरक सनेस २ कवि राजेन्द्र विमल/ रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"/ रोशन जनकपुरी कविता- प्रस्तुति जितेन्द्र झा जनकपुर


डा. राजेन्द्र विमल (१९४९- )



नयनमे उगै छै जे सपनाकेर कोँढ़ी
फुलएबासँ पहिने सभ झरि जाइ छै
कलमक सिनूरदान पएबासँ पहिने
गीत काँचे कुमारेमे मरि जाइ छै
चान भादवक अन्हरिये
कटैत अहुरिया
नुका मेघक तुराइमे हिंचुकै छल जे
बिछा चानीक इजोरिया
कोजगरामे आइ
खेलए झिलहरि लहरिपर
ओलरि जाइ छै
हम किछेरेपर विमल ई बूझि गेलियै
नदी उफनाएल उफनाएल
कतबो रहौ
एक दिन बनि बालू पाथरक बिछान
पानि बाढ़िक हहाकऽ हहरि जाइ छै
के जानए कखन ई बदलतै हवा
सिकही पुरिवाकेर नैया डूबा जाइ छै
जे धधरा छल धधकैत धोंवा जाइ छै
सर्द छाउरकेर लुत्ती लहरि जाइ छै
रचि-रचिकऽ रूपक करै छी सिंगार
सेज चम्पा आऽ बेलीसँ सजबैत रहू
मुदा सोचू कने होइ छै एहिना प्रिय
सींथ रंगवासँ पहिने धोखरि जाइ छै

रामभरोस कापड़ि "भ्रमर" (१९५१- )


गजल
करिछौंह मेघके फाटब, एखन बाँकी अछि
चम्कैत बिजलैँकाके सैंतब, एखन बाँकी अछि
उठैत अछि बुलबुल्ला फूटि जाइछ व्यथा बनि
पानिके अड़ाबे से सागर, एखन बाँकी अछि
बहैत पानिआओ किनार कतौ खोजत ने
अगम अथाह सन्धान, एखन बाँकी अछि
फाटत जे छाती सराबोर हएत दुनियाँ “भ्रमर”
ई झिसी आ बरखा प्रलय, एखन बाँकी अछि।

रोशन जनकपुरी


डर लगैए
नाचि रहल गिरगिटिया कोना, डर लगैए
साँच झूठमे झिझिरकोना, डर लगैए
कफन पहिरने लोक घुमए एम्हर ओमहर
शहर बनल मरघटके बिछौना, डर लगैए
हमरे बलपर पहुँचल अछि जे संसदमे
हमरे पढ़ाबे डोढ़ा-पौना, डर लगैए
आङनमे अछि गुम्हरि रहल कागजके बाघ
घर घरमे अछि रोहटि-कन्ना, डर लगैए
आँखि खोलि पढ़िसकी तऽ पढ़ियौ आजुक पोथी
घेँटकट्टीसँ भरल अछि पन्ना, डर लगैए
चलू मिलाबी डेग बढ़ैत आगूक डेगसँ
आब ने करियौ एहन बहन्ना, डर लगैए

दियाबातीक अवसरपर डा. राजेन्द्र विमल आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक पद्य- प्रस्तुति जितेन्द्र झा जनकपुर


डा. राजेन्द्र विमल (1949- )त्रिभुवन विश्वविद्यालयक जनकपुर कैम्पसमे नेपाली भाषा विभागक अध्यक्ष छथि।

दीयाबाती पर एक टा गजल- राजेन्द्र विमल


जगमग ई सृष्टि करए तखने दिवाली छी
प्रेम चेतना जागि पड़ए तखने दिवाली छी

जीर्ण आ पुरातनकेँ हुक्का-लोली बनाउ
पलपल नव दीप जरए तखने दिवाली छी

स्नेहकेर धार बहत बनत जग ज्योतिर्मय
हर्षक फुलझड़ी झरए तखने दिवाली छी

अनधन लछमी आबए दरिदरा बहार हो
रङ्गोली रङ्ग भरए तखने दिवाली छी

रामशक्ति आगूमे रावण ने टीकि सकत
रावण जखने डरए तखने दिवाली छी


धीरेन्द्र प्रेमर्षि (1967- ) हेलो मिथिला, काठमाण्डूक सुपरिचित मैथिली उद्घोषक छथि आ लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार छथि।

शुभकामना दिआबातीक- धीरेन्द्र प्रेमर्षि

चमकैत दीपकेँ देखिकऽ
जेना झुण्ड कीड़ा-मकोड़ा
कऽ दैछ न्यौछावर अपन अस्तित्व
दुर्गुण वा खलतत्त्वरूपी कीड़ा-मकोड़ाकेँ
नष्ट करबाक लेल चाही ने आओर किछु
अपना भीतरक मानवीय इजोतक टेमी
कने आओर उसका ली
अपनाकेँ सभक मन-मनमे मुसका ली
इएह अछि शुभकामना दिआबातीक-
देहरि दीप जरए ने जरए
मनधरि सदति रहए झिलमिल
किएक तँ अपना मात्र इजोतमे रहने
मेटा नहि सकैछ संसारसँ अन्हार

जनकपुरक सनेस १ कवि दिगम्बर झा दिनमणिक तीन टा कविता- प्रस्तुति जितेन्द्र झा जनकपुर

दिगम्बर झा “दिनमणि”



चल रौ बौआ चलै देखऽले घुसहा सब पकड़ेलैए
घुसुर घुसुर जे घुस लैत छल,
से सब आइ धरैलैए

मालपोत, भन्सार, पुलिस कि, कर अदालत जेतौं
घूसखोरक संजाल पसारल छै बाँच नै पबितौं
अनुसन्धानक कारवाइमे
सवहक होस हेरेंलैए

विना घूसके कहियो ककरो, जे नै कानो काज करै
बैमानी सैतानी करबा, मे नै कनिको लाज करै
क्यो कानूनके चंगुलमे फँसने
परदेस पड़ेलैए



हम सुना रहल छी तीन धार
भारी सहैत अछि भार कहथि सभ खेती सहिते अछि उजाड़।
गिद्दड़ सन सुटकओने नाङरि आगू पाछ जे छल करैत।
जे भोर साँझ, दश लोक माझ, हमरे दिश छल रहि-रहि बढ़ैत।
हम आङुर पकड़ि जकरा पथपर अति शिघ्र चलाऽ देलौं
हमरे प्रगतिक पथकेँ आगाँ, से ठाढ़ भेल बनिकऽ पहाड़॥
हम सुना
ककरा कहबै के सुनत आब, पओ कतौ छैक छै कतौ घाव,
हम भेलौं आब हड्डी समान, कहियो हमहीं रुचिगर कवाव।
हम घास खाअकऽ पालि-पोसि, जकरा कएलौं दुधगरि लगहरि,
तकरा लगमे जँ जाइत छियै, तऽ हमरे मारैए लथार॥ हम सुना,
हम तोड़ि देबै झिक-झोड़ि देबै शाखा फल-फूल मचोड़ि देबै,
स्वार्थक छै जे जड़िआएल बृक्ष तकरा जड़िस हक कोड़ि देबै।
मनमे जे चिनगी सुनगि रहल, से कहियाधरि हम झाँपि सकब,
तें ई मन जहिया लहरि जेतै, तहिया खएतै धोविया पछाड़॥ हम सुना



चलैमन जगदम्बाक द्वारि चलैमन जगदम्बाक द्वारि।
सब दुःख हरती झोड़ी भरती, बिगड़ल देती सम्हारि॥
चलै मन...

मधु कैटभक डरे पड़एला जटिया स्वयं विधाता।
पूजन ध्यान बन्दना कएलनि कष्टहरु हे माता॥
बोधल हरि मारल मधु कैटभ बिधिकेँ कएल गोहारि।
चलै मन..
महिषासुरक त्राससँ धरती थर-थर काँपए लागल
छोड़ि अपन घर द्वारि देवता ऋषि मुनि जंगल भागल।
हुनका सबहक कष्ट हरि लेलनि महिषासुरकेँ मारि। चलै मन..

हुँ कारक उच्चरित शब्दसँ धुम्र गेल सुरधाम।
चण्ड-मुण्ड आ रक्तवीजकेँ मिटा देलनि माँ नाम।
शुम्भ-निशुम्भ मारि धरतीसँ दैत्य कएल निकटारि॥ चलै मन...

शशि कुज बुध गुरु शुक्र शनिश्रवर की दिनमणिक तारा।
सर, नर मुनि, गन्धर्व अप्सरा सबहक अहीँ सहारा।
हमरो नैया पार करु माँ, भबसँ दिय उबारि। चलै मन...

