भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Saturday, March 28, 2009
समीक्षा श्रृंखला---२। रुपकांत ठाकुर पर आशीष अनचिन्हार।
शीर्षक पढैते देरी पाठक लोकनि एकर रचियता के निराशावादी घोषित कए देताह आ फतवा देताह जे समाज के एहन -एहन वकतव्य सँ दूर रहबाक चाही।मुदा हमरा बुझने पाठक लोकनि अगुता गेल छथि,आ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि। मुदा इहो एकटा सुपरिचित तथ्य थिक जे लोक के जतेक उपदेश दिऔक ओ ओतबे तागति सँ ओकर उन्टा काज करत।मुदा तैओ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि आ ता धरि नहि अगुताथि जा धरि शीर्षक पूर्ण वाक्य नहि भए जाए।आब अहाँ सभ टाँग अड़ाएब जे शीर्षक त अपना आप मे पूर्ण छैहे तखन अहाँ एकरा अपूर्ण कोना कहैत छिऐक ? मुदा नहि, कोनो वस्तु बाहर सँ पूर्ण होइतो भीतर सँ अपूर्ण होइत छैक। इहए गप्प एहि शीर्षकक संग छैक। अच्छा आब हम अपन विद्वताक दाबी छोड़ी आ आ अहाँ सभ के पूर्ण वाक्य के दर्शन कराबी - "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि, सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"।
मैथिली साहित्य मे बहुत रास बिडंबना छैक, प्रवंचना छैक, वंदना छैक अर्थात सभ किछु छैक मुदा तीन गोट वस्तु के छोड़ि--
१) मैथिली मे व्यंग प्रचुर मात्रा (गुण एवं परिमाण) मे नहि लिखाइत अछि,
२) जँ झोंक- झाँक मे लिखाइतो छैक त स्तरीय आलोचना नहि होइत छैक ,
३) आ जँ भगवान भरोसे स्तरीय आलोचना अबितो छैक त हरिमोहन झा के शिखर मानि सभ के भुट्टा बना देल जाइत छैक ।
एहि तीन टा के छोड़ि एकटा आर महान बिडंबना छैक जे आलोचक आलोचना करताह फल्लाँ बाबूक अथवा हुनक कृति के मुदा समुच्चा मैथिली अलोचना मे हरिमोहन बाबू तेना ने घोसिआएल रहता जे पाठक एहन आलोचना के हरिमोहने बाबूक आलोचना बूझैत छथि।
आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "ली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि--1) मोमक नाक (कथा संग्रह)
2) धूकल केरा (कथा संग्रह)
3) लगाम (नाटक)
4) वचन वैष्णव (नाटक)
5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक।
आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । इ शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मतलब जे लेखक भविष्यक संकेत कए गेल छथि।
आब किछु गप्प करी मैथली व्यंग मे राजनीतिक व्यंग पर। कोन चिड़ियाक नाम छैक राजनीतिक व्यंगइ हमरा जनैत मैथिली व्यंगकार नहि जनैत छथि। ओना व्यंग केकरा कहल जाइत छैक सेहो बूझब कठिन। हमरा जनैत मैथिली मे 93% व्यंग लिखल जाइत छैक मुदा 93% आलोचक ओकरा हास्य मानि आलोचना करैत छथि। सभ व्यंगकार ओहीक मारल छथि, चाहे शिखर-पुरुष हरिमोहन बाबू होथि वा रुपकांत ठाकुर। सुच्चा व्यंग लिखला पछातिओ हरिमोहन बाबू कहेलाह हास्य-व्यंग सम्राट। अर्थात हास्यकार पहिने आ व्यंगकार बाद मे। बाद बाँकी 7% हास्य लिखाइत अछि जकर प्रतिनिधि छथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" ।
हँ त फेर आबी हम राजनीतिक व्यंग पर। हमरा जनैत जाहि व्यंग मे अपन समकालीन अथवा पूर्वकालिक राजनीति, शासन-व्यवस्था, ओकर संचालक आदि पर निशाना साधल गेल हो ओकरा राजनीतिक व्यंग कहाल जाइए। ओना इ अकादमिक परिभाषा नहि अछि।
त फेर हम अहाँ सभ के रुपकांत ठाकुर लग लए चली, आ हुनक एक गोट पोथीक परिचय करा हुनक राजनीतिक चेतना के देखाबी। जाहि पोथी सँ हम अहाँ के परिचय कराएब ओकर नाम छैक "मोमक नाक"। एहि व्यंग-संग्रह मे नौ गोट कथा थिक। परिचय शुरु करेबा सँ पहिनहि कहि दी जे इ कोनो जरुरी नहि छैक जे हम अहाँ के नओ कथा कहब आ ने जरूरी छैक जे संग्रहक पहिल कथा सँ हम शुरू करी। इ निर्णय हमर व्यत्तिगत अछि आ अहाँ एहि सँ सहमत भइओ सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। हँ त हम शुरू करी संग्रहक अंतिम कथा "मर्द माने की" सँ। जेना की शीर्षके सँ बुझाइत छैक लेखक अवस्स एहि मे मर्दक परिभाषा देने हेथिन्ह। से सत्ते, लेखक जखन शुरुए मे कहैत छथिन्ह जे " लोटा ल' क' घरवालीक लहटगर देह पर गदागद ढोल बजौनिहार एहन सुपुरुष कत' भेटत?"। त सभ अर्थ स्पष्ट भए जाइत छैक। मुदा लेखक एतबे सँ संतुष्ट नहि भए आगू कहैत छथि " मर्द माने कमौआ, आ कमौआ माने वियाहल,आ वियाहल माने बुड़िबक आ बुड़िबक माने बड़द"। सुच्चा मैथिल अभिव्यत्ति। एखनो अर्थात 2009 धरि मैथिल समाजक इ धारणा छैक जे कमौए मर्द होइत अछि, आ जहाँ कहीं कोनो मर्द देखाइ पड़ल लोक ओकर विआह करबाइए कए छोरैए। आ जहाँ धरि गप्प रहल बियाहल माने बुड़िबक से त हम नहि कहब मुदा बुड़िबक माने बड़द अवश्य होइत छैक। खाली खटनाइ सँ मतलब। अधिकारक प्रति निरपेक्ष। आब हम एहि सँ बेसी नहि कहब एहि कथाक प्रसंग। बस एतबे सँ लेखकक चेतनाक अनुमान कए लिअ।
"ठोकल ठक्क" मे लेखक ओहन भातिज आ जमाएक दर्शन कराबैत छथि जनिकर काजे छन्हि कमीशन खाएब आ एहि लेल ओ अपन पित्ती एवं ससुरो के नहि छोड़ैत छथिन्ह। आ जँ एही कथाक माध्यमे अहाँ तात्कालीन रजनीतिक देखए चाहब त रुपकांत एना देखेताह-"सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"। अर्थात बेशर्म, निर्लज्ज, हेहर,थेथर सरकार।
भारतक समकालीन विकास जँ अहाँ देखबाक इच्छा होइत हो त रुपकांत ओहो देखेताह। कनेक पढ़ू "जय गंगा जी" जतए रेलगाड़ी के बढैत देखि लेखक टिप्पणी करैत छथि-"कांग्रेसी नेता जकाँ लोक के अपन पेट मे राखि क' ओकर सुख-दुख अथवा उन्नति-अवनति के बिसरि गाड़ी मात्र आगू बढब जनैत छल। अपना बले नहि कोइला आ पानिक बलें। परन्तु पवदान पर चढ़ल यात्री कतऽ छलाह?" ई सवाल जतेक भयावह लेखकक समय मे छल ततबे भयावह एखनो अछि। लेखक सरकारक डपोरशंखी योजनाक लतखुर्दन एही कथा मे करैत छथि-" कोन टीसन केखन बितलैक से मोन राखब पंचवर्षीय योजना सभ मे उन्नतिक कागजी आकड़ा मोन राखब थिक"।
बेसी प्रशंसात्मक उद्धरण देब हमरा अभीष्ट नहि मुदा तैओ एकटा उद्धरण देबा सँ हम अपना के रोकि नहि पाबि रहल छी। एही संग्रहक दोसर कथा थिक "फूजल ऊक"।बेसी अपन वक्तव्य नहि कहि उद्धरण सुनाबी-"मात्र सुधारवादी दृष्टि रखला मात्र सँ सुधार कथमपि नहि भए सकैछ"। जँ लेखकक भावना के बचबैत हम लिखी जे "प्रगतिशील विचार लिखला मात्र सँ प्रगतिशीलता कथमपि नहि आबि सकैछ" त इ स्पष्ट भए जाएत जे रुपकांत कतए व्यंग कए रहल छथिन्ह आ केकरा पर कए रहल छथिन्ह।
ठाकुर जी एकपक्षीय व्यंगकार नहि छथि। ओ दूनू पक्ष के हूट सँ मानसिक आ बूट सँ शारिरिक प्रताड़ाना दैत छथिन्ह। तकर प्रमाण ओ एहि संग्रहक पहिल कथा जे पोथीक नामो छैक अर्थात " मोमक नाक" मे देखेलैन्ह अछि। हुनकहिं शब्द मे " आजुक युग मे भला आदमीक परिभाषा उनटि गेल छैक। जनता जनता अछि जे से सभ मोमक नाक जकाँ लुजबुज। जखन जाहि दिस नफगर रहै छैक तिम्हरे लोक घूमि जाइछ" स्वतंत्रे भारत नहि हमरा विचारे जम्बूदीपक जनता सँ लए कए एखुनका भारतीय जनताक चारित्रिक विशेषता ई उद्धरण देखबैत अछि। आ एतेक देखेलाक पछातिओ आलोचक रुपकांतक नाम बिसरि गेल छथि।
भने आलोचक नाम बिसरि गेलखिन्ह मुदा पाठकक मोन मे एखनो धरि रुपकांत ठाकुरक रचना खचित छैन्ह। हमरा जनैत कोनो लेखकक प्रथम आ अंतिम सफलता इएह छैक। आ रुपकांत इ सफलता अपन रचनाक माध्यमें प्राप्त केलन्हि ताहि मे संदेह नहि।
विदेह ई पत्रिकामे http://www.videha.co.in/ पर पूर्वप्रकाशित।
सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा : मैथिली अनुवाद रमानन्द झा 'रमण' : भाषा सम्पादन गोविन्द झा
UNIVERSAL DECLARATION OF HUMAN RIGHTS
MAITHILI TRANSLATION
(राष्ट्रसंघक साधारण सभा 10 दिसम्बर, 1948 के ँ एक सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा स्वीकृत आ‘
उद्घोषित कएलक जकर पूर्णपाठ आगाँ देल गेल अछि। एहि ऐतिहासिक घोषणाक उपरान्त साधारण
सभा समस्त सदस्य देशसँ अनुरोध कएलक जे ओ एहि घोषणाक प्रचार करए तथा मुख्यतः, अपन देश
आ‘ प्रदेशक राजनैतिक स्थितिक अनुरूप बिनु भेदभावक, स्कूल आ‘ अन्य शिक्षण संस्था सभमे एकर
प्रदर्शन, पठन-पाठन आ‘ अनुबोधनक व्यवस्था करए।)
एहि घोषणाक आधिकारिक पाठ राष्ट्रसंघक पाँच भाषामे उपलब्ध अछि-अंग्रेजी, चीनी, फ्रांसीसी, रूसी आ,
स्पेनिश। एहिठाम एहि घोषणाक मैथिली रूपान्तरण प्रस्तुत अछि।)
उद्देश्यिका
जे ँ कि मानव परिवारक सकल सदस्यक जन्मजात गरिमा आओर समान एवं अविच्छेद्य अधिकारके ँ
स्वीकृति देब स्वतन्त्रता, न्याय आ‘ विश्वशान्तिक मूलाधार थिक,
जे ँ कि मानवाधिकारक अवहेलना आ‘ अवमाननाक परिणाम होइछ एहन नृशंस आचरण जाहिसँ मानवक
अन्तःकरण मर्माहत होइत अछि आओर अवरुद्ध होइत अछि एक एहन विश्वक अवतरण जाहिमे
अभिव्यक्ति आ‘ विश्वासक स्वतन्त्रता तथा भय आ‘ अकिंचनतासँ मुक्ति जनसामान्यक सर्वोच्च आकंाक्षा
