भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Tuesday, March 17, 2009

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (दोसर कड़ी)


द्वितीय पोस्ट


जाहि दिन हम पन्द्रह बरखक भेलौं ओकर दोसरे दिन हमर विवाह भs गेल। ओहि समय हम विवाहक अर्थ की होइत छैक सेहो नय बुझैत छलियैक। हमत मैट्रिक केर परीक्षा दs अपन पितिऔत बहिन केर विवाह देखय लेल गाम गेल रही। हमारा की बुझल छल जे हमरो विवाह भs जायत। ओहि समय हमर बाबूजी अरुणाचल (ओहि समय केर नेफा ) में पदासीन छलाह, हम रांची में अपन छोटका काका लग रहि कs पढ़ैत रहि ।


हमर पितिऔत बहिन केर विवाह भेलाक तुरंत बाद हमर बाबूजी आ छोटका काका कत्तो बाहरि चलि गेलाह, कतय गेलाह से हम नय बुझलियैय। हम सब भाई बहिन आ हमर छोटका काका के बड़की बेटी, अर्थात हमर पितिऔत बहिन सेहो हमरा सब संग गाम पर रहि गेलि, कारण हमरा सबहक स्कूल में गर्मी छुट्टी छलैक , हम सब खूब आम खाइ आ खेलाइ। मुदा हम देखि जे हमर दादी हमरा किछु बेसी मानैथ। अचानक एक दिन भोर में जखैन हम उठलौं त देखैत छी जे सब कियो व्यस्त छैथ। हमर दादी सब काज करनिहार सब के डाँटि रहल छलीह, कहैत छलीह " आब समय नय छैक, जल्दी जल्दी काज करय जो"। हमरा किछु नय फ़ुराइत छल जे ई की भs रहल अछि। हमरा देखिते हमर दादी कहलैथ "हे देखियौ, अखैन तक ई त फराके पहिर कs घूमि रहल छैथ"। हमरा किछु बूझय में नय आबि रहल छल जे ओ की बजैत छलीह तखैन हमरा ध्यान आयल जे शायद हमर जन्मदिन काल्हि छैक ताहि दुआरे दादी कहैत हेतीह हमरा चिढाबय के लेल।ओ सब दिन कहैत छलीह जे अय बेर जन्मदिन में अहाँ के साड़ी पहिरय पड़त, आ हम चिढ जायत छलिअय। ई सब सोचिते छलौं ताबैत देखलियय जे छोटका काका आंगन दिस आबि रहल छलाह। हुनका संग हमर बाबा सेहो छलाह । ओ दुनु गोटे दलान पर स आबि रहल छलाह , से बाबा के देखला स बुझय में आबि गेल । हुनका सबके देखिते हमर माँ आ दादी दुनु गोटे आगू बढ़ि क हुनकर स्वागत केलैथ, आ माँ के कहैत सुनलियैन्ह "आब कहू जल्दी स लड़का केहेन छथि"। हमरा किछु नय बुझना जाइत छल, ताबैत हमर काका हमरा दिस देखलैथ आ देखिते देरी कहलैथ अरे तोहर बियाह ठीक कs क आयल छियो मिठाई खुआ।


हम त एकदम अवाक् रहि गेलौं, हम ओतय सs भागि क अपन कोठरी में आबि बैसि क सोचय लगलियै, आब की होयत हम त अपन दोस्त सब के कहि कs आयल रहि जे अपन दीदी के बियाह में जा रहल छी , ओ सब की सोचत। हमरा एतबो ज्ञान नही छल जे हम बियाहक विषय में सोचितौं , हमरा चिंता छल जे दोस्त सब चिढायत।खैर, कनि कालक बाद सs हमर भाय बहिन सब खुशी खुशी हमरा लग अबैथ, आ सब गोटे खुशी खुशी कहैथ," हम सब नबका कपड़ा पहिरबय"। ओ सब तs आर बहुत छोट छोट छलैथ, हमही सबस पैघ छी।


हमर काका जल्दी जल्दी स्नान ध्यानक बाद भोजन क तुरंत चलि गेला, पता चलल जे ओ बरियाती आनय लेल गेलाह। ओहि दिन, दिनभरि सब व्यस्त छलैथ। हम अपन माँ के व्यस्त देखियैन्ह परंच खुश नय लगलीह । भरि गामक लोकक एनाइ गेनाइ लागल छलय। दोसर दिन भोरे हमर बाबूजी अयलाह । हुनका चाय देलाक बाद आ हुनका स गप्प केलाक बाद माँ के हम प्रसन्न देखलियैन्ह। ताबैत धरि हमहू बूझी गेल छलियैय जे आब सत्ते हमर विवाह भ रहल अछि, आ हमरा दोस्त सब सं बात सुनइये पड़त, आ ओ सब चिढायत तकरा s हम नहि बचि सकैत छी। ओहि दिन हमर जन्मदिन सेहो छलैय, साँझ में दादी के मोन रहि गेलैंह आ हमरा साड़ी पहिरय पड़ल।


खैर हमर विवाह बड़ धूम धाम स भेल आ हम तेहेन लोकक जीवन संगनी बनलों जे हमर जीवन धन्य भ गेल।

क्रमशः ...............
-कुसुम ठाकुर-

आमंत्रण- श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर (१९३६- )

ककरो दैछ निमंत्रण खाट
सब दिन सुतले रहबाले
हमरो दैछ निमंत्रण बाट
हरदम चलिते रहबाले।
ककरो पवन झुलाबय झुलना
सपना देखिते रहबाले।
हमरा पवन छुबैये देह
सिहरल सिहरल उठबाले।
हमरा खातिर पवन कमाल
हमरा खातिर पवन रुमाल
हमरा किरण कहैए झात
सबटा दुख हरि लेबाले
हमरा सोर करैय बाध
बाधक पारक नील आकाश
हमरा पंछीसँ अधिक प्रेम
गगनक आँचर सुँघबाले।
मानल थीक प्रलय केर राति
मन घबड़ाथि कथीले
हम तऽ हर-सिङ्गारक फूल
हरदम झरिते रहबाले।
सोना बनबा केर इच्छुक तऽ
आगिक डऽर कतेक दिन
हम तऽ धधरा लेल पजारि
अनुखन जरिते रहबाले॥

प्यास- श्यामल सुमन

हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
भूख लागल अछि एखनहुँ, उमिर बीत गेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
नौकरी की भेटल, अपनापन छूटल!
नेह डूबल वचन केर आश टूटल!!
दोस्त यार कतऽ गेल, नव-लोक अपन भेल!
गाम केर हम बुधियार, एतऽ बलेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!

आयल पाविन-त्योहार, गाम जाय केर विचार!
घर मे चचार् केलहुँ तऽ, भेटल फटकार!!
निह नीक कुनु रेल, रहय लोक ठेलम ठेल!
किनयाँ कहली जाऊ असगर, आ बन्द क खेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
की कहू मन के बात, छी पड़ल काते कात!
लागय छाती पर आबि कियो राखि देलक लात!!
घर लागय अछि जेल, मुदा करब निह फेल!
नवका रस्ता निकालत, सुमन ढ़हलेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!

Monday, March 16, 2009

मैथिल के? --रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

मिथिलाक अति पावन महि पर
जकर भेल थिक जन्म
वा जे करैछ एहि भूमि पर
अपन जीवनक कर्म
जे कए रहलैछ प्रवास
मुदा पुरुषा सभ करैत छलनि
मिथिले मे वास
चाहे ओ
कोनो धर्मक कियए ने हो
धर्मक अन्तर्गत कोनो जातिक
कियए ने हो
एहि सोच पर अबैछ घृण
जे मैथिल अछि मात्र ब्राह्मण
मैथिल छलथि राजा जनक
हुनक सुता छलीहए सीते
जाहि पर गर्व करैछ सगरे मिथिला
ने वैह छलाह ब्राह्मण, ने हुनकर धिये
कि ओ मैथिल नहि?
ई जुनि कहि
अछि मिथिला कतेको विभूति जनने
सदति रहू सीना तनने
पुरा काल सँ ई माटि
उपजबैत अछि बड़-बड़ विद्वान
सुनू खोलि कऽ दुनू कान
बसै छथि कलकत्ता, काठमांडू
वा न्यूयार्क ओ दिल्ली
ओ छथि सुच्च मैथिल जिनक
ठोर पर खेलि रहल छथि मैथिली
सभ मैथिल मिलि निज मिथिला केँ
दियाबू एकर मान-सम्मान
जे उभरय विश्व मानचित्र पर
बनि एकटा विशिष्ट चान
बुझलहुँ ने, जे कहलहुँ से
आब नहि पूछू, मैथिल के?

Saturday, March 14, 2009

मैथिल रंग बरसे (यू.एस. मे मैथिलक होली) - विद्या मिश्र



हमर सभक एहि बेरक होली हमर घरमे मनाओल गेल...25-30 टा परिवार रहथि। सभ मैथिल रहथि जाहिमे प्रोफेसर हरिमोहन झाक नाति आ डॉ. रमा झाक पुत्र प्रतीक झा सेहो रहथि, ओ हमरा सभक न्ईक मित्र सेहो छथि। हमर सभक प्रयास रहैत अछि पाबनि-तिहारकेँ पारम्परिक रूपमे मनेबाक जाहिसँ अगिला पीढ़ीक बच्चा एकर अनुकरण कए सकए, अनुभव क’ सकए आ अर्थ बुझि सकए।
पछिला साल सभ बच्चा सभ अपन लिखल नाटक हिरण्यकश्यप/ होलिकाक मंचन कएने रहथि। कमसँ कम हुनकासभकेँ होली पाबनि कोना आ किएक मनाओल जाइत अछि तकर पूर्ण ज्ञान छन्हि। किएक हम सभ रंग लगबैत छी आ गरा मिलै,प्त छी, पारम्परिक खानपान आ होली गीत..सभटा।
मैथिल लोकनि भाग लेबाक लेल न्यू जर्सी, विर्जिनिया, वासिंगटन डी.सी आ मेरीलेण्ड सँ अएलाह, से 4-5 गोट स्टेट्स मैथिल रहथि। एहि बेर सभसँ नीक उत्तर प्रतियोगिता रहए, सर्वोत्तम ड्रेस-समन्वय आ पार्सल देबाक प्रतियोगिता रहए आ एहि सभमे मिथिला संस्कृतिसँ सम्बन्धित गहन प्रश्न रहए।सर्वोत्तम उत्तरक लेल हम सभटा उत्तर पढ़लहुँ आ तखन वोट देलहुँ??? सभ गोटे एहि अवसरक लेल बड्ड उत्साहित रहथि आ एहि अवसरक प्रति उत्सुक सेहो। एतए यू.एस.ए. मे बसंतक छुट्टी रहैत अछि से स्कूल कॉलेजक बच्चा सभ अएलाह आ एहि पारम्परिक होली उत्सवमे भाग लेलन्हि...आ हुनका ई एतेक नीक लगलन्हि जे अगिला बरिख सेहो एहिमे सम्मिलित होएबाक सोचलन्हि.... आ अंतिममे होलीक आशीर्वचन हमर लिखल।

माय (कविता) -मनीष झा "बौआभाई"

माय (कविता)

मनीष झा "बौआभाई"

एक-एक क्षण जे बेटा के खातिर
कर जोड़ि विनती करैइयै माय
बिनु अन्न-जल ग्रहण केने बेटा लै
जितियाक व्रत राखैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


जिन्दगीक रौदा में तपि क'
बेटा के छाहड़ि दैइयै माय
बरखा-बिहाड़ि सन विषम समय में
आँचर स' झाँपि राखैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


घर में छोट-छिन बात पर में
बाप स' लड़ि लैइयै माय
बाप स' लड़ि बेटा के पक्ष में
फैसला करैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


बेटा नै जा धरि घर आबय
बाट टुकटुक ताकैइयै माय
ओठंगि के चौकठि लागि बैसल
राति भरि जागैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


वयस कियैक नै हुऐ पचासक
तहियो बौआ कहैइयै माय
अहू वयस में नज़रि ने लागय
तैं अपने स' निहुछैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


होय जानकी वा अम्बे के प्रतिमा
सभ रूप में झलकैइयै माय
तीर्थ-बर्थ सब मन के भ्रम छी
घर में जे' कुहरैइयै माय
कर्त्तव्य हमरो ई कहैइयै
घर में नै कलपय ई माय
आ एहि तरहें जन्म देल त'
माय के पद पाबय ई माय

ईक्कसवी सदीक फगुआ- दयाकान्त


ईक्कसवी सदीक फगुआ
ऋतु बसन्त के भेल प्रवेष
जाड़क नहि आब कोनो कलेष
मज्जर से गमकैत अछि आम
गाबै फगुआ सब बैस दलान
कियो मारै ढोल पर हाथ
किया दैत जोगिराक साथ
निकलैत जखन षिव के झांकी
बचैत नहि छल ककरो खांखी
मायक हाथक मलपुआक स्वाद
अबैत अखनो फगुआ मे याद
ब्रह्मस्थन में जमै छल टोली
भड़ल रहै छल भांगक झोली
भौजी हाथक रंग गुलाल
बजबैत जखन खुषीसॅ ’लाल’
सबकिया रंग में सराबोर
राग द्वेस सब भेल बिभोर
ईक्कसवी सदीक फगुआक हाल
केने अछि बड़ आई बबाल
नहि निकलैत आब रंगक झोली
एसएमएस से सब हैप्पी होली
आईटी में नव रंगक खेल
घरे से सब भेजैत ई-मेल
दु-चारि टा चित्र कट पेस्ट
नहि करैत छथि समय वेस्ट
नहि निकलैत भांगक डोल
दारू पी सब करै किलोल
बाजै सबतरि अस्लील सीडी
दुर भागै फगुआसॅ नव पीढी
आधुनिकताक दौर में हम
कयल महात्म फगुआक कम


दयाकान्त
ग्राम$पोस्ट ः नरूआर, झंझारपुर, मधुबनी (बिहार)

Wednesday, March 11, 2009

मिथिला परिक्रमा सम्पन्न


जनकपुर । मिथिलाक 15 दिना मध्यमा परिक्रमा बुधदिन सम्पन्न भेल अछि । जनकपुरमे रामजानकी र मिथिला विहारीक डोला अन्तरगृह परिक्रमा कएलाक बाद मध्यमा परिक्रमा सम्पन्न भेल अछि । नेपाल आ भारतक 1 सय 33 किलोमिटर दुरीमे रहल विभिन्न धार्मिक स्थलके भ्रमणक' परिक्रमा डोला मंगलदिन जनकपुरमे आबिक' विश्राम कएने छल ।

धनुषा जिलाक ठेराकचुरी मठसं फ़ागुन 13 गते परिक्रमा शुरु भेल छल । परिक्रमामे जनकपुरक हनुमाननगर होइत भारतको करुणा, विशौल, महोत्तरी जिलाक मटिहानी,जले·ार, मडइ, ध्रुव कुण्ड, कंचन वन, क्षिरे·ार, सतोषर, पर्वत्ता, औरही आ फ़ेरो पुन भारतक करुणा विशौल होइत वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र पडैत अछि । परिक्रमामे सहभागी साधुसन्त, महन्थ आ श्रद्धालु भक्तजन पएरे चलिक' इ परिक्रमा पुरा करैत अछि । मंगलक राति सम्मत जराओल गेल । जनकपुर नगरको अन्तगृह परिक्रमामे नेपाल आ भारतक श्रद्धालुक अपार भीड रहैत अछि ।

महामूर्खक उपाधि !




जनकपुर । प्राचीन मिथिलाको राजधानी जनकपुरमे होरी मनएबाक क्रममे महामुर्ख सम्मेलन आयोजन कएल गेल अछि । स्थानीय जानकी मन्दिरमे मंगलदिन रंग अबिर खेलैत महामूर्ख सम्मेलन सम्पन्न भेल । मिथिला नाट¬ कला परिषद होरीक अवसरमे हास्य कवि गोष्ठी आ महामुर्ख सम्मेलन करैत आएल अछि ।



महामूर्ख आ कवि गोष्ठी कार्यक्रममे स्थानीय राजनीतिकर्मी, बुद्विजिवी, व्यापारी, पत्रकार सहितके सहभागिता छल । सम्मेलनमे वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र विमल, कलाकार सुनिल मल्लिक सहित तीन दर्जनसं बेशी गोटेके महामुर्ख, पटमुर्ख, गदहा मुर्खक उपाधि देल गेल । कवि गोष्ठीमे प्रधानमन्त्री प्रचण्ड, काँग्रेसक सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला, एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल, फ़ोरम अध्यक्ष उपेन्द्र यादव सहितक नेताके व्यंग्य करैत कविता वाचन कएने रहैथ ।



Tuesday, March 10, 2009

सटै जँ ठोर अनचिन्हारक अनचिन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक-गजल

गजल

सटै जँ ठोर अनचिन्हारक अनचिन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक
बाजए जँ केओ प्यार सँ त बुझिऔ होली छैक

बेसी टोइया-टापर देब नीक नहि भाइ सदिखन अनवरत
निकलि जाइ जँ अन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक

केहन- केहन गर्मी मगज मे रहै छैक बंधु
मनुख बचि जाए जँ गुमार सँ त बुझिऔ होली छैक

की दुख होइत छैक चतुर्थीक राति मे नहि बुझि सकबै
हँसी जँ आबए कहार सँ त बुझिऔ होली छैक

जहाँ कनही गाएक भिन्न बथान तहाँ सुन्न- मसान
होइ कोनो काज सभहँक विचार सँ त बुझिऔ होली छैक

Monday, March 09, 2009

एही बेर फागुन मे

एही बेर फागुन में,
मचाऊ ऐहेन धमाल बउवा ,
पाबैन मोन रहे सबके,
किछ ऐहेन करू कमाल बउवा॥

छोडू रंग -भंग स परहेज़ ,
घोरि दियौ , पोखैर ताल बउवा,
युग बीतल नहीं खेल्लेलौं ,
अपने सब गोबर थाल बउवा॥

तोडू टेप रेकाडर, आ घेंट दबाऊ बाजा के,
एही बेर ता ठोकू जोगीरा के ताल बउवा
रंग-अबीर के छिट्टा सं भरी दियौ घर अंगना,
ततेक पक्का हुए रंग , मिटाई नै भैर साल बउवा॥

जोगी नाचत, जोगनिया नाचत,
मदमस्त भ का नचता लाल बउवा,
अहेन रंग से खेलु एही बेर,
सब कियो भ जाय नेहाल बउवा...

समस्त मिथिलांचल के फगुआ के शुभकामना, सत्ते अहाँ सब बड मोन पडैत छी

Friday, March 06, 2009

पैघ व्यक्तित्व छोट विचार

जनसत्ताक 1 मार्च 2009, रवि दिनक अंक में अपन स्तम्भ कागद कारे में प्रभाष जोशी एक रेल यात्राक विवरण देइत रेल बोगी में एक गोट दम्पत्तिक आपसी व्यव्हार (जे हुनका अरुचिकर लागलैन)
केर जिक्र केने छथि. ओ लिखैत छथि - मुस्कान आ बोली सं ओ दंपत्ति बिहारक लगैत छलै.
बोली सं प्रान्त चिह्नब कोनो विशेष बात नहि मुदा मुस्कान सं ??????
की बिहारक लोक सबहक मुस्कान आन प्रान्तक लोक सब सं भिन्न होइत छैक ???
( इ किछु आर नहि पूर्वाग्रहक प्रस्तुति थिक.) जेना कि हुनकर वर्णन छैन्हि अहि मुस्कानक कोनो नीक अर्थ लगायब मोश्किल अछि. संस्मरणक अंत होइत होइत एहन संकेत भेंटत अछि ओ दंपत्ति तें अभद्र छलै जें बिहारक छलै. हुनकर स्तम्भ सं सन्दर्भ अंश उपलब्ध करायल जा रहल अछि (देखू www.maithilimandan.blogspot.com ). प्रभाष जोशी सन व्यक्तित्व सं अहि तरहक टिपण्णीक अपेक्षा नहि कयल जा सकैछ.