Thursday, October 09, 2008

जीन मेरी गुस्ताव ली क्लाजियो - एहि सालक साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित


जीन मेरी गुस्ताव ली क्लाजियो (1940-)केँ एहि सालक साहित्यक ८ लाख १५ हजार पौंडक साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मनित कएल जएबाक घोषणा भेल अछि। मानवताकेँ राज कए रहल सभ्यतासँ नीचाँ आऽ आगू जाऽ कए देखबाक प्रवृत्ति छन्हि क्लाजियोक।न्यू-डिपार्चर्स,पोएटिक एडवेंचर आ सेंसुअल एक्सटेसीक लेख छथि क्लाजियो।

ली क्लाजियो मूलतः फ्रांसीसी भाषाक उपन्यासकार छथि, ओना हिनकर पिता अंग्रेज आऽ माता फ्रांसीसी छथिन्ह, दुनू गोटे मारीशससँ सम्बन्धित आऽ नाइजीरियाक समुद्री यात्रासँ नेनपनहिमे साहित्यिक जीवनक प्रारम्भ कएलन्हि। १९६३ ई. मे हिनकर पहिल उपन्यास प्रकाशित भेल आऽ आधुनिक समाजक प्रति एक तरहक विद्रोह छल। फ्रेच लेखक सभमे क्लाजियो स्वीकृत नहु भऽ सकलाह आऽ एखन ओऽ न्यू मेक्सिकोमे रहैत छथि।

थर्ड वर्ल्डक नजरिसँ देखब हिनकर रचनाक एकटा विशिष्टता छन्हि। मारीशसक उपन्यासकार अभिमन्यु उनुथक आ ताहि क्रममे रामायणक चरचा सेहो क्लाजियो करैत छथि।

हिनकर पहिल उपन्यास ले-प्रोसेस-वर्बल- द इनटेरोगेशन (जांचक पूछताछ)१९६३ ई. मे आयल जे अस्तित्ववादक बादक समयक उपन्यास छल। दिन-प्रतिदिनक भाषणबाजीक बदला सत्याताकेँ देखबय बला शक्ति ओ शब्द सभकेँ देलन्हि। फेर आयल हुनकर दू टा कथा संग्रह ला-फीवर आ ला-देल्यूज, एहि दुनू संग्रहमे पाश्चात्य नगरक समस्या आ डरक यथार्थ चित्रण भेल अछि।
टेरा-अमाटामे हुनकर पारस्थितिकी-तंत्रसँ जुड़ाव स्पष्ट अछि तँ डेजर्टसँ ओ उपन्यासक्लारक रूपमे स्थापित होइत छथि, एहिमे ओ उत्तर अफ्रीकाक लुप्त होइत संस्कृतिक चित्रण करैत छथि। क्लाजोयो दार्शनिक लेख सेहो लिखने छथि आऽ बच्चा लोकनिक लेल लुलाबी सेहो।

Tuesday, October 07, 2008

प्रवासी मैथिलकेँ समर्पित आठ गोट कविता- प्रस्तुति गजेन्द्र ठाकुर

विद्यापति(१३५०-१४५०) आऽ पाब्लो नेरुदा(१९०४-१९७१)

विद्यापति(१३५०-१४५०)



हम जुवती, पति गेलाह बिदेस। लग नहि बसए पड़उसिहु लेस।
सासु ननन्द किछुआओ नहि जान। आँखि रतौन्धी, सुनए न कान।
जागह पथिक, जाह जनु भोर। राति अन्धार, गाम बड़ चोर।
सपनेहु भाओर न देअ कोटबार। पओलेहु लोते न करए बिचार।
नृप इथि काहु करथि नहि साति।
पुरख महत सब हमर सजाति॥
विद्यापति कवि एह रस गाब। उकुतिहि भाव जनाब।



बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि, ठामे ठामे बस गाम।
हम एकसरि, पिआ देसाँतर, नहि दुरजन नाम।
पथिक हे, एथा लेह बिसराम।
जत बेसाहब किछु न महघ, सबे मिल एहि ठाम।
सासु नहि घर, पर परिजन ननन्द सहजे भोरि।
एतहु पथिक विमुख जाएब तबे अनाइति मोरि।
भन विद्यापति सुन तञे जुवती जे पुर परक आस।



परतह परदेस, परहिक आस। विमुख न करिअ, अबस दिस बास।
एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा।
भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि। पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि।
चरन-पखारन, आसन-दान। मधुरहु वचने करिअ समधान।
ए सखि अनुचित एते दुर जाए। आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ।



हम एकसरि, पिअतम नहि गाम। तेँ मोहि तरतम देइते ठाम।
अनतहु कतहु देअइतहुँ बास। दोसर न देखिअ पड़ओसिओ पास।
छमह हे पथिक, करिअ हमे काह। बास नगर भमि अनतह चाह।
आँतर पाँतर, साँझक बेरि। परदेस बसिअ अनाइति हेरि।
मोरा मन हे खनहि खन भाँग। जौवन गोपब कत मनसिज जाग।
घोर पयोधर जामिनि भेद। जे करतब ता करह परिछेद।
भनइ विद्यापति नागरि-रीति। व्याज-वचने उपजाब पिरीति।



उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर।
बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल।
बास चाहैत होअ पथिकहु लाज। सासु ननन्द नहि अछए समाज।
सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल।
पड़ेओस वास जोएनसत भेल। थाने थाने अवयव सबे गेल।
नुकाबिअ तिमिरक सान्धि। पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि।
मोरा मन हे खनहि खन भाग। गमन गोपब कत मनमथ जाग।



अपना मन्दिर बैसलि अछलिहुँ, घर नहि दोसर केवा।
तहिखने पहिआ पाहोन आएल बरिसए लागल देवा।
के जान कि बोलति पिसुन पड़ौसिनि वचनक भेल अवकासे।
घोर अन्धार, निरन्तर धारा दिवसहि रजनी भाने।
कञोने कहब हमे, के पतिआएत, जगत विदित पँचबाने।



सासु जरातुरि भेली। ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली।
तैसन न देखिअ कोई। रयनि जगाए सम्भासन होई।
एहि पुर एहे बेबहारे। काहुक केओ नहि करए पुछारे।
मोरि पिअतमकाँ कहबा। हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा।
पथिक, कहब मोर कन्ता। हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता।
भनइ विद्यापति गाबे। भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे।


पाब्लो नेरुदा (१९०४-१९७१), साहित्य लेल नोबल पुरस्कार १९७१ मे भेटलन्हि।

८.दुपहरियाक आसकतिक क्षण


अहाँक समुद्रसन गहीँर आँखिमे,
फेकैत छी नाहक पतबारि, निनायल दुपहरियामे,
ओहि पजरैत क्षणमे हमर एकान्त,
आर घन भए जड़ि उठल डूबैत घटवार जेकाँ,
धीपल लहलह चेन्ह, अहाँक हेरायल आँखिमे,
जेना दीप-स्तम्भक लगीचमे घुरैत जलराशि।

हमर देसाँतरक पिआ, अहाँ अन्हारे रखलहुँ,
अपन भंगिमासँ निकलैत दुःखक तटकेँ।


ठेहियायल दुपहरियामे, हम, फेर भए उदास फेकैत छी महाजाल
ओहि धारमे, जे अहाँक नाहसँ, आँखिमे अछि बन्न।
रतिचर चिड़ै, साँझेसँ निकलल तरेगणकेँ मारए लोल,
आऽ ओ हमर आत्मा जेना आर भए जाइत अछि दग्ध।

राति अपन छाहक घोड़ीपर अछि सबारी कसैत ,
अपन आकाशी रंगक अग्रभागसँ रेशमी चेन्ह छोड़ैत।

Friday, October 03, 2008

मैथिली भाषा केर ई पत्रिका

मैथिली भाषाक पहिल ई पत्रिका "विदेह" क १९ टा अंक ई-प्रकाशित भऽ चुकल अछि आऽ एकरा एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ २ अक्टूबर २००८ धरि)७०,४९७ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)।

"विदेह" मैथिली ई-पत्रिकाक नव १९ म अंक आऽ पुरान १८ टा अंक देखबाक लेल नीचाँक लिंक पर जाऊ।
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अपन रचना-सुझाव-टीका-टिप्पणी ई-मेलसँ पठाऊ-
ggajendra@videha.com पर।


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पथक पथ- गजेन्द्र ठाकुर

स्मृतिक बन्धनमे
तरेगणक पाछाँसँ
अन्हार गह्वरक सोझाँमे
पथ विकट। आशासँ!

पथक पथ ताकब हम
प्रयाण दीर्घ भेल आब।

विश्वक प्रहेलिकाक
तोड़ भेटि जायत जौँ
इतिहासक निर्माणक
कूट शब्द ताकब ठाँ।

पथक पथ ताकब हम
प्रयाण दीर्घ भेल आब।

विश्वक मंथनमे
होएत किछु बहार आब
समुद्रक मंथनमे
अनर्गल छल वस्तु-जात

पथक पथ ताकब हम
प्रयाण दीर्घ भेल आब।

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.

