भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति
(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार
लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली
पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor:
Gajendra Thakur
रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व
लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक
रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित
रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक
'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम
प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित
आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha
holds the right for print-web archive/ right to translate those archives
and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive).
ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/
पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन
संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक
अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह
(पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव
शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई
पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html, http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA
Saturday, April 04, 2009
विदेह २७ म अंक ०१ फरबरी २००९ (वर्ष २ मास १४ अंक २७)-part-ii
भाग रौ
(संपूर्ण मैथिली नाटक)- (आगाँ)
अंक 1 दृश्य : 3
लेखिका - विभा रानी
पात्र - परिचय
मंगतू
भिखारी बच्चा 1
भिखारी बच्चा 2
भिखारी बच्चा 3
पुलिस
यात्री 1
यात्री 2
यात्री 3
छात्र 1
छात्र 2
छात्र 3
पत्रकार युवक
पत्रकार युवती
गणपत क्क्का
राजू - गणपतक बेटा
गणपतक बेटी
गुंडा 1
गुंडा 2
गुंडा 3
हिज़ड़ा 1
हिज़ड़ा 2
किसुनदेव
रामआसरे
दर्शक 1
दर्शक 2
आदमी
तांबे
स्त्री - मंगतूक माय
पुरुष - मंगतूक पिता
भाग रौ
(संपूर्ण मैथिली नाटक)
अंक 1
दृश्य : 3
(प्रकाश मंगतू पर। ओ अखबार पढ़ि रहल अछि। पढ़ैत-पढ़ैत पसेने पसेने भ' जाइत अछि। ओ मुंह पोछैत, एम्हर-ओम्हर देखै छै.. फेर अटकि-अटकि क' पढ़ैत अछि..)
मंगतू : नवयुवती के साथ बलात्.. चार युवक.. नशे में.. भाई भी.. दो गिफ्तार.. दो अभी भी फरार.. (पसेना पोछैत अछि। हकला क' घबड़ाहटि मे बजैत अछि) माने.. काल्हि.. कविता.. गणपत कक्का.. राजू.. (माथ पकड़ि लेइत अछि) बहीनक रखवार अपने स' ओकरा परोसि देलकै गिद्घक सोझा.. (चिकरैत अछि) .. कक्का, गणपत कक्का..
(आवाज सुनि किछु छात्र, किछु यात्री ओम्हर अबैत अछि सभ पूछैत अछि -- की भेलौ रौ? सपना देखै छही की? दिने मे सपना.. हँ, एकरा करैये के की छै? चौबीसो घंटा, आठो पहर सूतल रहौ,.. हमरा आओर जकाँ नञि छै ने.. छिछियाइत फिरू।)
(मंगतू कानि रहलए। कखनो अखबार स' माथ पीटैत अछि, कखनो बेबसी मे अपन केस नोचैत अछि।)
मरियो नञि जाइ छी हम। एहेन देह, एहेन जिनगी, एहेन समाज.. मरि कियै नञि जाइ छी हम। रे दैब.. आह रे दैब! कक्का यौ, गणपत कक्का..?
(भीड़ के काटैत गणपत बहिराइत अछि। मंगतू ओकरा देखतही भरि पांज ध' लेइत अछि आ कनैत अछि। कक्का पीठ-माथ सोहरबैत ओकरा भरोस दियबैत अछि।)
मंगतू : कक्का.. काल्हि.. काल्हि..
गणपत : की भेलौ बेटा?
मंगतू : कक्का.. कविता.. काल्हि..
गणपत : कत्त' घुरलौ बाऊ। दुनू मे स' किओ नञि। आँखिए मे राति कटलए।
मंगतू : कविता आब नञि आओत कक्का..
(गणपत प्रश्नवाची दृष्टि स' ओकरा देखैत अछि.. मंगतू अखबार ओकरा दिस बढ़ा देइत छै। गणपत अनपढ़क मुद्रा मे अखबार उनटैत-पुनटैत अछि.. एकटा यात्री अखबार ल' क' पढ़ैत अछि.. खबरि सुनि गणपत थहराक' खसैत अछि.. मंगतू फेर भरि पाँजि ओकरा ध' लइत अछि।)
गणपत : (विक्षिप्त जकाँ) रौ दैब रौ दैब.. मौगत द' दे रो दैब.. आब हम जीबि क' की करब.. (मंगतू के झोरि क') कहै छले ने तों जे हम सभ घर-दुआर, बाल-बच्चेदार, परिवारबला आदमी सभ छी। देख लेले नें? ईहे अछि घर आ ईहे अछि धिया-पुता। गै कविता गै.. हमर सोन सन बेटी गै.. रौ रजुआ.. रौ तोरा नरको मे ठौर नञि भेटतौ रौ..
(पुलिसक सायरन बजै छै.. सभ यात्री ओत' स' हटि क' बस स्टैंड लग ठाढ़ भ' जाइत अछि। किओ घड़ी देखैत अछि, किओ मोबाइल करैत अछि, किओ चोर नजरि स' मंगतू-गणपत दिस देखैत अछि, किओ अखबार स' पंखा करैत अछि.. छात्रक एक गोट टोली मे खुसर-फुसर करैत अछि।)
(पहिला दृश्यबला पुलिस अबैत अछि.. डंडा डोलबैत..)
पुलिस : रौ, गणपत तोंही छें?
गणपत : जी हुजूर।
पुलिस : चल थाना..
गणपत : हमर कसूर हुज़ूर।
पुलिस सार नहिंतन! बेटी स' धंधा आ बेटा स' भड़ुआगिरी, आ पूछै छें.. चल थाना.. पता चलतौ जे की छौ तोहर कसूर..
(पकड़ि क' ठेलैत- ठालैत ल' जाइत अछि।)
मंगतू : साब! साब, हिनका छोड़ि देल जाओ। ई निर्दोख छथि।
पुलिस : (मंगतू के लात लगबैत) त' तोंही चल। रौ डाँड़ मे छौ बूता छौंड़ी सभ लेल! हट सार!
(मंगतू फेर बीच-बचावक प्रयास करैत अछि। पुलिस डंडा बरसाबइत ओकरा ठेलि देइत अछि। मंगतू मुंहक भरे खसल रहि जाइत अछि। पुलिस गणपत काका के पकड़ि क' ल' जाइत अछि। यात्री, जाहि मे किछु छात्र सभ सेहो छथि, बिटर-बिटर तकैत रहैत छथि। पुलिस के गेलाक बाद)
यात्री 1 : बाप रौ बाप! एहेन कलजुग! बापे बेटीबेच्चा।
यात्री 2 : अहूँ त'! जे पुलिसबाला कहि देलकै, पतिया लेलहुँ ने!
यात्री 3 : पुलिसक बात आ चूल्हिक पाद एक सन!
छात्र 1 : एतेक घमर्थन क' रहल छी। जहन पुलिस बुढ़बा के पकड़ि क' ल' गेलै, एकरा (मंगतू दिस) एतेक मारलकै, तहन त' नञि फ़ूटल बकार॥ पुलिस के जाइते देरी कि सभक लोल एक-एक हाथ नमगर भ' गेलै।
यात्री 1 : रौ, पुलिसक सोझा बाजक कोनो मतलब छै।
छात्र 2 : त' एखनि बाजबाक कोन अर्थ?
यात्री 2 : हे रौ, बूझल जे हम सभ किछु नञि बाजल। तों सभ त' छलें, युवा शक्ति, छात्र शक्ति! तोहें सभ कियैक ने बाजलें रे!
यात्री 1 : (मंगतू दिस) हम सभ त' बाउ रौ, जिनगीक दोग मे फँसल बूँट छी। सेठ साहूकार कैंचीक मध्य फँसल कापड़ि। पुलिस-दारोगा करबाक समय कत'?
छात्र 2 : जहन अपना पर आओत तहन?
यात्री 3 : तहन देखल जेतै।
छात्र 3 : माने अपना पर पड़ल मोसीबत पहाड़, आ आनक फूसि-फासि?
यात्री 1 : तैं ने कहलियौ रौ भाय जे तों आओर त' छें छुट्टा बरदि। ने घर गिरस्थीक चक्करि ने नौकरी पातीक झंझटि, ने बाल-बच्चाक पिरसानी। ऊपर स' नेता बनबाक मोका फ्री-फंड मे। (बस देखैत.. हे हमर बस आबि गेल' कहैत चढ़बाक अभिनय करैत अछि। चढ़ि गेलाक बाद सोर पारिक' छात्र के कहैत अछि -) रौ, मोन राखिहें हमर गप्प। की ठेकान, छात्र नेता स' मुख्य मंत्री आ फेर केंद्रीय मंत्री भ' जेबें। घरोवालीक निस्तार भ' जेतौ। हे ले (पाइ फेंकैत अछि..) ऊ भिखमंगाक दबाई करबा दिहें।
(छात्र सभ तमतमाएल ठाढ रहैत छथि, अन्य यात्री सभी हंसैत अछि। किओ ठहाका पारि क', किओ मुंह तोपिक! किओ मुसिकियाइत पेपर पढ़बाक त' किओ समय देखबाक अभिनय करैत अछि। सभक बस एकाएकी अबैत छै, सभ ओहि मे सवार भ' भ' चलि जाइत अछि। जाए स' पहिले सभ किओ चवन्नी, अठन्नी, सिक्का मंगतू दिस फेंकैत अछि आ छात्र आओर के इलाज क तगेदा करैत अछि।)
छात्र 1 : ओह! रहब मोश्किल भ' रहल छै! मोन उजबुजाइय ई सभ देखि क'।
छात्र 2 : सपना देखै छी, देखैत रहै छी। कहियो किओ सपना देखल त' आइ देश आजाद भेल। आजाद देश लेल सपना देखल जे सभके जीबाक, रहबाक, काज करबाक समान अधिकार अछि। किओ भूखल-पियासल, बेरोजगार नञि रहत। पढ़ाई रोटीए जकाँ अनिवार्य रहतै। मुदा भेटलै की? आजादीक एतेक बरखक बादो वएह भूख, गरीबी, बेरोजगारी..
छात्रा 1 : भ्रष्टाचार, बेईमानी, सत्ताक अपराधीकरण। जिनगी जीबाक विवश्ता..
मंगतू : (कने जोरगर आवाज मे, जाहि स' छात्र सभ सुन सकथि।) रौ हाथ-गोर रहितहु कियैक एना बाजि रहल छें।
(छात्रक ध्यान ओकरा दिस जाइत छै। ओ सभ ओकरा ल'ग अबैत अछि)
छात्र 1 : भाई, हाथे-गोर रहला स' समस्याक समाधान नञि भ' जाइ छै।
छात्र 2 : सभ ठाँ पाई चाही, पैरवी चाही। देख भाई, लोक आओर हमरा सभ के कहै छथि जे हम सभ युवा शक्ति छी, देशक भविष्य छी।
छात्र 3 : रौ, वास्तविकता त' अछि जे हमरा आओर के अपने नञि बूझल अछि अपन भविष्य।
छात्र 1 : माय-बाप सपना काढ़ै छथि जे बेटा सभ पढ़ि-लिख क' हमर दुख दूर करत।
छात्र 2 : हम सभ त' हुनकर दुखक भीजल चिपरी मे चिनगी लगाक' आबि जाई छी, रसे-रसे सुनगैइत रहू।
छात्र 3 : करैत रहै छी - अपन अरमानक खून, माय-बापक सपनाक हत्या। रौ, तों त' खाली देहे स' अपाहिज छें। ई व्यवस्थाक हाथे हम सभ त' तन-मन दुनू स' अपाहिज छी।
मंगतू : मुदा भाई, ई व्यवस्था की छै। ककर छै, के बदलत?
छात्र 1 : (रोब स') हे, नेता जुनि बन। दू अच्छर अखबार पढ़िक' अपना के प्रधानमंत्री नञि बूझ।
(पहिलुका पत्रकार युवक-युवतीक प्रवेश)
युवक : अरे वाह, आई त' एकरा लग छात्र सभ सेहो अछि। गुड। चलू, एकरो आओर के कवर क' लेइत छी।
युवती : हम त' आइ काल्हि रोजे देखै छी, किओ न किओ एकरा लग बनले रहैत छै।
युवक : ई छैहे तेहेन कमालक चीज। हाथ नञि, पएर नञि, घर-परिवार नञि, शिक्षा-संस्कार नञि । तइयो पढुआ छै, अखबार पढ़ै छै। चिट्टी-पत्री लिखै-पढ़ै छै।
(दुनू सटि क' ओकरा आओरक गप्प सुनैत छथि। छात्र सभ मंगतू लग स' हटि क' बस स्टॉप दिस बढ़ैत छथि।)
छात्र 1 : कह' लेल जे कही। भने ओकरा झलकारि दही। हमर गप्प मे सेहो तों सभ दर्शन ताक' लाग। मुदा, कखनो लगैत अछि जे एकरे जकाँ हम आओर सेहो भेल जाइ छी। लोक आओर भेल जाइत अछि, देश-दुनिया बनल जाइत अछि।
छात्र 2 : रौ बाप, हे, पहिनहीं परीक्षा खराब भ' गेल अछि। आब ई दर्शन-तरसन छाँटि क' माथ नञि खराब कर।
छात्र 1 : सुन त'! एकरा देखिक' तोरा नञि बुझाइ छौ जे एकर देह-देह नञि, ई समाज आ ओकर व्यवस्था छै। ई समाज, ई व्यवस्थाक माथ छै, माथ मे दिमागो छै, जे सोचैत त' छै, मुदा किुछ करै नञि छै। करबाक लेल सक्रियताक हाथ-गोर चाही, जे एकरे जकाँ ओकरो नञि छै। तैं एकरे जकाँ पड़ल रहै छै - लोथ भेल।
छात्र 3 : (छात्र 2 आ 3 माथ ठोकैत छथि।)
गेलौ रौ गेलौ। पूरमपूर गलौ। आब ई हमरा आओर के त' पकेबे करतौ, तोरो आओर के नञि छोड़तौ। (युवक-युवती के देख) नीक भेल। आबि गेलहुँ। सुनू आब अरस्तूक गप्प। (दुनू तेजी स' निकलि जाइत अछि। छात्र 1 ओही ठाँ अछि।)
युवक : देखू! पत्रकार छी हम आओर आ पत्रकार जकाँ बतियाइत छथि ई आओर।
युवती : हमरा आओर त' छात्र सभक संगे ओकरा कवर कर' चाहै छलहुँ।
युवक : से त' रहिए गेल।
युवती : ई एकटा अछि ने! एकरे कवर क' लेइत छी।
युवक : (चिढ़िक') त' निकालू साड़ी आ क' लिय' कवर।
युवती : शटअप! फालतू गप्प नञि करी। हमर संग साथ नञि नीक लगैत अछि त' अहाँ जा सकै छी। हम अपन काज क' लेब।
युवक : ककरा संगे? ऊ लोथक संगे की ई देशक भविष्यक संगे।
युवती : (चिकरैत) बंद करू ई बकवास। अहाँ जर्नलिस्ट छी। बूझै छी जर्नलिस्टक माने? (ओही उत्तेजना मे) जर्नलिस्ट माने उन्नत विचारक स्वामी, खुलल दिल आ दिमागवाला व्यक्ति, जनताक विचार वहन कर' बला, व्यवस्थाक छेद मे आंगुर द' क' देखाब' बाला। मुदा अहाँ त' ईर्ष्या आ द्वेष स' जरैत संठी छी मात्र। दुर्गंध स' भरल तौला। दुनियाक चौथा आवाजक नाम पर भड़ुआगिरी कर' बला। छि:।
(युवक नाराज भ' क' यवती दिस घूरैत अछि। युवतीक चिकरब सुनि बाहर गेल दुनू छात्र घूरि अबैत अछि। छात्र 1 पहिनही स' अकबकाएल बेरी-बेरी स' दुनू युवक-युवती के देखैत अछि। युवक-युवतीक हाथ घीचि क' मंच क दहिना भाग मे ल' जाइत अछि। छात्र सभ मंचक बाम दिस छथि आ मंगतू बीच मे। मंच पर अत्यन्त मद्घम प्रकाश। अचानक युवक-युवती पर हाथ उठबैत छै। सभ चौंकि उठैत अछि। युवती खसल अछि। मंगतू हड़बड़ाक' ओम्हर बढ़बाक प्रयास करैत अछि, मुदा खसि पड़ैत अछि। छात्र सभ युवकक चेहरा देखि ओहि ठाँ थकमकाएल रहि जाइत छथि। पार्श्र्व स' समवेत स्वर में ईको साउन्ड इफेक्ट मे ई पंक्ति चलैत अछि।)
किओ किछु नञि क' सकैत अछि।
किओ किछु नञि कहि सकैत अछि।
बिकाएल बजार मे मानवताक मूल्य
बंधक अछि माथ
हाथ गोर भांगल, धड़ शिथिल
जागू, जागू, तखने होएत विहान
नव सूरज रचत इतिहासक नव काल खंड।
(प्रकाश शनै: शनै: फेडआउट होइत अछि।)
(मध्यांतर)
(अगिला अंकमे जारी)
डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास)
वस्तुतः अपन रचनामे कोनो पात्राक सृजन केलाक बाद जँ रचनाकार ओकर स्वामी बनि जाइ छथि, चरित्राक सहज विकास नहि होअए दै छथि, तँ ओ रचना सामान्यतया असफल भ' जाइत अछि, अपना समयक यथार्थसँ पृथक रहि जाइत अछि, रचनाक सत्य आ नायकक आचरण समाज सापेक्ष नहि भ' पबैत अछि। मुदा राजकमल चौधरीक रचनाक नायक-नायिका आ तकर सहयोगी पूर्ण रूपें स्वतन्त्रा रहैत अछि, स्वेच्छाचारी नहि। ओकर चारित्रिाक विकासमे राजकमल चौधरीक नियन्त्राण ओतबे रहैत अछि, जतबा घूमैत चाक पर राखल माटि पर कुम्हार नियन्त्राण रखैत अछि। अपन ब्रह्माक मात्रा एतबहि टा नियन्त्राण पाबि ओ पात्रा आ रचना महान भ' जाइत अछि। जेना आदिकथा आ आन्दोलन महान भेल अछि; आदिकथाक देवकान्त आ सोना मामी; आन्दोलनक कमलजी, भुवनजी, नीलू, निर्मला, सुशीला महान भेल छथि।
आन्दोलनक प्रमुख पुरुष पात्रा छथि--विष्णुदेव ठाकुर, मोदनारायण जी, नरेन्द्र झा, चन्द्रशेखर बाबू, हेम बाबू, सुदर्शन जी, भुवनजी, कमलजी आदि। किछु अनाम-सुनाम सामूहिक पात्रा सेहो छथि, जे अवसर-बेअवसर अपन वक्तव्यसँ, आ अपन क्रिया-कलापसँ अपन चरित्रा आ मानसिक स्तरक परिचय दै छथि। विष्णुदेव ठाकुर, मोदनारायण जी आ चन्द्रशेखर बाबूक उपस्थिति कथा विस्तारमे ठाम-ठीम होइ छनि, मैथिलोचित प्रवृत्ति आ दुष्टतासँ परिपूर्ण छथि, एकर अलावा कोनो विशेष उल्लेखनीय योगदान हिनका लोकनिक नहि छनि। हेम बाबू सेहो तेहने प्रासंगिक पात्रा छथि, मुदा निर्मला सन उद्धत यौवना बेटीक पिता छथि, विधुर छथि। आत्म-प्रशंसासँ ग्रस्त छथि, अपन बौद्विकता पर अपनहि गर्वित रहै छथि, बेटीक उग्र-आधुनिकाक छवि कोनो बेजाए नहि लगै छनि, दोसरक नीको काल अधलाह लगै छनि, सुझाव आ उपदेश देबामे अपनाकें दक्ष बुझै छथि, छिद्रान्वेषी छथि। मैथिल समितिक आयोजनमे पचीस टाका चन्दा द' कए एना मोन बनबै छथि, जेना भुवनजीकें कीनि लेलनि (पृष्ठ-३४)।
नरेन्द्र झा मैथिल समितिक सक्रिय कार्यकर्त्ता छथि, भुवनजीक संग रहै छथि, मुदा परोक्षमे निन्दा करब स्वभाव छनि। निर्मलाक बासा पर जएबामे मोन लगै छनि, मुदा हुनका दुष्चरित्रा कहबामे रस लगै छनि (पृ. ३९-४०)। मैथिल जातिक आम वृत्ति--चुगलखोरी आ दुष्टाचरण पर एहि उपन्यासमे पर्याप्त दृष्टि देल गेल अछि (पृ.१७)। पात्राक वक्तव्य आ आचरणसँ चरित्राक सम्पूर्ण छवि अंकित करबाक महारत राजकमल चौधरीक लेखनमे सगरो देखाइत रहैत अछि।
सुदर्शनजी सन मातृभाषानुरागीक अवतारणा उपन्यासमे थोड़बे काल लेल भेल, मुदा ओतबहि कालमे उपन्यासकार हुनकर विराट छवि ठाढ़ क' देलनि। परम उत्साही, क्रियाशील आ विद्रोही व्यक्तित्वक एहि युवक द्वारा स्कूलमे भाषा सम्बन्धी रीति पर वक्तव्य जारी करब, प्रतिक्रिया देखाएब, एकटा विराट परिदृश्य दिश इशारा करब थिक। स्कूली शिक्षाक भाषा माध्यम आ शिक्षक-शिक्षार्थीक वार्तालापक भाषा माध्यम बड़ पैघ महत्व रखैत अछि। स्कूलमे शिक्षक लोकनि जखन मैथिलीमे गप करनि, तँ हुनका ओ अपन पिता, पितृव्य, भाइ सन लगैत रहनि। मुदा जखनहि आन बोली-बानीक लोक अध्यापक बनि स्कूल अएलनि आ ओ हिन्दीमे गप करए लगलनि, हठात् ओ अदना बुझाए लगलनि, मातृभाषा विरोधी लागए लगलनि (पृ. ५४-५५)। मातृभाषा लेल बुनियादी क्रान्तिक संकेत एहि अंशमे देल गेल अछि। सुदर्शनजीक हृदयमे क्रान्तिक आगिएना धधकै छनि जे बीचहि सभामे निर्मलाजीसँ बहस क' लेलनि--नइं निरमल दीदी!...शान्तिक कविता नइं, मात्रा क्रान्ति हमरा सभकें चाही, आन्दोलन चाही(पृ. ५३)।... एहि छोट सन उपन्यासमे ततेक बातक
संकेत देल गेल अछि, जे सूइक नोक बराबरि फाँक कतहु नहि देखाइत अछि। वस्तुतः सन् १९४७सँ १९६७ धरिक समय मिथिला लेल विचित्रा सन छल। स्वातन्त्रयोत्तर कालक भारतीय परिदृश्यमे मैथिल, मैथिली आ मिथिला ठकमूड़ी लगा क' बैसल छल। मिथिलाक जे सेनानी, सब किछु छोड़ि संग्रामक सिपाही बनल छल, तकरा पमरियाक तेसर बूझल जाए लागल, ओकर कोनो मानि-मोजर नहि देल जाइ छल। मिथिलाक जे व्यक्ति शासनमे गेल, से नंगरडोलाओन धन भ' गेल। ओकरा लेल मातृभाषा मैथिलीक उपेक्षा कोनो अर्थें उद्वेलनक विषय नहि छल। भाषाक महत्वसँ ओ परिचित नहि छल। ओहेन आत्मकेन्द्रित जन प्रतिनिधि मातृभाषा आ जनपदीय संस्कृति लेल कोन संघर्ष करितए?... स्वातन्त्रयोत्तर कालीन तीन दशकक मैथिली रचनाकारकें ई सब किछु भारी बोझ जकाँ निमाहए आ सँवारए पड़लनि। स्थानीय रूढ़ि निपटानक जटिल दायित्वसँ संघर्ष करैत भाषाई जागरूकता उत्पन्न करबामे, आ आन्दोलनक छद्मसँ सर्वसाधारणकें सावधान करबामे...तल्लीन रहब बड़ दुर्वह काज छल। आन्दोलन उपन्यास ताहि क्रममे महत्वपूर्ण भूमिका निमाहने अछि।
भुवनजी एहि उपन्यासक अत्यन्त उदार, निविष्ट आ सहज चरित्राक पात्रा छथि। उपन्यासक मुखर पक्ष थिक आन्दोलन, तकर नायक इएह छथि। मुदा, जें कि आत्मकथात्मक शैलीमे ई उपन्यास लिखल गेल आ कथावाचक कमलजी भ' गेलाह, भुवनजी गौण पड़ि गेल छथि।
बहुत रोचक ढंगें उपन्यासकार भुवनजीक चरित्रा ठाढ़ केने छथि--धीर, गम्भीर, शान्त, उदार।... कलकत्ताक पैघ कम्पनीमे कानूनी सहायक आ व्यापार संचालक छथि। मुदा मातृभाषाक प्रति प्रबल अनुराग छनि। मैथिल समिति आ मैथिली पत्रिाका लेल समर्पित व्यक्ति छथि, परोपकारी छथि, मैथिल लोकनि लेल बेस सहायक लोक छथि। ट्राम, बस, फैक्ट्रीमे सय-दू सय मैथिलकें नौकरी दिऔने छथि (पृ. ३४)। नीलू सन अनाथ बालिकाकें बेटी जकाँ रखने छथि (पृ. १४)। बेस बुझनुक, चिन्तनशील, युगीन परिस्थितिसँ आ परिस्थितिजन्य क्रिया-कलापसँ नीक जकाँ परिचित छथि। कमलजी जखन कोनो बात पर प्रतिवाद करै छथिन, तँ भुवन जी कहै छथि -- ई राजनीति थिकै कमलजी, एहिमे उचित-अनुचितक कोनो गप नहि कएल जा सकइए। मिथिला-आन्दोलनक लेल एखन एकटा नेता हमरा सबकें चाही, नामक नेता। जे सभामे गरजि सकए, शासक वर्गक आगाँ धुरझाड़ अंग्रेजी, हिन्दी, बंग्ला, फारसी चिकरि सकए। लोककें आतंकित क' सकए, एकटा बिहाड़ि सौंसे देशमे उठा सकए।... असली काज त' हम सब करबइ।... बिहाड़िमे उड़ैत ख'ढ़मे चिनगी त' हम सब लगेबइ (पृ. १५)। मातृभाषा आ जन्मभूमिक प्रति एहि तरहें समर्पित लोक, आन्दोलनकें सफल करबा लेल सफल मार्गक ज्ञाता, नीति-कुशल लोक, भुवनजीक नजरिमे कोनो पैघ काज लेल योजनापूर्वक काज करबाक परिदृश्य एना रचल जाइत अछि। एहेन निविष्ट आ नीतिज्ञ पुरुषक पत्नी महान कुरूपा, नितान्त अव्यवहारिक छथिन। समस्त भव्य छविक अछैत जीवन-परिदृश्यक एक खण्ड बेरंग छनि, मलीन छनि, श्रीहीन छनि। एहेन पत्नी संग कोनो सभा सोसाइटीमे नहि जा सकै छथि। कोनो सभ्य व्यक्तिक चौपालमे नहि बैसि सकै छथि...। भुवनजी सन विशिष्ट आ विराट व्यक्तित्व संग उठबा-बैसबाक लिलसा निर्मला सन सुशिक्षित, सुदर्शन, उद्धत यौवना स्त्रीकें होइ छनि। एहेन उदार देह आ उदार मोनक जवान स्त्रीक प्रति जँ भुवनजी सन परिस्थितिक लोक अनुरक्त होइ छथि, तँ से सहज सम्भाव्य थिक। मुदा अही बीच निर्मलाजीक परिचय कमलजीसँ होइ छनि आ निर्मला आब पुरान गाछक डारिसँ उड़ि कए नव डारि पर बैसए चाहै छथि, कमलजी दिश हुनकर अनुरक्ति बढ़ि जाइ छनि। भुवनजीकें ई बात पसिन नहि छनि, मुदा से व्यक्त नहि करए चाहै छथि। नहि चाहै छथि, मुदा व्यक्त भ' जाइ छनि (पृ. ४५)। वार्तालापक ई चमत्कार रोचक अछि।... वस्तुतः प्रेम, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्यक मार्गमे प्रतिद्वन्द्वी ठाढ़ हैब बड़ दुखदायी होइत अछि। एहि दृश्यक विकट-जटिल मनोविज्ञानक ओझराहटिकें जाहि सहजतासँ राजकमल चौधरी टिपने छथि, से रोमांचक अछि।
सकल मैथिल समाजमे चर्चा अछि, जे निर्मलाजी भुवनजीक प्रेयसी छथिन, ताही आकर्षणमे भुवनजी हुनकर बासा पर जाएब आएब करै छथि। मुदा भुवनजी ई व्यक्त नहि होअए देताह, प्रतिष्ठाक प्रश्न अछि। लोकक मुँह बन्द करबा लेल भुवनजी निर्मलासँ दूरी बढ़ा लेताह, से नहि हेतनि। स्त्री देहक उदार छाहरिक प्रश्न अछि। कोनो आन पुरुखक संगति निर्मलाकें भेटनि, से भुवनजीकें पसिन नहि, मुदा कोना रोकथिन, ओ हुनकर पत्नी नहि छथिन, घोषित प्रेमिको नहि। कमलजीक सोझाँ, जे हुनकर बड़ सम्मान करै छथिन, नांगट कोना हेताह?