घोषित हो;
जे ँ कि विधिसम्मत शासन द्वारा मानवाधिकारक रक्षा एहि हेतु परमावश्यक अछि जे केओ व्यक्ति
अत्याचार आ‘ दमनसँ बँचबाक कोनो आन उपाय नहि पाबि, शासनक विरुद्ध बागी नहि भए जाए;
जे ँ कि राष्ट्रसभक बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बढ़ाएब परमावश्यक अछि;
जे ँ कि राष्ट्रसंघक लोक अपन चार्टर मध्य मौलिक मानवाधिकारमे, मानवक गरिमा आ‘ मूल्यमे तथा स्त्री
आ‘ पुरुषक बीच समान अधिकारमे अपन निष्ठा पुनः परिपुष्ट कएलक अछि आओर व्यापक स्वतन्त्रताक
संग सामाजिक प्रगति आ‘ जीवन स्तरक समुन्नयन हेतु कृत संकल्पित अछि;
जे ँ कि सदस्य राष्ट्रसभ राष्ट्रसंघक सहयोगसँ मानवाधिकार आ‘ मौलिक स्वतन्त्रताक सार्वभौम आदर
तथा अनुपालन करबाक हेतु प्रतिबद्ध अछि;
जे ँ कि एहि प्रतिबद्धताक पूर्ति हेतु उक्त अधिकार आ स्वतन्त्रताक सामान्य बोध परम महत्त्वपूर्ण अछि,
ते ँ आब,
साधारण सभा
निम्नलिखित सार्वभौम मानवाधिकार घोषणाके ँ सभ जनता आ‘ सभ राष्ट्रक हेतु उपलब्धिक सामान्य
मानदण्डक रूपमे, एहि उद्देश्यसँ उद्घोषित करैत अछि जे प्रत्येक व्यक्ति आ‘ प्रत्येक सामाजिक एकक
एहि घोषणाके ँ निरन्तर ध्यानमे रखैत शिक्षा आ‘ उपदेश द्वारा एहि अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक प्रति
सम्मान भावना जगाबए तथा उत्तरोत्तर एहन उपाय-राष्ट्रीय आ अन्तरराष्ट्रीय-करए जाहिसँ सदस्य
राष्ट्रसभक लोक बीच तथा अपन अधीनस्थ अधिक्षेत्रहुक लोक बीच एहि अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताके ँ
सार्वभौम आ‘ प्रभावकारी स्वीकृति प्राप्त भए सकैक। ष्
अनुच्छेद 1
सभ मानव जन्मतः स्वतन्त्र अछि तथा गरिमा आ‘ अधिकारमे समान अछि। सभके ँ अपन-अपन बुद्धि आ‘
विवेक छैक आओर सभके ँ एक दोसराक प्रति सौहार्दपूर्ण व्यवहार करबाक चाही।
अनुच्छेद 2
प्रत्येक व्यक्ति एहि घोषणामे निहित सभ अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक हकदार थिक आओर एहिमे नस्ल,
लिंग, भाषा, धर्म, राजनैतिक वा अन्य मत, राष्ट्रीय वा सामाजिक उद्भव, सम्पत्ति, जन्म अथवा अन्य
स्थितिक आधार पर कोनहु प्रकारक भेदभाव नहि कएल जाएत। आओर ओ व्यक्ति जाहि देशक थिक
तकर राजनैतिक अधिकारितामूलक वा अन्तरराष्ट्रीय आस्थितिक आधार पर कोनो भेदभाव नहि कएल
जाएत-भनहि ओ देश स्वाधीन हो, ट्रस्ट हो, परशासित हो वा सम्प्रभुताक कोनो अन्य परिसीमाक अधीन
हो।
अनुच्छेद 3
सभके ँ जीवन-धारण, स्वातन्त्र्य आ‘ व्यक्तिगत ़सुरक्षाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 4
केओ व्यक्ति दासता वा बेगारीमे नहि रहत आओर सभ प्रकारक दासप्रथा आ‘ दासक खरीद-बिकरी
वर्जित होएत।
अनुच्छेद 5
ककरहु क्रूर, अमानुषिक वा अपमानजनक दण्ड नहि देल जाएत आ‘ ककरोसँ एहन व्यवहार नहि कएल
जाएत।
अनुच्छेद 6
प्रत्येक व्यक्तिके ँ सभठाम कानूनक समक्ष एक मानव रूपमे अपन मान्यताक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 7
सभ केओ कानूनक समक्ष समान अछि आ‘ बिना कोनो भेदभावक कानूनक संरक्षणक हकदार अछि।
अनुच्छेद 8
सभके ँ एहन कार्यक विरुद्ध जे संविधान वा विधि द्वारा प्रदत्त ओकर मौलिक अधिकारक हनन करैत हो
सक्षम राष्ट्रीय न्यायालयसँ उचित उपचार (न्याय) पएबाक हक छैक।
अनुच्छेद 9
केओ स्वेच्छासँ ककरो गिरफ्तार, नजरबन्द वा देश निर्वासित नहि करत ।
अनुच्छेद 10
सभ व्यक्तिके ँ अपन अधिकार आ‘ दायित्वक अवधारणार्थ तथा अपना पर लगाओल गेल कोनो
आपराधिक आरोपक अवधारणार्थ कोनो स्वतन्त्र आ‘ निष्पक्ष न्यायालय द्वारा पूर्ण समानताक संग उचित
आ‘ सार्वजनिक विचारणक हक छैक।
अनुच्छेद 11
1. दण्डनीय अपराधक आरोपी प्रत्येक व्यक्ति ताधरि निर्दोष मानल जएबाक हकदार अछि जाधरि
कोनो सार्वजनिक विचारणमे, जाहिमे ओकरा अपन समुचित सफाइ देबाक सभ गारंटी प्राप्त
होइक, विधिवत् दोषी सिद्ध नहि कए देल जाए।
2. जँ केओ व्यक्ति एहन कोनो दण्डनीय कार्य वा लोप करए जे घटनाक कालमे प्रचलित कोनो
राष्ट्रीय वा अन्तरराष्ट्रीय कानूनक दृष्टिमे दण्डनीय अपराध नहि थिक तँ ओ व्यक्ति एहि हेतु
दण्डनीय अपराधक दोषी नहि मानल जाएत।
अनुच्छेद 12
केओ व्यक्ति कोनो आन व्यक्तिक एकान्तता, परिवार, निवास वा संलाप (पत्राचारादि) मे स्वेच्छया हस्तक्षेप
नहि करत आ‘ ने ओकर प्रतिष्ठा आ‘ ख्याति पर प्रहार करत। प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन हस्तक्षेप वा
प्रहारसँ कानूनी रक्षा पएबाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 13
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन राष्ट्रक सीमाक भीतर भ्रमण आ‘ निवास करबाक स्वतन्त्रता छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन देश वा आनो कोनो देश त्यागबाक आ‘ अपना देश घूरि अएबाक
अधिकार छैक।
अनुच्छेद 14
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ उत्पीड़नसँ बँचवाक हेतु दोसर देशमे शरण मङबाक अधिकार छैक।
2. एहि अधिकारक उपयोग ओहि स्थितिमे नहि कएल जाए सकत जखन ओ उत्पीड़न वस्तुतः
अराजनैतिक अपराधक कारणे ँ भेल हो अथवा राष्ट्रसंधक उद्देश्य आ‘ सिद्धान्तक विरुद्ध कोनो
काज करबाक कारणे ँ े।
अनुच्छेद 15
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ राष्ट्रीयताक अधिकार छैक।
2. कोनो व्यक्तिके ँ राष्ट्रीयताक अधिकारसँ अथवा राष्ट्रीयता -परिवर्तनक अधिकारसँ अकारण
वंचित नहि कएल जा सकत।
अनुच्छेद 16
1. सभ वयस्क स्त्री आ‘ पुरुषके ँ नस्ल, राष्ट्रीयता वा सम्प्रदायमूलक केानो प्रतिबन्धक बिना, विवाह
करबाक आ‘‘ परिवार बनएबाक अधिकार छैक। स्त्री आ पुरुष दूनूके ँ विवाह, दाम्पत्य-जीवन
तथा विवाह-विच्छेदक समान अधिकार छैक।
2. विवाह, तखनहि होएत जखन इच्छुक पति आ‘पत्नीक स्वच्छन्न आ पूर्ण‘ सहमति हो।
3. परिवार समाजक एक सहज आ‘ मौलिक एकक थिक आओर एकरा समाजक आ‘ राज्यक
संरक्षण पएबाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 17
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ एकसरे आ‘ दोसराक संग मिलि सम्पत्ति रखबाक अधिकार छैक।
2. केओ स्वेच्छया ककरहु सम्पत्तिसँ वंचित नहि करत।
अनुच्छेद 18
प्रत्येक व्यक्तिके ँ विचार, विवेक आ धर्म रखबाक अधिकार छैक। एहि अधिकारमे समाविष्ट अछि धर्म आ
विश्वासक परिर्वतनक स्वतन्त्रता, एकसर वा दोसराक संग मिलि प्रकटतः वा एकान्तमे शिक्षण, अभ्यास,
प्रार्थना आ अनुष्ठानक स्वतन्त्रता।
अनुच्छेद 19
प्रत्येक व्यक्तिके ँ अभिमत एवं अभिव्यक्तिक स्वतन्त्रताक अधिकार छैक, जाहिमे समाविष्ट अछि बिना
हस्तक्षेपक अभिमत धारण करब, जाहि कोनहु क्षेत्रसँ कोनहु माध्यमे ँ सूचना आ‘ विचारक याचना, आदान
प्रदान करब।
अनुच्छेद 20
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँशान्तिपूर्ण सम्मिलन आ संगठनक स्वतन्त्रताक अधिकार छैक।
2. कोनहु व्यक्तिके ँ संगठन विशेषसँ सम्बद्ध होएबाक लेल विवश नहि कएल जाए सकैछ।
अनुच्छेद 21
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन देशक शासनमे प्रत्यक्षतः भाग लेबाक अथवा स्वतन्त्र रूपे ँ निर्वाचित
अपन प्रतिनिधि द्वारा भाग लेबाक अधिकार छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपना देशक लोक-सेवामे समान अवसर पएबाक अधिकार छैक।
3. जनताक इच्छा शासकीय प्राधिकारक आधार होएत। ई इच्छा आवधिक आ‘ निर्बाध निर्वाचनमे
व्यक्त कएल जाएत आओर ई निर्वाचन सार्वभौम एवं समान मताधिकार द्वारा गुप्त मतदानसँ
होएत अथवा समतुल्य मुक्त मतदान प्रक्रियासँ।
अनुच्छेद 22
प्रत्येक व्यक्तिके ँ समाजक एक सदस्यक रूपमे सामाजिक सुरक्षाक अधिकार छैक आओर प्रत्येक
व्यक्तिके ँ अपन गरिमा आ‘ व्यक्तित्वक निर्बाध विकासक हेतु अनिवार्य आर्थिक, सामाजिक आ‘
सांस्कृतिक अधिकार-राष्ट्रीय प्रयास आओर अन्तरराष्ट्रीय सहयोगसँ तथा प्रत्येक राज्यक संघठन आ‘
संसाधनक अनुरूप-प्राप्त करबाक हक छैक।
अनुच्छेद 23
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ काज करबाक, निर्बाध इच्छाक अनुरूप नियोजन चुनबाक, कार्यक उचित आ‘
अनुकूल स्थिति प्राप्त करबाक आ‘ बेकारीसँ बँचबाक अधिकार छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ समान काजक लेल बिना भेदभावक समान पारिश्रमिक पएबाक अधिकार छैक।
3. काजमे लगाओल गेल प्रत्येक व्यक्तिके ँ उचित आ‘ अनुरूप पारिश्रमिक ततबा पएबाक अधिकार
छैक जतबासँ ओ अपन आ‘ अपन परिवारक मानवोचित भरण-पोषण कए सकए आओर प्रयोजन
पड़ला पर तकर अनुपूरण अन्य प्रकारक सामाजिक संरक्षणसँ भए सकैक।
4. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन हितक रक्षाक हेतु मजदूरसंघ बनएबाक आ‘ ओहिमे भाग लेबाक अधिकार
छैक।
अनुच्छेद 24
प्रत्येक व्यक्तिके ँ विश्राम आ‘ अवकाशक अधिकार छैक जकर अन्तर्गत अछि कार्य-कालक उचित सीमा