Tuesday, September 30, 2008

मैथिली भाषा

"विदेह" मैथिली ई-पत्रिकाक नव १९ म अंक आऽ पुरान १८ टा अंक देखबाक लेल नीचाँक लिंक पर जाऊ।
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मिथिलाक ध्वज ग़ीत- गजेन्द्र ठाकुर

मिथिलाक ध्वज फहरायत जगतमे,
माँ रूषलि,भूषलि,दूषलि, देखल हम,
अकुलाइत छी, भँसियाइत अछि मन।
छी विद्याक उद्योगक कर्मभूमि सँ,
पछाड़ि आयत सन्तति अहाँक पुनि,
बुद्धि, चातुर्यक आऽ शौर्यक करसँ,
विजयक प्रति करू अहँ शंका जुनि।
मैथिली छथि अल्पप्राण भेल जौँ,
सन्ध्यक्षर बाजि करब हम न्योरा,
वर्ण स्फोटक बनत स्पर्शसँ हमर,
ध्वज खसत नहि हे मातु मिथिला।


महाभारतमे उल्लेख अछि, जे इन्द्र-ध्वजा गाढ़ नील रंगक होइत छल। रामक ध्वजा लाल-गेरुआ रंगक छलन्हि आ’ एहि पर कुलदेवता सूर्यक चित्र अंकित छल। महाभारतमे अर्जुनक ध्वजा पर वानरराजक चित्र छल। नकुलक ध्वजा पर सरभ पशुक चित्र छल। अथर्ववेदक अनुसार सरभ पशु दू माथक , दूट सुन्दर पंख बला, एकटा नमगर पुछी बला आ’ सिंहक समान आठ नोकगर पैरक आँगुर युक्त्त होइत छल।अभिमन्युक द्वजा पर सारंग पक्षी छल। दुर्योधनक ध्वजा सर्पध्वजा छल। द्रोणक ध्वजा पर मृगछाल आ’ कमण्डल छल।कर्णक ध्वजा पर हाथीक पैरक जिंजीर छल, आ’ सूर्य सेहो छलाह।
भगवान विष्णुक ध्वजा पर गरुड़ अंकित अछि। शिवक ध्वजा पर नंदी वृषभ अंकित अछि।
दुर्गा मण्डपमे शस्त्र,ट्क्का,पटह,मृदंग, कांस्यताल(बाँसुरीकेँ छोड़ि), वाद्य ध्वज,कवच आ’ धनुष केर पूजन होइत अछि। एहिमे सर्वप्रथम खड्गक पूजा होयबाक चाही। तकरा बाद चुरिका, कट्टारक, धनुष, कुन्त आ’ कवच केर पूजा आ’ फेर चामर,छत्र,ध्वज,पताका,दुन्दुभि,शंख, सिंहासन आ’ अश्व केर पूजा होइत अछि। हमरा हिसाबे मिथिलाक कोनो झंडा बिना एहि सभक सम्मिलनक संपूर्ण नहि होयत।

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.

Saturday, September 27, 2008

"विदेह" मैथिली ई-पत्रिका

"विदेह" मैथिली ई-पत्रिकाक नव-पुरान अंक देखबाक लेल नीचाँक लिंक पर जाऊ।
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I.
इन्द्रस्येव शची समुज्जवलगुणा गौरीव गौरीपतेः कामस्येव रतिः स्वभावमधुरा सीतेव रामस्य या। विष्णोः श्रीरिव पद्मसिंहनृपतेरेषा परा प्रेयसी विश्वख्यातनया द्विजेन्द्रतनया जागर्ति भूमण्डले॥9॥

उपर्युक्त पद्य विद्यापतिकृत शैवसर्वस्वसारक प्रारम्भक नवम श्लोक छी। एकर अर्थ अछि- उत्कृष्ट गुणवती, मधुर स्वभाववाली, ब्राह्मण-वंशजा, नीति-कौशलमे विश्वविख्यातओ’ महारानी विश्वासदेवी सम्प्रति संसारमे सुशोभित छथि, जे पृथ्वी-पति पद्मसिंहकेँ तहिना प्रिय छलीह जहिना इन्द्रकेँ शची, शिवकेँ गौरी, कामकेँ रति , रामकेँ सीता ओ’ विष्णुकेँ लक्ष्मी॥9॥


II. मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्। जखन हनुमान रामक संदेश लऽ सीता लग लंकाक अशोक वाटिका गेलाह तँ सोचलन्हि जे रावण संस्कृत बजैत अछि। यदि हम रामक संदेश संस्कृतमे सीताकेँ देबन्हि तँ ओऽ हमरा रावणक छद्म रूप बुझि संदेह करतीह। हमरा मानुषी आऽ संस्कृत (मानुषीमिह संस्कृताम्) दुनू अबैत अछि, से ओऽ सीताक भाषा मानुषीमे रामक संदेश देलन्हि। वाल्मीकि रामायणक सुन्दर काण्डक ई मानुषी भाषा आजुक मैथिलीक प्राचीनतम लिखित प्रमाण अछि।
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.

माँ देवीदुर्गाक नौ टा रूप

नवरात्रि पर विशेष प्रस्तुति: जितमोहन झा (जितू)
शक्तिक आराधना क पर्व थिक नवरात्रि ! शक्ति क बिना यदि देखल जाय तँ शिवो अपूर्ण छथि ! शक्तिये सँ सम्पूर्ण ब्रह्मांड संचालित अछि ! शक्तिक आराधना क ई नौ दिन (नवरात्रि) बहुत महत्वपूर्ण मानल गेल छल ! कहल गेल अछि जे अइ नौ दिन मे ब्रह्मांड क सम्पूर्ण शक्ति जागृत होइत छल ! इ ओ शक्ति अछि जै सँ विश्व (संसार) क सृजन भेल छल !

नवरात्रिक परंपरा :- नवरात्रि मे माँ दुर्गा क नौ रूपक तिथिवत पूजा - अर्चना कएल जाइत छनि ! देवी दुर्गा क ई नौ रूप एहि प्रकारेँ छनि,(१) शैलपुत्री, (२) ब्रह्मचारिणी, (३)चंद्रघंटा, (४) कुष्‍मांडा, (५)स्‍कंदमाता, (६)कात्‍यायनी,(७) कालरात्रि, (८)महागौरी आर (९) सिद्धिदात्री। जिनका बारे मे विस्तार सँ नीचाँ पढ़ब !अपन देश भारत क सभ प्रान्त में नवरात्रि मनाबए क अपन अलग - अलग परंपरा अछि ! एहि नौ दिन तक छोट कन्या (लड़की) क़ए देवी स्वरुप मानल जाइत छनि, नवरात्रि क अवसर पर हुनका भोजन कराऽ कऽs दक्षिणा देला कऽ उपरांत हुनकर पैरक पूजा कएल जाइत छनि ! कन्याभोज आर कन्यापूजन क ई परंपरा लगभग सभ प्रान्त मे देखि सकैत छलहुँ !

माँ देवीदुर्गा क अलग - अलग नौ रूप

माँ क प्रथम रूप (शैलपुत्री) :- माँ देवीदुर्गा क प्रथम रूप छनि शैलपुत्री ! पर्वतराज हिमालय क घर जन्म लेला सँ हिनकर नाम शैलपुत्री पड़लनि ! नवरात्री क प्रथम दिन हिनकर पूजा - अर्चना होइत छनि ! माँ क महिमा अपरमपार छनि ! हिनकर पूजन सँ भक्तगण सर्वदा धन - धान्य सँ परिपूर्ण रहैत छथि ! हमरा सभ केँs एकाग्रभाव सँ मन केँ पवित्र राखि कऽ माँ शैलपुत्री क शरण मे आबए के प्रयास करवाक चाही !

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता !

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान आर शैलपुत्री क रूप में प्रसिद्ध अम्बे, अहाँकेँ हमर बारंबार प्रणाम ! वा हम अहाँ केँ बारंबार प्रणाम करैत छी ! हे माँ हमरा पाप सँ मुक्ति प्रदान करू !

माँ क दोसर रूप (ब्रह्मचारिणी) :- माँ देवीदुर्गा क दोसर रूप छनि ब्रह्मचारिणी ! नवरात्री त्योहार क दोसर दिन हिनकर पूजा - अर्चना होइत छनि ! साधक अइ दिन अपन मन कए माँ क चरण मे लगबैत छथि ! ब्रह्म क अर्थ अछि तपस्या आर चारिणी क मतलब आचरण करए वाली ! एहि प्रकारेँ ब्रह्मचारिणी क अर्थ अछि तप क आचरण करए वाली ! हिनकर दहिना हाथ मे जप क माला आर वाम हाथ मे कमण्डल छनि ! माँ देवीदुर्गा क ई दोसर रूप अनन्तफल दए वाली छनि ! हिनकर उपासना सँ मनुष्य मे तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम क वृद्धि होइत छनि ! माँ क साधकगण जीवन क कठिनो अवस्था वा संघर्ष मे कर्तव्य - पथ सँ विचलित नञि होइत छथि ! माँ क कृपा सँ हुनका सर्वत्र सिद्धि आर विजय के प्राप्ति होइत छनि !
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान आर ब्रह्मचारिणी क रूप मे प्रसिद्ध अम्बे, अहाँकेँ हमर बारंबार प्रणाम ! वा हम अहाँ केँ बारंबार प्रणाम करैत छी ! हे माँ हमरा पाप सँ मुक्ति प्रदान करू !

माँ क तेसर रूप (चंद्रघंटा) :- माँ देवीदुर्गा क तेसर रूप छनि चंद्रघंटा ! नवरात्री त्योहार क तेसर दिन हिनकर पूजाक बहुत महत्व अछि ! माँ क ई रूप बहुत शांतिदायक आर कल्याणकारी छनि ! हिनकर मस्तक पर घंटाक आकार क अर्धचन्द्र छनि ताहि हेतु हिनकर नाम चंद्रघंटा देवी पड़ल छनि ! हिनकर देहक रंग स्वर्ण (सोना) क समान चमकीला छनि ! हिनका दस हाथ छनि ओ दसो हाथ मे खडग अस्त्र - शस्त्र आर बाण सु-शोभित छनि ! माँ चंद्रघंटा क कृपा सँ भक्तगण क समस्तपाप आर बाधा विनष्ट होइत छनि ! हमरा सभ केँ चाही कि अपन मन, वचन, कर्म आर काया केँ विधि - विधान क अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध आर पवित्र कऽ कए माँ चंद्रघंटा क शरणागत भऽs कऽ हुनकर उपास - आराधना मे तत्पर रही !
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान आर चंद्रघंटा क रूप मे प्रसिद्ध अम्बे, अहाँकेँ हमर बारंबार प्रणाम ! वा हम अहाँ केँ बारंबार प्रणाम करैत छी ! हे माँ हमरा पाप सँ मुक्ति प्रदान करू !