अइ उपन्यासमे सर्वाधिक जटिल व्यवस्था हिनकहि चरित्रा-चित्राणमे अछि। विवाद, तनाव, दाम्पत्य, प्रतिष्ठा, प्रभुत्व, भय, उदारता, वैराट्य... सब किछु मिला कए विचित्रा सन स्थिति बनैत अछि। एक दिशा पकड़ि कए जाइत रहू, हुनका नीक आ कि बेजाए साबित करैत रहू, जाइत-जाइत ओहिमे दोसर दृश्य आबि कए पहिलुक सूत्रा ओकरा देत। आन पात्राक संग से स्थिति नहि होइत अछि। कने-मने नीलूक चरित्रा-चित्राणमे सेहो इएह बात अछि।
कमलजी अइ उपन्यासक नस-नसमे समाएल छथि। कथावाचक हेबाक कारणें आन पात्रा लोकनिक चरित्रा पर टिप्पणियो करैत गेलाह अछि, मुदा हिनका सम्बन्धमे हिनकर टिप्पणी, उद्घोषणा, वक्तव्य, वार्तालाप आ आचरणे टा विश्लेषण आ मूल्यांकनक आधार बनि सकैत अछि। बेस पढ़ल-लिखल, आधुनिक विचारधारा, स्वच्छन्द चिन्तन पद्धति, प्रचुर प्रतिभा सम्पन्न बेरोजगार मैथिल युवक छथि। साहित्यिक संस्कारक सृजनशील आ सांसारिक युग चक्रक सूक्ष्मतासँ परिचित व्यक्ति छथि। छद्म, पाखण्ड, द्वेष-दुविधासँ परहेज छनि। क्षुधा, यौन-पिपासा आ आत्मसुरक्षाकें मनुष्यक मूल प्रवृत्ति मानै छथि। बुझनुक, वाक्चतुर आ जिम्मेदार लोक छथि। ट्यूशन क' कए भाउज, भतीजीक जीवन-यापन, लालन-पालनक चिन्ता रखै छथि। सामाजिक रीति-कुरीति, द्वेष-दुविधा, लोभ-ईर्ष्या, जीह-जाँघ-पेटक कामनासँ परिचित छथि। प्रतिभा आ वाक्चातुर्यक बलें महानगरमे अधिकांश लोकक नजरिमे सम्मानपूर्वक बसल छथि। निर्मला सन कामातुरा युवती हुनका पर लहालोट होइ छथि, नीलू सन किशोरी समर्पित हेबा लेल तत्पर छनि, मुदा उचितानुचितक ज्ञानसँ परिपूर्ण कमलजी नीलूक कौमार्य भंग नहि करै छथि। स्त्री-पुरुषक अतिरिक्त निकटता कखनहुँ कोनो परिस्थितिमे परिणत भ' जा सकैत अछि--ताहि अन्देशासँ कमलजी परिचित छथि, तें नीलू आ अपना बीच भाइ-बहिनक लक्ष्मण रेखा घीचि दै छथि।
नारी शोषणक प्रति रोष छनि, स्त्री दमनक प्रति आक्रोश छनि, देह व्यापार क' कए गुजर-बसर करै वाली सुशीला सन स्त्रीक अन्तर्कथा सुनि कए मोन घोर भ' जाइ छनि। कामेच्छा तृप्त करबा लेल अनेक पुरुख कोरमे नांगट होइत अर्थ-सम्पन्न स्त्री निर्मला, आ पारिवारिक भरण-पोषण हेतु असंख्य कामुक राक्षसक उत्तेजना शान्त करैवाली विपन्न स्त्री सुशीलाक तुलनात्मक विश्लेषण करए लगै छथि (पृ. ३७-३९)।
छोट वयसमे, जखन विवाहक अर्थो नहि बूझै छलाह, स्त्री पुरुष सम्बन्धक ज्ञानो नहि छलनि, तखनहि अपन भाउजक बहिन गुलाबसँ विवाह करबाक इच्छा व्यक्त केलनि (पृ २८); सम्पूर्ण उपन्यासक जीवनमे भुवनजी सन निविष्ट, प्रतिष्ठित आ गम्भीर लोकक प्रति कोनहु आक्षेप अथवा आधार नहिओ रहैत, निर्मलाजी सन पथभ्रमित स्त्रीक प्रति हुनकर अनुरक्ति (पृ. ४५); स्वकीया होइतहु अनेक परिस्थितिवश निर्मलाजी परकीया बनि जएबाक घटना (पृ. ३८-४०), नीलू पर विष्णुदेव ठाकुरक वासनात्मक दृष्टि (पृ. १६)...अइ तरहक कतोक प्रकरणसँ उपन्यासमे कथावाचक स्पष्ट करै छथि जे भूख, वासना आ सुरक्षाभाव मानव जीवनक अपरिहार्य आवश्यकता थिक, अइ अपरिहार्यताक अपवाद कमलजी स्वयं सेहो नहि छथि, जकर संकेत अपन वक्तव्य आ आचरणसँ दैत रहलाह। ई परिदृश्य एक दिश उपन्यासक आधार कथ्यकें मजगुत करैत अछि तँ दोसर दिश कमलजीक वैचारिक दुनियाँ आ दृढ़ मान्यताक प्रमाण दैत अछि।
आन्दोलनक स्त्री पात्राक कैक कोटि अछि-- समय-चक्र आ समाज व्यवस्थाक चाँगुरमे विवश; कामोन्मादमे मातल, मदोन्मत्त; किशोरकालीन उद्वेगमे बहकल, मुदा किछु-किछु सावधान। एहिमे एक वर्गक स्त्री छथि बनगाम वाली आ सुशीला। बनगामवाली जीवन संग्रामसँ लड़बा लेल स्त्री देहक सौदा करै छथि, सौदाक प्रबन्धन, दलाली; दस पाँच स्त्री रखै छथि, अपना घरमे जगह, सुविधा, सुरक्षा दै छथिन, व्यापार चलै छनि, तकर कमीशनसँ हुनकर जीवन-यापन होइ छनि; दुनियाँक आन कोनहुँ परिस्थिति, परिवेश, आर्थिक-सामजिक-राजनीतिक-नैतिक घटना-कुघटनासँ हुनका कोनहुँ सरोकार नहि छनि। गँहिकी अबैत रहए, पाइ लेल परपुरुष गमन हेतु सहर्ष तैयार स्त्रीक संख्या हुनका ओतए बढ़ैत रहए, एहिसँ पैघ बात, प्रसन्नताक बात हुनका लेल किछु नहि थिक। सुशीला रोजगारक अनुसन्धानमे बौआइत पिताक सन्तान थिकीह, जिनका अपन माइए अइ काज लेल प्रेरित केलकनि आ माइ संगे ओ विभिन्न वेश्यालयमे जाए लगलीह। जीवन-यापन हेतु आओर कोनो आधार बचल नहि छलनि (पृ. ३६-३९)।
दोसर वर्गक प्रतिनिधित्व करै छथि-- निर्मलाजी। जेना कि कहल भेल जे कोनहु व्यक्तिक आचारण, ओकर मनोवेगसँ संचालित होइत अछि, आ मनोवेगक मानसिक अवस्थिति व्यक्तिकें प्रदत्त सर्वांगीण वातावरणमे निर्मित आ निर्देशित होइत अछि। निर्मला, हेम बाबूक पुत्री छथि, हेम बाबू कमाऊ लोक छथि, महिनबारी दरमाहा अबै छनि, ओहि दरमाहाक लार-चार, संचय-निस्तार करबाक दायित्व अथवा अधिकार निर्मलाजीकें छनि--कोनो तरहक सामाजिक आँकुश अथवा आर्थिक दबावमे नहि रहै छथि। अन्न-वस्त्रा आ सामाजिक सुरक्षाक कोनो समस्या नहि छनि। मुदा दैहिक उत्ताप छनि, जगजियार बनल रहबाक आकांक्षा छनि, सबहक आँखिमे बसल रहबाक लिप्सा छनि। विधुर पिताक दरमाहा, आ परदेशी पति द्वारा पठाओल मनीयाडरक महाबलसँ निर्मलाजी मैथिल समिति द्वारा आयोजित जनसभामे अपनाकें शो-केसक मूर्त्ति जकाँ सजा क' प्रस्तुत करै छथि। अपन भाषण, भू्र-विलास, अधरक लाली, कुटिल कटाक्ष, रति-सुरति, अंग-संचालनसँ लोकक मोन मोहैत रहै छथि आ लोकक प्रशंसाक पात्रा बनल रहै छथि। हिनका सुशीला जकाँ बनगाम बालीक
खोलीमे खाट नहि ओछब' पडै छनि, नित्य प्रति आ अनेक बेर अनेक कामुक पुरुष संग व्याभिचार नहि करए पड़ै छनि। काज दुनू एके रंग करै छथि, मुदा, जें कि सुशीला लेल देह पूँजी छनि, तें हुनकर करतब व्यभिचार कहल गेल आ जें कि निर्मला लेल देह प्रसाद छनि, तें हुनकर करतब आचार भेल। सुशीला जकाँ जँ निर्मलोजी बेरोजगार पिताक बेटी रहितथि, दायित्वक बोझ तर दाबल रहितथि, दू साँझक नोन रोटी जुटएबा लेल, दू बीत वस्त्राखण्ड अनबा लेल देहक अलावा आन कोनो बाट नहि रहितनि, तँ निर्मला जीक चटक-मटक कतए जइतनि?... ओना आजुक स्त्री विमर्शमे छान-पगहा तोड़निहार वक्तव्यवीर लोकनि एहि चरित्राक प्रति, आ तकर एहि तरहक मूल्यांकनक प्रति अनघोल अवश्य करताह, जे स्त्री, देहसँ बाहरो बहुत किछु होइत अछि।...अवश्य होइत अछि, मुदा कोनो मादक संगीत सुनि पोन पर तबला बजाएब, आ तबला पर तबला बजाएब, दुनू दू बात होइत अछि। निर्मलाजी आ सुशीला जीक चारित्रिाक विश्लेषणमे एहि उपन्यासमे कामुकताक इएह विरोधी स्वरूप, वासनाक इएह विरोधाभास, नारी समुदायक इएह रूप वैविध्य आन्दोलन उपन्यासमे भावककें आन्दोलित करैत अछि।
(अगिला अंकमे जारी)
डॉ.शंभु कुमार सिंह
जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।
आलेख:
आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या
भारत गरीबक देश थिक। एतुका अधिकांश जनता एखनहुँ गाममे रहैत छथि जे कि कृषि कार्य पर निर्भर छथि आ बरखा पर। फलस्वरुप अनियमित बरखा सरकारी उपेक्षा ओ अशिक्षा तथा पिछड़ापनक कारणेँ गामक लोक गरीबीक जीवन बिता रहल छथि। यैह गरीब किसान ओ गामक लोक जखन कमयबा हेतु शहर जाइत छथि तँ मजदूर वा बोनिहार कहबैत छथि। ओतहु हुनका सभकेँ नारकीय जीवन जीवाक लेल बाध्य होम’ पड़ैत छैक। भारतक कुल आबादीक पैंतीस प्रतिशतक लगपास लोक एहन छथि जे जीवनोपयोगी न्यूनतम आवश्यकताक पूर्ति करबामे अक्षम छथि।
निर्धनता मनुक्खकेँ बेवस लाचार आ शक्तिहीन बना दैत अछि। निर्धन मनुक्ख पिछड़ल, दीन-हीन बाधाग्रस्त आ सदैव दोसरक दयारपर जीब’ क लेल बाध्य भ’ जाइत अछि। मानव जीवनक भयंकर अभिशाप थिक निर्धनता वा गरीबी। जाहि मनुक्खकेँ दू-साँझक रोटी नहि, पहिर’ क लेल शरीर पर वस्त्र नहि, रहक लेल घर नहि, बीमार भेलापर दवाय-दारूक पाय नहि, ओ जँ आत्माक उच्चताक दावा करत त’ ओ मिथ्याक सिवाय किछु नहि भ’ सकैत अछि। ओ स्वतंत्र कोना भ’ सकैत अछि ? ओ कोनहुँ बड़का काज कोना क’ सकैत अछि ? ओ अपन विचारकेँ स्वतंत्र रूपसँ कोना प्रकट क’ सकैत अछि ? निर्धनताक कारणेँ मनुष्य तंगदिल, तुच्छ, ओछ, कमजोर आ अपन ईच्छाक मार’वला बनि जाइत अछि।
मैथिली नाट्य साहित्य मध्य एहि समस्याक विश्लेषण निम्नस्थ नाटकमे भेल अछि। जीवनाथ झाक ‘वीर –वीरेन्द्र’ (1956) भाग्य नारायण झाक ‘मनोरथ’ (1966) बाबूसाहेब चौधरीक ‘कुहेस’ (1967) गुणनाथ झाक ‘कनियाँ – पुतरा’ (1967) महेन्द्र मलंगियाक ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ (1980) नचिकेताक ‘नायकक नाम जीवन’ (1971) अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क ‘आगि धधकि रहल छै’ (1981) गोविन्द झाक ‘अन्तिम प्रणाम’ (1982) गंगेश गुंजनक ‘बुधिबधिया’ (1982) आदि।
मनोरथ मे लक्ष्मीनाथ अपन निर्घनताकेँ कोसैत छथि। ओ कहैत छथि---- “हमर नाम तँ दरिद्रनाथ होमक चाही ने कि लक्ष्मीनाथ। एकठाम नाट्यकार गरीबक धीया-पुताक संबधमे कहने छथि जे ओ कोनो काज सोचि समझि कए करैत अछि ओ अपन सुख-सुविधाकेँ त्यागि दैत अछि। एहि परिप्रेस्थमे मैथिली नाट्यालोचक डॉ. प्रेम शंकर सिंहक कथन छनि--- “आर्थिक दशाक क्षीणताक कारणेँ मनुष्यकेँ केहन संकटापन्न समस्याक सामना करय पड़ैछ तकरे दिग्दर्शन एहि नाटकमे होइत अछि।”1
गरीबीक ई पराकाष्ठा छैक जे क्यो खाइत-खाइत मरैत अछि तँ क्यो कमाइत-कमाइत। एतय समुचित व्यवस्थाक आभाव अछि। एतय अधिकांश नेनाक स्थिति एहने अछि जे जन्मोपरान्त रोजी-रोटीक जोगाड़मे लागि जाइत अछि। ‘नाटकक लेल’ मे एहि समस्याकेँ उजागर कयल गेल अछि---- “कतेको लोक एक किनारमे पड़ल कूड़ाक ढेरसँ की सबने बीछि रहल छल, क्यो दू एकटा रोगायल बच्चाकेँ डेंगा रहल छल”2 निम्नवर्गक यर्थाथ चित्रणक दृष्टिसँ ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ मैथिली नाट्य साहित्यमे अद्वितीय स्थान राखैत अछि। एहि नाटकक केन्द्रबिन्दु थिक सर्वहारा वर्गक यातनापूर्ण जीवन, वासन्ती पवन, ग्रीष्मीय निदाध, बर्षाक रिमझिम हेमन्तक शीत आ शिशिरक सिहकी समटा गरीबक हेतु, फुसि थिक। एहिमे एकटा गरीब एरिवारक बारहो मासक दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण कयल गेल अछि, जाहिमे कातिक मासक एकटा बानगी प्रस्तुत अछि-----
“कातिक हे सखि बोनियो ने लागै छै,
अन्नक नहि कोनो बाट यौ।
पेटक ज्वाला राम सहलो ने जाइ छै,
घर-घर हुलकय राड़ यौ।”3
वस्तुत: कातिक मास खेतिहर मजदूरक लेल दुखक मास होइत अछि। एहि समयमे अन्नाभाव भ’ जाइत छैक एहन स्थितिमे निम्नवर्ग स्थिति दयनीय भ’ जाइत छैक – “दू गोट कोकड़ा पकबिति पियास लागल हय।”4गरीब लोकक लेल खयबाक हेतु भरिपेट अन्न वस्त्र आ आवासक एकटा जटिल समस्या भ’ गेल अछि एहि समस्या दिस नाटकारक ध्यान जाति छनि--- “अन्न बिना पेट जरिते हय, बस्तर बिना ठिठुरबे केली आ घर त’ दखते छी”5 प्रो. प्रेमशंकर सिंह एहि नाटककेँ “मिथिलाक निम्नवर्गीय समाजक अलबम कहने छथि।”6 “जाहि आँगनक बारहमासा एहिमे टेरल गेल अदि तकर ध्वनि खाली ओहि आँगनसँ नहि आबि रहल अछि, प्रत्युत मिथिलाक लाख-लाख आँगनसँ उठैत ओकर रोस, हाहाकार करैत सोझे मर्मकेँ बेधि देमयवला अछि।”7
आर तँ आर आइ समाजमे एहन गरीबी व्याप्त छैक जे गरीबकेँ मुइलाक उपरान्त कफन किनबाक लेल टका नहि रहैत छैक। “अंतिम प्रणाम” मे समाजक एहन दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण द्रष्टव्य थिक--- “ठीके त’ कहै छिऐ। हमरा आरू गरीब छी मुदा आनि पर दस गोटय मिलि जाय तँ की ने क’ सकैत छी।”8
‘बुधिबधिया’ मे सेहो गरीबीक दृष्टान्त भेटैत अछि। देश मे कतेको व्यक्तिक स्थिति सोचनीच अछि। किछु व्यक्ति अपन जीवन-यापन विलासितापूर्वक ढगसँ व्यतीत करैत छथि, मुदा सरकारक ध्यान गरीब लोकक दिस नहि जाइत छैक। जँ सरकार द्वारा किछु व्यवस्था कयलो जाइछ तँ ओकर लाभ गरीब लोक घरि नहि पहुँचि सकैत अछि--- “एकरा देह पर एक बीत वस्त्र नहि, एकर अंग-2 उघार अछि।”9
समाजक अधिकांश लोक गरीबी रेखाक नीचाँ अछि। महगी अकाश छुबि रहल अछि। सामान्य लोक अपन परिवारक हेतु भोजन, वस्त्र आवास जुटएबामे परेशान अछि। ‘अंतिम प्रणाम’ मे मुरारीक कथन अछि--- “तीन-तीन टा बच्चोकेँ भुखले सुतैत देखैत रहैत छी----घरवालीकेँ फाटल वस्त्रमे देखैत छी---अहू सँ बेसी किछु अशुभ भ’ सकैत अछि।”10
वर्तमान युगमे सामाजिक चेतनाक निरन्तर बढ़ैत गतिशीलता ओ परंपरागत रूढ़ि व्यवस्थाक जड़ताक बीच एकटा भयंकर संघर्ष आ तनावक स्थिति बनल अछि। आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटकक मूल-स्वर एहि प्रकारक विभिन्न संघर्ष, तनाव आ अनेक सामाजिक समस्या आदिसँ भरल अछि। सामाजिक जीवनक यथार्थक अभिव्यक्ति नाटककारक सामाजिक दृष्टि आ रचना दृष्टि पर आधारित होइत अछि। मिथिलांचलक समाजमे आर्थिक विपन्न जीवनक अस्तव्यस्तता स्वाभाविकतामे परिवर्तित भए गेल अछि।
संदर्भ
1. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, पृष्ठ—96
2. नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—54
3. ओकरा आँगनक बारहमासा, महेन्द्र मलंगिया,पृष्ठ--1
4. वएह, पृष्ठ—2
5. वएह, पृष्ठ--46
6. मैथिली नवीन साहित्य, सं. डॉ. बासुकीनाथ झा, पृष्ठ--28
7. वएह, पृष्ठ—28
8. अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा,
9. बुधिबधिया, डॉ. गंगेश गुंजन
10. अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा,
रामाश्रय झा "रामरंग" प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक १ जनवरी २००९ केँ निधन भऽ गेलन्हि। डॊ. गगेेश गुजन मृत्यु पूर्व हुनकासं साक्षात्कार लेने छलाह। प्रस्तुत अछि ओ अमूल्य साक्षात्कार- पहिल बेर विदेहमे।
पं0 रामाश्रय झाक इन्टरव्यू ।
प्रश्ननः1. अपनेक दृष्टि सं विद्यापति गीत-संगीत परंपरा कें कोन रूप मे देखल-बूझल जयवाक चाही? विद्यापति-संगीत परिभाषित कोना कएल जयवाक चाही? एतत्संबंधी कोनो स्वर-लिपि उपलब्ध अछि ?
