भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Monday, May 19, 2008

मैथिली भाषा http://www.videha.co.in/

1.इच्छा-मृत्यु


हे भीष्म अहाँक कष्टक बखान,
सुनल छल खाइत पान-मखान,
मुदा बुझलहुँ नहि ई बात ,
ईच्छा-मृत्यु किए कै तात!
भीषणताक’ कथा नहि थोड़,
भूख,अत्यचार गरीब पर जोड़,
हरिजन शोलकन्ह थोड़हि-थोड़,
केलन्हि भयावह क्षत्रिय तोर,
घोषनि-ब्राह्मण सभ मोर,
केलन्हि रटन्ता विद्या तोर।
एक युधिष्ठिरपर छोरिकय राज,
छोड़ल अ’हाँ निसास।
हमर युधिष्ठिर पाँच सय चालीस,
पहिरथि खादी-रेशमी खालिस,
बुझल भीष्म हम आब ई बात,
पेलहुँ इच्छा-मृत्युएँ अहाँ निजात।





2.वार्ड नं 29 बेड नं. 32 सँ
सफदरजंग हॉस्पीटलसँ,
आइ देखल हम मीत,
डॉक्टर-पेशेंट फ्री इलाजक,
दंभ भरइ छथि,हा’ इष्ट।
साबुन-तेल सभपर टैक्स,
भरइ छथि सभ वासी,
लैटरीन गंदा अछि पुछने,
नर्स बिगरि देखबइ छथि अपोलोक पगपाती।
जाऊ अपोलो गंदगी जौँ लागय,
टैक्सक बात फिनान्स मिनिस्टरेकेँ जाऊ बूझाबय।


























3.ट्रेन छल लेट

जायब दिल्ली कोना,
अस्पतालक भर्ती कक्ष,
ट्रेन अछि लेट,
डॉक्टर अछि व्यस्त।
पहुँचलहुँ दिल्ली,
दिल्ली दूर अस्त,
दिल्लीक सरकारी डॉक्टर,
आइ,काल्हि,परसू,भेलहुँ पस्त।
युग बदलल,गणतंत्र आयल,
मुदा ट्रेन दिल्ली जायबला,
आ’ डॉक्टर दूनू फुर्र,
दिल्ली अखनहुँ अछि दूर।




















4.सूर्य-नमस्कार

ॐ मित्राय नमः।।1॥
आँखि करताह ठीक मह,
हिनकर लाली’ कत्था-पान,
दाँतक त’रमे जखन चबान,
हनूमानक सूर्यक ग्रहण पड़ल मोन,
लाली देखल चढ़िकय मचान।
सूर्य-ग्रहणक वर्ण अछि,नहि ई राहुक ग्रास,
विज्ञानक छैक सभ बात,कहलन्हि कुलदीप काक।
पृथ्वी घुमैछ पश्चिम सँ पूर्व,आऽ,
सूर्य केँ घूमबैत अछि पूर्व सँ पश्चिम।
मुदा कहू जे गर्मीमे उत्तर-पूर्व आऽ
जाड़मे उत्तर-पश्चिम कियै छथि सूर्य।

की नहीं चलैत छथि अपन अक्ष,
ग्रहणक हेतु राहुक नहि काज,
चन्द्रमा बीचमे किरणक करै छथि ग्रास।
सभ गणना कय ठामे देल,
बूड़ि पंडित केलक अपवित्रक खेल।
खेल-खेलमे देश गेल पाछू,
आबहुतँ सभ आगू ताकू।
पुनि-पुनि करि दण्ड हम देल,
स्थिरचित्त नेत्र ई सभक लेल;
राहू-केतु सभक दिन आब गेल।
गंगामे गोदावरी तीरथमे प्रयाग,
धन्यभाग कौशल्यामायकेँ राम लेल अवतार।
स्नानक बादक मंत्रक ई भाग,
खोलत भरत प्रगति-एकताक द्वार।
शक्ति देहु हे भानु मामहः;
ॐ रवये नमः।।2॥

मेरुदण्ड-पग होयत सबल,
सूर्य-नमस्कारक परञ्च पाठ प्रबल।
सूर्यवंशीयोक अहह अभाग,
कर्ण-तर्पणक नहि करू बात।
जाति-कर्मक ज्ञानक ओर,
छल ओतय, नहि किएक पकड़ल।
राहू-ग्रासक बातक मर्म, अहह;
ॐ सूर्याय नमः॥3॥
सात अश्व-रथक उमंग,
रथमूसल अजातशत्रूक संग,
महाशिलाकंटकक जोड़,
केलक मगध काज नहि थोड़।
जर्मनी-इटलीक एकताक प्रयास,
दुइ सहस्त्राब्दी पहिनहि काश,
रश्मिक सात-अश्वक रहस्य,
बूझल मगध ताहिये पहर।
छोड़ल भाव पकड़लहूँ अर्थ,
हा’ भरतपुत्र केलहुँ अनर्थ।
भरु शक्ति हे सूर्य अहाँ;
ॐ भानवे नमः।

श्वासक-कुंभक केलहूँ अभ्यास,
यादि पड़ल कुन्तीक अनायास।
सूर्यमेल सुफल भऽ गेल,
कवच-कुण्डल भेटल,
सेहो इन्द्रहि संगे गेल।
एकलव्य पहिनहि द्रोण केलन्हि फेल,
अर्जुन, कर्ण-विजय कय लेल?
अखनहुँ ई प्रतियोगितामे अछि भेल,
प्रतिभाक रूप छय विकृत कैल,
अखनहूँ धरि की तू ई सहबह !!
ॐ खगाय नमः॥5॥
सूर्या आश्विन गमनमे फेर,
अछि परस्पर द्वंदक देरि,
गुरु बृहस्पति ठाढ़े-ठाढ़ ,
करतथि ई सभक उद्धार।
अखनहुँ गुरु छथि गूड़,
शूल दैत जोड़ पर हमारा ऋणी,
कहैत जे बनओताह हमरा चिन्नी,
रहताह स्वयं कुसियारक गूड़,
गुरुक-गुरुत्व उष्ण-सुड्डाह हह,
ॐ पूष्णे नमः॥6॥
जकर अंकसँ निकलल विश्व
विश्वक प्राण,
आऽ तकर श्वासोच्छवास,
गुरुत्वक खेलकेँ बनेलहूँ अहाँ,
काछुक, सहस्त्रनागक फनि जानि कि-की?
एकटा रहस्य आर गहिरायल,
भरत-पुत्र गेल हेरायल।
तकर ध्यान हेयास्तदवृत्तयः;
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः॥7।।
सूर्यकिरण पसरि छय गेल,
कतेक रहस्य बिला अछि गेल,
तिमिरक धुँध भेल अछि कातर,
मुदा ई की अद्भुत भेल।
रात्रि-प्रहर देखलहुँ सप्त-ऋषिगण,
दिनमे सभ-किछु स्वच्छ अछि भेल,
मुदा नहीं तरेगणक लेल ई भेल।
सत्यक परत तहियायल बनल खेल,
हाऽ विश्ववासी शब्दक ई मेल,
अहाँक दर्शनक स्तंभ किए भेल।
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः।
ॐ मरीच्ये नमः॥8।।
अहँक तेजमे हे पतंग प्रभाकर,
सागराम्बरा अछि जे नहायल,
सौर ऊर्जाक नव-सिद्धांत,
नहीं की देलक कनियोटा आस,
मेघा-मास नहि अहाँक अछि जोड़,
तखन मनुक्खक बात की छोड़।
पढ़ल ग्रंथ ब्रह्मांडक बात,
तरणि सहस्त्र एकरा पार,
अंशुमाली तपनसँ पैघगर गाल।
तकर ऊष्णता की हम सहब;

ॐ आदित्याय नमः॥9॥

पिताक बात अछि आयल मोन,
बिना सावित्रीक गायत्रीक की मोल,
दुइ वस्तुक मेल कखनहुँ नीक,
कहुखन परिणाम भेल विपरीत।
कटहर-कोआ खेलाह तात,
देलन्हि ऊपर पानक पात।
पेट फूलल भेल भिसिण्ड,
परल मोन रसायन-शास्त्र।
तीव्रसंवेगानामासन्नः;
ॐ सवित्रे नमः॥10॥

मोन पड़ल चोरी केर बात,
चोरक आँखिमे आकक पात,
पातक दूध पड़ला संता चोर,
सोचलक आब आँखि गेल छोड़ि।
कहलक मोने बुद-बुद्काय,
करु तेल नहि देब मोर भाय।अर्कक दूधक संग करु तेल,
बना देत सूरदासक चेल।
गौवाँ केलन्हि बुरबकी एहि बेर,
चोरक बुनल जालक फेर।
तेल ढ़ारि पठौलन्हि चोरकेँ गाम।
मुदा रसायन भेल विपरीत,
चोरक आँखि बचि गेल हे मीत।
गौआँक काजक हम लेब नहि पक्ष,
बस सुनायल रटन्त विद्याक विपक्ष।
ध्यान धरह आ’ ई कहह;
ॐ अर्काय नमः॥11॥
पोथीक भाष्य आ’ भाष्यक भाष्य,
अलंकारक जाल-जंजाल,
विज्ञानक पाखंड,
ऋतम्भरा बुद्धि कतय छल गेल।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः;
ॐ भास्कराय नमः॥12।।
करु स्वीकार हमर ई कविता,
हे दुःखमोचन हे, हे सविता।
दूर करू विकार संपूर्ण;
केलहुँ सूर्य-नमस्कार हम पूर्ण।













5.सनT सत्तासीक बाढ़ि

कमलामहारानीकेँ पार कएल पैरे,
बलानकेँ मुदा नाउक सहारे।
मुदा आइ ई की भेल बात,
दुनू छ’हरक बीच ई पानि,
झझा देत किछु कालमे लियऽ मानि।
चरित्रक ई परिवर्तन देलक डराय,
नव विज्ञानक बात सुनाय।
बाँध-बाँधि सकत प्रकृति की?
भीषण भेल आर अछि ई।
हृदयमे देलक भयक अवतार,
देखल छल हम गामक बात।
बड़का क’लम आ’ फुलवारीमे,
बड़का बाहा देल छल गेल;
पानिक निकासी होइत छल खेल।
नव विज्ञानी ई की केलथि,
बाहा सभटा बन्न भऽ गेल।
फाटक लागल छहरक भीतर,
बालु मूँहकेँ बन्न कय देल।
एक पेड़िया पर छलहुँ चलल हम,
आरिये-आरिये, देखल रुक्ष।
पहिने छल अरिया दुर्भिक्ष,
आब दुर्भिक्ष अछि छुच्छ।
सिल्ली, नीलगाय सभटा सुन्न,
उपनयनमे शाही काँट अनुपलब्ध।
जूड़िशीतलक भोगक छल राखल,
गाछक नीचाँ सप्ताह बीतल।
नहि क्यो वन्यप्राणी आयल खाय,
चुट्टीक पाँत पसरायल जाय।
छहरपर ठाढ़ अभियन्ताक गप,
छलहुँ सुनैत हम निर्लिप्त।
मुदा जाहि धारकेँ कएल पैर पार,
तकर रूप अछि ई विस्तार।
नवविज्ञानिक चरित्रानुवाद होयत एहन नहि छल हम जानल,
मुदा देने छल ओकरा दुत्कार,
कुसियारक किछु गाछ,पानिक बीचमे ठाढ़।
माटिक रंगक पानि,आ’ हरियर कचोड़ गाछ,
छहरक ऊपरसँ झझायल पानि,
लागल काटय छहरकेँ धारक-धार।
ठाम-ठाम क़टल छल छहर,
ऊपरसँ बुन्नी परि रहल।
सभटा धान-चारु,भीतक कोठी,
टूटि खसल,पानिक भेल ग्रास।
हेलिकॉप्टरसँ खसल चूड़ा-गूड़,
जतय नहि आयल छल बाढ़ि,
किएकतँ पानिमे खसाकय होयत बर्बाद।
हेलीकॉप्टरक नीचाँ दौड़ैत छल भीड़,
भूखल पेट, युवा आ’ वृद्ध।
ओ’ बूढ़ खा’ रहल छथि चूड़ा-गूड़,
बेटा-पुतोहुक शोक की करि सकत पेटक क्षुधा दूर?

एकटा बी.डी.ओ.क बेटा छल मित्र,
कहलक ई सरकार अछि क्षुद्र,
ओकरा पिताकेँ शंटिंग केलक पोस्टिंग,
गिरीडीह सँ झंझारपुरक डिमोशन, कनिंग।
मुदा भाग्यक प्रारब्ध अछि जोड़,
आयल बाढ़ि पोस्टिंग भेल फिट।
सोचलहुँ जे हमरेटा प्रारब्ध अछि नीच,
शनियो नीच, सरस्वती मँगेतथि की भीख?
पहुँचलहुँ गाम, पप्पू भाइक मोन छोट,
विकासक रूपरेखा, जल-छाजन,निकासी..,...
बात पर बात फेर सरकारक घोषणा,
बाढ़ि राहत, एक-एक बोरा अनाज,
सभ बोरामे पंद्रह किलो निकाललथि ब्लॉकक कर्मचारी।
बूरि छी पप्पू भाई अहूँ,
मँगनीक बरदक गनैत छी दाँत,
पिछला बेर ईहो नहीं प्राप्त।
हप्ता दस दिनक बादक बात,
क्यो गेल बंबई,क्यो धेलक दिल्लीक बाट;
गाममे स्त्री,वृद्ध आ’ बच्चा,
बंबईमे तँ तरकारी बेचब,बोझो उठायब;
सभ क्यो केलक ई प्रण,
मायक स्वप्न अछि कोठाक होय घर,
अगिलहीक बाद फूस आ’ खपड़ा,
पुनः बनायल बखाड़ी जखन भेल बखड़ा।
भने भसल बाढ़िमे भीत,
बनायब कोठाक घर हे मीत।
खसल लागल ईंटा गाममे,
कोठा-कोठामे भेल ठाम-ठाममे।
पुरनका कोनटा सभ गेल हेराय,
जतय हेरयबाक नुक्का-छिप्पी खेलायल ह’म भाय।
आब सुनु सरकारक खटरास,
आर्थिक स्थिति सुधारल ह’म मेहथमे क’ खास।
आदर्श ग्राम प्रखंडक एकरा बनाओल,
कहैत छी जे ह’म बंबई दिल्लीमे कमाओल,
सुनु तखन ई बात,
जौं रहैत अस्थिर सरकार,
तँ रहैत नहीं दिल्ली नहि बम्मई,
विजयनहरम साम्राज्यक हाल,
पुरातात्विककेँ अछि बूझल ई बात।
धन्यभाग ई मनाऊ, हमरा जितबिते रहू हे दाऊ।
प्रगति-परिश्रम अहाँ करू,
हमर समस्यासँ दूर रहू।
बाढ़ि आयल सत्तासीमे,
तबाही देखलहूँ,मुदा कहैत छी हम,
देखू आबाजाहीकेँ।

धन्यभाग हे नेता भाई,
अहीसँ तँ मनोरंजन होइत अछि,
मेला-ठेला खतम भय गेल,
हुक्कालोली भेल दिवाली,
आ’ जूड़िशीतलक थाल-कादो-गर्दा भेल होली।
तखन अहूँक बात सुनने दोष नहि ,
कमायलेल हमहूतँ दिल्ली-बंबई आयल छी,
कमसँ कम अहाँक ई बड़कपन,
जे गामकेँ नहि छोड़ल,
मनोरंजनो करैत छी,कमाइतो छी,खाइतो छी।
आ’ दिल्ली बंबइ सेहो घुमैत छी।





































6. महाबलीपुरममे
असीम समुद्रक कातक दृश्य,
हृदय भेल उमंगसँ पूरित।
सूर्य-मंदिर पांडव-रथ संग,
आकश-द्वीपक दर्शन कयल हम।
नूनगर पानि जखन मुँह गेल,
भेलहुँ आश्चर्यित,गेलहुँ हमारा हेल।
लहरिक दीवारिसँ हमारा टकराय,
अंग-अंग सिहरि-सिहराय।
देखल सुनल समुद्रक बात,
बिसरल मन-तन लेलहुँ निसास।
सुनेलक ‘मणि’ गाइड ई बात,
एलथि विदेशी खोललथि ई सत्य,
पल्लव वंशक ई छल देन,
भारतवसी बिसरल तनि भेर।
मोन पडल अंकोरवाटक मंदिर,
राजा खतम भेल बिसरल जन,हरि-हरि।
टूटल इतिहासक तार जखन,
स्वाति भेल ह्रास अखन;
कास्पियन सागरक पानिक भीतरक मंदिर,
भारतीय व्यापारीक द्वारा निर्मित।
आब एखन अछि हम्मर ई हाल,
गामक बोरिंग पम्पसेट अमेरिकन इंजीनियरक खैरात।
छोडू भसियेलहुँ कतय अहाँ फेर,
प्रीति,पत्नी,हँसि-हँसि भेलथि भेड़।



7.स्मृति-भय
शहरक नागरिक कोलाहल्मे,
बिसरि गेलहुँ कतेक रास स्मृति,
आ’ एकरा संग लागल भय,
भयाक्रांत शिष्यत्व-समाजीकरणक।
समयाभाव,आ’कि फूसियाहिंक व्यस्तता,
स्मृति भय आ’कि हारि मानब,
समस्यासँ,आ’ भय जायब,
स्मृतिसँ दूर,भयसँ दूर,
सामाजिकरणसँ दूर-खाँटी पारिवारिक।
मुदा फेर भेटल अछि समय,युगक बाद,
बच्चा नहि,भ’ गेलहुँ पैघ;
फेरसँ उठेलहुँ करचीक कलम,
लिखबाक हेतु लिखना,मुदा
दवातमे सुखायल अछि रोशनाइ,
युग बीतल,स्मृति बिसरल,भेलहुँ एकाकी।
सहस्त्रबाढ़नि जेकाँ दानवाकार,
घटनाक्रमक जंजाल,फूलि गेल साँस,
हड़बड़ाक’ उठलहुँ हम,आबि गेल हँसी,
स्वप्नानुशासन,लट्पटाकेँ खसलहुँ नहि,धपाक;
भ’ गेलहुँ अछि पैघ।
बच्चामे कहाँ छल स्वप्नानुशासन,
खसैत छलहुँ आ’ उठैत छलहुँ,
शोनितसँ शोनितामे भेल,
उठिकय होइत घामे-पसीने नहायल,
स्मृति-भयक छोड़ नहि भेटल,
ब्रह्मांडक कोलाहल, गुरुत्वसँ बान्हल,
चक्कर कटैत,करोड़क-करोड़मील दूर सूर्य,
आ’ तकर पार कैकटा सूर्य।
के छी सभक कर्ता-धर्ता,
आ’ जौं अछि क्यो,त’ ओकर
निर्माता अछि के’, ओह! नहि भेटल छोड़।
लेलहुँ निर्णय पढ़िकेँ दर्शन,
नहि करब चिन्तन,तोड़ल कलम,
करची आ’ दवात।
के छी ई सहस्त्रबाढ़नि,
घूमि रहल अछि एकटा परिधिमे,
शापित दानव आकि कोनो ऋषि,
ताकैत छोड़ समस्याक,
आ’ समस्यातँ वैह,
के ककर निर्माता आ’ तकर कतय अंतिम छोड़,
के ककड़ स्वामी आ’ सभक स्वामी के?
आ’ तकरो के अछि स्वामी!
भेटल स्वप्नानुशासन,टूटल शब्दानुशासन,
तकबाक अछि समाधान,
फेर गेलहुँ स्वप्नमे लटपटाय,
खसब नहि धपाक,तकबाक अछि छोड़।
शंका-समाधान ल’ग,
डगमग होमय लागल अपना पर विश्वास।
जेना कोनो भय,कोनो अनिष्ट,
बढ़ा देलक छतीक धरधरी,
आ’ कि नेनत्वक पुनरावृत्ति!
जन्म-जन्मांतरक रहस्य,आत्माक डोरी?
आ’ कि किण्वन आ’ विज्ञान केलक सृष्टिक निर्माण!
पीयूष आ’ विषक संकल्पना,
स्वाद तीत,कषाय,क्षार,अम्ल कटु की मधुर!
खाली बोनमे उठैत स्वर,
षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद!
खोजमे निकलि गेलथि अत्रि, अंगिरा, मरीचि,
संग लेने पुलऋतु,पुलस्त्य आ’ वशिष्ठ।
प्राप्त करबालेल अष्टसिद्धि अण्मिक,
महिमाक, गरिमाक, लघिमाक, प्राप्तिक, प्राकाम्यक,
ईशित्व आकि वशित्व,
सप्तऋषिक अष्टसिद्धि।
नौ निधिक खोज-पद्म,महापद्म,शंख,मकर,
कच्छप, मुकुन्द,कुन्द, नील आ’ खर्व,
बनल आधार दशावतारक।
मत्स्यावतार बचेलन्हि वेद, सप्तर्षिकेँ,
आ’ संगे मनुक परिवार।
कूर्मावतार संग मंदार-मेरु आ’
वासुक व्याल, आनल सुधा-भंडार।
वाराहावतार आनल पृथ्वीकेँ बाहर,
चारि अंबुनिधिक कठोर छल जे पाश,
मारल हिरण्याक्ष।
नरसिंह भगवान बचाओल प्रह्लाद,
मारिकय हिरण्यकश्यप,
वामन मारल बालि नापल,
दू पगमे पृथ्वी आ’ तेसरमे दैत्यराज।
परशुराम, राम आ’ कृष्ण;
केलन्हि असुरक संहार,
आ’ बुद्धि बदललन्हि तकर विचार।
तैं की जे हुनक प्रतिमा,
खसौलक देवदत्तक संतान।
छिः।क्यो रोकि नहि सकल बामियान।
नहि कल्कि नहि मैत्रेय,
जल्दीसँ आऊ श्वेत-सैंधव सवारि,
चौदह भुवन आ’ तेरह विश्वक,
अनबा युग-कलधौत।
अर्णवक कोलाहलमे जाय छल,
नेनत्व डराय।
मुदा अखन विज्ञान टोकलक मोन,
ई तँ अछि किण्वनक सिद्धांत।
दशावतारे तँ छथि,
उत्पत्तिक आधुनिक सिद्धांत।
मत्स्य, कूर्म, तखन वाराह,
फेर नरसिंह, तखन वामन।
एकसँ दोसर कड़ी मनुष्यक रंग-रूपक,
ताकय लेल छल निकलल।
दऽ देलन्हि अवतारक नाम,
भरत-तनय रोकलन्हि वैज्ञानिक सोच,
कड़ी गेल टूटि, ताकयमे कल्कि,
ओ’ ताहि द्वारेतँ नहीं एलाह मैत्रेय।
लागि रहल अछि भेटल सूत्रक ओर आर,
फूसिये छलहुँ डरायल करब षोडषोपचार।
वेद, पुराण, महाभारत,रामायण,अर्थशास्त्र ओ’,
आर्यभट्टीय,लीलावती, भामती,राजनीति,गणित,भौतिकी केर समग्र चरित्र।
कर्मक शिक्षा गेल ऊधियाय, बिहारिमे अंधविश्वासक।
दर्शन भेल जतय अनुत्तरित,
आ’ विज्ञान देलक किछु समाधान,
तँ पकरब छोर एकर गुरुवर,
जे केलक समस्या दूर।
एकर परिधि भने अछि छोट,यदि परिधि करब पैघ,
तँ फेर बदलताह दर्शनक कांट्रेक्टर,
दर्शनकेँ धर्ममे आ’ धर्मकेँ
नरक-स्वर्गक प्रकार-प्रकारंतरमे।