माँ क चारिम रूप (कुष्मांडा) :- माँ देवीदुर्गा क चारिम रूप छनि कुष्मांडा! नवरात्री क चारिम दिन हिनके पूजा - अर्चना होइत छनि ! माँ क मंद, हल्का हँसी द्वारा अंड अर्थात ब्रह्मांड केँ उत्पन्न करए के कारण हिनकर नाम कुष्मांडादेवी पड़लनि ! संस्कृत भाषा मे कुष्मांडा केँ कुम्हर कहल गेल अछि ! ताहि हेतु बाली मे माँ केँ कुम्हर बहुत प्रिय छनि ! जखन सृष्टि क अस्तित्व नञि छलए तखन माँ कुष्मांडादेवी ब्रह्मांडक रचना केलथि तहिँ हेतु माँ सृष्टि क आदि स्वरूपा छथि ! हिनकर भक्तगणकेँ उपासना सँ सब रोग - शोक मेटा जाइत छनि ! हिनकर भक्तिसँ आयु, यश, बल, आर आरोग्यक प्राप्ति होइत अछि !
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कुष्मांडा रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान आर कुष्मांडा क रूप मे प्रसिद्ध अम्बे, अहाँकेँ हमर बारंबार प्रणाम ! वा हम अहाँ केँ बारंबार प्रणाम करैत छी ! हे माँ हमरा पाप सँ मुक्ति प्रदान करू !

माँ क पाँचम रूप (स्कंदमाता) :- माँ देवीदुर्गा क पाँचम रूप छनि स्कंदमाता ! नवरात्रि क पाँचम दिन हिनकर पूजा - अर्चना होइत छनि ! मोक्ष क द्वार खोलए वाली माँ स्कंदमाता परम सुखदायी छथिन ! माँ अपन भक्त क समस्त इच्छाकेँ पूर्ति करैत छथिन ! माँ स्कंदमाता क कोरा मे भगवान स्कंदजी बालरूप मे विराजमान छथिन, भगवान स्कन्द (कुमार कार्तिकेय) क नाम सँ सेहो जानल जाइत छथि ! भगवान स्कंद प्रसिद्द देवासुर संग्राम मे देवतागण क सेनापति रहथि ! पुराण मे हिनका कुमार आर शक्ति कहि कऽ हिनकर महिमा क वर्णन कएल गेल अछि ! भगवान स्कंदक माता हेबा क कारण हिनकर (माँ दुर्गा क पाँचम रूपक) नाम स्कंदमाता पड़लनि !
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान आर स्कंदमाता क रूप मे प्रसिद्ध अम्बे, अहाँकेँspan> हमर बारंबार प्रणाम ! वा हम अहाँ केँ बारंबार प्रणाम करैत छी ! हे माँ हमरा पाप सँ मुक्ति प्रदान करू !

माँ क छठम रूप (कात्यायनी) :- माँ देवीदुर्गा क छठम रूप छनि कात्यायनी ! नवरात्रि क छठम दिन हिनकर पूजा - अर्चना होइत छनि ! हिनकर पूजासँ अद्भुद शक्ति क संचार होइत अछि वा दुश्मन क संहार करए मे माँ सक्षम बनबैत छलीह ! माँ क नाम कात्यायनी कियेक पड़लनि ओकर बहुत पैघ कथा अछि ! जकरा हम संक्षिप्त मे कहए चाहब :- कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि रहथिन, हुनकर पुत्र
ऋषि कात्य भेलखिन ! हुनके गोत्र मे विश्व प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन जन्म लेने छलाह ! ओ भगवती पराम्बा क उपवास करैत बहुत वर्ष तक बहुत पैघ तपस्या केलखिन ! हुनकर आकांक्षा रहनि जे माँ भगवती हुनका घर पुत्री क रूप मे जन्म लेथि! माँ भगवती हुनकर प्रार्थना स्वीकार केलखिन ! किछु समय क बाद जखन दानव महिषासुरक अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ि गेलनि तँ भगवान ब्रह्मा, विष्णु आर महादेव तीनू अपन - अपन तेजकेँ अंश दऽ कए महिषासुर क विनाशक लेल एक देवीकेँ उत्पन्न केलखिन ! महर्षि कात्यायन सभसँ पहिने हुनकर पूजा केलखिन ताहि कारण हिनकर नाम कात्यायनी पड़लनि !
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!


अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान आर कात्यायनी क रूप मे प्रसिद्ध अम्बे, अहाँकेँ हमर बारंबार प्रणाम ! वा हम अहाँ केँ बारंबार प्रणाम करैत छी ! हे माँ हमरा पाप सँ मुक्ति प्रदान करू !

माँ के सातम रूप (कालरात्रि) :- माँ देवीदुर्गा के सातम रूप छैन कालरात्रि ! दुर्गापूजा के सातम दिन माँ कालरात्रि के उपासना के विधान अछि ! माँ के उपासनासँ समस्त पाप - विघ्न के नाश होइत अछि आर भक्तगण काँ अक्षय पुण्य - लोकक प्राप्ति होई छैन ! माँ कालरात्रि के देहक रंग घोर अंधकार के समान एकदम कारी छैन ! हुनकर माथा के केश बिखरल रहे छैन ! हुनका तीनगोट नेत्र (आँख) छैन ओ तीनो ब्रह्मांड के समान गोल छैन ! हिनकर स्वरूप ओना त देखै में बहुत भयानक (डरावना) छैन मुदा सदा ओ शुभ फल दै वाली छथिन !
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान आर कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आहाके हमर बारंबार प्रणाम ! वा हम आहाँ के बारंबार प्रणाम करे छी ! हे माँ हमरा पाप सँ मुक्ति प्रदान करू !

माँ के आठम रूप (महागौरी) :- माँ देवीदुर्गा के आठम शक्तिरूप छैन महागौरी ! दुर्गापूजा के आठम दिन हिन्करे पूजा - अर्चना के विधान छैन ! माँ अपन पार्वती रूप में भगवान शिव काँ पाटी के रूप में प्राप्त करै हेतु बहुत कठोर तपस्या केना रहथिन ! कठोर तपस्या के कारण हुनकर देह एकदम करी भोs गेल रहेँन ! हुनकर तपस्या सँ प्रसन्न आर संतुस्ठ भोs के जखन भगवान शिव हुनकर देह के गंगाजी के पवित्र जल सँ रगैर के धोल्खिंन तखन माँ विधुत प्रभा के समान बहुत कान्तिमान - गौर भोs गेलैथ तहिसँ हुनकर नाम महागौरी पर्लेंन !
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान आर महागौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आहाके हमर बारंबार प्रणाम ! वा हम आहाँ के बारंबार प्रणाम करे छी ! हे माँ हमरा पाप सँ मुक्ति प्रदान करू !

माँ के नवम् रूप (सिद्धिदात्री) :- माँ देवीदुर्गा के नवम् रूप सिद्धिदात्री छैन ! माँ सभ तरहक सिद्धि प्रदान करै वाली छथिन ! नवरात्री के नौवा दिन हिनकर पूजा - अर्चना होई छैन ! नवदुर्गा में माँ सिद्धिदात्री अंतिम छथिन बांकी आठ दुर्गा माँ के पूजा - पाठ विधि - विधान के संग करैत भक्तगण दुर्गा पूजा के नौवा दिन हिनकर उपासना करैत छैथ ! हिनकर उपासना पूर्ण केला के बाद भक्तगण के लौकिक - परलौकिक सभ प्रकार के कामना के पूर्ति होई छैन !
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता !
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान आर सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आहाके हमर बारंबार प्रणाम ! वा हम आहाँ के बारंबार प्रणाम करे छी ! हे माँ हमरा पाप सँ मुक्ति प्रदान करू !


॥ सिद्धकुंजिकास्तोत्रम्‌ ॥

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्‌॥1॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्‌।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्‌॥2॥

कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्‌॥3॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌।
पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत्‌ कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌॥4॥

अथ मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सःज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वलऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा
॥ इति मंत्रः॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि !

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि !!१!!


नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि !

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे !!२!!


ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका !

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते !!३!!

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी !!४!!


विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि !

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी !!५!!

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु !

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी !!६!!


भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः !

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं !!७!!


धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा !

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा !!८!!


सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं कुरुष्व मे !

इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे !!९!!


अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति !

यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्‌ !!

न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा !!