Wednesday, March 04, 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार

गजल

यथा एन्नी तथा ओन्नी एन्नी-ओन्नी तथैव च
यथा माए तथा बाप मुन्ना-मुन्नी तथैव च

बलू हमर करेज जरैए अहाँ गीत लिखै छी
यथा भँइ तथा अच्छर पन्ना-पन्नी तथैव च

देखहक हो भाइ बोंगहक पोता कोना करै हइ
यथा मुल्ला तथा पंडित सुन्ना-सुन्नी तथैव च

देवतो जड़ि पकड़ै हइ मुहेँ देखि कए बचले रहू
यथा मौगी तथा भूत ओझा-गुन्नी तथैव च

बान्हि क भँइ दूरा पर मगबै ढ़ौआ पर ढ़ौआ
यथा समधी तथा समधीनी बन्ना-बन्नी तथैव च

की करबहक हो भगवान एमरी सभ के
यथा मरनाइ तथा जिनाइ रौदी-बुन्नी तथैव च

बचले रहिअह अनचिन्हार एहि गाम मे सदिखन
यथा साँप तथा मनुख जहर चिन्नी तथैव च

Tuesday, March 03, 2009

शब्द- सतीश चन्द्र झा

चिकड़ि रहल अछि शब्द आबि क’
निन्न पड़ल निश्बद्द राति मे।
अछि उदंड, उत्श्रृखल सबटा
नहि बूझत किछु बात राति मे।
केना करु हम बंद कान के
उतरि जाइत अछि हृदय वेदना।
बैसि जाइत छी तैं किछु लिखय
छीटल शब्द हमर अछि सेना।
कखनो कोरा मे घुसिया क’
बना लैत अछि कविता अपने
जुड़ल जाइत अछि क्लांत हृदय मे
शब्द शब्द के हाथ पकड़ने।
कविता मे किछु हमर शब्द के
नहि व्याकरणक ज्ञान बोध छै।
सबटा नग्न, उघार रौद मे
नेन्ना सन बैसल अबोध छै।
कखनो शब्द आबि क’ अपने
जड़ा दैत अछि प्रखर अग्नि मे।
कखनो स्नेह,सुरभि,शीतलता
जगा दैत अछि व्यग्र मोन मे।
क्षमा करब जौ कष्ट हुए त’
पढ़ि क’ कविता शब्दक वाणी।
शब्द ब्रह्म अछि नहि अछि दोषी
छी हमही किछु कवि अज्ञानी।

Monday, March 02, 2009

फानी-कथा-श्रीधरम

पंच सभ एकाएकी कारी मड़रक दुअरा पर जमा हुअ’ लागलछल । दलान पर चटाइ बिछा देल गेल रहै । देबालक खोधली मे राखल डिबिया धुआँ बोकरि रहल छल । मात्र रामअधीन नेताक अयबाक देरी रहै
बिना रामअधीन नेताक पंचैती कोना शुरु भ’ सकैए? डोमन पाँच दिन पहिनहि सँ पंच सभक घूर-धुआँ मे लागल छल । डोमन चाहैत रहए जे सभ जातिक पँच आबय, मुदा रामअधीन नेता मना क’ देने रहै, “बाभन-ताभन केँ बजेबेँ तँ हम नइँ पँचैती मे रहबौ जातिनामा पँचैती जातिए मे होना चाही ।“ डोमन केँ नेताजीक बात काटबाक साहस नइँ भेलै । रामअधीन आब कोनो एम्हर-ओम्हर वला नेता नइँ रहलै, दलित पाटीक प्रखंड अध्यक्ष छिऐ । थानाक बड़ाबाबू, सीओ, बीडीओ, इसडीओ सभ टा चिन्है छै । कुसी पर बैसाक’ कनफुसकी करै छै । मुसहरी टोलक बिरधापेंशनवला कागज-पत्तर सेहो आब नेतेजी पास करबै छै । कोन हाकिम कतेक घूस लै छै, से सभ टा रामअधीन नेता केँ बूझल छै । कारी मड़र तँ नामे टाक माइनजन, असली माइनजन तँ आब रामअधीने नेता किने?
डोमन पँच सभ केँ चटाइ पर बैसा रहल छल आ सोमन माथा-हाथ देने खाम्ह मे ओङठल, जेना किछु हरा गेल होइ । टील भरिक मौगी सभ कारी मड़रक अँगना मे घोदिया गेल रहै—सोमन आ डोमनक भैयारी-बँटवारा देख’ लेल । ओना दुनू भाइक झगड़ा आब पुरना गेल रहै । मौगी सभक कुकुर-कटाउझ सँ टोल भरिक लोक आजिज भ’ ग्र्ल रहय तेँ रामअधीन नेता डोमन केँ तार द’क’ दिल्ली सँ बजबौलकै । सभ दिनक हर-हर खट-खट सँ नीक बाँट-बखरा भइए जाय ।
झगड़ाक जड़ि सीलिंग मे भेटलाहा वैह दसकठबा खेत छिऐ जे सोमनक बापे केँ भेटल रहै । रामअधीन नेताक खेतक आरिये लागल दसकठबा खेत । कैक बेर रामअधीन नेता, सोमनक बाप पँचू सदाय केँ कहने रहै जे हमरे हाथेँ खेत बेचि लैह, मुदा पँचू सदाय नठि गेल रहै । रामअधीन नेता आशा लहौने रहए जे बेटीक बियाह मे खेत भरना राखहि पड़तनि, मुदा पँचू सदाय आशा पर पानि फेर देने छलै । एकहक टा पाइ जोगाक’ बेटीक बियाह सम्हारि लेलक तेँ खेत नइँ भरना लगेलक । मरै सँ चारि दिन पहिनहि पँचू सदाय सोमन आ डोमन केँ खेतक पर्ची दैत कहने रहै,”ई पर्ची सरकारक देल छिऐ, जोगाक’ रखिहेँ बौआ, बोहबिहेँ । नइँ । दस कट्ठा केँ बिगहा बनबिहेँ, भरि पेट खाइत देखिक’ सभकेँ फट्टै छनि । बगुला जकाँ टकध्यान लगेने रहैए ।“
डोमन बापक मुइलाक बाद परदेश मे कमाय लागल रहय आ सोमन गामे मे अपन खेतीक संग-सग मजूरी । फसिलक अधहा डोमनक बहु रेवाड़ीवाली केँ बाँटि दैक । मुदा, जेठकीसियादिनी महरैलवाली केँ ईबड्ड अनसोहाँत लागै, “मर्र, ई कोन बात भेलै, पसेना चुवाबै हमर साँय, चास लगाब’ बेर मे सभ निपत्ता आ बखरा लेब’ बेर गिरथाइन बनि जायत । लोकक साँय बलू गमकौआ तेल-साबुन डिल्ली से भेजै हय त’ हम कि हमर धीया-पुत्ता आरु सुङहैयो ले’ जाइ हय् ।“
सभ दिन कने-मने टोना-टनी दुनू दियादिनी मे होइते रहै । मुदा, ओहि दिन जे भेलै...
सोमन गहूँम दौन क’ क’ दू टा कूड़ी लगा देलक आ नहाय ले’ चलि गेल । गहूमक सऊँग देह मे गड़ैत रहै । रेवाड़ीवाली अपन हिस्सा गहूम पथिया मे उठाब’ लागल रहए कि देखते जेना महौलवाली केँ सौंसे देह मे फोँका दड़रि देलकै, “रोइयोँ नइँ सिहरै हय जेना अपने मरदबाक उपजायल होइ ।” रेवाड़ीवाली कोना चुप रहितय ? कोनो कि खेराअँत लै छै? झट द’ जवाब देलकै, “कोनो रंडियाक जिरात नइँ बाँटै हय कोइ अधहाक मालिक छिऐ छाती पर चढ़िक बाँटि लेबै।” ’रंडिया’ शब्दा महीरैलवालीक छाती मे दुकैम जकाँ धँसि गेलै-“बरबनाचो...के लाज होइ हय बजैत साँय मुट्ठा भेजै हय आइँठ-कुइठ धोइ क’ आ एत’ ई मौगी थिराएल महिंस जकाँ टोले-टोल डिरियायल फिरै हय, से बपचो...हमरा लग गाल बजाओत।“ सुनिते रेवाड़ीवालोक देह मे जेना जुरपित्ती उठि गेलै ओ हाथ चमकबैत महरैलवालीक मुँह लग । चलि गेल, “ऐ गै धोँछिया निरासी! तूँ बड़ सतबरती गै! हे गै उखैल क’ राखि देबौ गै । भरि-भरि राति सुरजा कम्पोटर पानि चढ़ा-चढ़ा क’ बेटीक ढीढ़ खसेलकौ से ककरा स’ नुकायल हौ गै? कोना बलू फटा-फटि बेटीक ’दीन क’ ससुरा भेज देलही।”
बेटीक नाम सुनिते महरैलवालीक तामस जवाब द’ देलकै झोँ टा पकड़िक’ रेवाड़ीवाली केँ खसा देलक । दुनू एकदोसराक झोँ ट पकड़ने गुत्थम-गुत्थी भेल । ओम्हर सँ सोमनक बेटा गँगवा हहासल-फुहासल आयल आ मुक्के-म्य्क्की रेवड़ीवाली केँ पेटे ताके मार’ लागल । रेवाड़ीवाली एसगर आ एमहर दू माइ-पूत । कतेक काल धरि ठठितया, ओ बपहारि काट’ लागल । टोल पड़ोसक लोक सभ जमा भ’ गेल रहै, दुनू केँ डाँटि-दबाड़ि क’ कात कयलक । दुनू दियादिनीक माथक अधहा केस हाथ मे आबि गेल रहै ।
ओहि राति रेवाड़ीवालीक पेट ने तेहन ने दरद उखड़लै जे सुरज कम्पोटर पानि चध्आ क’ थाकि गेलै, मुदा नइँ सम्हरेलै । चारिये मासक तँ भेल रहै, नोकसान भ’ गेलै । बेहोसियो मे रेवाड़वाली गरियबिते रहलै, “ईडनियाही हमरा बच्चा केँ खा गेल । सोचै हय कहुना निर्वश भ’ जाय जे सभ टा सम्पैत हड़पि ली । डनियाहीक बेटा मरतै । धतिंगबाक हाथ मे लुल्ही-करौआ धरतै । काटल गाछ जकाँ अर्रा जेतै...। ”
दिसरे दिन रेवाड़ईवाली थाना दौगल जाइत रहे, रिपोट लिखाव’ । रस्ता सँ रामअधीन नेता घुरेने रहै, “समाजे मे पँचैती भ’ जैतौ” आ नेताजी सोमन केँ मार’-मास्क छूटल रहै, “रौ बहि सोमना । मौगी केँ पाँज मे राखबेँ से नै । आइए सरबे सब परानी जहल मे चक्की पिसैत रहित’ । मडर केस भ’ जइतौ । सरबे हाइकोट तक जमानति नहि होइत ।” सोमन बीतर धरि काँपि उठल रहय । नहि जानि पँचैती मे की सभ हेतै । एक मोन भेलै, जाय आ पटुआ जकाँमहरैलवाली केँ डंगा दैक । ’ई, छिनरी के हरदम फसादे वेसाहैत रहैए ।’
रामअधीन नेताक अबिते पँचैतीक करबाइ शुरु भ’ गेलै । फौदारक चीलम सँ निकलैत धुँआक टुकड़ी किछु दूर उपर उठि बिला जाइत रहे गंधक माध्यम सँ अपन उपस्थितिक आभास दैत एअहय ।
“हँ त’ डोमन किऐ बैसेलही हेँ पँचैती, से पँच केँ कहबिही किने” रामअधीन नेता बाजल । डोमन ठाढ़ होइत बाजल, “हम परदेस कामाइ छिऐ । रेवाड़ीवाले एत’ एसगर रहै हय । पँचू सदाय बलू भैयाक बाप रहै त’ हमरो बाप रहै । हमहुँ पँचूए सदायक बुन्न स’ जनमल छिऐ आ बोए केँ सरकार जमीन देने रहै महंथ स’ छीनिक । अइ जमीन पर जतने अधिकार एकर हइ ओतने हमरो हय । तहन जे स’ब मिलि क’ रेवाड़ीवालीक गँजन केलकै, तकर निसाफ पँच आरु क’ दइ जाउ । हमरा आर कुछो नइँ कहनाइ हय ।“ सब चुप...फेर नेतेजी सोमन केँ टोकलके, “की रौ । तोहर की कहनाम छौ?”
“आब हम बलू की कहबै ? जे भ’ गेलै से त’ घुरिक नइँ एतै ग’ । समाज आरूक बीच मे छिऐ । जते जुत्ता मारै केँ हइ, मारि लौ । दुनू मौगी रोसाएल रहै, तहन त’ बलू ओकर नोकसान भ’ गेलै तेँ ओकर दिख त लोक नइँ देतै । तहन जे भ’ गेलै से भ’ गेलै । पंच आरू मिलिक’ बाँट-बखरा क’ दौ । खेतो केँ आ घरो केँ । झगड़े समापत भ’ हेतै ।”
“रौ बहिं सिमना, बात केँ लसियबही नइँ । तहन त’ अहिना ककरो कियो खून क’ देतै आ समाज मुँह देखैत रहतै । कोना बभना आरू पुक्की मारै जाइ हइ से तूँ सभ की जान’ गेलही । परसू बेलौक पर सार मुखिया हमरा देखि-देखिक’ हँसैत रहय, चुटकी लैत रहय, “की हौ रामअधीन! जहन टोले नइँ सम्हरै छ’ त’ बिधायक बनलाक बाद पूरा एलाका कोना सम्हरतह? सुनै छिय’ एहि बेर टिकट तोरे भेटत’ । चल’ अइहबा मे पार लागिऐ जेत’।...” नेताजी गुम्हरल, “टिकटेक नाम सुनिक’ सार सब केँ झरकै छनि, आगू की सभ जरतनि?” रामअधीन नेता एक बेर मोँ छ केँ चुटकी सँ मीड़ि उपर उठेक फेर आक्रामक मुद्रा बनबैत बाजल, “सुनि ले बहिं, से सभ नइँहेतौ । गलती दुनू के छौ । पाँच-पाँच हजार दुनू केँ जुर्बाना देम’ पड़तौ, जातिनाम खाता मे।” नेताजीस्वाभाविक गति सँ पुन: एक बेर मोंछक लोली केँ चुटकी पर चढ़बैत मड़र कका दिस देखलनि, “की हौ मरड़ कका बजैत किऐ ने छहक?” मड़र कका बदहा जकाँ मूड़ी डोला देलकै ।
डोमन भाइ सँ बदला लैक धुन मे एखन धरि गुम्हरि रहल छल, मुदा नेताजीक बात सुनिते झमान भ’ खसल । एक मोन भेलै, कहि दै—जे भेलै से भेलै भैयारी मे । नइँ करेबाक य’ पंचैती । ई किन बात भेलै ! हमरे बहु मारियो खेलक आ जुर्बान सेहो हमहीं दियौ, मुदा चुप रहल । डरें बाजल नइँ भेलै । डोमन केँ देखल छै जे रामअधीन नेता पंचैती नइँ माननिहार केँ कोना ताड़क गाछ मे बान्हिक’ पीटै छै । एखन धरि जुर्बाना वला पचासो हजार टाका जातिनाम खाता मे गेल हेतै, मुदा हिसाब? ककर बेटी बियेलैहेँ जे रामअधीन नेता सँ हिसाब माँगत!
रामअधीन नेताक पी.ए. जकाँ हरदम संग रहनिहार मोहन सदाय बाजि उठल, “की रौ सोमना, हम दुनू भाइ स’ पुछै छियो; कहिया तक पाइ जमा क’ देमही ? एक सप्ताह स’ बेसीक टेम नइँ देल जेतौ । अहि पाइ स’ कोनो छिनरपन नइँ हतै, सारबजनिक काम हेतै । दीना-भदरीक गहबर बनतै ।”
“कतौ स’ चोरी कए क’ त’ नइँ आनबै हमर हालति बलू ककरो स’ नुकाएल त’ नइँ हय ।“ सोमन कलपल ।
मोहन सदाय केँ रामअधीनक कृपा सँ जवाहर-रोजगार वला ठिकेदारी सभ भेट’ लागल छै । सीओ, बीडीओ केँ चेम्बरे मे बंद क’ दैत अछि आ मनमाना दस्तखत करा लैत अछि तेँ ओकरा सभ टभजियायल छै जे घी किना निकालल जाइत छै । ओ सभक चुप्पी केँ तौलैत मड़रककाअक नाड़ी पकड़लक “की हौ मड़र कका! तोरा आरूक की बिचार छह? दीना भदरीक गहबर मे ओ पाइ लागि जाए त’ नीके किने ?”
मरड़ कका आइ दस साल सँ हरेक पंचैती मे अहिना दीना-भदरीक गहबर बनैत देखि रहलछै’ मुदा एखनो दीना-भदरीक पीड़ी पर ओहिना टाँग अलगा क’ कुकूर मुतिते छै । मड़रकका मने-मन कुकू केँ गरियेलक, “सार, कुकूरो केँ कतौ जगह नइँ भेटै हय, देबते-पितरक पीड़ी केँ घिनायत ।” खैनीक थूक कठ धरि ठेकि गेल रहै, पच्चा द’ फेकैत बाजल’ “जे तूँ सभ उचित बुझही !”
पंचैती मे रामधीन नेता आ मोहन सदाय बजैत जा रहल छल । बाकी सभ पमरियाक तेसर जकाँ हँ मे हँ मिलबैत । सोमन पंच सभक मुँह ताकि रहल अछि, मुदा दिन भरिक हट्ठाक थाकल-ठेहियायल पंच सभक मुँह स्पष्ट कहै छै जे कतेक जल्दी रामअधीन नेता निर्णय दै आ ओ सभ निद्राक कोरा मे बैसि रहय । मड़र ककाक हुँहकारी सँ मोहन सदायक मनोबल एक इँच आरो उपर उठलै । ओ बाजल, “नगदी ई दुनू भाइ जमा क’ सकत से उपाय त’ नइँ छै तहन पाइ कोना एकरा सभ केँ हेतै, तकरो इन्तिजाम त’ आइए भ्’ जेबाक चाही । आब अहि ले’ दोसर दिन त’ बैसार नइँ हेतै । हम्र एक टा प्रस्ताब छै जे दुनू भाइक साझिया दसकठबा खेत ताबत केओ दस हजार मे भरना ल’ लौ । जहिया दुनू भाइ पाइ जमा क’ देतै तहिया खेत घुरि जेतै ।”
बिना ककरो विचार लेनहि मोहन सदाय डाक शुरु क’ देलक, “बाज’के लेबहक! जमीन अपने टोला मे रहतै बभनटोली मे नइँ जेनाय छै खपटा ल’क”
सभ चुप्प!
फेर मोहन सहाय बाजल, “जँ नइँ कियो लेबहक त’ नेताजी सोचतै, टोलक इज्जति त’ बलू बचाब’ पड़तै ओकरे किने ।” अंतिम श्ब्द बजैत मोहन सदायक आँखि नेताजीक आँखि सँ टकरा गेलै । मड़रकका आँखि मुनने भरिसक कुकूरे केँ खिहारि रहल छलाह । खैनीक सेप मुँह मे एतेक भरि गेल रहनि जे कने घोँ टाइयो गेलनि । खूब जोर सँ खखसैत बजलाह, :सुनि ले’ बहिं पिछला बेर जकाँ एहू बेर नइँ पजेबा खसि क’ उठि जाइ ।“ मड़र ककाक शंका मे आरो एक-दू गोटा अपन हामी भरलक । मोहन सदाय पहिनहि सँ तैयार रहय, झट द’ बाजि उठल, “नइँ हौ। दसक हहास बलू अपना कपार पर के लेत? जुर्बानाक पाइ देबते-पितर मे जेतै । दीना-भदरी संगे जे सार फ़द्दारी करत, तकरा घर पर खढ़ो बचतै ? घटतै त’ एक-दू हजार नेताजी अपन जेबियो स’ लगा देतै । कोनो अंत’ जेतै? धरम-खाता मे जमा रहतै । बभना आरू जेहन डीहबारक गहबर बनेलकै, ओहू स’ निम्मन दीना-भदरीक गहबर बनतै।”
महरैलवाली बड़ी काल सँ मुँह दबने रहय । आब ओकर धैर्य जबाव द’ देलक, “हइ के हमर जमीन लेतै? दीना-भदरीक गहबर बनै ले’ हमरे जमीन हइ । मोंछवला सभ बेहरी द’क’ बनेतै से नइँ।” रेवाड़ीवाक्लीक हृदय सेहो आब बर्फ भ’ गेल रहय । दियादनीक बात मे ओकरो मौन समर्थन रहै ।
रामअधीन नेता केँ कहियो-कहिओ दिन तका क’ तामस उठै छै जहन ओकरा मोनक विपरीत कोनो काज होइत छै। एहन परिस्थिति मे नेताजी टोल भरिक छौड़ी-मौगी सँ गारिक माध्यम सँ लैंगिक संबंध स्थापित क’ लैत छथि । “छिनरी केँ तूँ बीच मे बजनाहर के? हम सोमना नइँ छी, ततारि देब ।“ नेताजी मारैक लेल हाथ उठेलनि । महरसिलवली नेताजीक लग मे आरो सटैत बाजल, “माय दूध पियेने हइ त’ मारि क’ देख लौ ।” नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’ बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ । आगि-पानि बारि देबौ, देखै छी कोना गाम मे तूँ रहि जाइत छें।”
“है केहन-केहन गेलै त’ मोछवला एलै । बहरा गाम मे रहि जेबै तें जमीन पर नइँ ककरो चड़ह’ देबै । ई नेताबा आरू गुरमिटी क’क जमीन हड़प चाहै हय । जमीन भरना लेनिहार केँ त’ खपड़ी स’ चानि फोड़ि देबै । दीना-भदरी गरीबेक जमीन लेतै । अइ नेताबा आरूक कपार पर हरहरी बज्जर खसतै । घुसहा पंच सभ केँ मुँह मे जाबी लागि गेल हय । निसाफ बात बजैत लकबा नारने हइ ।“
महरैवालीक ई हस्तक्षेप सोमनक पक्ष केँ आरो कमजोर क’ देलकै । पंच सभ सोमन केँ धुरछी-धुरछी कर’ लगलै । फौदार कहलकै, “त’ रौ बहिं सोमना, ई मौगी ठिके झँझटिक जड़ि छियौ । एकरा अँगना क’ बइलेबेँ से नइँ? गाइरे सुनबै ले’ पंच आरू केँ बजेलही हें ।” सोमन केँ भरल सभा मे ई बेइज्जती बड़ अखड़लै “जहन मरदा-मरदी बात होइ हय त’ ई मौगी किऐ बीच मे टपकै हय ।” सोमन, महरैलवालीक ठौठ पकड़ि क’ अँगना मे जा क’ धकेलि देलक । महरैवाली आँगने सँ गरियाबैत रहल, “अइ मुनसा केँ त’ जे नइँ ठकि लइ । बोहा दौ सभ टा । नेतबा सभ त’ तौला मे कुश द’क’ रखनै हय।”
आब नेताजीक तामस मगजो सँ उपर चढ़ि गेल, “ई सार सभ ओना नइँ सुधरत । एखने बभना आरू दस टा गारि दैतनि आ चारि डंटा पोन पर मारितन्हि त’ तुरते पंचैती मानितय । कोन सार पंचैती नइँ मानत से हमरा देखनाइ यए ।” नेताजीक ठोरक लय पर मोंछो थरथरा रहल छल ! “सरबे सभ केँ हाथ-पयर तोड़िक’ राखि देबनि । घर मे आगि लगा क’ भक्सी झोंकान झौकि देबनि । देखै छी कोन छिनरी भाइ दरोगा हमरा खिलाफ एन्ट्री लैयए ।” चारू भर श्मशानक नीरवता पसरि गेल छल । पंच सभ आगाँक बातव् केँ रोकबाक लेल डोमन आ सोमन दिस याचक दृष्टएँ ताकि रहल छल । मोहन सदाय कागत-कजरौटी निकालैत सोमनक कान मे बाजल, “की विचार छौ, फसाद ठाढ़ करबें?” आ फेर सोमनक थरथराइत औंठा पकड़िक’ कजरौटी मे धँसा देलक ।
अही बीच महरैलवाली वसात जकाँ हहाइत आयल आ दुनू हाथ सँ कागत आ कजरौटी केँ पकड़ि क’ ओहि पर सूति रहल! ओ बाजय चाहैत रहय, मुदा मुँह सँ आवाज नहि निकलि रहल छलै । रामअधीन नेता कागत आ कजरौटी महरैलवालीक हाथ सँ छीन’ चाहैत छल, मुदा महरैलवाली पाथर भ’ गेल रहय । जेना ओ कागत नहि, ओ दसकठवा खेत हो जकरा ओ अपना छाती सँ अलग नहि कर’ चाहैत रहय ।
“छिनरी केँ तू एना नहि मानवें ।” महरैलवालीक मुँह पर घुस्सा मारैत ओकर मुट्ठी केँ हल्लुक कर’ चाहलक ।
एम्हर रेवाड़ीवालीक चेहरा तामसे लाल भ’ गैल रहै । ओकर सभ टा चिद्रोह नेता सभक कूटनीति केँ बुझिते पिघलि गेल रहै । ओ डोमनक देह झकझौरैत बाजल, “बकर-बकर की ताकै छ’ । नार’ ने पूतखौका नेताबा आरू केँ । जब खेते नहि बचत’ त’ बाँटब’ की?” रेवाड़ीवालीक ई रूप देखि नेताजीक हाथ ढील हुअ’ लागल । पंच सभ हतप्रभ रेवाड़ीवाली दिस ताक’ लागल

