भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

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Friday, December 12, 2008

जीवनक सार्थकता - कथा सागर - जितमोहन झा (जितू)

एक बेर महात्मा बुध्द अपन शिष्य आनंदक संग कतहु जाइत छलाह ! अचानक रस्ता मे हुनका बहुत जोर प्यास लगलैन ! आनंदसँ कहलखिन 'वत्स' कतहुसँ कनेक जल आनू हमरा बड जोरक प्यास लागल अछि ! आनंद नदीक किनार पहुँचला, एतबे मेs एक बैलगाड़ी नदीसँ गुजरलनि जाहिसँ नदीक जल दुषित भ' गेलनि ! आनंद वापस लौट गेलाह ! बुध्दसँ कहलखिन "गुरुदेव नदी सँs जा हम जल भरितहुँ ताबे s एक बैलगाड़ी ओहि से गुजरल जाहिसँ नदीक जल पूरा दुषित भ' गेल ! हम कतहु आर जगह सँ जल आनबा केs प्रयास करैत छी !" मुदा महात्मा बुद्ध हुनका फेर ओही नदीक तट पर जाय लेल कहलखिन ! नदीक जल एखनो धरी साफ नञि भेल छलनि, आनंद फेर लौट गेलाह ! गुरुदेव फेर हुनका ओही जगह भेजलखिन चारिम बेर आनंद जखन नदीक तट पर पहुँचलाह तँ नदीक जल शीशा के सामान चमकैत रहनि ! गंदगी के नामों निसान नञि रहनि ! जखन जल भरिकेँ लौटलाह तँ गुरुदेव (महात्मा बुद्ध) हुनका कहलखिन, "हमर सबहक जीवनक विचारकेँ बैलगाड़ी दिन - प्रतिदिन दुषित करैत अछि ! आर हम सब भागयs लागए छी ! यदि भागय के बजाय नदी केँ स्वच्छ होई केs प्रतीक्षा करी तँ जीवन सार्थक भ' जाएत .....

आदर्शवादी शिक्षक - कथा सागर - जितमोहन झा (जितू)

प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन बंगालक एक स्कुल मे अध्यापक रहथिन ! ओहि समय स्कुल मे वार्षिक परीक्षा चलैत छल ! जै रूम मे सूर्यसेनक ड्यूटी लगलनि ओहि रूम मे प्रधानाध्यापकक बेटा सेहो परीक्षा दैत छल ! सूर्यसेन हुनका नक़ल करैत पकड़लखिन परीक्षा सँ बाहर केँ देलखिन ! जखन परीक्षाक परिणाम आयल तँ प्रधानाध्यापकक बेटा फेल छल ! स्कुलक सभ अध्यापक s लगलनि जे आब सूर्यसेनक नौकरी गेलनि ! एक दिन अचानक सूर्यसेनकेँ प्रधानाध्यापकक बुलाबा एलनि !

प्रधानाध्यापक सूर्यसेन s स्नेह पूर्वक कहलखिन "हमरा जैनकेँ ख़ुशी भेल जे हमर स्कुल में आहा जेहेंन कर्तव्यनिष्ठ आदर्शवादी अध्यापक छैथ ! जे हमर (प्रधानाध्यापकक) बेटोकेँ दंड दै मेंs संकोच नञि केलैथ ! यदि अपने ओकरा नक़ल केला के बादो पास s देतो तँ हम अपनेक बर्खास्त क's देतहु" तहि पर सूर्यसेन तपाकसँ कहलखिन "यदि अपने हुनका पास करै केs लेल मजबूर करतो s हम इस्तीफा द् देतो!" सूर्यसेन अपन जेब s त्यागपत्र निकैल केs हुनका (प्रधानाध्यापक) केँ देखबैत कहलखिन, आय हम एकरा अपन संग आनने छलो ! तहि दिन सेs प्रधानाध्यापक महोदय सूर्यसेनक प्रशंसक बैन गेलाह ......

Friday, December 05, 2008

दू गोट कविता- ब्रज मोहन झा "सोनी” बनौटा - नेपाल

1.हम
ब्रज मोहन झा ”सोनी”
हम पत्रकार छि,
कुडा के ढेर पऽ पडल,
बिन तारऽक सितार छि ।

हम कथाकार आ
गित गजलकार छि
आगुमे डा. होइतो अर्थऽक बिमार छि

बन्‍द आ हडतालमे
अर्जुनऽक ढाल घटोतकच बनल
नेताके हथियार छि ।

हम गामघरऽक अकला
घरऽक फुटल तसला
मसोमातऽक भतार हम
नाटकऽक अचार छि ।

कियक त हम यूवा
पैघ बेरोजगार छि ।
कियक त हम यूवा
पैघ बेरोजगार छि ।



2.उदासी
ब्रज मोहन झा ”सोनी”
डेग डेग पऽ गाम सहरमे
सगरो नोर भोकासी अछी,
नोर बहा लोक सुती रहल
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

ओइ दिन ओकरा घर चोर गेलै,
कयलौ हल्‍ला होशीयारी लेल,
डरे चोरबऽक हनलक गब्‍दी ,
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

चोरबो पिटलक दोसरो डटलक
कानुनमे हमरा फँासी अछी ।
घुस खाऽ जज छोडी देलक,
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

चुप रहने संरक्षण भेटत
बाजब बडका बदनामी अछी ।
ई बात हमर गुरुजन कहलक,
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

आइ फेर देखलीयै सेन्‍ह पडैत,
”सोनी” सोनाके गाछी अछी ।
ई देखी सब केव भेल प्रशन्‍न,
तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

तँय हमरो छायल उदासी अछी ।

ब्रज मोहन झा ”सोनी”
,बनौटा – ५ (महोत्तरी)

गामक गप

एक युग मे होइत छैक बारह बरख
आउर एक बरख मे होइत तीन सौ पैसंठ दिवस
एक दिवस मे होइत छैक चौबीस घंटा
एक घंटा मे होइत साठ मिनट

हम कोनो अहां के
गणित आ समयक
हिसाब-किताब नहि
बुझा रहल छी

हम जोइर रहल छी
कतेक समय सं
गाम नहि गेलहु
आधा युग बीत गेल गाम गेला

जहि दिवस स
बाहरि अलों
शहर के रंग-ढ़ंग मे
रंगहि गेलों

सोचैत छी
हम एतहि बदलि गेलों
तहि गाम
कतेक बदलल होइत

छोटका काकाक द्वार पर
आबो लागैत हेतै घूर
दलान पर बैठकी मे
होइत हेत सभ शामिल

सूर्य उगलाक स पहिल
केए सभ जाइत हेतै लोटा लकए
दतमैन स मुंह
आबो धोइत हैत कि नहि गामक लोक

पांच बरख मे
सरकार बदलि जाइत छैक
गामक लोकक मे
सेहो परिवर्तन भेल हेता

लकड़ी-काठी से चूहलि
जलैत हेतै कि नहि
बभनगमा वाली भौजी
चायपत्ती मांगइलै आबैत हेतै कि नहि

गोबर स घर-द्वार
नीपैत हेतै कि नहि
दरवाजा पर माल-जालक
टुन-टुन बाजैत हेतै कि नहि

ई सभ सोचैत काल
हम एक-एक गप पर तुलना करैत छी शहर से
गाम आउर शहर मे फ़र्क भ गेल छैक
जमीन आ आसमानक

मुदा,
सब कुछ गाम मे
बदैल गेल
नहि बदलल छैक त आत्मीयता.