आ समय-समय पर वेतन सहित छुट्टी।
अनुच्छेद 25
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन जीवन-स्तर प्राप्त करबाक अधिकार छैक जे ओकर अपन आ‘ अपना
परिवारक स्वास्थ्य एवं कल्याण हेतु पर्याप्त हो। एहिमे समाविष्ट अछि भोजन, वस्त्र, आवास आ
चिकित्सा तथा आवश्यक सामाजिक सेवाक अधिकार आओर जँ अपरिहार्य कारणवश बेकारी,
बीमारी, अपंगता, वैधव्य, वृद्धावस्था अथवा अन्य प्रकारक दुरस्था उपस्थित हो तँ, ओहिसँ सुरक्षाक
अधिकार ।
2. परसौती आ‘ चिल्हकाके ँ विशेष परिचर्या आ सहायताक अधिकार छैक। प्रत्येक बच्चाके ँ, चाहे
ओ विवाहावधिमे जनमल हो वा ताहिसँ बाहर, समान सामाजिक संरक्षणक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 26
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ शिक्षा प्राप्तिक अधिकार छैक। शिक्षा कमसँ कम आरम्भिक आ‘ मौलिक
अवस्थामे निःशुल्क होएत। आरम्भिक शिक्षा अनिवार्य होएत। तकनीकी आ व्यावसायिक शिक्षा
सामान्यतया उपलभ्य होएत तथा उच्चतर शिक्षा सेहो सभके ँ योग्यताक आधार पर भेटतैक।
2. शिक्षाक लक्ष्य होएत मानव व्यक्तित्वक पूर्ण विकास आओर मानवाधिकार आ‘ मौलिक स्वतन्त्रताक
प्रति आदरभाव बढ़ाएब। शिक्षा राष्ट्रसभक बीच तथा जातीय वा धार्मिक समुदायसभक बीच
पारस्परिक सद्भावना, सहिष्णुता आ‘ मैत्री बढ़ाओत तथा शान्तिक हेतु राष्ट्रसंधक प्रयासके ँ गति
देत।
3. माता पिताके ँ ई चुनबाक तार्किक अधिकार छैक जे ओकर सन्तानके ँ कोन प्रकारक शिक्षा देल
जाए।
अनुच्छेद 27
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ समाजक सांस्कृतिक जीवनमे अबाध रूपे ँ भाग लेबाक, कलाक आनन्द लेबाक
तथा वैज्ञानिक विकासमे आ‘ तकर लाभमे अंश पएबाक अधिकार छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन सृजित कोनहु वैज्ञानिक, साहित्यिक अथवा कलात्मक कृतिसँ उत्पन्न,
भावनात्मक वा भौतिक हितक रक्षाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 28
प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन सामाजिक आ अन्तरराष्ट्रीय आस्पद प्राप्त करबाक अधिकार छैक जाहिसँ
एहि घोषणामे उल्लिखित अधिकार आ‘ स्वतन्त्रता प्राप्त कएल जाए सकए।
अनुच्छेद 29
1. प्रत्येक व्यक्ति ओहि समुदायक प्रति कत्र्तव्यबद्ध अछि जाहिमे रहिए कए ओ अपन व्यक्तित्वक
अबाध आ‘ पूर्ण विकास कए सकैत अछि।
2. प्रत्येक व्यक्ति अपन अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक उपयोग ओहि सीमाक अभ्यन्तरे करत जकर
अवधारण दोसराक अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक आदर आ‘ समुचित स्वीकृतिके ँ सुनिश्चित करबाक
उद्देश्यसँ तथा नैतिकता, विधिव्यवस्था आ जनतान्त्रिक समाजमे सामान्य जनकल्याणक अपेक्षाक
पूर्तिक उद्देश्यसँ कानून द्वारा कएल जाएत।
3. एहि स्वतन्त्रता आ‘ अधिकारक प्रयोग कोनहु दशामे राष्ट्रसंधक सिद्धान्त आ‘ उद्देश्यक प्रतिकूल
नहि कएल जाएत।
अनुच्छेद 30
एहि घोषणामे उल्लिखित कोनो बातक निर्वचन तेना नहि कएल जाए जाहिसँ ई घ्वनित हो जे कोनो
राज्यके ँ वा जनगणके ँ एहन गतिविधिमे संलग्न होएबाक वा कोनो एहन काज करबाक अधिकार
छैक जकर लक्ष्य एहि घोषणाक अन्तर्गत कोनो अधिकार वा स्वतन्त्रताके ँ बाधित करब हो।
Thursday, March 26, 2009
महाभारत- बिलट पासवान 'विहंगम'
आ महत्त्वाकांक्षा
जखन
विवेकक सीमामे नहीं अँटैछ,
महाभारत-
तखने मचैछ।
पुत्र-मोहमे पड़िक'
आनक हिस्सा हड़पैए
जखन आन्हर धृतराष्ट्र
द्रोपदीक अपमानसँ
लज्जित होइत अछि;
जखन सम्पूर्ण राष्ट्र;
सम्पत्ति
आ शक्तिक मदमे
जखन दुर्योधन
नँगटे नचैछ;
महाभारत-
तखने मचैछ।
समीक्षा श्रृंखला-1 विनीत उत्पलक मैथिली कविता संग्रह "हम पुछैत छी"- समीक्षक डॉ.गंगेश गुंजन
विश्व बजारी एहि समाज मे, भाषा-साहित्य सभक संसार मे सेहो बजारे जकां मंदी पसरल अछि। लगभग इएह परिस्थिति बेसी कला-विधाक बुझाइछ। साहित्यमे किछु आर विशेषे। ताहू मे कविताक विधा आओरो अनठिआएल अछि, किछु स्वयं कात करोट भेल आ किछु कएल जा रहल अछि। प्रकाशके टा द्वारा नहि, स्वयं संबंधित भाखा-भाखी अधिसंख्य लोक समाज द्वारा सेहो। जतए स्वयं कविक द्वारा, से अवश्य खेद करवाक विषय। कविता व्यक्ति कें अपन समाज मे एकटा आओर प्रतिष्ठा मात्र दिअयबाक मूल्य पर बेशी दिन जीवित नहि रहि सकैत अछि। अर्थात् कोनो सम्भ्रान्त व्यक्तिक भव्य ड्र्ाइंग रूम मे एक टा आओर इम्पोर्टेड दामी वस्तुक प्रदर्शनीय नमूनाक माल कविता नहि बनाओल जा सकैत अछि, जे कि दुर्भाग्य सं भ’ रहल अछि। भाषा वैह टा ओतबे जीवित अछि वा रह’वाली बुझा रहल अछि जे मात्र अपन भाषिक उपयोगिता बा कही अपन क्रय-विक्रय-मूल्यक बलें जीवित रहि सकय। ग्लोबल बजार मे भाषा अपन प्रवेश- जतेक दूर आओर गंहीर धरि करवाक क्षमता रखने अछि, ताही सामर्थ्यक उपयोगिते पर, ओतवे दुआरे जीवित राखल जा रहल अछि, कोनो अपन काव्य-सम्पत्ति, सांस्कृतिक अस्मिता आ भाषाक प्राचीनता बा महानताक जातीय स्वाभिमानक आधार पर नहि। तें दुर्भाग्यवश ई समय अपन-अपन भाषाक महानता ल’ क’ आत्म गौरव सं भरब तं फराक, जे मुग्ध पर्यन्त होयबाक समय नहि बांचि गेल अछि। हॅं, भाषाक ‘दाम’ ल’ क’ निश्चिन्त रहवाक बा कम बिकाएब ल’ क’ चिन्तित होयबाक समय अछि। मुदा कविता मे भाषाक आशय आ अस्तित्व कें एहन तात्क्षणिक बूझि लेब कोनो भाषा-साहित्यक मूल सं छूटि क’ आगां बढ़वाक बुद्धि कें अवसरवाद छोड़ि, दोसर किछु ने मानल जा सकैत अछि। समकालीन समस्त कवि कें, नवागन्तुक के तं अनिवार्यतः बजार आ कविता भाषाक बीचक एहि भेद कें नैतिक बुद्धियें बूझि’ए क’ एकर बाट चलवाक प्रयोजन । अन्यथा ई कविता सेहो एक टा नव पैकेटक नव उत्पाद बनि क’ दोकान मे रहत। पोथीक दोकान मे नहि। साज-शृंगारक कोनो मॉल मे, जत’ जनसाधारण लोकक पहुंचबो दुर्लभ! आब से बजार आ कविताक भाषाक एहि द्वन्द्व सं निकलैत भाषाक ई यात्रा कोन नीति-बुद्धि सं कएल जयवाक प्रयोजन ताहि विषय पर गंभीरता सं मंथन कर’ पड़त। स्वविवेक। ई त्वरित चाही। उत्पल जीक एहि कविता-पाण्डुलिपिक लाथें, ई चर्चा हमरा अभीष्ट भेल आ संभव, एकर श्रेय तें हम हिनके दैत छियनि। कारण बतौर काव्य-प्रवेशार्थी भाषा-व्यवहारक ई दायित्व हिनको वास्ते प्राथमिकताक डेग छनि। कविता भाषाहिक सवारी पर लोक धरिक अपन यात्रा करैत छैक। जेहन सवारी, जेहन सवार तेहन यात्रा। ताही मे गन्तव्य, काव्यबोध, युग आ जीवन-दर्शन समेत बहलमानी कही, कोचमानी कही, बा ड्र्ाइभरी-पॉयलटी तकर कर्म कुशलता, ई सभ तत्व अंतर्निहित छैक। बल्कि कएटा अन्यान्यहुं विषय जे कोनो कवि अपना साधनाक प्रक्रिया आ स्वविवेक सं निरन्तर अपने विकसित करैत जाइत अछि। मुदा तकरा यथावत “शब्द मे कहि सकब, प्रायः एखनो हमरा बुतें संभव नहि। कए दशक सं कविता लिखि रहल छी।
हिन्दी सन व्यापक भाषाक स्थापित नीक-नीक स्वनामधन्य कवि पर्यन्त अपन कविता-पोथी अपने छपा रहल छथि। बिकाइ छनि तं बेचि रहल छथि। कोनो ब्रांड प्रकाशक सं खामखा छपवहि चाहैत छथि तं ओकरा पुष्ट मात्रा मे धन दैत छथिन। सरकारी पुस्तकालय सभ मे थोक मात्रा मे ‘खपबा’ देबाक वचन दैत छथिन, तखन अपन गुडविल दैत छनि। वा अपने अर्थ सक्षम कवि-लेखक अपना पुस्तकक संपूर्ण प्रकाशन-व्यय स्वयं करैत छथि। तें पाठक आइ धनिके कवि टा कें, ब्रांड प्रकाशन सभ मे पढ़ि सकवाक सौभाग्य पबैत अछि । मैथिलीक स्थान निरूपण तं सहजहिं कएल जा सकैए। मैथिली मे तं ओहिना प्रायः सभ टा साहित्ये लेखक-कवि कें अपना अपनी क’ अपने छपबाव’ पड़ैत छैक। महाकवि यात्रीजी पर्यन्त विशय आबहु जीवित अति पुरना किछु लोक आ यात्रीजीक स्नेही-श्रद्धालु पाठक समेत हमरा खाढ़ीक हुनक स्नेह-समीपी किछु रचनाकार कें बिसरल नहि हेतनि। पोथीक प्रसार आ विक्रय सं मैथिल लेखकक केहन उद्यम जुड़ल रहलैक अछि! प्रकाशक कत’? अर्थात् कविता आ साहित्य कवि आ साहित्यकारहिक संसार मे जीवित अन्यथा मृत नहियों तं अनुपस्थित तं अनुभव कएले जा रहल अछि। ई युग यथार्थ एकदम देखार अछि।
एहना मे क्यो एक टा मैथिल युवक अपन समस्त ऊर्जा-उत्साहक संग दिल्ली मे कोनो संध्या बा प्रात अपन मैथिली कविताक पाण्डुलिपि दैत अपने कें ‘भूमिका’ लिखि देवाक आग्रह करथि तं केहन लागत ? मतलब जे प्रथम दृष्टया केहन अनुभव हएत? हमरा तं युवक दुस्साहसी आ किंचित गै़रजवाबदेह बुझयलाह। ओना जकरा साहस नहि हेतैक से कविताक बाट धइयो कोना सकैये !
अपन कुल अड़तालीस पृष्ठक अड़तीस कविताक पाण्डुलिपि दैत श्री उत्पल विनीत जखन से कहलनि तं किंचित असमंजस तं भेवे कएल। भूमिका-लेखन-काज सेहो एहि युग मे अपन धर्मान्तरण कए लेलक अछि। हमर प्राथमिकता सं तें बाहरे अछि। तथापि यदि कोनो मैथिली कविताक भविष्य एना सोझां उपस्थित हो तं स्वागत कोना नहि हो ! ताहू मे भागलपुरक नवतूर !