उत्तर ः हमरा विचार सँ विद्यापतिक अधिकांश गीत पद; भजनबद्धगायन शैली एवं किछु गीत ग्रामीण गीत शैलीक अंतर्गत् बूझल जयवाक चाही। उदाहरण स्वरूप पद-गायन शैली मे-
1. नन्दक नन्दन कदम्बक तरुतर
धिरे धिरे मुरली बजाव ।
2. जय जय भैरवि असुर भयाउनि।
एवं अन्य श्रृंगार रस सँ सम्बन्धित पद। जेना-
क. कामिनी करय असनाने
ख. सुतलि छलौं हम घरवा रे
ग. अम्बर बदन झपाबह गोरी
घ. ससन परस खसु अम्बर रे, इत्यादि ।
टइ तरहक पद व गीत मिथिला प्रदेश मे लगभग 60 व 70 वर्ष सं जे गाओल जाइत अछि एकर धुन अर्धांशस्त्रीय संगीतक अंतर्गत् एवाक चाही। परन्तु अइ पदक जे मिथिला मे गायन शैली छैक ओकर एक अलग स्वरूप छैक। जेकरा प्रादेशिक संगीत कहवाक चाही। जहांतक लोक संगीत तथा ग्रामीण संगीत सं संबंधित विद्यापतिक गीत अछि, जेना-
क. आगे माइ हम नहि आजु रहब एहि आंगन जो। बुढ़ होयता जमाय,
ख. हे भोलानाथ कखन हरब दुख मोर,
ग. उगना रे मोर कतय गेलाह,
घ. आज नाथ एक व्रत मोहि सुख लागत हे, इत्यादि ।
ई गीत सब लोक संगीतक धुनक अंतर्गत गाओल जाइत अछि। यद्यपि अहू लोकधुन मे रागक दर्शन छैक मगर राग शास्त्र केर अभाव छैक। तें हेतु ई सब गीत लोक संगीत शैली मे अयवाक चाही।
उत्तर-1-ए. विद्यापति संगीतक कोनो भिन्न स्वरूप नहि अछि, केवल विद्यापति गीत मिथिला प्रादेशिक संगीत शैलीक अंतर्गत गाओल जाइत अछि। राग आओर ई अर्धांशस्त्रीय एवं धुन प्रधान लोक संगीत राग गारा,राग पीलू, राग काफी, राग देस, राग तिलक कामोद इत्यादि राग सं सम्बन्धित अछि। अभिप्राय ई जे जेना सूर, तुलसी, कबीर इत्यादि संत कविक पद भिन्न-भिन्न तरह सं गाओल जाइत अछि अइसंत कवि सबहक कोनो खास अपन संगीत नहि छैन्हि जे कहल जाय जे ई सूर व तुलसी तथा कबीरक संगीत थीक, एही रूप सं विद्यापति संगीतक रूप मे बुझवाक चाही।
प्रश्नन-2. विद्यापति संगीत-परंपराक विषय मे आइध्रिक स्थिति पर अपनेक की विचार-विश्लेषण अछि ?
उत्तर-2. विद्यापति पदक सम्बन्ध मे हमर ई विचार अछि जे विद्यापतिक पद मैथिली भाषा मे अछि तें हेतु केवल मिथिला प्रदेश मे अइ पदक गायन प्रादेशिक संगीतक माध्यम सं होइत अछि। हॅं, यदा कदा बंगाल प्रदेश मे बंगला कीर्तन मे अवश्य प्रयोग हाइत अछि। कहवाक अभिप्राय ई जे कोनो प्रादेशिक भाषा मे लिखल काव्य केर गुणवत्ताक आकलन ओइ काव्यक श्रृंब्द व साहित्य तथा भाव पर निर्भर करैत छैक। संगीत आकइ काव्य के रसमय एवं सौंदर्यवर्धन करइक हेतु परम आवश्यक तत्व अवश्य थिक परन्तु प्राथमिकता पदक थिकइ। मैथिली भाषा अत्यन्त सुकोमल भाषा अछि एवं अइ मे लालित्य अछि ।आर संगीत सुकोमल भाषा मे अधिक आनन्द दायक होइत छैक।अही हेतु विद्यापति पद संगीतक माध्यम सं मिथिलाक संस्कृति मे विद्वान जन सं ल’ क’ जनसाधारण तकक मानस के प्रभावित क’ क’ अपन एक सुदृढ़ परम्परा बनौने अछि एवं मिथिलावासीक हेतु परिचय पत्र समान अछि। तें हेतु समस्त मैथिल समाजक ई परम कर्तव्य थीक जे अइ अमूल्य धन कें धरोहर जकां जोगा क’ राखी।
प्रश्न-3. विद्यापति-संगीत आओर विद्यापति-गीत कें एकहि संग बूझल जयवाक चाही बा फराक क’? यदि हं तं किएक आ कोना ?
उत्तर : एहि प्रश्नक उत्तर उपरोक्त पहिल तथा दोसर क्रमांक मे लिखल गेल अछि।कृपया देखल जाय।
प्रश्नन-4. विद्यापति-संगीतक प्रतिनिधि गायक रूप मे अपने कें कोन-कोन कलाकार स्मरण छथि आ किएक ?
उत्तर : विद्यापति पदक गायक आइ सं किछु वर्ष पूर्व बहुत नीक नीक छलाह, जेना पंचोभक पं0 रामचन्द्र झा,पंचगछियाक श्री मांगन, तीरथनाथ झा, बलियाक पं0गणेश झा, लगमाक पं0 अवध पाठक, श्री दरबारी ; नटुआ द्ध श्री अनुठिया ; नटुआद्ध पं0 गंगा झा बलवा, श्री बटुक जी, आर पं0 चन्द्रशेखर खांॅ, अमताक पं0 रामचतुर मलिक, पं0 विदुर मलिक, लहटाक पं0 रामस्वरूप झा, खजुराक पं0 मधुसूदन झा एवं नागेश्वर चैधरी, बड़ा गांवक पं0 बालगोविन्द झा, लखनौरक पं0बैद्यनाथ झा इत्यादि। वर्तमान मे जे गायक छथि हुनका सबहक नाम अइ प्रकार छनि-पं0 दिनेश झा पंचोभ, श्री उपेन्द्र यादव, अमताक पं0 अभयनारायण मलिक, पं0 प्रेमकुमार मलिक इत्यादि। उपरोक्त जतेक गायकक हम नाम लिखल अछि ई सब गायक अधिकारपूर्वक विद्यापतिक पद कें गबै वला छलाह एवं वर्तमान मे छथि। कियेक तं ई सब मिथिलावासी छथि। विद्यापति पदक अर्थ भाव पूर्ण रूप सं बूझि क’ तहन प्रश्नकरैत छलाह व वर्तमान मे करैत छथि। तें हेतु ई सब गायक स्मरण करवा योग छथि।
प्रश्नन-5. पं0 रामचतुर मल्लिक, प्रो0 आनन्द मिश्र प्रभृत्ति तं इतिहास उल्लेखनीय छथिहे । किछु अन्यो गायकक नाम अपने कह’ चाहब ?ओना मल्लिकजी तथा आनन्द बाबूक विद्यापति-गीत गायकी मे की किछु विशेष लगैत अछि जे अन्य गायक मे नहि ?
उत्तर ः हम जतेक गायक क नाम लिखल अछि सब अपना-अपना स्तर सं नीक छलाह एवं नीक छथि। विद्यापतिक पद गायन मे राग गायकीक जेना बड़का बड़का आलाप व तान तें गाओल नहि जाइत छैक। विद्यापति पद गायन मे पदक अर्थ भाव ध्यान मे राखि सरसतापूर्वक गाओल जाइत छैक। अइ सम्इन्ध मे एक सं दोसर गायकक तुलना करइक आवश्यकता नहि। तथापि पं0रामचन्द्र झा व श्री मांगनजी तथा पं0 रामचतुर मलिकजी,श्री बटुक जी,पं0 रामस्वरूप् झा,श्री दरबारी इत्यादि गायक बहुत प्रसिद्ध छलाह।
चूंकि प्रोफेसर आनन्द मिश्रजीकें हम कहियो गायन नहि सुनल तथा मिथिलाक गायक पंक्ति मे हुनक नाम हम नहि सुनल तें हेतु हुनका संबंध मे किछु लिखइ सं असमर्थ छी।
प्रश्न-6. विद्यापति-गीत मैथिली लोकगीत ध्रि कोना पहुंचल हेतैक ?एहि विषय मे अपनेक विश्लेषण की अछि?
उत्तर ः विद्यापति गीत मैथिलीक दू तरहक भाषा मे रचल गेल अछि।एकटा मैथिलीक परिष्कृत भाषा
मे रचल गेल अछि जेना-
1.नन्दक नन्दन कदम्बक तरुतर
2.अम्बर बदन झंपावह गोरी
3. उधसल केस कुसुम छिड़िआयल खण्डित अधरे । इत्यादि। अइ तरहक
मैथिलीक परिष्कृत भाषा मे जे गीत छैक से लोकगीत ;ग्रामीण अंचलद्धधरि बहुत कम पहुँचलै।
जे गीत ग्रामीण भाषाक माध्यम सं रचल गेल छैक।जेना-
1. आ गे माइ हम नहि आजु रहब एहि आंगन जं बुढ़ होयता जमाय....
2. हे भोलानाथ कखन हरब दुख मोर
3. जोगिया भंगिया खाइत भेल रंगिया हो भोला बउड़हवा.
4. उगना रे मोर मोरा कतय गेलाह.
इत्यादि।
अइ तरहक जे गीत छैक से लोकगीत;ग्रामीण अंचलद्धधरि अधिक सं अधिक पहुँचलए।एक बात आर ई जे लोकभषाक अधिक समकक्ष छैक तकरा जनाना सब अधिक गबैत छथि। हमरा बुझने विद्यापति गीत कें लोकगीत ;ग्रामीण अंचलद्धधरि पहुँचइके यैह कारण थीक। दोसर बात ई जे अपन मातृभाषा स्वभावतः बहुत प्रिय होइत छैक आर अपना मातृभाषाक माध्यम
सं जे काव्य रचल जाइत छैक आर ओइ मे लालित्य आ आकर्षण छैक तं ओ अपनहि आप विद्वान जन सं ल’ क’जनसाधारण तक प्रचारित भ’ जाइत छैक। आर विद्यापति पद तं लौकिक व पारलौकिक दुनू ृदृष्टिसं अत्यन्त उच्च कोटिक रचल गेल अछि, तथा सब तरहक गीत रचल गेल अछि जेना-भक्ति, भक्ति श्रृंगार, लौकिक श्रृंगार, श्री राधाकृष्णकें विलासक अत्यन्त मधुर गीत, भगवान श्रृंंकरक विवाह सं सम्बंधित जनसाधारण भाषाकके गीत एवं नचारी, समदाउनि,
बटगवनी,तिरहुत इत्यादि तरहक गीतक रचना केने छथि जे लोकरंजनके हेतु उच्चकोटिक एवं गायन के वास्ते बनल छैक। ई तंे बिना प्रयासहिं लोक मानस एवं लोकगीत धरि पहुँचि गेल गेल हेतैक।
प्रश्न-7.विद्यापति पदक मैथिली व्यवहार-गीत मे विलय होयवाक प्रक्रिया अपनेक दृष्टियें कोना आ की रहल हेतैक ?
उत्तर ः हमरा बुझने इहो प्रश्न 6ठमे प्रश्न सं संबंधित अछि। तें ओही पर विचार कएल जाय।
प्रश्न-8. विद्यापतिक पद यदि मिथिलाक सर्वजातीय माने-सभ वर्ग आ समाजक लोक मे स्वीकृत छैक ? तं तकर कारण विद्यापति-पदक साहित्यिक गुण बा ओकर सांगीतिकता छैक आकि एकरा मे निहित कोनो आन तत्व आ विशेषता छैक ?
उत्तर ः विद्यापति पद जे मिथिला समाजक सब वर्ग मे स्वीकृत छैक तकर मुख्य कारण विद्यापति पदक साहित्यिक गुण एवं सांगीतिक गुण दुनू छैक।मिथिला मे कवि विद्यापतिक पहिनहुं तथा बादहु मे बहुत कवि भेलाह मगर जनसाधारण मे तं हुनकर क्यो नाम तक नहि जनैत अछि। परंतु विद्यापति एवं विद्यापति गीत के तं एहेन क्यो अभागल मिथिलावासी हेताह जे नहि जनइत हेताह। विद्यापति पदक प्रचार-प्रसार मे साहित्यिक व संगीतक गुण के अतिरिक्त आन कोनो तत्व व कारणक जे अपने चर्चा कएल अछि, अइ सम्बन्ध मे हम ई कहब जे कवि विद्यापति भगवान के परम भक्त छलाहं हुनका भक्ति सं प्रभावित भ’ क’ भगवान शंकर जिनका घर मे नौकर के काज करैत रहथिन एहेन भक्त कविक कावय मे तं प्रचार-प्रसार हेबाक सब सं महत्वपुर्ण तत्व एवं कारण हुनका आराध्यदेवक कृपा बुझवाक चाही। भगवानक भक्ति सं हुनकर हृदय ओतप्रोत छलन्हि तें ओ अपन काव्य मे लिखैत छथि-
क. बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे ,
ख. हे भोलानाथ ;बाबाद्धकखन हरब दुख मोर , इत्यादि ।
ग. खास क’ भगवान राधाकृष्णक भक्ति व भक्ति-श्ाृंगार रस जे ओ अपना काव्य मे दरसओ
-लन्हि अछि ओ अत्यन्त हृदयस्पशर््ाी तथा संगीतमय अछि।
प्रश्न-9.लोकगीत एवं व्यवहार-गीत मे तत्वतः की-की भेद मानल जयवाक चाही ?
उत्तर ः लोकभाषा एवं लोकधुन मे जे गीत गाओल जाइत छैक तकरा लोकगीत कहल जाइत छैक। आर व्यवहार गीत क जे अपने चर्चा कएल अछि इउ सम्बन्ध मे हमर कहब ई जे एकरा अंतर्गत संगीतक सब शैली आबि जाइत छैक।परंतु हमरा बुझना जाइत अछि जे व्यवहा गीत सं अपनेक अभिप्राय संस्कार गीत सं अछि। हमरा विचार सं लोकगीत एवं व्यवहार गीत दुनू
के लोकसंगीत कहल जाइत छैक, अइ मे कोनो विशेष अंतर नइ छैक।
प्रश्न- 10.विद्यापति-संगीतक वर्तमान जे निश्चिते निराश कयनिहार अतः खेदजनक अछि। अपने कें तकर कारण की सब लगैत अछि ?
जखन कि बंगालक रवीन्द्र-संगीत-कला मे विद्यापति संगीत जकां कोनो प्रकारक पतनोन्मु -खता आइ पर्यन्त देखवा मे नहि अबैत अछि । तकरो कारण की आजुक उपभोक्तावाद, ब्जारवाद भू-मण्डलीकरण मात्रकें मानल जयवाक चाही बा आनो आन ऐतिहासिक, समाजा -आर्थिक परिस्थि ति आ सामाजिक कारण आ परिवर्तन कें ?
उत्तर ःअइ सम्बन्ध मे हम ई कहब जे संपूर्ण भारत मे अपना संस्कृति के छोड़ै मे जतेक मैथिल अगुआयल छथि तेना अन्य कोनो प्रदेश नहि। जे मैथिल मिथिला सं बाहर अन्य प्रदेश मे आबि गेलाहय सब सं पहिने ओ अपन मातृभाषाक प्रति उदासीन भ’ जाइत छथि आ अत्यंत हर्षपूर्वक ई कहैत छथि जे हमरा बच्चा के तं मैथिली बाजहि नहि अबैत छैक। अपना घर मे मैथिली नहि बजैत छथि। जखन अपना मातृभाषाक प्रति एहेन उदासीन छथि तहन अपना संस्कृति सं अपनहि आप दूर भ’ जेताह। अपना मॉं-बा पके डैडी व
मम्मी अन्य के अन्टी व अंकल कहैक रेवाज भ’ गेलै अछि तं हिनका सब सं की आश कयल जाय जे ई अपना संस्कृतिक रक्षा करताह। बंगाली,मद्रासी,पंजाबी,मराठी इत्यादि प्रदेशक लोक सब अपना संस्कृति के एखनहुं धरि संजोय क’ रखने अछि। मगर पश्चिमी सभ्यताक प्रभाव सब सं अधिक मैथिल पर छन्हि ते हेतु मिथिला संस्कृति मे एहेन हानिकारक परिवर्तन देखाय पड़ैत अछि।
प्रश्न-11.अपनेक स्मृति मे कोनो गायकक गायन बा अन्य कोनो संदर्भ हो जेकर वर्णन अपने कर’ चाही? हुनक विषय मे किछु सुनयवाक इच्छा हो।वर्तमान समेत आगां पीढ़ीक लाभ हेतैक। संगहि अपनेक किछु विशेष अभिमत जे देब’-कह’ चाही।
उत्तर ःहम शास्त्रीय संगीतक उपासक छी आर अत्यंत उदासीन भ‘ कहि रहल छी जे अपन मिथिला वर्तमान समय मे शास्त्रीय संगीत सं शून्य भ’ रहल अछि। वर्तमान समय सं पहिने पं0रामचतुर मलिक, पं0 बिदुर मलिक, पं0सियाराम तिवारी,;चूंकि पं0 सियाराम तिवारीक शिक्षा अमता गाम मे भेलन्हि तें हेतु हुनका मैथिल मानइ छियनि। पं0 चन्द्र शेखर खां,पं0 रघू झा, ई सब बहुत उच्च स्तरक गायक छलाह। खास क’क’ पं0 रामचतुर मलिक, व पं0 सियाराम तिवारी तं इतिहासिक गायक छलाह ध्रुवपद शैलीक गायन मे।
भावी पीढ़ीक शिक्षार्थी एवं जिज्ञासु के अइ गायक सबके जानइ के प्रयास व हिनका गायन व कार्यक सम्बंघ मे श्रृंोध करवाक चाही ताकि भावी पीढ़ी लाभान्वित एव धु्रुवपद शैली गायनक विशेषता सं परिचित होथि।
जय मिथिला जय मैथिली, जय जय जानकी अम्ब ।
जेहि रज मे मन्डन भेला, हरलन्हि शिव के दम्भ ।।
आशीष अनचिन्हार-
अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि (आलोचना)
शीर्षक पढैते देरी पाठक लोकनि एकर रचियता के निराशावादी घोषित कए देताह आ फतवा देताह जे समाज के एहन -एहन वकतव्य सँ दूर रहबाक चाही।मुदा हमरा बुझने पाठक लोकनि अगुता गेल छथि,आ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि। मुदा इहो एकटा सुपरिचित तथ्य थिक जे लोक के जतेक उपदेश दिऔक ओ ओतबे तागति सँ ओकर उन्टा काज करत।मुदा तैओ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि आ ता धरि नहि अगुताथि जा धरि शीर्षक पूर्ण वाक्य नहि भए जाए।आब अहाँ सभ टाँग अड़ाएब जे शीर्षक त अपना आप मे पूर्ण छैहे तखन अहाँ एकरा अपूर्ण कोना कहैत छिऐक ? मुदा नहि, कोनो वस्तु बाहर सँ पूर्ण होइतो भीतर सँ अपूर्ण होइत छैक। इहए गप्प एहि शीर्षकक संग छैक। अच्छा आब हम अपन विद्वताक दाबी छोड़ी आ आ अहाँ सभ के पूर्ण वाक्य के दर्शन कराबी - "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि, सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"।
मैथिली साहित्य मे बहुत रास बिडंबना छैक, प्रवंचना छैक, वंदना छैक अर्थात सभ किछु छैक मुदा तीन गोट वस्तु के छोड़ि--
१) मैथिली मे व्यंग प्रचुर मात्रा (गुण एवं परिमाण) मे नहि लिखाइत अछि,
२) जँ झोंक- झाँक मे लिखाइतो छैक त स्तरीय आलोचना नहि होइत छैक ,
३) आ जँ भगवान भरोसे स्तरीय आलोचना अबितो छैक त हरिमोहन झा के शिखर मानि सभ के भुट्टा बना देल जाइत छैक ।
एहि तीन टा के छोड़ि एकटा आर महान बिडंबना छैक जे आलोचक आलोचना करताह फल्लाँ बाबूक अथवा हुनक कृति के मुदा समुच्चा मैथिली अलोचना मे हरिमोहन बाबू तेना ने घोसिआएल रहता जे पाठक एहन आलोचना के हरिमोहने बाबूक आलोचना बूझैत छथि।
आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "ली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि--1) मोमक नाक (कथा संग्रह)
2) धूकल केरा (कथा संग्रह)
3) लगाम (नाटक)
4) वचन वैष्णव (नाटक)
5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक।
आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । इ शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मतलब जे भविष्यक संकेत कए गेल छथि।
आब किछु गप्प करी मैथली व्यंग मे राजनीतिक व्यंग पर। कोन चिड़ियाक नाम छैक राजनीतिक व्यंगइ हमरा जनैत मैथिली व्यंगकार नहि जनैत छथि। ओना व्यंग केकरा कहल जाइत छैक सेहो बूझब कठिन। हमरा जनैत मैथिली मे 93% व्यंग लिखल जाइत छैक मुदा 93% आलोचक ओकरा हास्य मानि आलोचना करैत छथि। सभ व्यंगकार ओहीक मारल छथि, चाहे शिखर-पुरुष हरिमोहन बाबू होथि वा रुपकांत ठाकुर। सुच्चा व्यंग लिखला पछातिओ हरिमोहन बाबू कहेलाह हास्य-व्यंग सम्राट। अर्थात हास्यकार पहिने आ व्यंगकार बाद मे। बाद बाँकी 7% हास्य लिखाइत अछि जकर प्रतिनिधि छथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" ।
हँ त फेर आबी हम राजनीतिक व्यंग पर। हमरा जनैत जाहि व्यंग मे अपन समकालीन अथवा पूर्वकालिक राजनीति, शासन-व्यवस्था, ओकर संचालक आदि पर निशाना साधल गेल हो ओकरा राजनीतिक व्यंग कहाल जाइए। ओना इ अकादमिक परिभाषा नहि अछि।
त फेर हम अहाँ सभ के रुपकांत ठाकुर लग लए चली, आ हुनक एक गोट पोथीक परिचय करा हुनक राजनीतिक चेतना के देखाबी। जाहि पोथी सँ हम अहाँ के परिचय कराएब ओकर नाम छैक "मोमक नाक"। एहि व्यंग-संग्रह मे नौ गोट कथा थिक। परिचय शुरु करेबा सँ पहिनहि कहि दी जे इ कोनो जरुरी नहि छैक जे हम अहाँ के नओ कथा कहब आ ने जरूरी छैक जे संग्रहक पहिल कथा सँ हम शुरू करी। इ निर्णय हमर व्यत्तिगत अछि आ अहाँ एहि सँ सहमत भइओ सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। हँ त हम शुरू करी संग्रहक अंतिम कथा "मर्द माने की" सँ। जेना की शीर्षके सँ बुझाइत छैक लेखक अवस्स एहि मे मर्दक परिभाषा देने हेथिन्ह। से सत्ते, लेखक जखन शुरुए मे कहैत छथिन्ह जे " लोटा ल' क' घरवालीक लहटगर देह पर गदागद ढोल बजौनिहार एहन सुपुरुष कत' भेटत?"। त सभ अर्थ स्पष्ट भए जाइत छैक। मुदा लेखक एतबे सँ संतुष्ट नहि भए आगू कहैत छथि " मर्द माने कमौआ, आ कमौआ माने वियाहल,आ वियाहल माने बुड़िबक आ बुड़िबक माने बड़द"। सुच्चा मैथिल अभिव्यत्ति। एखनो अर्थात 2009 धरि मैथिल समाजक इ धारणा छैक जे कमौए मर्द होइत अछि, आ जहाँ कहीं कोनो मर्द देखाइ पड़ल लोक ओकर विआह करबाइए कए छोरैए। आ जहाँ धरि गप्प रहल बियाहल माने बुड़िबक से त हम नहि कहब मुदा बुड़िबक माने बड़द अवश्य होइत छैक। खाली खटनाइ सँ मतलब। अधिकारक प्रति निरपेक्ष। आब हम एहि सँ बेसी नहि कहब एहि कथाक प्रसंग। बस एतबे सँ लेखकक चेतनाक अनुमान कए लिअ।
"ठोकल ठक्क" मे लेखक ओहन भातिज आ जमाएक दर्शन कराबैत छथि जनिकर काजे छन्हि कमीशन खाएब आ एहि लेल ओ अपन पित्ती एवं ससुरो के नहि छोड़ैत छथिन्ह। आ जँ एही कथाक माध्यमे अहाँ तात्कालीन रजनीतिक देखए चाहब त रुपकांत एना देखेताह-"सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"। अर्थात बेशर्म, निर्लज्ज, हेहर,थेथर सरकार।
भारतक समकालीन विकास जँ अहाँ देखबाक इच्छा होइत हो त रुपकांत ओहो देखेताह। कनेक पढ़ू "जय गंगा जी" जतए रेलगाड़ी के बढैत देखि लेखक टिप्पणी करैत छथि-"कांग्रेसी नेता जकाँ लोक के अपन पेट मे राखि क' ओकर सुख-दुख अथवा उन्नति-अवनति के बिसरि गाड़ी मात्र आगू बढब जनैत छल। अपना बले नहि कोइला आ पानिक बलें। परन्तु पवदान पर चढ़ल यात्री कतऽ छलाह?" ई सवाल जतेक भयावह लेखकक समय मे छल ततबे भयावह एखनो अछि। लेखक सरकारक डपोरशंखी योजनाक लतखुर्दन एही कथा मे करैत छथि-" कोन टीसन केखन बितलैक से मोन राखब पंचवर्षीय योजना सभ मे उन्नतिक कागजी आकड़ा मोन राखब थिक"।
बेसी प्रशंसात्मक उद्धरण देब हमरा अभीष्ट नहि मुदा तैओ एकटा उद्धरण देबा सँ हम अपना के रोकि नहि पाबि रहल छी। एही संग्रहक दोसर कथा थिक "फूजल ऊक"।बेसी अपन वक्तव्य नहि कहि उद्धरण सुनाबी-"मात्र सुधारवादी दृष्टि रखला मात्र सँ सुधार कथमपि नहि भए सकैछ"। जँ लेखकक भावना के बचबैत हम लिखी जे "प्रगतिशील विचार लिखला मात्र सँ प्रगतिशीलता कथमपि नहि आबि सकैछ" त इ स्पष्ट भए जाएत जे रुपकांत कतए व्यंग कए रहल छथिन्ह आ केकरा पर कए रहल छथिन्ह।
ठाकुर जी एकपक्षीय व्यंगकार नहि छथि। ओ दूनू पक्ष के हूट सँ मानसिक आ बूट सँ शारिरिक प्रताड़ाना दैत छथिन्ह। तकर प्रमाण ओ एहि संग्रहक पहिल कथा जे पोथीक नामो छैक अर्थात " मोमक नाक" मे देखेलैन्ह अछि। हुनकहिं शब्द मे " आजुक युग मे भला आदमीक परिभाषा उनटि गेल छैक। जनता जनता अछि जे से सभ मोमक नाक जकाँ लुजबुज। जखन जाहि दिस नफगर रहै छैक तिम्हरे लोक घूमि जाइछ" स्वतंत्रे भारत नहि हमरा विचारे जम्बूदीपक जनता सँ लए कए एखुनका भारतीय जनताक चारित्रिक विशेषता ई उद्धरण देखबैत अछि। आ एतेक देखेलाक पछातिओ आलोचक रुपकांतक नाम बिसरि गेल छथि।
भने आलोचक नाम बिसरि गेलखिन्ह मुदा पाठकक मोन मे एखनो धरि रुपकांत ठाकुरक रचना खचित छैन्ह। हमरा जनैत कोनो प्रथम आ अंतिम सफलता इएह छैक। आ रुपकांत इ सफलता अपन रचनाक माध्यमें प्राप्त केलन्हि ताहि मे संदेह नहि।
विदेह
मैथिली साहित्य आन्दोलन
(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु
विदेह २७ म अंक ०१ फरबरी २००९ (वर्ष २ मास १४ अंक २७)-part-i
एहि अंकमे विशेष:-
रामाश्रय झा "रामरंग" प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक १ जनवरी २००९ केँ निधन भऽ गेलन्हि। डॉ. गंगेश गुंजन मृत्युपूर्व हुनकासँ साक्षात्कार लेने छलाह। प्रस्तुत अछि ओ अमूल्य साक्षात्कार- पहिल बेर विदेहमे।
एहि अंकमे अछि:-
१.संपादकीय संदेश
२.गद्य
२.१. १. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता - कुमार मनोज कश्यप (कथा)
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल (आगाँ)
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी (आगाँ)
२.४. मैथिली भाषाक साहित्यी- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)
२.५.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी (आगाँ)अंक 1 दृश्य : 3
२.६. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.७. डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा -आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या
२.८. रामाश्रय झा "रामरंग" सँ डॉ. गंगेश गुंजन द्वारा लेल गेल साक्षात्कार
२.९. विवेचना: आशीष अनचिन्हार
३.पद्य
३.१.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (नवम खेप)
३.२. गजेन्द्र ठाकुर- 15 टा पद्य
३.३. सतीश चन्द्र झा- दू टा कविता
३.४.ज्योति- पनभरनी
३.५. पंकज पराशर - सत्तनजीब
३.६. मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल- बी.के कर्ण
४. मिथिला कला-संगीत- हृदयनारायण झा
५-मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी
६-लेखन - पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]
७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( तिरहुता आ देवनागरी दुनू लिपिमे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Tirhuta and Devanagari versions both ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक तिरहुता आ देवनागरी दुनू रूपमे
Videha e journal's all old issues in Tirhuta and Devanagari versions
१.संपादकीय
मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा गणतंत्र दिवसक अवसरपर कविता महोत्सवक आयोजन कएल गेल। मैथिलीमे रमण कुमार सिंह, सारंग कुमार, रवीन्द्र लाल दास, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कामिनी कामायनी आ गंगेश गुंजन जीक काव्य-पाठ भेल। मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा मैथिलीमे विद्यापति सम्मान आ भोजपुरीमे भिखारी ठाकुर सम्मान एक-एकटा, जे प्रत्येक 51-51 हजार टाकाक सम्मान राशिक होएत, साहित्यकार/ कलाकार/ संस्कृतिकर्मीकेँ देल जाएत। अकादमी द्वारा मैथिली आ भोजपुरीमे अलग-अलग पत्रिकाक सेहो प्रकाशन होएत जाहिमे कथा, कविता, लेख, निबन्ध, समीक्षा आ सर्जनात्मक टिप्पणी प्रकाशित कएल जाएत।
मैलोरंग सेमीनारमे सुभाषचन्द्र यादवजी फील्डवर्कक आधारपर लोककथा लिखबाक आग्रह कएने छलाह कारण अपन दादी-मैयाँसँ सुनल कथा क्षेत्रमे पसरल कथाक विभिन्न स्वरूपकेँ ग्रहण करबामे सक्षम नहि होइत अछि। विदेह द्वारा एहि सम्बन्धमे काज शुरू भ' गेल अछि आ शीघ्र एकर परिणाम ई-पत्रिकामे देखबामे आएत।
संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० जनवरी २००८) ७३ देशक ७११ ठामसँ १,४६,१६१ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in
२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल।
(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
२.गद्य
२.१. १. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता - कुमार मनोज कश्यप (कथा)
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल (आगाँ)
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी (आगाँ)
२.४. मैथिली भाषाक साहित्यी- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)
२.५.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी (आगाँ)अंक 1 दृश्य : 3
२.६. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.७. डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा -आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या
२.८. रामाश्रय झा "रामरंग" सँ डॉ. गंगेश गुंजन द्वारा लेल गेल साक्षात्कार
२.९. विवेचना: आशीष अनचिन्हार
१. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता - कुमार मनोज कश्यप
चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।
कबाछु
ओ बेंच पर बैसल ट्रेनक प्रतीक्षा करैत रहय ।
'शी-इ-इ।’ वला सिसकारी सुनिते ओकर छाती धक सिन उठलैक । बिन देखनहि ओकरा बुझा गेलैक, चम्पीवला आबि रहल छैक । आबिते नून—लस्सा जकाँ सटि जेतैक ।
चाहे अहाँ केहनो परिस्थितिमे रहू, ओ आबिते अहाँक हाथ या कनहा धऽ लेत। ओकर एहि चालि पर ओकरा खौंत नेस दैत छैक । एक दिन ओ बिख सनक बात कहि देने रहै । ओ तइयो अपन चालि नहि छोड़लकै ।
ई बुझितो जे चम्पीवला आबि रहल छैक ओ मटियेने रहल । पत्रिका पर आँखि गड़ौने सोचलक जे व्यस्त आ उदासीन देखि कऽ ओ चल जायत । लेकिन नहि । ओ आबि कऽ सोझा मे ठाढ़ भऽ गेलैक आ सिसकारी पाड़लकै--- 'शी-इ-इ !