निरीक्षण - श्यामल सुमन - जमशेदपुर

निरीक्षण


अपने सँ देखब दोष कहिया अपन।

ध्यान सँ साफ दर्पण मे देखू नयन।।



बात बडका केला सँ नञि बडका बनब।

करू कोशिश कि सुन्दर बनय आचरण।।



माटि मिथिला के छूटल प्रवासी भेलहुँ।

मातृभाषा विकासक करू नित जतन।।



नौकरीक आस मे नञि बैसल रहू।

राखू नूतन सृजन के हृदय मे लगन।।



खूब कुहरै छी पुत्री विवाहक बेर।

अपन बेटाक बेर मे दहेजक भजन।।



व्यर्थ जिनगी अगर मस्त अपने रही।

करू सम्भव मदद लोक भेटय अपन।।



सत्य-साक्षी बनू नित अपन कर्म के।

आँखि चमकत फुलायत हृदय मे सुमन।।




श्यामल सुमन, प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर - झारखण्ड,

सम्बन्ध - श्यामल सुमन - जमशेदपुर

सम्बन्ध


साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।

वेदना हम ह्रदय के सुनाबैत छी॥



कहू माताक आँचर मे की सुख भेटल।

चढ़ते कोरा जेना सब हमर दुःख मेटल।

आय ममता उपेक्षित कियै रति-दिन,

सोचि कोठी मे मुंह कय नुकाबैत छी।

साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।

वेदना हम ह्रदय के सुनाबैत छी॥



खूब बचपन मे खेललहुं बहिन-भाय संग।

प्रेम साँ भीज जाय छल हरएक अंग-अंग।

कोना सम्बन्ध शोणित कय टूटल एखन,

एक दोसर के शोणित बहाबैत छी।

साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।

वेदना हम ह्रदय के सुनाबैत छी॥



दूर अप्पन कियै अछि पड़ोसी लगीच।

कटत जिनगी सुमन के बगीचे के बीच।

बात घर घर के छी इ सोचब ध्यान साँ,

स्वयं दर्पण स्वयं के देखाबैत छी।

साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।

वेदना हम ह्रदय के सुनाबैत छी॥




श्यामल सुमन, प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर - झारखण्ड,

Wednesday, December 03, 2008

देश प्रेम मे आस्था-मदन कुमार ठाकुर

शरद ऋतु के महिना छल तिथि पुर्णमासिये के दिन छल़ आ तारिक सेहो ११ छल संग मंगल दिन सेहो छल। सब तरहे शुभ लग्न छल। हम बिमार अबस्थामे छलहुँ ताही द्वारे हम घरे पर रही। ठकन काका भोजन पर बैसले छलथि। हम दलान पर कुर्सी पर बैसल छलहुँ। बाबासँ रामायण आ महाभारतक संर्दभमे बात चित करैत छलो ! की ताबे में ऐगो जिपसी आबी के दलान के आगु में ठार भगेल हम दौर के देखय लेल गेलहुँ ओहीमे सँ चारि गो पुलिस हाथमे एगो पर्चि लके जिपसी के गेट से बाहर ऐला हमरा त बहुत डर भगेल जे हमरा पुलिस पकैर लेत ताही द्वुवरे हम ओतहि से धीरे धीरे ससरी के भागय लागलो की ताबे में ऐगो पुलिसबा हमरा पुछल्क ऐ लड़का ठकन ठाकुर का घर कौन हैं ? हम अपन मन में सोच्लो इ त हमरा काका के पकरैय लेल अयल हन हम पुलिस के दोसर के घर देखा देयत छियक आ ठकन काका के कहबैन जे ओ कतौ भैग जेता हम पुलिस के दोसर के घर देखा देलिय़ पुलिस ओहिठाम जेकs पुछ ताछ केलक आ १० मिनट के बाद फेर हमरे दलान पर आबिगेल आ बाबा से पुछलकैन जे ठकन ठाकुर को बुलाईये उसके नाम से वारन्ट आया हें! बाबा त अकचक्‍ति भगेला जे वारन्ट ककरा कहैत छै ! वारन्ट परचि जे छल से पुलिस हमरा बाबा के हाथ में पकरा देलकैन ! बाबा हमरा जोर से आबाज देलाइर्थि जे ऐमहर कनी आबह, इ वारन्ट पर्चि के पढ़ के सुनाबह , हम डराइर्ते डराइर्ते दलान पर ऐलो, वारन्ट पर्चि हम हाथ में लेलो देखलो इ अंग्रेजी में लिखल गेल अछि हम ओही के नही पैढ़ सकलो क्‍याकी हम ओही समय में दुसरी कक्षा में पढैते छलो ! ऐना त गाम घर में के ऐतेक अंग्रेजी पर ध्य्यान दैयत छैक ! ऐतबा में ठकन काका सेहो दलान पर आबी गेलाइर्थ आ पुलिस से कहलखिन जे हमही ठकन ठाकुर छी , सहाब हमरा कि कह चाहैत छी ? पुलिस हाथ में वारन्ट पर्चि के लsके सब के सामने पढैय लागल सब कियो धय्यान से सुनय लागल .......


To,

The Dear Public


With due respects it is submitted that according to 1991 census your family was having 19 members out of which 11 are sons and 6 are daughters. Now Bihar Military Control Board, Patna needs urgently 4 of your sons. For the sake of the country and dedication towards the home land, as a true patriot, you are requested to surrender 4 of your sons for the service to the country.


Jai Hind Jai Bharat

BMC (B) Patna

पुलिसबा अंग्रेजी में सबटा धुरघार पढ़ने चली गेल मुदा ओकर मतलब गाम में कियोक नही बुझलक ! डैरते - डैरते ठकन काका पुलिस से कहलखिन सहाब हमरा मैथिली में बता दिय जे ऐकर मतलब कि होइत अछि ? पुलिस के मैथिली बाजल नही होइत छलये तयो ओ कोसिस के कs हिन्दीये में ठकन काका से वर्तालाप केलकैन ! पुलिस - आप के शादी के कितने वर्ष हुवा है ? ठकन काका २८ वर्ष पुलिस - आपने अपने घर की जनसंख्याँ पे कंट्रोल क्यों नही किये ? ठकन काका – सहाब हम अपन जनानी से कहलये जे तु छः महिन एक साल के लेल नैहर चली जो लेकिन ओ नही गेल , कहैत रहीगेल जे हमर माय बाबु बहुत गरीब अछी ! ओही मे हम की करब ? पुलिस - ठाकुर जी घबराने कि कोई बात नही है , आपके घर परिवार आज मंगल दिन से सदा के लिये मंगल मय रहेगा ! ठकन काका – सहाब जी से अहा कोना बुझैत छियेक ! पुलिस – ठाकुर जी मैं बिहार बिहार मिलेट्री संचालक पटना से आया हूँ ! कंट्रोल बोड़ के तरफ से आपके चार पुत्रो का बुलाबा हैं ! इन चारो को सिपाही फैज में नौकरी मिलेगा और तीन हजार रूपैया प्रतिमाहा के हिसाब से तंखा मिलेगा ! जिस से आपके बांकी बच्चे अछे से अछे स्कुल कालेज में पढ़ सकेगा और देश प्रेम में आस्था बनाये रखेगा ! ई बात सुनी के ठकन काका झटसन अपन बरका बेटा राम के कहलखिन जे दौर के भैरव स्थान से ताबे हलवाई के दुकान से उधारी पॉँच किलो मोती चुर के लडू लेने आउ आ पहिने भगवती के भोग लगाउ आय मंगल दिन सेहो छी भगवती सदा मंगल करती ! तखने चारू भाई राम , श्याम, घनश्याम आ बलराम बी एम पी केम्प - ६ मुजफ्‍फरपुर चली गेला ट्रेनिंग पर ! ऐमहर गाम में सातो भाई आ छबो बहिन धीरे धीरे स्कुल आ कालेज जाय लागला पढ़ लिख के सब कियो निक निक पोस्ट पर पहुच गेला ! कियो सीए त कियो डाक्‍टर आ इनजिनीयर , सब तरहे ठकन काका के नाम रोशन करैय लगला ! ठकन काका के चारू तरफ्‍ से जान पहचान हुअ लगलैन , नेता मुखिया , पत्राकार , आ मिडिया बाला सब रोज कुन्नू नै कुन्न् बहाने हुन्का से पुछ ताछ करैय लेल आबैय लगलैन ! कियाकी ठकन काका के आय इन्कम लाखो , करोरो मेंs आबैय लगलेन ! ज्यो - ज्यो समय बितल गेल ताही अनुसार ठकन काका के सब बेटा आ बेटी के विवाहा दान होइत गेलैन ! कतेक में दहेज लके त कतेको मs बिना दहेज दके , सब तरहे सब काज धन्धा ठिक ठाक से चलैत छलैन ! ऐक दिन अचनक हुन्का घर पर ऐगे एमबुलेन्स आबिगेल सब लोक धीरे धीरे देखय लेल आब लागल , देख के सब चुपे चाप अपन घर दिस जाइर्ते रही जायत छल ! अही दृश्य के देखैक लेल ठकन काका सेहो गेला देखलखिन ओही में एगो लास जे हुन्कर माझिल बेटा श्याम के छलैन ! देख के ठकन काका बेहोश भगेला ! एमबुलेन्स के संग दुगो सिपाही और छल तकरा से सब कियो बात कारैय लागल , सिपाही कहलकैन जे हिनकर मौत कारगिलक लराई में भगेलाइन तै हम सब हिन्कर लास लके हिन्कर परिवार कए समरति करैय लेल आयल छी ! ठकन काका के समाज आ गाम घर में जतेक लोक सब छल सब कियो अंतिम संस्कार में भाग लेलैथ क्‍याकी ओ देश रक्षक शहीद पुत्र छला ! समय बितल गेल ठकन काका आब सेहो ७२ वर्ष के भगेल छला आ नैत आ नातीन के सेहो भरमार भगेल छलैऩ ! आइके समय मे हुनक परिवार के जनसंख्‍या ६८ सदश्य के भगेलेन तही उपलक्ष्य में आय १५ अगस्त के दिन , ठकन काका अपन सब परिवार के जतेक रिस्तेदारी नातेदारी सर समाज में जतेक भाइ बन्धु छल सब के ऐतबा नही सब नेता , मुखिया , शिक्षक गन आर जतेक आैफिसर सब छलैथ ! सब के आमंत्राण केने छलैथ , ठकन काका के मुख से ----- हम आई सब देश वासि के प्रति '' देश प्रेम में आस्थ '' बनाबैय या राखैय के लेल सब के प्राेतसाहन दैयत छी जे अपन देश अपन अधिकार अपन कर्त्‍वय अपन आत्‍म समान केवल देश प्रेम में आस्था रहला के बादे भेटैयत छैक ! जय हिन्द जय भारत , जय मैथिल जय मिथिला अहि अनुसारे सब नेता मुखिया, आर जतेक अभिवावक गन छलैथ सब कियो अपन अपन मुखारबिन्द से देश प्रेम में आस्था के लेल भाषन केलाइर्थ आ राष्ट्र् के मान बधेलाईथ आ देश भक्‍ति गीत से सेहा देश के सम्मान केलैथ ....