भौतिकी आ’ एस्ट्रोनोमीकेँ बनेलथि एस्ट्रॉलोजी
विज्ञान बनल अंधविश्वास।

जखन नेति-नेति बनत उत्तर। तखन भने रहय दियौक प्रश्ने अनुत्तरित।
सभ गेलथि आगू, मुदा भरत-तनय छथि पाछू।
लीलावतीयोमे,भानुमतीयोमे कोना तकताह जातिगत भेद,
एकलव्यक प्रशंसामे व्यासजीक लेख मुदा कार्य नहि क्यो बढ़ेलक आगू।
सहस्त्राब्दीक अंतराल देलक जातिगत करताल।
विज्ञान आ’ कला,भूख आ’ अन्न;
भेलाह जातिगत छोड़ताह की स्वाछन्न।
यादि पड़ल गामक भोज,ब्राह्मण आ’ शोलहकन्हक फराक पाँति,
पहिल पाँतिमे खाजा-लड्डू परसन पर परसन,
दोसर पाँतिमे एक्के बेर देल।
रोकल कला-विज्ञानक भागीरथीक धार,
भेटल राहूक ग्रास।
यादि पड़ैछ पिताक श्राद्धकर्म,भरि दिन कंटाहा ब्राह्मणक अत्याचार,
आ’ साँझमे गरुड़ पुराणक मारि।
सौर-विज्ञानक रूपांतर आ’ ग्रहणक कलन,
दक्षिणाक हेतु भेल कलुषित।
रक्षा-विज्ञानक रामायणक पाठ,
कखन सिखेलक भीरुताक अध्यात्म।
ब्यास्जीक कर्ण-एकलव्य-कृष्णक पाठ सामाजिक समरसताक;
अखनहु धरि अछि जीवंत, नहीं भेल खतम;
दू-सहस्त्राब्दी पहिनेक उदारवादी सोच;
सुखायल किएक विद्या,सरस्वती-धार जेकाँ भेल अदिन;
तखनहि जखन विद्या-देवी छोड़लन्हि,
सुखा गेलीह बिनपानिक बिन बुद्धिक।
फेर अओतीह कि घुरि कए बदलि भेष,
एतय, हम्मर भारत देश?
हजार बर्षक घोँघाउज,कि होयत बंद?
आ’कि एकलव्य-कर्ण-कृष्णक पाठ छोड़ि,
युधिष्ठिर-शकुनिक एक्का-दुक्का-पंजा-छक्काक पढ़ब पाठ।
कच्चा बारहकेँ शकुनि बदलताह पक्का बारहमे,
आ’ करताह अपन पौ-बारह।
तीनटा पासा आ’ चारि रंगक सोरे-भरि गोटी,
करत भाग्यक निर्माण?
चौपड़क चारि फड़ आ’ एक फड़मे चौबीस घर,
की ई फोड़त भारतक घर?
युधिष्ठिर जौं भेटताह तँ कहितियन्हि,
जे चारि लोकक सोझ केला पासाक,
खेलयतहुँ जकर नियम होइछ हल्लुक।

दू व्यक्तिक रंगबाजी खेलकेँ अहाँ ओझरेलहुँ,
खेला खेलक संग नहि वरनT खेलेलहुँ देश आ’ प्त्नीक संग।
तैं दैत छी ह’म ई उपराग,
शकुनियोसँ पैघ कैल अहँ अपराध।
जकरे नाम लालछड़ी सैह चलि आबय ठोकर मारि पड़ाय,सतघरिया;
ती-ती –तीतार तार मेना बच्चा अंडा पार;
बच्चामे खेलाय छलहुँ आमक मासमे ई खेला;
पासाक खेल सेहो खेलेलहुँ द्विरागमनक बाद भड़फोड़ी तक कनियाक संग।
वासर-रैन हे युधिष्ठिर-रूपी भरत-तनय नहि खेलाऊ ई खेल,
सभकेँ दियऽ ई शिक्षा,दिअऊ संगीतक मेल;
स्मृति भय तोड़ल सुर,दियह सुमति वर हे अय गोसाञुनि,
गाबि सकी हमारा गीत।
कज्जल रूप तुअ काली कहिअए,
मात्र ईएह नहि सत्य हे मीत,
उज्जल रूप तुअ वाणी कहिअए;
सएह होयत हमर परिणीत।
झम्पि बादर दूर भेल भय,
गगन गरजि उठेलक हुतासन कए,
हृदय मध्य बाउग कए,
मौलि-मउल छाउर दए।
शंख-फूकब वीर रससँ,
करब शुरु भय-भंजन;
स्मृति-स्वप्नक दंडसँ,
खनहि तोड़ब खन-खन, करब मंथन।
सागर-द्वारि पर आनब भुजदंडसँ,
गामक दूटा पाँतिक भोजनक आस्वादन।
खोलब बंद बुद्धि-विवेक, रुण्डमालमसानीसँ,
तोड़ब पाँति नहितँ करब नगरकेँ पलायन।
गाम गाम रहत नहितँ,
डुबायब भागीरथीक धारसँ;
जे रोकलथि एकर धार प्रलय-सन,
डूबताह-डूबेताह दू पाँतिबला गामकेँ अपन कुकर्मसँ।
भेल भूमि विलास कानन,
निविल बोन विहसि आनल;
कण्टक मध्य कुसुम विकल छल,
दर्शन-घोषनि-ब्राह्मण ओझरल।
धरणि विखिन छल,गंगा-तनु झामर,नहि कल-कल।
विज्ञान गणितक कोमल-गल,
अभाग्य तापिनि केल’क छल।
बुद्धक नगर बसायब हम भल,
अहाँ देव रहब स्वर्ग करि-केलि,
गामक लोकहि बजायब ठाम,
सोंपलि गाम,पाँति तोहाऊ,
चलब दर्शन-अद्वैत मोहाऊ,
गामेमे रहब हम मीत,
गायब नव-दर्शनक गीत।
अपन दर्शनक लेल जे देलक,
अहाँकेँ गामक वनवास,
लेब तकर बदला हमारा जा कय,
कष्ट सहब देब अहाँकेँ निसास।
अपन दर्शनक लेल,दुइ सहस्त्राब्दिक खेल केलेलन्हि जे,
तनिकर गामक स्वरूप हम करब कानन,
बुद्धक नगर बनेलन्हि जे कण्टक,
कुसुम ततय आनब हम आनब।
सयमे दूटा दर्शनलेल फाजिल,
पासा फेकब सहस्त्राब्दीक चौपड़ चारि युग पर,
जे अज्ञात तकरो ताकब हमारा तात,
परञ्च जे ज्ञात,तकर त’ करए दिय’ हिसाब-किताब।

























8.फ्रैक्चर

हॉस्पीटलमे आबाजाही
गामक प्रवासीक।
बुझैत छलाह जखन समाचार
पिताक भर्त्तीक।
ठामहि दरभङ्गा बस-स्टैंडहिसँ,
गाम जयबाक बदला अबैथ हॉस्पीटल।

की केलहुँ शरीरकेँ,
आ’ नहिये बनेलहुँ जमीन-जत्था।
बच्चा सभक लेल नहि
राखल दृष्टि यैह व्यथा।
की सभ करैत, कतय नहि पढ़ैत,
चण्डाल किए भेलहुँ हे कक्का।
ओतहि बैसल छलाह टुटियाँ,
पिताक समक्ष,
पहिनहिँ बुझने छलाह जे,
छल ई फ्रैक्चर।
कहल पहिने समाचार तँ पुछिअन्हु,
चाहो आब अबैत होयत,
पैर हाथ धोआय अनिहन्हु।
कहल पैर टुटि गेल की कका,
पिता किछु बजितथि, बजलाह टुटियाँ,
होइछ टूटब आ’ फ्रैक्चर होयब एक्के,
नहि छलन्हि बूझल से,
कहल नहि चिंता करैत जाउ,
भगवान रक्ष रखलन्हि,
फ्रैक्चरे भेलन्हि, पैर टूटल नहि बाउ।






































9.मरकरी डिलाइट
सोझाँसँ त्रिपुण्ड-चानन,
देने आयल रहथि उदना।

देखल गामक प्रवासी जहिना,
कहल रौ छँ तोँ भाइ उदना।
संग कटलहुँ बाँस,
जड़िमे बान्ही गमछा हम आवाजकेँ दबेबा लेल,
आ’ टेंगारीसँ दू छहमे काटय छलह तोँ,
पुरनाहाक डबरामे लीढ़क नीचा नुका कय,
करी संपन्न ई काज बिन विघ्न।

हम पश्चात् भेलहुँ प्रवासी,
मरकरी-डिलाइट दयकेँ तोँ,
भेलह गामक वासी।
पंडितक अकाल छल नहि,
छलह कोनो कंपीटीशन,
भेलहुँ अहाँ औ’ भजार,
गामक नव उदयनाचार्य।










10.चोरबजारक जुत्ता
ओह नहि मोन पारू,
बुझल अपनाकेँ बुधियार,
आनल ई जुत्ता ततयसँ,
गेलहुँ जहिया चोर बजार।
सैंत कय राखल एकरा,
थाल कीच नहि लागय देल।
पैर दैत छलहुँ पानिमे आ’
जुत्ताकेँ हाथमे लेल।
दुइये दिन तँ पहिरल एकरा,
सीढ़ीसँ छलहुँ उतरैत,
सोलसँ उखड़ि सोझँहि निकलल,
शरीर आत्मासँ रहित जे भेल।
सीबि-साबि कय ची पहिरि रहल,
पाइ वसूली तैयो हएत।
नहि पूछू जौँ पूछय छथि क्यो,
मोन कनैछ भोकारि-पारक लेल।












11.की-की गछलियन्हि
ट्रेनमे भेटलाह घटक,
यौ फलना बाबू।
मुँह देखाबक जोग नहि छोड़ल,
आगाँ की-की बाजू।
शांत बैसू भेल की।
अहाँक अछैत होइत की,
एहि गरीबक पुत्रीक,
कन्यादान संभव की भाइजी।
औ’ अहाँ गछि लेलियन्हि,
भेल कोजगरा द्विरागमनो,
भेटलन्हि किछुओटा नहि वरागतकेँ,
कोनोटा इज्जत नहि राखलन्हि ओ’।
यौ अहूँ हद्द कएलहुँ।
यादि नहि की-की गछलियन्हि।
ओहि सुरमे छलुहुँ बेसुध,
हँ मे हँ टा मिलेलियन्हि।
कहैत गेलाह ओ’ एक पर एक,
नहि कहि कय बुरबकी करितहुँ।
लक्ष्मीपात्र छथि से लक्ष्मी देलियन्हि,
आबोतँ जान बकसू।
मॉटरसायकिल लय की करतथि,
देहो-दशा ताहि लेले चाही,
चेनक लेल बेचैन किय छथि, निचेन रहथु,
बाकी अक्चि बात ई।
ताकि रहल छी पुत्रक हेतु,
तकैत रही अँहीक आस,
औ’ छलहुँ कतय भाँसल,
अहाँ यौ घटकराज।
कोनो मोटगर असामी,
आनि करू उद्धार,
तीनू बेटीक कर्जसँ उबारथि जे,
चाही एहन गुणानुरागी।




















12. बेचैन नहि निचैन रहू
12.
दौरि-दौरि कय पोस्ट-ऑफिस,
भेलहुँ जखन अपस्याँत किएकतँ,
मनीऑर्डरक छल आस।
पुछल एखन धरि अछि नहि आयल,
मनीऑर्डर यौ प्रभास।
चिट्ठीयेक संग पठेने छलथि पाइ,
चिठी तँ समयेसँ पहुँचल,
टाका किए नहि बाउ।
पोस्ट बाबू जे कए नेने रहथि,
हुनकर पाइसँ कोनो उद्यम,
कहल चिट्ठी अबैत अछि,
बेटा अछि अहाँक छट्ठु,
पाइ पठबैत समयसँ तँ पहुँचैत,
मुदा पठबैत अछि छुच्छे संदेश।

बेचैन किए छी,
की अप्पन उद्यम करब हम अहाँक टाकासँ,
से बुझैत छी।

दोसर गामक पोस्टबाबू,
फेकैत अछि चिट्ठी कमलाक धारमे,
हम छी बँटैत तेँ कहैत छी जे भेटल अछि संदेश।




13.होइ ची जे हुम लुक्खी नहि छी
देखि हुनका(गारिपढ़ुआकेँ),
देबय लागलथि गारि,
लुखीक नाम लय कय,
सात पुरखाकेँ देलन्हि ताड़ि।
ओ’ अनठेने ठाढ़ बूझल,
दैत अछि ई लुक्खीकेँ गारि।
कहल अन्तमे(गारि पढ़निहार),
हौ की छह होइत ई,
मूँहतँ छह केहन अप्पन,
लुक्खी नहि अपनाकेँ बुझैत छी।



















14.क-ख सँ दर्शन
ट्युशन पढ़बय जाइत छँह,
इज्जततँ करैत छौक?
जलखै तँ नहिये परञ्च,
चाहो-पानिक हेतु पुछैत छौह।
ट्युशन कय खाइत छी,
की कहलहुँ हे से नहि बाजू।
द्रोणक नव अवतार छी हम,
से छियन्हि कहि देने,
जाइत देरी करह जलखैक व्यवस्था,
करू नहितँ छी नहि हम द्रोण,
औठाँक नहि कोनो लालसा थोड़।
मात्र पढ़ेबन्हि छओ महिना,
दर्शन नहि होयतन्हि क-ख केर,
नहि से नहि बाजू,
खुआ पिया कय केने अछि ढेर।














15.गाय
लाठी मारबामे कोनो देरी नहि,
बछी भेला पर शोको थोड़ नहि,
परन्तु छी पूजनीया अहाँ,
निबंध लिखैत छी अहाँ पर क्षमा।































16.बापकेँ नोशि नहि भेटलन्हि
यौ बुझलहुँ बुच्चुनक गप्प,
नहि करैत छी खिधांश,सुनू हम्मर साँच।

समयक छल नहि हमरो अभाव,
कहल हँ सुनाउ किछु भाषण-भाख ।

देखि पुछलियैक बुच्चुनकेँ हौ,
ई की उजरा नाँकसँ सुँघने जाइत छह,
कहलक काका खोखीँ होइत छल,
खोखीँक दवाइ अछि ई।
औ बाबू बाप मरि गेलैक, मोशकिल रहय नौँसि भेटब,
मुदा देखू बेटा सोँटैत अछि विक्स वेपोरब।



















17.पाइ
देखू पाइ नहि लिय’ अहाँ,
बेटा विवाहमे कारण जे,
पुतोहु करत उछन्नड़,
पाइ बाली आयत जौँ।
पूछल अहाँ सभ जे छलियैक लेने,
बेटा विवाहमे पाइ जे,
कहलन्हि अहूमे गप्प अछि दूटा।
पहिल जे पाइ दबबैत अछि लोककेँ।
मुदा दोसर, जे दबा दैत छियैक,
हमरासभ पाइकेँ ।
जे कहलहुँ गुनू तकरे,
हमरा पर नहि आउ दाइ गे।
















18.असत्य
हम कक्कर काज नहि कएलहुँ,
बेर पर मुदा काज क्यो आयल?
असत्य नहि कहियो छी बाजल,
सत्यक आस नहि छोड़लहुँ आ’
असत्यक बाट सेहो नहि ताकल।
यौ अहाँ, एहनो क्यो बजैत अछि,
असत्य नहि छी कहियो बाजल,
एहिसँ पैघ कोनो असत्य अछि।
क्यो दुःखी कहलकतँ काज केलहुँ,
अपने जा कय तँ नहि पुछलहुँ,
ओक्कर काज भय जाइत छैक,
तँ उपकरि कय पुछैत छी,
जौँ काजमे भाँगठ होइत छैकतँ,
निपत्ता भय जाइत छी,
बेर पर एहने काज अहाँ अबैत छी।

हम आलांकारिक प्रयोग केलहुँ तेँ,
टाँग पकरैत जाइत छी।













19.मसोमात
मलेमासक मेला-ठेला,
ट्रेनक धक्का मुक्की।
हँसैत-हँसैत पेट छी पकड़ल,
हे यै कनियाकाकी।
कहैइत छलीह एकटा मसोमात,
भीड़मे ओहि गाड़ीमे,
एतेक दुःखतँ ओहू दिन नहि भेल,
भेलहुँ राँड़जाहि दिन, हौ सवारी।























20. श्राद्ध नहि मरा जाय
एक मृत्यु फेर दोसर मृत्यु,
नेनाक पिताक-काकाक।
कक्काक लोकवेद छलन्हि दबंगर,
से चिन्तित छ्ल छोटका भाइ।
श्राद्धावधिमे दोसर मृत्यु भेने,
एक्के श्राद्धसँ होइछ दोसराक श्राद्ध,
एकक श्राद्ध जायत मराय,
छल चिंतित दूनू भाय।
कमजोरहाक संग पण्डितो देत नहि,
शास्त्र धरि किछुओ कहय,
मामागाम खबरि दियौक,
पिताक श्राद्धने मरा जाय।















21.बानर राजा
सिँह राजसँ भेल पीड़ित वन-जन,
इलेक्शन करायल मिलि सभ क्यो,
संख्या वानरक हरिण मिला कय,
छल बेशी से भेल ओ’ राजा।
सिंहराजकेँ तामस अयलन्हि,
खा’गेल हरिणराजक बच्चा एकदिन।

दाबीसँ हरिण गेल सम्मुख,
वानर राजा कहलन्हि,
बदमाशी अछि सिंहक,
कहि निकलि गेल जंगल बिच।
गाछक डारि पकड़ि छिप्पी धरि,
खूब मचेलक धूम।
तामसे विख भय सिंह राज,
खएलक बच्चा सभटा मृगराजक,
जखन सुनाओल जाय वनराजकेँ,
फेर वैह धूम फेर मचाओल।
मृगराज कहल हे नृप,
एहि हरकंपसँ होयत,
जीवित हमर संतान।
कहल नृप कहू भाय,
हम्मर मेहनतिमे अछि की कमजोरी,
करल प्रयास हम भरिसक मुदा,
बुझू हमरो मजबूरी।

22.समुद्री
संस्कृतक पाठ नहि पढ़ल,
कोन पाठ अहाँ पढ़ने छी,
पंडित कहि बजबैत अछि सभ क्यो,
त्रिपुण्ड धारण कएने छी!
रहथि हमर पुरखा पंडित,
छोड़ू हमरा इतिहास देखू।
मिथिलाक गौरव याज्ञवलक्य,
कपिल कणादक देश छी ई,
जैमिनीक,गौतमक अछैतहुँ,
पुछै छी पण्डित केहन छी।
सामुद्रिक विद्या ज्योतिषिक जनय छी,
नहि सुनल फेर बहस किए छी केने।
फेर छी हँसी करैत अहाँ यौ,
भविष्यक छी हम हाल लेने।














23.मैट्रिक प्लक

हौ सभकेँ सुनलहुँ केने बी.ए.,एम.ए.,
मुदा बुझल नहि छल डिग्री,
दोसरो होइछ आनो-आनो।
आइ एक पकठोस बटुक,
अछि आयल दलान पर पूछल,
कोन अंग्रेजिया डिग्री छी लेने,
मैट्रिक प्लक एहने किछु बाजल।
हौ काका अछि की ओ’ गेल,
ओकर गेलाक बाद हम बाजब,
कारण अछि भेल ओ’ फेल।





















24.क्रिकेट-फील्डिंग

हम बाबा करू की पहिने,
बॉलिंग आ’ कि बैटिंग।
बॉलिंग कय हम जायब थाकि,
बैटिंग करि खायब जे मारि।
पहिले दिन तूँ भाँसि गेलह,
से सुनह हमर ई बात बौआ,
बटिंग बॉलिंग छोड़ि-छाड़ि,
पहिने करह ग’ फील्डिंग हथौआ।























25.गाम
तीस वर्ष नौकरी कइयो कय,
नहि बनल एकोटा मित्र।
आस-पड़ोसी चिन्हैतो नहि अछि,
ऑफिसक पूछू नहि गति।
गाम छोड़ि शहर छी आयल,
हमर मुदा अछि मोन।
सात जनम घूरि नहि जायब,
गाम छोड़ि नगरक कोनो कोन।























26. लोली
एहि शब्द पर भेल धमगिज्जर,
लोल हम्मर अछि नहि बढ़ल,
एतेक सुन्दर ठोढ़केँ छी,
अहाँ लोली कहि रहल।
हँसल हम नहि स्मृतिकेँ,
छोड़ि छी सकलहुँ अहाँ,
फैशन-लिपिस्टिक युगोमे,
लोलीकेँ खराब बुझलहुँ अहाँ।


