पाण्डुलिपि पढ़वाक क्रम मे हमरा कचकोही कविता ;मैथिली कवि विनोद जीक “शब्द मे कंचकूहद्धहोयवाक अनुभव भेलाक बादहु-कवि प्रतिभाक छिटकैत सूक्ष्म किरणक सेहो अनुभव, प्रिय आ आश्वस्तिकारक बुझाएल। स्वागत तें कहल अछि। उत्पलजीक प्रतियें उद्गार मे।
कविक प्रस्तावना हिनक कविताक संसार कें बुझबा मे विशेष सहायक अछि जे ई बड़ स्पष्ट बुद्धियें आ पूर्ण मनोयोग सं लिखलनिहें। हिनकर रचनाक बुनियादी वर्तमान आ सरोकारक उद्घोश जकां छनि। से मात्र वयसोचित उच्छ्वास नहि, बल्कि अपन वचनबद्धताक स्वरूप मे कहल गेल छनि।
सभ समयक नवीन पीढ़ी रचनाकारक सम्मुख अपन वर्तमाने प्रायः सब सं प्रखर चुनौती रहैत छैक। अतीत आ भविष्य तं अ’ढ़ मे रहैत छैक। रचनाकारक रूप मे अतीतक वास्ते ओकर नीक-बेजायक वास्ते ओकरा उत्तरदायी नहि बनाओल जा सकैए। यद्यपि ताही तर्क सं भविष्यक लेल ओकरा छोड़ि सेहो नहि देल जा सकैए। कारण समाजक भविष्य निर्माणक प्रक्रिया मे अन्य सभ सामाजिक कारण आ प्रेरक परिस्थिति सभ समेत, समकालीन रचनाकारहुक परोक्ष मुदा प्रमुख भूमिका रहबे करैत छैक। तें कविक दायित्व ल’ द’ क’ अपन समकालीनताक ज्ञान आओर अनुभव के विवेक सम्मत सम्वेदनाक रूप मे विकसित करैत अग्रसारितो कर’ पड़ैत छैक। जाहि सघनता आ व्यापकता सं कवि युगक “अतीत-ताप अर्थात् जीवनक दुःख-द्वन्द्व आ यथार्थ कें बूझि-पकड़ि पबैत अछि आ तकरा अपन रचना मे दूरगामी प्राणवत्ताक कलात्मक शिल्प द’ पबैत अछि, सैह ओकर प्रतिभाक सामर्थ्यक रूप मे दर्ज कएल जाइत छैक। कोनो रचनाकार अपना कृति मे बहुत युग धरि रहवाक सहज आकांक्षी होइतहिं अछि। तें हमरा जनैत मनुक्खक जिजीविशा आओर कविताक जिजीविशा मे तात्विक किछु भेद नहि। कवि जे अंततः मनुक्खे होइत अछि। तें दुनूक “आशक्ति अन्योनाश्रित होइछ।
विनीतजीक कविता मोटामोटी हमरा तीन अर्थछाया सं वेष्ठित अनुभव भेल। कविता मे अपन कथनक कोटि, तकर पकड़ आ प्रयोगक विधि। कएटा रचना तें कंचकोह जे कहल, से छैक एखन। कएटा भावानुभूति मे संवेदनशील मुदा कथन मे अपेक्षाकृत बेजगह। “कविताक विषय कथात्मक सांच मे कहि देल गेलैक अछि, जे स्वाभाविके, ओ कविता विशेष अपन जाहि अनुभव-निष्पत्तिक योग्य सक्षम रहैक आ उपयुक्तो, से नहि भ’ सकलैक अछि। से आगां सकुशल सफलता पाबि जाइक तकर सामर्थ्य कविता मे अवश्ये झलकैत छैक। से साफ-साफ। तें ओतहु निराशा नहि, आस्वस्ति छैक। कवि आ कविता दुनू अपना प्रकृतियें बनिते-बनिते बनैत छैक। तेसर जे अति ज्वलंत अतः कविताक प्राणानुभूति वला अनुभव कें पर्यन्त कवि किछु तेहन अंदाज मे कहि जाइत छथि जे ओकर वांछित प्रभाव पाठकक मन पर ओएह नहि पड़ैत छैक जे स्वयं कविक अभीष्ट छनि। अगुताइ मे कहल गेल सन आभास होइत छैक। कारण जे कविता मात्र कन्टेंटे नहि, कहवाक छटा आ व्यंजनाक कलात्मक स्तर पर काज करवाक कविक समुचित भाषिक क्षमता सेहो थिक।
बहुत सोचला उतर आधार भेटल जे, तकर यदि कोनो एकटा कारण देखल जाय, तं भाषाक अवरोध बुझाएल। कोनो भाषा स्वयं मे मात्र ओ भाषा टा नहि अपितु पूरा संस्कृति होइत छैक। भाषा मात्र ओकर बोध बा ज्ञाने नहि, ओकर संवेदना सेहो होइत अछि। अर्थात कोनो प्राचीन समृद्ध संस्कृतिक अभिव्यंजना लेल ओहि संस्कृतिक भाषाहुक प्रवाह मे प्रवेश चाही। से प्रवेश हमरा बुद्धियें भाषाक नाव टा सं संभव होइत छैक। नाव एकहि संग खेबैया सं ओकर स्वस्थ बल समेत कएटा अन्यान्य कुशलताक मांग करैत छैक। कवि सं कविता-विषय, तहिना। तें भाषाक साधना, कोनो कविक काव्य-यात्रा कें सुगम बनवैत छैक।सुचारु करैत छैक। दोसर जे, जेना जीवन आओर युग यथार्थ परिवर्तनशील होइत अछि , तहिना भाषाक भूमिका सेहो बदलैत छैक। अर्थात् भाषाक मिज़ाज।
उत्पल विनीतजी कें भाषाक रूप मे एखन मैथिलीक संग बहुत बेशी आयन-गेन करवाक प्रयोजन। तखनहि मैथिलीक सहज स्वाभाविक “शक्ति सं आत्मीयता आ परिचय विकसित भ’ सकतनि। भाषा कें अपन काव्य प्रयोगी अभियान मे विश्वसनीय संगी बनब’ पड़तनि। सभ कें बनब’ पड़ैत छैक। मातृ भाषा हएब, कविक सामर्थ्य तं होइछ मुदा काव्य सामर्थ्यो सेहो भ‘ जाइक, से आवश्यक नहि। तें कोनो कविक वास्ते काव्यभाषाक सिद्धि अभीष्ट।अनुभव तं जीवनक निरंतर अंतरंगता आओर सरोकार सं अपना स्वभावें चेतनाक अंग बनैत चलैत छैक। सैह रचनाकार कें श्रेय तथा प्रेयक विवेक भरैत रहैत छैक।
एहि टटका, उूर्जावान-संवेदनशील कविक पथ प्रशस्त हेतनि से विश्वास अछि। बहुत-बहुत स्नेह-“शुभाशंसाक संग, कालजयी कविताक आशा मे।
Tuesday, March 24, 2009
एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (तेसर कड़ी)

ओही समय में बेसी विवाह सभा सs ठीक भेलहा सब रहैत छलैक जाहि कारणे हरबरी वाला विवाह हमरा देखय कs ओतेक इच्छा नय होयत छल, मुदा दादी केs मोन रखबाक लेल हुनका संग कतो कतो चलि जायत छलौंह। ओहि समय हम परीक्षा फलक प्रतीक्षा में रही आर कोनो काजो तs हमरा नहि छलाह ।
एक दिन हम, माँ आ दादी आंगन में बैसल छलियै कि एकटा खबासनी आयल आ दादी के कहलकैन्ह " मलिकैन कनि एम्हर आयल जाओ "। ई सुनतहि दादी ओकरा लग चलि गेलिह, पता नय ओ हुनका कि कहलकैन्ह। कनि कालक बाद दादी हमरा कहलैथ "चलs हम तोरा एकटा सोलकनि सबहक विवाह देखाबैत छियौक"। हमरा आश्चर्य
भेल जे आई दादी केs की भेलछैन्ह जे ओ हमरा सोलकनि कs विवाह देखय लेल कहैत छथि। हम आश्चर्य सs पुछलियैन्ह "अहाँ सोलकनि कs विवाह देखय लेल जायब "? दादी मुसकैत हमरा कहलैथ "चलहि नय अहि ठाम, ब्रम्ह स्थान लग बरियाती छैक, दूरे सs खाली बरियाती देखि चलि आयब दूनू गोटे"।
हमारा मोन तs नहि होइत छलय बरियाती देखबाकs, मुदा हम दादी कs संग जएबाक जयबाक लेल तैयार भs गेलियैन्ह। ब्रम्ह स्थान लगे छलय, हम दुनु गोटे जखन ओतहि पहुँचलौं तs देखलियय जे ओतहि बीच में पालकी राखल आ ढोल पिपही बाजैत छलैह, जों आगु बढ़लौं तs देखैत छी जे ओहि पालकी में वर मुंह पर रूमाल देने बैसल छैथ आ एकटा बच्चा हुनका आगू में बैसल छलैन्ह, बरियाती सब सेहो बैसल छलैक। खैर हम सब आगू बढिकs बरियाती लग पहुँच गेलिये। हमरा निक भलहि नय लागैत छल मुदा पहिल बेर अहि तरहक बरियाती देखैत रही। हम आश्चर्य सs बरियाती देखैत रही कि कनिये कालक बाद सब बरियाती ठाढ़ भs गेलैथ आ पिपही ढोल जोर स बाजय लगलय। हम सब कनि पाछू भs गेलौं, जहिना पालकी उठलय कि हमरा माथ पर कियो पानी ढ़ारि देने छलs। हम त हक्का बक्का भs कs एम्हर ओम्हर ताकय लगलौं, त देखैत छी दादी कs हाथ में गिलास छलैन्ह। हम कानय लगलियय। ई देखि कs दादी हमरा तुंरत हँसैत कहलैथ गर्मी छलैक ताहि द्वारे ठंढा क देलियौक। हमरा
बड़ तामस भेल।
हम सब जखैन घर पहुँचलौं, हम कानैत माँ सs कहलियय हम कहियो दादी संग विवाह देखैक लेल नय जायब। हमर एकटा पीसी ओहि ठाम बैसल रहैथ, कहि उठलीह, " नय कानि तोहरे निक लेल केलथुन"। हमरा किछु नय बुझय में आयल आ बकलेल जकां हुनकर मुंह देखैत पुछलियैन्ह "कि निक भेल, सभटा कपड़ा भीजि गेल"? ई सुनि कs ओ कहलैथ "गय बरियाती कs जेबा काल पानि माथ पर देला सs लोकक विवाह जल्दि होयत छैक ताहि लेल तोरा पानि देलथुन "। हम आर जलि भुनि कs ओतहि सs चलि गेलौंह। ओकर कनिये दिनक बाद हमर विवाह भs गेल।
जहिया हमर विवाह भेल ओहि समय हमर घरवाला श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर इंजीनियरिंग के अन्तिम बरख में पढैत छलाह। हम मैट्रिक के परीक्षा देने रहि आ परीक्षा फल सेहो निकलि गेल छलs। हमर विवाह आषाढ़ मास में, (दिनांक १३ जुलाई) भेल छलs। विवाहक तुंरत बाद मधुश्रावणी छलैक ताहि द्वारे हम गाम पर रही गेलौं आ हमर काका मधु(हमर पितिऔत बहिन) के संग रांची चलि गेलाह । काका हमरा कहैत गेलाह जे ओ हमर परीक्षा फल आदि स्कूल सs लs कॉलेज में हमर नाम लिखवा देताह। तैं हम निश्चिन्त रही। हमर काका नाम लिखवेलाक बाद हमरा खबरि सेहो कs देलाह। हमर नाम "निर्मला कॉलेज रांची" में लिखायल छल।
दादी के आग्रह पर हमरा गाम पर रहि मधुश्रावनी करवा के छलs, बहिनक विवाह सs अपन विवाह आ मधुश्रावनी धरि करिब दू मास सs बेसी रहय परल छलs। हम पहिल बेर अपना होश में एतेक दिन गाम पर एक संग रहल रहि। ओना तs हम सब, सब साल गाम जायत रही, मुदा एक संग एतेक दिन नय रहैत रहि। ओ पहिल आ अन्तिम बेर छलs जे हम गामक मजा निक जकां लs सकलियैक।
-कुसुम ठाकुर-
क्रमशः ........
Monday, March 23, 2009
RECESSION यानि मंदी
मंदी जे नए कराबे...सुनए में बर आसान शब्द लागे ये मुदा बर खतरनाक शब्द छी इ RECESSION.