ला ला ----- ला ला


तिरंगा लहरे जो धीरे - धीरे


जय हिंद बोलू रे मैं धीरे - धीरे - २


सारे नेता जय हिंद बोले - २


हो हो ------ ला ला ------



तुम्ही मेरे देश का गौरव हो


तुम्ही मेरा देश का अभिमान हो


तुम्ही मेरा देश का भविष्य हो


तुम्ही मेरा देश का उज्जवल रूप हो


मेरे साथी हो तुम, मेरे सहारे हो तुम - २


बोले सारे बच्चे धीरे - धीरे


बोले सारे शिक्षक धीरे - धीरे हाँ - २


मेरा ये तिरंगा लहराता रहे


तिरंगा लहरे जो धीरे धीरे हिंद जय बोलू रे मैं धीरे - धीरे - २


सारे नेता जय हिंद बोले - २



हो हो ----- ला ला


१८५७ से आजादी का नारा था


१९४२ को भारत छोरो आन्दोलन था


१९४७ को देश मेरा आजाद हुआ


सारे देश वासी मिलके नारा दिया


मेरा ये तिरंगा लहराता रहे


तिरंगा लहरे जो धीरे - धीरे, जय हिंद बोलू रे मैं धीरे - धीरे - २


सारे नेता जय हिंद बोले - २



हो हो ----- ला ला


महात्मा गाँधी जैसे अहिंसा वादी थे


सुभाष - भगत जैसे क्रांति कारी थे


आम्बेडकर जैसे राईटर था


मोती और शास्त्री जैसे लीडर था


मेरा गौरव थे वो मेरा अभिमान थे वो - २


गाये गुणगान उनके धीरे - धीरे


गाये गुणगान वो भी धीरे - धीरे


मेरा ये तिरंगा लहराता रहे


तिरंगा लहरे जो धीरे - धीरे, जय हिंद बोलू रे मैं धीरे - धीरे - २


सारे नेता जय हिंद बोले - २



जय हिंद, जय भारत, जय मैथिली, जय मिथिला !!

मदन कुमार ठाकुर, कोठिया पट्टीटोल, झंझारपुर (मधुबनी) बिहार - ८४७४०४,

मोबाईल +919312460150 , ईमेल - madanjagdamba@rediffmail.com

Saturday, November 29, 2008

अहर्निश जागि करब हम रक्षा/ प्राणक बलिदान दए देब अपन
















केसर श्वेत हरित त्रिवार्णिक
मध्य नील चक्र अछि शोभित
चौबीस कीलक चक्र खचित अछि
अछि हाथ हमर पताका ई,
वन्दन, भारतभूमिक पूजन,
करय छी हम, लए अरिमर्दनक हम प्रण।
अहर्निश जागि करब हम रक्षा
प्राणक बलिदान दए देब अपन
सुख पसरत दुख दूर होएत गए
छी हम देशक ई देश हमर
अपन अपन पथमे लागल सभ
करत धन्य-धान्यक पूर्ति जखन
हाथ त्रिवार्णिक चक्र खचित बिच
बढ़त कीर्तिक संग देश तखन।
करि वन्दन मातृभूमिक पूजन,
छी हम, बढ़ि अरिमर्दनक लए प्रण।
समतल पर्वत तट सगरक
गङ्गा गोदावरी कावेरी ताप्ती,
नर्मदाक पावन धार,सरस्वती,
सिन्धु यमुनाक कातक हम
छी प्रगतिक आकांक्षी
देशक निर्माणक कार्मिक अविचल,
स्वच्छ धारक कातक बासी,
कीर्ति त्रिवार्णिक हाथ लेने छी,
वन्दन करैत माँ भारतीक,
कीर्तिक अभिलाषी,
आन्धीक बिहारिक आकांक्षी।

समर्पण गर्वक-संग ओहि 16 बलिदानीक नाम जे मुम्बईमे देशक सम्मानक रक्षार्थ अपन प्राणक बलिदान देलन्हि।


१.एन.एस.जी. मेजर सन्दीप उन्नीकृष्णन्







२.ए.टी.एस.चीफ हेमंत कड़कड़े




















३.अशोक कामटे











४.इंस्पेक्टर विजय सालस्कर











५.एन.एस.जी हवलदार गजेन्द्र सिंह "बिष्ट"








६.इंस्पेक्टर शशांक शिन्दे
७.इंस्पेक्टर ए.आर.चिटले
८.सब इंस्पेक्टर प्रकाश मोरे
९.कांस्टेबल विजय खांडेकर
१०.ए.एस.आइ.वी.अबाले
११.बाउ साब दुर्गुरे
१२.नानासाहब भोसले
१३.कांसटेबल जयवंत पाटिल
१४.कांसटेबल शेघोष पाटिल
१५.अम्बादास रामचन्द्र पवार
१६.एस.सी.चौधरी

1. दही चूडा चीनी- हरिमोहन झा 2. बाजि गेल रनडंक-श्री आरसी प्रसाद सिंह 3.तारानंद वियोगी-नन्दीग्रामपर पंचक