Thursday, February 26, 2009

बाल कविता-१ जीवकान्तक दू टा कविता

1.
अक्षर कवितामे अँकुसी- जीवकांत


नेना सभ लेल फूजल स्कूल
बड़का देबाल वला
बड़का बस वला स्कूल
अक्षर सभ
बनाओल जा रहल कटगर
पेंसिलक खपत बढल अछि
विद्यालयक देबाल होइत जाइत मोट
अक्षरक काट भेल सुरेब
शिक्षक भेलाह छोट

बहुत न्एना बकरी लए जाइए खेत दिस
देबाल दिस नहीं तकैए
फेकि देल खराँत वला सिलेट
अक्षर सभमे देखाइत चैक अँकुसी
विचित्र आकार
ओहिसँ नीक आकारमे
जन्म लैत अछि बकरीक बच्चा
शिक्षक सभकेँ अभिनन्दन
अभिनन्दन ह्रस्व इकारक मात्राकेँ
अभिनन्दन स्कूलक घड़ीकेँ
रजिस्टर सभक गेँटल अभारकेँ
नमस्कार


2.
तकैत अछि चिड़ै - जीवकांत



रातिक अंतिम पहरमे
चिड़ै जगैत अछि
राजमार्ग पर घोदिआइत अछि

छोट-छोट जानवर सभक देह
टुटैत अछि गाड़ीक पड़िया तर
छोट-छोट घौदामे
तकैत अछि चिड़ै

आंगनमे बाँस पर बैसल अछि छिड़ै
कुड़िअबैत अछि अपन पाँखि लोलसँ
तकैत अछि चिड़ै
चार सभक दुनू कात
झीलक कछेरमे सिम्मरक गाछ पर
बैसल चिड़ै गबैत अछि गीत
तकैत अछि पानि दिस
झीलक पानि दिस
की सभ दहाइत छैक पानिमे
तकैत अछि चिड़ै

भाइजी काका- डॉ. जयकान्त मिश्रक स्मरण- विद्या मिश्र

भाइजी काका- डॉ. जयकान्त मिश्रक स्मरण
हम बहुत छोट रही, भरिसक स्कूलक दिन छल, जखन कखनहु हमर घरमे अंग्रेजीक विद्वान, कवि, मैथिली लेखकक चर्चा होइत रहए, लोक सदिखन डॉ. जयकान्त मिश्रक चरचा करिते रहथि। ओ ओहि समयमे हमर सभसँ पैघ मामाजीक साढ़ू रहथि। नेनपनमे हम मैथिल आर मिथिलाक विकास आ उन्नतिक प्रति हुनकर समर्पण आ साहित्यमे हुनकर योगदानसँ बड्ड प्रभावित रही। ओ हमरा लेल आदर्श रहथि..प्रशंसा करी आ सदैव हुनकासँ भेंट करबाक आ देखबाक लेल लालायित रही।
हम अपन स्नातक विज्ञानक द्वितीय वर्षमे रही जहिया डॉ. जयकान्त मिश्रक सभसँ छोट बेटा अपन पितियौतक घरपर धनबाद आएल रहथि। आ हमर बाबूजी तहिया ओतहि पदस्थापित रहथि, से ओ सभ हमरो सभक अहिठाम भेँट करबाक लेल आएलाह। हमरासँ भेँट कएलाक बाद, गप कएलाक बाद ओ हमर बाबूजीसँ कहलन्हि...अहाँ किए नहि हमर पितियौत हेमकान्त मिश्रसँ बिन्नी (हम) क विवाहलेल प्रस्ताव अनैत छी। आ एतए देखू.. हमर डैड हुनका सभ लग प्रस्ताव रखैत छथि आ एक मासक भीतरे हम हेमक संग विवाहित भऽ जाइत छी।
जखन हम सुनलहुँ जे हमर विवाह डॉ. जयकान्त मिश्रक भातिजक संग होमए जा रहल अछि..हम बड्ड प्रसन्न भेलहुँ आ शीघ्रहि हुनकर संग हमर सम्बन्ध परिवर्तित भऽ गेल किएक तँ हम आब ओहि परिवारक पुतोहु रही, विद्वान आ लेखकक परिवारक।

हम डॉ. हरिवंश राय बच्चनसँ बहुत नजदीक रही, पत्राचार माध्यमसँ, हुनकर परामर्श अवसरपर भेटए आ पारस्परिक रुचि हमरा सभ बाँटी। ओना तँ ओ हमरासँ बड्ड पैघ रहथि मुदा तैयो हमरा सभ एक दोसारासँ गप बाँटी आ एक-दोसराक चिन्ता करी, से हम हुनका कहलहुँ जे अहाँ प्रसन्न होएब जे हम इलाहाबादक डॉ. जयकान्त मिश्रक भातिजक संग विवाहित होमए जा रहल छी। हमरा जवाब भेटल जे हमर विवाह एकटा विद्वानक परिवारमे होमए जा रहल अछि, ई वैह छथि जिनका हम इलाहाबाद विश्वविद्यालयक अंग्रेजीक विभागाध्यक्षक अपन प्रभार देने रहियन्हि आ ओ सर्वदा हमरा अपन गुरु मानैत छथि। आ हुनकर पिता डॉ. उमेश मिश्रकेँ हम अपन गुरु मानैत छियन्हि। ओहि परिवारक ओ जे प्रशंसात्मक वर्णन कएलन्हि से आह्लादकारी रहए आ तकरा सोचैत एखनो हम उत्फुल्लित भऽ जाइत छी।

हम सभ १९९९ ई. मे संयुक्त राज्य अमेरिकामे बसि गेलहुँ मुदा हमरा सभक हृदय, आत्मा आ मस्तिष्क सर्वदा इलाहाबादमे रहैत छी आ त्रिवेणीपर भेल सभ कर्मकेँ अनुभव करैत छी हमरा सभ ओ सभ छोट-छीन काज करैत छी जे परिवारक प्रति आदर आ प्रेमक भाग अछि। हुनकर समर्पण, परम्परा, सरलता आ संस्कृतिक प्रति लगाव अनुकरणीय अछि। हम सभ हुनकर परिवारक मुखिया, गुरु आ भाइजी काकाक रूपमे क्षति सदैव अनुभव करब। ई परिवार आ समाजक लेल एकटा पैघ क्षति अछि।

Wednesday, February 25, 2009

चिकन टिक्की (ग्रिल्ड) हरियर चटनीक संग

चिकन टिक्की (ग्रिल्ड) हरियर चटनीक संग

बोनलेस चिकन- १/२ किलो
पियाजु- २ टा मध्यम आकारक
लहसुन- चारि झाबा
आदी (भुजबी कएल)- एक चम्मच
सौंस धनी- एक चम्मच
जीर- एक चम्मच
नून- इच्छानुसार
तेल- २ चम्मच
हरियर मरचाइ (काटल)- एक चम्मच
हरियर धनिया पात (काटल)- २० चम्मच

बोनलेस चिकनकें ग्राइन्डर/ मिक्सरमे पीसि कऽ बट्टामे राखू। जीर आ धनीकें लोहियामे भूजि कऽ मिक्सरमे बूकि लिअ आ बटामे धऽ दियौक। पियाजु,आदी आ लहसुनकें पीसिकें मिला कऽ बटामे काटल हरियर मेरचाइ आ धनियापात संग मिला दियौक।
दू चम्मच तेल आ नून (जेहन रुचए) बटामे दए चारि घण्टा रसबाक लेल छोड़ि दियौक।
ओवन/ ग्रिलरकें ३२५ एफ.पर धऽ दियौक


Chicken Tikki ( grilled ) with green chutni

Boneless chicken - 500 gm
Onion - 2 medium
garlic - 4 cloves
ginger ( grated ) - 1 table spoon
Whole coriander - 1 table spoon
Cumin seeds - 1 table spoon
salt ( as per choice )
Veg oil - 2 table spoon
green chillies ( cut ) - 1 table spoon
Green coriander leaves ( cut ) - 20 table spoon

Grind boneless chicken in a grinder / mixer and keep that in a large bowl .
Dry roast coriander and cumin seeds on a pan and crush in grinder and put it in the same bowl .
Paste onion , ginger and garlic in the same grinder and mix all of them in the same bowl along with cut green chillies and coriander leaves .
Add 2 table spoon of oil and salt as per requirement in the same mixture and keep aside for 4 hrs to marinate properly .

Put oven / griller on 325F

जंगल दिस !- रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

कम नहि, लागल छल भीड़ बेस
सूर्य उगल, फाटल कुहेस
तरुणी-तरुणक एकटा जोड़ा
घूमि रहल छल गुफा एलोड़ा
चश्मा साजल दुनू केर माथ
रखने एक दोसरक हाथ मे हाथ
हिप्पी देखि लागल तरुण अपाटक
जूता छलैक फोरेन हाटक
जिंस लगौने आओर टी शर्ट
देखि मोन कहलक बी एलर्ट
तरुणीक केश बॉब कटक
खाइत चलैत छल चटक-मटक
बढ़ैत चलि जाइत छल सीना तनने
तरुण प्रेमीक संग गप्प लड़ौने
तरुणी देह पर छलैक वस्त्र कम
तकर ने छलैक ओकरा गम
चलैत-चलैत भेल ठाढ़ दुनू
मोने सोचल एना लोक चलैछ कुनू
धेलक एक दोसर केँ भरि पाँज
देखि कऽ हमरा भऽ गेल लाज
मुँह घुमा पुछलियैक-जेबऽ कोन दिस
बाजल दुनू एक संग-जंगल दिस!

Monday, February 23, 2009

मैथिली के ल क किछु असुविधाजनक प्रश्न...

कखनो क सोचैंत छी जे मैथिली भाषा और मिथिलांचलक विकास ओहि रुप में किएक नहि भ सकलै जेना दोसर प्रान्त आ आन भाषा सब तरक्की क गैलै। एखुनका परिदृश्य अगर देखी त बुझाइत अछि जे मैथिली साहित्य के विकास आ एतुक्का विकास के ल क चिंता सिर्फ किछु मुट्ठी भरि लोक के दिमागी कसरत छैक-आम मैथिल ( या मैथिलीभाषी ? ) के एहि स कोनो सरोकार नहि। हालत त ई अछि जे मैथिल लोकनिके धियापुता दरभंगो मधुबनी में मैथिली नहि ,हिंदी में बात करैत छथि। एकर की कारण छैक आ एना किएक भैलैक।


अगर एकर तह में जाई त एहि भाषाके संग सबसं पैघ अन्याय ई भेलैक जे एकरा किछु खास इलाका के मैथिली बनयबा के आ किछु खास लोकक भाषा बनयबाके प्रयास कयल गैलैक। मैथिली के दरभंगा मधुबनी आ खासक ओतुक्का ब्राह्मण के भाषा बनाक राखि देल गेलैक। मधेपुरा-पूर्णिया के बात त दूर दरभंगो मधुबनी के विशाल जनसमुदाय ओ भाषा नहि बजैत अछि जे किताबी मैथिली के रुप में दर्ज छैक। ओना ई बात दोसरो भाषा के संगे सत्य छैक लेकिन कमसं कम ओतय ओहि भाषा के स्थानीय रुप के हिकारत या हेय दृष्टि सं नहिं देखल जाई छैक। मैथिली में एहि तरहक कोनो प्रयोग के बर्जित कय देल गेलैक। मिथिला के खेतिहर,मजूर, मुसलमान आ निम्नवर्ग ओहि भाषा में तस्वीर कहियो नहि देखि सकल। जखन मिथिला राज्य के मांग उठल त हमसब मुंगेर तक के अपना में गनि लैत छी, लेकिन जखन भाषा के बात हेतैक त ओ सिर्फ मधुबनी के पंचकोसी या मधुबनी झंझारपुर तक सिमटि कय रहि जाईछ।

हमरा याद अछि जे कोना सहरसा या पूर्णिया के लोकके भाषा के मधुबनी के इलाका में एकटा अलग दृष्टि स देखल जाई छैक। इलाकाई भिन्नता कोनो भाषा में स्वभाविक छैक लेकिन यदि ओ अहंकारवोध सं ग्रस्त भ जाई त ओहि भाषा के भगवाने मालिक। फलस्वरुप जखन भाषाई आधार पर राज्यके मांग उठलैक त मिथिलांचलक विराट जनसमुदाय ओहि स अपना के नहि जोड़ि सकल आ ओ आन्दोलन लाख संभावना के बावजूद नहि उठि सकल। रहल सहल कसरि राज्यसरकार क मैथिली विरोधी रवैया पूरा कय देलक। मैथिली के बीपीएससी स हटा देल गैलैक, आ मैथिली अकादमी के निर्जीवप्राय कय देल गेलैक। लेकिन एहि के लेल सत्ता के दोष कियेक देबै, जखन जनता के दिस सं कोनो प्रवल प्रतिरोध नहि छलैक त सत्ता त अपन खेल करबे करत।