अमेरिकी आर्थिक मंदी (US recession) के असर भारत पर भी भ गेल आ धीरे-धीरे जटिल भा रहल ये । अखबार, न्युज चैनल (हिन्दी, अंग्रेजी) सब में अए सा जुरल न्युज के भरमार ये। अही कारण कतेक रास कंपनी सब बंद भ रहल ये, सब सा बेस छेाट कंपनी के मंदी झटका लागल ये। कतेक युवा छन में रेाजगार साँ बेरेाजगार भ गेल आ भ रहल ये, कतेक चुल्हा बंद हेाए के कगार पर ये, कतेक लाखपति धरातल पर आबि गेल ये । देश के अरबपति के कमाई पर मंदी जबरदस्त सेंध लगालक ये आ लगभग सब के संपत्ति में करीब 61 परसेंट तक के गिरावट आएल ये। रेाज कुनु नए कुनु कंपनी पींक स्लीप या रिलेाकेशन थमा रहल ये । सच पुछु ता हमरेा डर लागे ये, आए के समय में किछ भी भा सके ये अखन तक ता बिरला ग्रुप आ किछ ढंग के कंपनी एहि तरह के एकसन ने ल रहल ये लेकिन भबिस्य के नए पता। एही मामले में सरकारी नेाकरी बाला बृन्द सब ठीक अैछ ।
हमर दू टा कविता 1.नाव आ जीवन 2.मौनक शब्द -सतीश चन्द्र झा
नाव नदी मे चलल सोचि क’
दूर नदी के अंत जतय छै।
देखब आई ठहरि क’ किछु छण
नदी समुद्रक मिलन कतय छै।
छै संघर्ष क्षणिक चलतै जौ
जल धारा विपरीत दिशा मे।
चलब धैर्य सँ भेटत निश्चय
छै आनंद मधुर आशा मे।
कखनो अपने पवन थाकि क’
मंद भेल चुपचाप पलटतै।
फेक देब पतबार अपन ई
जल धारा के दिशा बदलतै।
छोट नाव के एतेक घृष्टता
सुनि क’ भेल नदी के विश्मय।
नाचि रहल अछि जल मे तृणवत
बुझा रहल छै जीवन अभिनय।
की बुझतै ई नाव नदी मे
जीवन पथ धारा अवरोधक।
केना चीर क’ निकलि जाइत अछि
नहि छै भय ओकरा हिलकोरक।
तेज धार छै प्राण नाव के
जीवन छै सागर अथाह जल।
नदी किनारक छाँह मृत्यु छै
जल विहीन जीवन के प्रतिपल।
नहि होइ छै किछु भय जीवन मे
मृत्यु देखि सोझा मे प्रतिक्षण।
अपने चलि क’ नाव मनुख के
सिखा रहल छै जीवन दर्शन।
क्रुद्ध नदी के जल प्रवाह मे
उतरि गेल जे ‘तकरे जीवन’।
भय संघर्ष,निराश,कष्ट सँ
ठहरि गेल ओ ‘जड़वत जीवन’।
2. मौनक शब्द
हेरा गेल अछि शब्द अपन किछु
तैं बैसल छी मौन ओढ़ि क’।
वाणी जड़वत, जिह्वा व्याकुल
के आनत ग’ ह्नदय कोरि क’।
के बूझत ई बात होइत छै
मौन शब्द,वाणी सँ घातक।
राति अमावश के बितला सँ
जेना इजोत विलक्षण प्रातक।
अछि सशक्त जीवन मे एखनो
ई अभिव्यक्तिक सुन्दर साध्न।
एकर चोट छै प्रखर-उचय अग्नि सन
शीतलता चंदन के चानन।
नहि छै आदि -उचयअंत मे समटल
अंतर मे विश्राम वास छै।
आनंदक अतिरेक ह्नदय मे
नव अनुभूतिक महाकाश छै।
अछि अव्यक्त मौन अक्षर सँ
ज्ञान दीप के प्रभा प्रकाशित
दृष्टिबोध् सँ दूर मौन अछि
शब्द अर्थ सँ अपरिभाषित।
वाणी अछि ठहराव झील के
मौन नदी के निश्छल धार।
उठा देत हिलकोर हृदय मे
जखने बान्हब धार किनार।
छै संगीत मधुर स्वर झंकृत
नै छै अर्थ मौन के जड़ता।
कोलाहल सँ दूर मौन के
वाणी सँ छै तिव्र मुखरता।
कतेक विवस अछि शब्द जगत के
वर्तमान के व्यथा देखि क’।
असमर्थ अछि सत् चित्राण मे
की लिखू हम शब्द जोड़ि क’।
Sunday, March 22, 2009
जागू आब -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'
चारू दिस अन्हार अछि ।
मूर्ख अछि गद्दी पर बैसल ,
पढ़ल-लिखल बेकार अछि ।
जतय देखू मारि - फसाद ,
होइत लूट - पाटक काज अछि ।
विकास त' सपनेहुँ नहि देखू ,
शैतानक भेल राज अछि ।
हिंसा आ बेईमानी केर ,
भेल सउँसे आधिपत्य अछि ।
आजुक गाँधी-नेहरू सभ,
बजैत खाली असत्य अछि ।
एम्हर, ओम्हर, जेम्हर देखू ,
दानव करैत किलोल अछि।
उजरा खादी कुरता पाछा,
दबल बहुत रस पोल अछि ।
बन्न पडल अछि बुद्धिक ताला,
मूर्खक शासन ई लोकतंत्र अछि।
फुइस फसाद अछि फुला रहल ,
ई लोकतंत्रक मूल मंत्र अछि ।
नवक्रान्तिक छथि मांग करैत भू ,
सबहक मति आइ मारल अछि ।
सत्य अहिंसा आइ काल्हि,
एहि समाज सं बारल अछि ।
Saturday, March 21, 2009
डॉ विजयकांत मिश्र

डो. विजयकांत मिश्रक जन्म मंगरौनी गाम - जे नव्य न्याय आ तांत्रिक साधनाक जन्म-स्थली अछि- (जिला मधुबनी) मे
भेलन्हि।
ओ 1948 मे प्राचीन भारतीय इतिहास आ संस्कृति विषयमे एलाहाबाद विश्वविद्यालयसँ सनात्तकोत्तर उपाधि कएलाक बाद कतेक बरख धरि बिहार सरकार आ पटना विश्वद्यालयसँ सम्बद्ध रहलाह आ 1957 ई. सँ भारतीय पुरात्तत्व विभागमे काज कएलन्हि आ ओकर शिशुपालगढ़, कौशाम्बी, वैशाली, हस्तिनापुर, कुम्हरार, पाटलिपुत्र, करियन, सोनपुर, बिलावली, नालन्दा, राजगीर, चन्द्रवल्ली, आ हम्पी खुदाइमे विभिना भूमिकामे भाग लेलन्हि।
हिनकर लिखल-सम्पादित पोथी सभमे अछि:
1.वैशाली,1950
2.कुम्हरार एक्सकेवेशंस: 1950-1957
3.पुरातत्व की दृष्टिमे वैशाली
4.नागेश भट्टाज पारिभाषेन्दुशेखर
5.मिथिला आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर (सम्पादित)
6.कल्चरल हेरिटेज ऑफ मिथिला
7.श्रृंगार भजनावली- एक अध्ययन
8.क्षेत्र पुरातत्वविज्ञान -
9.पुरातत्व शब्दावली
जुल्मी- मंत्रेश्वर झा
अपना पर बजरत तखन बुझवै जे की।
काल्हियो छलहुँ हमारा आ काल्हियो रहब,
बीतत वर्तमान तखन बुझबै जे की।
फूसि फासि ठूसि ठासि भरलहुँ जिनगी,
अंतकाल पछताके बुझबै जे की।
बजौलहुँ इनाम ले बदनामी खातिर,
नाम जुटत अपनो त' बुझबै जे की।
नुका नुका पर्दा मे बाँचब कते दिन,
खोलब जौं भेद तखन बुझबै जे की।
जागि गेल छी- महेन्द्र नारायण राम
मोटगर-मोटगर
सादा कागत पर
रे अन्यायी,
हमारा अऊँठा निशान लगा गेल छी,
तकरे प्रभावे
आइ धरि
देख! कतेक हमारा सुखा गेल छी।
रक्त, हाड़-माँसु समर्पित क' तोरा
शोषण उत्पीड़नक बीच
भावनाक चिक्कस बनि पीसा गेल छी।
जरि गेल अछि आब मुदा
अन्हार घरक दीया
पढ़ब, लिखब, गुनब
मोन मे
गड़ि गेल अछि
आब हमारा खुश भ' रहल छी
आखर-आखर पढ़ि रहल छी
कुशल भ' रहल छी
साक्षर भ' रहल छी
हमारा जागि गेल छी।
आब क्यो अऊँठा निशान नहीं लगबाओत
रक्त-हाड़-माँसु केँ नहीं चिबाओत
सुन्दर हृष्ट-पुष्ट शरीर केँ नहीं तड़पाओत॥
बाल कविता-२ गाछ मे -जीवकांत
पात मे बसात
पात मे फूल
गाछ झूल-झूल
पात मे छाह
गाछ वाह! वाह!
गाछ मे आम
गमकैए गाम
गाछ मे मेघ
भीजैए खेत
पातमे उछाह
गाछ वाह! वाह!
बुढ़ी माता- कथा- अमित कुमार "गोपाल",
बुढी माता - Source of inspiration
ई बात जनवरी १९९५ के छी, मेडिकल केाचिगं क्लास ५.३० बजे भेार साँ हेायत रहै, हम घर साँ अन्हारे ४.३० - ४.४५ में निकलैत रही, पटना में जनवरी मास में बहुत ठंढा परैत छै। वेा समय में आई काल साँ बेसी ठंढा परैत रहे। ठंढा उपर साँ सुनसान रास्ता बहुत डर लागैत रहै, लेकिन इक नया जोश में सब किछ बिसेर जाईत रही, ११ जनवरी के कोचिंग में मेाडयुल टेस्ट रहै ई कारण हम ४.०० बजे भेारे घर साँ निकल परलु जे ठंढा के कारन लेट ने हुए। हम जहिना पुनाईचक-हरताली मेार के बीच रेलवे लाईन लग पहुँच लु, अचानक इक टा घेाघ तानने , करिया कंबल अेाढने एक टा मनुख सामने आबि गेल, डर साँ हम साईकिल सा गिर परलु, वो बहुत बुढ आ कमर लग साँ झुकल लागल। हम ऊठ के ठाढ भेलु...गरदा सब झार कऽ जहिना चले लाऽ भेलु तहिना आबाज देलक सुन...अ....बैाआडर साऽ हालत खराब भ गेल....चारेा तरफ सा सन..सन जकाऽ अवाज महसुस हुए लागल, डरल-डरल आेकरल लग गेलु...पुछलक कताऽ जाए रहल छै...हमरा सा पुछलक (ता तक अपन घेाघ नए हटाने रहे)..डर साँ आवाज जल्दी नेऽ निकलल..लेकिन हिम्मत कऽ के जबाब देलु...केाचिगं जा रहम छी।फेर पुछलक कथी के पढाई करे छैहम कहलु... डाक्टरी के तैयारी करे छी.. अच्छा बेस.देासर पढाई में मेान नेऽ लागे छेा...कनि देर रूक तखन जाभियेता तक टाईम लगभग ४.४५ भऽ गेल रहे, एक..दु टा आदमी सब सडक पर सेहेा नजर आबे लागल, लेट हेाएत रही ए कारन हि्म्मत कऽ के कहलेा.. हमरा लेट भ रहल ये..हमर आइ परीक्षा छी ।कुनु बात नेऽ । जबाब भेटलबर असमंजस में पैर गेलु..की करी नइ करी, एक मेान हेाए रहे राह चलैत लेाग के अवाज दी लेकिन रेाड फेर सुनसान भऽ गेल lतखन वेा अपन घेाघ हटालक हुनकर चेहरा के देखते लगभग बेहोश भऽ गेलु...बुढ झुरीदार चेहरा आ उपर साँ मर्द जका मुछ दाढी..हे भगवान आई तक एहन नेऽ देखने रहु ।हमर हाउ भाउ के देख बाजल - हमरा देख क डर लागे छेा.. नए डर हम देासर कियेा नए छियेा ।पता नए किए वेा किछ अपन जकाँ लागल, ता तक लगभग ५ साँ उपर टाईम भ गेल रहे, रेाड पर दुध बाला, पेपर बाला सब नजर आबे लागल, किछ देर के बाद आवाज भेटल आब तु जेा...घुरेत काल आभये।हम हवा के भाति तीर सा भे बेसी तेज साँ निकलु..बहुत लेट भा गेल रहु साईकिल के अपन क्षमता सा भी तेज स्पीड सा चलाएब सुरु का देलु, जहिना गाँधी मैदान-सब्जी बाग के मुह पर पहुचलु ..देखलु जे जबरदस्त एक्सीडेंट भेल रहे, पुरा रास्ता पुलिस बंद क देने रहे, एक्सीडेंट लगभग १५-२० मिनट पहले भेल रहे जही में ४ टा आउर १ टा चाई बाला दुकानदार मारल गेल रहे.. उ ४ टा हमरे केाचिगं के छात्र रहे, जे चाए पीबा के खातिर रुकल रहे लेकिन ?हमहु अेाहि चाई वाला के दुकान पर रेाज रुकेत रही ( अगर बुधी माता नए भेटतिए ता हमहु उ टाईम चाए के दुकान पर रहतु...फेर पता नए )चाए पीबे के आदत नए रहे लेकिन ठंढा के चलते पीब लेत रही ।कहुना केाचिगं पहुच लु...उ ठाम घटना के सुचना पहुच गेल रहे.. केाचिगं २ दिन के वास्ते बंद भा गेल, छात्र के घर वाला के सुचना द देल गेले, हमहु बुझल मेान साँ घर वापस हुए लागलु घर घुरेत काल वेा बुढिया फेर वही ठाम भेटल वेाहिना घेाघ तानने, लग जा के सब घटना सुनाले के बाद भी हमर जबाब नए देलक...किछ देर के बाद कहलक - बेाआ हमरा भुख लागल ये,कि खेबे - हम पुछलुचुरा आ सकर जबाब भेटल।संयेाग एहन रहे ताबि तक ई सब तरह के समान खरीदे के वास्ते दुकान पर नेए गेल रहु (कारन जे घर मे काज करे लेल ढेर आदमी रहे, आउर हम सब साँ छेाट रही)फिर भी दुकान जा कऽ चुरा सकर किनि काऽ आनलु,किछ देर के बाद हम पुछलु - कतेऽ जेभी हम पहुंचा देबेाकतेा नेऽ - जबाब भेटलरह भी कतऽ - हम पुछलुए जगह - सीधा जबाब भेटलखाना कतऽ खेवी, पुछला पर जबाब भेटल - तु खुआ, बेसी बक-बक ने कर खाए ले दे फेर पुछए जे पुछे के छेा (बिल्कुल रुखल जबाब भेटल)संग ही स्नेह साँ कहलक - तुहेा खेा ।