1. दही चूडा चीनी
हरिमोहन झा
दही चूड़ा चीनी
खट्टर कका दलान पर बैसल भाङ घाटैत छलाह । हमरा अबैत देखि बजलाह— हाँ...हाँ....ओम्हर मरचाइ रोपल छैक, घूमि कऽ आबह ।
हम कहलिऐन्ह।— खट्टर कका, आइ जयवारी भोज छैक, सैह सूचित करय आयल छी ।
खट्टर कका पुलकित होइत बजलाह...बाह बाह ! तखन सोझे चलि आबह । दु एकटा धङ्घेबे करतैक त की हैतैक ? ...हँ, भोजमे हैतैक की सभ ?
हम—दही चूडा चीनी ।
खट्टर कका— बस, बस, बस । सृष्टिगमे सभ सँ उत्कृ ष्टू पदार्थ यैह थीक । गोरसमे सभ सँ माँगलिक वस्तु— दही, अन्न मे सभक चूडामणि—चूडा, मधुरमे सभक मूल—चीनी । एहि तीनूक सँयोग बूझह तै त्रिवेणी—सँगम थीक । हमरा त त्रिलोकक आनन्दभ एहिमे बूझि पडैत अछि । चूडा...भूलोक, दही...भुवर्लोक, आ चीनी...स्वकर्लोक ।
हम देखल जे खट्टर कका एखन तरंगमे छथि । सभटा अद्भुते बजताह । अतएव काज अछैतो गप्पज सुनबाक लोभें बैसि गेलहुँ ।
खट्टर कका बजलाह— हम त बु झै छी जे एही भोजन सँ साँख्यक दर्शनक उत्पत्ति भेल अछि ।
हम चकित होइत पुछलिऐन्हु—ऐं ! दही चूडा चीनीसँ साँख्य दर्शन ! से कोना ?
खट्टर कका बजलाह...एखन कोनो हडबडी त ने छौह ? तखन बैसि जाह । हमर विश्वास अछि कपिल मुनि दही चूडा चीनीक अनुभव पर तीनू गुणक वर्णन कऽ गेल छथि । दही...सत्वकगुण, चूडा...तमोगुण, चीनी...रजोगुण ।
हम कहलियन्हि—खट्टर कका, अहाँक त सभटा कथा अद्भुते होइत अछि । ई हम कतह नहि सुनने छलहुँ ।
खट्टर कका बजलाह— हमर कोन बात एहन होइ अछि ने तों आनठाम सुनि सकबह ?
हम— खट्टर कका, त्रिगुणक अर्थ दही चूडा चीनी, से कोना बहार कैलियैक ?
खट्टर कका—देखह, असल तत्व दहिएमे रहैत छैक, तैं एकर नाम सत्व । चीनी गर्दा होइछ, तैं रज । चूडा रुक्षतम होइछ, तैं तम । देखै छह नहि, अपना देशमे एखन धरि “तमहा” चूडा शब्द प्रचलित अछि ।
हम—आश्चर्य ! एहि दिस हमर ध्यान नहि गेल छल ।
खट्टर कका व्याख्या करैत बजलाह—देखह, तमक अर्थ छैक अन्धकार । तैं छुच्छ चूडा पात पर रहने आँखिक आगाँ अन्हार भऽ जाइ छैक । जखन उज्जर दही ओहि पर पडि जाइ छैक तखन प्रकाशक उदय होइ छैक । तैं सत्व गुण कें प्रकाशक कहल गेलैक अछि । “सत्वं लघु प्रकाशकमिष्टम्” । तैं दही लघुपाकी तथा सभ कैं इष्टओ (प्रियगर) होइत अछि । चूडा कोष्ठघ कैं बान्हि् दैत छैक । तैं तम कैं अवरोधक कहल गेल छैक । और बिना रजोगुणे त क्रियाक प्रवर्तन हो नहि । तैं चीनीक योग बेत्रेक खाली चूडा दही नहि घोंटा सकैत छैक । आब बुझलहक ?
हम कहलिऐन्ह — धन्य छी खट्टर कका । अहाँ जे ने सिद्ध कऽ दी !
खट्टर कका बजलाह—देखह, साँख्यक मतसँ प्रथम विकार होइ छैक महत् वा बुद्धि । दहि चूडा चीनी खैला उत्तर पेटमे फूलि कय पसरैत छैक । यैह महत् अवस्था थिकैक । एहि अवस्थामे गप्प खूब फुरैत छैक । तैं महत् कहू वा बुद्धि...बात एक्के थिकैक । परन्तु एकरा हेतु सत्व गुणक आधिक्य होमक चाही अर्थात दही बेशी होमक चाही ।
हम—अहा ! साँख्य दर्शनक एहन तत्व् दोसर के कहि सकैत अछि ।
खट्टर कका बजलाह—यदि एहिना निमन्त्रण दैत रहह त क्रमशः सभ दर्शनक तत्व वुझा देवौह । त्रिगुणत्मिवका प्रकृति द्रष्टी पुरुष कैं रिझबैत छथि । एकर अर्थ जे ई त्रिगुणत्मवक भोजन भोक्ता पुरुष कैं नचवैत तथि । तैं—नृत्यकन्तिभोजनैर्विप्राः ।
हम कहलियन्हि—परन्तु् खट्टर कका ! पछिमाहा सभ त दही चूडा चीनी पर हँसैत छथि ।
खट्टर कका अङपोछा सँ भाँग छनैत बजलाह—हौ, सातु लिट्टी खैनिहार दधि—चिपटान्न क सौरभ की बुझताह ! पच्छिमक जेहन माटि बज्जर, तेहने अन्न बजरा, तेहने लोको बज्र सन । अपना देहक भूमि सरस, भोजन सरस, लोको सरस । चूडा पृथ्वी तत्वे...दही जल तत्व...चीनी अग्नि तत्व । तैं कफ पित्त वायु—तीनू दोष कैं शमन करबाक सामर्थ्य एहिमे छैक । देखह, अनादि काल सँ दही चूडा चीनीक सेवन करैत—करैत हमरा लोकनिक शोणित ठण्ढा भऽ गेल अछि । तैं मैथिल जाति कैं आइ धरि कहियो युद्ध करैत देखलहक अछि ?
हम— खट्टर कका, कहाँ सँ कहाँ शह चला देलहुँ । बीच—बीचमे तेहन मार्मिक व्यंग्य कऽ दैत छिऐक जे...
खट्टर कका—व्यंग्य नहि, यथार्थे कहैत छिऔह । देखह, भोजने सँ प्रकृति बनैत छैक । चाली माटि खा कऽ माटि भेल रहैत अछि । साँप बसात पीवि कऽ फनकैत अछि । साहेब सभ डवल रोटी खा कऽ फूलल रहैत अछि । मुर्गा खैनिहार मुर्गा जकाँ लडैत अछि । और हम सभ साग—भाँटा खा कऽ साग—भाँटा भेल छी । हमरा लोकनि भक्त (भात)क प्रेमी थिकहुँ, तैं एक दोसरा सँ विभक्त रहैत छी । ताहु पर की त द्विदल (दालि)क योग भेले ताकय ! तखन एक दल भऽ कऽ कोना रहि सकैत छी ?
हम—अहा ! की अलंकारक छटा !
खट्टर कका—केवल अलँकारे नहि, विज्ञानो छैक । कोनो जातिक स्विभाव बुझबाक हो त देखी जे ओकर सभ सँ प्रिय भोजन की थिकैक ? देखह, बँगाली ओ पच्छाँ हीक स्वभावमे की अन्तर छैक ?...जैह भेद रसगुल्ला ओ लड्डुमे छैक । रसगुल्ला‍ सरस ओ कोमल होइछ, लड्डू शुष्क। ओ कठोर । रसगुल्लाल पूर्वक प्रतीक थीक, लड्डू पश्चिामक । तैं हम कहैत छिऔह जे ककरो जातीय चरित्र बुझवाक हो त ओकर प्रधान मधुर देखी ।
हम— खट्टर कका, अपना सभक प्रधान मधुर की थीक ?
खट्टर कका—अपना सभक प्रधान मधुर थीक खाजा । देहातमे मिठाइ कहने ओकरे बोध होइछ । खाजा ने रसगुल्ला जकाँ स्निग्ध होइछ, ने लड्डू जकाँ ठोस । तैं हमरा लोकनिमे ने बँगालीवला स्नेह अछि, ने पंजाबीवला दृढता ...तखन खाजामे प्रत्येक परत फराक—फराक रहैत छैक, से अपनो सभमे रहितहि अछि ।
हम—वाह ! ई त चमत्कािरक गप्प कहल ! मौलिक !
खट्टर कका—ऐंठ वा बासि बात हम बजितहिं ने छी ।
हम—वास्तवमे खट्टर कका ! अहाँ ठीक कहै छी । गाम—गाममे गोलैसी, घर—घरमे पट्टीदारी झगडा । कचहरीमे पागे पाग देखाइत अछि । से किऐक ?
खट्टर कका—एकर कारण जे हमरा लोकनि आमिल मरचाइ बेसी खाइत छी । तीख चोख भेले ताकय । तीतोमे कम रुचि नहि । नीम—भाँटा, करैल, पटुआक झोर... हौ, जैह गुण कारणमे हतैक सैह ने कार्यमे प्रकट हैतैक ! कटुता, अम्लता ओ तिक्ताता हमरा लोकनिक अंग बनि गेल अछि । स्वाइत हम सभ अपनामे एतेक कटाउझ करैत छी !
हम—परन्तु बंगाली सभमे एतेक प्रेम किऐक ?
खट्टर कका भाँगमे एक आँजुर चीनी मिलबैत बजलाह—ओ सभ प्रत्येक वस्तु मे मधुरक योग दैत छथि । दालिओ मीठ, तरकारिओ मीठ, माछो मीठ, चटनिओ मीठ ! तखन कोना ने माधुर्य रहतन्हि ? अपनो जातिमे एहिना मीठक व्युवहार होमऽ लागय तखन ने ! तैं हम कहैत छिऔह जे अपना जातिमे जौं सँगठन करबाक हो त मधुरक बेसी प्रचार करह । केवल सभा कैने की हैतौह ? —“भोज ने भात ने, हरहर गीत !“गाम सँ दुगोला दूर करबाक हो त “दही चूडा चीनी लवण कदली लड्डू बरफी”क भोज करह ।
ई कहि खट्टर कका भाङ्गक लोटा उठौलन्हि और दू—चारि बुँद शिवजीक नाम पर छीटि घट्टघट्ट कय सभटा पीबि गेलाह ।