27.जाति
ऑफिसमे छल काज बाँझल,
किरानी पर एकगोट तमसायल।
कोन जातिक छी अहाँ,धैर्य आब नहि बाँचल,
दशो लोककेँ कैक दिनसँ छी झुट्ठो घुमाओल।

छाती ठोकिकय जातिक नाम छल ओ’ बाजल,
दसोलोकक दिशि निन्गहारि ताकल,
ताहिमेसँ एक सजाति उठल बाजल,
घोल-आसमर्द्दक बीच कहलक नहि बाजू,
जातिक नाम धय कय,ई यादि राखू।
काज अछि हमरो बाँझल,मुदा जातिक अछि बात जौँ,
अछि कलेजावला जाति ई,से काज कतबो लेट हो।



















28.काँकड़ु
काँकड़ुगणकेँ छोड़ल एकटा ड्रममे,
नहि बन्न कएलक ऊपरसँ,
पुछल हम छी निःशंक अपने।
यौ मिथिलाक ई अछि काँकड़ु सभ,
एक दोसराक टाँग खींचत,
बक्शा बन्द कर्बाक करू नहि चिन्ता,
खुजलो सभटा सभ ठामे रहत।


























29.कैप्टन
वॉलीवॉलमे खेलाइत काल,
पप्पू भाइक होइछ हुरदंग,
खेलायब हम फॉरवार्डसँ,
नहि नीक खेलैत छे नीक,
आगू खेलाय देखैब हम।
सभ सोचि विचार कय,
बनाओल कैप्टन पप्पू भायकेँ,
टीमक हारि देखि कय जिद्द,खेलाय पाछुएसँ।
फारवॉर्ड बनू अहीं सभ नहि तँ मैच हारू आगुएसँ।






















30.कोठिया पछबाइ टोल

बूढ़ छलाह मरैक मान,
पुत्र पुछल अछि कोनो इच्छा,
जेना मधुर खयबाक मोन,
नीक कपड़ा पहिरबाक मोन,
फल-फूल खयबाक मोन।
कोठाक घर बनयबाक इच्छा,
पूर्ण भय पायत किछु सालक बादे,
कहू कोनो छोट-मोट इच्छा,
पूर करब हम ठामे।

हौ’ कहितो लाजे होइत अछि,
पछिबारि टोल कोठियाक रस्ता,
दुरिगरो रहला उत्तर ओकरे धेलहुँ,
जाइत दुर्गास्थान कारण,
टोल छल ओ’ अडवांस्ड।
मोनमे लेने ई इच्छा जाइत छी,
जे ओहि टोलमे होइत विवाह।
कहैत तावत हालत बिगड़ि गेलन्हि,
ओ’ बूढ़ स्वर्गवासी भेलाह।









31. पुत्रप्राप्ति
लुधियानाक मन्दिर पर रहैत छी,
पूजा पाठ करैत छी।
कहैत छी अहाँ ठकि कय हम खाइत छी,
गाममे तँ एक साँझ भुखले रहैत जाइत छी।
दस गोटेकेँ पुत्र प्रप्तिक आशीर्वाद देल,
पाँचटाकेँ फलीभूत भेल।
पुत्री जकरा भेलैक से हमरा बिसरि गेल,
मुदा पुत्रबला कएलक हमर प्रचार,
मिथिलाबाबाकेँ ठक कहैत छह,
गामक हमर ओ’ दियादी डाह।






















32. दि’न

विवाह दिन तकेबाक बात,
युवक बाजल पंडितजी अहूँ,
नहि बुझलहुँ अमेरिकाक प्रगति,
ओतय के दि’न तकबैत अछि कहू।
अहाँ अधखिज्जू विद्वान सुनू।
हमर तकलाहा दिनमे विवाह कय,
झगड़ा-झाँटि करितहु बुझु,
जिनगी भरि पड़ै अछि निमाहय।
ओतय बिनु दिनुक विवाह,
भोरसँ साँझेमे भय जाइछ समाप्त।




















33. दूध

महीस लागल छल लागय,
बहिन दाइक ठाम।
पहुँचलहुँ आस लेने,
ठाँऊ भेल बैसलहुँ ओहि गाम।
दूध छल जाइत औँटल,
मुदा बहिन दाइकेँ गप्पमे
होस नहि रहल।
भोजन समाप्ते प्राय छल,
दूध राखल औँटाइते रहल।
कहल हम हे बहिन दाइ,
अबैत रही रस्तामे देखल,
साँप एक बड़-पैघ,
एतयसँ ओहि लोहिया धरि,
दूध जतय औँटाइछ।
ओह भैया बिसरलहुँ हम,
दूध रहल औँटाइत,
मोनमे बात ततेक छल घुमरल,
होश कहाँ छल आइ।





34. बिकौआ
बड़ पैघ भोज उपनयनक,
पछबारि पारक छथि नव-धनिक।
बी.के.झा नाम नहि सुनल,
ओतय ठाढ़ ओ’ धनिक।
आरौ बिकौआ छँ तूहीँ,
दूटा पाइ भेल ओ’ भाइ,
कलकत्ता नगरीक प्रतापे।
नहि तँ मरितहुँ बिकौए बनि,
झा,बी.के. नाम भेल।
























35.गद्दरिक भात
गत्र- गत्र अछि पाँजर सन,
हड्डी निकलल बाहर भेल।
भात धानक नहि भेटयतँ,
गद्दरियोक किए नहि देल।
औ’ बबू गहूमक नहि पूछू,
दाम बेशी भेल।
गेल ओ’ जमाना बड़का,
बात-गप्प नहि खेलत खेल।























36.एकटा आर कोपर
गप्प पर गप्प,
प्रकाण्डताक विद्वताक।
हम्मर पुरखा ई,
हाथीक चर्चा,
सिक्कड़ि-जंजीर टा जकर बचल।
आँगनमे लालटेन नहि वरन् डिबिया टिमटिमाइत,
लालटेन गाममे समृद्धिक प्रतीक।
फेर दलान पर गप्पक छोड़,
एकटा कोपर दियौक आउर।






















37. महीस पर वी.आइ.पी.

छलहुँ हम सभ जाइत,
आर मारि लोकसभ पैरे-पैरे।
दुर्गास्थानमे छल कोनो मेला,
देखि हमरा सभकेँ बाट देल।
मारि लोक छल ओतय छलहुँ,
महीस पर हम चारिटा वी.आइ.पी.ये,
ओकर सभक बात छल लौकिक जौँ,
हमरा लोकनिक आध्यात्मिक तेँ,
मूल-गोत्रक प्रभावे!


























38.गप्प-सरक्का

नहि गेलथि घूमय बूरि,
बुझैत अछि बड्ड छैक काज।
आइ-काल्हितँ अहाँक चलती अछि,
हमरा सभतँ करैत छी बेकाजक काज।

































39.फलनाक बेटा
भोज देलन्हि रेंजरक बाप।
आह कमेने अछि तँ
फलनाक बेटा।
भोज समाप्ति पर लय,
पान सुपारी लय देखल,रेंजरकेँ जे लोक।
अओ कहू कोन बोनकेँ,
साफ कएल एहि भोजक लेल।



























40.ट्रांसफर

नॉर्म्सक हिसाबे ट्रांसफर,
कएल हम अहाँक,
कहल छल एकर कोन,
छल महाशय जरूरति।
कएल सेवा हम अहाँक,
राति-दिन भोर धरि।
अप्पन घरक काज छोड़ल,
अहाँक काजकेँ आगू राखल।
ताहिमे नहि हम लगायल,
नॉर्म्स केर नहि गप्प छल आयल।
ट्रांसफरमे ई कतयसँ,
आबि गेल श्रीमान।
तखनहि रोकल हुनक,
ट्रांसफर, औफिसर तत्काल।
















41.अटेंडेंस
लेट किए अएलहुँ अहाँ,
अटेंडेंस लगाऊ।
लाल बहादुर अयलाह जखन,
देखल छल क्रॉस लगायल।
नहि देल ध्यान साइन कएल,
पूछल अफसर लेट छी आयल।
ऊपरसँ कय हस्ताक्षर,
क्रॉस नुकयने नहि अछि मेटायल।
लाल बहादुर कहल सुनू ई,
के करत निर्णय तखन,
हम कएल हस्ताक्षर पहिने,
क्रॉस लगाओल अहाँ तखन।


















42.शो-फटक्का
की यौ बाबू शो-फटक्का,
बड्ड देने छी आइ।
पहिने कोनो दिन आबि बुझायब,
नहि जायब पड़ताय।
दहो-दिशा दस दिन काज,
देत चालि संग चालिस साल।
बड़ा देने छी शो-फतक्का,
करू पहिने किछु काज।


























43.भारमे माटि

काबिल ठाकुर कहल जोनकेँ,
भारमे माटि उघि लाऊ।
दुहु दिशि भार रहततँ,
बोझ दुनू दिशि जायत।
कम थाकब अहाँ आ’,
माटि सेहो बेशी आओत।
दियाद कलामी ठाकुर देखि ई,
सोचल ओ’ नोकसानक भाँज।
भरिया तोरा जान मारतह,
एके बोनिमे दोबर काज!
पटकि भार भरिया पड़ायल,
काबिल ठाकुर रहलाह मसोँसि।
लंघी मारि पैर खींचि कय,
अप्पन कोन भल भेल हे भाइ।















44.मजूरी नहि माँगह
भरि दिन खटि हम गेलहुँ,
माँगय अपन मजूरी।
कहलन्हि जौँ मजूरी मँगबह,
मारि देबह हम छूरी।
कहल नहि बरू दिय मजूरी,
मारू नहि परञ्च ई छूरी।
जियब जखन हम करब काज,
कय आनो ठाम जी-हजूरी।
























45.दोषी

दोषी छह तोँ।
नहि छी मालिक।
देलक दू सटक्का।
हम छी दोषी बाजल,
तखन बता संगीक पता।
साँझ धरि पड़ल मारि,
परञ्च नहि बता सकल ओ’,
नाम सङ्गीक।
कारण छल नहि ओ’दोषी,
नाम बतायत तखन कथीक।























46.कंजूस
तीमन माँगल भनसियासँ,
सूँघा रहल छल गमक।
कहियोतँ अयबह हमरा लग,
देबह तखन उत्तर।
शहर भगेलग पाइ कमेलहुँ,
माँगल पाइ किछु दैह,
बदला पाइक झनक सुनाबह,
गमकसँ नहि अछि मोन भरैत।




























47.लंदनक खिस्सा
लन्दनक साउथ हॉलमे शहीद भिंडरा,
लेस्टरमे शहीद सतवंत-बेअंत,
नहि मानब हम गुरुकुलकेँ,
होयत खिधांश सुनू तखन।
लेस्टरमे सभ अपने लोक,
नहि भेटैछ अंग्रेज एकोटा।
भेटने हमही मँगैत जाइत छी,
वीसा,पासपोर्ट सेहो सभटा।




























48.रिपेयर
ऑफिसक तालाक रिपेयर केलक,
बिल मोटगर जखन देलक कारीगर,
हम पूछल एहि ड्रॉवरक तँ,
ताला नहि मह्ग छल,
रिपेयरसँ सस्तमे तँ,
नव ताला आयत गय।
औ’ बाबू तखन कमीशन,
अहीं जाय आऊ द’।
























49.अंध विश्वास

सुमेर पर्वतक चारू-कात,
निशान देखाय कहलक गाइड,
सर्पक चेन्ह ई जे,
भेल समुद्र-मंथन एहिसँ,
सर्प-रस्सा अछि चेन्ह छोड़ि गेल,
चारू-कात तहीसँ।

संगी हमर हँसल कहलक,
कोनो पहाड़ पर जाऊ,
पहाड़ ऊपर चढ़य लेल,
गोलाकार रस्ता बनबाऊ।
नहितँ सोझे ऊपर चढ़ब,
सोझे खसय नीचाँ लय,
हओ गाइड तोहूँ विश्वासक,
छह अंध-काण्ड सुनेबा लय।


















50.गुड-वेरी गुड
भारतीय वाङमय केर,
व्याख्या एहि तरहेँ भेल,
जौँ किछु नीक भेल तँ नीक,
आ’ जौँ उलटा तँ सेहो ठीक।
प्रारब्धक भेल मेल,
आ’ लिखलहाक भेटबाक बात,
नीक भेल तँ गुड आ’
वेरी गुड जौँ भेल अधलाह।


























51. दूध
प्रथम जनवरी देखल एक,
भोरे-भोर दूधक लेल,
लागि लाइन जखन आयल बेर,
खुशी-प्रफुल्लित पाओल फेर।
मुदा रस्ताक बीचहि खसल दूध,
ओह भेल अपशकुन बहुत।
सुनि खौँजाइ कहल नहि से,
पता नहि शकुने होअय जे।
कहल हँ-हँ शकुने थीक,
माँ पृथ्वीकेँ लागल अर्घ्य,
प्रथमे पायल प्रथमक भोग,
हरतीह सभटा दुःख आ’ रोग।





















52. अभ्यास

पूछल गुरूसँ मृदंगक गति,
भय रहल अछि मंद,
गुरु कहलन्हि से करू तखन,
अभ्यास तखन प्रतिदिन।
प्रतिदिनतँ करितहि छी,
हम एकर सदिखन अभ्यास,
तहुखन हमर घटय अछि,
गति आ’ टूटय लय औ तात।
करू भोर साँझ अहाँ,
अभ्यास बिना करि नागा।
भोर करब अभ्यास जखन,
साँझमे टूटत नहि लय,
साँझमे करब पुनराभ्यास,
होयत भोरमे हाथ गतिमय।
गुरुसँ पूछल कोना जड़,
एहि पाथरसँ हम बनायब,
घोटक गतिमय बनबयमे,
हम माह जखन लगाओल।
कहल गुरू तखन देखू,
एहि जड़-पाथरमे घोटक,
जे बेशी लागय एहिमे,
तोड़ि हटाऊ अहाँ फटाफट।
कहल शिष्य ई काज,
अछि पहिलुक्का काजसँ हल्लुक।
कहल गुरू काज वैह अछि,
सोचबाक अछि ई फेर।
पहिने बेशी काज पड़ल छल,
आब थोड़ अछि भेल।































53. टी.टी.
53.

मजिस्ट्रेट चेकिङ भेल।
वीर सभ भागल बाधे-बाधे,
खेहारलक पुलिस जखन।
चप्पल छोड़ल ओतय बेसुध तन।
मुदा बुरबक लाल एकटा,
चप्पल लेलक उठाय,
दोसर चप्पल छोड़ि पड़ायल,
आयल गाम हँफाइत।
सभ हँसि पुछलक हौ बाबू,
एकटा चट्टी लय कय,
कोन पैरमे पहिरब एकरा,
दोसर खाली होयत।
ई बुरबकहा बुरबके रहल।
हँसि भेड़ सभ भेल।
दोसर दिन बाध सभ गेल ओतय,
देखल सबहक दुनू चट्टी भेल निपत्ता,
बुरबकहाक एक चट्टिये छल बाँचल,
नहि लेलक सोचि करब की एकटा।
मुँह लटकओने सभ घूरल आ’
नाम बदललक बुरबकहाक,
टी.टी. बाबूकेँ ठकलक ई,
नाम होयत सैह एकर आब।




54.आँखि
दादा पहुँचलाह डॉक्टर लग,
पुछल होइछ की बाबा,
मर्र डॉक्टर अहाँ छी,
बताऊ भेल की हमरा।
औँठासँ कय शुरू,
बताऊ पहुँचा धरिक समचार,
कहल पहिने करू ठीक,
आँखिकेँ ओ’ सरकार।
कोनो चश्मा नहि फिट पड़ल,
दूरबीनक शीशा जखन लगाओल,
कहल हँ अछि आब कोनहुना,
भाखय अक्षर चराचर।
सड़ही आम देखि बजलाह,
बूढ़ भेलहुँ हम अहाँ बुझय छी बच्चा,
बैलूनसँ खेलायब हम से वयस नहि अछि अच्छा।
यौ दादा ई सड़ही छी,
हम पड़ि गेल छी सोँचहि,
सड़ही आम अहाँ की देखब,
चश्माक नंबरे गलत पड़ल अछि।








55.हर आ’ बरद

मोन गेल भोथियायल,
जोति बरद सोचिमे पड़लहुँ,
एतय-ओतय केर बात,
हर जोतने भेल साँझ,
हरायल बरद ताकी चारू कात।
कहबय ककरा ई गप्प,
सुनि हँसत हमरा पर आइ,
मोने अछि भोथियायल,
अप्पन सप्पत कहय छी भाय।


























56.नरक निवारण चतुर्दशी
भुखले भरि दिन दिन बिति गेल,
नरक निवारण लय हम रहलहुँ,
साँझमे मंदिर विदा सभ भेल।
दुर्गापूजा लगमे आयल,
सिंगरहार केर चलती भेल।
माटि काटि गोबरसँ नीपि कय,
भोरे-भोर फूल लोढ़ि लेल।
सरस्वती पूजाक समय बैर,
अशोकक-गाछ-पात गोलीक लेल,
बोने-बोन महुआक फरक लेल,
घूमि-घामि अयलहुँ भेल-भेर।
अण्डीक बीया तेलहानीमे दय कय,
तरुआ ओकर तेलक खएल,
कुण्डली मिरचाइक फरमे अंतर,
बुझैत-बुझैत दिन कत’ गेल।
सुग्गोकेँ ई खोआय रामायण,
सुनला कत्तेक दिन भय गेल।












57.नौकरी

नौकरी नहि करी तखन,
भेटय तनखा तन खायत,
वेतन भेटत बिना तनहि,
आब कते बुझायब।
गाम घूरि जौँ जायब,
खायब की कमलाक बालू,
औ गुलाब काका पहिने,
हमरा ईएह बुझाऊ।
भरि दिनका ठेही अछि जाइत,
जखन जाइत छी सूइत।
भोर उठला संता अखनहुँ,
समस्यासँ अछि नहि छूटि।




















58.तीने टा अछि ऋतु
पुछल स्कूल किएक नहि अयलहुँ।
मास्टर साहेब होइत छल बर्खा,
जाइतहुँ हम भीगि।
बर्खामे जायब अहाँ भीगि,
गर्मीमे लागत लू-गर्मी,
आ’ जाड़क शीतलहरीमे,
हाड़-हाड़ होइत जायब यौ,
बौआ होइत अछि ई तीनियेटा ऋतु,
सालमे पढ़ाई-पढय कहिया जायब यौ।





















59.ऑफिसमे भरि राति बन्द

साँझ परल सभ उठल,
गेल अप्पन-अप्पन घर।
बाबूजी रहथि फाइलमे ,
करैत अपनाकेँ व्यस्त।
कौकिदार नहि देलक ध्यान,
केलक बन्द ओहि राति।
हमरा सभ चिंतित भेलहुँ,
कएलहुँ चिंतित कछ्मछ धरि प्राति।
भोरमे जखन दरबान खोलि,
देखलक हुनका ऑफिसमे,
माफी माँगि औँघायल,
पहुँचेलक घर जल्दीसँ।
एक बूढ़ी हमर पड़ोसी,
कहलन्हि कोना रहल भेल,
हमरा सभतँ नहि तकितहुँ बाट,
राति भरिमे भय जयतहुँ अपस्याँत।
बेटा सभ लजकोटर, मुँहचूरू,
छन्हि हिनक हे दाइ (हमर माइ)।
हॉलीक्रॉस स्कूल दरभंगामे,
भेल छल घटित एक बात,
गर्मी तातिलमे बच्चाकेँ,
बन्द कएल दरबान।
महिना भरि खोजबीन भेल,
नहि चलल पता कथूक,
स्कूल खूजल देखल बच्चाक,
लहाश सभ हुजूम।
बाप ओकर मुँहचुरू छल,
स्कूलसँ जौँ बच्चा नहि आयल,
सुतले छोटि गएल तखन,
गेल रहय पछ्तायल।
बच्चा देबाल पर लिखने रहय,
अपन कष्टक बखान,
पानि भोजन बिना,
भेलय ओकर प्राणांत।

















60. नानीक पत्र
पत्र आयल मोन ठीक नहि,
लक्ष्मी अहाँ देखि जाउ,
एहि बेर नहि बाँचब नहि,
ई गप भुझु बाउ।
पेटक अलसर अछि खयने,
चटकार सँ खाओल जेन मसल्ला।
अंतिम क्षण देखबाक बड्ड अछि मोन,
चिट्ठी लिखबाले अयलाह तेहल्ला।
क्यो नहि पहुँचेलकन्हि लक्ष्मीकेँ,
कहल चिट्ठीमे अछि भारभीस कएल,
एक आर चिट्ठी आएल जे,
माय गेलीह देह छोड़ि।
लक्ष्मीक बेटा बोकारि पारि कानय,
कहलक छी हम सभ असहाय।

नहि अयतीह हमर लक्ष्मी,
मायक मुँह देखय अंतिम बेर,
नाम रटैत अहाँक ई बूढ़ि,
गुजरि गेलि जग छोड़ि।
अपन घरक हाल की कहू,
भगवाने छथि सहाय,
घरघुस्सू सभ घरमे अछि,
दैव कृपा हे दाय।
61. केवाड़ बन्द

बाहरसँ आबयमे भेल लेट,
छोट भाय कएल केवाड़ बन्द,
किछु कालक बाद जखन खुजल,
भैय्या कहल हे अनुज,
दुःखी छी हम पाड़ि ई मोन,
अहिना जखन छलहुँ हम सभ बच्चा,
पिता कएलन्हि घर बन्द।
कनेक देरी होयबाक कारण,
पुछलन्हि नहि ओ’ तुरंत।
तुरंत काका सेहो बुझाओल,
बाल विज्ञानक द्वंद,
जे भेल से बिसरि शुरू,
करू नव जीवन स्वाच्छंद।
