ओना त ई कहिनाई मुनासिब नहि जे मैथिली में आम जनता के लेल या प्रगतिशील चेतना के स्वर नहि मुखरित भेलैक लेकिन ओ ओहि तरीका सं व्यापक नहि भ सकलै जेना आन भाषा में भेलैक। मैथिली के रचना में ओ मुख्यधारा नहि भ सकलै। दोसरबात ई जे कहियो मिथिला में कोनो समाजसुधार के आंदोलन नहि भेलैक जेना बंगाल वा महाराष्ट्र में देखल गेलैक। तखन ई कोना भ सकैछ जे सिर्फ भाषा के त विकास भय जाय लेकिन समाज के दोसर क्षेत्र में ओहिना जड़ता पसरल रहैक। मिथिला के इतिहास के देखियौक त एतय येह भेलैक। दोसर बात ई जे मिथिला या मैथिली के लेल जे संस्था सब बनल ओकर कामकाज के समीक्षा सेहो परम आवश्यक। मैथिली के विकास के लेल दर्जनों संस्था बनल जाहि में चेतना समिति के नाम अग्रगण्य अछि। लेकिन ओ चेतना समिति की कय रहल अछि आ जनता सं कतेक जुड़ल अछि एकर विशद विवेचना हुअक चाही। सालाना जलसा आ सेमिनार के अलावा एकर मैथिली भाषा के लेल की योगदान छैक तकर विशद समीक्षा हुअके चाही। मैथिली के बजनिहार भारते में नहि नेपालों में छथि, लेकिन दूनू दिसके भाषाभाषी के जोड़य के कोनो ठोस उपाय एखन तक दृष्टिगोचर नहि।


एखन जहिया सं मैथिली के संविधान में मान्यता भेटलैक अछि तहिया सं साहित्य अकादमी के किछु बेसी गतिविधि देखय में आबि रहल अछि। लेकिन मैथिली के जखन तक आम जनता आ ओकर सरोकार सं नहि जोड़ल जायत एकर आन्दोलन धार नहि पकड़ि सकैत अछि। एकर सबसं पैघ जिम्मेवारी ओहि बुद्धिजीवी लोकनि पर छन्हि जे मैथिली के पुरोधा कहबै छथि। हुनका सं ई उम्मीद त जरुर कयल जा सकैछ जे ओ एकर ठोस, सर्वग्राही आ समीचीन समाधान सामने लाबथु आ ओहि पर समग्र रुपे चर्चा हो।

Saturday, February 21, 2009

प्रबोध सम्मान 2009 / फरबरी 22, 2009 केँ 4 बजे अपराह्नमे देल गेल / कंप्यूटर आ मैथिली


मैथिलीक सभसँ प्रतिष्ठित प्रबोध सम्मान 2009 क लेल श्री राजमोहन झाकेँ स्वास्ति फाउंडेशन द्वारा पटनाक विद्यापति भवनमे 22 फरबरी 2009 केँ 4 बजे अपराह्नसँ शुरु भेल कार्यक्रममे देल गेल। एहिमे स्मृति चिन्ह आ एक लाख टाका देल जाइत अछि। श्री भीमनाथ झा, उदय नारायण सिंह, विजय बहादुर सिंह, अभय नारायण सिंह आ ढेर रास गणमान्य लोक एहि अवसरपर उपस्थित छलाह।


मैथिलीक भारतीय ओपेन ऑफिस, मल्टी प्रोटोकोल मेसेंजर,कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम, स्क्राइबस, सनबर्ड कैलेंडर, ई-मेल क्लाइंट, की-बोर्ड ड्राइवर, फॉंट, वेब ब्राउसर, आ द्विभाषीय डिक्शनरी आब आबि गेल अछि। ई सम्भव भेल अछि टेक्नोलोजी डेवेलपमेंट फॉर इंडियन लैंगवेजेज प्रोग्राम, सेंटर फॉर डेवेलोपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्युटिंग आ साहित्य अकादमीक सहयोगक परिणाम स्वरूप।
मैथिली साफ्टवेयर अओजार आ फान्ट नाम्ना एहि सी.डी.पर विद्यापतिक फोटो लागल अछि।
ई सोफ्टवेयर मैथिली साफ्टवेयर अओजार आ फान्ट लिंकपर उपलब्ध अछि।

मैथिली-अंग्रेजी/ अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोशक ms-sql server आधारित सर्च डिक्शनरी, जाहिमे अंतर्राष्ट्रीय फोनेटिक अल्फाबेट आ मिथिलाक्षरक प्रयोग देवनागरी आ रोमनक संग भेल अछि विदेह कोश एहि लिंकपर उपलब्ध अछि। एहिमे कम्प्यूटर आ इंटरनेट शब्दावलीक सेहो अटाबेश भेल अछि।

Friday, February 20, 2009

असोथकित-कथा-अनलकान्त

प्राइवेट वार्डक बिस्तर पर पड़ल-पड़ल ओ सामनेक टेबुल पर राखल एक मात्र
खाली गिलास मे बड़ीकाल सँ ओझरायल छल। काँचक ओ मामूली सन गिलासओकरा देखैत-देखैत रूप बदल' लागल छलै। एक बेर ओकरा लगलै जे ओहि खाली गिलास मे नीचाँ सँ अनायास पानिक सतह ऊपर उठ' लगलै आ अगिले क्षणगिलासक चारूभर पानि खसैत सेहो ओकरा प्रत्यक्षे जेना बुझेलै! ओ झट आँखि मूनिलेलक। बड़ीकाल पर आसते-आसते फेर ओ आँखि खोललक। गिलास पूर्ववत खाली छलै। ओ फेर निश्चेष्ट गिलास पर नजरि गड़ा देलक। कोठली मे देबालघड़ीक टिक्-टिक् केर हल्लुक-सन आभास छलै।
किछुए क्षण बीतल हैत कि ओ देखलक गिलासक आकृति एक लय-क्रम मेपैघ होअय लगलै! एक बेर ओकरा लगलै, ई तँ कुंभकरणक पेट थिक! तत्क्षणे फेरबुझेलै, ई विशाल बखारी थिक!...भरि पेट भात लेल रकटल मोन-प्राण मे पेटक
संग बखारीक स्मृति ओकरा नेनपने सँ खेहारने आबि रहल रहै। परेशान जकाँ भ'क' ओ अपन नजरि ओकहर सँ हटाब' चाहलक कि ओकरा बुझेलै जे माथ मे किछु चनकि रहल छै आ देह मे तागति सन किछुओ ने रहि गेल छै। ओ अपना केँ बड़असहाय-असोथकित बुझि फेर आँखि मूनने रहय कि तखने एक टा सर्द-सन हाथओकरा माथ पर बलबला आयल घाम पोछ' लगलै। कोठली मे तखन ओकर पत्नीमात्र छलि, मुदा ओकर हाथ ओहन सर्द हेबाक अनुमान नइँ छलै ओकरा। ई फराक जे ओकर आत्मा मे खरकटल खरखर हाथक धन्नी-हरदि वला गमक आँखि नइँ खोल' देलकै।
हठात् हल्लुके सँ केबाड़ ठकठका क' ककरो भीतय अयबाक आभास भेलै,तँ नइँ चाहैतो ओ आँखि खोलि देलक। नर्स छलि। नर्सक आगू-आगू ओकर मुस्कीछलै। ओकरा मन मे स्फूर्ति जकाँ अयलै। नर्सक मुस्कीक उतारा मुस्किए सँ देलक।एक नर्से टा तँ छलै जकर आयब ओकरा बड़ सोहाबै छलै। डाकटरो सँ बेसी। एक टामधुर-सन धुन ओकर धिरछायल मोन केँ छुबलकै। एक खास किसिमक निसाँ मेआँखिक पल झपा गेलै।
कनेकाल बाद 'मनोहर कहानियाँ' मे डुबलि पत्नीक पन्ना पलटबाक स्वरओकरा कर्कश जकाँ लगलै। भीतर सँ कचकचा गेल छल। पत्रिका मे डुबलि पत्नीदिस तकबा सँ बचैत, नइँ चाहैतो फेर सामनेक टेबुल पर राखल खाली गिलास दिसताक' लागल।
किछुए क्षण बीतल हैत कि गिलास फेर रंग-रूप बदल' लगलै। ओकराअपन दिमाग पर बेस दबाव बुझेलै। ओ नइँ चाहैतो बाजल, ''टेबुल पर सँ एहिगिलास केँ हटाउ!...''
पत्नी पछिला तीन दिन सँ बेसी खन ओकरा संग छलि। पहिल दिन तँ मारतेफजहति करैत भरि दिन ओ बड़बड़ाइते रहि गेल छलि। कतेको केओ बुझारति कि अनुनय-विनय कयलकै, ओकरा पर तकर असरि नइँ भेलै। एकदमे झिकने जाइतरहलि, ''सब हमरे घर बिलटाबै पर लागल यए। धियापुता केँ के देखतै? अयँ! जकरा कपार पर दू-दू टा अजग्गि बेटी रहतै तकर ई किरदानी?... काज-धंधाक चिंते ने! हरखन दोसे-मीत! सब दिन नाटके-साहित्य आ दरुबाजीक मोहफिल! देखौ, आइ केओ ताकहु अयतै!...'' एहने-सन मारते रास बात! मुदा ओ एको बेरमुँह नइँ खोललक। दोसर दिन पत्नीक बाजब स्वाभाविके रूपेँ कने कम भेलै, मुदा ओकर मुँह सिबले रहलै। तेसरो दिन ओकरा ओहिना गुमसुम देखि पत्नीक भीतरआतंक जकाँ किछु पैस' लगलै। से ओहि दिन गुकमी जकाँ लधने ओ ओकराबजबाक बाटे ताकि रहल छलि। एहन खन पतिक आदेश ओकरा नीक लगलै। ओ उठलि आ गिलास हटा बगलक अलमारी मे रखै सँ पहिने पानि लेल पूछलक। ओमुड़ी डोला नासकार कयलक।
पत्नीक भीतर किछु कचकि जकाँ उठलै। आँखि डबडबा गेलै।...
एकरा एहि अस्पताल मे भर्ती दोसे-मित्र सभ करौने छलै। ओकरे सभक समाद पर ओ बताहि जकाँ छोटकी बेटीक संग भोरे-भोर भागलि आयलि छलि।ओकर लाख फजहति आ बड़बड़ाहटिक बादो इलाजक सभ टा व्यवस्था वैह सभ क' रहल छल। ओकरा बेसी बजबाक साफल ई भेलै जे कैक गोटे बाहरे सँ हालचाल ल', सभ टा व्यवस्था बुझि-गमि, घुरि जाइ छल। से थाह पाबि गेलि छलि ओ।
क्षण भरिक लेल तँ ओकरा अपन कड़ैती आ बजबाक प्रभाव पर गौरवे जकाँ
भेलै। ओकरा लगलै जे एहि तरहेँ ओ अपन घरवला केँ मुट्ठीमे क' सकै अछि। मुदापतिक पीयर चेहरा देखिते ओकरा भीतर पैसल अदंक आशंकाक झड़ी लगा देलकै। ओ चोट्ïटे उठलि। पयर मारि आस्ते सँ बाहर भेलि।
पैघ सन गलियारा पार क' ओ रिसह्रश्वशनक आगूक गुलमोहर लग ठाढ़ भेलि।
अस्पताल प्रांगणक सामनेवला छोर पर बेरू पहरक रौद मे बैसल किछु गोटे पर ओकर नजरि गेलै। ओ दूरे सँ चिन्हैक प्रयास क' रहलि छलि कि ओकहर सँ दू गोटेलपकि क' ओकरा लग अयलै, ''की, कोनो बात?" ई दुनू ओकरा पतिक सब सँ
पुरान मित्र छलै। ओकरा बियाहो सँ पहिनेक सहमना, लंगोटिया!...जकरा सभक
ताधरि किछुओ फराक नइँ छलै। बियाहक बादो चौदह-पंद्रह वर्ष धरि प्राय: ओहिनारहलै। शुरूक पाँच साल तँ आश्रमो संगे रहलै जावत्ï अलग-अलग ठाम चाकरी नइँ भेटलै। एहि मे पहिल ओ छल जे ओकरा 'कनियाँ गै' कहै छलै आ 'वर बाबू' कहैत जकरा सँ ओ हँसी-मजाक मे सदति साँय-बौहुक अदला-बदली करबाक गपशप करै छलि। मुदा तखन ओकरा मुँह सँ बहरायल वाकय संबोधनहीन छलै। दोसर, छात्र-जीवन मे भनसाघरक इंचार्ज रहबाक कारणेँ शुरूहे सँ ओकरा सौतिन कहै छल। मुदा तखन तीनूक संबंधक कोनो टा पहिचान नइँ छलै। ई स्थिति ओकराबड़ दारुण जकाँ बुझेलै। एक बेर ओकरा मोन मे अयलै जे वैह ओहि संबोधन सँ पुकारय, मुदा से भेलै नइँ। ओ अपन भावना पर कठोरता सँ लगाम लगौलक, ''की करबै आब, हमर तँ घरे बिलटि गेल। तै पर सँ ओकर गुमसुम रहब!..." सेरायलआ घबड़ायल सन स्वर बहरेलै। कनेक असमंजसक बाद पहिल दोस्त जे कह' चाहैत छल, से नइँ कहिओहिना किछु बाजि देलक, ''ठीक भ' जयतै। डॉकटर सँ हमरा गह्रश्वप भेल यए।"
''नइँ! ...कोनो चिंताक बात नइँ!" दोसर तोस देब' चाहलक।
एहन जवाब ओ नइँ सुन' चाहने छलि। मुदा ओकरा बस मे किछु ने छलै।आब ओ पहिनेक स्थिति मे नइँ घुरि सकै छलि जकरा सँ कहियो पिण्ड छोड़बैतनीक लागल छलै। ओकरा मुँह सँ बहरेलै, ''घुटनाक अलावा डॉकटर तँ कहै छै,
सब कुछ नॉर्मल है!

''हँ, सैह तँ! ..." पहिल जल्दी सँ जवाब ताकलक, ''रसेरस सब ठीक भ' जयतै।'
''हँ! हँ!..." दोसरक चेहरा पर टार'क भाव बेसी साफ छलै।