2. बाजि गेल रनडँक
श्री आरसी प्रसाद सिंह
बाजि गेल रनडँक, डँक ललकारि रहल अछि
गरजि—गरजि कै जन जन केँ परचारि रहल अछि
तरुण स्विदेशक की आबहुँ रहबें तों बैसल
आँखि फोल, दुर्मंद दानव कोनटा लग पैसल
कोशी—कमला उमडि रहल, कल्लोोल करै अछि
के रोकत ई बाढि, ककर सामर्थ्यल अडै अछि
स्वीर्ग देवता क्षुब्धँ, राज—सिंहासन गेलै
मत्त भेल गजराज, पीठ लागल अछि म�ोलै
चलि नहि सकतै आब सवारी हौदा कसि कै
ई अरदराक मेघ ने मानत, रहत बरसि कै
एक बेरि बस देल जखन कटिबद्ध “चुनौती”
फेर आब के घूरि तकै अछि साँठक पौती ?
आबहुँ की रहतीह मैथिली बनल—बन्दिगनी ?
तरुक छाह मे बनि उदासिनी जनक—नन्दिुनी
डँक बाजि गेल, आगि लँक मे लागि रहल अछि
अभिनव विद्यापतिक भवानि जागि रहल अछि

3
तारानंद वियोगी

नंदीग्राम पर पंचक
एक

जनता जागल भूमि लए
बाजि रहल दू टूक
जनवादी के हाथ मे
एम्हदर छैन्ह बंदूक

एम्हदर छैन्ह बंदूक
दनादन गोली मारथि
टाटा बिड़ला के खड्ढा मे
जन के गाड़थि

जे छल जनता केर पहरुआ
सैह अधक्की भेल
सोभथि श्री बुशराज मुकुटमणि
देश भांड़ मे गेल

दू

जे जनता के गठित क'
बनल छलाह बदशाह
सएह कहै छथ‍ि कुपित भ'
जनता बड तमसाह

जनता बड तमसाह
सुनए नहि एको बतिया
बुश केर की छैन्हय दोख
एतुक लोके झंझटिया

छलहा मार्क्सझ के प्रबल प्रबंधक
आब बजाबथि झालि
आबह राजा तंत्र संभारह
गां मे रान्ह्' दालि

तीन

गां मे लोकक खेत अछि
खेते थिक अवलंब
सएह कहै छथि बादशाह
छोड़ै जन अविलंब

छोड़ै जन अविलंब
कंपनीक बैरक आबै
अपन मजूरी पाबि
देस के मान बढाबै

एहन देस ओ बनत
जतक जनता होअए नि:स्वोत्व
संसद बौक बनल अछि देखू
राजनीति के तत्वि

चारि

लोक छलिए चुप आइ धरि
देखि रहल छल खेल
जनता के जे रहए आप्तआ जन
सएह गिरह कट भेल

सएह गिरहकट भेल
आब ओ मैल छोड़ाओत
छोड़त ने क्योा खेत
भने सब प्राण गमाओत

टाटा बिड़ला के बस्तीय मे
जनता ने क्योक हएत
जे बसतै से कुली कबाड़ी
देस बेच क' खएत

पांच

सएह कहै छी
सुनह वियोगी
बूझह की थिक 'सेज'
तों छह ककरा पक्ष मे
गांधी कि अंगरेज

गांधी आ अंगरेज दुनू मे
बाझल झगड़ा
निर्दय नइ झट हएत
बुझाइ-ए जोड़ा तगड़ा

बचत कोना क' लोक
भूमि, से सएह झकै छी
गांधी आ अंगरेज एतहु छथ‍ि
साफ देखय छी।

Sunday, November 23, 2008

हर आ’ बरद

मोन गेल भोथियायल,
जोति बरद सोचिमे पड़लहुँ,
एतय-ओतय केर बात,
हर जोतने भेल साँझ,
हरायल बरद ताकी चारू कात।
कहबय ककरा ई गप्प,
सुनि हँसत हमरा पर आइ,
मोने अछि भोथियायल,
अप्पन सप्पत कहय छी भाय।

Friday, November 21, 2008

मिथिला विभूति 2- मिथिलाक महिला विभूति

अणिमा सिंह

(१९२४- )—समीक्षिका, अनुवादिका, सम्पादिका।प्रकाशन: मैथिली लोकगीत, वसवेश्वर (अनु.) आदि। लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज, कलकत्तामे पूर्व प्राध्यापिका।




लिली रे


जन्म:२६ जनवरी, १९३३,पिता:भीमनाथ मिश्र,पति:डॉ. एच.एन्.रे, दुर्गागंज, मैथिलीक विशिष्ट कथाकार एवं उपन्यासकार । मरीचिका उपन्यासपर साहित्य अकादेमीक १९८२ ई. मे पुरस्कार।मैथिलीमे लगभग दू सय कथा आ पाँच टा उपन्यास प्रकाशित।विपुल बाल साहित्यक सृजन। अनेक भारतीय भाषामे कथाक अनुवाद-प्रकाशित। प्रबोध सम्मान प्राप्त।



शांति सुमन

जन्म 15 सितम्बर 1942, कासिमपुर, सहरसा, बिहार, प्रकाशित कृति, “ओ प्रतीक्षित, परछाई टूटती, सुलगते पसीने, पसीने के रिश्त, मौसम हुआ कबीर, समय चेतावनी नहीं देता, तप रेहे कचनार, भीतर-भीतर आग, मेघ इन्द्रनील (मैथिली गीत संग्रह), शोध प्रबंध: मध्यवर्गीय चेतना और हिन्दी का आधुनिक काव्य, उपन्यास: जल झुका हिरन। सम्मान: साहित्य सेवा सम्मान, कवि रत्न सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान। अध्यापन कार्य।





शेफालिका वर्मा


जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),सम्प्रति: ए. एन. कालेज मे हिन्दीक प्राध्यापिका ।प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित कृति :विप्रलब्धा कविता संग्रह,स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह,एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत । ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह ।



इलारानी सिंह


जन्म 1 जुलाई, 1945, निधन : 13 जून, 1993, पिता: प्रो. प्रबोध नारायण सिंह सम्पादिका : मिथिला दर्शन, विशेष अध्ययन: मैथिली, हिन्दी, बंगला, अंग्रेजी, भाषा विज्ञान एवं लोक साहित्य। प्रकाशित कृति: सलोमा (आस्कर वाइल्डक फ्रेंच नाटकक अनुवाद 1965), प्रेम एक कविता (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विषवृक्ष (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विन्दंती (1972), स्वरचित: मैथिली कविता संग्रह (1973), हिन्दी संग्रह।






नीरजा रेणु

जन्म: ११ अक्टूबर १९४५,नाम: कामाख्या देवी,उपनाम:नीरजा रेणु,जन्म स्थान:नवटोल,सरिसबपाही ।शिक्षा: बी.ए. (आनर्स) एम.ए.,पी-एच.डी.,गृहिणी ।प्रकाशित रचना:ओसकण (कविता मि.मि., १९६०) लेखन पर पारिवारिक, सांस्कृतिक परिवेशक प्रभाव।मैथिली कथा धारा साहित्य अकादेमी नई दिल्लीसँ स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथाक पन्द्रह टा प्रतिनिधि कथाक सम्पादन ।सृजन धार पियासल कथा संग्रह,आगत क्षण ले कविता संग्रह, ऋतम्भरा कथा संग्रह,प्रतिच्छवि हिन्दी कथा संग्रह,१९६० सँ आइधरि सएसँ अधिक कथा, कविता, शोधनिबन्ध, ललितनिबन्ध,आदि अनेक पत्र-पत्रिका तथा अभिनन्दनग्रन्थमे प्रकाशित ।मैथिलीक अतिरिक्त किछु रचना हिन्दी तथा अंग्रेजीमे सेहो।