आब अनठेनाइ असंभव छलै । ओ मूड़ी उठा कऽ चम्पीवला दिस तकलकै । चम्पीवला पुरान यार जकाँ रभसल दृष्टिएँ ताकि रहल छलैक आ नजरि मिलते नि:संकोच हाथ धऽ लेलकैक ।
बेंच पर ओकर दुनू कात संभ्रान्त आ परिचित व्य क्ति सभ बैसल रहैक । एहन अवस्थाआ में चम्पीचवलाक धृष्टपता बहुत अशोभनीय आ फूहड़ छलैक। चम्पीवला पर ओकरा बड्ड तामस उठलैक ।
'की कऽ रहल छेँ ?’— ओ टिरसलै ।
चम्पीवला कोनो परवाह नहि केलकै आ ओ जे टांग पर टांग चढ़ेने बैसल रहय तकरा अलग करबाक जेना आदेश दैत जाँघ पर हाथ राखि देलकै । देहकेँ ढील छोड़ि देने चम्पी करबामे ओकरा सुविधा होइतैक । 'बेहूदा नहितन !’ – जाँघ पर राखल चम्पीवलाक हाथकेँ जेना ओ काछि कऽ फेकलकै ।
ओकर एहि व्यवहारसँ चम्पीवला हतप्रभ नहि भेलै, बल्कि ढीठ जकाँ कहलकै—'एक बेर छूबल देहकेँ फेर छूबऽ मे कथीक संकोच ?'
चम्पीवला बहुत पैघ बात कहि देने रहैक जे साँच तऽ रहैक, किन्तु ओहिसँ ओ लजा आ खौंझा गेल । ओकरा बुझेलै जेना ओ स्त्री हो आ ई चम्पीवला ओकर पुरान यार । चम्पी आ मालिश करायब ओकरा बहुत अश्लीब बुझेलै ।
'देखै नहि छिही, कतेक गरमी छैक !’— चम्पीवलाक बातमे जे धार छलैक तकरा भोथरेबाक लेल ओ एकटा बहाना बनेलक ।
'हँ ठीके, गरमी तऽ बहुत छैक ।’— अपन निराशाकेँ नुकेबाक लेल चम्पीवला बजलै ।
चम्पीवलाक चलि गेला पर ओ अवग्रहसँ छूटल, मुदा चम्पीवलाक दीनताक लेल ओकरा अफसोस भेलैक । ठाम-कुठाम आ समय- कुसमय वला महीन समझ जँ चम्पीवला मे रहितिऐक तऽ एहनो गरमी मे ओ चम्पी करा सकैत रहय । लेकिन एहन बुधि सँ ओकर पेट नहि चलतैक ।
ओ एहिना फेर कहियो गाड़ीमे या स्टेशन पर भेटि जेतैक आ सिसकारी पाड़ि कऽ चम्पी करेबाक इशारा करतैक—शी-इ-इ ! जेना पटेबाक लेल कोनो छौंड़ा कोनो छौंड़ीकेँ कनखी मारैत हो । ई सोचिते चम्पीवलाक प्रति ओकर वितृष्णा बढ़ि गेलैक ।
लघुकथा-
कुमार मनोज कश्यप ।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।
विवसता
अपन जन्मभूमि के प््राति मोह ककरा नहिं होईत छैक? जाहि धरा पर पहिल बेर पायर राखल, जकर धूरा-माटि मे खेल-खेल कऽ समर्थ भेलंहु, तकरा प््राति लगाव तऽ स्वभाविके आछ। अपन राज्यक सीमा मे प््रावेश कईयो कऽ गाम नहिं जाई से ने हमर मोन मानत आ ने गाम-परिवारक लोक। अहु बेर सरकारी यात्रा सँ मुस्किल सँ पलखति पाबि रातियो भरि लेल गाम जेबाक विचार कय बिदा भऽ गेलंहु बस धरबाक लेल। भोरे आपसे एबाक छल, तैं कोनो समान लऽ जेबाक दरकारे नहिं।
सभ गामक चौक पर अहाँ के ओहन रिक्सावला भेट जायत जे चौक सँ बस लग-पासक गामक सवारी उठबैत आछ - आर कतहुँ नहिं जायत ओ - कतबो बेगरता होऊक लोक कें। चौक पर बस रुकिते ओ सभ रिक्सा लऽ कऽ तेना दौड़ैत आछ सवारी लेवाक हेतु जेना कोनो तिर्थ-स्थानक पण्डा। जकरा सवरी भेटि गेलैक से विजयी आ आन सभ हारल - मुदा पेᆬर सँ आगला प््रातियोगिता लेल डाँड़ बन्हने।
कैकटा रिक्सावला हमरो पाछु दौड़ल, मुदा आई हमरा पायरे जेबाक मोन भऽ रहल छल, तैं मना कऽ देलियई। समान कोनो छलैहे नहिं आ साँझक सोहाओन मौसम, कियैक नहिं आनंद लेल जाय एकर। सभ सँ पैघ बात जे गामक एहि चिर-परिचित धुरियायल रस्ता पर चलि कऽ एक बेर पेᆬर हम अपन बितल दिन मोन पाड़ऽ चाहि रहल छलंहु। आततक स्मरण बड़ मनभावन भेल करैत छैक।
सड़क पार कय हम चलऽ लगलंहु गामक ओहि रस्ता पर जे कहियो बड़ आत्मीय छल हमर। किछु आभास भेला पर पाछाँ तकलंहु - एकटा रिक्सवला निरीह भावें रिक्सा लऽ कऽ चल अबैत हमरा पाछाँ। लऽग आबि बाजल -'' हाकीम! तऽ नहिंये करबै रिक्सा? जे मोन हुअय से दऽ देब खुशी सँ, मुदा बैस जाऊ हमर रिक्सा पर।'' हम कहलियै - ''बेकार मे हमरा पाछाँ नहिं पड़, आई हमरा पायरे जेबाक ईच्छा भऽ रहल आछ । घुरि जो तों।'' रिक्सावला के आँखि मरल माँछ जेना थिर भऽ गेलै हमरा उपर। कल्पैत स्वर मे बाजल- ''ऐं यौ हाकिम! अंहु सन हाकिम-हुक्काम जँ पयरे चलऽ लगतै, तऽ हमरा सभ गरीब-गुरबा अपन परिवारक पेट कोना पोसतै?''
हमर पैर एकाएक थमकि गेल। बिना किछु बजने हम बैसि गेलंहु ओकर रिक्सा पर।
वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्टीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि।
बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल
“ की होइतैक ? ओतयसँ तान्त्रिक धड़फड़ाइत सोझेँ राजदरबार गेलाह, राजाकेँ सम्पूणर्ण वृतान्त सुनोलन्हि । आ’ फेर तखन तान्त्रिकेक सलाहपर एहि खधियाक उत्खननक निर्णय भेल रहैक । ओहिमे महाभारत कालक योद्धासभक शरीरक कोनो हाड़ भेटतैक की से सोचि उ पाँच हजार जन छौ महीनातक एकरा खनिते रहि गेलैक । बहुतो हाड़खोर भेटलैक । सभकेँ गङ्गाजीमे अनुष्ठानपूर्वक प्रवाहित कयल गेल — जेना फुलाक बिर्सजन होइत छैक । तहियासँ ई खधिया उत्खननक कारणेँ एहन बड़का पोखरिक रुपमे परिणत भऽ गेल । किएक तऽ एहिमे बहुतो हाड़खोर भेटल रहैक तैं एकर नाम बादमे हड़ाहा पोखरि भऽ गलैक । ”
अत्यन्त उत्क ण्ठासँ हमर स्वर सुखा गेल छल — “ तखन ? ”
मोदिआइन बाजलि — “ इहए छैक अहि पोखरिक कथा । आब अहाँ खा पी कऽ सुतू । थाकल छी । ”
थाकल तऽ हम ठीके रही । भरि दिनक शहर प्रदक्षिणाक कारणेँ शरीर गलिकय क्लान्त भऽ गेल छल । थकानक कारणेँ बीच–बीचमे आँखि सेहो निन्नसँ मुना जाइत छल, मुदा मलाहिनक कथे एहन छलैक जे बेर–बेर उताहुल आ’ उत्तेजित कऽ दैत छल । ततबेमे सन्याेहो समाप्त कऽ मिसरजी दोकानमे प्रवेश कयलन्हि आ’ मोदिआइनकेँ कहलखिन्ह — “ मोदिआइन, बौआकेँ बढ़ियाँसँ खुआ–पिआकय सुता देबन्हि । हम ओम्हरे खा लेब । राति अबेर कऽ फिरब । दू स्टेयशन आगाँधरि जएबाक अछि । गाड़ी सेहो आबक समय भऽ गेल छैक । तैं हम आब जाइत छी । ”
हम दौड़िकय हुनका लग पहुँच गेलहुँ आ’ जीद्द करय लगलहुँ — “ हमहुँ जायब । ”
मिसरजी एहिबेर कहुना तैयार नहि भेलाह । मोदिआइन सेहो समझओलकि — “ कहाँ जायब थाकल–ठेहिआयल शरीर लऽ कऽ रातिमे । चारि–पाँच घण्टाभमे मिसरजी चलिये अओताह । चलू, खा कऽ सुतू । भाँटाक तरुआ बना दैत छी, दूध आ’ भात खा लियऽ । ”
मिसरजी स्टेरशनदिसि बिदा भऽ गेलाह । मोदिआइन चुल्हिमे बैसिकय भाँटा तड़य लागलि । भितरका कोठरीमे मोदी बैसल खोंखि रहल छल । हम कनेक काल एकसरे चौकीपर बैसल अन्हामरमे डूबल दड़िभङ्गा शहरकेँ देखैत रहलहुँ । बीच–बीचमे सोझे मलाहिन ठाढ़ भऽ जाइत छलि । हम सोचय लगलहुँ अखन रातुक एहि निस्तब्ध अन्हा रमे जे पोखरि हेरायल विलीन अछि तकरे एक कातमे ओ बैसति छलि हएत अही दोकानक घराड़ी लग कतहु उ हम चौकीपर बहुत कालधरि नहि बैसि सकलहुँ । ससरिकय चुल्हिदिसि मोदिआइनलग पहुँचि गेलहुँ । मोदिआइन बाजलि — “ बौआ, भूख लागि गेल ? बैसू उ आब लगचिया गेलैक, कनेक्के देरी अछि । तुरत्ते सभ किछु तैयार भऽ जायत । ”
हम कहलिऐक — “ मोदिआइन, महाभारत कालक लोक कहुँ एतेक दिन तक जिअत ? साँचे रहैक ओ मलाहिन ?”
ओ बाजलि — “ किया नहि जीअत ? प्रेतात्माोक रुपमे जुगजुगान्तरतक जिबैत अछि लोक । अपन प्रियजनसभक लगमे रहय चाहैत अछि । कोनो ने कोनो पिआस, कोनो ने कोनो पूरा होमयसँ बाँकी कामना भीतरी आकांक्षा ओकरासभकेँ अमर जकाँ मृत्यु्लोकमे दृश्य–अदृश्य राखि घुमा रहल रहैत छैक । ”
हम धड़फड़ाकय पुछि बैसलिऐक — “ तऽ अखनो होयतैक ओ मौगी ?”
मोदिआइन तरकारी नीचा उतारैत बाजलि — “ होयतैक उ लिय, अहाँ खाऊ”
ओ उठिकय पीढ़ी अनलकि आ’ हमरा बैसयलेल देलकि । एकदम नया स्थान आ’ परिवेशमे अपरिचितसनक महिलाद्वारा देल गेल दूध, भात, गुड़ आ’ भाँटाक तरुआ खाइत हमरा किछु कोनादन आ’ असहज जकाँ लागल । असगरपन अनुभव भेल । घर मोन पड़ि गेल । माय–बाबु, भाय–बहिन सभ केओ याद आबि गेलथि । अखनतक तऽ सभ केओ खा कऽ सुति रहल होयताह । नहि जानि, मिसरजी कखन घुरताह ? आ’ कत्तहु नहि अयलाह तखन ? हमर मोन घबड़ाय लागल । हमरा सुतय लेल एकगोट कम्म लपर नील रङ्गक चद्दरि मोदिआइन ओछा देने छलि । एकटा मैल तकिया ओहिपर रखैति ओ चौकीये परसँ हमरादिसि तकलकि आ’ बाजलि — “ बौआ, खाउ ने उ किया ने खाइ छी ? जल्दी–जल्दी खाउ । भरिपेट खायब । याऽ देखू, ओछाओन ओछा देलहुँ अछि । अहाँक सुतयलेल ।”
हम जल्दीये खा कऽ उठि गेलहुँ आ’ हाथ धो कऽ ओछाओनपर पड़ि रहलहुँ । मोदिआइन भाडा़–वर्त्तन माँजि आङ्गनमे गोलियाकय राखि देलकि । तकराबाद ओ एकगोट डिबिया लेसिकय चुल्हि लग राखि देलकि आ’ लालटेनकेँ मिझा देलकि । आब ओहिठाम चुल्हि लगक एकगोट धुआँ उगलैत लाल धधड़ाबला डिबियाक क्षीण प्रकाश मात्रहिं रहैक । बाहर निर्जन निस्तब्ध रात्रि आ’ असंख्य कीरासभक तीख महींन आवाज व्या प्तब छलैक । मोेदिआइन एकबेर कोठरीमे चारुभर घुमिकय देखलकि । शायद सभ किछु ओकरा ठीकेठाक लगलैक । ओ बाजलि — “ हँ, तऽ आब सुतू । डर तऽ नहि लागत ने, बौआ ?”
हम भीतरसँ साहस बटोरिकय कहुना मुड़ी हिलबैत कहलिऐक — “ नहि, हमरा डर नहि लागत “
जाइत–जाइत ओ फेर बाजलि — “ हम सटले भीतुरका कोठरीमे छी । जरुरी बुझायत तऽ मोदिआइन कहि कऽ सोर करब । ठीक छ़ै ?”
ओकरा जाइते जेना राति आओर निस्तब्ध भऽ गेल होइक ।
डिबियाक लाल शिखा कखनो–कखनो हिलि जाइक तऽ कोठरीमे सभ किछु — सम्पूीर्ण छाँहसभ सेहो हिलय लगैक । भीतपरक छाँहसभ, ढ़कियाक, मोटरीक, लाठीक, बोराक छाँहसभ कखनो–कखनो दहिन–बाम करैक, हिलोरि मारिकय झुलैक तऽ कखनो एक्के ठाम थर्थराय लगैक । डिबियाक बाती कखनो चट–चट कऽ कऽ चरचराइक तथा बातीक मुँहपर कारी गिरह बनि जाइक । खाली धुआँक मोटगर रासि चारुदिसि चढ़ैत उठैत रहैक । धीरे–धीरे हमरा मोनमे डरक सञ्चाबर होमय लागल । एना एकसर हम कहियो नहि सुतल रही । मलाहिनक खिस्सा ओहिना स्पैष्ट– देखाय लागल । हमर हृदय डरसँ काँपय लागल । देहक सभ रोइयाँ काँट जकाँ ठाढ़ भऽ गेल । तखने लागल जेना बाहरक निस्तब्धता भङ्ग भऽ गेलैक आ’ पानिमे केओ छपाकसँ कुदलैक । हमरा बड्ड डर भऽ गेल आ’ हम जोड़सँ चिचिअयलहुँ — “ मिसरजी ऽऽऽ उ”
मोदिआइन भीतरेसँ पुछलकि — “ की भेल, बौआऽऽऽ ़ “
हम कहलिऐक — “ हड़ाहा पोखरिमे केओ छपाकसँ कुदलैक अछि । ”
ओ हमरा अन्ठाेकय सुतक लेल कहैति बाजलि — “ सुतू, सुतू । पानिमे माछ कुदलैक अछि “
मोदी एकभरसँ खोंखि रहल छल । बुझाइत छलैक जेना ओ अखने मरिये जयतैक । मोदिआइन नहि जानि कथी बाजलि आ’ मोदीक छातीपर मालिस करय लागलि । मोदी घेघिआइत बजलैक — “ ओह उ बाप रे उ एहिसँ तऽ मरियो जइतहुँ ऽऽऽ । ”
मोदिआइन कनेक पिताइत कहलकैकि — “ मोदी उ रातिमे ई की अमङ्गल बात बजैत छह । मालिससँ तोरा दम फुुलनाई कम भऽ जयतह । कहुना सुति रहह । ”
कनेक कालक बाद भीतर कोठरीक हलचल शान्त भऽ गेलैक । अन्ततः ओसभ शायद सुति रहल छल । मोदीक साँस भारी आ’ घेघिआइत चलि रहल छलैक । रातुक भयावह निस्तब्धता, डिबियाक प्रकाशक छोट घेराक बाहर चारुतरफकेर अन्हाआर गुजगुज परिवेश, निशाचरी कीरासभक तीख आ’ महींन ध्वानिक गुञ्जरन तथा एम्हेर–ओम्हरर हिलैत, डोलैत आ’ थर–थर करैत छाँहसभ । हम फेर भयभीत होमय लगलहुँ । मस्तिष्कमे बेरि–बेरि उत्पन्न होइत मलाहिनक प्रेतात्माजक कल्पनाक चित्रसँ हमर दम फुलय लागल । दिनभरिक बौअइनीक कारणेँ शरीर ओहिना थाकल आ’ मलीन छल, आँखि भारी छल, झपलाइत छलहुँ मुदा डरसँ निन्न भऽ नहि रहल छल । आँखि लगिते कनेक सपना जकाँ देखाइत छल आ’ फेर डरसँ िन्ान्न टुटि जाइत छल । जागलोमे आ’ सपनोमे एकहि रङ्गक डराओन आकारसभ आगाँ ठाढ भऽ जाइत छल । हम फेर एकबेर जोड़सँ डेराकऽ चिचियाऽ उठलहुँ — “ मिसरजी ऽऽऽ “
मोदिआइन ‘ की भेल ? की भेल ? ’ कहैत दौड़लि आयलि । मोदी खोंखिते रहय । मोदिआइन बाजलि — “ बौआकेँ डर लागि गेलन्हि । बेचारा उ अच्छाे कोनो बात नहि, हम अहीं लग बैसैति छी । ”
मोदिआइनक हमरालग अबिते हमर डर आब पूरे हेरा गेल छल । निन्न धीरे–धीरे जाँतय लागल छल कि मोदिआइन पुछलकि — “ बौआ, खिस्सा सुनक मोन करैत अछि ? सुनब तऽ सुनाऊ”
हम हुलसिकऽ कहलिऐक — “ सुनाउ ने, मोदिआइन “
मोदिआइन कथा सुनाबय लागलि । जेना कि ओकर आदत रहैक ओ एक्के सुरमे बजैति चलि जाइति छलि । हमरा बुझाय लागल जेना दूरसँ ककरो स्वर लगातार हमर कानमे पड़ि रहल होय । डर हेराऽ गेल छल तैं आब घरक भीतपरक हिलैत–डोलैत छाँहसभ खेल आ’ कौतुक जकाँ लागय लागल छल । दिनभरिक परिश्रम रग–रगमे निन्नक सञ्चायर कऽ रहल छल । हडा़हामे बीच–बीचमे छप–छप सेहोे होइत रहलैक जे हमरा दूरसँ अबैत पृष्ठपभूमिक आवाज जकाँ लगैत रहल । स्टेशनपरक भिनसुरका कोलाहल, हुलिमालिक दृश्य, लालदरबार, हथिसार, आ’ शहरक अन्यान्य दृश्यसभ हमर थाकल मस्तिष्कसँ रङ्ग जकाँ धोआइत मलीन्ा होबय लागल । बीच–बीचमे हम औंघाइयो जाइत छलहुँ । सपनामे चित्रसभ एकटापर दोसर–तेसर अबैत पड़ैत देखाय लगैत छल । आ’ अही बीचमे मोदिआइन निरन्तर अपन सुरमे हमरा खिस्सा सुना रहलि छलि । ओकर स्वरमे सम्मो–हन छलैक । बिहारिक पश्चात् जेना बर्षाक बुन्नसभ खसैत रमणगर लगैत रहैत छैक ठीक तहिना हमर कानमे ओकर कोमल महीन आवाज टप्टप् कऽ पड़ि रहल छलैक । ओ कहैति गेलि — “ बहुत पहिनेक गप्पत थिक । बहुतो पहिनेक ऽऽ भारतबर्षमे हस्तिनापुर नामक एकगोट बड़ीटा राज्यक राजधानी रहैक । ओतक राजा रहथि धृतराष्ट्रग — बूढ आ’ आन्हर उ आन्हर रहथि तैं गद्दीपर नहि बैसि सकलाह । परिणामस्वरुप राजा बनक प्र्रश्नकपर हुनक बेटा आ’ भातिजसभमे कलह मचि गेलन्हि । धृतराष्ट्ररक रानी गान्धाहरी अत्यन्त पतिव्रता रहथिन्ह । जहिना हुनक पति अपन आँखिसँ विश्वपक सुन्दर रचना देखयमे असमर्थ रहथिन्ह तहिना ओहो अपन आँखिक उपयोग नहिये करब उचित बुझलन्हि आ’ तैं सदैवक हेतु अपनोेेे आँखिमे पट्टी बान्हि लेलन्हि । हुनका एक सय बेटा भेलन्हि जे बादमे धृतराष्ट्र क पट्टी कौरव कहायल । जेठकाक नाम रहन्हि दुर्योधन । धृतराष्ट्रआक पाँचटा भातिज । सभसँ जेठ रहथिन्ह युधिष्ठिनर । ई पाँचो भाईँ पाण्डटव कहयलाह । बेटा आ’ भतिजामे राजक लेल कलह बहुत बढ़ि गेलाक कारणेँ धृतराष्ट्र् बूढ़–पुरानसभसँ सरसलाह कऽ भतिजासभक हेतु अलगे राज छुटियाकऽ दोसर राजधानीक बना देलखिन्ह, इन्द्रप्रस्थण “
“ हस्तिनापुरसँ उत्तर–पूूर्व खाण्डहवप्रस्थ् जङ्गलकेँ फाँड़िकऽ इन्द्रप्रस्थ–क स्थापना कयल गेल छल । ओहिसँ पहिने खाण्ड वप्रस्थ क जङ्गलमे विभिन्न जातिसभ अपन–अपन वस्तीणमे निवास करैत छल । ओहीमे बहुतो ठाम आर्य परिवारसभक वस्तीुसभ सेहो रहैक । इन्द्रप्रस्थनक स्थापनामे ई सभ वस्तीतसभ उजड़ि गेल । जङ्गलक आदिवासीसभ तऽ उत्तरभर भीतर आओर घनगर जङ्गलमे चलि गेल मुदा नया नगरक स्थापनासँ खेती–पाती कऽ कऽ बसल परिवारसभ बहुत कठिन परिस्थितिमे फँसि गेल । घरदुआर उजड़ि गेलैक । उजड़ल बेघर परिवारसभमे एकगोट क्षत्रिय परिवार सेहो रहैक । ओहि परिवारमे एकगोट बालिका छलि जकर नाम जकर नाम जकर नाम अच्छाप, राखि लियऽ रहैक नारी उ नारी माने बुझैत छिऐक , बौआ ?”