हारिक' ओ वार्ड दिस घुरलि, ''आउ ने, कनेकाल हुनके लग.."
गाछ ओकरा लगीच अयलै। सिरमा लग। दुनूक नजरि मिललै। ओ निहालभ" गेल।
ओ किछु बाज' चाहलक, तँ ओकरा अपन पत्नीक उपस्थितिक भान भेलै।
गाछ सेहो किछु बाज' चाहलक, मुदा कोठली मे ओकरा मीतक कयाहता छलि। गाछओकरा बेडे पर सटिक; बैसि रहल। दुनूक हाथ एक-दोसराक हाथ मे छलै। दुनूक हाथ गरम छलै।
''चाह-ताह बाहर सँ एत' आबि सकै छै ने?" दोसर बुदबुदायल।
तखने ओकर पत्नी उठलि, ''लगले अबै छी"' आ कोठली सँ बाहर भ'गेलि। ओकरा पाछाँ लागल दोसर मीत सेहो बहरायल।
किछु पल बीतल कि ओ पड़ले-पड़ल फुसफुसायल, ''ककर्यू मे ढील बुझाइ
छौ!.."
''नइँ-नइँ!... अपना सब घर-परिवार लेल सही समय पर किछु ने सोचलौं।तकर सब टा दु:ख एकरे सब केँ भेलै।" गाछ आब झुकि जकाँ आयल छल।
ओ किछु क्षण चुपचापे रहल। फेर एकहर-ओकहर ताकि बाजल, ''रौ बुडि़!
हमरा सभक लेल अपने टा घर कहिया घर छल? हमसभ तँ सभक घर-परिवार केँ अपने बुझैत रहलौं।" बेड पर पड़ल देह जेना मोन संग उड़' चाहै छल।
''जँ सैह रहि जाइत शुरू सँ अंत धरि तँ कोनो दु:ख नइँ छल मीत! मुदा एक
एहन मोड़ पर आबि हम सभ अपन आरि बेराब' लगलौं जत' पछिलुको कयलधयल सभ टा पर पानि फिरि गेल। ने घरक रहलौं ने घाटक।..." आब गाछ साक्षात मनुकख भ' गेल छल।
''ई तों की कहै छें?... हम तँ एखनो एकरे पाछू सब किछु न्योछावर कयनेछी। के अछि आइ हमरा सँ बेसी कयनहार?'
''यैह!... यैह भेलौ सीमा! दोसर केओ तोरा सँ बढि़ नइँ किछु करै यए तेँ तों आगू किएक बढबें!... आ ई त्याग-न्योछावर-कथा मंचे टा सँ शोभै छै। हम-तों जतेक ने न्योछावर करबाक गपशप करै छी, से सब वास्तव मे आब कैरियर चमकाबैक
साधन भ' गेल यए। जेँ केओ दोसर हमरा सब सँ आगू बढि़ सक्रिय नइँ अछि, ते हमरासभक ई अधकचरा प्रयास पैघ अभियान कहाबै यए। मुदा ई जानि ले जे हमरासभक ई प्रयास एक टा बिजुका सँ बेसीक ओकाति नइँ रखै अछि जकरा सँ बड़ीकाल पर ओ आँखि फोललक। सामनेक खाली टेबुल पर ओकर नजरि गेलै, तँकिछु चिड़ै-चुनमुनी डराइत होइ तँ होइ, सुग्गर-हरिन आकि नीलगाय पर कोनोओकरा टेबुलक सतह सहाराक रेगिस्तान बुझेलै। टेबुलक पार बैसल लोकक आकृति असरि नइँ पड़ै छै।' मीत आवेश मे आबि गेल छलै।रेगिस्तानक छोर परक गाछ लगलै। ओ ओहि गाछक हरिअरी पर नजरि टिकौलक। जवाब मे एखनो ओ बहुत रास तर्क द' अजेय रहि सकै छल। यैह तँ ओकरआँखि तृप्त भ' गेलै। शकित छलै। मुदा एक तँ ओहि बातक कने असरि पड़ल छलै आ दोसर, पत्नीक घुरिक' आब' सँ पहिने ओकरा किछु आर जरूरी बात पूछबाक छलै। से शांत होइतमद्धिम स्वर मे बाजल, ''एखन से सब बतायब जरूरी नइँ छै। कहले बात कते कहबौ? ...सुन, एक टा जरूरी बात!..."आ फुसफुसायल, ''ओत' रंगशालाक
हॉल मे हमर किछु भेटबो कयलौ?"
''की?" गाछक पात-पात खिलखिला क' हँसल।
''हमर कुञ्जी?"
''हँ! ...ओ कत' जायत? मंचक काते मे छल।"
''दे!..."
''बाकस मे बंद क' राखि देने छियौ। पहिने ठीक तँ हो!"
''शहर मे कोनो चर्चा?"
''हँ, कल्पना मंचक छौंड़ा सब एक टा रीमिकस तैयार कयलक अछि—
कुञ्जी हेराय गेल भाँगक बाड़ी मे..." क्षणभरि बिलमि फेर नहुँए बाजल, ''आचार्यक 'मुसल आ मुसलमान" कथाक मंच प्रस्तुति आइ मुजकफरपुर मे छिऐ जत' सहरसा सँ जनकपुर धरिक लोक जमा भ' रहल छै। एत' सँ कल्पनो वला सभ गेल छै!.."
ओकरा पर तनाव जकाँ बढि़ गेलै। क्षणेभरि कोठली मे भारीपन रहलै! तखने
चाहक ट्रे लेने एक टा छौंड़ाक संग ओकर पत्नी आ दोसर मीत घुरि अयलै।
रसेरस फेर टेबुल पर रेगिस्तान पसरि गेलै आ गाछ तकर ओहि पार चलि
गेल।
ओ दोसर मीतक मदति सँ गेड़ुआक सहारें ओठङि गेल छल। पत्नीक हाथ सँ
कप पकड़लक। फेर एक टा बिस्कुट ल' नहु-नहु कुतरैत कतहु हेरा गेल छल।
चाहक घोंट लैत ओत' शुरू भेल बाल-बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइ, कयाह-दान आमहँगाइक संग-संग क्रिकेटक गह्रश्वप ओकरा जोडि़ नइँ पाबि रहल छलै।
साँझक अन्हार जखन बाहरक वातावरण केँ गाढ़ कर' लागल छलै आ साँझुक
राउण्ड पर आयल डॉकटर देखिक' जा चुकल छलै, घर सँ टिफिन बॉकसवला झोड़ानेने एक टा नवोदित कवि मित्र आबि गेल छलै। राति मे ओहि नवतुरिए केँ रुकबाक छलै।
किछु काल बाद ओकरा पत्नीक संगे ओकर दुनू मीत घर विदा भेल।नवतुरिया कवि सेहो पानिक बोतल आन' लेल बहरायल छल कि पहिल मीत गेटक बाहर सँ घुरिक' ओकरा लग अयलै आ एक टा कने पैघ सन कुञ्जी हाथ मे दैत कहलकै, ''ले! ...एकरा बिना तोरा नीन नइँ हेतौ!" आ झट बहराय गेल।
ओ एक बेर ठीक सँ ओहि कुञ्जी केँ देखलक। बड़ पुरान होइतो सब तरहें नव छलै। पुलक सँ भरि तुरंत जेब मे राखि लेलक। पानि ल'क' घुरल नवतुरिया प्रेम सँ भोजन लगौलकै। नवतुरियाक आवेशभोजन मे रुचि बढ़ा देलकै। तेँ खाय क' पड़ल तँ नवतुरियाक दू गोट कवितोसुनलक। चाबसी द' सब चिंता सँ ध्यान हटा आगू मे जे फिल्म छलै तकरसफलताक कल्पना मे झिहरि खेलाय लागल। नीन किछु जल्दिए आबि गेलै।
ओ देखलक जे ओकर किताब लोकसभ लाइन लगाक' कीनि रहल छै।मारते रास चैनलवला सभ घेरने छै। ओ जल्दी-जल्दी किछु बाजि एक टा उज्जररंगक कार मे बैसि जाइ अछि। कार अज्ञात दिशा मे जा रहल छलै कि नीन टूटि गेलै।
ओ फेर आँखि मूनि जल्दी सँ जल्दी ओहि सपना मे जयबाक चेष्टा कर' लागल।
एहि बेर ओ देखलक जे ओकरा ढाइ लाखक कोनो पुरस्कार भटलै। ओकरासकमान मे पुरस्कार प्रदाता नौकरशाह सभक दिस सँ रंगमंडलक समस्त सदस्यक संगहि वरिष्ठ पत्रकार आ साहित्यकार लोकनिक बीच भव्य पार्टी चलि रहल छै।...अचानक ओहि बीच ठाढ़ एक टा अद्र्धविक्षिह्रश्वत सन युवक चिचिया लगै छै, ''अहाँ सभ अवसरवादी छी! पूजीपतिक दलाल छी!..." कि तमसाक' ओत' जमा सभ केओ अपना-अपना गिलासक दारू ओहि युवक पर फेकि दैत छै।... आ ततेक दारू ओकरा पर खसै छै जे ओ युवक बगलक नाली मे बहि जाइ छै!...
अचानक फेर ओकर नीन टूटलै। एहि बेर ओकर छाती जोर-जोर सँ धड़कि
रहल छलै।कनेकाल मे ओकर मोन स्थिर भेलै, तँ ओ नवतुरिया कवि दिस ताकलक। ओओकरा बेडक दहिना कातक सोफा पर नीन छलै।
ओकर बामा हाथ अनायास पेंटक जेब मे गेलै आ अगिले पल कुञ्जी ओकरा आँगुरक बीच छलै। बड़ीकाल धरि ओ ओहि कुञ्जी केँ देखैत रहल। कुञ्जीदेखैत-देखैत ओकरा अपन वियारंगक ओ अन्हार मोन पडि़ अयलै जे ओकर कुञ्जी तँ गिडऩहि छलै, ओकरा एहि बेड धरि पहुँचा देलकै। वियारं ओहि विद्यापति यात्रीरंगशालाक संक्षिह्रश्वत नाम छलै जकर ओ अध्यक्ष आ निर्देशक छल। जत' पछिला दससाल मे सभ सँ बेसी नाटक ओकरे निर्देशन मे भेल छलै। जत'क ओ सभ सँ सकमानित आ सर्वेसर्वा छल। जत' पहिल मंजिल पर ओकरा एक टा पैघ सन कक्ष भेटल छलै। ओहि कक्ष सँ नइँ मात्र वियारंक सभ टा गतिविधि संचालित करैत छलओ, ओकर समस्त हित-मीतक चौपाल वैह छलै। मुदा ओहि रातुक अन्हार!...
...असल मे ओइ दिन बेरू पहर अशोका मे बालीबुडक एक टा पैघ प्रोड्यूशरसंग ओकर मीटिंग सफल भेल छलै। भूमि समस्या आ सशस्त्र आन्दोलन सन विषय
पर ओ एक टा मसालेदार फिल्मक लेल स्क्रीह्रिश्वटंग आ सह-निर्देशनक एग्रीमेंट साइन कयने रहय। तकरा बाद शैकपेनक दौर जे शुरू भेलै से प्रोड्यूशरक उड़ान-समयक कारणें सँझुका आठे बजे धरि चललै। ओत' सँ ओ बाहर भेल तँ ऑटो मे बैसैतअपन सभ सँ करीबी कॉमरेड दासक मोबाइल पर पहिल सूचना देलक। दास नगरक सभ सँ बेसी प्रसार संकयावला दैनिक समाचार पत्रक कयूरोचीफ रहय। ओ तत्कालओकरा अपन दकतर बजा लेलकै। दासक केबीन मे ओकरा पहुँचिते तय भेलै जे एहि उपलकिध केँ खास दोस्तसभक बीच सेलिब्रेट कयल जाय। से ओतहि सँ फोन क' चारि-पाँच गोट 'हमह्रश्वयाला'साहित्यकार-पत्रकार-रंगकर्मी केँ साढ़े दस बजे धरि वियारं पहुँचबाक सूचना देल गेलै। फेर ओ दासेक खटारा एलएमएल वेस्पा पर पाछाँ बैसि विदा भेल छल। रस्ता मे महात्मा गांधी चौक पर चारि-चारि ह्रश्वलेट चिकन आ पनीर फ्राइ पैक करबौलक। काजू, मूँगफली आ दालमोटक संगे सलादक व्यवस्था क' चारि डिकबासिगरेट सहित दू टा पैघ-पैघ पॉलिथीन पैकेट मे लेलक। दासक डिककीक झोड़ा मेरमक बड़का-बड़का बोतल रखैत आधा सँ कमे बचल अद्धा टकरेलै। ओकराबगलक जूस दोकानक पाछाँ दुनू मीलि खाली करैत अमेरिकन पॉलिसीक चर्चा कर'लागल छल। अपन-अपन सिगरेट जराय जखन ओत' सँ विदा भेल, तँ साहित्यअकादेमी आ मनुवादक व्याकया शुरू भेल छलै।
कनेक तेज सन चलैत बसात जाड़क प्रभाव बढ़ाब' लागल छलै। मुदा ओ दुनूमौसम केँ ठेङा देखबैत वियारं दिस जाइत अपना मे मस्त छल। तेहन मस्त जे साँझेसँ शुरू झिस्सी केँ 'इन्जॉय क' रहल छल।
तखन ओ सभ वियारं सँ किछुए दूर नेहरू स्टेडियम वला मोड़ पर छल कि दूटा घटना एक संग घटलै। एक, बुनिआयब तेज हेबाक संगे बसात बिहाडि़ जकाँ रूपल' लेलकै आ दोसर, दासक जेब मे राखल मोबाइल अंग्रेजी धुन पर चिचियाब' लगलै। कात मे स्कूटर रोकि दास एको मिनट सँ कमे गह्रश्वप कयलक आ पाछाँ घुमिबाजल, ''रौ, समान सभ ल'क' तों जो वियारं। एखन साढ़े नौ भ' रहल छौ। हम एक घंटा मे अयबौ। संपादकक आदेश छै, की क' सकै छी?... चल गेटक बाहरछोडि़ दै छियौ।"
खराब मौसमक बादो गेट सँ दूरे पॉलिथीन पैकेट आ झोड़ा थमा दास स्कूटरमोडि़ फुर्र भ' गेलै। ओ वियारं बिल्डिंग दिस तकलकै। सभ किछु अन्हार मे डूबल
छलै। गेटक दुनू कात स्थित विद्यापति आ यात्री बाबाक प्रतिमा धरि देखा नइँ पडि़ रहल छलै, तँ कालिदास-शैकसपीयर सन-सन मारते रास नाटककारक देबाल मेजड़ल छोट-छोट पाषाण मूर्ति कत' लखा दैतै। हवा प्रचंड भ' गेल रहै आ बुन्नीआर तेज। ओ धतपत आगू बढ़ल। ग्रील-गेट फोलि अन्हार पैसेजक मुँहथरि परठमकल। चिकरिक' रमुआ चौकीदार केँ दू-तीन बेर शोर पाड़लक। मुदा कोनो
उतारा नइँ भेटलै। एहन मौसम मे राति-बिराति ककरो नइँ अयबाक अनुमान क' ओसरबा साइत घर पड़ा गेल रहय! बिजली नइँ रहै आकि स्वीचे लग सँ काटि देनेछलै ढोहरीक सार, से नइँ कहि। ओकरा अपना हाथक पॉलिथीन पैकेट धरि नइँ सुझि रहल छलै। आखिर कहुनाक' सीढ़ी तकबाक साहस क' ओ एक टा पयर आगू बढ़ौनहि रहय कि गेटक सटले कतेको युग सँ ठाढ़ बडग़ाछक एक टा पैघ सनडारि टूटिक' हड़हड़ाइत गेट पर खसलै। ओकरा लगलै, पृथ्वी दलमलित भ' गेलैआकि ओहि गाछ संग पूरा वियारं बिल्डिंग भरभराक' खसि पड़लै! कत' गेलै पॉलिथीन पैकेट सभ, कत' खसलै झोड़ा आ कोकहर अपने ढनमनायल; तकर कोनो ठेकान नइँ रहलै!...बड़ीकाल बाद होश अयलै, तँ ओ कराहि जकाँ रहल रहय। ओकरा पयरलग भीजल सन किछु डारि-पात बुझेलै आ माथ लग सर्द देबाल। देबाल टोब'क क्रम मे ओकर हाथ अपना माथ पर गेलै। ओत' लसलस सन किछु सटल जकाँ बुझेलै। ओ ओकरा रगडि़क' पोछबाक प्रयास कयलक, तँ भीतर सँ पातर सन दर्दहुल्की मारलकै।
तखन ओकरा ई बुझबा मे भाँगठ नइँ रहलै जे ओकर कपार फुटि गेलै आताहि पर शोणितक थकका जमि गेल छै। मुदा तैयो ओकरा ई भान नइँ भ' रहल रहैजेे ओ कत', किऐ आ कोन परिस्थिति मे पड़ल छलै।...
किछु क्षण आरो बीतलै तखन ओकरा नीचाँ सीमेंटक सतहक भान भेलै। कि पयर मोडि़ हड़बड़ाक' बैसल आ घबड़ाक' चारूकात हथोडिय़ा मार' लागल।अचानके ओकरा हाथ मे काँचक एक टा चोखगर टुकड़ी गड़लै आ दर्द सँ सिसिया उठल। मुदा क्षणे बाद ओ फेर हथोडिय़ा द' रहल छल। हथोडिय़ा मारैत ओबदहवाश छल। कि एक ठाम फर्श पर किछु तेजगंधवला तरल पदार्थ बुझेलै। ओहि गंध केँ परख' मे थोड़ समय लगलै, मुदा जहिना ओकरा गंधक पहिचान भेलै कि सभ किछु स्मरण भ' अयलै।आब ओ जल्दी-सँ-जल्दी सीढ़ी ताकबा लेल व्यग्र छल। ओकरा कोनोहालति मे शीघ्र पहिल मंजिल पर स्थित अपन कक्ष मे पहुँचबाक छलै। ओहि कक्षमे जत' इजोतक कैक टा वैकल्पिक साधन रखने छल ओ। ओकर कुञ्जी ओकराजेब मे छलै। बामा जेब मे हाथ द' कुञ्जी छूबिक' ओ आश्वस्त भेल। कि ओकरा कोना क्षण अपन संगी सभक आबि जयबाक आशंका भेलै। अन्हार मे घड़ीअकाजक छलै, से झट ओ दहिना जेब मे राखल मोबाइल निकाल' चाहलक जाहिसँ अन्हारो मे समयक ज्ञानक संग क्षीण-सन इजोत सेहो भेटि सकै छलै। मुदा जेबसँ बहरेलै दू-तीन भाग मे अलग-अलग भेल मोबाइलक पार्ट-पुर्जा! आब ओकरघबड़ाहटि आरो बढि़ गेल छलै। अन्हारक सोन्हि मे ओ तेना भुतिया गेल जे दिशाक कोनो ज्ञाने ने रहि गेल छलै। आरो किछु काल धरि बौअयलाक बादो जखन थाह नइँ लगलै, तँ अन्हारक कोनो अज्ञात स्थल पर ओ सुस्ताब' लागल छल। सुस्ताइत-सुस्ताइत ओकरा भीतरहँसी जकाँ किछु फुटलै। ओकरा मोन पड़लै जे एतबे टा जिनगी मे ओ कतेक बिहडि़धाँगि आयल छल। लगभग एक दशक तँ अण्डरग्राउण्डे रहल छल। केहन-केहन कठिन ऑपरेशन सफल कयने छल। कतेक मुठभेड़, कतेक काउन्टर मे बमगोलीक बीच सँ निकलि आयल छल ओ!... ओकर ई इतिहास आइयो कतेको युवा केँ प्रेरणा दैत छलै।अपन स्वर्णिम अतीतक स्मरण सँ ओकरा भीतर साहसक संचार भेलै।उठिक' सावधान मुद्रा मे ठाढ़ भेल आ दृढ़ निश्चय क' एक सीध मे थाहि-थाहिक' बढ़' लागल। किछुए क्षण बाद सहसा ओकरा ठेहुन सँ किछु टकरेलै। हाथ सँ छूबिक' ओ परखलक—आगू मे कुर्सी छलै। फेर हाथ बढ़ाय क' ओ एकहर-ओकहर टटोललक—कुर्सीक पतियानी लागल छलै। तत्काल ओकरा बुझबा मे आबि गेल छलै जे ओ फुजले रहि गेल दुआरि सँ मेन हॉल मे आबि गेल छल। तखन कुर्सीदर-कुर्सी पकड़ैत ओ बीचक रस्ता ध'क' सभ सँ आगूक कुर्सी धरि पहुँचि गेल।एत' पहुँचि ओकरा सब किछु सुरक्षित जकाँ बुझेलै। से ओ ततेक आश्वस्त भ' गेलजे आराम सँ ओहि कुर्सी पर बैसि पयर पसारि देलक।आब ओकरा मेहमान मित्र सभ सँ पकड़ेबाक कोनो चिंता नइँ रहलै। तेँ धीरे धीरे ओ ओकरा सभ केँ बिसरय लागल छल। कि तखने सेलिब्रेट करबाक अवसरक महकाा मोन पड़लै। मोन मे कनेक कचोट भेलै। मुदा एते पैघ नाट्य-अनुभव ओकरासभ स्थिति मे तालमेल बैसायब सिखा देने छलै।
आब ओ सहज भ' जयबाक स्थिति मे आबि रहल छल कि ठीक तखने मंचक बीचोबीच खसैत प्रकाशक एक फाँक मे ओकर प्रतिरूप ठाढ़ देखा पड़लै।क्षणभरि मुरुत जकाँ ठाढ़ रहलाक बाद प्रतिरूप अचानक बाजल, ''रौ मीत, किऐदु:खी छें?
''अयँ!... तों के?" ओ अकचकाइत पूछलकै।
''नइँ चिन्हले हमरा?... कोनो बात ने! चिंता नइँ करय, दुनिया एहिना चलै छै!" प्रतिरूप मुस्किआइत कहलकै।
''मुदा छें के तों?" ओ फटकारैत पूछलकै आ उठिक' ठाढ़ भ' गेल।
''हमरा चिन्हि क' की करबें? दुनिया तोरा चिन्है छौ! दोसर खेमाक लोक के गरियाबैत रह! ओ सभ पतीत छै, कुपमंडुप छै, समाज केँ पाछाँ ल' जायवला छै।ओकरा ई सभ कहला मात्र सँ समाज बदलि जयतै आ तों महान भ' जयबै! फेरअंग्रेजी बोहु-बेटी घर अयतौ। स्टेटस बदलि जयतौ! बेचारी बहिन हिंदी बड़अलच्छी, बाड़हनि झाँट!... प्रतिरूपक स्वर संयत छलै।
''तों हमरा पर व्यंग्य करै छें?" ओ फेर बिगड़लै।
''व्यंग्य?... एहि सभ पर तँ तोरा महारत छौ। बस लिखैक फुर्सति नइँ छौ। नेतँ आलोचक जीक गुरुद्वारा मे माथ टेकिते कोर्स मे लागि गेल रहितौ। आचार्यक प्रसाद पबिते साहित्य अकादेमी भेटि गेल रहितौ!"
''हम कोर्सक भूखल नइँ छी। आचार्य आ आलोचक जी केँ ठिठुआ!...
साहित्य अकादेमी चाहबे ने करी हमरा! हम ओहि पर थुको फेक' नइँ जायब। हमतँ व्यापक सामाजिक परिवर्तनक आकांक्षी छी। समातामूलक वैज्ञानिक सोचक आग्रही। सदिखन जनते टा हमरा नजरि मे रहै अछि।" ओ आक्रोश सँ भरल स्वर मे गरजलक।
प्रतिरूप थपड़ी पाडय़ लगलै, ''वाह! वाह! कतेक कर्णप्रिय लगैत अछि ईसब! अद्ïभूत!... जँ सरिपहुँ एना होइतय!...सय मे निन्यानबे टा मैथिली भकत दुमुँहेबहराइतय?..."
ओ छड़पि क' मंच पर चढि़ गेल छल, ''तोरा बुझल नइँ छौ, मंच परडायरेकटरक इच्छाक विरुद्ध केओ एको क्षण ने रहि सकै अछि! जल्दी भाग! हम
की क' सकै छी से बुझले ने छौ तोरा!"
''डायरेकटर छें तों?... धुर्र! अपन कोठलीक ताला तँ खोलिए ने सकै छें! जोतँ अपन कोठली?..." प्रतिरूप ओहिना ठाढ़ रहलै।
ओ तामसे कँपैत कुञ्जी निकालि लेलक, ''देख, देख कुञ्जी हमरा हाथ मेअछि। देख!..." कि तखने ओरा हाथ सँ छिटकि क' दर्शकदीर्घा दिस गेल कुञ्जीअन्हारक समुद्र मे डूबि गेलै।
अचानक प्रतिरूप जोर-जोर सँ हँसैत ठहाका लगब' लागल।
अपमान सँ माहुर होइत ओ प्रतिरूप केँ मारै लेल दौड़ल। प्रतिरूप अलोपित भ' गेलै। मुदा अन्हार मंच पर ओ बताह जकाँ दौडि़ रहल छलै। कि हठात चारि फुटनीचाँ मंचक आगू मे ओ अरर्रा क' खसल—धड़ाम! ...  
अस्पतालक बेड पर पड़ल-पड़ल ओकरा लगलै, भीतर सँ ओ खुकख भ' गेल,
एकदम कोढि़ला!...
देह पसेना-पसेना छलै! कंठ सुखाय लागल छलै। बामा हाथक कुञ्जी दहिना जेब मे नुकबैत बड़ प्रयास क' ओ बगलक सोफा पर सूतल नवतरिया कवि केँ आवाज देलक।
अकचकाइत जागल ओ कवि ओकरा संकेत पर गिलास मे पानि भरि आनलक।ओकरे सहारा पाबि माथ अलगा क' ओ दू घूट पानि पीबि असोथकित जकाँ पडिऱहल।
नवतुरिया दया भरल नजरिएँ एकटक ओकरा देखैत रहलै। सामनेक खिड़कीक
साफ होइत काँच भोरक आभास द' रहल छलै।

की हमहूँ रहबै कुमार - मदन कुमार ठाकुर

यौ पाठक गण की कहू अपन मिथिला राज्य चौपट भ' गेल ( से कोना यौ ) एक त कमला कोशीक दहार आ दोसर दहेज़ प्रथाक व्यवहार ! कमला कोशी लेलक पेटक आहार त दहेज़ प्रथा केलक आर्थिक लाचार ! कन्यादान से कतेक पिता लोकनि सेहो भेला बीमार आ कतेको बर छथि ओही बाधा सँ सेहो कुमार आ बीमार ! ओही सभ बात के लs क' हम नब युबक संघक बाधा कs ल'क' पाठक गणक समक्ष मैथिल आर मिथिला पर हाजिर छी.......