। इति श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ।

Sunday, September 21, 2008

गोपेशजी नञि रहलाह- प्रस्तुति गजेन्द्र ठाकुर


समय रूपी दर्पणमे
(प्रस्तुत अछि गोपेशजीक कविता जे २००६ केर नचिकेताजीक “मध्यम पुरुष एकवचन” जेकाँ उत्तर-आधुनिक अछि, मुदा लिखल गेल २५-३० वर्ष पूर्व। हिनकर प्रस्तुत कविता नवीन कविताक शैलीमे लिखल गेल अछि।)


समय रूपी दर्पणमे

देखइत छी हम अपन मूह

आऽ करइत छी अनुभव

जे किछु नव नहि होइछ

जनमइ अछि

नित्य अहलभोर

किछु एहन-एहन इच्छा

उठइ अछि मोनमे भावनाक तरङ्ग

जे आइ किछु नव होएत



मुदा सुरुज भगवान छापि दैत छथि

दिनुक माथपर किछु एहन-एहन समाचार

जाहिमे हम अपनाकेँ

अभियोजित नहि कए पबैत छी

दूर-दूर उड़इत गर्दाक पाँखिएँ

पोसा पड़बा जहिना मोट भए जाइत अछि

तहिना हमर भावना-तरंग

अनुभवक सम्बल पाबि मोट भए कए

सिद्ध करैछ जे

नव किछु नहि होइछ



जे किछु हमरा सोझाँ अबैछ

से थिक समयक शिलाखंडपर

खिआएल पुरनके वस्तु, पुरनके विचार,

जे नव होएबाक दम्भ भरैत अछि

आऽ थाकल ठेहिआएल मोनक पीड़ा हरैत अछि



स्व. श्री गोपालजी झा “गोपेश” क जन्म मधुबनी जिलाक मेहथ गाममे १९३१ ई.मे भेलन्हि। गोपेशजी बिहार सरकारक राजभाषा विभागसँ सेवानिवृत्त भेल छलाह। गोपेशजी कविता, एकांकी आऽ लघुकथा लिखबामे अभिरुचि छलन्हि। ई विभिन्न विधामे रचन कए मैथिलीक सेवा कएलन्हि। हिनकर रचित चारि गोट कविता संग्रह “सोन दाइक चिट्ठी”, “गुम भेल ठाढ़ छी”, “एलबम” आऽ “आब कहू मन केहन लगैए” प्रकाशित भेल जाहिमे सोनदाइक चिट्ठी बेश लोकप्रिय भेल। वस्तुस्थितिक यथावत् वर्णन करब हिनक काव्य-रचनाक विशेषता छन्हि। श्री मायानन्द मिश्रजीसँ दूरभाषपर गपक क्रममे ई गप पता चलल जे गोपेशजी नहि रहलाह, फेर देवशंकर नवीन जी सेहो कहलन्हि। हमर पिताक १९९५ ई.मे मृत्युक उपरान्त हमहूँ ढ़ेर रास आन्ही-बिहाड़ि देखैत एक-शहरसँ दोसर शहर बौएलहुँ, बीचमे एकाध बेर गोपेशजी सँ गप्पो भेल, ओऽ ईएह कहथि जे पिताक सिद्धांतकेँ पकड़ने रहब। फेर पटना नगर छोड़लहुँ आऽ आइ गोपेशजीकेँ श्रद्धांजलिक रूपमे स्मरण कए रहल छियन्हि। स्मरण: हमरा सभक डेरापर भागलपुरमे गोपेशजी आऽ हरिमोहन झा एक बेर आयल छलाह। गोपेशजी सनेस घुरैत काल मधुर लेलन्हि आऽ हरिमोहनझा जी कुरथी!
गोपेशजीक कवितामे सेहो वस्तुस्थितिक यथावत सपाट वर्णनक आग्रह रहैत अछि जे हुनकर चरित्रगत विशेषता सेहो छलन्हि। हरिमोहन झाजीक अन्तिम समयमे प्रायः गोपेशजीकेँ अखबार पढ़िकेँ सुनबैत देखैत छलियन्हि। हरिमोहनझाक १९८४ ई.मेमृत्युक किछु दिनुका बादहिसँ ओऽ शनैः शनैः मैथिली साहित्यक हलचलसँ दूर होमए लगलाह। एहि बीच एकटा साक्षात्कारमे शरदिन्दु चौधरी सेहो हुनकासँ एहि विषयपर पुछबाक कोशिश कएने छलाह मुदा गोपेशजी कहियो ने कन्ट्रोवर्सीमे रहलाह, से ओऽ ई प्रश्न टालि गेल छलाह।

Tuesday, September 16, 2008

कथा-कोसी/ अपराजिता - स्व.राजकमल चौधरी- प्रस्तुति गजेन्द्र ठाकुर


स्व. राजकमल (मणीन्द्र नारायण चौधरी) (१९२९-१९६७), महिषी, सहरसा। रचना:- आदि कथा, आन्दोलन, पाथर फूल (उपन्यास), स्वरगंधा (कविता संग्रह), ललका पाग (कथा संग्रह), कथा पराग (कथा संग्रह सम्पादन)। हिन्दीमे अनेक उपन्यास, कविताक रचना, चौरङ्गी (बङला उपन्यासक हिन्दी रूपान्तर) अत्यन्त प्रसिद्ध। मिथिलांचलक मध्य वर्गक आर्थिक एवं सामाजिक संघर्षमे बाधक सभ तरहक संस्कार पर प्रहार करब हिनक वैशिष्ट्य रहलन्हि अछि। कथा, कविता, उपन्यास सभ विधामे ई नवीन विचार धाराक छाप छोड़ि गेल छथि।

अपराजिता

(वैदेही, अक्टूबर १९५४ सँ साभार)

हमर अभिन्न मित्र नागदत्त अपन घरवाली केँ अपराजिता कहैछ। किएक, से कि सोचलो उत्तर एखन धरि बूझऽ मे आयल अछि?

हम धरि हुनका अन्नपूर्णा भौजी कहैत छियनि। जर्दा लेल बड्ड छिछिआयल रही आ ओ खास अवसर पर संकट-मोचन रहथि। ओहुना हमरा मैथिल-बाला सभ मे अन्नपूर्णाक रूप अधिक भेटैत अछि।

मुदा अपराजिता?

धुः! पत्नीक प्रति ई भाव तँ एक विदेशी भाव थिक। भारतीय सँ एकरा कोनो साम्य छैक? मिसियो भरि ने। भारतीया तँ बेचारी लाज, बन्धन, आवरण, नियम ओ उपनियम सँ तेना कऽ जकड़लि रहैछ जे ओ सर्वदा पराजित बनलि रहैछ।

एही सभ मे दहाइत-भसिआइत रही। खिड़की सँ बाहर मिथिलाक श्यामल, सोहागिन, सुहासिन धरती। ट्रेनक खिड़की सँ बाहर देखैत रही।

दिवानाथ धरि मूड़ी निहुड़ौने “गारंटी ऑफ पीस” मे ओझरायल छल। मुक्ती बाबू ट्रेनक हड़ड़-हड़ड़ मे ताल दैत विद्यापतिक पाँती गबैत रहथि, “सखि हे, हमर दुखक नहि ओर”।

नागदत्त अपना लगक मोसाफिर संगेँ जोर-जोर सँ बजैत रहय, “नइँ महाराज...आन देश मे ई हाल नइँ छैक...अही ठाँ रूस मे देखिऔक गऽ। विज्ञानक जोर सँ मनुक्ख नदीक धार केँ अपन इच्छानुसार मोड़ि देलक अछि”।

इन्टरक एहि डिब्बा मे आनो-आन यात्री सभ अपन-अपन गप्प सभ मे तल्लीन रहथि। एकटा बूढ़ दरोगा साहेब अपन सहगामी केँ कोनो रोमांचकारी डकैतीक खिस्सा कहैत रहथिन। एकटा सेठ अपन अधवयसू मुनीम केँ सोना-चानीक तेजी-मन्दीक कारण बुझा रहल छलाह, लगहि मे हुनक पत्नी घोघ तनने बैसलि! ट्रेन समस्तीपुर सँ फूजल। कैप्सटनक डिब्बासँ अन्तिम सिकरेट बहार कऽ दिवानाथ सुनगाबऽ चाहैत रहय...सलाइयो रहैक लगहि मे ...मुदा ओ तँ रहय अपन “गारंटी ऑफ पीस” मे ओझरायल। हमरा हँसी लागल। हम हँसऽ लगलहुँ। मुक्तीबाबू दोसर गीत गाबऽ लगलाह, “मानिनि आब उचित नहि मान”!

हठात् खिड़कीसँ हुलकि दिवानाथ चिचिआयल, “देख, मणि...देख...अपराजिताक ताण्डव”! सभ गोटा हुलकी मारऽ लागल। सभक आँखि विस्मय-विस्फारित!

“गारंटी ऑफ पीस” खतम छल...विद्यापतिक गीत खतम छल। रूसक कथा खतम छल। डकैतीक कथा थम्हि गेल...सोना-चानीक तेजी-मन्दी सेहो बन्द भऽ गेल रहय। सिकरेटक लगातार धुँआ रहि गेल आ रहि गेल अपराजिता!