“ हम किया ने बुझबैक, नारीक अर्थ छिऐक — मौगी “
मोदिआइन बाजलि — “ हँऽऽ , नारी माने हमरे सनक मौगी उ बौआ, अहाँ तऽ बहुतो बुझैत जनैत छिऐक “
बड्ड संतोष भेल । मोदिआइनक प्रशंसा हमरा प्रफुल्लिित कऽ देलक । आँखि निन्नसँ भारी भऽ गेल छल । घरोमे मायसभ सुतय कालमे एहने खिस्सासभ कहैत रहय आ’ सुनिते–सुनिते हम निन्न पड़ि जाइत रही । अखनो हमरा घरे जकाँ नीक लागि रहल छल । जेना हम घरेमे खिस्सा सुनि रहल होइ । साँचे कही तऽ हमरा लागल जेना इएह कथा हमर माय हमरा कहियो सुनोने रहय । हमरामे आऽलादक निसा चढ़ैत चलि गेल, एकगोट अवर्णनीय आनन्दहमे सन्हियाइत चलि गेलहुँ । हम सभ किछु बिसरि गेलहुँ, खाली मोदिआइनक कोमल कण्ठेचटाक आवाज आ’ ओहि आवाजद्वारा चित्रित भऽ रहल कथाक दृश्यसभ मात्रहिं हमर चेतनामे बाँकी रहि गेल ।
“ नारी तहिया एकगोट छोटि नग्निआका बालिका छलि । इन्द्रप्रस्थ केँ राजधानी बनाबयलेल असंख्यम लोकसभ ओतय आबय लगलैक । भीड़ बढ़य लगलैक । रातिदिन एक कऽ काज आगाँ बढ़ैत गेलैक । धीरे–धीरे नम्हकर–नम्हेर विशाल भवनसभ ठाढ़ होमय लागल । फुलवारी–वाटिकासभ लगाओल सजाओल गेल । मूर्त्तिकारसभ सुन्द्र आ’ नीक–नीक आकर्षक मूर्त्तिसभ गढ़ि–गढ़ि कऽ विभिन्न स्थानसभपर ठाढ़ कयलन्हि । इन्द्रप्रस्थगक शोभा आ’ सुन्दररता इन्द्रपुरीकेँ सेहो मात करय लागल । नव निर्मित नगरमे नव–नव वस्त्रापभूषणधारीसभ आबिकय रहय लगलाह । गान–बाजानसँ नगर बजार रमणीय भऽ गेल । बहुतो हाथी, घोड़ा, सजल–बजल बड़का–बड़का रथसभ आयल । अस्त्रय–शस्र्ाजसँ सुसज्जित वीर रक्षकीसभ सेहो आयलि । बालिका नारी विस्मिसत भए आँखि फारि–फारिकय एहि सभ विराट परिवर्त्तनकेँ निहारति रहलि । सड़कपर नाङ्गटि कुदैति, अपनेसनक अन्य बाल–बालिकासभक हुलिमे एतएसँ ओतय दौड़ैति नयाँ–नयाँ चमत्कािरिक दृश्यसभक ओ अवलोकन करैति गिेल । मुदा ओकर माय–बापक स्थिति किछु भिन्न रहैक । ओसभ अत्यन्त दुखित रहथि । घर–घराड़ी सभ किछुक हरण भऽ गेल छलन्हि । नगर स्थापनाक क्रममे बहुतो लोक जन–मजूरीमे लागि गेल रहय आ’ कतेक दोसर पेशाकेँ अङ्गीकार कऽ नेने रहय । बहुतो महिलासभ गणिका वृतिमे चलि गेलि छलि ़ पेट तऽ कहुना येनकेन प्रकारेण पोसा जाइत रहैक मुदा अपन स्वतन्त्रन खेती–पातीमे लागि आयल ओतक पूर्वनिवासी खेतिहर वृतिबलासभ अत्यन्त दुखित आ’ क्षुब्ध छल । तथापि नियतिकेँ स्वीकारब छोड़ि दोसर कोनो उपाय बाँकी नहि रहैक ।
एक दिन अभूतपूर्व शोभा–सिन्दूधरक आयोजन भेलैक आ’ पाण्डडवसभ नगरमे प्रवेश कयलथि । ओही दिन ओसभ गृहप्रवेश सेहो कयलन्हि उ बड्ड हुलि, बड्ड लोक — बड्ड विशाल आयोजन रहैक उ अनेकन् यज्ञ भेल, ब्राऽमण आ’ पुरोहितसभ उच्चह कण्ठरसँ वेदक पाठ कयलन्हि ़ अस्त्र –शस्त्र क प्रदर्शन भेलैक । उपस्थित सैनिक आ’ नागरिकलोकनि पाडण्वओसभक जयजयकार कयलखिन्ह । यज्ञ–धूमसँ आच्छा्दित आकाश बड़ी कालधरि जयध्वतनिसँ प्रकम्पिउत होइत रहल । बालिका नारी अत्यन्त कौतुकमय भऽ उत्सुजकतासँ एहि सम्पूकर्ण आयोजन आ’ प्रदर्शनक अवलोकन कएलकि । ओ देखलकि जे पाण्डथवसभ अत्यन्त सुन्दनर रहथि आ’ द्रौपदीक रुपक वर्णन तऽ सम्भूवे नहि छल । ओहुना हरेक घरमे पहिनहिंसँ एकर चर्चा रहैक । बालिका नारी छलि तऽ बड्ड छोटि मुदा तैयो ओ भाँपि गेलि जे पाँच प्रतापी युद्ध–कुशल पुरुष–रत्नँसभक सिम्ा्ब लित प्रेमपात्री हएबाक कारणेँ द्रौेपदीक नाक, भृकुटि आ’ ग्रीवा गर्वसँ चढ़लि छलैक ।
पाण्ड वसभ इन्द्रप्रस्थदसँ दिनानुदिन अपन विस्ताएर होइत बढ़ैत राज्यपर शासन करय लगलाह । इन्द्रप्रस्था धीरे–धीरे एकगोट राजधानीक अपेक्षित गति धऽ लेलक । ओतक नागरिकसभ अपन–अपन वृति आ’ काजमे लागि गेल । नहुँए–नहुँए नगरक नूतनता समाप्त होमय लगलैक । विस्थापित भऽ गेल परिवारसभ सेहो एक–एक कऽ अपनाकेँ स्थापित करैत स्थायी नागरिकक रुपमे परिणत होइत गेल । ओहोसभ क्रमशः पूर्ण रुपेण नागरिकताक नव स्वरुपकेँ ग्रहण करय लागल छल । नारी बालिकासँ नम्हनर होइत गेलि । डाँड़मे डराडोरि लऽ कऽ वस्त्र खण्डि बान्हय लागलि ।
एम्होर हस्तिनापुरक दुयोर्धनक दरबार आ’ इन्द्रप्र्रस्थिक युधिष्ठि रक दरबारमे भीतरे–भीतर नित्यप्रति प्रतिस्प–र्धा बढ़िते चलि गेलैक । दुयोर्धनकेँ पाण्ड्वक उन्नति असह्य होमय लगलन्हि ़ ओम्ह्र पाण्डथव सेहो प्रतिरक्षाक तैयारीमे जुटि गेलाह । दुनूूमे युद्धे तऽ शुरु नहि भऽ गेलैक मुदा सामरिक तैयारीसभ होमय लागल ़ हस्तिनापुर आ’ इन्द्रप्रस्थडक बीचमे एकप्रकारसँ शीतयुद्धक वातावरण बनि गेलैक । देखाबयलेल उपरसँ दुनू औपचारिकतामे नीके सम्बहन्धन रखने रहथि । दुनू परिवार सामाजिक एवम् धार्मिक अनुष्ठानसभ पारिवारिक रुपमे सम्मिपलित भऽ कऽ सम्प न्न करथि मुदा तरेतर दिनानुदिन बैर–भाव बढ़िते गेलन्हि । दुनू दिसक बूढ़–पुरानसभ एकरा शान्त करक अनेकन् प्रयत्नल कयलथि मुदा सफल केओ नहि भऽ सकलाह ।
(अगिला अंकमे)
उपन्यास- चमेली रानी
जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर।
चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
पुजारीजीक जबाब सुनि दरोगा अइँठल मोछ केँ औरो अइँठलक, फेर अपनासंग आयल सिपाही केँ ताकीत केलक–”कृपलबा! तुम सावधानी से इन दो लोगन पर नजर रख। हम अंदर चेकीन करता हूँ।”
दरोगा मंदिरक पाछाँ बनल खोपरी दिस बिदा भेल। कृपलबा नामक सिपाही ससरि क’ पुजारीजी लग आयल। पुजारीजीक आगाँ थार मे राखल पेड़ा पर ओकर आँखि जेना गरि गेलैक। ओ ओहीठाम बैसि रहल, बाजल–”ई सरौं, अपनो मरिहें औरो हमरो जान खतम करिहें। पुजारी बाबा, थार मे की बा? बड़ा गम गम करेला।”
पुजारीजी स्वामी दिस ताकैत छलाह। दुनू केँ आँखिक भाषा मे गप भ’ रहल छल। सिपाहीक प्रश्न सुनि पुजारीजी हड़बड़ाइत पटिया पर बैसि गेलाह आ कहलनि–”परसाद थिकै सिपाहीजी। भोग लगाउ।”
पुजारी जी दूटा पेड़ा कृपलबा नामक सिपाहीक हाथ मे राखि देलथिन आ कान केँ दरोगाक गतिविधि पर पथने चुप भ’ रहलाह। हुनक माथ पर चिन्ताक सिकुरन स्पष्ट झलकै छल।
दरोगा पहिले दुनू खोपड़ी केँ बाहर घुमि जाँच-पड़ताल केलक। मूड़ि नमरा क’ चारू कातक हाव-भाव के निहारलक। फेर आयल ओहि कोठलीक दरबजा लग जाहि मे काके आ मैना छलीह।
दरोगा सटायल केबाड़ केँ भराम दए खोलि भीतर ढुकि गेल। अन्दर काके आ मैना कोन अवस्था मे छलीह, दरोगा की देखलक से दरोगा जानए। मुदा, दरोगा चिचियाति आ बफारि कटैत बाहर आयल आओर पलटनिया दैत पुजारीजी लग पहुँच गेल। हँफैत बाजल–”हे पुजारी बाबा, ई मंदिर बानु? ई भगवान का फ्लेट बानु? अन्दर कोन खेल होत बा। हम जे देखली, राम राम, आब अहाँ से का कहीं। हमार त’ नजरिए झौआ गेल बा।”
गर्मी आ उमस पराकाष्ठा पर छलै। दरोगाक शरीर मोट आ भारी-भरकम। ओ काके आ मैनाबला कोठली सँ भगैत आयल छल। ओकर सम्पूर्ण देह पसीना सँ लथपथ छलै।
पुजारीजी फेर हाथ जोड़ैत बजला–”सरकार, कोठली मे हमर बालक आ हुनकर कनिआँ। हमर बालक बिआहो ने करैत छल। कतेक परतारने त’ अहि बेर शुद्धक समय मे दिल्ली सँ एलाह। हुनकर बिआहक त’ दसो दिन ने भेलनि। कहू त’ अहाँ की कर’ भीतर गेलौं? छिया, छिया।”
–”अरे, हमनी का करब? हमनी के ड~यूटी बड़ा बेढंगा बा।” कहैत दरोगाबैसक उपक्रम कर’ लागल। ओ पहिने एक हाथ रोपलनि, फेर दोसर हाथ रोपि, देहक बैलेन्स ठीक केलनि। तखन लूद द’ बैसि गेलाह।
पुजारीजी अन्दाज केलनि जे दरोगाक वजन तीन, साढ़े तीन मन सँ कम नहि हेतैक।
कृपलबा दुनू पेड़ा केँ मुँह मे ठुसि नेने छल। पेड़ाक साइज बेस पैघ छलै। ओ कहुना क’ पेड़ा घोंटबाक प्रयास क’ रहल छल।
दरोगा पटिया पर बसैत देरी पेड़ाबला थार केँ दुनू आँंखिये निहार’ लागल। ओ बाजल–”पेड़ा बानु?”
–”हँ सरकार! अहीं सभहक लेल बाबाक परसाद थिक। भोग लगबियौ।”
कहैत पुजारीजी पेड़ाक थार घुसका क’ दरोगाक आगाँ मे क’ देलथिन।
–”सुगन्धी त’ बड़ा नीमन बा। गाय का दूध मे बनल ह’ तो?”
–”हँ सरकार! सामने देखिऔक मुसहर टोली। सदाय भाइ सभ महादेवक भक्त। सभहक दूरा पर मुलतानी गाय। तखन दूधक कौन कमी। खाक’ देखल जाए।”
दरोगा एकटा पेड़ा मुँह मे देलक–”वाह! वाह!! पुजारीबाबा। सबाद बड़ा अच्छा बा। बहुत दिनन के बाद अइसन पेड़ा खाई के मौका मिललबा।”
दरोगा थारक सभटा पेड़ा उदरस्त क’ लेलक। पेड़ा मे पुष्ट सँ नवका भांग मिलाओल रहैक। पुजारीक देल पानि सेहो दरोगा पीब गेल। तखने पुजारीजी पुछलथिन–”हाकिम, ई नट-नटिन बला की मजरा थिकै?”
दरोगा पहिने पूरा मुँह बाबि ढेकार केलक। फेर बाजल–”आब रौआ से का छिपायब। वायरलेस पर अरजेन्ट खबरि आयल बा। ओ नट-नटिन बड़का डकैत। कोनो मारवाड़ी के लाखो टाका का जेबर गहना लेके भागल बा। सोंचली, सरौं के पकड़ब त’ आधा माल डकार जायब, आधा माल जमा करब। के सार बुझिहेंए? बहुत दिन हो गेइल, कोनो बड़का माल हाथ नहिखे आईलबा।”
पुजारीजी मोने-मोन बजला–‘बस एक घड़ी आओर। भांग जखन भिजतौक तखन नट-नटिन केँ तकिहेंए रे सार।’
दरोगाक माथ सुन्द होबए लगलै। ओ डपोरशंख जकाँ चुपे एककात देख’ लागल। किछु काल पहिले काके आ मैनाबला दृश्य ओकर मानस पटल पर थिड़क’ लागल। ओकरा अपन बियाहक गप मोन पड़’ लगलै। जखन ओ पहिल बेर अपन कनिआँक मुँह देखलक–कारी, उठल आ मोटका थूथून। Åपरका दाँत निचला ठोरकेँ छपने, डिग्गासन पितरिया आँखि। ओकरा जिनगी सँ विरक्त भ’ गेलैक। ओ संन्यास लेबा लेल तैयार भ’ गेल।
मुदा, एखन जे दृश्य देखलक। वाह! छौकड़ी राधा रानी त’ छौकड़ा किसन-कन्हैया। मन केँ हर्षित क’ देलक।
रंग त’ अनलक नवका भांग। किछुए कालक बाद भिसिण्ड तोंदबला दरोगा पटिया पर चित पड़ल नाक सँ डिगडिगिया बजा रहल छल। थोड़बे हटल कृपलबा बीड़ी मुँह मे दबने बेहोश पड़ल, मोंछ के चिबा रहल छल।
ई सब कार्य पूर्ण अनुशासित आ पटुताक संग होशियार व्यक्तिक देख-रेख मे भ’ रहल छल। कनेक आओर सांझ जकाँ भेलै त’ कतहु सँ पाँच युवक आ पाँच युवती, कुल दस, कमरियाबला पिअरका वस्त्रा पहिरने कामर केँ कन्हा पर उठौने आयल। आगन्तुक युवक-युवतीक उमेर काके आ मैनाबला छलै। सब तहिना चुस्त-दुरुस्त आ शांत।
तुरंते पुजारीजी, स्वामीजी, काके एवं मैना कमरियाबला ड्रेस मे आ कामर केँ उठौने तैयार होइत गेलाह। डालरबला दुनू बोरा केँ छोट-छोट मोटरी बना क’ सब कमरियाक कामौर मे लटका देल गेलै। सब वस्तु ल’ क’ कमरिया टोली मे जोर सँ हुंकार देलक पाछाँ कमरियाक टोली ओहि मंदिर सँ प्रस्थान केलक। मंदिर मे रहि गेला फोंफ कटैत दरोगा आ टिटहीबसंत सिपाही कृपलबा।
कमरियाक टोली भरि राति चलैत रहल। टोलीक नेतृत्व केनिहार आ पुजारी बनल अमृतलाल। अमृतलाल जाहि जाति या संप्रदायक प्रतिनिधित्व करै छल ओ पुस्त दर पुस्त सँ चोरि विद्या मे पारगंत होइ छल। अमृतलाल भुखन सिंहक खास पियादा रहए। ओ चतुर आ भुखन सिंहक विश्वासी मातहत छल। कठिन अवसर पर भुखन सिंह अमृतलाल केँ खास किस्मक काज करक लेल नियुक्त करै छलाह। प्रस्तुत अभियान मे अमृतलाल अपन निपुणताक सहज परिचय द’ रहल छल।
अमृतलाल केँ ओहि इलाकाक पूर्ण ज्ञान छलैक। ताहि कारणे कमरियाक टोली कोनो गाँव वा शहर मे प्रवेश नहि केलक। बाघ-बोन, गाछी-बिरछी, मरचरही, धारक कछेर होइत भोरहवा मे निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचल। ओतए सभ तरहक इन्तजाम छलैक। भरि दिनक विश्रामक बाद कमरियाक टोली फेर दोसर राति अमृतलालक नेतृत्व मे चलैत रहल आ भोर होइत चमेलीरानीक अड्डा पर पहँुचि गेल।
स्वामीजी सभटा डालर सुरक्षित अर्जुन केँ सुपुर्द क’ चमेलीरानी सँ भेंटकरबाक उद्देश्य सँ बिदा भेलाह। रस्ते मे हुनका चमेलीरानी सँ भेंट भ’ गेलनि।
चमेलीरानी झुकिक’ दुनू हाथ जोड़ि स्वामीजी केँ प्रणाम केलनि आ कहलनि–”बज्जर काका, ददू अहाँ के अबिलम्ब बजौलनि अछि।”
ददू अर्थात~ भुखन सिंह, चमेलीरानीक धर्म-पिता। स्वामीजी अर्थात~ बज्जर कका भुखन सिंहक दाहिना हाथ। चमेलीरानीक आग्रह पर भुखन सिंह ठाकुर नांगटनाथ सिंह नामक अभियान मे बजz नाथ केँ पठौने छलाह।
चमेलीरानी बज्जर कका केँ बड़ आदर करैत छलि। सदिखन हिन्दी आ अँग्रेजी बाजैवाली चमेलीरानी भुखन सिंह, बज्जर कका एवं औरो पैघ हस्ती लग मैथिलीए टा बजैत छलीह। चमेलीरानीक व्यवहार मे नम्रता आ कोमलता बज्जर कका केँ बड़ सोहाइत छलनि।
बज्जर कका चमेलीरानीक प्रणामक प्रतिउत्तर मे हाथ उठा क’ आशीर्वाद देलनि आ कहलनि–”काके आ मैनाक संग काज करबा मे नीक लागल। फेर कहिओ हुनका संगे कोनो अभियान मे जेबा मे हमरा प्रसन्दता होयत। सब ठीक बिटिया, हम अबिलम्ब बिदा भ’ रहल छी।”
बज्जर ककाक प्रस्थानक बाद चमेलीरानी ओतए पहुँचली जतए काके आ मैना कमरियाबला ड्रेस मे चुपचाप मूड़ी गारने बैसल छलीह। किछु दिन पूर्व हुनका दुनू संगे बड़ पैघ अत्याचार भेल छलनि तकर वृत्तांत सेहो सुनि ली।
ठाकुर नांगटनाथ सिंहक अभियानक पहिने चमेलीरानीक संसार मे बहुत किछु परिवर्तन भेल छलै। पछिला ट्रेन डकैतीक बाद हुनक जे अर्जुन संगे वार्तालाप भेल छलै से हमरा ज्ञात अछि। तकर बादे चमेलीरानी खास किस्मक निर्णय लेलनि। ओ अर्जुन सँ विवाह केलनि। बिआहक अवसर पर कीर्तमुखक पाँचो बेटा उपस्थित छल। ओहि पाँचोंक समक्ष चमेलीरानी अपन योजनाक स्पष्टीकरण केलनि। सभहक विचार मे मेल-मिलाप भेलै। सब मिलि क’ सभहक सहयोगे कार्य करबाक हेतु तत्पर होइत गेलाह।
कलकत्ता आ मदzास सँ दूटा स्पेशल जपानी ट्रेनर केँ आनल गेल। अहि ट्रेनर केँ पैघ तनखाह आ सब तरहक सुविधा उपलब्ध कराओल गेल। आधुनिक युगक सब आधुनिक उपकरण आनल गेलै। खास स्थान पर ओइ दुनू जपानी ट्रेनरक देख-रेख मे अत्यधिक कठिन आ परिश्रमबला ट्रेनिंग आरंभ भेलै। ट्रेनिंग लेनिहार छल कीर्तमुखक पाँचो बेटा आ चमेलीरानी। ट्रेनिंग छह मास तक चलल। पाँचो भाइ अर्थात~ युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुलवा आ सहदेवा संगे चमेलीरानी अपनशरीर एवं मनक पूर्ण तैयारी केलनि जे अगिला योजना केँ क्रियान्वित करबा लेल जरूरी छलै।
अही छह मासक भीतरे पाँच सुरक्षित स्थानक चयन भेल। प्रत्येक स्थान मे दू बीघा जमीन कीनल गेल। फेर ओकर तैयारी कएल गेलै। करीब एक सय छात्रा-छात्राा केँ रहबाक लेल अलग-अलग हाWस्टल, व्यायामशाला, सुन्दर मैदान इत्यादिक संगे भवन पाँचों ट्रेनिंग कैम्प केँ लेल बनाओल गेल। पाँचो ट्रेनिंग कैम्प केँ नवीनतम उपकरणक संगे कम्प्यूटरीकरण कयल गेल। सम्पूर्ण प्रान्त मे चोरि, डकैती, रंगबाजी, अपहरण, गुटबाजी आदिक गृह-उद्योग पसरल छल। अत: पाँचो ट्रेनिंग सेन्टरक हेतु पाँच सय युवक-युवती केँ ताकए मे कोनो अरचन नहि भेलै। युवक-युवतीक चयन मे अति सावधानी राखल गेलै। सबहक उमेर चौदह सँ बीस वर्षक अन्दरे रहै तकर ध्यान राखल गेल।
आब ओहि पाँचो कैम्पक उद्देश्य, कार्यक्रम आ अपन प्रान्तक लेल समर्पण इत्यादिक बखान आगाँ कयल जायत। सम्प्रति काके अर्थात~ सहदेवा एवं मैनाक संग भेल अत्याचार केँ स्पष्ट करी।
सहदेवा जाहि कैम्पक इनचार्ज छल ओहि मे मैना ट्रेनिंग ल’ रहल छलीह। ओही ठाम दुनू केँ नैन-मटक्का भेलै। एकर सूचना तत्काल चमेलीरानी केँ देल गेल।
चमेलीरानी अबिलम्ब दुनूक बियाहक तिथि निश्चित केलनि। फलाँ तारीख क’ सहदेव वल्द कीर्तमुख निवासी मिरचैयाक मैना वल्द बेनाम निवासी अनामकक बियाह होयत। सभ केँ हकार, सभ केँ स्वागत।
पैघ मंडप बनल। सजाबट, खेबा-पिबाक नीक इन्तजाम, पाँच सयक लगभग गेस्ट। बियाह भेल। सहदेव आ मैना सभकेँ प्रणाम करैत आ आशीर्वादक मोटरी उठबैत कोहबर दिस प्रस्थान केनहिए छल कि नांगटनाथ बला योजनाक सूचना आयल–”सूटकेस बैंकाक से चलने वाला है।”
योजना मास पूर्वे बनि चुकल छलै। ओहि मे सहदेव केँ काके बनि क’ तथा मैना केँ भाग लेबाक छलैक। अस्तु, कोहबर मे जेबा लेल तैयार ओ दुनू बज्जरकका संग निर्मली पहुँच गेल। भेलै ने अत्याचार?