62. जेठांश
छोट भायकेँ देल परती,
आ’ राखल सेहो जेठांश,
मरल जखन कनियाँ तखन,
भोजक कएल वृत्तांत।
कहल नमहर भोज करू,
पाइ नहि तकर न बहन्ना।
जकरे कहबय से दय देत,
चीनी चाउर सलहाना।
खेत बेचि कय हम कएलहुँ,
श्राद्ध पिताक ओहि बेर।
अपना बेरमे नहि चलत बहन्ना,
फेर बुझू एक बेर।
















63. सादा आकि रंगीन
ब्लैक एण्ड ह्वाइटक गेल जमाना,
सादा कि रंगीन।
दरिभंगा काली मंदिर लगक,
लस्सी बलाक ई मेख-मीन।
जखन बूझि नहि सकलहुँ,
तखन कहल एकगोट मीत,
सादा भेल सादा आ’
भांगक संग भेल रंगीन।






















64. गंगा ब्रिज
यादि अबैत अछि मजूर सभक मृत्यु,
चक्करि खाति खसैत नीचाँ पानिमे,
पचास टा मृत्युमे सँ दस टाक भेल रिपोर्ट,
चालीस गोटेक कमपेनसेसन गेल खाय,
नेता ठीकेदार आ’ अफसर।
एहि खुनीमा ब्रिजक हम इंजीनियर,
कहैत छी हमरा ईमानदार,
घूस कोना लेल होइत छैक ककरो,
देखैत गुनैत ई सभ यौ सरकार।




















65. दरिद्र
आठ सय बीघा खेत,
कतेक पोखरि चास-बास।
मुदा कालक गति बेचि बिकनि,
झंझारपुरसँ धोती कीनि,
घुरैत काल देखल माँच।
धोती घुरा कय आनल,
आ’ कीनल माँछ,पूछल,
हौ माछ ई काल्हि कतय भेटत,
धोतीतँ जखने पाइ होयत,
जायब कीनि लायब तुरत।
दरिद्रताक कारण हम आब बूझि गेल छी,
एक दिनुका गप नहि ,सभ दिनुका चरित्र छी।


















66.रौह नहि नैन

हँ यौ नैन अछि ई,
मुदा शहरक लोक की बुझय,
सभ ताकैत अछि रौह,
नैन कहबय तँ क्यो नहि कीनय।
छागर खस्सी आ’ बकरीक,
अंतर जौँ जायब फरिछाबय,
बिकायत किछु नहि बिनु टाका,
एहि नगरमे किछु नहि आबय।





















67. जूताक आविष्कार
जखन गड़ल एक काँट,
राजा कहलक ओछाउ,
बना माटिक हमर ई,
राजधानी निष्कंटक बनाऊ।

जखन सभटा चर्म आनि कय,
नहि कए सकल ओछाओन,
एक चर्मकार आओल आ’,
राजाकेँ फरिछाय बुझाओल।
पैर बान्हि ली चर्मसँ आकि,
पृथ्वीकेँ झाँपी ओहिसँ,
निष्कंटक धरती नहियोतँ,
मार्ग निष्कंटक होयत।















68. जोंकही पोखरिमे भरि राति
सुनैत छलहुँ जे बड़बड़ियाबाबू साहेबक,
लगान देलामे जौँ होइत छल लेट।
भरि राति ठाढ़ कएल जोंकही पोखरिमे,
बीतल युग अयलाह फेर जखन हाथी पर,
लेबाक हेतु लगान-लहना जहिना,
गारि-गूरि दैत हाथी पर,छूटल,
टोलक-टोल, मुँह दुसना,
जमीनदारी खतम भेलो पर सोचल,
किछु ली असूलि,
मुदा लोक सभ बुधियारी कएल,
नहि अएलाह ओ’ घूरि।



















69. गैस सिलिण्डरक चोरि
गेलहुँ रपट लिखाबय,
भेल छल सिलिण्डरक चोरि।
मोंछ बला थानेदार बजलाह,
बूरि बुझैत छी हमरा सभकेँ,
डबल सिलिनडर चाही,
एफ. आइ. आर. सस्ता नहि,
अछि एतेक हे भाइ।
हम कहल डबल सिलेण्डर,
तँ अछिये हमरा, अच्छा तँ
तेसर सिलेण्डर लेबाक अछि देरी।
तकल कतय चोरकेँ अहाँ,
अहाँक तकनाइ अछि जेना,
चैत अछि कोल्हूक बरद।
भरि दिन घुमैछ नहि बढ़ैछ,
एको डेग,अहँ नहि करू सैह,
प्रगतिक नाम पर एहि बेर।
स्कूटरक चोरिक बेर कहलक,
इंस्योरेंसक पाइ चाही,
कहू अहाँसँ कोर्टमे भ’ पायत,
देल अहाँसँ गबाही।
फेरी पड़ि जायत अहाँकेँ,
पुनः कोर्टमे जायब,
उलटा निर्णयो भ’ जायत,
बूझि फेर से आयब।
संग गेल ड्राइवर कहलक नोकरी,
छैक एकरे ठीक,
पाइयो अछि कमाइत करि,
रंगदारी,फेकैत पानक पीक।

































70. फैक्स
फैक्टरी पहुँचि कहल,
करू सर्च वारंट पर साइन,
मालिक कहल रुकू किछु काल धरि,
फोन करय छी आइ।
ट्रांसफरक ऑर्डर आयल,
रिलीविङगक संगहि,
अफसर निकलल ओतयसँ,
वारंट बिना एक्सीक्यूट केनहि।






















71.बूढ़ वर
कतय छी आयल आइ,
ताकि रहल छी वर,
20-20 वरखक दूटा,
अछि कतहु अभड़ल।
रंग सिलेबी सिंघ मुठिया,
अद्ंत तकैत छी अहाँ,
से भेटत कहिया।
की चाही एकटा पैघ,
20-2- केर दू गोटक बदला,
40 केर जौँ एकटा,
लय ली तँ छी हम तैयारे,
काज खतम करू सभटा।
















72.नौकर
फोन करि कय घरमे पूछल,
छथि फलना घरमे आकि,
आगू पुछितथि ओ’ ब्अजलाह,
दय कय एक धुतकारी।
एहि फोनक हम बिल भरैत छी,
नहि करू अहाँ पुनः बात,
मैसेज अहाँक देब हम पुत्रकेँ,
से छी के अहाँ लाट?
नौकर नहि अहाँक ने छी,
से हम अपन पुत्रक,
कनिया कहि टा छी हम नौकर,
बुझू ई यौ अफसर।



















73.क्लासमे अबाज
दुनू दिशक बेंचकेँ उठाकय पुछलन्हि,
आयल कोन कातसँ अबाज।
पकड़ल एक कातकेँ छोड़ल,
फेर कएल दू फारि।
आधक-आध करैत पहुँचलाह,
फेर जखन लग लक्ष्य,
दुइ गोट मध्य जानि नहि सकलाह,
अबाज केलक कोन वत्स।
रैगिंगमे सेहो अहिना कए,
सभकेँ कहल उठि जाऊ,
जखन क्यो नहि उठल कहल,
अहाँ अहाँ अहाँ एकाएकी उठैत जाउ।







74. एस.एम.एस.
कहू एहिमे अहाँ छी,
सहमत आ’ की छी अहाँ असहमत,
दुनू रूपमे दिय’ अहाँ,
अपन विचार कय एस. एम.एस.।
आहि कमाऊ अहाँ रुपैय्या,
हम बूरि छी भाइ,
न्यु टेक्नोलोजी छी ई सभ,
बूरि क्यो नहि आइ।







75. अल्हुआ
खाइत भेलहुँ हम अकच्छ तखन,
ई अकाल छल भेल भारि।
वेदपाठक सुनि कय आग्रह,
अएलहुँ हरिद्वार भुखालि।
भरि दिन मंत्र भाखि सोचल,
खीर पूड़ी सभ खायब।
मुदा ओतुक्का पंडित सभ,
खा’ ई सभ छल अघायल।
कएलक मेनू परिवर्त्तन कहलक,
आइ अल्हुआ अहि लायब।
बूझल नहि छल हमरा ई,
हाथ धोने छलहुँ बैसल।
आयल अल्हुआ देखि कर जोड़ि,
विनती कए हम पूछल (अल्हुआसँ),
हमतँ छी ट्रेनसँ आयल,
अहाँ कथीसँ अयलहुँ।
हमरासँ पहिने अहाँ एतय,
कोन सवारी सँ पहुँचलहुँ।

















76. दीया-बाती

आयल दीया बाती,
कतेक अमावस्या अछि बीतल,
जकर अन्हारमे लागल चोट,
कतेक जीव थकुचायल पैरहि,
अन्हारक छल थाती।
दीया बाती अनलक प्रकाश,
ज्ञान-ज्योतिक अकाश,
नमन करय छी हम एहि बातक,
अंधकार-तिमिर केर होबय नाश।






77. इटालियन सैलून
घर भेल समस्तीपुर,दिल्लीमे छी आयल,
खोलि सैलून इटालियन,अयलहुँ कमायले’।
पुलिसक रोक देखि कय गेलहुँ गाम घुरि,
पुनः छी आयल, सैलून कतय बानाओल?
ईटा पर जे छी अहाँ बैसल, सैह कहबैछ,
इटालियन, रोक अहू पर अछि पुलिसक,
सेहो अखनो धरि नहि बूझल यौ अहाँ।













78. शव नहि उठत

गामक कनियाँ मूइलि शव अँगनामे राखल,
सभ युवा कएने अछि नगर दिशि पलायन,
जे क्यो रहथि से घुमैत रहथि ब्लॉक दिशि,
साँझमे अयलाह देखल कहल गेलथि मुइल।
गामपर क्यो नहि उठेलक शवकेँ किएक,
हम कोना छुबितहुँ भाबहु ओ’ होयतीह ।
मुइल पर भाबहु की भैसुर केलहुँ अतत्तह,
समय बदलल नहि बदलल ई गाम हमर।









79.खगता
गोर लागि मौसीकेँ निकलैत,
पूछथि अछि किछु खगता,
आइ नहि पूछल जखन,
बैसल फेर ओ’ तखन।
फेर उठल फेर नहि पुछलन्हि,
सोचि जे रहैत नहि छन्हि काज।
जाइ कोना पाइक बड्ड अभाव।
लोक कहैछ, आयल छथि खगते,
ओना दर्शनहुँ दुर्लभ, अहीँ कहू,
खगतामे अछि पुछैत क्यो आगूसँ।






80. अतिचार
तीन साल छल अतिचार, नहि होयत एहि कारण।
पंडितबे सभ बुझथुन्ह, छन्हि पत्रा सभ बिकाइत,
पकड़त सभ बनारसी पत्राकेँ, सेहो नहि बिकायत ,
समय अभावेँ होयत ई, जौँ अतिशय भ’ जायत।














81. रबड़ खाऊ

रबड़ खाऊ आ’ वमन करू चट्टी,
अपचनीय तथ्य सभ देखल भ्रात,
बड़ छल बुधियार,केलक घटकैती,
शुरू जखन भेल सिद्धांत, विवाद,
विवाहठीक भेलाक बादक दोसर सिद्धांत,
लड़का विवाह कालमे बिसरलाह भाषण,
नव सिद्धांतक सृजन कय केलन्हि सम्मार्जन।









82.मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाइ

मुँह चोकटल नाम छन्हि हँसमुख भाइ,
बहुत दिनसँ छी आयल करू कोनो उपाय,
मारि तरहक डॉक्युमेंट देलन्हि देखाय,
पुनः-प्रात भ’ जायत देल नीक जेकाँ बुझाय,
शॉर्ट-कट रस्ता सुझाय देलन्हि मुस्काय,
मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाय।












83. बाजा अहाँ बजाऊ
मेहनति अहाँ करू,
फल हमरा दिय।
चित्र अहाँ बनाऊ,
आवरण सजाऊ,
हमर किताबक।
नृत्य हम करू,
बाजा अहाँ बजाऊ।
कृति हमर रहत,
मेहनति करब अहाँ,
आइसँ नहि ई बात,
अछि जहियासँ शाहजहाँ।







84.पिण्डश्याम
दहेज विरोधी प्रोफेसर,
केर सुनू ई बात,
पुत्री विवाहमे कएल,
एकर ढेर प्रचार।
पुत्रक विवाहमे बदलि सिद्धांत,
वधू रहय श्याम मुदा,
मारुति भेटय श्वेत,
सिद्धांतक मूलमे, छोड़ू विवेक।









85. राजा श्री अनुरन्वज सिंह
एक सुरमे बाजि देखाऊ,
नहि अरुनन्वन, नहि सिंह,
पूरा एकहि बेर बताऊ,
राजा श्री अनुरन्वज सिंह।














86.पाँच पाइक लालछड़ी
परिवार छल चला रहल,
बेचि भरि दिन,
पाँच पाइक लालछड़ी,
दस पाइमे कनेक मोट लपेटन।
देखैत नहाइ साँझमे,
ठेला चला कय आयल,
बेटाकेँ पढ़ायल,
आइ.आइ.टी.मे पढ़ि,
निकलल कएलक विवाह,
जजक छलि ओ’ बेटी।
पिता कोन कष्टसँ पढाओल,
गेल बिसरि, पिताक स्मृतिसँ दूर।
नशा-मदिरामे लीन, कनियाँ परेशान,
लगेलन्हि आगि, झड़कलि,
ओकरा बचेबामे ओहो गेला झड़कि।
कनियाँतँ गुजिरि गेलीह ठामे,
मुदा ओ’ तीन मास धरि,
कष्ट काटि पश्चात्ताप कए,
मुइलाह बेचारे ।
















87. थल-थल
कतबो दिन बीतल,
गद्दा जेकाँ थलथल,
पट्टी टोलक ओ’ रस्ता,
भेल आइ निपत्ता।
मटि खसा कय लगा खरंजा,
पजेबाक दय पंक्ति,
नव-बच्चा सभ कोना झूलत,
ओहि गद्दा पर आबि।
थल-थल करैत ओ’ रस्ता,
लोकक शोकक कहाँ भेल बंद,
माँ सीते की अहाँ बिलेलहुँ,
ओहि दरारिमे अंत।







88. चोरुक्का विवाह
सिखायब हिस्सक छूटत,
नहीं आनब कनियाँकेँ,
भायक माथ टूटत।
भेल धमगिज्जर सालक साल बीतत,
युवक-युवती दुनू भेल चोर विवाहक कैदी,
नहीं छल कोनो हाथ परंच,
छल सजा पबैत।
भागल घरसँ युवक आब पछतायल घरबारी,
मुदा की होयत आब,
ओ’ समाजक व्यभिचारी।
एलेक्शनक झगड़ामे भाय-भायकेँ मारल,
चोरुक्का विवाहक घटनामे ओकरा दोहरायल।






89. भ्रातृद्वितीया
कय ठाँऊ बैसलि,
आसमे छलि,
भाय आयत, बीतल,
साँझ आयल।
आँखि नोर छल सुखायल,
चण्डाल कनियाँक गप पर,
सालमे एक बेर छल अबैत,
सेहो क्रम ई टूटल।
कय ठाँऊ बैसलि,
धोखरि अरिपन विसर्जित,
छल साँझ आयल।





90. नव-घरारी
साँप काटल नन्दिनीकेँ,

Saturday, May 17, 2008

ईश्वर के दोसर रूप " माँ "

माँ,
अई भावना कए शब्द मs बाँधबहुत कठिन अछि ईश्वर के बनेल एहेंन कृति छथिन जिनका ख़ुद ईश्वर अपन सब सs करीब महसूस करैत छैथ ! माँ ईश्वर के दोसर रूप केना छैथ ........

जखन (ईश्वर) भगवान माँ बनेल्खिंन

ईश्वर माँ के सृजन मs बहुत व्यस्त रहथिन ओही बिच एक देवदूत अवतरित भेल्खिंन आर ईश्वर सs कहाल्खिंन : अपने इ चीज के निर्माण पर बहुत समय नष्ट के रह्लो'य ! अई पर ईश्वर कहाल्खिंन 'देखई मs इ खाली हाड़ - मांस के कृति छथिन लेकिन हिनका पास एहेंन गोद हेतैन जे दुनिया भर के सकूंन सs भरल हेतैन , हिनका पास एहेंन आँचल हेतैन जकरा छाव मए किन्करो डर नै हेतैन , हिनका पास एहेंन ममता हेतैन जै सs सब छोट - मोट पीड़ा ख़त्म भो जेतैन ........

देवदूत कहाल्खिंन -: हे ईश्वर, अपने आराम करू एहेंन कृति के हमही निर्माण के दैछी ! ईश्वर कहाल्खिंन नै हम आराम नै के सकैत छलो आर इ आहा के बस के बात नै अछि ! हिनकर निर्माण हम ख़ुद कर्बैंन ! ओई जीवेत जागेत कृति के निर्माण जखन ईश्वर के लेल्खिंन तखन देवदूत हुनका परैख कए अपन प्रतिक्रिया देल्खिं -: इ बहुत काफी मुलायम छैथ ! ईश्वर कहाल्खिंन "इ काफी सख्त सेहो छथिन ! अपने कल्पना नै के सकैत छलोs एहो सहो सहो सहो कते किछ बर्दाश्त के सकैत छथिन !

इ सहनशक्ति के प्रतिकृति छैथ'की वक्त आबे पर चंडी, कलिका, दुर्गा, सेहों बैन कs अवतरित हेथिन ! धरती पर हिनकर अनेक रूप देखई लय मिलत ! देवदूत अभिभूत भेल्खिंन ! अंत मए गाल पर हाथ फेर कए कहाल्खिंन अई ठाम त पैन टपैक रहलेंन य ! हम अपने सs कहने रही न की अपने हिनका मए काफी ज्यादा चीज जोइर रहलो'य ! अई पर इश्वर कहाल्खिंन इ पैन नै नोर छियेंन ......

एकर कुन काज ?

इ ख़ुशी, ममता, कष्ट, उदासी, सुख - दुःख सब के लेल माँ के भावनात्मक प्रतिक्रिया छियेंन !देवदूत कह्लाखिंन -: अपने महान छी ! अपने के बनेल इ कृति सर्वश्रेष्ठ अछि ! हम अपने के इ कृति माँ कए सत् - सत् प्रणाम करै छियेंन !

परिभाषा स परे छैथ माँ .....

माँ एक सुखद अनुभूति अछि ! ओ एक शीतल आवरण छैथ सच'म शब्द सs परे छैन माँ के परिभाषा !

माँ शब्द के अर्थ कए उपमा अथवा शब्द के सीमा मs बाँधब सम्भव नै अछि ! इ शब्द के गहराई, विशालता, कए परिभाषित करब सरल नै अछि कियेकी इ शब्द मs सम्पूर्ण ब्रह्मांड, सृष्टि के उत्पति के रहस्य समेल अछि ! माँ व्यक्ति के जीवन मs हुनकर प्रथम गुरु होई छथिन हुनका विभिन्न रूप - स्वरुप मs पूजल जै छैन कुनू मनुष्य अपन जीवन मs मातृ ऋण सए मुक्ति नै पैब सके छैथ ! अपन मिथिला संस्कृति मs जननी आर जन्मभूमि दुनु कए माँ के स्थान देल गेल अछि !

मनुष्य अपन भौतिक आवश्यकता के पूर्ति जन्मभूमि यानि धरती माँ सs ताए जीवनदायी आवश्यकता के पूर्ति जननी सs करैत छैथ माँ अनंत शक्ति के धारनी होई छथिन ! ताहि हेतु हुनका ईश्वरी शक्ति के प्रतिरूप मैंन'क ईश्वर के सद्र्श्य मानल गेल छैन ! माँ के करीब रैह'क हुनकर सेवा के'क हुनकर शुभवचन सs जे आनंद प्राप्त होइत अछि ओ अवर्णनीय अछि ! अपन देल गेल स्नेह के सागर के बदला माँ अपन बच्चा सs किछ नै चाहेत छथिन ! ओ हर हाल मs बच्चा के हित सोचे छथिन, तही हेतु हम अपन समस्त मिथिला वासी सs हाथ जोरी विनती करे चाहब की हुनका (माँ) अपन तरफ सs कुनू तरह के दुःख नै हुवे दीयोंन इ हमर सब के कर्तव्य होबाक चाही..

दवा सs कम नै अछि हँसी



हँसे सs तन - मन मय उत्साह के संचार होइत अछि, आर यदि आत्मा सs हँसल जे दवा सs बेसी फायदेमंद होइत अछि ! हँसी एक उत्तम टॉनिक के काज करैत अछि ! हँसे के लेल आई जगह जगह हास्य क्लब बैन रहल अछि , ताकि भागदौरयुक्त जिन्दगी मs तनाव स मुक्ति मिले ! अपने'क मालूम होबाक् चाही की बात करे वक्त हम सब जते ऑक्सीजन लै छी ओई स छः गुना बेसी ऑक्सीजन हंसेत काल लै छी ! अई तरह शरीर कs प्रयाप्त मात्रा मs ऑक्सीजन मिलेत अछि ! मनोवैज्ञानिको तनाव ग्रस्त आदमी कs हँसे के सलाह दैत छथिन ! मनोवैज्ञानिक के कहब अछि की जखन अपने मुस्कुराबैत छलो त आहाक मस्तिस्क अपने आप सोचे लगैत छैथ की अपने खुश छी ! इये प्रक्रिया पूरा शरीर कए प्रवाहित करैत अछि आर अपने सुकून महसूस करैत छलो ! जखन अपने हँसब शुरू करे छी त शरीर मs रक्त कए संचार तीव्र भो जैत अछि ! तनाव म अगर हँसे के क्षमता हुवे त दुखों कम महसूस होइत अछि ! हँसे सs बहुत लाभ मिले'य जेना की ...
* हँसे सs क्रोध नै आबैत अछि
* हँसे सs आत्मसंतोष के संग सुखद अनुभूति सहो होइत अछि
* शरीर मs नया स्फूर्ति के संचार होइत अछि
* हँसे सs मन म उत्साह के संचार सेहो होइत अछि
* ब्लड प्रेशर कम सेहो होइत अछि
अई तरह सs हँसे के बहुत फायदा देखल गेल अछि आहो हँसब आर हँसेब कए अपन आदत मए शामिल क लिय आर फेर देखु तनाव अपने के पास नै फटकत संगे अपने स्वस्थ सेहो रहब

Thursday, May 15, 2008

आहा'क गुस्सा ....