सरिपहुँ... बागमती, कमला, बलान, गंडक आ खास कऽ कऽ कोसी तँ अपराजिता अछि ने! ककरो सामर्थ नहि जे एकरा पराजित कऽ सकय। सरकार आओत...चलि जायत..मिनिस्टरी बनत आ टूटत, मुदा ई कोसी...ई बागमती...ई कमला आ बलान...अपन एही प्रलयंकारी गति मे गाम केँ भसिअबैत, हरिअर-हरिअर खेत केँ उज्जर करैत, माल-जालकेँ नाश करैत, घर-द्वारक सत्यानाश करैत बहैत रहत आ बहैत रहत।

वेद मे नदी केँ मनुक्खक सेविका कहलकैक अछि...मनुक्खक पत्नी कहलकैक अछि...

मुदा,

बहुओ भऽ कऽ कोसी आ बागमती अपराजिता अछि...

अन्नपूर्णा कहाँ?

रेलवी-सड़कक दुहू कात कोसक कोस पसरल अबाध जल-प्रवाह! दुहू क्षितिज केँ छुबैत जलक धार!!

“लगैत अछि, हम सभ ट्रेनपर नहि, मने जहाजपर बैसल होइ। जेना चारू कात विशाल, विकराल, विराट समुद्र हो जे हमर अस्तित्व पर्यन्तकेँ डुबा देलक अछि!”, बाजल दिवानाथ। मुक्ती टिपलक, ’मणि भाइ, कते गामक तँ कोनो थाहो-पता ने लगैत छैक जे एतऽ कहिओ कोनो गामो रहैक। जतऽ ईंटाक पोख्ररापाटन हवेली रहैक ततऽ की छैक? महाविशाल मोइन आ कुण्ड! जतऽ खेत आ खरिहान रहैक ओहि ठाँ गण्डकी नंगटे नचैए...खरिहानक नाच नहि, श्मसानक नाच!”

हाथक “ब्लिज” केँ तह दैत एकटा सज्जन बजलाह, “आ बाबू...सरकार तँ पटना आ दिल्लीक सचिवालय मे बिजलीक पंखा आ स्प्रिंगदार सोफाक बीच सूतल अछि। मिथिला वा भोजपुर भसिआइए गेल तँ ओकरा की? कोसी सर्वनाशे करइए तँ ओकरा की? ओ तँ इण्डियाक “फारेन-पालिसी” सोचैत अछि। भीतर सँ भारत खुक्ख भऽ रहल अछि...कोकनि रहल अछि, मुदा ओ यू.एन.ओ.क कुर्सी बचाबक फिकिर मे अपस्याँत अछि”। दरोगाजी कनिएँ उकड़ू भऽ बैसि गेलाह आ कान पाथि हमरा लोकनिक गप्प सुनऽ लगलाह। सेठजी अपन धर्मपत्नी दिस व्यग्र भावेँ ताकि बजलाह, “रधिया की माँ...जरा इलायची तो देना...सर चकरा रहा है”।

दाँत कीचि दिवानाथ गुम्हड़ल- गारंटी ऑफ पीस!! हम सोचलहुँ, हमर देश मे जे “गारंटी ऑफ पीस” दऽ सकैछ से तँ लालकिलाक मुरेड़ा पर खजबा टोपी, करिया अचकन...चुननदार पैजामा पहिरने तिनरंगा छत्ता तनने आराम सँ पड़ल अछि! आ भगवान सँ स्वर्ग मे छथि तँ अबस्से दुनियाँ मे सभ वस्तु ठीक छैक।

यद्यपि देशक ई हालत किएक, से सभ जनैत अछि- हमहूँ..अहूँ...नेता आ जनतो! तइयो ई देश अपन दरिद्रा केँ सोनाक पानि चढ़ाओल डिब्बी मे बन्द कऽ कऽ विदेशक प्रदर्शनीक “शो-केस” मे सजबैत अछि। रीढ़क अपन हाड़ तोड़ि ताजक रूप मे उपस्थित करैत अछि। फाटल-चीटल केथड़ी जोड़ि आ सजा, भटरंग कऽ प्रति पन्द्रह अगस्त कऽ शाही महल सभ पर धर्मचक्र-सज्जित तिरंगा फहरबैत अछि।

गाड़ी ठाढ़ भऽ गेलैक।

पुल रहैक कोनो मने। फेर चुट्टीक चालि मे घुसकनियाँ काटऽ लागल। सभ मोसाफिर खिड़की आ फाटक पर मुड़िआरी देने बाहर हुलकी मारऽ लागल-

गण्डक, बागमती, कमला आ कोसीक भयानक रूप। समुद्रक ज्वारि जकाँ विकराल ढेहु उठैत। लगैक मने सौंसे ट्रेनकेँ गीड़ि जायत! लहरिक संगहि-संग कौखन कोनो पुरना नूआक फाटल पाढ़ियुक्त भाग...कौखन काठक सनुकचाक कोनो थौआ भेल भाग...कौखन जानवरक हाड़! घरक ठाठ बहल जा रहल छल...खाट आ चौकी भसिआयल जा रहल छल...इज्जति आ प्रतिष्ठा मिथिलाक नोर मे दहायल जा रहल छल। जीवन भसिआयल जा रहल छल। सीसो-सखुआ-आमक कलमबाग आ बँसबिट्टी डूबि गेल छल।

ऊपर रहैक केवल पीतवसना नागकन्या गण्डकी अपन अति विषाक्त फुफकार छोड़ैत।

मुक्तापुर आबि गेल।

स्टेशनक चारू कात पानिएँ पानि। स्टेशन पर असंख्य गरीब किसान-बोनिहार लहालोट होइत। ककरो एक मुट्ठी अन्न नहि...पाँच हाथ वस्त्र नहि...टाँग पसारि कऽ सूतक स्थान नहि। प्लाटफारम पर आकाशक ठाठ तर असंख्य किसान-परिवार! धीया-पूता भूखेँ चिकरैत...माय ओकरा घोघ तर मुँह नुकओने कनैत। एकटा कोनो कांग्रेसी सज्जन स्टेशन-मास्टर केँ जोर-जोर सँ कहैत रहथिन, “अरे, महाराज...एहि मे सरकारक कोन कसूर? भगवानक लीला छनि। सरकार की जानऽ गेलैक जे एहन विशाल बाढ़ि आबि रहल छैक। ताहू पर रिलीफ कमेटी बनि रहल छैक। अगिला हप्ता मिनिस्टर लोकनिक “टूर प्रोग्राम” छनि। आ अलाबे एकर मुख्यमन्त्री दरभंगा, मुजफ्फरपुर आ सहरसाक कलक्टर केँ तार देबे कयलथिन अछि जे ओ जते चाहथि रिलीफक हेतु खर्च करथि। से नहि आब की करौक?”

आ सरिपहुँ सरकार खर्च करैत रहैक से हम देखलिऐक! एकटा गृहस्थ बाजल, चारिम दिन अन्न भेटल छल...मूड़ पीछू दू सेर...ओकर पहिने तँ मात्र जले टा आधार होइक। आ दू सेर चाउर कक्खन धरि? स्त्रीगणकेँ पहिरक कोनो नूआ-फट्टा नइँ। मलेरियाग्रस्त लोक केँ लहालोट पुरिबा आ जाड़ सँ बचबऽक खातिर कम्बल नहि। रेलवे कर्मचारी हाता सँ एकटा ठहुरिओ नइँ काटऽ देनिहार। पूछक तँ बड़ इच्छा छल... मुदा गाड़ी फुजि गेलैक।

“ब्लिज” वला सज्जन बजलाह, “बाबू एखन की देखलिऐक अछि, आगाँ ने चलू...किसनपुर...हायाघाट....मोहम्मदपुर...जोगियार..कमतौल दिस आर प्रलय मचल छैक। एहन कोनो परिवार नहि छैक जकर कोनो समाङ कि कोनो बच्चा कि कोनो माल नहि दहा-भसिआ गेल होइक”।

हायाघाट स्टेशन! सूर्यास्तक समकाल।

डुबैत सूर्यक लालिमा प्रतीचीक जल केँ रक्त सन बनओने। लिधुराह पानि..खुनिञा धार!! मुक्ती बाबू सिकरेट ताकऽ चललाह। दिवानाथ प्लाटफारम पर अपने घर मे शरणार्थी बनल गृहविहीन सँ गप्प कऽ रहल छल। गाड़ीक इंजन मिझा गेल रहैक। लेहरियासराय सँ तार अओतैक तखन ने फुजतैक गाड़ी! हमहूँ उतरलहुँ। देखलिऐक, सौंसे प्लाटफारम पर चुट्टी ससरऽक दौर पर्यन्त नइँ। अँगनइ मे बाँसक पातर सट्टा गाड़ि-गाड़ि ओहि पर पातर पुरान नूआ कि धोती टाँगि कऽ तम्बू सन बनल। एहन-एहन सैकड़ो तम्बू एक पतिआनी सँ ठाढ़। स्त्रीगण सभ लोटे-लोटे स्टेशनक इनार सँ पानि अनैत रहथि आ धीया-पूता टुक-टुक ट्रेन दिस तकैत रहय। पानिक कछेड़ मे एकटा बुढ़िया बाढ़ि मे डूबल बेटाक शोक मे बताहि भेलि चिकरैत रहय। पानिक कछेड़ मे एकटा बुढ़िया बाढ़ि मे डूबल बेटाक शोक मे बताहि भेलि चिकरैत रहय। ओझरायल केश मुँह पर...नूआ-फट्टाक होस नहि...गाबि-गाबि कानय, हे गण्डक मैया...हे कमला मैया। कतऽ गेलइ हम्मर सुगवा, कतऽ गेलइ हमर लाल!