चमेलीरानीक इशारा पाबि सहदेव आ मैना हुनक सोझा मे आबि ठार भ’ गेल। हे भगवान! अब कोन हुकुमनामा चमेलीरानी सुनौती से नहि जानि।
चमेलीरानीक ठोर पर मृदुल हँसी। ओ हुकुम देलखिन–”अहाँ दुनू हमर कोठली मे जाउ। ओतए सब किछुक इन्तजाम छै। एक मास धरि अहाँ दुनू ओहिकोठली मे निवास करी से हमर आदेश।”
सहदेव चुपे रहला। मुदा, मैना दबले मगर देखार, खिखिया उठली। ओ दुनू चमेलीक स्पेशल कक्ष मे प्रवेश केलनि।
(अगिला अंकमे)
डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।
कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
मैथिली भाषाक साहित्य२
मैथिली भाषाक अधिकांश साहितय मानक मैथिली मे उपलब्ध३ अछि जकरा ‘साहित्यिक भाषा’, ‘साधुभाषा अथवा शिष्टा भाषा’ सेहो कहल जाइत अछि। अधिकांश समयधरि ई एकमात्र साहित्यिक अभिव्य’क्ति क भाषा छन जाहि आधार पर एकरा ‘मानक मैथिली’ कहल जाइत अछि। ई दरभंगा आमघुबनी जिला मे बाजल जाइत अछि। ‘दक्षिणी मानक मैथिली’ समस्तीइपुर, बेगूसराय, खगडिया, सहरसा, मेधपुरा आ सुपौल जिला आदि मे बाजल जाइत अछि। एहि मे मानक मैथिली सँ किछु अन्तमर अछि। पूर्वी मैथिली पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, करिहार आदि जिला क केन्द्रीनय आर पश्चिमी भाग मे अशिक्षित वर्ग सभ मे चलैत अछि तथा महानन्दाा सँ पूव सेहो हिन्दू लोकति बजैत छथि जतय मुसलमान मुख्य त: बाडव्लाा बजैत अछि। छिकाछिकी बोली गंगाक दक्षिण भाग मे बाजल जाइत अछि। एहि मे खगडिया आ बेगूसराय जिला क पूर्वी भाग, बॉंका जिलाक पश्चिम भाग केँ छोडि क’ संथाल परगनाक उत्तजरी आ पश्चिमी भाग मे बाजल जाइत अछि। पश्चिमी मैथिली मुजफफरपुर, पूर्वी चम्पा’रण आ पश्चिमी चाचारण जिलाक पूर्वी भाग मे बाजल जाइछ। चम्पा।रण आ उत्तलर मुजफफरपुर क बोली भोजपुरी सँ प्रभावित अछि। जोलही बोली दरभंगा जिलाक अधिकांश इस्लाम धर्मविलम्बीफ अपन पडोसी हिन्दूप क भाषा मैथिली बजैत अछि, मुदा ओकर बोली थोडे क विकृत आर अरबी-फारसी शब्दीऍं ूिज्ञित रहैत अछि।
वर्तमान समय मे मैथिलीक दू उपभाषाक नव नामकरण आ नवजागरण भेल अछि जाहि मे प्रथम थिक अंगिका अद्वितीय थिक बज्जिका। अंगिका भाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पूर्वी मैथिली कहल अछि आ डा. सरजार्ज अब्राहम ग्रियर्सन छिकाछीकी गॅवारी कहलनि।एकर क्षेत्र भागलपुर, गोडा आ देवधर तथा संथाल परगना मानल जाइत अछि। बज्जिका ओहि उपभाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पश्चिमी मैथिली कहलहुँ अछि। ई नामकरण बज्जी। आलिच्छिवी क इतिहास क आधार पर कयल गेल अछि, किन्तु आधुनिक परिप्रेक्ष्यन मे एहि जातिक नामनिशान नहि भेटैत अछि।
मैथिली व्याककरणक अपन निजी विशेषता अछि। एकर विशिष्टआताक प्रसंग मे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ‘लिग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया (खण्ड -5, भाग-2) (1902), ‘एन इण्ट्रोगडक्शलन टू द मैथिली लैंग्वे ज ऑफ नौश विहार (1800) तथा ‘सेभन ग्रामर्स ऑफ द डायलेक्ट्से एण्डस सब डायलेक्टय ऑफ द विहारी लैंग्वेकज (1883) मे विस्ता रपूर्वक विचार क’ ई प्रमाणित क’ देलनि अछि जे ई विश्ष्टिता अन्य भारतीय भाषादि मे नहि उपलब्धस भ’ रहल अछि। मैथिली व्याककरण मे सर्वनामक तीन रूप प्रयुक्मज होइत अछि-‘अपने’, ‘अहॉं’ आ ‘तों’ वा मोरा, मुदा बाडव्लाय मे दू ‘आपनी’ आ ‘भूमि’ वा ‘तुइ’ आ हिन्दी मे सेहो दूइए रूप प्रयुक्तग होइत अछि ‘आप’ आ ‘तुम’। मात्र भषा-शास्त्रमक दृष्टिऍं सँ नहि, प्रत्युफत व्या‘करण आ शब्दा वलीक विभन्न ताहि आ विशेषतादि कारणेँ नहि, अन्य‘ भाषा-भाषी लोकतिक द्वारा सरलता सँ बुझबाक कारणेँ नहि, प्रतयुत अपन एक स्वेतन्त्रि साहित्यिक आ सांस्कृातिक परम्पीरा हैबाक कारणेँ मैथिली भाषाक स्व तन्त्रत अस्तित्व‘ अछि। मैथिली भाषा आ व्यााकरणक सम्ब न्धस मे अनेक कार्य भेल अछि। ओहुना संस्कृथत आ अंग्रेजी व्या्करणक आधार मानिक’ मैथिली मे छोट-पैध अनेक व्या करण लिखल गेल अछि, मुदा महावैयाकरण दीनबन्धु् झा (1878-1955) क ‘मिथिला भाषा विद्योतन’ (1945) क ऐतिहासिक महत्वव अछि जकरा सूत्र-शैली मे ओ लिख लनि जे संस्कृ त-प्राकृतक श्रेष्ठय व्याककरणादि सँ तुलना कयल जा सकैछ। एहि व्या करण केँ आधार मानिक’ गोविन्दल झा (1923) ‘लघुविद्योतन’ (1963) आ ‘उच्चजतर मैथिली व्यासकरण’ (1979) क रचना कयलनि। हिनक अन्यं कृति मे ‘मैथिलीक उद्गम ओ विकास’ (1968) आ ‘मैथिली भाषा’ (1909-2000) ‘द फारमेशन ऑफ मैथिली लैग्वे ज (1960) सर्वाधिक उल्ले6खनीय कार्य कयलनि अदछ।
अन्यल स्वितन्त्रा साहित्यिक भाषाक समान मैथिली भाषाक अपन स्वकतन्त्रस प्राचीन लिपि थिक जकरा ‘तिरहुता’ वा ‘मिथिलाक्षर’ वा मैथिलाक्षर’ वा ‘मैथिली लिपि’ कहल जाइत अछि। तिरहुता नाससँ ज्ञात होडत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक अछि जकर विकास ‘तीरमुक्तस’ वा ‘तिर्हुत’ नामक व्यजवहार हैबाक बाद पूर्णत: प्राप्तफ कयल गेल अछि। बौद्ध ग्रन्थत ‘ललित-विस्तमर’ मे एहि लिपि केँ ‘वैदेही लिपि’ क नाम पर अभिहिस कयल गेल अछि। घुमा क’ लिखनिहार पूर्वी वर्णमाला साक्षात बाडव्लीत असमिया, मैथिली आ ओडिया लिपिक स्रोत थिक। वस्तुुत: मिथिलांचल मे उपलब्धा प्राचीन संस्कृलत ग्रन्थि एही लिपि मे उपलब्ध अछि जकरा बाडव्लास, असमिया आ ओडियाक पण्डित लोकति केँ पढबा मे सुविधा होइत छवि। पटना सँ प्रकाशित ‘मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास’ (1960-61) मे अनेक किस्मक मे एहि लिपिक तात्विक अघ्यियन प्रस्तुोत कयलनि, किन्तुफ दुर्योग रहल जे पुज्ञतकाकार प्रकाशित नहि भ’ सकल। एहि दिशा मे राजेश्वमर झा (1923-1977) ‘मिथिरलाक्षरक उद्भव आ विकास (1971) लिखिक’ एकर ऐतिहाकिसकता, प्राचीनता, शास्त्री यता प्रमाणित कयलनि अछि जे भाषा-पैश्राानिक दृष्टिसँ एकर सर्वातिशायी महत्व थिक। उनैसम शमाब्दी(क मल्य,चरि ई लिपि जीवित छल, मुदा वर्तमान सन्दषर्भ मे एकरा लोक बिसरि गेल अछि आ ओकरा स्थैन पर देवनागरी लिपि व्यिवहार कयल जाय लागल अछि।
मैथिली साहित्यह क इतिहासकार लोकति एकरा सामान्यएत: तीन काल आदिकाल, मघ्यिकाल आ आधुनिककाल मे विभक्तह क’ अघ्यएयन कयलनि अछि। किन्तु ओंकर समय सीमाक निर्धारण से इतिहासकार लोकति मे मनैक्य क सर्वथा अभाव अछि। इतिहास-लेखनक आधार-भूत प्रक्रियाकेँ घ्याीन मे रासिक’ एकरा निम्नास्थव काल खण्ड् मे विभाजित करब श्रेयस्कसर प्रतीत होइत अछि:
i. आदिकाल 800 ई. सँ 1350 ई. धरि।
ii. मघ्याकाल 1351 ई. सँ 1857 ई. धरि।
iii. आधुनिक काल
i. ब्रिटिशकाल 1857 ई. सँ 1947 ई. धरि।
ii. स्वाटतन्त्र योत्त.र काल 1947 सँ अर्द्यपर्यन्ता।
सन् 1857 ई. का सिपाही विद्रोहक पश्चा त् मैथिली साहितय मे आधुनिक कालक सूत्रपात मानल जा सकैछ। ई विशाल मुगल साम्राज्याक अन्तिम वर्ष थिक। मुगल शासनक अवसानोपरान्तम ब्रिटिश शासन काल मे जाहि सामाजिक चेतनाक उदय भेल ओहि मे सन् 1857 ई. पश्चापत् क्षिप्रताअबैत अछि। एहि सामाजिक चेतनाक प्रतिनिधित्वन नवीन शिक्षित बुद्धि जीवी वर्ग कयलक ले एक भाग अपन प्राचीन संस्कृपति क सुरक्षाक प्रति उत्सुिकतिा देखौलक आ दोसर भाग युग क आलोकक स्वा्गत कयलक। एहि सांस्कृ तिक अनुष्ठाकन मे भारतीय भाषादिक विकास भेल आ ओकर साहित्या सम्पकन्न आ समृद्ध होइत अछि।
पश्चिमी शिक्षक प्रचार, रेल-तारक व्यवहार, रचायत शासनक व्यकवस्था मुद्रण कलाक आविष्काेर आ सामाजिक चेतनाक प्रभाव साहित्यभ पर पडल आ ओ स्ढत परम्पनरादिकेॅा तोडि क’ नव दिशाक दिस चलि पडल। मैथिली साहित्यपक इतिहास मे नव-युगक निर्माण मे कमीश्पहर चन्दाा झा (1831-1907) आ पण्डित लालदास (1856-19) अवदान सर्वाधिक महत्व-पूर्ण अछि। हुनक राजनीतिक.सामाजिक रचनादिक आधार पर अनुमान कयल जा सकैछ जे सन् 1857 ई. क पश्चारत् परिवर्तित परिस्थितिक सहल प्रक्रिया छल। वस्तु त: चन्दा झा आ लालदास मैथिली साहितय मे नवयुग अनबा मे समर्थ भेलहि। अपन गद् रचनादि द्वारा ओ लोकति आधुनिकता क द्वार खोललनि। फेर जहिना-जहिना मिथिलान्चरल से नव आलोक पसरल साहितय सेहो नव-नूतन किसलयक संग पल्ललवित भेल।
सर्वप्रथम तँ ओ रहस्यलवादी गीत एवं कवितादिक थिक जकर अन्वेषण नेपाल मे तथा प्रकाशन बंगाल मे भेल। एकर रचयिता सिद्ध लोकति छथि। एहि सिद्ध लोकतिक सम्ब न्ध बौद्ध लोकतिक महायान शाखाऍं छलनि। एहि रचना-संग्रहक नाम ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ देल गेल अछि। सन् 1323 बंगाब्दन अर्थात् सन् 1916 ई. मे महामहोपाघ्यादय डा. हरप्रसाद शास्त्री (1853-1931) सर्वप्रथम एकर प्रकाशन करौने छलाह। एहि मे संग्रहीत कविता सभक भाषा अति प्राचीन अछि मथा एहि मे ओ विशेषता दि अछि जे बाडव्ला्. मैथिली, मगाही आदि पूर्वीय भषादि मे अछि। एहि कारणसँ एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे रारबल जाइत अछि। एहि कारण सॅा एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे राखल जाइत अछि। वस्तु त: ई कवितादि तहिया लिखल गेल जखन आधुनिक पूर्वीय भाषादि अपन प्रारम्भिक अवस्था: मे छल। भाषा वैज्ञानिक लोकति एहि विषय मे एकमत छथि। अत: एहि कवितादिक भाषा पूर्वीय अथवा मागधी अपभं्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्त अछि। तथापि ई स्वा्भाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्वस उपलबध अछि जे मागधी अपभ्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्तत अछि। तथापि ई स्वामभाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्वि उपलब्धस अछि जे मागधी अपभ्रंश सँ विकसित वर्तमान भाषादि मे सेहो पाओल जाइत अछि। एकरा संगहि ई मानबाक लेल प्रचुर साधन अछि। ई संग्रह प्राचीन मैथिलीक रूप थिक। एकर रचयिता अधिकांश मिथिलाक निवासी रहल हैताह।
बौद्ध गान ओ दोहा मे तीन न्रकारक साहित्यर उपलब्ध भ’ ीहल आछि, जकरा मैथिलीक प्रारम्भिक रूप कहल जा सर्कैछ। ओ अछि: दोहा कोश, चर्चाचर्च विनिश्च य आ डाकार्णव। एकर स्वईचिता बौद्ध सिद्ध आ तान्त्रिक रहथि। हिनक भाषा मिभिलाक पूर्वी भागक प्राचीन रूप थिक। एहि सामग्री आदिक आधार पर एकर रचयिता लोकतिक समय आठम शताब्दीक सँ तेरहस शताब्दीर धरि निश्च्य कयल जाइत अछि। विषयक दृष्टि सँ एहि रचनादिक ओतेक महत्वब नहि जतेक की भाषाक दृष्टिऍं अछि। एकर भाषा एहन अछि जकरा आधार पर एकरा मैथिली, बाडव्लात, असमिया, हिन्दीा, मगही आ भोजपुरी आदि प्रत्येरक भाषा-भाषी अपन सम्परत्ति घोषित करैत छथि। एहि समय भारतीय आर्य भाषा निर्माणक स्थिति मे छल। इएह कारण अछि जे भाषा-वैज्ञानिक लोकति एहि रचना-समूह मे भारतीय पूर्वान्चतलक सभ भाषादिक रूप भेटैत अछि। संगहि-संग ई मानबाक लेल सेहो प्रचुर साधन अछि जे एहि संग्रह केँ प्रधानत: मैथिलीक रूप थिक। ज्योअतिरीश्व र (1280-1340) वर्णरत्ना्कर (1940) मे एकर सम्पूचर्ण नामावली द’ देलनि अछि। पूर्वीय भाषादि मे सर्वप्रथम मैथिलीक प्रयोग गम्भीतर साहित्य क रूप मे कयल गेल छल। बाडव्लाै आ आसमी मे तँ साहित्यि-रचनाक प्रयास एक शताब्दीम पाछॉं जा क’ प्रारम्भय भेल तथा एकरा लेल मैथिलीक महान कवि विद्यापति प्रेरक सिद्ध भेलहि। एकर अतिरिक्त प्राचीन अप्रपभं्रश मे कविता लिखबाक परम्प रा मात्र मिथिला मे छल आ ई परम्प्रा चौदह म शताब्दीत धरि चलैत रहस। विद्यापति अपन दू पुस्तकक-‘कीर्तिलता’ (1924) आ ‘कीर्तिपताका (1960) तथा अनेक छोट कवितादिक रचना मे कयलनि जे देश्यप-मिश्रित अपभ्रंश शिला ‘प्राकृत पैडालम’ टीकाकर वंशीधर एहि मे संगृहीत अपभ्रंश कवितादिक भाषाकेँ अवहट् कहलनि। डा. सुभद्र झा एकरा आदिकालीन मैथिली कहलनि। ओ लिखैत छथि. ‘प्राकृत पैड;लम मे उदाहरण स्वररूप अनेक शब्द2 एवं पद देल गेल अछि जकरा विषय मे कहल जा ाकैछ जे ओ प्राक् मैथिली मे रचित थिक ओहि मे एहन किछु नहि अछि जकरा आदिकालीन मैथिली कहबासँ वंचित क’ सकी।‘ राधाकृष्णि चौधरी (1924-1984) ‘मिथिलाक सांस्कृ तिक इतिहास’(1961) क परिशिष्टी-ग मे प्राकृत पैडलम मे व्यपवहृत 115 शब्दाादिक सूची देलनि अछि तथा एहरा आदिकालीन मैथिलीक ग्रन्थ1 मानलनि अछि। तथापि एहि प्राचीन भाषाक विषय मे सुनिश्चित एवं अन्तिम रूपसँ विचार करब आवश्यकक अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यए मे एकरा प्राक् मैथिली मानव तर्क संगत अछि।
दोसर प्रकारक साहित्य1 जे उपलब्धप भ’ रहल अछि ओ थिक ‘डाकवचनाबली’। एहि वचनाबली मे स्थाानीय लोक प्रसिद्ध विज्ञाता, ज्यो तिष एवं कृषि सम्बेन्धी वचन, जीवन आ विविध विषयक समालोचना भेरैत अछि। ई जनसामान्यध मे प्रचलित अछि तथा एकर विस्तावर आसामसॅ ल’ कए राजस्थारन धरि सम्पूआर्ण आर्यवर्त मे विस्तृमत अछि। एकर रचयिताक सम्बतन्ध् मे विद्वान लोकति मे मतैक्या नहि अछि तथा अनेक जनश्रुति आदि प्रचलित अछि। देशक भिन्नर भिन्ना भाग सब मे एकर रचयिता लोकतिक भिन्नय-भिन्न नाम अछि। मिथिला मे डाक, घाघ, भण्डनरी एवं डंक आदि प्रचलित आदि। एम्ह र आबिक’ देशक विभिन्नि भागसॅ एहि वचनावलीक कतिपय संग्रह प्रकाया मे आयल अछि, परन्तुं एहि मे सँ कोनो, कोनो प्राचीन हस्तिलिखित प्रति पर आधारित नहि भ’ कए ओहि भू-भाग मे प्रचलित अनेक मौखिक रूप पर अछि। एकर फलस्विरूप प्रत्येतक संस्कररणक भाषा आधुनिक भ’ गेल अछि। मैथिलीक हेतु ई सौभाग्यपक बात थिक जे डाकक नाम पर प्रचलित अनेक वचन मैथिल विद्वान द्वारा रचित ज्योैतिषक प्राचीन ग्रन्थापदि मे उद्घृत अछि। जाहि मे किछु तँ चौदहम-पन्द्ररहम शताब्दीिक थिक। एहि उद्धरणादिक भाषा अत्यकन्त् प्राचीन अछि तथा ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ क भाषासँ साम्यश रखैत अछि। ओना तँ मिथिला सँ जे वचनाबली प्रकाशित भेल अछि ओकर भाषा आधुनिकताक छाप नेने अछि। मात्रमिथिला आचार्यगण कोनो महान आचार्यक वचन सदृश प्रमाणक हेतु डाक वचनादि केँ जे उद्घृत कयलनि अछि ओहिसँ ओकर मैथिल उद्भव आ प्राचीनता सिद्ध होइत अछि। अत: ई कहब पूर्णत: संगत सिद्ध होइत अछि जे डाक मैथिल रहथि आ हुनक लोक प्रसिद्ध सारबी आदिक भाषा प्राचीन मैथिलीथिक। कालान्तछर मे ई सम्पूैर्ण भारत मे प्रचलित भ’ गेल तथा अपन मौखिक परम्प्रा मे नूतन रूप धारण क लेलक अछि।
मात्र डाके एहन व्य क्ति नहि रहथि जे एहि प्रकारक लोक प्रसिद्ध वर्णनक रचना प्राचीन मैथिली मे कयलनि। एतबा तँ निश्चित अछि जे सबसँ विख्यारत इएह छथि। सप्त रत्नाणकरकर्ता महामहोपाहसाय चण्डेलश्वूर अपन ‘कृतचिन्तािमणि’ नामक ज्योएतिष निबन्धतक प्रशानग्रन्थह मे अवहद्ध भाषाक अनेक पद म्रमाण रूप मे उदृत कयलनि अछि, जकरा क्षपणक जातक भृगुसंहिंता तथा कापलिक जातक प्रभृत ग्रन्थनसँ उदृत कहलनि अछि। यद्यपि ई ग्रन्थ आब अनुपलब्धभ अछि, अतएंव ई नियिचत रूप सँ नहि कहल जा सकैछ जे उक्ति ग्रन्थद ओही भाषा मे लिखल गेल अथवा ओहि मे कतहु सँ अदृत कयल गेल अंछि। परन्तुई डाकवचनावली क रचनाक समानहि ई सब सेहो जनसाधारण केँ प्रभावित करबाक लेल विद्वान लोकति हुनके भाषाक आश्रय लैत रहथि आ चाण्डे श्वरर सदृश विद्वान् सेहो प्रमाण स्वारूप ओंकरा उदृत करबा मे कनेको कुण्ठित नहि भेलाह।
तेसर प्रकारक जे साहित्यज उपलब्धद अछि ओ लोक प्रसिद्ध आख्यातन आ गीतक थिक। एहि मे किछु तँ साहित्यिक थिक। गोपीचन्दशक गीत एही श्रेणी मे अबैत अछि। ई गीत ओही समयक थिक जाहि समयक डाकक वचन थिक। ई गीत भीखमॉंगनिहारक एक वर्ग द्वारा गाओल जाइत अछि जकरा गुदरिया गोसांईक नाम देल गेल अछि। एहि गीतक अतिरिक्तए लोरिक, सलइेस. बिहुला, मरािया आदिक गीत कथादि एही वर्गक थिक। ई सभ रचनादि प्राचीन कालक थिक। एहि कथादिक विशेषता ईहो अछि जे एकर कथानायक कोनो अवतारी देवता वा अंशी पुरूष नहि छथि। डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन एकर संकलनक प्रयास कयने रहथि। युग-युगसँ ई जनकण्ठि मे पीढी-दर-पीढी गुंजित होइत आवि रहल अछि। एकर भाषाक परिशुद्धता क विषय मे कयों दावा नहि क’ सकैछ। अपन मौखिक परम्पगरा सँ एकर भाषा मे निश्चित रूपेण परिवर्तन भेल हैत। एहि रचनाहि केँ देखि क’ ई स्पकष्टख प्रमाण भेटैत अछि जे मैथिली अपभ्रंश भाषाकेँ लोकप्रिय रचनाक लेल प्रयोग करबाक परम्प रा मात्र उपयोगी साहित्यखक लेल नहि, प्रत्युभत मनोरंजनक लेल सेशे-मिथिला मे पूर्व भारतीय अपभ्रंश भाषाक आरम्भिक स्थिति मे जकर समय भाषा वैज्ञाानिक एक हजार ई. निधारित करैत छथि।
डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन सर्व प्रथम एहन गीतादि केँ ‘इण्डियन एण्टीकक्वेरटी’ खण्डल-10 मे प्रकाशित करौलनि। एकर अतिरिक्ता ‘समबिहारी फोक सॉंग्स ’ (1884), ‘टू भरसन्सल ऑफ द सांग्सक आफ गोपी चन्दक’ (जे. ए. एस. बी. खण्ड 54, भाग-1 अर ‘द वर्थ आफ लोरिक’ (कैम्ब्रिज 1929) आदि मे प्रकाशित अछिणे उल्लेेखनीय अछि। एम्हतर आबि क’ लोकगीतक कतिपय संग्रह प्रकाश मे आयल अछि जाहिसॅा एकर विकास मे गति आयल अछि। मिथिलान्चमलक विभिन्नथ जनपद मे मैथिलीक करीब तीस लोक नाट्यक प्रस्तुरति इस देखल अछि जाहि मे लोक जीवनक स्वामभाविक अभिव्यनक्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्यिक त्रिवेणी प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक जीवनक स्वाछभाविक अभिव्य क्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्यजक त्रिवेणी प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक-जीवनक सार-गर्वित भावसँ सम्पतन्ने, तत्काृलीन युग क प्रवृतिक मनोरंजकता प्रदान करबाक हेतु नव-नव आयामक व्यरवस्था कयलक। कालन्तयर मे इएह साहित्यिक विधादिक रूप मे विकसित भेल। विविध मांगलिक अवसर जेना व्रत-त्यौ-हार, धार्मिक, सांस्कृ्तिक लोकोतसव इत्यािदिक विशेष परिस्थिति मे विभिन्नव प्रक्रियादि सँ उद्भूत सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृातिक आ साहित्यिक चेतनाक परिणाम थिक मैथिली लाक-नाट्य।
मिथिला और मैथिली साहित्यसक ऐतिहासिक ग्रन्थों के अवगाहन सँ ज्ञान होइछ जे मिथिला पर अनेक राजवंश शासन कयलक जाहि मे तीन राजवंश क शासक लोकति मे कर्णाट राजवंश (1097-1324), ओइनवार राजवंश (1353-1526) आ खण्डट वला राजवंश (1556-1947) प्रमुख छथि। कर्णाटवंशीय राजा लोकतिक छत्र-छाया मे मैथिली साहित्यिक साहित्यआकार लोकति केँ प्रोत्साहन भेटबाक प्रक्रिया प्रारम्भ भेल। ज्यो तिरीश्वार ठाकुर एही राजवंशक छठम राजा महाराज हरिसिंह देवर (1443-1444) क सभासद रहथि। ओइनवार वंशक शासनकाल मे मैथिली साहित्यरक विकास अत्यडन्तत दुतगतिऍं भेल, कारण एहि राजवंशक राजा लोकति केँ साहित्यलक प्रति अधिक अभिरूचि छलनि जकर फलस्व रूप साहित्ये मनीषी लोकतिकेँ कतेक राजा लोकति प्रोत्सातहित कयलनि जाहि मे उल्ले खनीय छथि कवीश्वँर चन्दाे झा आ महाकविलास दास आ साहित्यि रत्नािकर मुंशी रघुनन्दमनदास (1860-1945)। ई साहित्यप मनीषी लोकतिक रचनादि मे सर्वथा आधुनिकताक शुभारम्भर होइत अछि।
सर्व प्रथम प्रामाणिम पुस्तिक जे खॉटी मैथिली मे अछि आ थिक ज्योितिरीश्व र ठाकुरक ‘वर्णरत्नाककर’ आ ‘धूर्तसमागम’ (1960)। ई दुनू पुस्त क चौदहम शताब्दीक आरम्भ मे लिखल गेल छल। वर्णरत्नािकरक विषय मे सन् 1901 ई. मे बंगाल एशि।यारिक सोसायटीक सचिव केँ महामहोपाघ्याकय डा. हरप्रसाद शास्त्री सूचना देने रहथि। प्रथमे प्रथम एकर प्रकाशन डा. सुनीतिकुमार चटर्जी (1890-1977) आ पण्डित बबुआजी मिश्र क संयुक्त। सम्पा दक ख मे एकर प्रकाशन भेल छल। अपन रिपोर्ट मे महामहोपाघ्यामय डा. हरप्रसाद शास्त्री कहने रहथि, ‘ई ग्रन्थ काव्यश नहि, काव्योोपयोगी ग्रन्थम कहि सकैत छी। यदि ज्यो्तिरीश्वरर वास्त्व मे इच्छारपूर्वक काव्यग ग्रन्थथ लिखितथि तँ एकर स्वटरूप आन रूपक रहैत, मुदा वर्णनक अवसर पाबि ग्रन्थयकारक सहज कवित्व प्राय: नहि मानलक आ लाख रोकनहु पर सेहो कस्तुरी मोदक समान प्रकटभ’ गेल। स्थ ल-स्थ लक वर्णनकेँ देखिक’ कादम्बखरी प्रभृति संस्कृवत गद्य-काव्य क स्मलरण भ’ जाइत अछि। एहि प्रकाश्क उन्न त गद्य-साहित्यण केँ देखिक’ अनुमान होइत अछि जे एहि सँ चारि-पॉंच शताब्दी पूर्व मिथिला भाषा मे नियचये साहित्यत रचना प्रारम्भे भ’ गेल छल। अनेक अनुच्छिट उपमादिक संग्रह. भाषा-उपभाषाक उल्लेिख द्वारा भाषा-विज्ञान सम्बन्धीर अनेक सामग्री, ओहि समयक सामाजिक तथा साहित्यिक विचारक भण्डाीर, ओहि समयक वर्णन-शैली इतयादि विशेषताक विशद रूप एहि ग्रन्थ, मे उपलब्धम अछि।
प्रतिपाद्य गद्य ग्रन्थि भावी कवि आ कत्थ क लोकतिक क हेतु एकपथ प्रदर्शक ग्रन्थच बनायब छल जेना जँ नायकक वर्णन करबाक होतॅ कोन-कोन विषयक उल्लेथख करब उचित, जँ नायिका वर्णन करबाक होतँ कोन-कोन विषयक निरूपण करब आवश्यशक अछि। ई ग्रन्थ् सातकल्लोिल मे विभाजित अछि जेना नगस्व र्णन, नायिका वर्णन, आस्था न वर्णन, ऋतु-वर्णन, प्रयानक वर्णन, भट्टादि वर्णन आ श्म्शान वर्णन। सबसँ महम्व क बातईथिक जे ई पुस्तरक गद्य मे अछि तथा उत्तथर भारतक कोनो भाषा साहित्या मे एतेक प्राचीन ग्रन्थन नहि भेहैत अछि। जखन दोसर-दोसर प्रान्तथ अपन भाव प्रकाशनक लेल कोनो साहित्यिक माघ्येमक अभाव मे अन्धतकार मे टापर-टोइया द’ रहल छल, तखन मैथिली एक पूर्ण भाषा क रूप मे विकसित भ’ गेल छल जाहि सँ समाजक स्वमरूप केँ प्रकट कयल जाय सकय। ई कोनो लोकप्रिय भाषाक प्रधान विशेषता है। वर्णरतनाकर एकर सटीक उदाहरण थिक।
ज्योरतिरीश्वदरक दोसर रचना संस्कृकत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाटक थिक ‘धूर्त समागम’ । ई नाटक जतय मैथिली कविता आ नाटकीय परम्प राक द्योतक थिक, ओतहितत्काधलीन समाजक चित्र अंकित कयलनि अछि जनिक चातु:शालक चारू भाग कतहु महींस बान्हकल अछि, कतहु बाछा-बाछीक संगपुष्टत थन्वाट ली गाच एम्हजर-ओम्हूर जा रहल अछि, कतहु दासी सुन्दकर भवनक प्रागंण मे मन्दन-मन्द गति सँ अवगार्हन क’ रहल अछि।
वर्णरत्नाचकर आ धूर्तसमागम क रचना नोकभाषाक आलोकमय भविष्युक सूचक छल। भाषा-साहितयक एहि अभ्युतदय आ विकासक कोनो साहित्यिक प्रेरणाक परिणाम नहि कहल जा सकैछ, प्रत्यु त ई तँ साहित्यिक जडवाद सँ असन्तुयष्ट जनताक स्वाेभाविक प्रवृतिक प्रकाशन छल। भाषा मे फूटैत कवि-प्रतिभा जरमन राजा लोकति केॅा चमत्कृआत कयलक तखन हुनक संरक्षण एवं प्रोत्साकहनक फलस्वनरूप भाषा-काव्यतक विकास भेल। ई विकास एहि बातकद्योतक जे लोक भाषा केँ साहित्यिक गौरव सॅ विशेष अवधि धरि वंचित नहि कयल जा सकैछ। जे सामान्यो जनमानसक व्यािपक भाषा बनिगेल ओहि मे व्यिवहारोपसोगी एवं ललित दुनू प्रकारक साहित्यिक सृष्टि अवश्य हैत। मैथिली साहित्याक इतिहासक इतिहासक अवलोकन कयला सँ एकर स्पवष्टू बोध होइछ। वस्तुित: ज्योीतिरीश्पकरक रचनादि मैथिली गंगाक ‘हरद्वार’ थिक जतय ओ लोक भाषाक सामान्यँ धरातल पर उतरि क’ पूर्ण वेग सँ प्रवाहित होमच लागल एकर पश्चाचत् उमापति उपाघ्या्य सर्वाधिक लोकप्रिय नाटककार भेलाह जनिक ‘पारिजातहरण’नाटकऍं असमक शंकरदेव (1499-1568) आत्याधिक प्रभावित भेलाह।
मैथिली साहित्यज केँ ई सौभाग्यह अछि जे ओइनवार वंशक शासनकाल मे एक एहन प्रतिभासम्प्न्न व्याक्तित्व क प्रादुर्भाव भेल जनिक काव्यईप्रतिभा अमर भ’ गेल आ ओ मात्र मिथिला धरि सीमित नहि रहल ; प्रत्युकत पूर्वान्चाल मे बंगाल, आसाम आ ओडिसा धरि ख्याेति अर्जित कयलक आ समस्तह भारतवर्ष मे लोकप्रियता अर्जित कयलनि ओ रहथि विद्यापति। हिनक ग्थ्न्ामक विषय-वैविघ्य केँ देखला सँ ज्ञात होइत अछि जे ओ केवल कविए नहि, प्रत्युहत सर्वतोमुखी प्रतिभासँ समलंकृत सच्चिन्त्क रहथि। ओ एकहि संग शास्त्रतकार, राजनीति-विशारद, इतिहासकार, भूवृतान्तक लेखक, अर्थशास्त्रा विद्, नीतिशास्त्रन विचक्षण, धर्म-व्यूवस्थािपक, निबन्ध-कार, शिक्षक, कथाकार, संगीतज्ञ आपुरूषार्थ पुजारी रहथि। ई निम्नतस्थन संस्कृतत ग्रन्थानदिक रचना कयलनि यथा- भूपरिक्रमण (1976), शैवसर्वस्वचसार (1815), लिखनावली (1969), दुर्भाभक्तिरडि;णी (1902), शैवसर्वस्वकसार (1980), शैव सर्वस्वञसार पुराण-भूतसंग्रह (1981), गंगावाक्याावली (अप्रकाशित), संस्कृ0त-प्राकृत-मैथिली मिश्रित रचनादि मे त्रिभाषिक नाटक गोरक्षविजय (1960) आ मणिमन्ज9री (1966) आ अवहटट् रचनादि मे कीर्तिलता (1924) एवं कीर्तिपताका (1960) थिक । विशुद्ध मैथिली मे ई पदावलीक रचना कयलनि जकर उपलब्धतताक स्रोत थिक नेपाल, मिथिलाम्पकलक अन्तजर्गत रामभद्रपुर, तरौनी एवं राग तरडि;णी आ बंगालक अन्तधर्गत क्षणदा गीत चिन्ता्मणि, पदामृतसमुद्र, पदकल्पुतरू, कीर्तनालल्दृ आ संकीर्तनामृत तथा लोककण्ठअक पद। एहि पदक संख्याच एक हजार पॉंच सयक लगधक अछि। यद्यपि हिलक अधिरकांश रचनादि प्रकाश मे आबि गेल अछि तथापि गंगावाक्याकवली, गयापतलक आ वर्षकृत्यल पुस्तअकाकार प्रकाशन नहि भ’ पाओल अछि। ई पीडा दायक स्थिति अछि जे हिनक रचनादि एतेक लोकप्रिस मेल तथापि हिलक समग्र रचनादिक प्रकाशन ग्रन्थापवली वा रचनावलीक रूप मे अद्यापि प्रकाशित नहि भ’ पाओल अछि।
वस्तुअत: एहन प्रतिभासम्पान्नी महाकविक कृतिकेँ घ्या्न मे राखि अद्यापि साहित्यु चिन्तकक लोकति जतेक अपुसन्धान आ आलोचना प्रज्ञतुत कयलनि अछि ओकरा एकांगी कहल जा सर्केछ ले ओ पुरूषार्थ कवि रहथि जे अपन कृति आदि मे कोनो-ने-कोना रूप सॅ ‘पुरूषार्थचतुष्ट य’क प्रतिपादण कयलनि अछि। हिनक सम्पूलर्ण कृतिक मुख्य उद्देश्य् अछि पौरूष। विद्यापति अपन कृति सभ मे मानवक उदारता, वीरता, धीरता, साहसिकता, निर्भीकता, स्पौष्टतता, कर्तव्य्परायणता, बुद्धि आ ज्ञानवर्द्धक सभ साधन पर बल देलनि अछि जे सामाजिक आ सांस्कृेतिक वातावरणक निर्माण मे समान रूपसँ सहयोग प्रदान क’ समय। जाहि मानव मे पर्युक्तआ गुणक अभाव अछि जे हुनका दृष्टि मे अयलनि तकर ओ अपहास कयलनि। पुरूषार्थ चतुष्टसय क दृष्टिएँ हिनक समग्र कृति हिनक नवोन्सेनषशालिनी प्रतिभाक विपुल-वैठुण्य्क परिचय दैत अछि। लोक मे स्वध-धर्म आ राष्ट्रस-धर्म क सुरक्षा क भावना ओ संचारित आ ओकरा पल्ल्वित पुष्पित करय चाहैत रहथि। अपन समग्र पदावली मे ओ अतीव मृदुलता, जनजीवन मे सुसुप्त मधुर-भाव केँ जगयबाक क्षमता मिथिलाक जनमानस मे अभिहिंत हैबाक कारणेँ ई सर्वाधिक लोकप्रिय भेल।
विद्यापति अपन साहित्या-साधनाक माघ्यि मे मैथिली-साहित्य भंडार केॅा भरबाक लेल अनेक विधा करचनाकयलनि। हिनक एक-एक रचना मैथिलीक अमूल्य -निधि थिक जाहि मे एक भाग श्रंृखगारिकताक आभास भेटैछ तँ दोसर भाग भक्तिक, मुदाविद्यापतिक समग्र कृति पर जखन प्रत्येक्ष रूप सॅ विचार करैत छी तखन स्पटष्टा भ’ जाइठ जे भारतीय-चिन्तपन-धारासँ प्रभावित भ’ कए ओ पुरूषार्थ-चतुष्टअयक उदेदश्यचसँ समग्र रचनादि कयते रहथि।
एहि प्रकारेँ विद्यापति मैथिली-साहित्या मे जे परम्प राक शुभारम्भा कयलनि ओकरा परवर्ती कवि लोकति अपनाक’ रचना कयलनि। विद्यापतिक समसायिक उवं यपरवर्ती कविलोकति एहि साहित्य्क बहुमूल्यष सेवा कयलनि। हिनक समसामयिक कवि लोकति मे भवानीनाथ (1375-1450), अमृतकर (1450-1500), चन्द्र कला (1400-1475), कंसनारायण (1475-1528), गोविन्द0 कवि (1450-1530), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), नवकवि यशोधर (1500-1550), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), सदानन्दक 1550), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्या1म सुन्द4र (1500), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्या)म सुन्दभर (1500), हरिदास (1609-1950), गंगाधर (1600) श्रीनिवास मल्लग (1640) इत्या5दि उल्लेषखनीय छथि।
(अगिला अंकमे जारी)
विदेह
मैथिली साहित्य आन्दोलन
(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु
Friday, April 03, 2009
कुंडलिया- आशीष अनचिन्हार
बाप मरल अन्हार मे पूतक नाम पावर-हाउस
नोर-माँड़ पिबए माए कनिञा खाए माउस
कनिञा खाए माउस ताहि पर दही चाहबे करी
बिनु सेब-समतोलाक वज्र खसए हरहरी
कह अनचिन्हार कविराय कनिञा चंडीक अंश
भुखले नहि रखथिन्ह त बढ़तैन्ह कोना वंश
Thursday, April 02, 2009
हमर प्रेम- कृष्णमोहन झा

हमर ठोरक पपड़ी पर जे एकटा मर्म सुखा रहल अछि
हमर जिह्वा पर जे धूरा उड़ि रहल अछि
हमर सोनितक धार सँ जे धधरा उठि रहल अछि
हमर देहक शंख सँ जे समुद्रक आवाज आबि रहल अछि
हमर आत्माक अंतरिक्ष मे जे चिड़ै-चुनमुनी कलरव क’ रहल अछि
हमर स्मृतिक गाछ पर जे झिमिर-झिमिर बरखा भ’ रहल अछि
तकरा सभक चोट आ खोंच केँ
टीस आ मोंच केँ
रूप आ रंग केँ
स्वर आ गंध केँ
कोना पानक एकटा बीड़ा बनाक’
हम अहाँक आगू राखि दी आ कही-
लिअ’ ग्रहण करू
ई थिक अहाँक प्रति हमर प्रेम…
जखन कि हमरा बूझलए
जे हमर प्रेम
गुड़ियाम मे बान्हल एक टा पियासल बरद अछि
जे खाली बाल्टी केँ देखि-देखिक’ भरि राति हुकरैत अछि
हमर प्रेम अछि
छिट्टा सँ झाँपल एक टा छागर
जे बन्द दुनिया सँ बहरयबाक बेर-बेर चेष्टा करैत अछि
हमर प्रेम धूरा-गर्दा मे जनमल एक टा टुग्गर चिलका अछि
जे दीने-देखार हेरा गेल अछि
बीच बाजार मे
तखन अहीं कहू
कोना हम अपन आत्माक फोका केँ
एक टा मृदुल भंगिमाक संग अहाँक सम्मुख तस्तरी मे राखि दी
आ कही-
लिअ’ ग्रहण करू…
हमर प्रेम जँ किछु अछि तँ एक टा फूजल केबाड़
हमर प्रेम जँ किछु अछि तँ एक टा कातर पुकार
कि आउ
अइ दुनियाक सभ सँ कोमल आ सभ सँ धरगर चीज बनिक’
आबि जाउ
अहाँक स्वागत मे
हमरा ठोर सँ ल’क’ अहाँक ओसार धरि जे ओछाओल अछि
ओ कोनो कालीन नहि
अहाँक तरबा लेल व्यग्र
खून सँ छलछ्ल करैत हमर ह्रदय अछि
आ हमर हड्डीक प्राचीन अंधकार मे
ओसक एक टा बुन्न सन कोमल
अनेक युग सँ अहाँक बाट ताकि रहल अछि हमर प्राण…
हमर प्राण अछि अहाँक आघात लेल आतुर
अहाँक आघात एहि जीवनक एक मात्र त्राण
1.नहि सोभैया रंगदारी-2.हे नेता जी अहाँ के प्रणाम: दयाकान्त
अहॉं विदेहक छी संतान
राखु याज्ञवल्क्यक मान
नहि बिसरू मंडन, ंअयाची
वाचस्पति, विद्यापति केर नाम
गौरब-गाथा सॅ पूर्ण धरा पर
नहि करू एकरा संग गद्दारी
नहि सोभौया रंगदारी
हमर ज्ञान संस्कृतिक चर्चा
हाई छल जग में सदिखन
छल षिक्षाक केन्द्र बनल
पसरल नहि षिक्षाक किरण जखन
आई ठाड़ छी निम्न पॉंतिमें
नहि करू षिक्षाक व्यपारी
नहि सोभौया रंगदारी
कियो बनल स्वर्णक पक्षघर
किया बनल अवर्णक नेता
आपस में सब ‘ाडयंत्र रचिके
एक-दोसराक संग लड़ेता
अहॉं सॅ मिथिला तंग भ गेल
छोरू आब जातिक ठीकेदारी
नहि सोभौया रंगदारी
बाढिंक मारल रौदीक झमारल
जनता के आब कतेक ठकब
गाम-घर सब छोरी परायल
अहॉ आब ककरा लुटब
भलमानुश किछु डटल गाम में
नहि फुकु घर में चिंगारी
नहि सोभौया रंगदारी
आबो जागु आबो चेतु
कहिया धरि अहॉं सुतल रहब
देखु दुनियॉ चांद पर चली गेल
अहॉं आबों कहिया उठब
अहीं सनक भायक खातिर
कनैत छथि वैदेही बेचारी
नहि सोभौया रंगदारी
2.हे नेता जी अहाँ के प्रणाम
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम
एक बेर नहि सत्त-सत्त बेर
करैत छी अहाँ के नित्य प्रणाम
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम
दू अक्षर सँ बनल ई नेता
देशक बनल अछि भाग्यविधाता
आई-काल्हि ओहा अछि नेता
जकरा लग अछि गुंडाक ठेका
जाल-फरेब फुसि में माहिर
घोटाला में सतत प्रधान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम
खादी कुरता नीलक छीटका
मुंह में चबेता हरदम पान
मौजा ऊपर नागरा जूता
उज्जर गमछा सोभय कान्ह
जखन देखू चोर-उच्चका
भरल रहै छैन सतत दलान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम
केने छैथ ई भीष्म प्रतिज्ञा
झूठ छोडि नहिं बाजब सत्य
हाथी दांतक प्रयोग कय के
मुंह पर बजता सबटा पद्य
कल-बल-छल के वल पर सदिखन
जीत लैत छैथ अप्पन मतदान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम
गाम विकाशक परम विरोधक
होबय नहि देता एकोटा काज
बान्ह-धूर स्कूल पाई सँ
बनबैत छैथ ओ अप्पन ताज
स्त्री शिक्षाक जँ बात करू तँ
मुईन लैत छैथ अप्पन कान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम
कविता- भूतःवर्तमानःभविष्य- आशीष अनचिन्हार
भूतःवर्तमानःभविष्य
अकबर के जोधाबाइक संग
विआह करबाक लेल परामर्श के देने रहैक
भूत बाजि ने रहल
रोमिला थापरक तर्क संपूर्ण रुपे सत्त
नागेश ओकक फूसि
लोक के गोधरे किएक देखाइत छैक
कश्मीरी पंडित आ राजौरी किएक नहि
वर्तमान नहि बाजि रहल
तुष्टीकरण के
कहिआ धरि भारत मे
धर्मनिरपेक्षता मानल जेतैक
भविष्य बाजि ने रहल
Wednesday, April 01, 2009
समीक्षा श्रृंखला-३ गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोशपर- उदय नारायण सिंह "नचिकेता"