आजुक भाग दौर के जिंदगी मs तनाव ग्रस्त रहब आम बात अछि ! जखन हम सब तनाव ग्रस्त रहैत छलो तs कखनो कखनो गुस्सा ऐब सेहो स्वाभाविक अछि ! लेकिन गुस्सा यदि आदत के रूप ल लीय, तs ओई पर विचार करबा'क चाही ! बार बार गुस्सा करला सs हमरा सब के सेहत पर ओकर बहुत ग़लत प्रभाव परैत अछि ! कनी अपन अरोस परोस मs नज़र दौराबू आहा देखब की जे महानुभाव गुस्सा नै करैत छैथ, ओ बीमार बहुत कम परैत छैथ ! गुस्सा एक प्रकार के भावना अछि ! लेकिन जखन भावना व्यवहार आर आदत मs बदैल जै'य त अपने के साथ - साथ दोसरो पर ओकर ग़लत असर परे लगे'य ! तही लेल जरुरी अछि की अपन गुस्सा के सही वजह कs पहचाने के प्रयाश करी आर ओई पर नियंत्रण राखी

गुस्सा पर नियंत्रण करै लेल जरुरी अछि, आहा अपन बारे मs ठीक स जानी की आहा'क अपन प्रति व्यवहार केहेन अछि !

गुस्सा नियंत्रण करै हेतु किछ टिप्स

*कुनू तरहक समस्या सs लरै के क्षमता राखी आर ओई बात के पता करी की उक्त बात अपने क वाकई मs गुस्सा करै योग्य अछि !

*ओई बात के पता करै के प्रयास करी जै सs अहा'क गुस्सा आबैत अछि

*गुस्सा के समय अपन शरीर खास के क हाव - भाव आर हाथ - पेर के गति विधि के ध्यान राखी

*गुस्सा ऐला पर अपन ध्यान क दोसर पर केंद्रित करै के प्रयाश करी


अई तरह'क छोट - मोट बात कय ध्यान मs राखैत अपने अपन गुस्सा स निजात पैब सके छलो ! गुस्सा के वक्त कुनू तरहक प्रतिक्रिया स बच्बाक चाही ! ओई सs लगभग सब समस्या खुदे समाप्त भो जेत

नोट : आदमी के भावना (सोच),विचार आर आदत मs अंतसर्वबंध होईत अछि ! विचार, सोच कs प्रभावित करैत अछि आर सोच सs आदत बदलैत छले ! दोसर पहलू पर विचार करल जे तय अहो के आदत विचार मs आर फेर विचार भावना मs परिवर्तन आने छले !

Friday, March 21, 2008

मैथिली भाषा http://www.videha.co.in/

मान्यवर,

विदेहक नव अंक (अंक 6 दिनांक 15 मार्च 2008) ई पब्लिश भ' गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | एहि अंकमे विवेकानन्द झाक अंग्रेजी निबंध साहित्यकेँ समाजसँ जोड़बाक उद्देश्यसँ राखल गेल अछि। ज्योतिझाचौधरीक कविताक संग पञ्जीकारजीक पञ्जी पर निबंध देल गेल अछि। प्रवासी मैथिल स्तंभमे विदेहक इतिहासकेँ आँगा बढ़ाओल गेल अछि। रचना लिखबासँ पहिने.. स्तंभमे मैथिली अकादमी द्वारा निर्धारित भाषाक अंकन कएल गेल अछि, आँगाक अंकमे अन्यान्य रचनाक संग एकर सभ बेर पुनरावृत्ति कएल जायत।मिथिला कला चित्रकलाकेँ श्री उमेश कुमार महतो जे बहादुरगंज,किशनगंजक छथि, केर चित्रकला प्रदर्शित अछि। मुल्क राज आनन्द अपन अंग्रेजी किताब मधुबनी पेंटिंगक द्वारा मिथिला पेंटिंगक नामे केँ बदलि देलन्हि। मुदा बहादुरगंज, किशनगंजक ई चित्रकार प्रदर्शित करैत छथि जे वस्तुतः ई मिथिला पेंटिंग अछि।बालानां कृते द्वारा मैथिली बाल साहित्यक अभावकेँ दूर करबाक प्रयास कएल गेल अछि, तँ संगीत शिक्षा आ' संस्कृत शिक्षा द्वारा मिथिलाक संगीतमय आ' संस्कृतमय इतिहासकेँ पुनर्ज्जीवित कएल जा रहल अछि। मुख्य पृष्ठ प्रीति ठाकुर द्वारा (गौरी-शंकरक अंकन) डिजाइन आ' चित्रित कएल गेल अछि। गौरीजी शिवक गर्दनिसँ अपन गरदनि बाहर निकालि अद्भुत भक्त्ति-भाव प्रकट कएने, छथि। एहि मूर्त्तिकेँ आ' एहि मे खचित मिथिलाक्षरक 1200 साल उरान लिपिक छटा मिथिलाक खोज स्तंभमे देल गेल अछि, जतय नेपाल आ' भारतमे पसरल मिथिलाक माटिक अन्यान्य चित्र सेहो उपलब्ध अछि। मिथिलाक रत्नमे साहित्यकारक अतिरिक्त खेलकूद आ' अन्यान्य विधासँ संबंधित (संगीत,फिल्म,पत्रकारिता,इतिहास,संस्कृत आ' अंग्रेजी, अर्थशास्त्री,डिप्लोमेट,रजनीतिज्ञ आदि)मिथिलाक विभूतिक चित्र प्रदर्शित अछि। वेबसाइट खोलला अनन्तर विद्यापतिक 'बड़ सुखसार पाओल तुव तीरे'क वाराणसीक गंगातट पर शहनाइ पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान द्वारा बजाओल, आ' तबला पर किषन महाराज आ' वायलिन पर श्रीमति एन. राजम द्वारा बजाओल संगीत बाजि उठैत अछि। संपर्क_खोज स्तंभ पर मिथिला आ' मैथिलीक साइट सभक संकलन/लिंक देल गेल अछि।सभटा पुरान अंक आर्काइवक अंतर्गत राखल गेल अछि।विदेहक अपन सर्च इंजिनसँ विदेहक नव-पुरान अंककेँ ताकल जा' सकैत अछि। दोसर सर्च इंजिनसँ मैथिलीक विशेष संदर्भमे संपूर्ण वेबकेँ ताकि सकैत छी।पुरान किताब सभक डिजिटल इमेजिंग विदेह कॉर्पोराक अंतर्गत करबाओल जा' रहल अछि। वेब सर्चेबल डिक्शनरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जॉड़ि सकताह केर कार्य सेहो आरंभ कएल गेल अछि। मैथिलीमे बालानांकृतेक एनीमेशन सेहो शुरू कए देल गेल अछि।प्ञ्जीक मिथिलाक्षर आ' देवनगरीक पत्रक सेहो स्कैनिग शुरू भ' गेल अछि। ई सभ शीघ्र आर्काइवक अंतर्गत देल जायत।विदेहक पुरान अंक सामान्य आ' pdf फॉर्मेटमे आर्काइवक अंतर्गत राखल गेल अछि। पाठक पाक्ष्क पत्रिकाक pdf संस्करण डाउनलोड सेहो कए सकैत छथि।

अपनेक रचना आ' प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर

http://www.videha.co.in

ggajendra@videha.co.in

ggajendra@yahoo.co.in


 

Dear Sirs,

The new issue of Videha (Issue 6 date 15 March 2008)
has been e-published at http://www.videha.co.in/ .In this issue Vivekananda Jha's essay DO WE REALLY EXIST AS NATION has been published as it was realized that literature cannot remain separate from political realities.The poem of Jyoti Jha chaudhary, Panjikaarajee's essay has been placed and History of Videha has been further carried forward in Prawasi Maithili (in English) column.The standardization of Maithili has been attempted and for this in 'Rachna Likhba se pahine' column Maithili Academy,Patna's suggestions has been placed and it will be repeated under this column alongwith other articles in every forthcoming issue.Under A concept Mulkraj Anand coined in his book 'Madhubani Painting' and after that Mithila Painting came to be known as Madhubani Painting.Under column Mithila kala Chitrakala a young artist of Kishanganj District shri Umesh Kumar Mahto has shown that the painting is really Mithila Painting.In Children's column the paucity of Children's literature in Maithili has been addressed and in Samskrit Shixa and Sangeet Shixa the historical continuity of Mithila with Music and Samskrit has been revived.The frontpage has been designed and painted by Preeti Thakur(Gauri Shankar's Image). The Gauriji's neck is coming out of Shiva and the viewers get devoted by seeing them.The original photos and 1200 year old Mithilakshar script on this photo can be seen in Mithilak Khoj column, where exceptional seens of Mithila of India and Nepal has been placed. Under 'Mithila Ratn' personalities, old and new from the field of Maithili,Samskrit and English literature, from sports,film,music,of historians,journalists,economists,diplomats etc.has been placed. Whe one opens the site Vidyapati's Bar Sukh Sar paaol tua teere, rendered in music at the bank of The Ganges at Varanasi by Bharat Ratn Bismillah Khan on Shahnai,Kishan Maharaj on Tabla and Smt. N.Rajam on Violin gets playing.On sampark_khoj page links/addresses of sites on Mithila and Maithili has been placed.Videha's own search engine enables readers to search contents of old-new issues of videha.On the second search engine readers can search whole web in special context of Maithli.The Digital imaging of old Maithili books has been started under Videha Corpora Project,web searchable English Maithili dictionary in English and Roman scripts simultaneously has also been started where the readers will be able to add/suggest new Maithili words,animation project of children's literature has also been started,the scanning of Mithilakshara and Devanagari Panjis has also been started. All these will be soon available on Videha Archieve.The normal and pdf versions of old issues of videha has been placed at Videha Archieve section. The readers can download pdf versions of the fortnightly magazine.

Awaiting your creation and suggestion.

GAJENDRA THAKUR

http://www.videha.co.in

ggajendra@videha.co.in

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गजेन्द्र ठाकुर

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मैथिली भाषा

मान्यवर,

विदेहक नव अंक (अंक 6 दिनांक 15 मार्च 2008) ई पब्लिश भ' गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | एहि अंकमे विवेकानन्द झाक अंग्रेजी निबंध साहित्यकेँ समाजसँ जोड़बाक उद्देश्यसँ राखल गेल अछि। ज्योतिझाचौधरीक कविताक संग पञ्जीकारजीक पञ्जी पर निबंध देल गेल अछि। प्रवासी मैथिल स्तंभमे विदेहक इतिहासकेँ आँगा बढ़ाओल गेल अछि। रचना लिखबासँ पहिने.. स्तंभमे मैथिली अकादमी द्वारा निर्धारित भाषाक अंकन कएल गेल अछि, आँगाक अंकमे अन्यान्य रचनाक संग एकर सभ बेर पुनरावृत्ति कएल जायत।मिथिला कला चित्रकलाकेँ श्री उमेश कुमार महतो जे बहादुरगंज,किशनगंजक छथि, केर चित्रकला प्रदर्शित अछि। मुल्क राज आनन्द अपन अंग्रेजी किताब मधुबनी पेंटिंगक द्वारा मिथिला पेंटिंगक नामे केँ बदलि देलन्हि। मुदा बहादुरगंज, किशनगंजक ई चित्रकार प्रदर्शित करैत छथि जे वस्तुतः ई मिथिला पेंटिंग अछि।बालानां कृते द्वारा मैथिली बाल साहित्यक अभावकेँ दूर करबाक प्रयास कएल गेल अछि, तँ संगीत शिक्षा आ' संस्कृत शिक्षा द्वारा मिथिलाक संगीतमय आ' संस्कृतमय इतिहासकेँ पुनर्ज्जीवित कएल जा रहल अछि। मुख्य पृष्ठ प्रीति ठाकुर द्वारा (गौरी-शंकरक अंकन) डिजाइन आ' चित्रित कएल गेल अछि। गौरीजी शिवक गर्दनिसँ अपन गरदनि बाहर निकालि अद्भुत भक्त्ति-भाव प्रकट कएने, छथि। एहि मूर्त्तिकेँ आ' एहि मे खचित मिथिलाक्षरक 1200 साल उरान लिपिक छटा मिथिलाक खोज स्तंभमे देल गेल अछि, जतय नेपाल आ' भारतमे पसरल मिथिलाक माटिक अन्यान्य चित्र सेहो उपलब्ध अछि। मिथिलाक रत्नमे साहित्यकारक अतिरिक्त खेलकूद आ' अन्यान्य विधासँ संबंधित (संगीत,फिल्म,पत्रकारिता,इतिहास,संस्कृत आ' अंग्रेजी, अर्थशास्त्री,डिप्लोमेट,रजनीतिज्ञ आदि)मिथिलाक विभूतिक चित्र प्रदर्शित अछि। वेबसाइट खोलला अनन्तर विद्यापतिक 'बड़ सुखसार पाओल तुव तीरे'क वाराणसीक गंगातट पर शहनाइ पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान द्वारा बजाओल, आ' तबला पर किषन महाराज आ' वायलिन पर श्रीमति एन. राजम द्वारा बजाओल संगीत बाजि उठैत अछि। संपर्क_खोज स्तंभ पर मिथिला आ' मैथिलीक साइट सभक संकलन/लिंक देल गेल अछि।सभटा पुरान अंक आर्काइवक अंतर्गत राखल गेल अछि।विदेहक अपन सर्च इंजिनसँ विदेहक नव-पुरान अंककेँ ताकल जा' सकैत अछि। दोसर सर्च इंजिनसँ मैथिलीक विशेष संदर्भमे संपूर्ण वेबकेँ ताकि सकैत छी।पुरान किताब सभक डिजिटल इमेजिंग विदेह कॉर्पोराक अंतर्गत करबाओल जा' रहल अछि। वेब सर्चेबल डिक्शनरी जाहिमे पाठक नव-नव शब्द जॉड़ि सकताह केर कार्य सेहो आरंभ कएल गेल अछि। मैथिलीमे बालानांकृतेक एनीमेशन सेहो शुरू कए देल गेल अछि।प्ञ्जीक मिथिलाक्षर आ' देवनगरीक पत्रक सेहो स्कैनिग शुरू भ' गेल अछि। ई सभ शीघ्र आर्काइवक अंतर्गत देल जायत।विदेहक पुरान अंक सामान्य आ' pdf फॉर्मेटमे आर्काइवक अंतर्गत राखल गेल अछि। पाठक पाक्ष्क पत्रिकाक pdf संस्करण डाउनलोड सेहो कए सकैत छथि।

अपनेक रचना आ' प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर

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Dear Sirs,

The new issue of Videha (Issue 6 date 15 March 2008)
has been e-published at http://www.videha.co.in/ .In this issue Vivekananda Jha's essay DO WE REALLY EXIST AS NATION has been published as it was realized that literature cannot remain separate from political realities.The poem of Jyoti Jha chaudhary, Panjikaarajee's essay has been placed and History of Videha has been further carried forward in Prawasi Maithili (in English) column.The standardization of Maithili has been attempted and for this in 'Rachna Likhba se pahine' column Maithili Academy,Patna's suggestions has been placed and it will be repeated under this column alongwith other articles in every forthcoming issue.Under A concept Mulkraj Anand coined in his book 'Madhubani Painting' and after that Mithila Painting came to be known as Madhubani Painting.Under column Mithila kala Chitrakala a young artist of Kishanganj District shri Umesh Kumar Mahto has shown that the painting is really Mithila Painting.In Children's column the paucity of Children's literature in Maithili has been addressed and in Samskrit Shixa and Sangeet Shixa the historical continuity of Mithila with Music and Samskrit has been revived.The frontpage has been designed and painted by Preeti Thakur(Gauri Shankar's Image). The Gauriji's neck is coming out of Shiva and the viewers get devoted by seeing them.The original photos and 1200 year old Mithilakshar script on this photo can be seen in Mithilak Khoj column, where exceptional seens of Mithila of India and Nepal has been placed. Under 'Mithila Ratn' personalities, old and new from the field of Maithili,Samskrit and English literature, from sports,film,music,of historians,journalists,economists,diplomats etc.has been placed. Whe one opens the site Vidyapati's Bar Sukh Sar paaol tua teere, rendered in music at the bank of The Ganges at Varanasi by Bharat Ratn Bismillah Khan on Shahnai,Kishan Maharaj on Tabla and Smt. N.Rajam on Violin gets playing.On sampark_khoj page links/addresses of sites on Mithila and Maithili has been placed.Videha's own search engine enables readers to search contents of old-new issues of videha.On the second search engine readers can search whole web in special context of Maithli.The Digital imaging of old Maithili books has been started under Videha Corpora Project,web searchable English Maithili dictionary in English and Roman scripts simultaneously has also been started where the readers will be able to add/suggest new Maithili words,animation project of children's literature has also been started,the scanning of Mithilakshara and Devanagari Panjis has also been started. All these will be soon available on Videha Archieve.The normal and pdf versions of old issues of videha has been placed at Videha Archieve section. The readers can download pdf versions of the fortnightly magazine.

Awaiting your creation and suggestion.

GAJENDRA THAKUR

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Thursday, March 13, 2008

नैहर मs ससुराल के बुराई करब ठीक नै अछि

हमर परोसी मधु हर महीना दु महीना म नैहर आबैत छली ! नैहर ऐला के बाद परिवार के बिच अपन ससुराल के बहुत बुराई करैत छथि ! हम सास एहेंन केल्खिंन, हमर ससुर ओहेंन केल्खिंन वगैरह - वगैरह ! दरअसल मधु क लागे छैन की हुनकर ससुराल वाला बहुत ख़राब छथिन ! मधु के माँ - बाबूजी सम्झेत छैथ की ओ अपन बेटी के विवाह गलत घर में के देल्खिंन ! ओ सब मधु के हर बात पर यकींन करैत छथिन, करबो किये न कर्थिन ? मधु हुनका सब के लाडली बिटिया छथिन न ! मधु ससुराज गेला पर नै त अपन सास - ससुर के बात मानैत छथिन नै अपन पति के बात ! हरदम अपन पति स हुनकर माँ - बाबूजी आर दियर - ननद के बारे म शिकायत करैत रहैत छथिन ! मधु के पति हुनका बहुत सम्झेल्खिन तयो मधु म कुनू सुधर नै भेलैन, अंत म मधु के पति हुनका स परेशान भे क हुनका तलाक दै के फैसला केलैठ ! आखिर आई तरहक नोबत किये एलैन ?

इ समस्या खाली मधुवे के नै बल्कि सब युवती के अछि ! जे ससुराल क कहियो मन स नै अपने पावैत छैथ ! लिहाजा ससुराल के सब सदस्य हुनका ख़राब नज़र आबैत छैन ! ओ छोट - छोट बात सब क अपन दिल मए अई तरह वैसे लैत छथिन की ससुराल हुनका जैल के समान महशुस होई छैन ! नतीजा इ की नैहर पहुचते सब के बुराई करब सुरु करैत छैथ ! ऐठाम हम कहे चाहब की यदि हम सब युवती सहनशीलता स काज ली त हमरा सब क ससुराल नैहरो स निक लागत ! यदि हम सब दुनु परिवार के बिच सेतु बने के प्रयाश करी त दुनु परिवार के संबंध म जीवन भर मिठास कायम राहत ! नैहर म माँ - बाबूजी क बेटी के हर शिकायत क गंभीरता स नै लेबाक चाही ! हुनका चाही की अपन बेटी क ससुराल जय स पहिने निक जेका सम्झाबैथ की शादी के बाद हुनकर सास - ससुर हुनकर माँ - बाबूजी छथिन ! आर ननद - देवर , भाई - बहिन ! हुनका बड़ा के सम्मान करबाक चाही ! बेटी क मानसिक रूप स अई तरह तैयार करबाक चाही की ओ ससुराल क अपन घर सम्झेथ !

सास - ससुर के फर्ज छैन की ओ बहू क बेटी सम्झेथ किये की कुनू लड़की के लेल ससुराल हुनकर नया घर होई छैन जते ओ नया सिरा स जीवन सुरु करैत छली !

आई - कैल नौकरी करे वाली युवती क अपन कमाई के अभिमान होई छैन ! हुनका अपन पद आर वेतन के अहंकार नै करबाक चाही अई स पति आर देवर - ननद स संबंध म तनाव के स्थिति बैन सकेत अछि ! बात फेर अलग होई के या तलाक तक पहुच सके य ! नैहर म युवती बहुत किछ करैत छली, ससुराल म हुनका अपन बहुत इच्छा मारे परैं छैन ! हुनका चाही की ओ सब के पसंद - नापसंद के ख्याल रखैत !

हर इन्शान एक समान नै होई छैथ ! हर एक के निक - अद्लाह आदत होई छैन ! ऐकरा झगरा के मुद्दा नै बनेबाक चाही ! अई सब के पीछा आहा के एक मात्र लक्ष्य होबाक चाही की धीरे - धीरे अपने क ससुराल के माहोल के अनुसार खुद क ढालना चाही, आर घर के प्यारी बहु बने के प्रयाश करबाक चाही ! एक दिन ओ समय एबे करत जहिया ससुराल वला आहा के बात क ध्यान स सुनता आर आहा के विचार - विमर्स क महत्व देता ! ससुराल आर नैहर के बिच के नाजुक डोर क सम्हैर क राखब अहि के हाथ म अछि.

Saturday, March 08, 2008

ज़िम्मेदारी

किछ महानुभाव अपन ज़िम्मेदारी कए बोझ समझेत छैथ आर किछ महानुभाव ओकरा अपन जीवन के उद्देश्य अपन कर्म आर कर्तव्य ! आइठंम सवाल इ नै अछि की के की मानैत छैथ, सवाल इ अछि की एके बात के लेल इ अलग -अलग नजरिया किये ?

बोझ या जीवे के उद्देश्य - हर काज के साथ जिम्मेदारी जुरल अछि ! बिना जिम्मेदारी कs पूरा केना कुनू काज मs सफलता के उम्मीद बैमानी अछि ! आब इ आहा क सोच्बाक अछि की काज जिम्मेदारी स करबाक चाही या बोझ समझ कs ....