उषाकिरण खान


जन्म:१४ अक्टूबर १९४५,कथा एवं उपन्यास लेखनमे प्रख्यात।मैथिली तथा हिन्दी दूनू भाषाक चर्चित लेखिका।प्रकाशित कृति:अनुंत्तरित प्रश्न, दूर्वाक्षत, हसीना मंज़िल (उपन्यास), नाटक, उपन्यास।





प्रेमलता मिश्र ’प्रेम’

जन्म:१९४८,जन्मस्थान:रहिका,माता:श्रीमती वृन्दा देवी,पिता:पं. दीनानाथ झा,शिक्षा:एम.ए., बी.एड.,प्रसिद्ध अभिनेत्री दू सयसँ बेशी नाटकमे भाग लेलनि ।भंगिमा (नाट्यमंच) क भूतपूर्व उपाध्यक्षा, पत्रिकाक सम्पादन, कथालेखन आदिमे कुशल । ’अरिपन’ आदि अनेक संस्था द्वारा पुरस्कृत-सम्मानित।


आशा मिश्र


जन्म:६-७-१९५० ई.,प्रकाशित कथा मे मैथिकीक संग हिन्दी मे सेहो । सभसँ पैघ विजय मैथिली कथा संग्रह।





नीता झा

जन्म : २१-०१-१९५३,व्यवसाय:प्राध्यापिका । लेखन पर समाजक परम्परा तथा आधुनिकताक संस्कार सँ होइत विसंगतिक प्रभाव।प्रकाशित कृति : फरिच्छ, कथा संग्रह १९८४, कथानवनीत १९९०,सामाजिक असन्तोष ओ मैथिली साहित्य शोध समीक्षा।





ज्योत्स्ना चन्द्रम

मूल नाम: कुमारी ज्योत्स्ना ,उपनाम : ज्योत्स्ना आनन्द ,जन्मतिथि: १५ दिसम्बर, १९६३,जन्मस्थान : मरूआरा, सिंधिया खुर्द, समस्तीपुर,पिता: श्री मार्कण्डेय प्रवासी,माता: श्रीमती सुशीला झा,कार्यक्षेत्र : अध्ययनाध्यापन ।,रचना प्रकाशित : झिझिरकोना (कथा-संग्रह), एसगर-एसगर (नाटक),बीतक संग संकलन एवं सम्पादन।एकर अतिरिक्त दर्जनाधिक कथा ओ कविता विभिन्न पत्र-पत्रिका में प्रकाशित तथा आकाशवाणीक पटना, भागलपुर, दरभंगा केन्द्रसँ प्रसारित।शिक्षा : पटना विश्वविद्यालयसँ हिन्दी साहित्यमे एम.ए,।


सुस्मिता पाठक


जन्म:२५ फरवरी, १९६२,सुपौल, बिहार । परिचिति कविता संग्रह प्रकाशित । कथावाचक, कथासंग्रह प्रकाशनाधीन । राजनीति शास्त्रमे एम.ए.। संगीत, पेंटिंगमे रुचि । मैथिलीक पोथी पत्रिका पर अनेक रेखाचित्र प्रकाशित । समकालीन जीवन, समय, आ तकर स्पंदनक कवयित्री । अनेक भाषामे रचनाक अनुवाद प्रकाशित।


विभा रानी (१९५९- )लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता-बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा।

विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि।
'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि, जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि।

श्रीमति विभारानी सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि।

ज्योति
www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) ज्योतिकेँ भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी।


रूपा धीरू
- जन्मस्थान-मयनाकडेरी, सप्तरी, श्रीमती पूनम झा आ श्री अरूणकुमार झाक पुत्री।स्थायी पता- अञ्चल- सगरमाथा, जिल्ला- सिरहा। प्रथम प्रकाशित रचना-कोइली कानए, माटिसँ सिनेह (कविता),भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक पुस्तकक धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँग मैथिलीमे सहअनुवाद,सङ्गीतसम्बन्धी कृति- राष्ट्रियगान, भोर, नेहक वएन, चेतना, प्रियतम हमर कमौआ (पहिल मैथिली सीडी), प्रेम भेल तरघुस्कीमे, सुरक्षित मातृत्व गीतमाला, सुखक सनेस। सम्पादन-पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादन-सहयोग,हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ आ कक्षा 9-10 क ऐच्छिक मैथिली विषय पाठ्यपुस्तकक भाषा सम्पादन), पल्लवमिथिला, प्रथम मैथिली इन्टरनेट पत्रिका,वि.सं. २०५९ माघ (साहित्यिक), सम्पादन-सहयोग।

मैत्रेयी - याज्ञवल्क्यक दू टा पत्नी छलथिन्ह, १. कात्यायनी आऽ दोसर मैत्रेयी। मत्रेयी ब्रह्मवादिनी छलीह। कात्यायनीसँ हुनका तीनटा पुत्र छलन्हि- चन्द्रकान्ता, महामेघ आऽ विजय।

Sunday, November 16, 2008

‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिकाक २२-२५ म अंक

अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भऽ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका केर २५ टा अंक http://www.videha.co.in/
पर ई-प्रकाशित भऽ चुकल अछि। "वि दे ह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका मासक १ आऽ १५ तिथिकेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि, ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। विदेहक सालाना २५ म अंक (०१ जनवरी २००९) प्रिंट फॉर्ममे सेहो आएत।
अहाँसँ सेहो "विदेह" लेल रचना आमन्त्रित अछि। यदि अहाँ पाक्षिक रूपेँ विदेहक हेतु अपन रचना पठा सकी, तँ हमर सभक मनोबल बढ़त।
२.कृपया अपन रचनाक संग अपन फोटो सेहो अवश्य पठायब। अपन संक्षिप्त आत्मकथात्मक परिचय, अपन भाषामे, सेहो पठेबाक कष्ट करब, जाहिसँ पाठक रचनाक संग रचनाकारक परिचय, ताहि प्रकारसँ , सेहो प्राप्त कए सकथि।
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संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० दिसम्बर २००८) ७० देशक ६७३ ठामसँ १,३६,८७४ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।


२.संदेश

१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।

२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|

३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।

४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।

५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।

६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।

७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।

८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।

९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।

१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।

११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।

१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।

१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।

१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल।

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Saturday, November 15, 2008

अंधेर नगरी चौपट राजा - मदन कुमार ठाकुर

एक समयक बात अछि, एक दिन गुरु आर चेला चिंता मणि दुनु गोटे तीर्थयात्रा पर निकललाह बहुत दूर जखन गेला रास्ता मे दुनु आदमी केँ भूख लागि गेल छलनि तs दुनु गोटा एगो मिठाई के दोकान पर गेलाह दोकानदार सँ कहलखिन जे हमरा दुनु आदमी के भोजन करबाक अछि अहाँ कतेक पाई लेब !

दोकानदार कहलकनि हम अहाँ दुनु आदमी सँ ५० - ५० पाई के हिसाब सँs भोजनक रेट लेब ! दुनु आदमी सोचलथि ई नगरी मेs बहुत महगाय छैक आगू जा के कुनू दोसर दोकान पर भोजन करब ! हुनका सभ केँ भूख बहुत जोर लागल छलनि ओ सभ दोसर दोकान पर पहुचला दोकानदार सँs पुछलखिन तँs दोकानदार कहलकनि जे हम अहाँ दुनु आदमीक २५ - २५ पाई केँ हिसाब सँs भोजन करायब !