हम ता अजीब मु्स्किल मे पर गेलु, अेाकराअकेले छेाएर के जाए के मेान सेहेा नए करेत रहे..बहुत सोचला के बाद डिसिजन ले लु जे एकरा अपन संग लऽ जाइल जाए ।रिक्सा पर बुढिया माता आ साईकिल साँ हम घर पहुच लु, अेाकरा गेट के बाहर ठाढ कऽ हम घर गेलु, सब कहानी अपन माता जी के बतालु, बुढी माता बाहर ठाढ छे सेहेा कहलु, माता जी के आज्ञा भेल नीचा में एकटा रुम खाली छै अेाए में हुनका जगह देल जाए सब ब्यबस्था (बिछेाना, कंबल ,साफ सारी) कऽ क घर में बेसालु, शाम में बाबु जी आफिस सा एला ता हुनकेा सब कहानी बतालु, बाबु जी पुछला - कहिया तक इ रहतेा, नए पता हम कहलेा, फेर माता जी सब संभाल लेली आ बाबु जी के समझा देलखिन । बुढी माता के सेवा करब हमर रेाज के ड्युटी भ गेल, केाचिग जाए सा पहिने आ आबे के बाद १ सा १.३० घंटा हमर टाईम बुढी माता लग बीते लागल । खाना के अलग-अलग फरमाइश हेाएत सब किछ पुरा करेत १ ह्फता बीतल, एक दिन अपना लग बेसा हमरा बारे में पुछे लागल (जेना अपन दादी, बाबा,अग्ज) अतिंम में कहल गेल देासर पढाई (मेडकल छेार क) कर बहुत नाम हेतेा, बहुत पैसा कमाबे, माइ-बाबु जी के नाम सेहेा हेतेा । १० वाँ दिन रात में बिना कीछ बताने पता नए कतऽ चैल गेली..आइ तक नेऽ भेटली..हम इंतजार करे छी बुढी माता इक दिन जरुर भेटती । बुढी माता के बात बिल्कुल सही निकलल जखन १४-१५ घंटा पढाई केला के बाबजुद सी०बी०एस०सी० मेडिकल मे वेटिगं आबी गेलु, बी०सी०इ०इ० में डेयरी टेडॄ भेटल, एम०डी०ए०टी० में १०० परसेंट चांस रहे(९० परसेंट सही रहे, सलेक्सन ६०-७० परसेंट पर हेाएत रहे) मगर सेंटर केंसिल ब गेल, एही सब कारन साँ हम फरस्टरेसन में रेहा लागलु, पढाई-लिखाइ बंद कऽ देलु जे एतक मेहनत करे के बाद जखन नए सफल भेलु ता आब कहियेा नेऽ हेाएब। हमरा बुढी माता के बात याद आबि गेल..संग ही बाबु जी सेहेा कहला - अपन टेॄक चेंज करु, लगभग वही समय यु०जी०सी० सा ३ टा नया केासॅ पटना युनिवसिटी एवं मगध युनिवसिटी के भेटल ((१) Bio Tecnology (२) Water & Enviromental Management & (३) BCA)। प्रतियेागिता परीक्षा के आधार पर एडमिसन के प्रेासेस सुरु भा गेल, बी०सी०ए) हमर किछ ढंग के क्रेास बुझाएल हमहु प्रतियेागिता परीक्षा में बेसलु आ पास कऽ गेलु, यु०जी०सी० बी०सी०ए० के पहलुक बैच के पहलुक छात्र हम रही जे फाइनल परीक्षा में ८९ परसेंट सा पास करलु, बाबु जी कहला आब यु०पी०एस०सी या ढंग के सरकारी नैाकरी के तैयारी कारु लेकिन हमर सेाच किछ आउर रहे / अखन तक ये । “अगर अपन मेरिट / एविलिटी के युज करना ये ता सरकारी नैाकरी नए करना चाही" फेर पटना बेलटान साँ साफ्टवेयर मे पेास्ट ग्रेगुएट डिप्लोमा करलु, फेर एम०सी०ए० करलु, मैान भेल जे एम०बी०ए० करल जाए (बहुत कठिन रहे आइ० टी० सा एम०बीए०ए० करब) बुढी माता के क्रपा सा एम०बीए०ए० भी कऽ ले लु अपन खचा चलबे लेल पाट टाइम नैाकरी सेहेा करलु, केम्पस सलेक्सन में रिलांयस इनफेाकाँम के आफर भेटल ज्वाइन करलु, फेर एच० डी० एफ० सी० बैंक साँ आफर भेटल ता बैंक ज्वाइन करलु.. दिल में इच्छा रहे टाटा , बिरला में नैाकरी करी बुढी माता कर क्रपा साँ इच्छा पुरा भेल आ बिरला ग्रुप सा निक पेाजिसन के आफर आइब गेल ज्वाइन सेहेा करलु आ अखन तक एही जगह छी ।..आब इच्छा यऽ दि्ल्ली, मुंबई के बहुत सेवा करलु आब अपन बिहार - मिथिला के सेवा करल जाए..बुढी माता के दया साँ सेहेा भा जेते.....लेकिन सबसाँ पैघ इच्छा बुढी माता के दशन के पता नए .................।
Friday, March 20, 2009
कुंडलिया- आशीष अनचिन्हार
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कुंडलिया
डेग-डेग पर छाल्ही भेटै डेग-डेग पर गूँह
लूझए बला लुझबे करतै जकर जेहन मूँह
जकर जेहन मूँह धोधि पोन बेसी अछि चतरल
प्राण मुदा अछि टूटल फूटल काटल कतरल
कह अनचिन्हार कविराय एहने छैक संसारक रीति
सगरो दुनिया बजि रहल स्वार्थक गीति
Thursday, March 19, 2009
कृतघ्न मनुख बेमार आलोचना.
नाम गिनेबा लेल जं भिडि जाइ त' असमाप्य श्रृंखला शुरू भ' जायत.
मुदा कृतघ्नता में हमर सबहक जोर नहि. भाषा संस्कृतिक नाम पर भरि जीवनक होम क' देनिहार कें हम सब बेर-बेर मोन तक पारब उचित नहि बुझैत छी. जीबैत काल धरि किछु गोष्ठीक अध्यक्षता आ छोट छिन सम्मानक अलावे हुनका सबहक हिस्सा किछु नहि अबैत छैन्हि. अहि दुर्भाग्य पूर्ण प्रसंग सं अपना सबहक सौन्दर्यबोध आ संस्कृतिबोधक इयत्ता संदेहक वस्तु
बनि गेल अछि. अतीतक तीत अनुभव नवतुरिया सबकें सहज नहि होमय द' रहल छैक. अहि सन्दर्भ में युवा रचनाकार अखिल आनंदक ई गप उल्लेख करबा योग्य अछि – “ मैथिली सं पाइक आस तं नहिये रहैत छैक कम सं कम सही मूल्यांकन त' होए’’. गुणगान आ निंदाक बीच फंसि दम तोइर रहल मैथिली आलोचनाक सधल इलाज़ बहुत जरूरी छैक
Wednesday, March 18, 2009
हमर गाम-प्रवीण झा
दक्षिण, पश्चिम सुदै, तरडीहा
पूब में बहै छथि मातु कौशिकी
मध्य हमर गाम घोघरडीहा
पूर्वकाल मे गोमाताक डीह तेँ
नाम एकर छल “गोघरडीहा”
कालक्रमे अपभ्रंश शब्द मे
नाम बदलि भेल “घोघरडीहा”
मधुबनी जिलाक ई थिक गौरव
पुष्पवाटिका मे जेना चम्पाक सौरभ
अतिरूद्र, लक्षचण्डी यज्ञक महाप्रयाण
हमर गाम कहायल “यज्ञग्राम”
सन् 89 क महायज्ञकेँ अभिनन्दन
स्तुति केलक बी.बी.सी. लंदन
चौबिस मन्दिर, तेइसटा पोखरि
बाग-बगीचा भेटत सभतरि
दलाने-दलान सत्संग आ प्रवचन
दुर्गापूजा मे नाटक आ प्रहसन
“काली”, “दुर्गा”, “भोला बाबू”
फेर सँ ओहने यज्ञ कराबू
रेलवे स्टेशन, हाट-बाजार
हमरा गामक जमल व्यापार
सत्यनारायण सर्राफ, फूस सुल्तानियॉं
मारवाडी बंधु आ देशवाली दोकानियॉं
अधिसूचित क्षेत्र, प्रखंड मुख्यालय
आई.टी.आई, स्कूल, महाविद्यालय
राजनीति आ ज्ञान-विज्ञान
रहन-सहन आ खान-पान
शिक्षा-दीक्षा, कला-संस्कृति
हमर गाम वास्तविक अनुकृति
सब सँ सुन्दर अछि महान्
हमर गाम आ मिथिलाधाम ।
दिल्लीमे बिहारक संस्कृतिक झलक
ई कार्यक्रम दिल्लीक सामाजिक संस्था राग विराग एजुकेशनल एंड कल्चरल सोसाइटी
उत्सवक आखिरमे युवा कलाकार अंशुमाला बिहारमे पावनि... त्योहार...खुशीक मौका पर गाबय जाए वाला गीत पेश कएलन्हि। एहिमे कजरी... जट-जटिन... शादी-विवाह आओर होली पर गाबय जाय वाला गीत छल. लोक नाटक वाला हिस्सामे जयशंकरजी खुशबू आओर वंदनाक संग 'जट-जटिन' प्रस्तुत कएलन्हि.
Tuesday, March 17, 2009
एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (दोसर कड़ी)

द्वितीय पोस्ट
जाहि दिन हम पन्द्रह बरखक भेलौं ओकर दोसरे दिन हमर विवाह भs गेल। ओहि समय हम विवाहक अर्थ की होइत छैक सेहो नय बुझैत छलियैक। हमत मैट्रिक केर परीक्षा दs अपन पितिऔत बहिन केर विवाह देखय लेल गाम गेल रही। हमारा की बुझल छल जे हमरो विवाह भs जायत। ओहि समय हमर बाबूजी अरुणाचल (ओहि समय केर नेफा ) में पदासीन छलाह, हम रांची में अपन छोटका काका लग रहि कs पढ़ैत रहि ।
हमर पितिऔत बहिन केर विवाह भेलाक तुरंत बाद हमर बाबूजी आ छोटका काका कत्तो बाहरि चलि गेलाह, कतय गेलाह से हम नय बुझलियैय। हम सब भाई बहिन आ हमर छोटका काका के बड़की बेटी, अर्थात हमर पितिऔत बहिन सेहो हमरा सब संग गाम पर रहि गेलि, कारण हमरा सबहक स्कूल में गर्मी छुट्टी छलैक , हम सब खूब आम खाइ आ खेलाइ। मुदा हम देखि जे हमर दादी हमरा किछु बेसी मानैथ। अचानक एक दिन भोर में जखैन हम उठलौं त देखैत छी जे सब कियो व्यस्त छैथ। हमर दादी सब काज करनिहार सब के डाँटि रहल छलीह, कहैत छलीह " आब समय नय छैक, जल्दी जल्दी काज करय जो"। हमरा किछु नय फ़ुराइत छल जे ई की भs रहल अछि। हमरा देखिते हमर दादी कहलैथ "हे देखियौ, अखैन तक ई त फराके पहिर कs घूमि रहल छैथ"। हमरा किछु बूझय में नय आबि रहल छल जे ओ की बजैत छलीह तखैन हमरा ध्यान आयल जे शायद हमर जन्मदिन काल्हि छैक ताहि दुआरे दादी कहैत हेतीह हमरा चिढाबय के लेल।ओ सब दिन कहैत छलीह जे अय बेर जन्मदिन में अहाँ के साड़ी पहिरय पड़त, आ हम चिढ जायत छलिअय। ई सब सोचिते छलौं ताबैत देखलियय जे छोटका काका आंगन दिस आबि रहल छलाह। हुनका संग हमर बाबा सेहो छलाह । ओ दुनु गोटे दलान पर स आबि रहल छलाह , से बाबा के देखला स बुझय में आबि गेल । हुनका सबके देखिते हमर माँ आ दादी दुनु गोटे आगू बढ़ि क हुनकर स्वागत केलैथ, आ माँ के कहैत सुनलियैन्ह "आब कहू जल्दी स लड़का केहेन छथि"। हमरा किछु नय बुझना जाइत छल, ताबैत हमर काका हमरा दिस देखलैथ आ देखिते देरी कहलैथ अरे तोहर बियाह ठीक कs क आयल छियो मिठाई खुआ।
हम त एकदम अवाक् रहि गेलौं, हम ओतय सs भागि क अपन कोठरी में आबि बैसि क सोचय लगलियै, आब की होयत हम त अपन दोस्त सब के कहि कs आयल रहि जे अपन दीदी के बियाह में जा रहल छी , ओ सब की सोचत। हमरा एतबो ज्ञान नही छल जे हम बियाहक विषय में सोचितौं , हमरा चिंता छल जे दोस्त सब चिढायत।खैर, कनि कालक बाद सs हमर भाय बहिन सब खुशी खुशी हमरा लग अबैथ, आ सब गोटे खुशी खुशी कहैथ," हम सब नबका कपड़ा पहिरबय"। ओ सब तs आर बहुत छोट छोट छलैथ, हमही सबस पैघ छी।
हमर काका जल्दी जल्दी स्नान ध्यानक बाद भोजन क तुरंत चलि गेला, पता चलल जे ओ बरियाती आनय लेल गेलाह। ओहि दिन, दिनभरि सब व्यस्त छलैथ। हम अपन माँ के व्यस्त देखियैन्ह परंच खुश नय लगलीह । भरि गामक लोकक एनाइ गेनाइ लागल छलय। दोसर दिन भोरे हमर बाबूजी अयलाह । हुनका चाय देलाक बाद आ हुनका स गप्प केलाक बाद माँ के हम प्रसन्न देखलियैन्ह। ताबैत धरि हमहू बूझी गेल छलियैय जे आब सत्ते हमर विवाह भ रहल अछि, आ हमरा दोस्त सब सं बात सुनइये पड़त, आ ओ सब चिढायत तकरा s हम नहि बचि सकैत छी। ओहि दिन हमर जन्मदिन सेहो छलैय, साँझ में दादी के मोन रहि गेलैंह आ हमरा साड़ी पहिरय पड़ल।
खैर हमर विवाह बड़ धूम धाम स भेल आ हम तेहेन लोकक जीवन संगनी बनलों जे हमर जीवन धन्य भ गेल।
क्रमशः ...............