जना की हम ककरो चर्चा करे छी त हुनकर छवि ध्यान मs आइब जैत अछि ! उधारण स्वरुप कुनू बच्चा के चर्चा करला पर ओकर मासूमियत, ओकर शरारत, ओका भोलापन सब स्मरण भो जाय यs ! बात कुनू मित्र के करू त हुनकर सज्जनता, आचरण व्यवहार सब हमरा सब के ध्यान म आइब जैत अछि ! ओहिना जखन कुनू कामयाबी के बारे म कुनू कामयाब आदमी के बारे म हमसब चर्चा करेत छलो त पबे छी सब के पाछा हुनकर जिम्मेदारी के हाथ छैन ! जखन - जखन स्वतंत्रता के चर्चा चले य तs ओई मए जै क्रांतिकारी के नाम बच्चा - बच्चा के जुबान पर होई छैन ओ खाली अई लेल की ओसब जे जे जिम्मेदारी लेलैथ रहे ओकरा बखूबी समझल्खिंन आर पूरा तन - मन आर जान न्योछावर करे हेतुओ ओ अपन जिम्मेदारी स कखनो पीछा नै हटलेथ !


हम त इये कहब कुनू भी काज कs जिम्मेदारी स करे के प्रयाश करी ! चाहे काज पैघ हुवे या छोट जिम्मेदारी स करल गेल काज के मज़े किछ आर होई य ! जिम्मेदारी स काज करै वला मए विवेकशीलता, आत्मविश्वास आर सकारात्मक सोच के अमूल्य धरोहर हुनकर मार्ग प्रशस्त करैत खुद हुनकर काज म कामयाबी के मिसाल बैन क सदैव हुनकर मनोबल उंचा राखे छैन ! आई जतेक अविष्कार हमरा सब के बिच अछि ओकरो करे वला कियो सधारने इन्सान रहथिन ! आई नव - नव तकनीक नव - नव अविष्कार, हर क्षेत्र म दिनोदिन प्रगति के नव नव रास्ता तखने खुलल य जखन हमरा सब क अपन अपन जिम्मेदारी के समझक अहसास भेल अछि !


आई कियोभी चाहे आदमी, संस्था, समाज या देश अपन जिम्मेदारी कए समझे बिना किछ भी हासिल नै के सके छैथ ! एक छोट सन क देश जापान जकरा पूर्ण रूप स तहस - नहस करे म कुनू कसर बांकी नै राखल गेल, ओ फेर आर पहिने स कही ज्यादा उन्नत रूप मए विश्व भैर म अपन स्थान बनेना अछि ! कुन दम पर ? यकीनन अपन जिम्मेदारी स उद्देश्य समेझ कs ....

अहिलेल कहेछलो आहू अपन जिम्मेदारी पूरा करे म कुनू कसर बांकी नै राखी ! यदि अपने क इ बोझ महसूस हुवे त यकीनन आहाके ओकरा बारे म आगा किछ भी सोच्बाक व्येथ अछि ! आहा ओई काज क ओहिठाम छोइर क चैन के निंद ली इये आहा के लेल बेहतर हेत ! कियेकी जखन आहा अपन आचरण आर व्यवहार मए कुनू बदलाव नै लाबे चाहे छी त कम स कम अपन समय बर्बाद नै करू ! पुरातन काल मए कतेक लड़ाई भेल, जते जिम्मेदारी स काज करल गेल ओते हुनका सब क जीत मिललैन आर जते जिम्मेदारी ठीक ढंग स पूरा नै भेल ओई ठाम परिणाम मए मिललैन - हार

अपने कs माने परत यदि आदमी कुनू जिम्मेदारी अपन इच्छा स लैत छैथ त ओ हुनकर ताकत आर जीवन जीवे के उद्देश्य बैन जाय छैन ! मुदा यदि कुनू जुम्मेदारी ज़बरन लिए परे त ओ बोझ महसूस हुवे लागे य ! सवाल जिम्मेदारी के अहसास के अछि ! जकरा संक्षेप्त म कहल जाय त अपन हालत आर हालात के जिम्मेदारी यदि आहा स्वयं पर ली तखने अई मs सूधार हेत !!

Friday, March 07, 2008

खिस्सा जीवनक ( मैथिली भाषा लघु कथा)


एक आदमीक घर एक सन्यासी पाहुन बनि कs एलखिन। रातिमे गपशपक बीच ओऽ संन्यासी आदमीसँ कहलखिन की अहाँ एहि ठाम ई छोट-मोट खेतीमे की लागल छी ! साइबेरियामे किछु दिन पहिने हम यात्रा पर रही, ओइ ठाम जमीन एतेक सस्ता अछि मानू अहाँकेँ मँगनीम्वे भेट जाएत! अहाँ अपन ई जमींन बेचि कऽ साइबेरिया चलि जाऊ ! ओहिठाम हजारो एकड़ जमीन भेट जाएत एतबे जमीनमे ! ओइ ठामक जमीन बड उपजाऊ छइ, आर ओइ ठामक लोक एतेक सीधा-साधा की करीब-करीब जमींन मुफ्तेमे दऽ देत! ओइ आदमीकेँ वासना जगलनि! ओऽ दोसरे दिन अपन सभ जमीन बेचि कऽ साइबेरिया चलि देलथि! जखन ओऽ साइबेरिया पहुँचला तँ सन्यासीक गप हुनका सत्य लगलनि! ओ ओइ ठामक आदमीसँ पुछलखिन की हम जमीन कीनय लय चाहए छी ! तँ हुनका जबाब भेटलनि, जमीन कीनए हेतु अहाँ जतेक पाइ अनलहुँ यऽ ओकरा राखि दियौ ; आर जीवनक हमरा लग खाली इएह उपाय अछि की जमीन बेचि दी! काल्हि भोर सूरज उगइ पर अहाँ निकलब आर साँझ सूरज अस्त होएबा धरि जतेक जमीन अहाँ घेर सकी घेर लेब ओऽ अहाँक भऽ जाएत!
बस चलैत रहब .........साँझ सूरज डूबए तक जतेक जमीन अहाँ घेर सकब घेर लेब ओऽ अहाँक भऽ जाएत! बस शर्त ई अछि की जतएसँ अहाँ चलब शुरू करब साँझ सूरज डूबएसँ पहिने अहाँकेँ ओही ठाम वापस आबए पड़त !
ओऽ आदमी राति भरि सूति नञि सकलाह, सत्य पुछू तँ यदि हुनका जगह पर अहूँ रहितहुँ तँ ओहिना होइतए; एहेन क्षणमे कियो सुति सकैत छथि? ओऽ आदमी राति भरि योजना बनाबैत रहलाह की कोन तरहसँ कतेक जमीन घेरल जाय! भोर होइते पूरा गामक लोक जमा भऽ गेलखिन। जहिना सूरज उगलथि ओऽ आदमी चलब शुरू केलाह ! चलएसँ पहिने ओऽ रोटी आर पानि सभ संगमे लऽ लेलथि रहए ! रास्तामे भूख प्यास लागै पर सोचने रहथि चलिते-चलिते भोजनो कऽ लेताह! हुनकर खाली इएह सोचब रहनि की कुनू भी स्थितिमे रुकनाइ नञि छइ ! चलैत-चलैत आब ओऽ दौड़ब शुरू कऽ देलखिन सोचलथि बेसी जमीन घेर लेब ! ओऽ दौगैत रहलाह, सोचने रहथि ठीक बारह बजे घुरि जाएब , ताकि सूरज डूबैत-डूबैत वापस पहुँचि सकी ! बारह बाजि गेलनि, ओऽ मीलो चलि चुकलथि रहए, मुदा वासनाक कोनो अंत छइ ? ओऽ सोचऽ लगलाह, बारह तँ बाजि गेलए आब लौटबाक चाही ; मुदा सोझाँ बला जमीन बड़ उपजाऊ छइ कनी ओकरो घेर ली! लौटेत समय कनी तेजीँ स दौगए पड़त आर की एके दिनक तँ बात छइ तेजीसँ दौग लेब !
दौड़ए के चक्करमे ओऽ भूख-प्यास सभ बिसरए देलखिन, नञि ओऽ किछु खेलथि नञि पिलथि बस दौगेत रहलाह! रास्तामे ओऽ रोटी पानि सभ फेक देलखिन ! बस लगातार दौगैत रहलाह। एक बाजि गेलनि मुदा हुनका घुरऽ के मोन नञि होइत रहनि, किएकी आगाँक जमीन आर सुन्दर-सुन्दर रहए ! मुदा आब ओऽ लौटएक प्लान बनेलथि; दु बजे ओऽ लौटब शुरू केलन्हि! हुनका डर सताबए लगलनि की घुरि सकब की नञि ! ओऽ अपन सभ ताकति वापस दौगएमे लगा देलथि ; लेकिन तागति ख़तम होइक करीब रहनि ! सुबहेसँ दौगैत-दौगैत हाँफऽ लगलाह, ओऽ घबराबऽ लगलाह की सूरज डूबए धरि घुरि सकब की नञि ! दुबारा अपन सम्पूर्ण तागति दौगएमे लगाऽ देलथि मुदा आब सुरजो डूबए लगलाह .......! बेशी दूरीयो आब नञि बचलनि, ग्रामीण सभकेँ ओऽ देखऽ लगलाह ! सभ गामक लोक हुनका आवाज़ पर आवाज़ दैत रहनि, सब हुनका उत्साहित करैत रहथिन आबि जाऊ ......आबि जाऊ। ओऽ आदमी सोचए लगलथि की अजीब आदमी एहिठामक छथि ! ओऽ अपन अंतिम दम लगाऽ देलथि, एम्हर सूरज डूबैत छथि आर ओम्हर ओ दौगैत छथि! सूरज डूबैत - डूबैत पाँच - सात गज पहिने ओऽ खसि पड़लाह, तैयो दम नञि तोड़लथि। आब हुनकासँ उठल नञि जाइ छनि, किछ दूरी बाँकी देखि ओऽ घुसकैत- घुसकैत पहुँचए के प्रयास करए लगलाह! सूरजक अन्तिम किरण विलिप्त होइसँ पहिने हुनकर हाथ ओहि जमीन पर पड़ि गेलनि जतएसँ ओऽ दौगब शुरू केलथि रहए ! एक तरफ सूरज डूबल दोसर तरफ हुनकर अंतिम साँस सेहो हुनकर साथ छोड़ि देलकनि। ओऽ मरि गेलाह, बहुत मेहनति केलखिन रहए ! शायद ह्रदयक दौरा पड़ि गेलनि ! ओइ ठाम जमा गामक सब सोझ-साझ कहाबए बला ओऽ दौगएक चक्करमे भूख-प्यास सभ बिसारि देलखिन नञि ओऽ किछ खेलथि नञि पिलथि बस दौगैत रहलाह ! रास्तामे ओऽ रोटी-पानि सभ फेक देलखिन ! बस लगातार दौड़ैत रहलाह। एक बाजि गेलनि मुदा हुनका घुरबाक मोन नञि होइत रहनि, किएकी आगाँक जमीन आर सुन्दर - सुन्दर रहए ! मुदा आब ओऽ लौटेबाक प्लान बनेलथि; दु बजे ओऽ लौटब शुरू केलाह ! हुनका डर लागऽ लगलनि की घुरि सकब की नञि ! ओऽ अपन सब ताकति वापस दौड़एमे लगाऽ देलथि ; लेकिन ताकत ख़त्म हेबाक करीब रहनि ! भोरेसँ दौड़ैत - दौड़ैत हाँफऽ लगलाह, ओऽ घबराबए लगलाह की सूरज डूबए तक घुरि सकब की नञि ! दुबारा अपन सम्पूर्ण तागति दौड़ैमे लगाऽ देलथि मुदा आब सुरजो डूबए लगलाह .......! बेशी दूरियो आब नञि बचलनि। ग्रामीण सबकेँ ओऽ देखए लगलाह ! सब गामक लोक हुनका आवाज़ पर आवाज़ दैत रहनि, सब हुनका उत्साहित करैत रहथिन आबि जाऊ ......आबि जाऊ। ओऽ आदमी सोचए लगलथि, की अजीब आदमी एहिठामक छथि ! ओऽ अपन अंतिम दम लगाऽ देलथि। एम्हर सूरज डूबैत छथि आर ओम्हर ओ दौड़ैतत छथि ! सूरज डूबैत - डूबैत पाँच - सात गज पहिने ओऽ खसि पड़लाह तैयोदम नञि तोड़लथि। आब हुनकासँ उठल नञि जाए छनि। किछु दुरी बाँकी देख ओऽ घुसकैत-घुसकैत पहुँचए के प्रयास करए लगलाह! हँसैत-हँसैत आपसमे बात करऽ लगलाह की अइ तरहक पागल आदमी आबिते जाइत रहैत छथि !ई कुनू नव घटना थोड़े अछि ! अक्सर लोग खबर सुनला पर आबैत रहथि आर अहिना मरैत रहथि ! ई कुनू अपवाद नञि, नियम रहए ओहि सब जमींदारक ! कियो ऐहन नञि भेलाह जे ओऽ जमीनकेँ घेरि कऽ ओकर मालिक बनलाह ! ई (लघु कथा) खाली कहानी मात्र न्ञि अछि ! ई घटना हमर, अहाँ आर सम्पूर्ण संसारक कहानी छी। हमर सभक जीवनक कहानी छी ! हुनके जेकाँ आइ हम सभ कऽ रहलहुँ-ए! हुनके जेकाँ जमीन घेरए के पाछाँ दौगि रहलहुँ-ए की कतेक जमीन घेर ली ! बारह बाजए-ए , दुफरिया होइ-ए, घुरए धरि समय भेलाक बाबजूद कनी आरक चक्करमे हम सब दौगि रहल छी ! ओकरा पाछाँ भूख प्यास सब बिसारि दए छी ! सत्य पुछू तँ हमरा अहाँक लग जीबए लेल समय नञि अछि ! हमसब चाहतक पीछाँ भागि रहलहुँ-ए! कहियो हमसब संतुष्ट नञि भऽ रहलहुँ-ए, हुनके जेकाँ हमर अहाँक सोच अछि, एहिसब चक्करमे गरीब - धनिक सब भूखे मरि रहलहुँ-ए कियो अपन जीनन जी नञि पबैत छ्थि ! जीबए हेतु कनी विश्रान्ति चाही ! जीबए लेल कनी समय चाही, जीवन मँगनी भेटए-ए बस ज्ञान भेनाय जरुरी अछि !!

चलू किछ बात करी

बिना बात - चित के परिवारिक रिश्ता म करुवाहत आम बात अछि ! इये करुवाहत जन्म दै य अवसाद आर तनाव जेहेंन परेशानी क ! जरुरी अछि की परिवार के सब सदस्य स्वस्थ माहोल म किछ देर बैस क बातचीत करी ! एक दोसर स बात बाँटी ताकि रिश्ता टुकरा म बटे स बचे ! आई समाज के लगभग हर परिवार के सदस्य म तनाव देखई लए मिले य ! बेटा बाप स, बेटी माँ स, पत्नी पति स, त भाई बहिन स रुसल रहेत छैथ ! इ सब समस्या के मूल कारण अछि की किनको पास दु घडी बैस कए बातचीत करै के फुरसत नै छैन ! हम सब टीवी या अपन - अपन कमरा तक सीमित भेल जे रहलो य ! परिवार के बिच संवादहीनता परसल अछि जकरा कारण हम सब एक दोसर के भावनात्मक रूप सए वंचित छी ! माँ - बाबूजी आर बच्चा सब के बिच म एक शून्य उत्पन्न भेल जे रहल अछि ! माँ - बाबूजी बच्चा सब स अनावश्यक बातचीत करब नै चाहेत छैथ ! खाली जरुरी बात पुइछ क रैह जाई छैथ ! जखन की माँ - बाबूजी क बच्चा के हरेक बातक जानकारी होनै चाही ! बच्चा पर ध्यान राखब हर माँ - बाबूजी के फर्ज होई छैन ! जातक आहा अपन बच्चा स बात चित नै करबे त ओ अपने क अपन मन के बात कोना बतेत ? खाश के क युवावस्था प्राप्त करे बला आहा के बच्चा के लेल इ परम आवश्यक अछि की आहा हुनका स बात चित करैत रहू ! ताकि अपने क पता चले ओ कते जैत छैथ, की पहिनैत छैथ, हुनकर के के संगी - साथी छैन आर हुनकर कथी कथी म रूचि छैन इ सब जानकारी राखब हर माँ - बाबूजी के लेल परम आवश्यक अछि ! माँ - बाबूजी के फर्ज छियेंन की ओ अपन जायज बात बच्चा क बताबैथ ! अगर अपने गृहिणी छी त आई दिन म आहा की सब काज केलो, के के दिन म एलेथ आदि चर्चा सब करबाक चाही ! कतेक बेर त देखल गेल य की पत्नी - पति आपसे मए एक - दोसर क नै जानैत छथिन ! किये की ओ आपस म एक - दोसर के बिच कुनू चर्चा नै करैत छैथ ! या करैतो छैथ त कम - सम, पति - पत्नी के रिश्ता भोजन के लिया, कपड़ा धोई लिया बस अहि ठाम तक सीमित अछि ? आई स्थिति म रिश्ता म दुरी बढ़ने स्वाभाविक अछि ! किनको मुह स सुनलो की " हमर इये प्रयाश रहे य की जै घर म बाबूजी बैसल रहैत छैथ ओई घर म हम नै बैसी" याद राखु की इ स्थिति बुजुर्ग लोकैंन क परेशां करे य ! अहिलेल वृद्धावस्था मए हर बुजुर्ग क़ शिकायत रहै छैन की बच्चा माँ - बाबूजी के पास नै बैसैत छैथ !


याद राखी की संवादहीनता क वैचारिक मतभेद बढ़ई य जे अंत मए भावनात्मक दुरी म बदैल जैत अछि ! माँ - बाबूजी आर बच्चा के बिच यदि आरंभ स संवादहीनता के स्थिति पैदा नै हुवे त अंत तक वैचारिक आदान - प्रदान कायम रहत ! साथे नया पीढ़ी म पनैप रहल अवसाद, तनाव जेहेंन परेशानी के हल सेहो मिल जेत !!

Thursday, March 06, 2008

आहा के हँसब कमाल रहे साथी




आहा के हँसब कमाल रहे साथी !
हमरा आहा पर मलाल रहे साथी !!

दाग चेहरा पर दे गेलो आहा !
हम त सोच्लो गुलाब रहे साथी !!

रैत मs आबई अछि अहि के सपना !
दिन मs अहिके ख्याल रहे साथी !!

उइड़ गेल निंद हमर रैत के !
आहा'क एहने सवाल रहे साथी !!

करै लए गेल छलो दिलक सौदा !
कियो आयल छलैथ दलाल साथी !!

आहा के हँसब कमाल रहे साथी !
हमरा आहा पर मलाल रहे साथी !!

Wednesday, March 05, 2008

जीवन के उद्देश्य आर आहाक आत्मविश्वास

प्रिय मिथिला बंधूगन......
कुनू भी सफलता ओहिना हाथ नै लागै छई, ओकरा हेतु आवश्यक अछि की अहाक उद्देश्य स्पष्ट हुवे आर आहा क आत्मविश्वास हुवे की आहा जे रास्ता चुन्लो य ओई पर आहा तमाम व्यवहारिक - अव्यवहारिक रुकावट के बावजूद चलैत रहब !

मुदा की स्पष्ट आर आत्मविश्वासी होनै एतेक आसान अछि ? सकारात्मक सोच ओहिना विकसित नै होइत छल ! कतेक हीन भाव स आई के प्रतियोगिता पूर्ण समय मए युवा लोकेन ग्रसित रहैत छैथ ! सकारात्मक सोच के लेल सर्व प्रथम आवश्यक अछि अपने क जानै परत की आहा मए की कमि आर की खूबी अछि !

आत्मविश्वास बढेनैय खाली आहा के हाथ म अछि ! ओकरा लेल आहा क कनी सामाजिक आर मिलनसार बने परत ! लोग सब स मिल्योन, हुनकर सब बात सुनियोंन, अपन बिचार दियो, हुनकर बिचार सुनियो ! अई तरह स अपने क महसूस हेत की आहो क लोग सूनेत छैथ ! आहा के विचार क सम्झेत छैथ, आहा स ओ प्रभावित होइत छैथ ! लोग स गर्मजोशी स मिलल करू, लोग आहा स गर्मजोशी स मिलता त आहा क निक लागत ! हमर कहे के मतलब अपने क अपन आप म उद्देश्य के लेल ईमानदार होबाक चाही !

आहा अपन वर्तमान आर भविष्य सs लगाव राखु ! अपन सामर्थ्य क ध्यान म राखैत भविष्य के उद्देश्य निर्धारित करू ! अई लगाव क लगन मए बदले दियो ! हमर मतलब आहा पहिने अपन लक्ष्य सुनिश्चित करी तकर बाद तन - मन - धन स ओकरा हासिल करे मए जुटी !

लक्ष्य मिल्ला के बादो भविष्य के तरफ देखब बंद नै करी कारन आहाक सफलता कुंठित भे जेत ! सफलता के खाली एके सीढी नै होई छई, इ अंतहीन सिलसिला अछि जे हर सीढी के बाद आहा क नया आत्मविश्वास प्रदान करत ! जना की बच्चा पहिने एके कदम चालला पर गीर जैत छैथ, मुदा लगन के कारन चल्नै सिखेत छैथ ! पहिने दु फेर चैर फेर एक निश्चित दुरी ......... फेर किछ दिन म ओ दौरे लगेत छैथ ......... मुदा की ओ फेर चुप बैसैत छैथ ? नै किछ दिन के बाद ओ साईकिल चलाबैत छैथ .... मतलब इ सिलसिला कहियो रुके नै छैन !

निराशा सफलता के लेल सबसे बेसी घातक होई य ! निराश व्यक्ति समर्थ भेलो पर असमर्थ होइत छैथ ! निराशा स बचनै जरुरी अछि, चाहे ओकरा लेल अपन अहम त्यैग दोसर स मददे किये न लिए परे ! ज्ञानअर्जन के कुनू सीमा नै अछि, ज्ञान स आत्मविश्वास बढ़ैत अछि !