अंग्रेजी जेना एकरा हम आइ देखैत छी, भाषाक वैश्विक इतिहासमे एकटा सापेक्षतया नूतन घटना अछि संभवतः मैथिलीसँ किछुए पुरान। ई एहि लेल किएक तँ जखन मैथिलीक सभसँ पुरान उपलब्ध ग्रन्थ ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखल जा रहल छल ओ समय रहए अंग्रेजीमे चौसरक। पाश्चात्य कोशमे सभसँ पुरान कोश तखुनका अक्कादी साम्राज्यमे रचित भेल जाहिमे सुमेरी-अक्कादी शब्द सूची रहए (आधुनिक सीरियाक एबलामे प्राप्त) आ एकर समय छल लगभग २३०० ई.पू.। मुदा सभसँ प्राचीन ग्रीक कोश एपोलोनियश द सोफिस्ट प्रथम स्शताब्दीक, ई होमरयुगीन शब्दपरिभाषा आ अर्थ सूचीबद्ध करैत अछि आ एकटा उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। द्वितीय सहस्राब्दी ई.पू. उर्रा= हुबुल्लु शब्दार्थसूची जे एहने द्विभाषी शब्द सूचीक संग पुरान कोशीय लेखाक उदाहरण एकटा आर उदाहरण अछि जेकर तुलना तेसर शताब्दीक चीनी परम्परे सँ कएल जा सकैत अछि। प्रारम्भिक जापानी प्रयास ६८२ ई.क चीनी अक्षरक नीना ग्लॉसरी आ सभसँ पुरान उपलब्ध जापानी कोश तेनरेइ बान्शो मैगी (८३५ ई.) सेहो महत्त्वपूर्ण प्रयास छल। भारतमे वैदिक साहित्यक संरक्षण व्याकरण आ कोशीय रचनाक लेल सभसँ पैघ उत्प्रेरक छल। संस्कृतक पाणिनीय आ दोसर वैयाकरणिक परम्परामे ई एकटा सामान्य आ पूर्णतः आधारभूत कार्य रहए- वैदिक वाक्यकेँ शब्दमे खण्ड-खण्ड करब आ शब्दकेँ खण्ड करब धातु-प्रत्ययगघतकमे। एहि क्रममे शाब्दिक संरचना, भाषायी ध्वनि तन्त्रक संग संरचनात्मक-ध्वन्यात्मक सिद्धांत सभ सेहो विकसित भेल। ई विश्वास कएल जाइत अछि जे निघण्टु (७०० ई.पू.) पर यास्क एकटा निरुक्त नाम्ना भाष्य लिखलन्हि जे आइ सभसँ पुरान ज्ञात कृति अछि आ ई परम्परा सेहो पाली परम्परा धरि चलल। ओ सभटा कोशीय सामग्रीकेँ समानार्थी आ समानह्रिजए-ध्वनि अनुसार सजेलन्हि। शास्त्रीय संस्कृतमे सभसँ लोकप्रिय कृति अछि अमरसिंहक अमरकोष (६ठम धताब्दी)। कटालोगस कैटालोगोरम मात्र अमरकोषपर कमसँ कम ४० टा भाष्यक सूची दैत अछि जे प्राचीन भारतमे एहि समानार्थी कोशक महत्व आ लोकप्रियता देखबैत अछि। एहि तरहक आर कोश जे कम-बेशी अमरकोषक आधारपर रचित भेल आ एहिमे सम्मिलित अछि (संदर्भ मल्हार कुलकर्णी- TDIL अन्तर्जालपर):-
१. भोजक कृत नाममालिका (११म शताब्दी)
२. सहजकीर्तिक सिद्धशब्दार्नव (१७म शताब्दी)
३. हर्षकीर्तिक शारदीयाख्यानाममाला (१७म शताब्दी)
४. धनन्जय भट्टक पर्यायशब्दरत्न
५. कोशकल्पतरु
६. नानार्थरत्नमाला- इरुगप दण्डाधिनाथ (१४म शताब्दी)
७. राघवक नानार्थमञ्जरी
८. धरनीदासक धरणीकोश (१२म शताब्दी)
९. शिवदत्त मिश्रक शिवकोश
१०. सौभरीक एकार्थनाममाला-द्वक्षारनभमाला
११. मकरन्ददासक परमानन्दीयनाममाला
पहिल अधुनातन युगक संस्कृत कोश जे पाश्चात्य सिद्धांतकेँ प्रयुक्त कए बनाओल गेल से अछि प्रोफेसर एच.एच.विल्सन द्वारा संगृहीत आ १८१३ ई. मे प्रकाशित संस्कृत-अंग्रेजी कोश। दू टा भारतीय कोश तकर बाद आएल पं. सर राजा राधाकान्त देवक शब्दकल्पद्रुम आ पं. ताराकान्त तर्कवाचस्पतिक वाचस्पत्यम् ।
हमर विचारमे प्रयुक्त शब्दकोशशास्त्र आकि कोश संग्रहक विज्ञान वा कला जे अछि कोश सभकेँ विभिन्न कार्यक लेल लिखब आ संपादन करब आ ई सेहो ततबे महत्वपूर्ण अछि जतेक सैद्धांतिक कोशशास्त्र महत्वपूर्ण अछि। शब्दकोशशास्त्र शब्द एकटा कथ्यक रूपमे १६८० ई.मे आबि कए प्रयुक्त भेल जखन कि कोश शब्द अंग्रेजी भाषामे १५२६ ई. मे आबि कए प्रयुक्त भेल जेनाकि मेरिअम-वेब्सटर कोश कहैत अछि। हमरा सभकेँ कहल जाइत अछि जे कोशमे ई सभ सम्मिलित होएबाक चाही:-
१. प्रिंत वा इलेक्ट्रॉनिक रूपमे संदर्भ स्रोत जाहिमे वर्णमालाक आधारपर सजाओल शब्द रहए, जाहिमे ओकर रूप, उच्चारण, कार्य, व्युत्पत्ति, अर्थ आ वाक्य रचना आ कहबी युक्त प्रयोग होअए।
२. एकटा संदर्भ ग्रंथ जाहिमे संबंधित कार्य-विषयक महत्त्वपूर्ण पदबंध आ नामक वर्णानुसार सूची होअए- संगमे ओकर अर्थ आ अनुप्रयोगक चर्चा सेहो रहए।
३. एकटा संदर्भ ग्रंथ जाहिमे एक भाषाक शब्दक लेल दोसर भाषामे समानार्थ देल रहए।
४. एकटा संगणकीय संशोधित सूची (दत्तांशशब्द वा शब्द पदक) जे सूचना प्राप्ति वा शब्द संसाधकक लेल संदर्भक रूप उपयोग कएल जा सकए।
एहि असाधारण आ समय साध्य कलाक अनुप्रयोगमे सम्मिलित कार्य सभमे ई सभ आवश्यक रूपमे सम्मिलित अछि:-
*प्रयोक्ताक निर्धारण आ ओकर आवश्यकताक निर्धारण
*सामान्यजनक शब्दशक्तिक आधारपर भाषिक शब्दक संख्याक निर्धारण आ एकटा निश्चित सीमित परिधिमे ओकर निर्णय
*परिभाषा आ विवरणक सज्जाक विषयमे निर्णय
*कोशक संदर्भमे सूचना संचरण आ विचार-क्रियाक निर्धारण
*कोशक विभिन्न अंगक निर्धारण दत्तांशक संग्रह आ प्रदर्शनक लेल उचित संरचनाक चयन (जेना आवरण-संरचना, संवर्गीकरण, वर्गीकरण, प्रसारण आ एकसँ दोसर अंशमे सन्दर्भ-संकेत)
*प्रधान शब्द आ जोड़एवला शब्दक चयन- पारिभाषिक शब्द बनएबाक लेल
*समानधर्मिता आ संधिकेँ चिन्हित करब
*अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आइ.पी.ए.) आ ब्लॉच एण्ड ट्रैगर चिन्हक प्रयोगसँ शब्द उच्चारणक निर्देश
*सुरुचिपूर्ण आ वर्ग-स्थान-विशेष बोली स्वरूपक योग
*बहुभाषिक कोशक लक्ष्य भाषाक लेल समानार्थी शब्दक चयन
*छपल आ इलेक्ट्रॉनिक दुनू तरहक कोशमे उपयोक्ताक लेल प्रवेशमार्ग बटन आ आन सुविधा
बिहारक गंगाक मैदान आ नेपालमे हिमालयक निचुलका पहाड़ीक तराइ क्षेत्र मिलि कऽ मैथिली आ मिथिलाक सांस्कृतिक क्षेत्रक निर्धारण करैत अछि, जे बहुत पहिने १९०८ ई. मे जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा चर्चित भेल, ओना ओ मुख्यतः भारतमे स्थित मिथिला क्षेत्रपर केन्द्रित रहल। एहि क्षेत्रमे बहुत रास परिवर्तन आ सीमाक पुनर्निर्धारण भेल। २०म शताब्दीक प्रारम्भमे ग्रियर्सन मैथिली भाषाक क्षेत्र सम्पूर्ण दरभंगा आ भागलपुर जिलाकेँ मानलन्हि। एकर अतिरिक्त ओ मैथिलीकेँ मुजफ्फरपुर, मुंगेर, पूर्णियाँ आ संथाल परगनाक बहुसंख्यक लोक द्वारा बाजल जाएवला भाषाक रूपमे चिन्हित कएलन्हि। मुदा आइ-काल्हि एहिमे सँ किछु अंश झारखण्ड राज्यक अंग भऽ गेल अछि।
एतए ई तथ्य आनब सेहो समीचीन होएत जे एहि बीच राज्यक मान्यताक क्रममे मात्र १७ मे सँ ५ जिला (ई अछि भागलपुर, पूर्णियाँ, सहरसा, दरभंगा आ मुजफ्फरपुर) बिहारक मैथिली भाषी क्षेत्रक रूपमे सामान्य रूपमे अभिहित भेल। पॉल ब्रास (१९७४) मैथिली आन्दोलनक अपन वृहत् अध्ययन उत्तर भारतमे भाषा,धर्म आ राजनीति मे एकरा सामान्य रूपमे परिभाषित भौगोलिक क्षेत्रक रूपमे लेलन्हि। १९८० क दशकमे बिहारक ३१ जिलामे भेल विभाजनक बाद एकटा प्रोजेक्ट रिपोर्टमे (द मैथिली लैंगुएज मूवमेन्ट इन नॉर्थ बिहार: अ सोशियो लिंगुइस्टिक इन्वेस्टीगेशन नामसँ) संयुक्त रूपसँ हमरा आ एन.राजाराम आ प्रदीप कुमार बोस बनाओल गेल, हम सभ एहि निर्णयपर पहुँचल छलहुँ जे ३१ मे सँ ई सभ १० जिलाकेँ मैथिली भाषी क्षेत्र मानल जएबाक चाही: भागलपुर, कटिहार, पूर्णियाँ, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर आ वैशाली। से एहि भौगोलिक सीमाक परिवर्तन प्राकृतिक परिवर्तन (कोशी धार २०० बरखमे सात बेर अपन दिशा बदलने अछि) आ जिलाक पुनर्गठनक परिणामस्वरूप भेल अछि।
ई ककरो लेल एकटा पैघ चुनौती होएत जे मैथिलीक एकटा भीमकाय कोश बनेबाक प्रयास करताह जेना गजेन्द्र ठाकुर कएने छथि। ई परिस्थिति आर ओझरा जाइत अछि कारण मैथिलीक शब्द चयन अंशतः वा अधिकांशतः एहि सांस्कृतिक क्षेत्रमे बाजल जाएवला १२ टा आन भाषासँ संभवतः प्रभावित होइत अछि। एतए एहि लगभग १२ टा दोसर भाषाक वर्णन सेहो वर्णन योग्य अछि। मैथिलीक आस-पड़ोसमे भोजपुरी आ मगही अछि आ हिन्दी एहि सभपर ऊपरसँ आच्छादित अछि जे एहि तीनू भाषा समूहक लोक द्वारा बाजल जाइत अछि। मुदा बिहार एकटा बहु-भाषी राज्य अछि आ नेपाली आ बांग्ला भाषी सेहो एतए प्रचुर मात्रामे देखल जा सकैत छथि। एकर अतिरिक्त किएक तँ मैथिली भाषी झारखण्ड क्षेत्रमे सेहो पर्याप्त मात्रामे छथि, ई बुझबाक थिक जे ओराँव, मुण्डारी, हो, बिरहोर, धांगर, संथाली आ संख्यामे कम ऑस्ट्रिक भाषा समूहक वक्ता सेहो हुनका संग निवास करैत छथि। ओना तँ मिथिला क्षेत्रक बहुत रास मुस्लिम अपन मातृभाषा मैथिली देखबैत छथि मुदा बहुत रास एहनो छथि जे अपनाकेँ उर्दूभाषी घोषित करैत छथि। एहि सभ भाषामे मात्र चारि टा केँ सांवैधानिक मान्यता भेटल अछि- हिन्दी, उर्दू, बांग्ला आ नेपाली (पछाति संथालीकेँ सेहो)। हमरा विचारेँ मैथिलीक वाक्य-रचनापर ऑस्ट्रिक भाषा समूह सहित विभिन्न कोणसँ प्रभाव पड़ल अछि। मुदा कोशीय स्तरपर योग आ अनुकूलन सीमित स्रोतसँ भेल अछि जेना उर्दू, हिन्दी, भोजपुरी आ मगहीसँ। कोश आत्मसात करैत अछि देशी शब्दावलीकेँ देशज शब्दावलीक संग। ई एहि कारणसँ कारण हमरा विचारेँ बेशीसँ बेशी २५-३०% वक्ता मैथिलीकेँ एकभाषीय रूपमे बजैत छथि। कारण शेष दोसर भाषामे सेहो नीक पइठ रखैत छथि। ओ मथिली भाषी जे बिहारक पश्चिमी सिमानपर रहैत छथि, भोजपुरी सेहो बजैत छथि आ पटना-राँची-गया-मुंगेर-क्षेत्रमे रहनिहार मगही जनैत छथि आ सेहो हिन्दीक अतिरिक्त। मुदा एकटा अत्यल्प प्रतिशत कहू जे ३-५ % सँ कम्मे, एहन मैथिल छथि जे अंग्रेजीमे सेहो प्रभावी रूपमे बाजि सकैत छथि। मुदा अंग्रेजीसँ मैथिलीमे शब्दक आगम ततबे वृहत अछि जेना ई कोनो दोसर नव भारतीय भाषा (न.भा.भा.) सभमे अछि।
बहुत गोटे ई शंका व्यक्त कऽ सकैत छथि जे कतेक गोटे एहन होएताह जिनका गजेन्द्र जी सनक प्रयाससँ लाभ भेटतन्हि ? ओना तँ मैथिली भाषीक संख्याक आधिकारिक आँकड़ा स्थिर नहि रहल अछि मुदा एहि तथ्यक विस्तारसँ वर्णन आवश्यक अछि। जनसंख्याक आँकड़ा वास्तविक नहि अछि जेना २००१ ई.क जनसंख्याक ई आँकड़ा: १,२१,७९,१२२. एकरापर अविश्वास पक्का अछि। जखन हम देखैत छी जे मैथिली भाषीक संख्याक संदर्भमे दस बरखक अंतरालमे लेल जनसँख्या आँकड़ामे बहुत बेशी परिवर्तन अछि। ई १८९१ सँ दस बरखक अंतरालमे जनसंख्याक आँकड़ामे बढ़ल आ घटल संख्याक तुलनासँ स्पष्ट अछि:
१९०१-११: +३.१२%
१९११-२१: -०.७७%
१९२१-३१: +७.६८%
१९३१-४१: +९.१३%
१९४१-५१: गणना नहि भेल
१९५१-६१: +२२.३५%
१९६१-७१: +२०.८९%
१९७१-८१: +२४.१९%
तार्किक रूपेँ वास्तवमे मैथिली वक्ताक संख्या स्थिर रूपेँ बढ़ल अछि। हमर अनुमानसँ किछु संकेत देल जा सकैत अछि जे अनिमानित ४ करोड़ धरि पहुँचैत अछि। १८९११ मे ग्रियर्सन (१९०८) अनुमान कएलन्हि जे मैथिली भाषीक संख्या ९२,८९,३७६ अछि। एकर विरुद्ध १९६१क जनसंख्या आँकड़ा एकरा ४९,८२,६१५ कऽ दैत अछि। निश्चयरूपेण १९६१ क जनसंख्या आँकड़ा वास्तविक नहि अछि। ओना ग्रियर्सनक (१९०९) जनसंख्या आकलन जे हुनकर १८९१ ई. मे कएल सर्वेक्षणपर आधारित अछि, सभक द्वारा सम्मति प्राप्त नहि अछि। वर्तमान शताब्दीक प्रारम्भमे मैथिली निम्न क्षेत्रमे बाजल जाइत छल:-
(i) सम्पूर्ण दरभंगा आ भागलपुर
(ii) मुजफ्फरपुरक ६/७ भाग
(iii) मुंगेरक १/२ भाग
(iv) पूर्णियाँक २/३ भाग
(v) संथाल परगनाक ४/५ भाग जे जनगणना आँकड़ामे वर्णित हिन्दी भाषी छथि।
१८१६ ई. मे उत्तर दिसुका भाषायी क्षेत्र नेपाल राजशाही द्वारा स्थायी रूपसँ नेपालमे सम्मिलित कए लेल गेल। ताहि द्वारे भाषा बजनिहारक संख्या पर पहुँचबाक लेल नेपालक जनसंख्याक १४% हिस्सा आर जोड़ए पड़त। पॉल ब्रास (१९७४:६४-६) गेटक गणना (जनसंख्या वर्ष १९०१ ई.) १८८५ ई.सँ उपलब्ध विभिन्न दस्तावेजक आधारपर करैत छथि आ १,६५,६५,४७७ संख्यापर पहुँचैत छथि। ई गणना ग्रियर्सनक आकलनकेँ आधार लए आ तकर बादक ८ दशकमे बिहारमे जनसंख्या वृद्धिकेँ आधार लए कएल गेल अछि। १९८१ क जनसंख्या आँकड़ाक आधारपर आ मिथिला क्षेत्रक बाहर पसरल मैथिलक संख्याकेँ जोड़ि कऽ आ १० जिलाक जनसंख्याकेँ (३१ जिलामेसँ) ध्यानमे राखि हम आ हमर सहयोगी १९८० क दशकक मध्यमे २,२९,७२,८०७ (सिंह, राजाराम आ बोस १९८५) क संख्यापर पहुँचलहुँ। ई संख्या हमर विचारमे जनसंख्याक दसवर्षीय वृद्धिकेँ ध्यानमे रखैत ४ करोड़ धरि पहुँचल अछि आ ताहि द्वारे बहुत रास लोक कोशक एहि भीमकाय प्रयाससँ लाभान्वित होएताह। ई सामान्यतः मानल जाइत अछि जे मैथिली मिथिला क्षेत्रक ब्राह्मण द्वारा बाजल जाइत अछि। ई एकटा पहिलुका कुप्रचार छल जे एकरा हिन्दीक बोलीक रूपमे सिद्ध कए चाहैत रहथि मुख्यतः हिन्दी भाषीक आधिकारिक संख्यामे वृद्धिक उद्देश्यसँ। मुदा उत्तरी बिहारक जाति संरचनाकेँ देखैत मैथिलीक जनसंख्या संबंधी आँकड़ा एकर सत्य कथा कहत। सापेक्षतया मैथिलीक बेस संख्या जे जनगणना रिपोर्टमे आएल, केँ एहि तथ्य मात्रसँ व्याख्यायित कएल जा सकैत अछि जे ओना तँ मैथिली भाषी जिलाक कतोक क्षेत्रमे ४६.८४% धरि मुस्लिम आ ३१.०६% धरि हिन्दू निवास करैत छथि, मैथिलीक लेल जे सहयोग आएल अछि से एहिमे सँ एकटा पैघ संख्या द्वारा मैथिलीकेँ अपन मातृभाषा घोषित कएने बिना संभव नहि छल।
मिथिलामे भाषा प्रयोगक एकटा सर्वेक्षण ई देखा सकैत अछि जे ओना तँ भाषाक औपचारिक क्षेत्र सभमे प्रयोग कम भेल अछि मुदा ई सेहो सत्य अछि जे एकर साहित्यिक उत्पादकता आ उपलब्धि आइ अखिल भारतीय स्तरपर बेशी नीक जकाँ सोझाँ आबि रहल अछि तुलनात्मक रूपेँ जतेक ई आइसँ २० बरख पूर्व अबैत छल। मधुबनी चित्रकला वा मिथिला कला आइ भरि भारतमे सुप्रसिद्ध भऽ गेल अछि आ विश्व-बजार धरि पहुँचि गेल अछि। मात्र तखने जखन मैथिली भाषी नव-पीढ़ी अपन सांस्कृतिक भाषायी बोधसँ हटबाक निर्णय करताह तखने एकरा कोनो खतरा सोझाँ अएतैक। हमरा विचारेँ सांवैधानिक अधिकार नहि भेटनाइ अप्रत्यक्ष रूपमे मैथिलीक लेल वरदान साबित भेल कारण ई साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधिकेँ बल देलक। ई पहिनहियेँ बहुत रास सांवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषा सभकेँ पाछाँ छोड़ि देलक, जेना मणीपुरी, कोंकणी, नेपाली आ सिन्धी सेहो। आ आब जखन की ई अष्टम सूचीमे अछि एकरा सभटा आधिकारिक आ आन तरहक संरक्षण भेटबाक चाही जकर ई अधिकारी अछि। एकरा एकर उपयोगकर्ताक सहयोग सेहो भेटबाक चाही जे आब आधुनिक अओजार सभक ताकिमे छथि जेना ऑनलाइन पत्रिका, ई-कोश, सुविधाजनक जंगम परिभाषा-कोश सभ आ स्वचालित प्रश्नोत्तर प्रणाली इत्यादि। ताहि स्तरपर ई मैथिली कोश जे अन्तर्जाल आ छपल दुनू संस्करणमे उपलब्ध होएत, से संग्रहकर्त्ता द्वारा एकटा महत्वपूर्ण योगदान होएत। मैथिली भाषी समुदाय आ आन भाषाक अनुवादक-विद्वान द्वारा गजेन्द्र ठाकुर आ प्रकाशक विशेष प्रशंसाक पात्र छथि। ई सत्य अछि जे मैथिली कोश-विज्ञान बहुत बादमे विकसित भेल, म.म. दीनबन्धु झाक प्रयासक बहुत बाद आ आब जा कए हमरा सभक सोझाँ महत्त्वपूर्ण कार्य सभ आएल अछि जेना पं गोविन्द झा द्वारा कल्याणी कोश वा जयकान्त मिश्रक वृहत् मैथिली शब्दकोश, मतिनाथ मिश्र ‘मतंग’ क मिथिला शब्द प्रकाश वा अलाइस डेविसक बेसिक कलोक्विअल मैथिली : अ मैथिली-नेपाली-अंग्रेजी वोकाबुलरी। संक्षिप्त मैथिली शब्दकोश आ द्विभाषी मैथिली शब्दकोश जे मैथिली अकादमी द्वारा संकल्पित अछि, अयनाइ एखन बाकी अछि। राष्ट्रीय अनुवाद मिशन द्वारा संकल्पित (देखू www.ntm.org.in) लांगमैन- सी.आइ.आइ.एल. बेसिक इंगलिश- इंगलिश- मैथिली जे कॉर्पोरापर आधारित अछिसेहो एकटा रुचिगर उत्पाद होएत। मुदा सभटा कहला आ केलाक बाद एहि कार्यक महत्त्व समय बितलाक संगे अनुभूत कएल जाएत।
२८.०२.२००९ प्रोफेसर उदय नारायण सिंह
मैसूर
निदेशक
केन्द्रीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.)
हम लिखैत छी कविता- उदय चन्द्र झा "विनोद"
हम लिखैत छी कविता
सूर्यकेँ अर्घ्य दैत छी
ककरो किछु फर्क भने नइँ पड़ौक
हमरा पड़ैत अछि
अहाँ पढ़ू वा नहि
हमरा लिखय पड़ैत अछि
हमरा लेल कविता लिखब
आइयो अछि आवश्यक
परमावश्यक अछि जीवाक लेल।
गजल- आशीष अनचिन्हार
-------------------------------------------------------------------------------------------------
गजल
रचना कतेक टका लगतै सपना किनबाक लेल
जूटल घर सरदर अँगना किनबाक लेल
हम मुक्त छी राग-विराग प्रेम-घृणा सँ
रचना कतेक टका लगतै भावना किनबाक लेल
सत्त मानू हम काज करै छी लोकतंत्रक पद्धतिए
रचना कतेक टका लगतै पटना किनबाक लेल
पत्रकारिता गुलाम छैक टी.आर.पीक
रचना कतेक टका लगतै घटना किनबाक लेल
बाल कविता-३ माटिक बासन- जीवकान्त
लाल-लाल अछि
गोल-गोल अछि कटगर
माटिक छाँछी दही जमओलनि
उज्जर, कठगर, सोन्हगर
छथि कुम्हार ओ धन्य-धन्य
जे भारी चाक घुमाबथि
माटि-पानिसँ चाकक ऊपर
नाना रूप बनाबथि
आंगुर छुआ, इशारा देलनि
माटि धयल नव रूप
लाल सुराहीमे जल झाँपल
घरमे छोटकी कूप
माटिक मुरुत बनइ सल्हेसक
कहबइ गामक देब
बड़ पवित्र अछि
माटिक बासन
सुन्दर आर सुरेब
Help Alexa Learn Maithili
Helping Alexa Learn Maithili: Cleo Skill: Amazon has a skill called "Cleo" that allows users to teach Alexa local Indian lang...
-
"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
-
जेठक दुपहरि बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि पछबा प्रचण्ड बिरड़ो उदण्ड सन सन सन सन...
-
उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...