जय गणेश मंगल गणेश, सदिखन रटलो मंत्र उचार !
सभ बाधाक हरय बाला, कते गेलो अहाँ छोड़ि संसार !!
अपना लेल अगल - बगल मे, हमरा लेल किए दूर व्यवहार !
आब कहू यो गणपति महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार... !!


बरख बीत गेल देखते देखते, जन्म कुंडली मे थर्टी ! (३०)
दहेजक आस मे हम नै बैसब, हमरो उम्र भो जेत सिक्सटी !! (६०)
गाम - गाम मे जे के बाजब, बाबू हमर छथि दुराचार !
आब कहू यो बाबू - काका, की हमहूँ रहबै कुमार... !!


ब्रह्म बाबा के सभ दिन गछ्लो, लगाबू अहि लगन मे बेरापार !
ओही खुशी मे अहाँ के देब, हम अपन गाय के दूधक धार !!
हे कुसेश्वर हे सिंघेश्वर, अहाँक महिमा अछि अपरम पार !
अहि लगन मे पार लगाबू, हम आनब दूध दही आ केराक भार !!
आब कहू यो भोले दानी, की हमहूँ रहबै कुमार .......


सौराठ सभा मे जे के बैसलों, सातों दिन आ सातो राति !
कियो नै पुछलक नाम आ गाम, की भेल अपनेक गोत्र मूल बिधान !!
घर मे आबी के खाट पकरलो, नै भेल आब हमर कुनू जोगार !
आब कहू यो बाबा - नाना, की हमहूँ रहबै कुमार !!


दौर - दौर जे पंडित पुर्हित, सभ दिन पूछी राय बिचार !
पंडित जी के मुहँ से फुटलैन ई बकार ..........
जेठ अषाढ़ त बितैते अछि, अघन से परैत अछि अतिचार !!
आब कहू यो पंडित पुर्हित, की हमहूँ रहबै कुमार .....


नै पढ़लो हम आइये - बीए, छी हमहूँ यो मिडिल पास !
डॉक्टर भइया - मास्टर बहिया, ओहो काटलैथ एक दिन घास !!
ओही खान्दानक छी यो हमहूँ, जून करू आब हमर धिकार !
आब कहू यो बाबू - भैया, की हमहूँ रहबै कुमार !!


गोर - कारी सभ के रखबै, लुल्ही - लंगरी से घर के सजेबई !
बौकी पगली के दरभंगा में देखेबाई, कन्ही कोतरी से करब जिन्दगी साकार !!
आब कहू यो संगी - साथी, की हमहूँ रहबै कुमार ..........


अघन के लगन देख हम झूमी उठलो, जेना करैत अछि नाग फुफकार !
लगन बीत गेल माघ फागुन के, गुजैर रहल अछि जेठ अषाढ़ !!
अंतिम लगन ओहिना बितत, नैया डूबत हमरो बिच धार !
आब कहू यो मैथिल आर मिथिलाक पाठक गन, की हमहू रहबै कुमार !!

नब युवक के बातक रखलो मान, शादी.कॉम में लिखेलो अपन नाम !
नै कुनू भेटल कतो से मेल, लागैत अछि जे ईहो भेल फैल !!
कतेक दिन करब मेलक इंतजार........
आब कहू यो कम्पूटर महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार !!

भोरे उठी गेलो खेत खलिहान, उम्हरे से केना एलो कमला स्नान
देखलो दुई चैर आदमी के, बात करैत छल कन्यादान !
पीड़ी छुई हम भगवती के, पहुँच गेलो हम अपन दालान !!
हाथ जोरी हम सबके, विनती केलो बारम् बार !
आब कहूँ यो घटक महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार !!





मदन कुमार ठाकुर,
कोठिया पट्टीटोला,
झंझारपुर (मधुबनी)
बिहार - ८४७४०४.

Wednesday, February 18, 2009

पहिल डेग-उपेन्द्र दोषी

आ तीनू गोटे बड़ी काल धरि चलैत रहल। चुपचाप। नि:शब्द। आगू-आगू मङर मने सुक्कल मङर, बीच मे चिना माय, सुक्क्लल मङरक घरनी आ तकरा पाछू कल्लर ठाकुर – गामक अधलाह काज मे बाँहि पुरनिहार।
पीच रोडक दुबगली घर सभ रेखैत कल्लर चौंकल –आरे तोरी के! मङर, थुम्हा आबि गेलै हो।
मङर हँ हूँ किछु नहिं बाजल। बस, खाली डेग दैत बढैत रहल। निसाभाग राति मे अनठिया लोक आ लोकक बोली सुनैत दोकानक आगू मे ओङहाइत मोर पाँचेक कुकूर दौड़लै झाँऊ-झाऊँ करैत्। चिनिया माय डरे सहमि गेलि आ मङरक लग चलि आएल। ओकरा कुकूर आ चोर दुनूक बड डर होइत छैक्। लगै जेना ओ जोर स चिचिआय लागति। ओकरा थरभस लागि गैलै आ मङरक लग ठाढि जकाँ भ गेलि। ओकर जाँघ जेना लोथ भ गेलैक आ पायर बान्हल सन बूझना गैलैक। पाछू-पाछू चलैत कल्लर ताबत लग आबि गैलैक –“चलू ने मङराइन चलू! कुकूर तँ एहिना भूकत! हाथी चलय बजार कुकूर भूकय हजार! चलू!”
मुदा पसेना स तीतलि चिनिया-माय की बाजौ? ओकर कंठ जेना फुजबे ने करैक। ताबत किछु आर कुकूर संग भ क तीनू गोटेक आगू पाछू भूक लगलै। कुकूर सभ भूकैत-भूकैत जखन आसमान माथपर उठाब चाहलकै त मङर अपन ठेंङा रोड पर पटकैत – फट-फट क कुकूर के डाँट लगलै, मुदा कथी लै कुकूर सभ गुदानतैक। तहन कल्लर उसाहलक अपन ठेंङा आ झटहा जका फेक क चाहलक कि कुकूउर नांङरि सुटका भागल दोकान दिस। थोड़ेक फरा कजाक फेर भूक लागल। चिनिया-माय के जेना जान मे जान अयलै। ओ फक द निसास छोड़लक। खा पोसनिहार सब के! चिनिया माय डेराइते बाजलि।
-- चुप रह चल चुपचाप। मङर धोपि देलकै।
-- मौगि कथु जाति, अपन सोभाव नहि बिसरति। मङरक स्वर मे सह दैत कल्लर समर्थन कयलकै।
-- सैह न कह्। कहलकै जे चालि, प्रकृति, बेमाय, तीनू संगहि जाय। त अनेरे तखनी स घाठि फेनने छै। चिनिया माय खौंझाइत कहलकै।
-- रौ बहिं…हमरे धोपै-ए! कल्लर? सुनहक! कहलकै जे अहीर बुझाबय से मर्द। गै, अखनी जे तू गारि पड़लीही से जँ सुनितौ रहे, आ आबि क चारि सटका पोनपर ध दितौ त केहन लगितौक।“मङर फेर चिनिया माय के रेवाड़लक।
--छोड़ि दहक मङर, तोंहि चुप भ जाह। कथी लै लगैत छह मौगी स। मौगी होइ-ए धीपल खापड़ि। एक मुट्ठी बातक तीसी जहाँ पड़ल की लागल चनचनाय।“ कल्लर स्थितिके सम्हारैत बाजल।
--मर, हम त कुकूर के कहलिएक। लोक के कहलिएक थोड़े! कहलकैक जे –घेघ छल तोरा, उछटे गेल मोरा – चिनिया माय साँचे चनचना उठल।
-- खैनी खेबहक मङर? – गप्प आ स्थिति के दोसर दिस मोड़ैत कल्लर पुछलकै।
--ओह बहिं। कुकूरो सभ किछु आँखि देखलक-ए! देख ने कोना हवाइ लुटने अछि। मङर कुकूर दिस फेर ठेङा उसाहलक।
कुकूरक अनवरत भूकब सूनि एकटा दोकानदार बल स उकासी आ खखास कैलक। सड़कक दोसर कातक दोकानदार टार्चक रोशनी एहि तीनू गोटेपर फेकलक आ पुन: सूति रहबाक उपक्रक कर लागल। पानवाला झाजीक निन्न सेहो टूटि गेलैक।
--की छिऐ हौ सुमरित? कुकूर बड़ लगै छै? झाजी ओंङ्घायल स्वर मे पुछलकै।
--नै कुच्छो! बटोही बाबा। सुमरित बातके अनठबैत कहलकै।
--एते रातिक बटोही? झाजी फेर टोकारा देलकै। खौंझा गेल सुमरित्। इह! इहो बुढबा जे है। सुतत से नै, त कथी है करै-ए। मुदा झाजी के मुँह पर की कहौ? तह दैत बाजल – हौतै कोई, साथमे एकटा जनानियो हई।
--आँय! जनानियो है? – झाजी जेना के जेना धरती पर स्वर्ग भेटि गेलनि। जरूर ई उढरा-उढरी होयत। जरूर ककरो ल क पड़ायल होयत। झाजी फनिक क गुमटी सँ आबि गेल। कुकूर सभक आ झाजीक कोरस सूनि लगभग पूरा थुम्हा बजार जागि गेलै। बजारे कोन? गोट तीसेक घर कुल मिला क। पीच रोडक दुबगली। धिया-पूताक धरिया जका पसरल।
से झाजी सङ झटकल चारि गोटे आर। दौड़ल तीनू के रोकय लेल। कल्लर पाछू तकलक आ सहमि क ढाढ भ गेल।
--कहाँ रहै छ? ढाढ रह – झाजी डपटि क बाजल। चिनिया माय आसन्न भय स प्रकम्पित भेलि मोने-मोन गोहारि कर लागल -- जय हो खेदन बाबा, जय कारू बाबा!
--कहाँ रहै छह? – चाहबला छौड़ा बाजल।
-- रामनगर। -- कल्लर बाजल।
-- कोन रामनगर? – झाजी डपटैत पुछलकै।
-- हरदी-रामनगर। मङर पाछू घुनैत उत्तर देलकै।
-- जेब कहाँ? – सुमरित चिनिया माय के मुँह पर टार्च बारि क रोशनी फेकैत पुछलकै।
-- सुपौल जयबै बाबू। -- कल्लर मिरमिराइत बाजल।
सुमरित आ झाजी चिनिया माय के देखलक आ सोचऽ लागल। गोर अदक देह। छाती आ बाँहि गोदना सँ छाड़ल। नाक मे करीब एक भरिऽक लोलक निचला ठोर पर लटकैत। करीब चालीसक वयस, मुदा शरीर कटगर। झाजी जखन-जखन एहन लोक के दैखैत अछि – लोलऽक लेल सोचऽ लगैत अछि। सैह, ई मौगी खाइत होयत तँ लोलक मुँहमे नहिं चल जाइत होयतैक? थूक फैकैत होयत तँ लोलक पर सभाटा लटकि जाइत होयतैक? मुदा झाजी एखन किछु नहिं सोचलक। बाजल – सो सभ कुछ नहीं होगा। हम निगरानी समिति का सेकरेटरी है। रात भर तुम लोग हियाँ रुक जाव। भोर मे जहाँ जाना है चला जाव। एतना रात को जाने नहीं देगा। रात को औरत लेके चलेगा? की हौ छब्बू?
--हँ मालिक! – चाहबला छौंड़ा हुँकारी भरलकै।
-- से की हम कोनो अनकर मौगी लऽ कऽ जाई छियै? अपन घरनी के लऽ कऽ जाइ छी।
-- चोप! तामस चढाता है, घरनी का भरुआ। एतना रात को चलेगा? झाजी फेर दबारलक।
मुदा बाह रे कल्लर! दिमाग मे जेना प्रश्नऽक सही उत्तरि भेट गैलै। ओ कने एकांत भऽ गेल। आ एक दू गोटे के अपना दिस बहटारि लेलक। बाजल – असल मे मङराइन के केन्सर के बीमारी भेल छै। ब्लाकऽक डाकटर कहलकै जे पटना मे जल्दी देखा ले। सम्भव आगूओ जाय पड़त। तेँ बाबू भोरका गाड़ी पकड़ऽ लेल धड़फड़ायल छिए। नहिं त रामनगर आ सुपौल कोन दूर? दू-अढाई घंटाक रास्ता।
-- केन्सर? – सभ फुसफुसायल अपना मे। सुमरित पहिने हनछिन-हनछिन करैत रहय। भारी बीमारीक नाम सुनि छौंड़ो सभ पाछू हटऽ लागल। तखन झाजी बेचारे की करत? – अच्छा रमनगर के गंगाधर झा के चिन्हैत छहका?
-- ओ तऽ हम पड़ोसिये छथि! – कल्लर बाजल।
-- आ राजीन्दर बाबू के?
-- ओ हम्मर पड़ोसी – मङर बाजल। हबैन तक हम हुनके हऽर जोतैत छलियैन।
बड़ बेस, जाह। मुदा देखऽ रातिकऽ चलै छह, नीक नहिं करै छह। -- झाजी हारल जुआरी जकाँ बाजल।
-- की करबै मालिक! कोनो की सऽखसँ रातिकऽ चलै छी? जाउ आहाँ सुतू गऽ। परनाम! कल्लर पिण्ड छोड़बैत बाजल।
-- अच्छा, सुनऽ, गाँजा-बाजा तऽ ने छऽ संग मे? – फेर झाजी पुछ्लकैक।
-- नहिं मालिक, जाउ निचैन भेल।
झाजी अपन गुमटी मे फिरि आयल आ अंङैठी-मोड़ देबऽ लागल। हाँफी। हाँफी पर हाँफी।
कुकूरो सभ अपना सीमान सऽ टपल बूझि चुप भऽ गेल। थुम्हा बजारा से इहो तीनू टपि गेल। आब कारी स्याह पीच रोड आ रोडक दुबगली बबूरक बोन। रातुक अन्हार मे कारी सड़क आर कारी लागऽ लगलैक। भारि अकास जनेरक माबा जकाँ तरेगन छिड़िआयल रहैक आ भिखमंगाक फाटल कंबल सन सहस्त्राक्ष लगैक।
बबूरोबोनि जखन टपि गेल तऽ तीनू कने आफियत अनुभव कयलक्। भीड़ स बेदाग निकलि कऽ चलि आयल तकर प्रसन्नता सबऽ सऽ बेसी कल्लर के छलैक। कारण स्थितिक गंभीरताके वैह बुझने रहैक। मङर- मङराइनक हेतु धन-सन। जेना अदना सन गप्प भेल होइक। कल्लर प्रसन्नता सँ उठौलक पराती – तीन देखहुँ जात, सखि हे तीन देखहुँ जात! कमल नयन, विशाल मूरति, सुन्दरी एक साथ! सखि हे! इह! बरगाही भाइ, ठकुरबो जे है, अतत्तह करैए। अरे दुपहरिया राति मे पराती गबै-ए चलऽ की चुपचापे! – मङर अकछाइत बाजल।
-- आब की राति धयले छै? भोर त भऽ गेलै। -- कल्लर बाजल।
-- “रौ बहिं, डंडी-तराजू माथ सऽ कनिये हठ भेलै आ भोर भऽ गेलै? कम सऽ कम एखन एक पहर राति आर छै। देखहक—“ मङर कल्लर के बहटारलक आ आकास मे उगल त्रिशंकु दिस इशारा करऽ लगलैक।
-- अच्छा छोड़ऽ -- कल्लर अनठबैत कहलकै।
-- ‘तखन तेजू मिसर की सभ केलक मङराइन?”
-- मङराइन जे मानसिक रुपे गाम आ बथान मे ओझड़ायल छलि, साकांक्ष होइत बाजलि – ओना परोछक बात छै, लेकिन हमरा तेजू मालिक किछु नै कहलक। हमर हाथो नै धयलक। बाटे धयने आयल, बाटे धयने गेल।“
-- सुनलहक मङर? भऽ गेलऽ! लड़ि लेलऽ मोकदमा? हम तऽ पहिने कहलियऽ, मौगीक विसबास नहिं।“ – कल्लर स्पष्ट कऽ देलकै।
मङर अपन फराठी सम्हारैत लागल रेड़ऽ -- गय मौगी, तेजुआ…! गय, हाकीम पुछतौ तऽ इहे कहबही। गाम आ सुपौल सभ घिनाओत ई मौगी। देखि ले डांङ। ठीक-ठीक जे कल्लर सिखौलकौ, हाकिम लग कहऽ पड़तौक। ने तऽ देखि ले। एही डाङ सऽ डेंङा देबौ। सुक्कल मङर के तों एखन चिन्हले कहाँ? – मङर हकमि जकाँ गेल।
-- कुच्छो करऽ, हमरा लाज होइ-ए। ई बात हमरा हाकिम लग कहल पार नहिं लागत्। हम गामे सऽ कहैत अबै छियऽ। मारि देबऽ तऽ मारि दऽ। चढा दऽ चाँपे। मुदा हमरा बुते ककरो आगि उठाओल पार नहिं लागत। बेचारा हमर किछु बिगाड़बो नै केलक तऽ हम अनेरे कथी लेल दोख दियौक। झूठ बाजि कऽ की?” – चिनिया माय घनघनाइत कहलकै।
-- गय, सोनाक टुकड़ी खेत कबुआ लेलक। मालक बथान लेल मोंछ पिजबै-ए आ तों कहै छे हमर कुच्छो नै बिगाड़लक? दही न अथी कराकऽ ओकर रुप्पैया, जे करजा सधाकऽ खेत छोड़ायब।“—मङर चिनिया माय के गरिअबैत बाजल।
-- “दौक ने देह बेचिकऽ टाका जहाँ सँ होई छै तहाँ से। करजा खेलकै ई, एकर बाप, आ देबै हम?” – चिनिया माय बिक्ख होइत लोहछैत बाजल।
-- “गय, तों हमरा बापके कहबे?” फटाक- फटाक। -- आ मङर बैसा देलकै दू डाङ चिनिया माय के पोन पर।
-- “मङर, हम पहिने कहलियऽ। एकरा बूते नहि होएतऽ। ई तऽ तेजुएक राज़ी छऽ। ओकर सिकैत बजतऽ? ई तऽ गोटे दिन तोरे माहुर खोआ देतऽ।“ – कल्लर ललकारा देलकै।
-- “रै कोढिया! पुतखौका ! तोरे घरनी सन सभ छै? तोरे घरनी जेना जुगल सिंह सङे फँसल छौ, तहिना बुझै छिही। बड़ पूर बनऽ चलला-हे। हम जेना जनिते नहि छियनि?” – चिनिया माय कसिकऽ कल्लर ठाकुर पर प्रहार कयलकै।
कल्लर ठाकुर एहन प्रहारक कल्पनो नहिं कयने छल। तिलमिला गेल। “तखन लिहऽ खेतक साँती बाप बलाऽ…।“ – कल्लरो ताव मे आबिकऽ बाजल। “मङर एहिसँ नीक तँ चिनिया। तोहर बातो मानैत छह। फट फट जबाबो दितैक हाकिम के। इह। पौ बारह!”
-- रौ कलरा, किछु भऽ जाउ, हम अपना बेटी के बजार नहिं चढायब। एखन ओकर गौना करबाक अछि। ओकरा हाकिम लग ठाढ करबै तऽ हम रहब कहीं के? गौना होयतैक? कुटुम की कहत? नहिं ई नहिं होएत। ओ तऽ पाहुन थिक। हमर लोक थिक थोड़े? ई जे हमर लोक अछि तकर ई हालति …।“ --- कहैत कहैत मङर पित्ते लह-लह करऽ लागल।
बेटीक मादे सुनैत देरी चिनिया माय जेना उग्र भऽ गेलि। ओकर सौंसे देह काँटो-काँट भऽ गेलैक। उनटि कऽ ओ कोन फुर्ती सऽ कल्लरक पेट हबकि लेलकै से कल्लरो के पता नहिं चललैक। कल्लर बफारि तोड़ऽ कानऽ लागल। आ, पेट मे दाँत गड़ौने चिनिया माय संज्ञा शून्य भऽ गेलि। बड़ी का पर होश भेलै तऽ तर मे कलराक ऊपर सऽ स्वयं के पड़ल देखि हड़बड़ा गेलि चिनिया माय। उठलि आ लागलि बड़बड़ाय – हम अनकापर पाथर नहिं फेकबै, नहिं फेकबै। किन्नहु नहिं, किन्नहुं नहिं। बताहि भऽ गेलि चिनिया माय। मङर बामा हाथे फराठी आ दहिना हाथे माथ पकड़ि बैसि गेल। खन कल्लर के देखय, खन चिनिया माय के। डंडी तराजू पछिमा अकास मे लटकि गेल रहैक। त्रिशंकुक निचला तारा जका मङर लटकि गेल रहय। की करौ? की करौ ओ?