गुरूजी आ चिंतामणिजी सोचलथि जे ई नगरी मे सबसँ सस्ता छैक अहि सँ सस्ता दोसर नगरी मे नञि भेटत हम भोजन एतहि करब ! अहिठामक भोजन सेहो बहुत स्वादिष्ट होइत अछि ! चिंतामणिजी गुरूजी सँs कहलखिन गुरूजी हम अहि नगरी मे रहब कियेकी अहिठाम सब किछ बहुत सस्ता भेटैत छैक आर भोजन सेहो बहुत स्वादिष्ट होइत अछि ! गुरुजी कहलखिन अहाँ अहिठाम नञि रहू कियेकी अहि नगरी मे भारी संकट आबय बला अछि ! अहाँ केँs अपन जानक बलिदान देबय पड़त ! चिंतामणि गुरुक बात नञि मान्अलथि ओ अपन गुरुजीक संग छोड़ि देलखिन ! चिंतामणि केँs अहिनगरी मे बहुत सुख आर आनंद आबय छलनि ! तहि सँs खा's पीs क' बहुत मोटाक' सिल भ's गेलथि !

समय बितलगेल भादव के महिना सेहो आबिगेल छल, कोसी नदी मेs बाढ़ि सेहो आबी गेल तहि सँs कतेक गाम सेहो दहा गेल छल, ओही नगरीमे सेहो पानि आबिगेल छल ! मंगला अपन जान बचबैक खातिर अपन घर - आँगन छोड़ि के भागिगेल आ बच्चा सभ के सेहो छोड़िक' चलि गेल छल ! ओकर घर - द्वार सभ खसि पड़ल ताहि सँ ओकर बेटाक मृत्यु भ's गेल छलय ! ई बात पूरा गाम मे सोर भ' गेलय जे मंगला अपन जान बचबै के खातिर अपन बेटाक बलिदान द् देलक ई बात ओही नगरी के राजा क's खबर भेलनि त's राजा अपन सेनापति सँs कहलखिन जे मंगला कs खोजि क's ला' हम ओकरा फाँसीक सजा देब ओ बहुत जुर्म केलक हन ! मंगलाक खोजि केs राजदरवार मेs पेस करल गेल ओकरा सँs राजा कहलखिन रोऊ मंगला तू ई गलती किये करले ? !

मंगला बजलथि .... हजूर हम त कुनू गलती नञि केलहुँ, हम त बच्चा केs छोड़िये टा क' भगलहुँ ई गलती तs राजमिस्त्री केलक जे हमर घर के छत ठीक सँs नञि बनेलक !


राजाक हुकुम भेलनि जे जल्दी सँs जल्दी राजमिस्त्री केँ दरवार मेs पेस कर'लए जे ओ बड गलती केलक जे कच्चा मकान बनेलक ........

दोसर दिन राज मिस्त्री राजदरवार मेs हाजिर भेलाह ओ राजा सँs कहलखिन हजूर गलती हम नञि केलहुँ, हम तँs छते टा बनेलहुँ, गिलेबा ख़राब त's हमर हेल्फर चुनचुनमा केलक आब अहीं कहू हमर कतय गलती अछि !

राजा फेर सेनापति केँs आदेश देलखिन जे चुनचुनमा केँs जल्दी बजा'क' लाऊ .......

तेसर दिन चुनचुनमा राजदरवार मेs हाजिर भेल... राजा हुनका सँ पुछलखिन जे रोऊ चुनचुनमा तू एहेंन गलती कियेक केलाह ...?

चुनचुनमा बाजल हजूर सभटा गलती हमही नञि केलहुँ गलती तँs ओही मईटो मेs छल जे ओ मईट बलुवाहा छल तैयो हम मज़बूरी मेs गिलेबा बनेलहुँ कियेकी हमरा पाई के बहुत जरुरत छल ! इहे हमरा सँs गलती भेल ! आब हजूर हमरा अहां जे सजा दी सभ हमरा मंजूर अछि !

राजा चुनचुनमा केs फाँसी के सजा सुनेल्खिन...........

राजा चंडाल केँs चुन्चुनमा के लेल फाँसीक फंदा तैयार करे के आदेश देलखिन चंडाल फाँसीक फंदा अपन हिसाब सँs तैयार केलक, चारिम दिन चुन्चुनमा केँ फाँसी के फंदा पर चढ़ाओल गेल ! फाँसीक फंदा लम्बा - चौरा छल .... चुन्चुनमा बहुत दुबर पातर ताहिसँs ससरिके फाँसीक फंदा सँs निचा उतरि गेल आ बगल मे जा's कएs ठाढ़ भ'sगेल....

सब कियो टकटक देखते रहि गेल ............

चंडाल चुन्चुनमा केँs दुबारा फाँसीक फंदा पर चढ्बए लागल...मुदा राजा ओकरा मना क' देलखिन ! राजा क हुकुम भेलनि जे चुनचुनमा केँs दुबारा सजा नञि हेतनि कियेकी राजदरवारक नियम होइत अछि जे एक आदमी केँs सजा एके बेर होइत छैक.... ताहि दुवारे अहि फंदा पर ओकरा सजा भेटतनि जकर गरदनि अहि फंदा मेs ठीक सँs बैसतैक..... सेनापति केँs राजा आदेश देलखिन जे अहाँ फंदा क हिसाब सँs कुनू आदमी पकड़ि क' लाऊ हम ओकरा फाँसीक सजा देबयs .......

सेनापति पूरा राज मेs घुमलाह हुनका चिंतामणिक गरदनि फंदाक हिसाबे सही बुझेलनि ! राजा केँ जे आदेश रहनि से ओ चिंतामणि सँs सुनेलखिन ! राजाक आदेश सुनि कएs चिंतामणि बहुत चिंतित भेलाह, ओ सोचए लगलाह की आब हम की करी चारू दिस हुनका किछ नञि सुझैत छनि ! तखने हुनका गुरूजीक बात याद परलनि ओ सोचलथि जे आब हमरा अपन जानक बलिदान सँs गुरुवेजी टा बचेताह दोसर कियो नञि !


चिंतामणि गुरुजीक ध्यान करए लगलाह.......

बनदे बोदमयंनितयंग गुरुर शंकर रूपनं !

यमासर्तोही बक्रोपि चन्द्रः सरबस्तर बन्देयेत !!
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर: !
गुरुर साक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम: !!
अखंडमंडलाकारंग व्याप्त येनग चराचरम !
तत्पदं दर्शितंग तस्मै श्री गुरुवे नम: !!
अज्ञान तिमरामिराधस्य ज्ञानानां शलाकय: !
चक्षुरपितयेंग तस्मै श्री गुरुवे नम: !! इत्यादि .........


चिंतामणिक स्मरण केला सँs गुरूजी केँ अचानक याद अलयनि जे हमर चेला चिंतामणि काफी संकट मेs फसल छथि ! हुनका अहि संकट सँs उबारनाय हमर धर्म अछि ! गुरूजी फेर ओही नगरी मे वापस आबि गेलाह आ चिंतामणि सँs हुनकर वार्तालाप सेहो भेलनि ! गुरूजी सब बात सँ अवगत भेला के बाद चिंतामणि केँs बोल भरोस देलखिन जे अहाँ चिंता जूनि करू हम आबि गेल छी !

चारिम दिन चिंतामणि राज दरवार मेs हाजिर भेलाह ! राजा हुनका फाँसी के सजा सुनेलकनि .....

तखने गुरूजी राजा सँs अर्जी केलनि हे राजन चिंतामणि एखन नवयुवक छथि हम बृध सेहो भ's गेल छी ताहि दुवारे अहाँ हमरा फाँसी के सजा दिअ जे हम अहि फाँसी पर चढ़ि क's स्वर्गलोक चलि जायब जाहिसे हमर तीनो लोक मेs जय - जय कार होमए लागत !

ई बात सुनि कए राज दरवार मेs जतेक लोक सभ बैसल छल सब कियो बेरा - बेरी राजा सँs अर्जी आर विनती केलथि जे हे राजन अहि फाँसी पर चढ़ि क' हम स्वर्गलोक जायब जाहिसँ हमर जय - जय कार तिनोलोक मेs होयत !

ई बात सुनि क' राजा अपना मोन मेs विचार केलथि जे कियेक नञि हमही अहि फाँसी पर चढ़ि क' स्वर्गलोक चलि जाइ जे हमर जय - जय कार तीनो लोक मेs होयत ! राजा झटसं अपन गद्दी सँ उतरि क's फाँसी क फंदा मे जा's क's लटकि गेलाह आ चंडाल केँs आदेश देलखिन जे फाँसी केँ उठा दे .....

राजा यमलोक चलि गेलाह .....

अहि दुवारे कहल गेल अछि अंधेर नगरी चौपट राजा ......