आ ओम्हर दिवानाथ बूढ़ा दरोगा साहेब केँ बुझा रहल छलनि...मनुक्ख जे चाहय से कऽ सकैत अछि। एही ठाँ चीन केँ देखिऔक...ओकर “ह्वांगहो” कोसिओ सँ भयानक रहैक। मुदा लाल क्रान्तिक दू बरखक बाद ओकरा सघन बान्ह सँ जकड़ि देलकैक, आइ ओ ह्वांगहो चीनक वरदान छैक, अभिशाप नहि। आ दिवानाथक आँखिमे लाल चिनगीक तीक्ष्ण प्रकाश आ ज्वाला। भेल जे अमृतपुत्रक एहि ज्वालामे कोसी भस्म भऽ जयतीह। मुदा एक जोड़ा आँखिक चिनगी सँ नहि। लक्ष-लक्ष जोड़ा आँखिक अंगोर सँ। हमरा एकर चतुर्दिक एहन रक्तिम दाहक चिनगीक जाल बूनऽ पड़त।

मुक्तीबाबू अधजरुआ सिकरेट हमरा दिस बढ़ा बजलाह, “मणिबाबू, प्लाटफारमक ओइ भाग तकिऔ तँ कने...कोना छागर-पाठी जकाँ लोक सभ अछि, मालगाड़ी मे कोंचल। हुँ! कोंढ़ उनटि जाइत अछि”।

ट्रेन पार कऽ ओइ पार गेलहुँ। एकटा पूर्ण मालगाड़ी रहैक ठाढ़। डिब्बा मे पुरुष, मौगी, धीआ-पूता, माल-जाल सभ भरल छल। डिब्बे मे चूल्हि सुनगि रहल छल। हाँड़ी सभ चढ़ाओल जा रहल छल। कोसी आ गण्डकी मैया केँ प्रार्थनाक “कोरस” सुनाओल जा रहल छलनि। हाहाकार आ रुदनक स्वर गूँजि रहल छल।

मालगाड़ीक डिब्बा सँ एकटा विद्यार्थी बहरायल...कोर मे चारि-पाँच बरखक कनटिरबी केँ रखने। ओ छौँड़ी बड़ी-बड़ी जोर सँ हिचकैत रहैक। नागदत्त पुछलकैक, “अहा-हा...किऐक औ...की भेलैक अछि...किऐक कनैत अछि”?

ओ नेनिया केँ ठोकैत बाजल, “एकर माय, बाबू साहेब, डूबि गेलैक एही बाढ़ि मे। कनतैक ने तँ...”? सभ गोटा निस्तब्ध भऽ गेल।

युवक बाजल, “विद्यार्थी छी अहाँ लोकनि...तेँ मन होइछ अहाँ लोकनि सँ गप्प करी। हम सभ एही स्टेशन सँ तीन मील पर रामपुर गामक बासी छी। आब तँ ओ बस्तिए नइँ रहलैक...। सौंसे गाम भसिया कऽ लऽ गेलैक...ई राक्षसी गण्डकी”।

मारिते रास लोक जमा भऽ गेल, ओकर गप्प सुनऽ लेल। दरोगा साहेब बजलाह, “की सौंसे गाम”?

“हँ औ। हठात राति मे आबि गेलैक बाढ़ि। छन-छन पानि बढ़ैत...कोनो तरहेँ स्त्रीगण लोकनि केँ नाह पर लदलहुँ...माल-जाल हँकओलहुँ...वस्तु-जात, अत्यन्त आवश्यक वस्तु सभ कनहा पर लदलहुँ, पड़यलहुँ, स्टेशनक दिस। कतहु भरि डाँड़...कतहु कच्छाछोप, कतहु चपोदण्ड। हेलैत-डुबैत एतऽ पहुँचलहुँ। कतेक नेना-भुटका डूबल। माल-जालक तँ कथे कोन। भसिआयल ठाठ पर हमरा लोकनि स्त्रीगण सभ केँ बैसा कऽ अनलहुँ एतऽ धरि। अयला पर पता लागल जे एहि कनटिरबीक माय डूबि गेलैक। ई हमर भतीजी थिक। मुदा आब की”? कने काल चुप भऽ गेल ओ। युवकक आँखि पनिआ गेलैक। फेर बाजल,”स्टेशन आबि देखल, ई पहिनहि सँ भरल छल। लगीचक पन्द्रह बीस गामक लोक सभ सँ भरल छल। एहि इलाका मे एकटा ई स्टेशन मात्र छैक ऊँच स्थान। खाली इएह मालगाड़ी रहैक ठाढ़। सभ गोटा एही मे शरण लेल। सम्पूर्ण डिब्बा खाली छल, सभ मे हम सभ भरि गेलहुँ।

दोसर दिन प्लेटफॉर्म पर सेहो पानि आबि गेलैक, तखन लोक सभ बोरा जकाँ एक दोसर पर गेंटल रही। युवक सभ ऊपर छत पर चढ़ि गेलाह, स्त्रीगण आ बूढ़, नेना सभ डिब्बे मे रहलाह।

स्टेशन मास्टर हमरा सभ केँ डेरओलनि, मालगाड़ी खाली कर दो।

अहीं लोकनि कहू से कोना होइतैक? हम सभ कतऽ जाइतहुँ? हमरा सभक संग मे पाइ-कौड़ी नहि छल, घर नहि छल, पहिरऽ लेल वस्त्र नहि छल”। एतेक कहि युवक फेर रुकि गेल। नहुँए सँ बाजल, “हमरा जऽर अछि। जाड़ भऽ रहल अछि, यदि अपने सभक मे एकटा बीड़ी हो तँ दिअऽ“।

मुक्तीबाबू ओकरा सिकरेट देलथिन आ दिवानाथ सलाइ। युवक बाजल, “ओ, ई तँ कैप्सटन अछि”। फेर बड़े तन्मय भऽ सिकरेटक कश खींचऽ लागल। (एलेक्शनक अवसर पर कैथोलिक पादरी सभ सम्पूर्ण तिरू-कोचीन मे मङनी मे सिकरेट आ चाहक पैकेट बँटने छलाह। पैकेट सभ पर लिखल छल, काँग्रेस को वोट दो।) नागदत्त पुछलथिन, “फेर की भेल”?

“फेर की हेतैक”? युवक गाड़ीक कम्पाट सँ ओंगठि कऽ बाजल, “फेर पुलिस आबि-आबि कऽ हमरा सभकेँ तंग करऽ लागल। जकरा संग पाइ-कौड़ी छलैक से पाइ-कौड़ी दऽ कऽ पुलिसक ठोकर सँ बचल रहल। रातिखन कऽ युवती सभ गाड़ीक डिब्बा सँ बिलाय लागलि। मुदा हम सभ मालगाड़ीक डिब्बा केँ छोड़लहुँ नहि। छोड़ि कऽ हम सभ कतऽ जैतहुँ? दोसरे दिन समस्तीपुर सँ एकटा बड़का इंजिन आयल।

स्टेशन मास्टर बाजल, “तुम लोग गाड़ी खाली कर दो, वरना इंजिन तुम लोगों को लेकर समस्तीपुर चला जाएगा। वहाँ तुम लोगों को जेल हो जायगा, सरकारी गाड़ी पर कब्जा जमाने के जुर्म मे”।

बूढ़ सभ कहलथिन जे नीके होयत, लऽ चलऽ। कम सँ कम भोजनो तँ भेटत जहल मे। मुदा स्त्रीगण कानऽ लगलीह। नेना सभ चीत्कार मारऽ लागल। मैथिल स्त्रीगण जे कहियो गामक बाहर पयर नहि रखलनि तनिका हम जेल कोना जाय दितहुँ। आ तखन हम सभ नारा लगओलहुँ, “मालगाड़ी नहीं जायगा, नहीं जायगा”।

पुलिसक लाठीक मदति सँ ड्राइवर मालगाड़ी मे इंजिन लगओलक। आ एम्हर हम सभ इंजिनक आगाँ आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेलहुँ, “मालगाड़ी नहीं खुलेगा, नहीं खुलेगा”। पुरुष लोकनि छाती तानि कऽ ठाढ़ भऽ गेलाह। स्त्रीगण पड़ि रहलीह। नेना सभ बाँसक फट्ठी मे लाल वस्त्र बान्हि कऽ आगाँ मे ठाढ़ भऽ गेल।

बाँसक फट्ठी मे लाल चेन्ह!

गाड़ी रोकऽक चेन्ह।

अपन अधिकार लेबऽक चेन्ह।

युवकक गर्दनि तनि गेलनि, उत्साह सँ बाँहि फड़कऽ लगलनि, आँखि लाल भऽ गेलनि।

सेठजी अपन स्त्रीक कान मे कहलथिन, रधिया की माँ, सूटकेस पास ले आओ, कुछ हो जा सकता है”।

दरोगा साहेब गुनगुनयलाह, “ठीक कहइ छी”।

युवक कहब जारी रखलनि, “पुलिस तँ पहिने घबड़ा गेल, ड्राइवर इंजिन बन्द कऽ देलक। कतेक हजार लोकक रेड़ा पड़ऽ लागल। पुलिस “लाठी चार्ज” करऽ चाहलक, मुदा हम फरिछा कऽ कहि देलियनि, यदि एकोटा लाठी उठल तँ हम सभ एक-एकटा पुलिस केँ उठा-उठा कऽ गण्डक मे फेँकि देब। कहू तँ, पन्द्रह-बीस पुलिस के की चलितनि एहि क्रुद्ध जनसमुद्र मे?