चिनबारक दीप–उषा किरण खान

समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक। नबका अटैची के राग तर नीक जऽका दाबि लेलकै। डिब्बा मह’क सभटा यात्री तऽ भरि दिनुक चीन्हले-जानल छैक। भतीजीक विवाह छैक से गाम जाइत छैक। ओ अगिले टीसन पर उतरि जयतैक। ताहि सऽ बगलबला बाबू कोनो लड़िकाक उदेस मे पटना गेल छलैक्। आ गेट लग ठाढ बाबू भारी गुम्मा छैक। टोकलो पर नै बजै छैक। कोन टीसन जैतै, की करतै। एक्को बेर मुँह पर मुसकियो ने अयलै। ठोरो नै पटपटौलकै। “बाप रे बाप, एतीकाल धरि जौं हम चुप रहि जाई त मुंहे फरि जायत। गे दाई!” मोने-मोन विचारलक। मोन भेलै कहै – “हो बाबू, निम्मन से बैठू ने, हबा नै लगइये”। मुदा चुप्पे रहल।

महेसरीक घरबला एकटा कुमारि आ एकटा बियाहलि बेटी लऽ कऽ गामे मे रहै छलै। जवानी समय मे रिक्शा चलबैत रहै आ महेसरी दाइक काज करैत रहय। सुख सऽ रहय। ससुर मुइलैक तखन जमीन बाँट-बखरा भेलै आ बिगहा डेढक एकरो हिस्सा भेलैक। ससुर जा जिबैत छलै एकटा खुद्दियो नई परि लागऽ देलकै। नबकी बहु संग सभटा जमीन लऽ कऽ आतरि-चातरि भेल रहैक। मुइला पर कामति गाम नहिं छोड़ैत छल। एकटा बेटीक बियाह तऽ पहिने कयने रहे, दोसर बेटिक बियाहक सरंजाम जुटबऽ लेल महेसरी गाम छोड़ि पटना सेवने छल। पटना मे मारे इतियौत-पितियौत भाइ-बहिन सभ रहैत छैक। तकरे संगे रहि छौ डेरा मे चौका-बर्तन करैत अछि महेसरी।

“हे गे बहिन, अपन समान सब ठीक सऽ रखिहैन आब। अइ गाम जाएबला गाड़ी मे ने बिजली छै ने बत्ती”। -- सगबे भाइ कहकै।
“ठीक से हय हमर समान”। -- महेसरी घोकरी लगा लेलक।
“है तऽ सेहे”। -- दोसर भाइ बजलै।
“रे बाबू गरीब आदमी छी, डेरा मे कमा कऽ जमा कैली इ सब सरंजाम के लेत हमर समान?”
“की सभ समान? तोरा सभ के तऽ बेसी लगै छऽ नहिं” – सामनेबला बाबू पुछलखिन।
“यौ बाबू, हमर जे जमाय हय ने, से दमकल के मिस्तिरी हय। तनी-मनी जमीनो-जाल है मरदाबा के। से ओक्कर मुंह बड़का गो है। घड़ी-साइकिल-रेडियो। लत्तो-कपड़ा खपसूसरत कहै छै”।
“तऽ देबही से सब?” – दोसर यात्री पुछलखिन।
“हँ सरकार, एगो मलकीनि है, से हरदम डिल्ली जाइत रहै छै, कल-पुरजा के कारबार हई। ओकरे से घड़ी आ रेडियो मंगबेलियै। पटना से आधा दाम मे हो गेलै”।
“बाह, तखन तऽ लेलहक समान”।
“त ए सरकार, एगो मलकिनिया हय मरबारिन। तऽ ओकर बक्सा मे कोंचल हय रंग-बिरंग के सरिया। ऊहे हमरा एगो जरी के काम कएल साड़ी देलक। पीयर टूह। हम कहली जे होली-दसहारा के साड़ी न दिऊ, ई साड़ी दे दिऊ। आ बाकी मलकिनियाँ सब से साड़ी ले-ले कऽ रखले रही से सब ले जाइ छी। बेटी के सांठे के न परबाह हय”।
आ लड़का के कपड़ा? से तऽ कीनने हेबहऽक”? --- बाबूक जिज्ञासा रास्ता कटबाक साधन सेहो छलनि।
“लड़िका के कपरा किन लेलियै। बेटी के लेल एगो पायल आ बालचानी के किनलियै। बड़ा महग हो गेलै…”।

दरबज्जा लग ठाढ अरुणक कान मे सभटा पड़ैत छैक आ कनपट्टी पर धम-धम होमय लगैत छैक। आइ तीन बरख पर गाम जा रहल अछि अरुण। बाबू बीमार छथिन आ बहिनक द्विरागमन हेतै। बाबू बड़ कलपि कऽ लिखने छथिन आबऽ लेल। सरंजामक ओरियान कऽ नेने छथिन, खाली घड़ी आ रेडियो तों नेने अबिहक --- से बाबू लिखने छलखिन। अपना जेबी के टेबलक अरुण। मात्र डेढ सै टाका छैक। एकटा निसास छोड़लक। गाम मे बीए पास कऽ क बैसल रहय तखन बाबू केहन-केहन कटुक्ति सब कहि मोन बताह कैने रहथिन। एत्तुका लोक के नोकरी भेटै छै कि नय? अरुण सबटा बर्दाश्त कऽ खेत-पथार जाइते रहल। एक्केटा पुत्र रहथिन। बूझथि बाबू स्नेह सऽ कहैत छथि। कनियाक द्विरागमन भेला पर अरुण के कटुवचन अखरय लगलनि। बाबू दिनानुदिन बेसी कटु भेल जाइत छलखिन। माय सेहो थारी संग पहिने उपदेश पाछा उलहन आ आब गारि परसऽ लागल छलथिन। तखन अरुण हारि कऽ गाम छोड़ि देलक। तीनटा ननदि सबहक बीच एकटा भाउजि अरुणक कनिया नैहर चल आयलि छलीह। आ एमहर-ओमहर एँड़ी घसैत अरुण कोनो खानगी व्यापारी ओतय टाइपिस्ट भऽ गेल छलाह। कनिया सेहो संगे रहय लागल छलखिन। छौ मास पहिने कनिया के एकटा बच्चा नष्ट भऽ गेल छलनि। ओ अत्यन्त रुग्ण भऽ गेल छलखिन। अरुणक सीमित आमदनी ओही मे स्वाहा भऽ जाइत छलनि। कतेक पाइ हथपैंच भऽ गेल छलनि।

“दुनू परानी मिलि कऽ कमयली ए बाबू, तब न बेटी के आइ साँठ-राज करै छी। की बरक-बरका लोक करत ऐसन साँठ-राज”। --- महेसरी जोर-जोर सऽ बजै छल। आ अरुणक कान मे अपना कनियाक कुहरनाइ धमकऽ लगलनि। कोनो काजक नहिं छथि। अरुण मोनेमोन विचारय लागल। गामक साधारण घरऽक बेटी छथि, मुदा दुनू बेकतीक काजो नै सपरै छनि। मोनेमोन खौंझाहटि उठलनि। फेर विचारय लगलाह। ओहि मे हुनकर कोन दोख। जेहने शिक्षा-दीक्षा भेटतनि तेहने बुद्धि-अक्किल हेतनि। बिसरल-भटकल कत्तहुँ सऽ कहियो कोनो चिट्ठी अबै छलनि। परसू चिट्ठी भेटलनि बाबूक तऽ बड्ड अचरज भेलनि। क्षणहि मे अचरज बिला गेलनि। छोटकी बहिन प्रमिलाक द्विरागमन मे बच्चा आ कनियाँ के बाबू बजौने छथिन। अरुण पत्र पढि चिन्तित भऽ उठल छल। कतऽ सऽ ओ बाबूजीक फरमाइश पूरा करथिन?

“ई पहिले पहिल बाबू मुँह खोलि कऽ किछु मंगलनि अछि। की करबैक”? – पत्नी सारगर्भित विचार प्रकट कैलथिन।
“हुनका मंगबाक आवश्यकता की छलनि?” – अरुण कहने छलखिन।
“तें ने, आब भेलनि अछि तऽ मंगैत छथि। जैयौ, सर सरंजाम सेहो करऽ पड़त” – कहलखिन पत्नी। अरुण सक किछु पार नै लगलै तऽ अपने पेटी मे सऽ नूआ बहार कऽ ननदि लेल देलखिन आ नोर पोछैत विदा कयलखिन।
“लोक की कहत? अन्तिम ननदिक दुरागमन छल” --- भरल कंठ सऽ बजली।
“की कहत? हम नै लऽ जाएब। हमहीं जाइ छी से बहुत करै छी” – डपटि देने छलखिन अरुण।

आ डेढ सै टाका जेबी मे नेने जाइ छथि। जिद्द करथिन तऽ अपना हाथऽक घड़ी दऽ देथिन। आर की? लोक की कहतै? गामक लोकक सोझाँ कोन मुँह देखौथिन। ई साधारण दाइ-खबासिनी घड़ी आ रेडिओ नेने जाइ छै। मुदा अरुण की करतै। एकर पत्नी तऽ परिवार मे दाइक पाइ बचौतैक ताहू जोग नहिं छैक। बाबू गामहि रहऽ दितथि …तऽ की? कोना रहय दितथि, लोक की कहितैन। फेर ओएह गाम, समाजक लोक आ लोकापवाद चारुकात सऽ घेरि लैत छैन। बीए पास कऽ कऽ गाम मे घरुला बनल छथि। आ लैह। रहऽ शहर मे। करह नोकरी। एकटा बेटा, माय-बाप कतहु, अपने कतहु। ऐ बेर तऽ बाबूक चिट्ठी मे स्वर बड़ कमजोर बुझना गेलनि। रुग्ण छथि, आब होएत होतनि बेटा संगे रहितौं। किंवा बेटेक संगे अपने रहथि।

महेसरीक गर्वोक्ति सुनि-सुनि अरुणक खून गरम होबय लगैत छनि। दृष्टि महेसरीक राग तर दाबल अटैची पर जाइत छनि – नव ललौन अटैचीक चमकैत हैन्डिल एम्हरे छैक। ओइमे घड़ी आ रेडियो छैक, चानीक पायल आ दोसर बस्तु-जात सभटा छैक। के जानय महेसरी ई सब मालिक-मलिकाइन सबहक ओतय से चोरा कऽ जमा केने हो, के जानए। ई सब बड्ड चालाक होइत अछि। विचारलनि अरुण – फुसिये ठकि रहल अछि जे छौ-छौ डेरा मे काज करैत छी। खाली फाजिल गप्प। जरुर ई चोरौने जाइ छैक। कहुना लऽ जाइ छै। अरुण तऽ कहुनो नय नेने जाइत छथि। गाम मे माय-बाप आ बहिन रास्ता तकैत हेतैनि – अरुण औताह आ सबटा दुःख दूर कऽ देता। स्वर तऽ तेहने रहनि पिताक पत्रक। एकटा छोट-सन स्टेशन आर तकर बाद अरुणक स्टेशन । वस्तुत: दुनू स्टेशनक बीचहि मे अरुणक गाम पड़ै छनि। एक बेर फेर अरुणक दृष्टि महेसरीक अटैचीक हैन्डिल पर पड़लनि। एक झटका मे अटैची घीचि तेज होइत गाड़ी स अरुण उतरि कऽ पड़ा जाथि तखन की? विचारैत काल शरीर मे रक्त तेजी सऽ दौड़य लगलनि। स्टेशन पर सऽ गाड़ी ससरऽ लगलै। अरुण अझक्के अटैची घीचि लेलखिन। महेसरी मुंह बौने रहि
गेल। छि: ई की करै छी हम? एकटा चौका-बरतन करऽवाली स्त्रीक सामग्री चोरबै छी? ई विचारि मोन मे अबिते अरुणक आगू बढल पैर ठमकि गेलनि। मुँह बौने महेसरी आ आगू बढैत ओकर संगबे अन्हार मे तकित रहलै आ अरुण अटैची महेसरीक कोरा मे पटकि एकटा खाली हँसी हँसऽ लागल।

“एह, हम तोरा ई बुझबा लेल अटैची घिचलिअऽ जे खाली बात पर नहि रहऽ समानक रक्षा सेहो करऽ।“
“ए बौआ, हमर तऽ जिउए हाथ हेरा गेल। बड़ कठिन कमाइ के है” – महेसरी कँपैत स्वर मे कहलकै।
“नहिं नहिं, डेरै के बाते नै छै, बाबू देखतहिं सुधंग लगै छथिन” – ठिसुआएल एकटा संगबे बजलै महेसरी सऽ।

अपन अशुद्ध मोन पर संस्कारी शुद्ध मोनक विजय बड़ सुखकर लगलै अरुण के। जाड़ो मे पसीना छुटि गेलै। तरहत्थी भीज गेल छलै। कंठ सुखा गेलै। मुदा माथ एखन खाली छलै। एकदम्म शून्य। किछु नै छलै। गाड़ी दोसर स्टेशनऽक लग आबि गेल छलै। पुक्की पारय लगलै। अन्हार दिस तकैत अरुणक आँखि एकटा खोपड़ीक चिनवार पर चलि गेल। चिनवार पर दीप जरै छलै।

कतेक डारिपर पुरस्कृत



जितेन्द्र झा. १७ फरबरी २००९ । नयाँ दिल्ली
मैथिली भाषाक कतेक डारिपर संस्मरण कृतिके एहिबेरके साहित्य एकेडमी पुरस्कार 2008 देल गेल अछि । भारतक राजधानी नयाँ दिल्ली स्थित साहित्य एकेडमीद्वारा आयोजित एक समारोहमे विभिन्न 23 भारतीय भाषाक कृतिके पुरस्कृत केएल गेल अछि । साहित्य एकेडमी पुरस्कार अन्तर्गत 50 हजार भारतीय नगद आ ताम्रपत्रसं सर्जकके सम्मान कएलक । मैथिली भाषाक संस्मरण कृति कतेक डारिपरके लेखक मन्त्रेश्वर झा के इ सम्मान देल गेलन्हि । एहि पोथीमे झा अपन प्रशासनिक जीवनक अनुभव सहेजने छैथ । झा मैथिली साहित्यिक, सांस्कृतिक अभियानमे सक्रिय छैथ ।
झा मैथिली साहित्य समृद्धिक लेल पाठक संख्या बढएबापर ध्यान देल जएबाक चाही कहलनि । मन्त्रे·ार झा पटनावि·ाविद्यालयसं स्वर्ण पदक आ राजनीतिमे स्नातकोत्तर कएने छैथ । हिनक अन्चिन्हार गाम, बहसल रातिक इजोत, कांटक जंगल आ पलाश, चाही एकटा नोकर जेहन कृति प्रकाशित छन्हि । हिनक जन्म सन् 1944 मे बिहारक मधुवनी जिलामे भेल छन्हि ।
सन 1972 में झाक प्रथम कृति खाधि कविता संग्रह प्रकाशित भेल रहनि । एखनधरि हिनक 25 टा कृति प्रकाशित भ चुकल छन्हि । पुरस्कृत पोथी मैथिलीमे नव आयामक पहिल आत्म कथा मानल गेल अछि ।

Tuesday, February 17, 2009

मॉं मिथिले त कनिते रहती: प्रवीण झा जीक एक गोट अतुकांक कविता ।

मॉं मिथिले त कनिते रहती, जाबए नै करब सब मिली हुंकार
अधिकार त बलिदाने सॅ भेटत, सब मिली के होउ तैयार ।
घर-घर जरै छै धू-धू के आगि, तैयो सब जाइ छै मिथिला के त्‍यागी,
माई के ममता के पैर सॅ कुचलि क, छोडि जाउ नै अहॉ अपन घर-द्वारि ।
बाढि रूपी दानव अबैछ हर साल,
विनाशलीला सॅ करैत पूरा मि‍थिला के बेहाल ।
मॉ मिथिला क उठै छथि चित्‍कार,
जनमानस में मचि जाइत अछि हाहाकार,
सामग्री राहतक गटकि क नेता सभ होइछ मालामाल ।
एहि दानव सभक त्रास सॅ मॉ मिथिले भ गेली कंगाल ।
के साजिश क दबौलक मिथिलाक अधिकार ?
की मातृद्रोही नहि अछि अपन मिथिलेक कर्णधार ?
जमाना बदलि क भ गेल छैक नवीन,
किया मिथिला अछि एखनो साधन विहीन ?
मिथिलाक नेता सॅ हमरा जवाब चाही,
तथाकथित विकासक हमरा हिसाब चाही ।
पॉंच साल पर छलै अपन दरश देखौने,
फुसियाहा छलै केहन भाषण सुनौने ।
“अलग मिथिला राज्‍य बनायब,
घर-घर में खुशहाली लायब.....
-से कहि क ओ ठकबा भ गेल फरार ।
ल-ल के वोटे समेटै टा नोटे,
मॉ मैथिली के पहुंचाबै टा चोटे
मिथिला के संतान बेईमान बडका,
करू एकरा सब के अहॉ बहिष्‍कार ।
की थिक इ उचित जे परदेश जा क मात्र मिथिला के कोसी ?
की नै इ उचित जे संगठित भ हम सब आब मिथिला लेल सोची ?
धन्‍य छथि ओ मैथिल नहि जिनका अपन संस्‍कृति पर नाज,
अपन समृद्ध भाषा बाजए में जिनका होई छनि एखनहु बड लाज ।
बंगाली हुए वा मराठी, मद्रासी हुए वा गुजराती,
स्‍वयं निज भाषा पर कियो नै करै छै प्रहार ।
एहन सुकर्म क क अपन दामन के बनाउ नै अहॉ दागदार ।
अपन भाषा ओ संस्‍कृतिक पतन हेतु स्‍वयं नै बनु अहॉ जिम्‍मेवार ।
मातृभूमिक लेल जे काज नै आबए, ओ जिनगी के थिक शत-शत धिक्‍कार ।
मॉ मिथिला पुकारि रहल छथि, अश्रुपूरित नेत्र सॅ निहारि रहल छथि ।
अपन भाषा ओ संस्‍कृतिक करू अभिमान, तखनहि भेटत विदेशो में मान ।
कटि क अपन माटी सॅ, के पओलक अछि एखन तक सम्‍मान ?
किया बनब आन भाषा के दास,
कान में अमृत घोरैछ अपन मैथिलीक मिठास ।
चलू निज धाम, करू प्रस्‍थान,
आब नै हेतै मिथिलाक अपमान ।
कर्ज बहुत छैन मातृभूमि के सब पर, निज माटी के करू सब मिली नमस्‍कार ।
लिय प्रतिज्ञा हाथ उठा क, मॉ मिथिला के करब हम सब उद्धार ।
अपन श्‍वास सॅ अहॉ गिरि के खसाउ, पैरक धमक सॅ जग के हिलाऊ ।
करू भैरव नाद आ नभ के गुंजाऊ,
मिथिलाक खंडित गौरव के सब मिली क वापस लाऊ ।
सहलौ बहुत, आब नै सहब हम सब तिरस्‍कार,
याचना ओ प्रार्थना सॅ नै भेटल एखन तक, आब धरू अहॉ तरूआरि
सौम्‍य रूप मैथिलक देखलक एखन तक रौद्र रूप आब देखत संसार
उग्र पथ पर आब बढि क अहॉ आब, छीनू अपन अतिक्रमित अधिकार ।
मॉ मिथिले त कनिते रहती जाएब नै करब सब मिली हुंकार,
अधिकार त बलिदाने सॅ भेटत सब मिली क होऊ तैयार ।।