अगर आहा अपन उद्देश्य के प्रति समर्पित आर स्पष्ट छी त कुनू तरहक विरोध के परवाह नै करी ! आत्मविश्वास के बिज बचपन स मन म होई य, बस ओकरा सिंचेत - रोपैत रहे के जरुरत अछि ! ओ फल्बे - फुल्बे करत अई तरह स अपन लक्ष्य क निर्धारित करैत निराशा के उपेक्षा के क अपन उद्देश्य प्राप्त करे हेतु सक्रिय रहू, एक न एक दिन सफलता आहा के कदम चुम्बे करत॥


हम जीतमोहन जी के आभारी छियेंन जे ओ इ मैथिली ब्लोग
मैथिल और मिथिला " बनेलैथ आर ओई पर हमरो सब क लेखक के रूप म आमंत्रित केलैथ ! समस्त मिथिला वासी स हमर आवाहन अछि की अपनों मैथिली भाषा के प्रति जागरूकता देखाबी !!

धन्यवाद" जय मैथिली, जय मिथिला !!

Monday, March 03, 2008

छोट - छोट बात

अपन सबहक़ जीवन इश्वर के देल एक सर्वश्रेष्ठ उपहार अछि ! अई जीवन रूपी उद्यान क सुगंध सs परिपूर्ण बनाबई हेतु आर खुद क संतुष्ट राखै के लेल किछ बात ध्यान म राखब अति आवश्यक अछि ! अगर हम सब इ बात क सदैव ध्यान म राखी त निश्चित रूप स हम सबतरह सs आत्मिक शांति के सुख प्राप्त के सकब ! कखनो किनको स किछ प्राप्त करे के आशा नै करबाक चाही ! कियेकी इ जरुरी नै अछि की किनको पर करल गेल अपने के अपेक्षा हरदम पूरे हुवे ! आशा के विपरीत भेला पर यदि आहा के मन मए दुःख होई या त किनको दोसर स हम कुनू अपेक्षा करबे किये करब ?

हमेशा धीरज स काम लेबाक चाही, कियेकी रास्ता लम्बा जरुर होइत अछि मुदा अंतहीन नै ! कुनू कदम उठावे स पहिने भली भाति सोइच - विचैर लेबाक चाही

क्रोध क अपन वश म राखी कियेकी क्रोध मुर्खता स आरंभ आर पश्चाताप पर समाप्त होइत अछि !

सदैव याद राखी की "मधुर वचन अछि औषधि आर कटू वचन अछि तीर" इ शब्द क ध्यान म रैख क बाजी !

शेक्सपियर कह्लाखिन रहे " संक्षेप बुद्धिमत्ता के आत्मा होइत अछि ! आवश्यकता स अधिक बात किनको सुने हेतु बाध्य नै कारियोंन ! कहल गेल अछि वार्तालाप जतेक लम्बा होइत अछि ओकर प्रभाव ओतेके कम होइत अछि !

अपन प्रशंसा करे के भूल नै करी ! आई स आहा दोसर पर प्रभाव नै डेल सकब, सामना बाला क खुद पता चले दीयोंन की आहा एहेंन सीधा सरल व्यक्तित्व कतेक गुण स परी पूर्ण छी ! हुनका आहाके बरे म खुद अनुमान लगबे दीयोंन !

परनिंदा, आलोचना नै करी, दोसर के दोष निकाले के पाछा नै रही ! इ सब आदत उन्नति आर सफलता म बाधक सिद्ध होइत अछि !

इष्या आदमी कs ओही तरह खोखला बनबैत अछि जय तरह लकड़ी क दीमक ! इ भावना नै हमरा प्रसन्नता देत अछि नै दोसर कए ! हमरा सब क दोसर के सुख म सुखी, आर दोसर के दुःख मए दुखी होबक चाही !

प्रेम जीवन के सब कठिनाई आर समस्या क आत्मसार करैत अछि ! सदैव प्रेम के भावना रख्बाक चाही !

हमेशा आत्मविश्वासी रही, आत्मविश्वास जीवन के हर क्षेत्र म सफलता के ले जरुरी अछि ! जखन धन , ज्ञान , साथ नै दै छई तखन आत्मविश्वास काज आबे य !

दोसर के हित म अपन हित देखल करू , किनको दोसर के दुःख म अपन सुख के त्याग बहुत संतोष दै छई ! इ सच्ची सेवा कह्लाबे य ! दोसर के सेवा करबाक चाही किये की हर मनुष्य म इश्वर विधमान रहे छथिन ! किन्कारो आंसू पोछब मुसीवत म सहायता करब इश्वर के प्रार्थना के तुल्य होई छई !

Friday, February 29, 2008

बजट भ गेल पेश

चलू, एही सरकार के,
अन्तिम बजट भ गेल पेश,
जे आशा छल, वैह भेटल,
बड नई लागल ठेस॥

गाडी-मोटर भ गेल सस्ता,
रोड पर बढ़त रेस,
धुआं उडेनाय महग भेलैन
जे सिगरेट लेता लेस॥

मोबाईल, कंप्यूटर, भ गेल सस्ता,
सब ब्लॉगर करू ऐश,
कर्जा माफी सं पता नई,
किसान के कते खत्म हतैइन क्लेश॥

देखी चुनाव अगिला बरख,
चिदंबरम धेलाईथ दानी के भेष,
देखल जाय महगाई स कहिया तक,
त्रस्त रहत ई देश॥

बजट के स्वाद लिय ....

बजट २००८ - २००९ (व्यापार)

आई दिनांक २९/०२/२००८ कs वित्तमंत्री पी.चिदंबरम २००८ / २००९ के बजट पेश केलैठ ! देखल जाई त बजट के मुख्य केन्द्र बिंदु रहा किसान आर अल्पसंख्यक वोट बैंक ! आगामी लोकसभा चुनाव कs ध्यान म राखेत कर्ज के दलदल मए डुबल किसान लोकेन के लेल ६० हजार कड़ोर रुपैया कर्ज माफ करे के घोषणा केलेथ वित्तमंत्री पी.चिदंबरम ! वेतन भोगी लोकेन कs आयकर म बहुत राहत मिललेंन दलित, पिछरल, आर अल्पसंख्यक के कल्याण के वास्ते योजना के लेल खजाना खोइल देल गेल अछि ! वित्तमंत्री पी.चिदंबरम संप्रग सरकार के बजट म चैर कड़ोर किसान के कर्ज माफ करे के ऋण राहत आर माफी योजना के घोषणा केलेथ ! कर्मचारी आर मध्य वर्ग कs खुश राखै के लेल डेढ़ लाख रुपैया सालाना के व्यक्तिगत आय कs कर सs पूर्ण रूप स मुक्त के देलखिन ! महिला क आब १.८० लाख आर बुजुर्ग क २.२५ लाख तक कुनू कर नै दिया परतेंन ! सही मायने म देखल जाए त इ बजट मए गरीब आर मध्य वर्ग लोकेन के लेल बहुत किछ करै के प्रयाश केलैथ वित्तमंत्री पी.चिदंबरम !


नीचा बजट के मुख्य अंश प्रस्तुत अछि !!

~* आयकर*~
* आयकर सीमा १ लाख ५० हजार भेल
* महिला के लेल आयकर सीमा १ लाख ८० हजार भेल
* बुजुर्ग के लेल आयकर सीमा २ लाख २५ हजार भेल
* ५ लाख स ऊपर ३० फीसदी टैक्स
* १.५ स ३ लाख तक १० फीसदी टैक्स
* ३ स ५ तक २० फीसदी टैक्स
* माँ - बाबूजी के इलाज पर १५००० के खर्च म ८० - डी के तहत छुट
* बैंक स पैसा निकाले पार टैक्स खत्म

~*सस्ता हेत*~

* जीवन रक्षक दवाई

* सेट टॉप बॉक्स

* डेयरी उत्पाद

* दोपहिया , तिपहिया वाहन

* बस आर कार

~*महग हेत*~

* सिगरेट, तम्बाकू , सॉफ्टवेयर


~*अन्य मुख्य बजट बिंदु*~

* रक्षा बजट १० फीसदी बैढ़ क १ लाख ५६ हजार कड़ोर भेल

* ३०० आई आई टी के विकास हेतु ७५० कड़ोर

* दु गो नया साइंस सेंटर खुलत

* बिजली उत्पाद पर जोर, २८ हजार कड़ोर के निवेश

* इंदिरा आवास योजना म हर आदमी के लेल ३५ हजार

* सिंचाई के लेल २० हजार कड़ोर के योजना

* बागवानी विकाश के लेल ११०० कड़ोर के योजना

* कृषि बीमा योजना के लेल ६४४ कड़ोर के योजना

* विज्ञान के छात्र के लेल ८५ कड़ोर के योजना

* बाल विकाश योजना के लेल ६३०० कड़ोर

* सर्वशिक्षा अभियान हेतु १३१०० कड़ोर

* दुपहर भोजन के लेल ८ हजार कड़ोर

* पोलिया अभियान हेतु १०२२ कड़ोर

* तीन नया आई आई टी खुलत

* आंध्र प्रदेश, राजस्थान, आर अपन बिहार म आई आई टी खुलत

* भारत निर्माण के लेल ३१ हजार कड़ोर के योजना

* ४१० कस्तूरबा गाँधी कन्या स्कूल बनत

केना बची आलोचना के तीर सs

मिथिला "बहिन"

लोकेन के लेल खाश"

समाज मs आहा कतो जाओ आहा क किछ लोग अई तरह के मिलये जेत जिनकर काजे सिर्फ दोसर के किछ नै किछ बुराई करब होई छैन ! इ हुनकर आदत होई छैन जकरा सूइन कs सायद आहा क गुस्सा होइत हेत ! हमर इ ब्लोग लिखे के मकसदे इ अछि की ओई समय आहा गुस्सा नै के क हुनकर बात कs नया मोड़ दीयोंन फेर हुनकर हालत देखु ! वास्तव मs अई तरहक लोग के उद्देश्य इये होई छैन की कुन तरह आहा के भाड़काबे ता की गुस्सा मs अपने हुनका किछ अनर्गल बात कैह दीयों ताकि हुनका आहा के बुराई दोसर लग करै के मोका मिलैंन ! ताहि लेल कहे छी यदि ओई समय आहा अपन गुस्सा पर काबू के लाई छी तस समझू आहा किला फतह के देलो ! किछ ऐहना हमर परोसी के संग भेल रहैंन, एक दिन ओ अपन ननद कs सबके सामना मए दुत्कारलखींन ताहिए सs हुनकर ख़ुशी क ग्रहण लैग गेलेंन ! दरअसल हुनकर ननद हुनका किछ स किछ गाहे - बगाहे सुनबैत रहथिन, बस एक दिन जखन घर म मेहमान रहैंन ओही समय ननद के कटाक्ष के ओ तहेंन जबाब देलखिन की ओही दिन सs ननद के नज़र म बुरा बैंन गेली ! सब मेहमान हुनकर बुराई केलखिन आर फेर त हर कियो हुनका स बात करे स पहिने इ धारणा बने लेल्खिं की ओ बहुत ख़राब छैथ ! हुनकर ककरो स नै बने छैन, हुनका स बात करबे बेकार अछि ! जखन की वास्तव म आई तरह के कुनू बात नै रहेंन ! दरअसल हर आदमी के तम्मना होई छैन की सब हुनका निक कहैंन ! असल म हम सब हमेशा इये समझे छी की सामनेवला जेहेंन हम चाहे छी ओहिना व्यवहार हमरा संग करैथ ! मुदा हमर सभक विरुद्ध कियो यदि किछ बाजेत छैथ ताए हमर सभक दिल तुइट जैत अछि ! हुनका स रिश्ता फीका परे लागे य ! यदि आहा अपन रिश्ता म खटास लाबे स बचे लाय चाहे छी, त किनको प्रति कुनू प्रतिक्रिया व्यक्त करे स पहिने इ जरुर सोइच ली की हुनका की पसंद छैन, आर की नापसंद, इ बात स अपने क खाली हुनकर खुबिया आर खामिया के बारे म पता नै चलत, बल्कि हुनका आहा स्वाभाविक गुण के साथ स्वीकारो के सकब ! आहा के अपेक्षा नै हेत नै टूटत, मगर एकर मतलब इ नै अछि की किन्कारो कुनू भी अनर्गल बात बर्दाश्त करेत रहू ! खाली आहा अपन मन म इ धारणा बने ली की आहा हुनकर बात कखन तक बर्दाश्त के सके छी ! बात सीमा पार होई स पहिने हुनका बाते दीयोंन की आहा हुनकर बहुत बात बर्दाश्त केलियेंन आब बर्दाश्त नै हेत ! आई स सामने बला क अपन गलती के अहसास भे जेतेंन आर आहा के रिश्ता बिगड़े स बैच जेत ! बहिन हमरा समझ स निक इये अछि की यदि कुनू तरहक विवाद स घिरल बात कियो कहा त निक इये हेत की अपने चूपी सैधली, सामने वला निराश भो क खुदे बाजब बंद के देती ! ओनैयो हर बात पार सवाल - जबाब करब कुनू निक बात थोरे न अछि ! एकर बावजुदो यदि अपने क गुस्सा आबे त अपन ध्यान कतो आर मोइड़ देल करू, जना की यदि घर म छी त बहर आँगन मए निकैल क किछ काज के लेल करू, टीवी खोइल क बैस सके छी ताकि ओई समय चलाई बला बात के रुख बदैल जाय ! कतेक बेर देखल गेल अछि की हम सब कुनू बात के प्रतिक्रिया क नकारात्मक ढंग स लैत छलो ! इ बात ठीक नै अछि ! ठंढा दिमाग स हमरा सब क सोच्बाक चाही की हम अपन आप कई कोना सुधारी कहावत अछि "आप भला तो जग भला" यदि कियो अपने स किछ कहेत अछि त पहिने हुनका बात पर नाराज़ होई के बदला अमल करैत सोचबाक चाही की बात म कतेक सत्यता अछि ! मिठास के संग जबाब दै के कला के साथे - साथ विनम्रता क अपन व्यक्तितत्व के अंग बनाबी इये हमर सब मिथिला बहिन स आग्रह अछि ! हमर धारणा यदि अपने क पसंद हुवे त टिप्पणी देब नै भुलब धन्यवाद !!

Wednesday, February 27, 2008

होली - कथा




होली उत्सव के उत्पति के कथा हिरण्यकश्यप के बहिन होलिका आर पुत्र प्रह्लाद सs जुरल अछि !!



इ पर्व के मुख्य संबंध बालक प्रह्लाद सs छैन ! जे रहैत तय विष्णु भक्त मुदा एहेंन परिवार मए जन्म लेलेथ रहा जकर मुखिया क्रूर आर निर्दयी रहथिन ! प्रह्लाद के बाबूजी अर्थात निर्दयी हिरण्यकश्यप अपनाआप कए भगवान सम्झैत रहथिन ! आर सब प्रजा सए इये उम्मीद करैत रहथिन की ओहो सब हुनका भगवान मानैत पुजैन ! जे हुनका नै पुजैत रहथिन ओकरा या तए माइर देल जैट रहेँन या कैद खाना मए बंद कैल जायत रहेँन ! जखन हिरण्यकश्यप कs पता चललैन की हुनकर पुत्र प्रह्लाद विष्णु भक्त छैथ तs पहिने हुनका (प्रह्लाद) कए डरे - धमके कए आर अनेक प्रकार सs हुनका पर दबाब डाइल कए की ओ विष्णु भगवान कs छोइर हुनका (हिरण्यकश्यप) कs पुजैथ समझाबे के प्रयाश केलखिन ! मगर प्रह्लाद कए अपन भगवान विष्णु पर अटूट श्रद्धा रहेँन ओ बिना कुनू भय के हुनका पुजैत रहलाखिन ! सब प्रयाश के बावजूद जखन प्रह्लाद नै मानलखींन तए हिरण्यकश्यप बिचार्लैथ की प्रह्लाद कs जान सए मैर देल जाई ! एकरालेल ओ बहुत तरह के उपाय केलैथ मुदा हर बेर असफल रहलैथ ! अंत मए हिरण्यकश्यप अपन बहिन होलिका, जिनका अग्नि मs नै जले के वरदान प्राप्त रहैंन, हुनका बजेलखिन आर प्रह्लाद कए मारै के योजना बनेलखिन ! एक दिन निर्दै हिरण्यकश्यप बहुत सारा लकड़ी जमा केलेथ आर ओई मए आइग लगे देलखिन ! जखन लकड़ी तीव्रता सs जरे लग्लैन तए हिरण्यकश्यप अपन बहिन होलिका कए आदेश देलखिन की ओ प्रह्लाद कs गोद मए ले कs जडैत आइग मए बैसेथ ! होलिका हुनकर आज्ञा के पालन करैत ओहिना केलखिन ! दैवयोग सs प्रह्लाद बैच गेला आर होलिका वरदान के बावजूद ओही आइग मए जैल कs भस्म भे गेली ! तहिये सs प्रह्लाद के भक्ति आर असुरी राक्षसी होलिका के स्मृति मए इ त्योहार मनेल जैत अछि !



समस्त मिथिला वासी कs "मैथिल और मिथिला" ब्लोग के तरफ स रंगक त्योहार होली के हार्दिक शुभकामनाये !!!

Tuesday, February 26, 2008

बजट २००८ - २००९

रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव अइयो बेर लगातार पाँचवा साल किराया मs कुनू वृद्धि नै केलखिन ! लालू प्रसाद यादव भारतीय रेल के इतिहास म मंगलवार दिनांक २६/०२/२००८ कs एक नया कृतिमान स्तापित केलैथ ! उलटे ओ २००८ - २००९ के बजट मs किराया मs पाँच सs सात प्रतिशत के कमी के घोसना केलखिन, नीचा बजट के मुख्य अंश प्रस्तुत अछि !!

* ५० रुपैया सs उपर के किराया मए ५ फीसदी छुट

* एसी के तेसर दर्जा मए ३ फीसदी के छुट

* एसी के दोसर दर्जा मए ४ फीसदी के छुट

* एसी प्रथम श्रेणी मए ७ फीसदी के छुट

* महिला कए पाँच फीसदी नौकरी

* १० नया गरीब रथ चलत

* ५३ नया गाड़ी चलत

* १६ गाड़ी के विस्तार

* रेल कारखाना के लेल २०० करोड़

* केरल मए नया कोच फैक्ट्री बनत

* गैंगमैन कए गेटमैन बनेल जेत

* कुली कए गैंगमैन बनेल जेत

* चाइना रेलवे सs समझोता

* स्नातक छात्र के किराया मए रियायत

* पटना,सिकंदराबाद,मुम्बई,नईदिल्ली,स्टेशन विश्वस्तरीयबनत

* अशोक चक्र पास कए शताब्दी, राजधानी मs मान्यता

* वरिष्ठ नागरिक कए ५० फीसदी के छुट

* बोनस ६५ दिन सए बैठ क ७० दिन भेल

* ५७०० नया सुरक्षाकर्मी के भर्ती

* रेलगाड़ी मए इन्टरनेट के सुविधा मिलत

* विश्वस्तरीय स्टेशन के लेल १५ हजार करोड़

* १९५ स्टेशन पर पैदल यात्री पुल के निर्माण

* उड़ीसा के महानदी पर पुल बनत

* मोबाइल पर टिकट बुकिंग के सुविधा


उपयुक्त रेल बजट के धोसना केलैथ रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव, अई बेर के बजट मs भारतीय रेल क २५ हजार करोड़ के मुनाफा आर पिछला ५ साल मए ६८ हजार करोड़ के मुनाफा करेलखिन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ! देखल जाए त पिछला पाँच साल सए भारतीय रेल कs घाटा सs उबैर देलखिन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ! ऐयतरह सs अई बेर बहुत निक रेल बजट पेश केलैथ रेल मंत्री, आब देख्बाक इ ऐच्छ की जतेक घोसना केलैथ या ओई मs पूरा की सब करैत छैथ रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव !!