जय मैथिली, जय मिथिला


मदन कुमार ठाकुर, कोठिया पट्टीटोल, झंझारपुर (मधुबनी) बिहार - ८४७४०४,
मोबाईल +919312460150 , ईमेल -
madanjagdamba@rediffmail.com

Thursday, November 13, 2008

मिथिलाक भोज - प्रवीण झा

मिथिलाक भोज
उत्‍तम भोजन करै छथि मैथिल दिन, दुपहरिया, सॉझ, पराते
भोजक यदि बात करी त', मिथिलाक भोजक होइछ और बाते ।
एहि बेर बनल एहन संयोग
ग्रह-नक्षत्रक उत्‍तम योग
परि लागल हमरो एक भोज
छलौ करैत जकर हम खोज
छुट्टी मे हम गेलहुँ गाम
निमंत्रण आयल पुरूषे-दफान
सब मे छलनि भोजक उत्‍साह
धीया-पुता मे आनंद अथाह
चिंटू-पिंटू के भोरे सॅ उमंग
जेबै हमहू लालकाका क' संग
सॉंझ होइत भ' गेल अनघोल
चलै चलू पुबारी टोल
सब जन चलला लोटा लेने
छला कतेको बूटी देने
पहिल तोर भ' गेल प्रारंभ
भोक्‍ता केलनि भोजन आरंभ
आब सुनू व्‍यंजनक लिस्‍ट
सभक भेल पूर्ण अभिष्‍ट
छल आगू मे केराक पात
ताहि पर छल गमकौआ भात
डलना, कदीमा, बर, बरी
घी के संग दालिक तरी
अन्‍न-तीमन छल केहन विशेख
सब तरकारी एक पर एक
झुंगनी, कटहर, भॉटा-अदौरी
पुष्‍ट दही-चीनीक संग सकरौड़ी
केहन खटतुरूस बरीक झोर
खेलैन सब कियो पोरे-पोर
भोक्‍ता सब क' देलैन सत्‍याग्रह
तैयो भेल आग्रह पर आग्रह
भ' गेल बूझू महोमहो
सकरौड़ी बहल दहोबहो
मिथिला मे प्रसिद्ध अछि दही-चूड़ा,
पूरी-तरकारीक भोज मध्‍यम ।
कियो पँचमेर करथु तें की,
दालि-भाते होइछ सब सॅ उत्‍तम ।
भोक्‍तागण के पूर्ण संतुष्टि भोज मे होई छै बारीकक हाथे ।
भोजक यदि बात करी त', मिथिलाक भोजक होइछ और बाते ।
बाहरो मे खेने छी भोज परन्‍तु,
भोज-भात की करत इ दुनियॉ ।
मिथिलाक भोज अछि जतए रूपैया,
बाहरक भोज होइत अछि चौअनियॉ ।
नै कोनो आग्रह नै कोनो पात
हर-हर गीत नै भोज आ भात
पहिने लाऊ टाका वा गिफ्ट,
तखने भेटत भोजनक लिफ्ट ।
मांगू खाउ लाईन मे जाऊ,
जौं छी अहॉ भोजनक इच्‍छुक ।
प्‍लेट मे अहॉंके भेटत सामग्री,
ठाड़े रहु, जेना अकिंचन भिक्षुक ।
प्‍लेट लीय' आ बढि़ क' आऊ,
लागल अछि "सिस्‍टम बफर" ।
पूरी, पोलाव लीय प्‍लेट मे,
ठाड़े खाऊ जेना "डकहर" ।
इ कोन आदर, इ कोन सम्‍मान ?
पीबू जल आ करू प्रस्‍थान
भोजनोत्‍तर नै भेटत पान-सुपारी
एहन नोत नै हम स्‍वीकारी
हमरा प्रिय "मिथिलाक भोज"
नोत मानी हम सोझे-सोझ
लक्ष्‍मीपति के छथि मिथिला मे, तकर प्रतीक अछि भोजे-भाते
भोजक यदि बात करी त, मिथिलाक भोजक होइछ और बाते ।
प्रवीण झाजीक दोसर कविता

हमर आशानन्‍द भाई - प्रवीण झा

हमर आशानन्‍द भाई
हमर आशानन्‍द भाई, कमौआ ससुरक एकलौता जमाई ।
मास मे पन्‍द्रह दिन सासुरे मे डेरा ।
पबै छथि काजू-किशमिश, बर्फी-पेड़ा ।।
भोजन मे लगैत छनि बेस सचार ।
तरूआ, तिलकोर आ चटनी-अचार ।।
जेबी त गर्म रहबे करतैन, भेटैत रहै छनि गोरलगाई ।
हमर आशानन्‍द भाई, कमौआ ससुरक एकलौता जमाई ।
ससुर करैत छथिन ठीकेदारी ।
घटकैती मे छला अनारी ।।
जखन गेला ओ घटकैती मे ।
फँसि गेला बेचारे ठकैती मे ।।
आशानन्‍दक पिता कहलखिन- "सुनू औ मिस्‍टर !
हमर बेटा अछि "माइनेजिंग डाइरेक्‍टर" ।
के करत गाम मे हमर बेटाक परतर ।
के लेत इलाका मे हमरा बेटा सॅ टक्‍क्‍र ।।
तनख्‍वाह छैक सात अंक मे ।
कतेको लॉकर छैक "स्विस बैंक" मे ।।
कतेको लोक एला आ गेला, कियो ने छला लोक सुयोग्‍य ।
"बालक" देबैन हम ओही सज्‍जन के जे कियो हेता हमरा योग्‍य ।।
बीस लाख त द गेल छल, बूझू जे ओ कथा भ गेल छल ।
मुदा मात्र टाका खातिर बेटा के बेची हम नै छी ओ बाप कसाई" ।
हमर आशानन्‍द भाई, कमौआ ससुरक एकलौता जमाई ।
जोड़-तोड़ भेल, इ कथा पटि गेल ।
लगले विवाहक कार्ड बॅटि गेल ।।
दहेज भेटलनि लाख एगारह ।
आ आशानन्‍द भाईक पौ बारह ।।
शुभ-शुभ के भ गेलै ने विवाह ?
आब कनियॉक बाप होइत रहथु बताह ।
भेल विवाह मोर करबह की ?
आब पॉचों आंगुर सॅ टपकैत अछि घी ।
भले ही कनियॉ छैन कने कारी ।
मुदा विदाई मे त भेटलैन "टाटा सफारी" ।।
विवाहेक लेल ने छला बाहर मे ।
आब नौकरी-चाकरी जाय भाड़ मे ।।
आब जहन "बाबा" बले केनाई छनि फौदारी ।
तखन आब कियाक नै ओ ध लेता घरारी ।।
नै जेता ओ दिल्‍ली फेर, लगलैन हाथ ससुर के कमाई ।
हमर आशानन्‍द भाई, कमौआ ससुर के एकलौता जमाई ।
बिलास मे डूबल छथि आकंठ ।
सब दिन खेता रोहुएक "मुरघंट" ।
कुशल-क्षेम लेल हम पुछलियैन्‍ह- "की आशानन्‍द भाई ठीक" ?
ताहि पर कहला हमरा जे- "अहॉ के की तकलीफ ?
मुर्गा मोट फँसेलौ हम,
तें ने करै छी आइ बमबम" ।
कनियॉंक माई कपार पिटै छथि ।
"भाग्‍यक लेख" कहि संतोष करै छथि ।।
"हमर बुचिया के कपार केना एहन भेलै गे दाई !"
हमर आशानन्‍द भाई, कमौआ ससुर के एकलौता जमाई ।
बहुतो आशानन्‍द छथि एहि आस मे।
कहियो फँसबे करत कन्‍यागत ब्रह़मफॉंस मे ।।
कियो कहता जे हम "मार्केटिंग ऑफिसर",
कहता कियो हम छी कंपनीक "मैनेजर",
तड़क-भड़क द भ्रम फैलौने,
छथि अनेको "लाल नटवर" ।
ध क आडम्‍बर देने रहु, आशा क डोर धेने रहु ।
कोनो गरदनि भेटबे करत, अप्‍पन चक्‍कू पिजेने रहु ।।
भला करथुन एहन आशानन्‍द सभक जगदम्‍बा माई ।
हमर आशानन्‍द भाई, कमौआ ससुरक एकलौता जमाई ।।
प्रवीण झाजीक दोसर कविता

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