पाँच पत्र-हरिमोहन झा

पाँच पत्र
एक
दड़िभङ्गा १-१-१९
प्रियतमे
अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ। परन्तु हमरा ओ अहाँक बीचमे भारी भदबा छथि। अहाँक बाप-पित्ती, जे दू मासक बाद फगुआमे हमरा आबक हेतु लिखैत छथि। साठि वर्षक बूढ़केँ की बूझि पड़तनि जे साठि दिनक विरह केहन होइत छैक !
प्राणेश्वरी, अहाँ एक बात करू माघी अमावस्यामे सूर्यग्रहण लगैत छैक। ताहिमे अपना माइक संग सिमरिया घाट आउ। हम ओहिठाम पहुँचि अहाँकें जोहि लेब। हँ एकटा गुप्त बात लिखैत छी जखन स्त्रीगण ग्रहण-स्नान करऽ चलि जएतीह तखन अहाँ कोनो लाथ कऽकऽ बासापर रहि जाएब। हमर एकटा संगी फोटो खिचऽ जनैत अछि। तकरासँ अहाँक फोटो खिचबाएब देखब ई बात केओ बूझए नहि। नहि तँ अहाँक बाप-पित्ती जेहन छथि से जानले अछि।
हृदयेश्वरी हम अहाँक फरमाइशी वस्तु –चन्द्रहार- कीनिकऽ रखने छी। सिमरियामे भेट भेलापर चूपचाप दऽ देब। मुदा केओ जानए नहि हमरा बापके पता लगतनि तँ खर्चा बन्द कऽ देताह। हँ एहि पत्रक जबाब फिरती डाकसँ देब। तें लिफाफक भीतर लिफाफ पठारहल छी। पत्रोत्तर पठएबामे एको दिनक विलम्ब नहि करब। हमरा एक-एक क्षण पहाड़सन बीतिरहल अछि। अहाँक प्रतीक्षा मे आतुर।
पुनश्च : चिट्ठी दोसराके छोड़क हेतु नहि देबैक। अपने हाथसँ लगाएब रतिगरे आँचरमे नुकौने जाएब आओर जखन केओ नहि रहैक तँ लेटरबक्समे खसा देबैक।
दू
हथुआ संस्कृत विद्यालय १-१-२९
प्रिय,
बहुत दिनपर अहाँक पत्र पाबि आनन्द भेल। अहाँ लिखैत छी जे ननकिरबी आब तुसारी पूजत, से हम एकटा अठहत्थी नूआ शीघ्र पठा देबैक। बंगट आब स्कूल जाइत अछि कि नहि? बदमाशी तँ नहि करैत अछि? अहाँ लिखैत छी जे छोटकी बच्चीके दाँत उठि रहल छैक, से ओकर दबाइ वैद्यजीसँ मङबाकऽ दऽ देबैक। अहूके एहिबेर गामपर बहुत दुर्बल देखलहुँ जीरकादि पाक बनाकऽ सेवन करू। जड़कालामे देह नहि जुटत तँ दिन-दिन ह्रस्त भेल जाएब। ओहिठाम दूध उठौना करू। कमसँ कम पाओभरि नित्य पिउल करब।
हम किछु दिनक हेतु अहाँकें एहिठाम मङा लितहुँ। परन्तु एहिठाम डेराक बड्ड असौकर्य। दोसर जे विद्यालयसँ कुल मिला साठि टका मात्र भेटैत अछि। ताहिमे एहिठाम पाँचगोटाक निर्वाह हएब कठिन। तेसर ई जे फेर बूढ़ीलग के रहतनि ! इएहसभ विचारिकऽ रहि जाइत छी। नहि तँ अहाँक एतऽ रहने हमरो नीक होइत। दुनू साँझ समयपर सिद्ध भोजन भेटैत बंगटो के पढ़बाक सुभीता होइतैक। छोटकी कनकिरबीसँ मन सेहो बहटैत। परन्तु कएल की जाए ! बड़की ननकिरबी किछु आओर छेटगर भऽ जाए तँ ओकरा बूढ़ीक परिचर्यामे राखि किछु दिनक हेतु अहाँ एतऽ आबि सकैत छी। परन्तु एखन तँ घर छोड़ब अहाँक हेतु सम्भव नहि। हम फगुआक छुट्टीमे गाम अएबाक यत्न करब। यदि नहि आबि सकब तँ मनीआर्डर द्वारा रुपैया पठा देब।
अहींक कृष्ण
पुनश्च : चिट्ठी दोसराकें छोड़क हेतु नहि देबैक अपने हाथसँ लगाएब। रतिगरे आँचरमे नुकौने जाएब आओर जखन केओ नहि रहैक तँ लेटरबक्समे खसा देबैक।


तीन

हथुआ संस्कृत विद्यालय १-१-३९
शुभाशीर्वाद

अहाँक चिट्ठी पाबि हम अथाह चिन्तामे पड़ि गेलहुँ। एहिबेर धान नहि भेल तखन सालभरि कोना चलत। माएक श्राद्धमे पाँच सए कर्ज भेल तकर सूदि दिन-दिन बढ़ले जा रहल अछि। दू मासमे बंगटक इमतिहान हएतनि। करीब पचासो टका फीस लगतनि। जँ कदाचित पास कऽ गेलाह तँ पुस्तकोमे पचास टका लागिए जएतनि। हम ताही चिन्तामे पड़ल छी। एहिठाम एक मासक अगाउ दरमाहा लऽ लेने छियैक। तथापि उपरसँ नब्बे टका हथपैंच भऽ गेल अछि। एहना हालतिमे हम ६२ टका मालगुजारी हेतु कहाँसँ पठाउ? जँ भऽ सकए तँ तमाकू बेचिकऽ पछिला बकाया अदाय कऽ देबैक। भोलबा जे खेत बटाइ कएने अछि, ताहिमे एहिबेर केहन रब्बी छैक? कोठीमे एको मासक योगर चाउर नहि अछि। ताहिपर लिखैत छी जे ननकिरबी सासुरसँ दू मासक खातिर आबऽ चाहैत अछि। ई जानि हम किंकर्तव्यविमूढ़ भऽ गेल छी। ओ चिल्हकाउर अछि। दूटा नेना छैक। सभकेँ डेबब अहाँक बुते पार लागत? आब छोटकी बच्ची सेहो १० वर्षक भेल। तकर कन्यादानक चिन्ता अछि। भरि-भरि राति इएहसभ सोचैत रहैत छी, परन्तु अपन साध्ये की? देखा चाही भगवान कोन तरहें पार लगबै छथि!
शुभाभिलाषी
देवकृष्ण
पुनश्च : जारनि निंघटि गेल अछि तँ उतरबरिया हत्ताक सीसो पंगबा लेब। हम किछु दिनक हेतु गाम अबितहुँ किन्तु जखन महिसिए बिसुकि गेल अछि तखन आबिकऽ की करब?
अहाँक देवकृष्ण


चारि
हथुआ संस्कृत विद्यालय १-१-४९
आशीर्वाद
हम दू माससँ बड्ड जोर दुखित छलहुँ तें चिट्ठी नहि दऽ सकलहुँ। अहाँ लिखैत छी जे बंगट बहुकें लऽकऽ कलकत्ता गेलाह। से आइकाल्हिक बेटा-पुतहु जेहन नालायक होइत छैक से तँ जानले अछि। हम हुनकाखातिर की-की नहि कएल! कोन तरहें बी।ए। पास करौलियनि से हमहीं जनैत छी। तकर आब प्रतिफल दऽरहल छथि। हम तँ ओही दिन हुनक आस छोड़ल, जहिया ओ हमरा जिबिते मोछ छँटाबऽ लगलाह। सासुक कहबमे पड़ि गोरलग्गीक रुपैया हमरालोकनिकेँ देखहु नहि देलनि। जँ जनितहुँ जे कनियाँ अबितहि एना करतीह तँ हम कथमपि दक्षिणभर विवाह नहि करबितियनि। १५०० गनाकऽ हम पाप कएल, तकर फल भोगिरहल छी। ओहिमेसँ आब पन्द्रहोटा कैँचा नहि रहल। तथापि बेटा बूझैत छथि जे बाबूजी तमघैल गाड़नहि छथि। ओ आब किछुटा नहि देताह आर ने पुतहु अहाँक कहलमे रहतीह। हुनका उचित छलनि जे अहाँक संग रहि भानस-भात करितथि, सेवा-शुश्रुषा करितथि। परञ्च ओ अहाँक इच्छाक विरुद्ध बंगटक संग लागलि कलकत्ता गेलीह। ओहिठाम बंगटकें १५० मे अपने खर्च चलब मोश्किल छनि कनियाँकें कहाँसँ खुऔथिन। जे हमरालोकनि ३० वर्षमे नहि कएल से ईलोकनि द्विरागमनसँ ३ मासक भीतर कऽ देखौलनि। अस्तु। की करब? एखन गदह-पचीसी छनि। जखन लोक होएताह तखन अपने सभटा सुझतनि। भगवान सुमति देथुन। विशेष की लिखू? कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।
देवकृष्ण
पुनश्च: जँ खर्चक तकलीफ हो तँ छओ कट्ठा डीह जे अहाँक नामपर अछि से भरना धऽकऽ काज चलाएब। अहाँक हार जे बन्धक पड़ल अछि से जहिया भगवानक कृपा होएतनि तहिया छुटबे करत!
पाँच
काशीतः
१-१-५९
स्वस्ति श्री बंगटबाबूकें हमर शुभाशिषः सन्तु।
अत्र कुशलं तत्रास्तु। आगाँ सुरति जे एहि जाड़मे हमर दम्मा पुनः उखरि गेल अछि। राति-रातिभरि बैसिकऽ उकासी करैत रहैत छी। आब काशी-विश्वनाथ कहिया उठबैत छथि से नहि जानि। संग्रहणी सेहो नहि छूटैत अछि। आब हमरालोकनिक दबाइए की? औषधं जाह्नवी तोयं वैद्यो नारायणो हरिः। एहिठाम सत्यदेव हमर बड्ड सेवा करैत छथि। अहाँक माएकें बातरस धएने छनि से जानिकऽ दुःख भेल परन्तु आब उपाये की? वृद्धावस्थाक कष्ट तँ भोगनहि कुशल! बूढ़ीकें चलि-फीरि होइत छनि कि नहि? हम आबिकऽ देखितियनि, परञ्च अएबा जएबामे तीस चालीस टका खर्च भऽ जाएत दोसर जे आब हमरो यात्रा मे परम क्लेश होइत अछि। अहाँ लिखैत छी जे ओहो काशीवास करऽ चाहैत छथि। परन्तु एहिठाम बूढ़ीके बड्ड तकलीफ होएतनि। अपन परिचर्या करबा योग्य त छथिए नहि, हमर सेवा की करतीह? दोसर जे जखन अहाँ लोकनि सन सुयोग्य बेटा-पुतहु छथिन तखन घर छोड़ि एतऽ की करऽ औतीह? मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा! ओहिठाम पोता-पोतीके देखैत रहैत छथि। पौत्रसभके देखबाक हेतु हमरो मन लागल रहैत अछि। परञ्च साध्य की? उपनयनधरि जीबैत रहब तँ आबिकऽ आशीर्वाद देबनि। अहाँक पठाओल ३० टका पहुँचल एहिसँ च्यवनप्राश कीनिकऽ खा-रहल छी। भगवान अहाँके निकें राखथु। चि। पुतहुके हमर शुभाशीर्वाद कहि देबनि। ओ गृहलक्ष्मी थिकीह। अहाँक माए जे हुनकासँ झगड़ा करैत छथिन से परम अनर्गल करैत छथि। परन्तु अहाँकेँ तँ बूढ़ीक स्वभाव जानले अछि। ओ भरिजन्म हमरा दुखे दैत रहलीह। अस्तु कुमाता जायेत क्वचिदपि कुपुत्रो न भवति, एहि उक्ति के अहाँ चरितार्थ करब।
इति देवकृष्णस्य
पुनश्च : यदि कोनो दिन बूढ़ीके किछु भऽ जाइन तँ अहाँलोकनिक बदौलति सद् गति होएबे करतनि जाहि दिन ई सौभाग्य होइन ताहि दिन एक काठी हमरोदिस सँ धऽ देबनि।

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी( प्रथम कड़ी)


एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन करबाक अछि।


हम सदिखन अपना के हुनकर शिष्या सहचरी आ नही जानि कि सब बुझैत रही। हुनक कि एकोटा एहन रचना छलैन जकरा कि हम पूरा होम स पहिने कैएक बेर नहि सुनैत रही। हम त हुनक एक- एक रचना के ततेक बेर सुनैत रही जे करीब करीब कंठस्त भ जैत छल। एक एक संवाद आई धरि ओहिना हमर कान में गूंजैत रहित अछि। हम त हुनक सबस पैघ आलोचक, सबस पैघ प्रशंसक रही। अद्भुद कलाकार छलाह, एक कलाकार में एक संग एतेक रास गुण भैरसक नहि होइत छैक। लेखक, निर्देशक, अभिनेता,गीतकार, संगीतकार, सब गुण विद्यमान छलैन्ह। हमारा कि बुझल जे नीक लोकक संग बेसी दिनक नहि होइत छैक। भगवनोके नीक लोकक ओतबे काज होइत छैन्ह जतबा कि मनुष्य के। हमत भगवान् स कहियो किछु नै मान्गलियैन, बस हुनक संग सदा भेंटय
यैह टा कामना छल। मुदा एक टा बात निश्चित अछि जे, जओं भगवान छैथ आ कहियो भेंटलैथ त अवश्य पुछ्बैन्ह जे ओ हमारा कोन गल्तिक सजा देलैथ, हम त कहियो ककरो ख़राब नै चाहलिये।


एतेक कम दिनक संग परंच ओ जे हमरा पर विश्वास केलैंह आ हमारा स्नेह देलैंह शायद हमरा सात जन्मों में नहि भेंट सकैत छल। एखनो जं हम हुनक फोटो के सामने ठाढ़ भ जैत छी त बुझैत अछि जे ओ कहि रहल छैथ हम सदिखैन अहाँक संग छी।

Monday, February 16, 2009

अनिलचन्द्र ठाकुर १३ सितम्बर 1954- 2 नवम्बर 2007


स्व. अनिलचन्द्र ठाकुर जीक जन्म 13 सितम्बर 1954 ई.केँ कटिहार जिलाक समेली गाममे भेलन्हि। 1982 ई.मे हिन्दी साहित्यमे स्नातकोत्तर केलाक बाद नवम्बर '93 सँ नवम्बर '94 धरि "सुबह" हस्तलिखित पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन कएलन्हि आ कोशी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकमे अधिकारी रहथि। मैथिली, अंगिका, हिन्दी आ अंग्रेजीमे समानरूपेँ लेखन।
मृत्युक पूर्व ब्रेन ट्यूमरसँ बीमार चलि रहल छलाह।
प्रकाशित कृति:
आब मानि जाउ(मैथिली उपन्यास)- पहिने भारती-मंडन पत्रिकामे प्रकाशित भेल, फेर मैलोरंग द्वारा पुस्तकाकार प्रकाशित भेल।
कच( अंगिकाक पहिल खण्ड काव्य,1975)
एक और राम (हिन्दी नाटक,1981)
एक घर सड़क पर (हिन्दी उपन्यास, 1982)
द पपेट्स (अंग्रेजी उपन्यास, 1990)
अनत कहाँ सुख पावै (हिन्दी कहानी संग्रह,2007)

आब मानि जाउ(मैथिली उपन्यास)- एहि उपन्यासमे एक एहन युवतीक संघर्ष-गाथा अंकित अछि जे अपन लगनसँ जीवन बदलैत अछि। असंख्य गामक ई कथा, कुलीनताक अधःपतनक कथा, संस्कारविहीनताक उद्घाटन आ भविष्यक पीढ़ीकेँ बचएबाक चेतौनी छी ई कथा।
click on the link : अनिलचन्द्र ठाकुर

बतहिया पुछै छै सवाल. दयाकान्त ‘‘दीपक‘‘

सगर नगर अछि मुह लटकौने
“शर्म सॅ सबकिया सिर झुकौने
कोन दोश हमर अछि अहिमे
पति के म़त्यु भेल अकाल
बतहिया पुछै छै सवाल
चैदह बितल चढिते पंद्रह
भ गेल हमर विवाह
सोलह बरख के मुॅह नहि देखलहु
भ गेल जीवन बदहाल
बतहिया पुछै छै सवाल
नाम अलच्छी सासु पुकारैथ
ससुर सदिखन कुलबोरनी
ननौद, दिअर मुॅह देख भागैथ
बितत कोना जीवन बेतरनी
बतहिया पुछै छै सवाल
सगर समाज मे चर्चा एकेर्टा
अबिते खेलकै “ाुषील बेटा
हमरा देखि रस्ता सब काटय
भ जाय किया यात्रा खराब
बतहिया पुछै छै सवाल
माय बाप नहि घुरी के ताकय
भौया-भौजी मुॅह नुकावय
नोर सुखायल नींद हरायल
एक-एक पल भेल पहाड
बतहिया पुछै छै सवाल
सास-ससुर सेट छिरकैया
ननद-दिअर परफ्रयुम लगबैया
कुकुरो साबुन रोज लगबैया
हमरा बेर में हैया बबाल
बतहिया पुछै छै सवाल
कनियॉ मरत बरत नहि दोश
वर मुर्हला पर कनियेक दोश
बर चाहे कतेको विवाह करताह
किया नहि होयत विधवा विवाह
बतहिया पुछै छै सवाल

दयाकान्त ‘‘दीपक‘‘

Help Alexa Learn Maithili

  Helping Alexa Learn Maithili:   Cleo Skill:  Amazon has a skill called "Cleo" that allows users to teach Alexa local Indian lang...