आमंत्रण- श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर (१९३६- )
सब दिन सुतले रहबाले
हमरो दैछ निमंत्रण बाट
हरदम चलिते रहबाले।
ककरो पवन झुलाबय झुलना
सपना देखिते रहबाले।
हमरा पवन छुबैये देह
सिहरल सिहरल उठबाले।
हमरा खातिर पवन कमाल
हमरा खातिर पवन रुमाल
हमरा किरण कहैए झात
सबटा दुख हरि लेबाले
हमरा सोर करैय बाध
बाधक पारक नील आकाश
हमरा पंछीसँ अधिक प्रेम
गगनक आँचर सुँघबाले।
मानल थीक प्रलय केर राति
मन घबड़ाथि कथीले
हम तऽ हर-सिङ्गारक फूल
हरदम झरिते रहबाले।
सोना बनबा केर इच्छुक तऽ
आगिक डऽर कतेक दिन
हम तऽ धधरा लेल पजारि
अनुखन जरिते रहबाले॥
प्यास- श्यामल सुमन
भूख लागल अछि एखनहुँ, उमिर बीत गेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
नौकरी की भेटल, अपनापन छूटल!
नेह डूबल वचन केर आश टूटल!!
दोस्त यार कतऽ गेल, नव-लोक अपन भेल!
गाम केर हम बुधियार, एतऽ बलेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
आयल पाविन-त्योहार, गाम जाय केर विचार!
घर मे चचार् केलहुँ तऽ, भेटल फटकार!!
निह नीक कुनु रेल, रहय लोक ठेलम ठेल!
किनयाँ कहली जाऊ असगर, आ बन्द क खेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
की कहू मन के बात, छी पड़ल काते कात!
लागय छाती पर आबि कियो राखि देलक लात!!
घर लागय अछि जेल, मुदा करब निह फेल!
नवका रस्ता निकालत, सुमन ढ़हलेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
Monday, March 16, 2009
मैथिल के? --रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'
जकर भेल थिक जन्म
वा जे करैछ एहि भूमि पर
अपन जीवनक कर्म
जे कए रहलैछ प्रवास
मुदा पुरुषा सभ करैत छलनि
मिथिले मे वास
चाहे ओ
कोनो धर्मक कियए ने हो
धर्मक अन्तर्गत कोनो जातिक
कियए ने हो
एहि सोच पर अबैछ घृण
जे मैथिल अछि मात्र ब्राह्मण
मैथिल छलथि राजा जनक
हुनक सुता छलीहए सीते
जाहि पर गर्व करैछ सगरे मिथिला
ने वैह छलाह ब्राह्मण, ने हुनकर धिये
कि ओ मैथिल नहि?
ई जुनि कहि
अछि मिथिला कतेको विभूति जनने
सदति रहू सीना तनने
पुरा काल सँ ई माटि
उपजबैत अछि बड़-बड़ विद्वान
सुनू खोलि कऽ दुनू कान
बसै छथि कलकत्ता, काठमांडू
वा न्यूयार्क ओ दिल्ली
ओ छथि सुच्च मैथिल जिनक
ठोर पर खेलि रहल छथि मैथिली
सभ मैथिल मिलि निज मिथिला केँ
दियाबू एकर मान-सम्मान
जे उभरय विश्व मानचित्र पर
बनि एकटा विशिष्ट चान
बुझलहुँ ने, जे कहलहुँ से
आब नहि पूछू, मैथिल के?
Saturday, March 14, 2009
मैथिल रंग बरसे (यू.एस. मे मैथिलक होली) - विद्या मिश्र
हमर सभक एहि बेरक होली हमर घरमे मनाओल गेल...25-30 टा परिवार रहथि। सभ मैथिल रहथि जाहिमे प्रोफेसर हरिमोहन झाक नाति आ डॉ. रमा झाक पुत्र प्रतीक झा सेहो रहथि, ओ हमरा सभक न्ईक मित्र सेहो छथि। हमर सभक प्रयास रहैत अछि पाबनि-तिहारकेँ पारम्परिक रूपमे मनेबाक जाहिसँ अगिला पीढ़ीक बच्चा एकर अनुकरण कए सकए, अनुभव क’ सकए आ अर्थ बुझि सकए।
पछिला साल सभ बच्चा सभ अपन लिखल नाटक हिरण्यकश्यप/ होलिकाक मंचन कएने रहथि। कमसँ कम हुनकासभकेँ होली पाबनि कोना आ किएक मनाओल जाइत अछि तकर पूर्ण ज्ञान छन्हि। किएक हम सभ रंग लगबैत छी आ गरा मिलै,प्त छी, पारम्परिक खानपान आ होली गीत..सभटा।
मैथिल लोकनि भाग लेबाक लेल न्यू जर्सी, विर्जिनिया, वासिंगटन डी.सी आ मेरीलेण्ड सँ अएलाह, से 4-5 गोट स्टेट्स मैथिल रहथि। एहि बेर सभसँ नीक उत्तर प्रतियोगिता रहए, सर्वोत्तम ड्रेस-समन्वय आ पार्सल देबाक प्रतियोगिता रहए आ एहि सभमे मिथिला संस्कृतिसँ सम्बन्धित गहन प्रश्न रहए।सर्वोत्तम उत्तरक लेल हम सभटा उत्तर पढ़लहुँ आ तखन वोट देलहुँ??? सभ गोटे एहि अवसरक लेल बड्ड उत्साहित रहथि आ एहि अवसरक प्रति उत्सुक सेहो। एतए यू.एस.ए. मे बसंतक छुट्टी रहैत अछि से स्कूल कॉलेजक बच्चा सभ अएलाह आ एहि पारम्परिक होली उत्सवमे भाग लेलन्हि...आ हुनका ई एतेक नीक लगलन्हि जे अगिला बरिख सेहो एहिमे सम्मिलित होएबाक सोचलन्हि.... आ अंतिममे होलीक आशीर्वचन हमर लिखल।
माय (कविता) -मनीष झा "बौआभाई"
मनीष झा "बौआभाई"
एक-एक क्षण जे बेटा के खातिर
कर जोड़ि विनती करैइयै माय
बिनु अन्न-जल ग्रहण केने बेटा लै
जितियाक व्रत राखैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय
जिन्दगीक रौदा में तपि क'
बेटा के छाहड़ि दैइयै माय
बरखा-बिहाड़ि सन विषम समय में
आँचर स' झाँपि राखैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय
घर में छोट-छिन बात पर में
बाप स' लड़ि लैइयै माय
बाप स' लड़ि बेटा के पक्ष में
फैसला करैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय
बेटा नै जा धरि घर आबय
बाट टुकटुक ताकैइयै माय
ओठंगि के चौकठि लागि बैसल
राति भरि जागैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय
वयस कियैक नै हुऐ पचासक
तहियो बौआ कहैइयै माय
अहू वयस में नज़रि ने लागय
तैं अपने स' निहुछैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय
होय जानकी वा अम्बे के प्रतिमा
सभ रूप में झलकैइयै माय
तीर्थ-बर्थ सब मन के भ्रम छी
घर में जे' कुहरैइयै माय
कर्त्तव्य हमरो ई कहैइयै
घर में नै कलपय ई माय
आ एहि तरहें जन्म देल त'
माय के पद पाबय ई माय
ईक्कसवी सदीक फगुआ- दयाकान्त
ईक्कसवी सदीक फगुआ
ऋतु बसन्त के भेल प्रवेष
जाड़क नहि आब कोनो कलेष
मज्जर से गमकैत अछि आम
गाबै फगुआ सब बैस दलान
कियो मारै ढोल पर हाथ
किया दैत जोगिराक साथ
निकलैत जखन षिव के झांकी
बचैत नहि छल ककरो खांखी
मायक हाथक मलपुआक स्वाद
अबैत अखनो फगुआ मे याद
ब्रह्मस्थन में जमै छल टोली
भड़ल रहै छल भांगक झोली
भौजी हाथक रंग गुलाल
बजबैत जखन खुषीसॅ ’लाल’
सबकिया रंग में सराबोर
राग द्वेस सब भेल बिभोर
ईक्कसवी सदीक फगुआक हाल
केने अछि बड़ आई बबाल
नहि निकलैत आब रंगक झोली
एसएमएस से सब हैप्पी होली
आईटी में नव रंगक खेल
घरे से सब भेजैत ई-मेल
दु-चारि टा चित्र कट पेस्ट
नहि करैत छथि समय वेस्ट
नहि निकलैत भांगक डोल
दारू पी सब करै किलोल
बाजै सबतरि अस्लील सीडी
दुर भागै फगुआसॅ नव पीढी
आधुनिकताक दौर में हम
कयल महात्म फगुआक कम
दयाकान्त
ग्राम$पोस्ट ः नरूआर, झंझारपुर, मधुबनी (बिहार)
Wednesday, March 11, 2009
मिथिला परिक्रमा सम्पन्न
महामूर्खक उपाधि !
जनकपुर । प्राचीन मिथिलाको राजधानी जनकपुरमे होरी मनएबाक क्रममे महामुर्ख सम्मेलन आयोजन कएल गेल अछि । स्थानीय जानकी मन्दिरमे मंगलदिन रंग अबिर खेलैत महामूर्ख सम्मेलन सम्पन्न भेल । मिथिला नाट¬ कला परिषद होरीक अवसरमे हास्य कवि गोष्ठी आ महामुर्ख सम्मेलन करैत आएल अछि ।
महामूर्ख आ कवि गोष्ठी कार्यक्रममे स्थानीय राजनीतिकर्मी, बुद्विजिवी, व्यापारी, पत्रकार सहितके सहभागिता छल । सम्मेलनमे वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र विमल, कलाकार सुनिल मल्लिक सहित तीन दर्जनसं बेशी गोटेके महामुर्ख, पटमुर्ख, गदहा मुर्खक उपाधि देल गेल । कवि गोष्ठीमे प्रधानमन्त्री प्रचण्ड, काँग्रेसक सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला, एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल, फ़ोरम अध्यक्ष उपेन्द्र यादव सहितक नेताके व्यंग्य करैत कविता वाचन कएने रहैथ ।
Tuesday, March 10, 2009
सटै जँ ठोर अनचिन्हारक अनचिन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक-गजल
सटै जँ ठोर अनचिन्हारक अनचिन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक
बाजए जँ केओ प्यार सँ त बुझिऔ होली छैक
बेसी टोइया-टापर देब नीक नहि भाइ सदिखन अनवरत
निकलि जाइ जँ अन्हार सँ त बुझिऔ होली छैक
केहन- केहन गर्मी मगज मे रहै छैक बंधु
मनुख बचि जाए जँ गुमार सँ त बुझिऔ होली छैक
की दुख होइत छैक चतुर्थीक राति मे नहि बुझि सकबै
हँसी जँ आबए कहार सँ त बुझिऔ होली छैक
जहाँ कनही गाएक भिन्न बथान तहाँ सुन्न- मसान
होइ कोनो काज सभहँक विचार सँ त बुझिऔ होली छैक
Monday, March 09, 2009
एही बेर फागुन मे

मचाऊ ऐहेन धमाल बउवा ,
पाबैन मोन रहे सबके,
किछ ऐहेन करू कमाल बउवा॥
छोडू रंग -भंग स परहेज़ ,
घोरि दियौ , पोखैर ताल बउवा,
युग बीतल नहीं खेल्लेलौं ,
अपने सब गोबर थाल बउवा॥
तोडू टेप रेकाडर, आ घेंट दबाऊ बाजा के,
एही बेर ता ठोकू जोगीरा के ताल बउवा
रंग-अबीर के छिट्टा सं भरी दियौ घर अंगना,
ततेक पक्का हुए रंग , मिटाई नै भैर साल बउवा॥
जोगी नाचत, जोगनिया नाचत,
मदमस्त भ का नचता लाल बउवा,
अहेन रंग से खेलु एही बेर,
सब कियो भ जाय नेहाल बउवा...
समस्त मिथिलांचल के फगुआ के शुभकामना, सत्ते अहाँ सब बड मोन पडैत छी
Friday, March 06, 2009
पैघ व्यक्तित्व छोट विचार
केर जिक्र केने छथि. ओ लिखैत छथि - मुस्कान आ बोली सं ओ दंपत्ति बिहारक लगैत छलै.
बोली सं प्रान्त चिह्नब कोनो विशेष बात नहि मुदा मुस्कान सं ??????
की बिहारक लोक सबहक मुस्कान आन प्रान्तक लोक सब सं भिन्न होइत छैक ???
( इ किछु आर नहि पूर्वाग्रहक प्रस्तुति थिक.) जेना कि हुनकर वर्णन छैन्हि अहि मुस्कानक कोनो नीक अर्थ लगायब मोश्किल अछि. संस्मरणक अंत होइत होइत एहन संकेत भेंटत अछि ओ दंपत्ति तें अभद्र छलै जें बिहारक छलै. हुनकर स्तम्भ सं सन्दर्भ अंश उपलब्ध करायल जा रहल अछि (देखू www.maithilimandan.blogspot.com ). प्रभाष जोशी सन व्यक्तित्व सं अहि तरहक टिपण्णीक अपेक्षा नहि कयल जा सकैछ.