आ, पुलिस सँ नाक रगड़ैत रहि गेल, मुदा मालगाड़ी नहि जा सकल। दोसर दिन भोरे नाव पर चाउरक बोरा गेंटने “स्टूडेंट्स-फेडरेशन” आ “नौजवान-संघ”क लोक सभ अयलाह आ ई हम सभ पहिल सहायता पओलहुँ।

आ आब तँ पानि कम भऽ रहल अछि। सरकारोक कुम्भकर्णी निन्न टूटि रहल छनि। ओहो दू-दू सेर चाउर बाँटि गेलाह अछि”। एतेक कहि युवक चुप्प भऽ गेलाह। वातावरण अशान्त छल, सभक मन युवकक दुःखपूर्ण कथा सुनि खिन्न छलैक। एतबे मे स्टेशनक एकटा कर्मचारी आबि कऽ बाजल-

“गाड़ी खुल रही है, डिब्बे मे बैठिए”।

अपन बिना मायक भतीजी केँ कोरा मे लऽ कऽ युवक प्लेटफॉर्म पर ठाढ़ रहल।

गाड़ी नहुँ-नहुँ चलऽ लागल, तखन ओ दिवानाथक बामा हाथ दबा कऽ बाजल, “मोन राखब बन्धु”! हठात् बूढ़ दरोगा साहेब अपन “सीट” पर सँ उठि अपन ऊनी चद्दरि युवकक कान्ह पर धऽ देलथिन आ फेर अवरुद्ध कंठ सँ कहलथिन, “अहाँ केँ तँ ज्वर अछि, ई चद्दरि लऽ लिअऽ। आ...”।

गाड़ी तेज भऽ गेल।

फेर तँ ओएह चारू कात अथाह अबाध समुद्र छल आ हिलकोरक घोर गर्जन।

Saturday, September 13, 2008

कोसी,बाढ़ि आऽ दिल्ली- राजेन्द्र भवन दिल्लीमे १२ सितम्बर २००८केँ भेल सेमीनार




























कोशीक बाढ़ि-किछु पद्य (प्रस्तुति गजेन्द्र ठाकुर)


1.स्व.रामकृष्ण झा “किसुन” (१९२३-१९७०)

कोशीक बाढ़ि


आबि रहलै बाढ़ि

अछि उद्दाम कोशीक धार

आबि रहलै बाढ़ि ई

अति क्षुब्ध/ मर्यादा-रहित सागर सदृश

उछलैत/ लहरिक वेगमे

भसिया रहल छै काश वा कि पटेर, झौआ, झार

गाछ, बाँस कतहु

कतहु अछि खाम्ह, खोपड़ि

खढ़ कोरो सहित फूसिक चार

आबि रहलै बाढ़ि अछि उछाम कोशीक धार

बचि सकत नहि एहिसँ

डिहबार बाबा केर उँचका थान

वा कि गहबर सलहेसक

आ रामदासक अखराहा

वा डीह राजा साहेबक

ड्योढ़ी, हवेली, अस्तबल, हथिसार

बाभनक घर हो

कि डोम दुसाध गोंढ़िक तुच्छ खोपड़ि

पानि सबकेँ कऽ देतै एकटार

आबि रहलै बाढ़ि

अछि उद्दाम कोशीक धार।



ऊँच-ऊँच जतेक अछि

सब नीच बनि जयतैक

नीच अछि खत्ता कि डाबर

भरत सबटा/ ऊँच ओ बनि जैत

हैत सबटा/ ऊँच ओ बनि जैत

हैत सबटा एक रंग समभूमि

ऊँच नीचक भेद नहि किन्नहु रहत

जे ऊँच अछि

पहिने कटनियांमे कटत

आ नीच सभकेँ

ऊँच होमक

सुलभ भऽ जयतै सहज अधिकार

कोढ़मे छक दऽ लगय तँ की करब

आब ई सब तँ सहय पड़बे करत

बाप-बाप करू कि पीटू सब अपन कपार

आबि रहलै बाढ़ि

अछि उद्दाम कोशीक धार।

आरि धूर ने काज किछुओ दऽ सकत

सब बुद्धि

नियमक सुदृढ़ बान्ह ने किच्छु

टिकि सकत किछु काल

बस

सब पर पलाड़ी पानि

उमड़ि कऽ चढ़ि जैत

सबकेँ भरि बरोबरि कऽ देतै

आ पुरनकी पोखरि

कि नवकी अछि जतेक

खसि पड़त ई पानि बाढ़िक हहाकऽ

नहि रोकि सकबै

रोकि नहि सकतैक ऊँच महार

जे बनल अछि पोखरिक रक्षक

भखरिकऽ वा कि कटिकऽ निपत्ता भऽ जैत

आ पानि जे खसतै

तखन ई

बहुत दिनसँ बान्हि कऽ राखल

महारक शृंखलामे

अछि जते युग-युग प्रताड़ित

प्रपीड़ित फुसिऐल पोसल

नैनी, भुन्ना आ कि ललमुँहियाँ प्रभृति

ई माछ सब एहि पोखरिक नहि रहि सकत

सब बहार उजाहिमे जयबे करत

पाग आब रहय कि नहि

वा बचि सकय नहि टीक ककरो

की करब?

एहि बाढ़िमे अछि ककर वश?

ककरा कहू जे के नै हैत देखार

आबि रहलै बाढ़ि

अछि उद्दाम कोशीक धार।

आबि रहलै बाढ़ि जे कोशीक ई

बचि सकत नहि घर आ कि दुआर

सड़क-खत्ता/ ऊँच-नीच

पोखरि कि डाबड़/ गाम-गाछी

आ कि खेत-पथार

आबि रहलै बाढ़ि

अछि उद्दाम कोशीक धार।

2.कोसी लोकगीत (मोरंग, नेपाल,नदियाँ गाती हैं, ओमप्रकाश भारती, २००२)

सगर परबत से नाम्हल कोसिका माता, भोटी मुख कयेले पयाम
आगू-आगू कोयला वीर धसना खभारल, पाछू-पाछू कोसिका उमरल जाय
नाम्ही-नाम्ही आछर लिखले गंगा माता, दिहलनि कोसी जी के हाथ
सात रात दिन झड़ी नमावल चरहल चनन केर गाछे ये
चानन छेबि-छेबि बेड़ बनावल, भोटी मुख देव चढ़ी आय ये
गहिरी से नदिया देखहुँ भेयाउन, तहाँ देल झौआ लगाय
रोहुआक मूरा चढ़ी हेरये कोसिका, केती दूर आबैय छे बलान
मार-मार के धार बहिये गेल, कामरू चलल घहराय
पोखरि गहीर भौरये माता कोसिका, कमला के देल उपदेस
माछ-काछु सब उसरे लोटाबय, पसर चरयै धेनु गाय
गाइब जगत के लोक कल जोरी, आजु मइआ इबु न सहा

3.कोसी लोकगीत(बिहार की नदियाँ, सहृदय, १९७७)



मुठी एक डँड़वा गे कोसिका अलपा गे बयसवा

गे भुइयाँ लौटे नामी-नामी केश

कोसी मय लोटै छौ गे केश॥

केशवा सम्हारि कोसी जुड़वा गे बन्हाओल

कोसी गे खोपवा बन्हाओल

ओहि खोपवा कुहुकै मजूर।

उतरहि राज से एलेँ हे रैया रनपाल

से कोसी के देखि-देखि सूरति निहारै

सूरति देखि धीरज नै रहै धीर॥

किये तोरा कोसिका चेकापर गढ़लक

किये जे रूपा गढ़लक सोनार॥

नै हो रनपाल मोहि चेकापर गढ़लक

नै रूपा गढ़लक सोनार

अम्मा कोखिया हो रनपाल हमरो जनम भेल

सूरति देलक भगवान

गाओल सेवक जन दुहु कर जोरि

गरुआक बेरि होउ न सहाय, गे कोसी मैया

होउ न सहाय॥


4.कोसी लोकगीत(कोसी लोकगीत- ब्रजेश्वर,१९५५)



रातिए जे एलै रानू गउना करैले,

कोहबर घरमे सुतल निचित!

जकरो दुअरिया हे रानो कोसी बहे धार

सेहो कैसे सूते हे निचित॥

सीरमा बैसल हे रानो कोसिका जगाबै

सूतल रानो उठल चेहाय॥

काँख लेल धोतिया हे रानो मुख दतमनि

माय तोरा हंटौ हे रानो बाप तोरा बरजौ

जनु जाहे कोसी असनान॥

हँटलौ ने मानै रानो दबलौ ने मानै

चली गेलै कोसी असनान॥

एक डूब हे कोसी दुइ डूब लेल

तीन डूब गेल भसियाय॥

जब तुहू आहे कोसिका हमरो डुबइबे

आनब हम अस्सी मन कोदारि॥

अस्सी मन कोदरिया हे रानो बेरासी मन बेंट

आगू आगू धसना धसाय॥

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