Monday, February 25, 2008

मधुक एक ठोप ( मैथिली भाषा लघु कथा)


कुरुक्षेत्रक भीषण रक्तपातक बाद, अपन सभ पुत्र गवाँ चुकल शोकसँ संतृप्त धृतराष्ट्रक दुःख विदुरक समक्ष अश्रुधाराक रूपमे बहि निकललनि ! तखन ओऽ सेविका पुत्र (विदुर) हुनका समक्ष वर्तमान स्थितिक अनुकूल एक उपदेशात्मक नीति-कथाक वर्णन केलखिन !
विदुर कहलखिन "आइ एकटा ब्राह्मणक कथा अपनेकेँ बताबैत छलहुँ ! जे जंगली पशुसँ भड़ल जंगलमे पथ - भ्रमित भऽ गेलखिन रहए ! शेर आर चिता, हाथी आर भालूक चीख, चिंघाड़, आर गर्जनक एहन दृश्य जे मृत्युक देवता, यमोक मोनमे सिहरन पैदा कऽ दैतियनि! ब्राह्मणोकेँ ओऽ वातावरण डरा देलकनि रहए! हुनकर सम्पूर्ण शरीर भयसँ थरथराइत रहनि ! हुनकर मस्तिष्क आशंकासँ भरल रहनि आर हुनकर भयभीत मोन कुनू देवताकेँ व्याकुल भए तकैत रहनि, जे हुनकर प्राणकेँ भयावह वनचरसँ बचाऽ सकतियनि ! लेकिन ओइ बर्बर जानवरक गर्जनासँ सम्पूर्ण जंगल प्रतिध्वनित भऽ कs हुनकर उपस्थितिक आभास करबैत रहनि !ब्राह्मणकेँ एहन प्रतीत होइ छ्लनि की जतए-जतए ओ जाइत छथिन, जानवरक गर्जना हुनकर प्रतिच्छाया बनि कए हुनकर पीछा करैत छ्लनि ! अचानक हुनका लागलनि की ओऽ भयावह जंगल एक घन जाल बुनि कs हुनका आर डरा रहलनि-ए! जंगलक गहनता एक डराओन स्त्रीक रूप धरि, अपन दुनु हाथ पसारि कs हुनका अपनामे विलीन करएक निमंत्रण दऽ रहलनि-ए!जंगलक बीचमे एकटा इनार रहनि जे घास आर बड़का-बड़का लत्तीसँ झाँपल रहए ! ओऽ ओही इनारमे खसि गेलखिन आर लत्तीक सहारासँ कुनू पाकल आम जेकाँ लटपटा कs माथक भर उलटा लटकि गेलखिन ! हुनका लेल डरक बादल गहींर भेल जाइत रहनि! इनारक तलमे ओऽ एक राक्षसी सांप देखलथि, इनारक मुंडेर पर एक बड़का हाथी जकर छः मुँह आर बारह पैर रहनि , ओ मंडरबैत रहए ! आर लत्तीक बीचमे बनल मधुमाछीक छत्ताक चारू दिस विशालकाय मधुमाछी ओकर भीतर-बाहर भिनभिनाबैत रहए ! मधुमाछीक छत्तासँ टपकै बला मौधक किछु ठोप लटकल ब्राह्मणक मुँह पर खसलनि ! ओइ लटकल परिस्थितियोमे ओऽ ब्राह्मण शहदक ओऽ बूंद केँ नञि छोड़लखिन ! जतेक बूंद गिरैत रहनि, हुनका ओतेक संतोष प्राप्त होइत रहनि ! मुदा हुनकर इच्छा शांत नञि होइत रहनि ! ओऽ आर जीवित रहए लय चाहैत रहथिन ! जखन ओऽ शहदक मज़ा लैत रहथि तखने ओऽ देखलखिन की जै लत्ती पर ओऽ लटकल रहथिन ओइ लत्तीकेँ किछु उज्जर आर कारी मूषक (मूस) अपन धरगर दांतसँ काटि रहलनि-ए! हुनकर भय आर बढ़ि गेलनि ! ओऽ भयसँ चारूदिस घिरि गेलथि, कखनो हुनका मांसाहारी जानवरक भय, तँ कखनो डराओन स्त्री, राक्षसी सांप तँ कखनो ओइ लत्तीक भय होइत रहनि जकरा मूषक (चूहा) अपन दांतसँ कुतरैत रहए। भएक एहि बहावमे ओऽ माथक बल लटकल छथि ! अपन आशाक संग , मधुक रसास्वादक तीव्र आकांक्षा लऽ कs ओइ जंगलमे हुनका जीवित रहबाक आर प्रबल इच्छा रहनि!
विदुर धृतराष्ट्रसँ कहैत छथिन " ई जंगल एक नश्वर संसार अछि; एहि संसारक भौतिकता एक इनार आर अंधकारमय इनारक चारू दिसक स्थान कुनू व्यक्ति विशेषक जीवन चक्रकेँ कs दर्शाबैत अछि ! जंगली पशु रोगक प्रतीक अछि तँ डराओन स्त्री नश्वरताक द्योतक ! इनारक नीचां बैसल विशालकाय सांप ओऽ काल अछि, जे समयकेँ लीलए लऽ पर्याप्त अछि ! एक वास्तविक आर संदेहरहित विनाशकक तरह ! लत्तीक मोह - पाशमे ब्राह्मण लटकल छथि जे स्वरक्षित जीवनक मूल प्रवृति छथि, जकरासँ जीव बाँचल नञि अछि ! इनारक मुंडेर पर छः मुखी हाथीक प्रतीक ई अछि, छः मुख अर्थात छः ऋतु आर बारह पैर माने सालक बारह मास ! लत्तीक कुतरए बला मूस ओऽ दिन राति अछि, जे मनुष्यक आयुकेँ अपन धरगर दाँतसँ कुतरि-कुतरि कs कम क्ऽ रहल अछि ! यदि मधुमाछी हमर सबहक इच्छा अछि तँ मधुक एक बूंद ओऽ तृप्ति जे इच्छामे निहित अछि ! हम सब मनुष्य इच्छाक अथाह समुद्रमे शहद रूपी काम-रसक भोग करैत डूबि-उतरि रहलहुँ-ए!
एहि तरहेँ विद्वान लोक जीवन चक्रक व्याख्या केने छथि, आर ओकरासँ मुक्तिक उपाएसँ अवगत करेने छथि !

Saturday, February 23, 2008

आइबे रहल ऐच्छ फगुआ याऊ


गेल जाड़ मांस के कंपकंपी,
कूदू फान्दू बउवा येऊ,
मादक हवा कही रहल ऐच्छ,
आइबे रहल आइछ फगुवा यौ ॥

रंग-अबीर सं चमकत अंगना,
बल्जोरी के जोर चालत,
दू गिलास भांग के बाद,
बीस ता मल्पूआ यौ॥

नाक-भों जे कियो चढायब,
या की रंग पैइन सं घब्रायब,
जे करतेई बेसी लतपत,
रंग सं भ जीते थौवा यौ..

गोर्की भौजी, छोटका बउवा,
पहिरू पूर्ण अंगा, पुरना नुवा,
रंग-अबीर पोलिस सं,
सब गोते लागब कौवा यौ॥

बड नीक ई पाबैइन आइछ,
सबके मोंन के भाबैईत ऐच्छ,
एके रंग मैं सब रंगेतय ,
के धनीक, के बिल्तौवा यौ॥

फगुवा के यह मज़ा त छाई ,
तैयारी के ने आवश्यकता छाई,
रंग पैइन दुनु छाई सस्ता,
नई खर्चा हित दहौउअया यौ॥
फगुवा के तैयारी करू...

सुख - कोना सुखी रही ?



कोना सुखी रही ? मानव सभ्यता के आरंभ स इ प्रश्न मनुष्य क परेशान केना छई ! दार्शनिक, कवी, लेखक, विचारक, वैज्ञानिक आर नेता इ सब लोकेन अपन - अपन तरीका स अई प्रश्न के उत्तर के खोज आर व्याख्या केलखिन यए ! मुदा आइयो मनुष्य इ प्रश्न अनुत्तरिय अछि ! वर्तमान समय म आई जखन हमरा पास नया युग के आधुनिक चिंतन अछि, नई पीढ़ी के दार्शनिक, मैनेजमेंट मसीहा, आर सब समस्या के तुरंत निदान करै वाला विशेशग्य अछि ! आध्यात्मिक स्वर्ग के सुख दै वाला गुरु आर अई संसार त्वरित मोक्ष के अनुभूति दिलाबे बाला स्वामी सब छैथ ! मुदा सुखी केना रही इ प्रश्न ज्यों के त्यों अछि ! किछ दिन पहिने हम अई प्रश्न के बहुत रोचक आर सुखद आर दुःख पर प्रकाश डाले वाला उत्तर स रु ब रु भेलो जकरा हम अपने सब के बिच बांटे के इक्षुक छलो ! श्री श्री रवि शंकर जी द् आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के संस्थापक कहैत छथिन की " अई ठाम दु टा कारण अछि दुःख के ! अतीत के पछतावा आर भविष्य के चिंता ! कतेक पैघ गप कहाल्खिंन ओ ? हम सब अक्शर सोचेत छलो की काश हमर विवाह किनको और स हेतिया ! हम ओ दोसर बाला नोकरी किये न स्वीकार केलो ? आदि आदि ! हमर सब के मस्तिष्क हमेशा अतीत आर भविष्य के बिच उलझल रहैत अछि ! या त हम सब बैह गेल दूध के लेल दुखी होइत छलो या ओई पुल क पार करै के प्रयाश म जाकर तक हम पहुचो नै सके छी ! अनावश्यक रूप स भेल घटना पर अपन माथा पेच्ची करै छी या जे होई बाला य ओकर चिंता मए वर्तमान क व्यर्थ करैत छलो ! बीत चुकल कैल के पश्याताप आर आबे बाला कैल के उत्सुकता मए हम आई के अनमोल पल के हरेनाए जय छी ! त अहि कहू हम सब सुख कोना प्राप्त करब ? श्री श्री रवि शंकर जी के कथन अनुसार हमरा सब कए इ स्वीकार करै परत की वर्तमाने सब किछ अछि ! हमरा वर्तमान के क्षण क पूरा तरह जिवाक चाही आर वर्तमान म हम जे के रहलो य ओई म अपन पूरा क्षमता लगे कए ओही मए अपन पूरा ध्यान केन्द्रित करी ! हमरा सब कए आई आर एखन म विश्वास करैये परत ! की भेल आर की हेत म भो सके य इ बात अपने कए असंभव प्रतीत हुए ! सचमुच म इ सिख लेब कठिन अछि ! जखन भी एक बच्चा एक कागज पर किछ चित्रित करैत छैथ, कागज के नाव पैन मए तैरैत या एक पंक्षी क उडैत देखैत छैथ ! ओई समय म ओ अपन पूरा ध्यान ओही काज मए लगबैत छैथ ! हुनका तनिको चिंता नै रहैत छैन की कियो हुनका देख रहलेंन य या कियो हुनका पर हैस रहलें या ! ओकरा इयो बात परेशान नै करे छई की ओ किछ देर पहिना की केला रहा आर किछ देर बाद की करता ! ओ त खाली अपन काज म मगन रहैत छैथ ! हम सब इ प्रकृति प्रदत्त बिना स्वचेतन भेल बच्चा के तरह वर्तमान के क्षण म जिवई के इ गुण क हरे चुकलो य ! जखन की सबसे बेहतर तरीका अछि जीवन म ख़ुशी ढूढाई के बजाय ओकरा कए हम पैकेज्ड मोक्ष आर ब्रांडेड निर्वाण के लेल भागी !

इ छोट-मोट बात क ध्यान म राखैत जीवन म सदा सुखी रैहसके छी

Friday, February 22, 2008

एक अलग पहचान !

कतेक सुखद हेतीए, अगर लोग के बिच मs आहा के एक अलग पहचान रहतीए ? लोग अपने कs पसंद करैथ, अपने स मिलब पसंद करैथ, अपने के बात कs ध्यान सs सुनैथ, इ हर इन्शान के चाहत होइत अछि !!

मुदा अपने कs इ माने परत की इ सब एतबो आसान नै छै ! एक अलग शख्सियत के मालीक हेनै बहुत मुश्किल अछि ! खाली शारीरिक सुन्दरता, पद आर पैसा के बस के इ बात नै अछि ! आहा एक आम आदमी भेला के बावजूद भी खास बैन सके छी ! बशर्ते किछ छोट - मोट बात अगर याद राखी !

किछ याद राखै योग्य बात .........

* एक निक श्रोता बनू !

* निक वक्ता ओ कहलाबैत छैथ जे सब के बात क सुनैथ आर अंत मs सोइच कs अपन विचार रखैत छैथ !

* ज्यादा बाजब, डींग हाकब, व्यंग्य करब, अपने मुह मिया मिट्ठू बनब अई तरहक बात अपने के शख्सियत कs गलत साबित कैर सकेत अछि !

* हमेसा ओही तरहक बात करबाक चाही जे आहा के जीवन मs खरा उतरे ! जकरा आहा स्वयं व्यवहार मs लाबे छी !

* अपन बहुमूल्य राय किनको मांगला पर दीयोंन !

* सुतई समय अपन स्वविलेषण जरुर करी !

* अपन सिधांत बनाबू, आर ओई पर अमल करै के हर संभव प्रयास करू !

* हमेसा सकारात्मक सोच राखी ! मनोवैज्ञानिक के कहब छैन की आत्मविश्वास आर आशावादी व्यक्ति हर चुनोती के सामना करै मs सक्षम होइत छथिन !

* निक बनै के लेल निक सोचब जरुरी अछि ! दोसर के आचरण कs छोइर कs अपन आचरण पर ध्यान देबाक चाही !

* स्वभाव मs विनम्रता के साथ दृढ़ता आवश्यक होइत अछि ! कुनू गलत बात या प्रस्ताव पर नै कहब सिखु !

अई तरहक छोट - मोट बात कs अपन व्यवहार मए उतैर कs अपने सब के बिच अपन एक अलग, स्पष्ट पहचान बनाबे मs सफल भे सके छी ! पैसा आर प्रसिद्धि के पीछा भागब व्यर्थ अछि ! अपन क्षेत्र मs सफल व्यक्ति बनै के प्रयास करू ! कारन अहि सs अपन मिथिला के पहचान अछि !!


आब बाल ठाकरे देलखिन आइग कए हवा

मराठी बनाम उत्तर भारतीय के सवाल पर पिछला किछ दिन पहिने महाराष्ट्र म भड्कल आइग शांत होइए बला छले की ओकरा एक बेर फेर हवा दै के कोशिश शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे केलखिन य ! ओ मराठी अस्मिता के नाम पर हिंदी के खिलाप रुख दर्शाबैत बिहार के नेता आर रेल मंत्री लालू प्रसाद क सीधे निशाना बनेलखिन य ! बाल ठाकरे अपन पार्टी के प्रमुख्य पत्र 'सामना' के सम्पादकीय के जरिया लालू प्रसाद क तमिलनाडु के मरीन बिच पर छठ पूजा करै के बात क चूनोती देलखिन य ! अपने क मालूम हुए की लालू प्रसाद यादव महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे द्वारा उत्तर भारतीय के खिलाप चलेल गेल आंदोलन के जबाब म कहलाखिन रहा कि अगला बेर ओ मुम्बई म छठ पूजा मनेता ! जबाब म शिव सेना सुप्रीमो बाल ठाकरे संपादकीय म लिखलाखिंन कि "तमिलनाडु म मुख्यमंत्री करूणानिधि सब स्कूल म तमिल क अनिवार्य के देलखिन य ! बिहार क नर्क बनाबे बला लालू म हिम्मत छैन त ओ केन्द्र म अपन सहयोगी के सरकार के विरोध करै के लेल तमिलनाडु जैथ आर ओई ठाम बिहारी के मजमा लगाबैथ" ! बाल ठाकरे उत्तर भारत के ओई स्थानीय कांग्रेश नेता सब क आड़े हाथ लेलखिन जे सब कथित रूप स मुम्बई के नगर निगम (बी एम सी) म हिंदी क आधिकारिक भाषा बनाबे के मांग करैत छथिन ! हुनका सब पर निशाना साधेत ठाकरे लिखला हा, "पहिने हिनका सब क चेन्नई, बेंगलूर, हैदराबाद, कोलकाता, आर गुवाहाटी म एहेंन करे के कोशिश करबाक चाही ! अई ठाम महाराष्ट्र के धरती पुत्र मराठी या मुम्बई के शान म कुनू गुस्ताखी बर्दाश्त नै कर्थिन !" बाल ठाकरे बी एम सी मए हिंदी क आधिकारिक भाषा के दर्जा दै जाई के मांग करै बला नेता के खिलाप कानूनी करवाई करै के आर हुनका जेल मए बंद करै के मांग केलखिन य ! ओ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुखो क नै बख्शलखींन हुनकर बयांन "मुम्बई के दरवाजा सब लए खुलल छई के विरोध मए ठाकरे बाजला 'भूमि पुत्र के कीमत पर मुम्बई के शोषण होइत अछि ! मुम्बई म भूमि पुत्र कए वाजिब हक नै मिल रहले य !

सच्चाई त इ छैन की बेचारा तिलमिलेल छैथ, कारन पहिने हुनकर अपन माटी आर आब अपन परिवार पर शासन नै रहलेंन ! परिवार क बिखरैत देख कए तिलमिलेबे करता आर हुनका सए हेबे की कर्तैन !!

Thursday, February 21, 2008

कुर्ता फाड़ होली के तैयारी म लालू

भारतीय रेल के कायापलट म अपन केन्द्रीय भूमिका के लेल वाहवाही बटोरे बला रेल मंत्री लालू प्रसाद कुर्ता फाड़ होली खेलै के तैयारी म छैथ ! उदार बजट पेश के क जानता के प्रशंसा बटोरे वला लालू प्रसाद क हर साल होली के बेसब्री स इंतजार रहैत छैन ! लालू प्रसाद आईएएनएस स बातचीत के दरमियाँन कहल्खिन की अपन ड्रीम बजट पेश करै के बाद ओ बहुत खुश छैथ ! आर अई बेर अपन खास अंदाज म होली मनेता ! हुनकर नेतृत्व म भारतीय रेलवे २०० अरब रुपैया के आमदनी केलकैन य ! अपन चिर परिचित शैली म ठहाका लगबैत लालू प्रसाद कहल्खिन की जखन होली के मौसम हुवे त कुर्ता के चिंता के करैत छैथ ! ओ अइयो बेर कुर्ता फाड़ होली खेलता ! हुनकर कहब छैन जे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, वित्त मंत्री पी. चिदंबरम आर देश के करोडो लोकेन हुनकर रेल बजट के तारीफ के चुकाल्खिन य ! तही ले क अई बेर हुनका लेल पूरा सुकून स होली मनेनै आसान छैन ! बिहार म सत्ता गवाबई के बाद लालू प्रसाद के लेल होली अधिक मजेदार नै रैह गेलेंन रहा, लेकिन एक बेर फेर ओ अपन पुरान अंदाज म आर मस्ती के संग इ त्यौहार मनाबई के तैयारी म छैथ ! रेल मंत्री लालू प्रसाद होली अपन पत्नी राबड़ी देवी के आधिकारिक निवास १० सर्कुलर रोड म मनेता ! राबड़ी देवी विधान सभा म विपक्ष के नेता छथिन ! लालू प्रसाद होली क रंगीन बनाबई म जुइट गेला य ! होली के मौका पर लालू प्रसाद अपन पार्टी के नेता सभक कपड़ा फैर क हुनका संग होली खेलैत छैथ ! जखन बिहार म लालू - राबड़ी दंपती के शासन रहेंन, त मुख्यमंत्री निवास के होली चर्चा के विषय रहैत रहेंन ! ढोल के थाप पर झुमैत लालू क कैमरा म कैद करै के लेल फोटो ग्राफर के बिच होड़ रहैत रहेंन किछ ओहिना अइयो बेर के होली हेतै लालू प्रसादक

Monday, February 18, 2008

आस्था या अंधविश्वास

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

करेड़ी वाली माँ

जिनकर मूर्ति स निकले छैन अमृतधारा ....
आस्था आर अंधविश्वास के इ कड़ी म हम आहा के बिच पैन निकले के चमत्कारक चर्चा करब ! जी हाँ, मध्य प्रदेश के शाजापुर जिला स आठ किलोमीटर दूर स्थित करेड़ी गाम म देवी माँ के मूर्ति स लगातार पैन निकैल रहलैन य ! ग्राम वासि के मानब छैन की इ पैन नै अमृत छिये ! हमर किछ दोस्त लोकेन के मुलाकात ओई गाम के सरपंच इन्द्र सिंह स भेलेंन ओ बतेलखिन जे माँ के मूर्ति बहुत प्राचीन छैन ! सरपंच के दावा एता तक छैन कि ओ मूर्ति महाभारत कालीन छिये ! हुनकर कहब छैन कि मूर्ति आराध्य देवी कर्णावती के छियेंन ! कहल्खिन जे माँ कर्णावती दानवीर कर्ण क रोज सौ (१००) मन सोना दैत रहथिन ! जकरा कर्ण प्रजा के भलाई के लेल दान करेत रहथिन ! ओई गामक लोक के कहब छैन कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य सेहो माँ के भक्त रहथिन ! आई कैल इ मंदिर क गाम के नाम स करेड़ी वाली माता के मंदिर कहल जै छैन ! जखन मूर्ति आर पैन के बबाद पूछताछ करल गेलेंन त चंदर सिंह (मास्टर जी) कहल्खिन कि किछ दिन पहिने माँ के मूर्ति स एकाएक पैन निकले लगलैन ! पहिने सभक मानब रहैंन की पैन मूर्ति के स्नान के समय भैर जैत छले जे बाद म निकले छैन, सब मिल क ओई जगह क साफ करलाखिन जै जगह पैन भैर जैत रहे ! मुदा देखल गेल की माँ के बांह के पास बनल एक छेद स वापस पैन भैर गेल ! बहुत बेर पैन साफ करल गेलेंन मुदा दुबारा किछ समय म भैर जैत छालेंन ! तखने स पूरा गाम वासी के कहबाक छैन की ओ पैन नै माँ के प्रसाद माँ के अमृत छिये ! बाद म मंदिर के अन्दर पहुच के देखल गेल की मंदिर के बहार एक बावड़ी (गढा) अछि ओहीठा माँ के मूर्ति के पास बनल एक छेद म पैन भरल अछि ! मंदिर के पुजारी कहलाखिन किछ दिन पहिने आई छेद स अपने आप पैन बहा लागले आर देखते देखैत पास के बावड़ी पैन स भैर गेले ! तखन स लगातार मूर्ति स पैन निकेल रहल छई ! फेर की बात काने कान इ बात पूरा ग्रामीण क पता चललाई तखन स श्रद्धालु के ताता लगातार मंदिर म बैढ़ रहलेंन या ! सभक मानब इ छई जे इ पैन नै अमृत छिये ! जकरा पीने स सब दुःख दूर होइत अछि, सभक कहब छैन जे गाम म बहुत प्राचीन मंदिर छैन ! गाम म जखन जखन नवनिर्माण हेतु खुदाई होई छई त प्राचीन मूर्ति के भग्नावशेष निकले छई !लेकिन पुरातत्व विभाग के ध्यान ओई तरफ नै छैन !मंदिर म खरा रैह क सामने देखल गेल की पुजारी मूर्ति स निकले बाला जल क वितरित केलखिन किछ देर म जल पुनः भैर गेले ! मंदिर पहुचे बला हर श्रद्धालु के कहब छैन की इ माँ के चमत्कार छियेंन ! माँ के मूर्ति बेहद पुरान छैन, आर जमीन म सेहों धसल छथिन! आब सच्चाई की अछि इ त विज्ञाने बतेता ! आई समबंध म अहक सोचब की अछि हमरा बताबू

Help Alexa Learn Maithili

  Helping Alexa Learn Maithili:   Cleo Skill:  Amazon has a skill called "Cleo" that allows users to teach Alexa local Indian lang...