Wednesday, March 04, 2009
गजल- आशीष अनचिन्हार
यथा एन्नी तथा ओन्नी एन्नी-ओन्नी तथैव च
यथा माए तथा बाप मुन्ना-मुन्नी तथैव च
बलू हमर करेज जरैए अहाँ गीत लिखै छी
यथा भँइ तथा अच्छर पन्ना-पन्नी तथैव च
देखहक हो भाइ बोंगहक पोता कोना करै हइ
यथा मुल्ला तथा पंडित सुन्ना-सुन्नी तथैव च
देवतो जड़ि पकड़ै हइ मुहेँ देखि कए बचले रहू
यथा मौगी तथा भूत ओझा-गुन्नी तथैव च
बान्हि क भँइ दूरा पर मगबै ढ़ौआ पर ढ़ौआ
यथा समधी तथा समधीनी बन्ना-बन्नी तथैव च
की करबहक हो भगवान एमरी सभ के
यथा मरनाइ तथा जिनाइ रौदी-बुन्नी तथैव च
बचले रहिअह अनचिन्हार एहि गाम मे सदिखन
यथा साँप तथा मनुख जहर चिन्नी तथैव च
Tuesday, March 03, 2009
शब्द- सतीश चन्द्र झा
निन्न पड़ल निश्बद्द राति मे।
अछि उदंड, उत्श्रृखल सबटा
नहि बूझत किछु बात राति मे।
केना करु हम बंद कान के
उतरि जाइत अछि हृदय वेदना।
बैसि जाइत छी तैं किछु लिखय
छीटल शब्द हमर अछि सेना।
कखनो कोरा मे घुसिया क’
बना लैत अछि कविता अपने
जुड़ल जाइत अछि क्लांत हृदय मे
शब्द शब्द के हाथ पकड़ने।
कविता मे किछु हमर शब्द के
नहि व्याकरणक ज्ञान बोध छै।
सबटा नग्न, उघार रौद मे
नेन्ना सन बैसल अबोध छै।
कखनो शब्द आबि क’ अपने
जड़ा दैत अछि प्रखर अग्नि मे।
कखनो स्नेह,सुरभि,शीतलता
जगा दैत अछि व्यग्र मोन मे।
क्षमा करब जौ कष्ट हुए त’
पढ़ि क’ कविता शब्दक वाणी।
शब्द ब्रह्म अछि नहि अछि दोषी
छी हमही किछु कवि अज्ञानी।
Monday, March 02, 2009
फानी-कथा-श्रीधरम
बिना रामअधीन नेताक पंचैती कोना शुरु भ’ सकैए? डोमन पाँच दिन पहिनहि सँ पंच सभक घूर-धुआँ मे लागल छल । डोमन चाहैत रहए जे सभ जातिक पँच आबय, मुदा रामअधीन नेता मना क’ देने रहै, “बाभन-ताभन केँ बजेबेँ तँ हम नइँ पँचैती मे रहबौ जातिनामा पँचैती जातिए मे होना चाही ।“ डोमन केँ नेताजीक बात काटबाक साहस नइँ भेलै । रामअधीन आब कोनो एम्हर-ओम्हर वला नेता नइँ रहलै, दलित पाटीक प्रखंड अध्यक्ष छिऐ । थानाक बड़ाबाबू, सीओ, बीडीओ, इसडीओ सभ टा चिन्है छै । कुसी पर बैसाक’ कनफुसकी करै छै । मुसहरी टोलक बिरधापेंशनवला कागज-पत्तर सेहो आब नेतेजी पास करबै छै । कोन हाकिम कतेक घूस लै छै, से सभ टा रामअधीन नेता केँ बूझल छै । कारी मड़र तँ नामे टाक माइनजन, असली माइनजन तँ आब रामअधीने नेता किने?
डोमन पँच सभ केँ चटाइ पर बैसा रहल छल आ सोमन माथा-हाथ देने खाम्ह मे ओङठल, जेना किछु हरा गेल होइ । टील भरिक मौगी सभ कारी मड़रक अँगना मे घोदिया गेल रहै—सोमन आ डोमनक भैयारी-बँटवारा देख’ लेल । ओना दुनू भाइक झगड़ा आब पुरना गेल रहै । मौगी सभक कुकुर-कटाउझ सँ टोल भरिक लोक आजिज भ’ ग्र्ल रहय तेँ रामअधीन नेता डोमन केँ तार द’क’ दिल्ली सँ बजबौलकै । सभ दिनक हर-हर खट-खट सँ नीक बाँट-बखरा भइए जाय ।
झगड़ाक जड़ि सीलिंग मे भेटलाहा वैह दसकठबा खेत छिऐ जे सोमनक बापे केँ भेटल रहै । रामअधीन नेताक खेतक आरिये लागल दसकठबा खेत । कैक बेर रामअधीन नेता, सोमनक बाप पँचू सदाय केँ कहने रहै जे हमरे हाथेँ खेत बेचि लैह, मुदा पँचू सदाय नठि गेल रहै । रामअधीन नेता आशा लहौने रहए जे बेटीक बियाह मे खेत भरना राखहि पड़तनि, मुदा पँचू सदाय आशा पर पानि फेर देने छलै । एकहक टा पाइ जोगाक’ बेटीक बियाह सम्हारि लेलक तेँ खेत नइँ भरना लगेलक । मरै सँ चारि दिन पहिनहि पँचू सदाय सोमन आ डोमन केँ खेतक पर्ची दैत कहने रहै,”ई पर्ची सरकारक देल छिऐ, जोगाक’ रखिहेँ बौआ, बोहबिहेँ । नइँ । दस कट्ठा केँ बिगहा बनबिहेँ, भरि पेट खाइत देखिक’ सभकेँ फट्टै छनि । बगुला जकाँ टकध्यान लगेने रहैए ।“
डोमन बापक मुइलाक बाद परदेश मे कमाय लागल रहय आ सोमन गामे मे अपन खेतीक संग-सग मजूरी । फसिलक अधहा डोमनक बहु रेवाड़ीवाली केँ बाँटि दैक । मुदा, जेठकीसियादिनी महरैलवाली केँ ईबड्ड अनसोहाँत लागै, “मर्र, ई कोन बात भेलै, पसेना चुवाबै हमर साँय, चास लगाब’ बेर मे सभ निपत्ता आ बखरा लेब’ बेर गिरथाइन बनि जायत । लोकक साँय बलू गमकौआ तेल-साबुन डिल्ली से भेजै हय त’ हम कि हमर धीया-पुत्ता आरु सुङहैयो ले’ जाइ हय् ।“
सभ दिन कने-मने टोना-टनी दुनू दियादिनी मे होइते रहै । मुदा, ओहि दिन जे भेलै...
सोमन गहूँम दौन क’ क’ दू टा कूड़ी लगा देलक आ नहाय ले’ चलि गेल । गहूमक सऊँग देह मे गड़ैत रहै । रेवाड़ीवाली अपन हिस्सा गहूम पथिया मे उठाब’ लागल रहए कि देखते जेना महौलवाली केँ सौंसे देह मे फोँका दड़रि देलकै, “रोइयोँ नइँ सिहरै हय जेना अपने मरदबाक उपजायल होइ ।” रेवाड़ीवाली कोना चुप रहितय ? कोनो कि खेराअँत लै छै? झट द’ जवाब देलकै, “कोनो रंडियाक जिरात नइँ बाँटै हय कोइ अधहाक मालिक छिऐ छाती पर चढ़िक बाँटि लेबै।” ’रंडिया’ शब्दा महीरैलवालीक छाती मे दुकैम जकाँ धँसि गेलै-“बरबनाचो...के लाज होइ हय बजैत साँय मुट्ठा भेजै हय आइँठ-कुइठ धोइ क’ आ एत’ ई मौगी थिराएल महिंस जकाँ टोले-टोल डिरियायल फिरै हय, से बपचो...हमरा लग गाल बजाओत।“ सुनिते रेवाड़ीवालोक देह मे जेना जुरपित्ती उठि गेलै ओ हाथ चमकबैत महरैलवालीक मुँह लग । चलि गेल, “ऐ गै धोँछिया निरासी! तूँ बड़ सतबरती गै! हे गै उखैल क’ राखि देबौ गै । भरि-भरि राति सुरजा कम्पोटर पानि चढ़ा-चढ़ा क’ बेटीक ढीढ़ खसेलकौ से ककरा स’ नुकायल हौ गै? कोना बलू फटा-फटि बेटीक ’दीन क’ ससुरा भेज देलही।”
बेटीक नाम सुनिते महरैलवालीक तामस जवाब द’ देलकै झोँ टा पकड़िक’ रेवाड़ीवाली केँ खसा देलक । दुनू एकदोसराक झोँ ट पकड़ने गुत्थम-गुत्थी भेल । ओम्हर सँ सोमनक बेटा गँगवा हहासल-फुहासल आयल आ मुक्के-म्य्क्की रेवड़ीवाली केँ पेटे ताके मार’ लागल । रेवाड़ीवाली एसगर आ एमहर दू माइ-पूत । कतेक काल धरि ठठितया, ओ बपहारि काट’ लागल । टोल पड़ोसक लोक सभ जमा भ’ गेल रहै, दुनू केँ डाँटि-दबाड़ि क’ कात कयलक । दुनू दियादिनीक माथक अधहा केस हाथ मे आबि गेल रहै ।
ओहि राति रेवाड़ीवालीक पेट ने तेहन ने दरद उखड़लै जे सुरज कम्पोटर पानि चध्आ क’ थाकि गेलै, मुदा नइँ सम्हरेलै । चारिये मासक तँ भेल रहै, नोकसान भ’ गेलै । बेहोसियो मे रेवाड़वाली गरियबिते रहलै, “ईडनियाही हमरा बच्चा केँ खा गेल । सोचै हय कहुना निर्वश भ’ जाय जे सभ टा सम्पैत हड़पि ली । डनियाहीक बेटा मरतै । धतिंगबाक हाथ मे लुल्ही-करौआ धरतै । काटल गाछ जकाँ अर्रा जेतै...। ”
दिसरे दिन रेवाड़ईवाली थाना दौगल जाइत रहे, रिपोट लिखाव’ । रस्ता सँ रामअधीन नेता घुरेने रहै, “समाजे मे पँचैती भ’ जैतौ” आ नेताजी सोमन केँ मार’-मास्क छूटल रहै, “रौ बहि सोमना । मौगी केँ पाँज मे राखबेँ से नै । आइए सरबे सब परानी जहल मे चक्की पिसैत रहित’ । मडर केस भ’ जइतौ । सरबे हाइकोट तक जमानति नहि होइत ।” सोमन बीतर धरि काँपि उठल रहय । नहि जानि पँचैती मे की सभ हेतै । एक मोन भेलै, जाय आ पटुआ जकाँमहरैलवाली केँ डंगा दैक । ’ई, छिनरी के हरदम फसादे वेसाहैत रहैए ।’
रामअधीन नेताक अबिते पँचैतीक करबाइ शुरु भ’ गेलै । फौदारक चीलम सँ निकलैत धुँआक टुकड़ी किछु दूर उपर उठि बिला जाइत रहे गंधक माध्यम सँ अपन उपस्थितिक आभास दैत एअहय ।
“हँ त’ डोमन किऐ बैसेलही हेँ पँचैती, से पँच केँ कहबिही किने” रामअधीन नेता बाजल । डोमन ठाढ़ होइत बाजल, “हम परदेस कामाइ छिऐ । रेवाड़ीवाले एत’ एसगर रहै हय । पँचू सदाय बलू भैयाक बाप रहै त’ हमरो बाप रहै । हमहुँ पँचूए सदायक बुन्न स’ जनमल छिऐ आ बोए केँ सरकार जमीन देने रहै महंथ स’ छीनिक । अइ जमीन पर जतने अधिकार एकर हइ ओतने हमरो हय । तहन जे स’ब मिलि क’ रेवाड़ीवालीक गँजन केलकै, तकर निसाफ पँच आरु क’ दइ जाउ । हमरा आर कुछो नइँ कहनाइ हय ।“ सब चुप...फेर नेतेजी सोमन केँ टोकलके, “की रौ । तोहर की कहनाम छौ?”
“आब हम बलू की कहबै ? जे भ’ गेलै से त’ घुरिक नइँ एतै ग’ । समाज आरूक बीच मे छिऐ । जते जुत्ता मारै केँ हइ, मारि लौ । दुनू मौगी रोसाएल रहै, तहन त’ बलू ओकर नोकसान भ’ गेलै तेँ ओकर दिख त लोक नइँ देतै । तहन जे भ’ गेलै से भ’ गेलै । पंच आरू मिलिक’ बाँट-बखरा क’ दौ । खेतो केँ आ घरो केँ । झगड़े समापत भ’ हेतै ।”
“रौ बहिं सिमना, बात केँ लसियबही नइँ । तहन त’ अहिना ककरो कियो खून क’ देतै आ समाज मुँह देखैत रहतै । कोना बभना आरू पुक्की मारै जाइ हइ से तूँ सभ की जान’ गेलही । परसू बेलौक पर सार मुखिया हमरा देखि-देखिक’ हँसैत रहय, चुटकी लैत रहय, “की हौ रामअधीन! जहन टोले नइँ सम्हरै छ’ त’ बिधायक बनलाक बाद पूरा एलाका कोना सम्हरतह? सुनै छिय’ एहि बेर टिकट तोरे भेटत’ । चल’ अइहबा मे पार लागिऐ जेत’।...” नेताजी गुम्हरल, “टिकटेक नाम सुनिक’ सार सब केँ झरकै छनि, आगू की सभ जरतनि?” रामअधीन नेता एक बेर मोँ छ केँ चुटकी सँ मीड़ि उपर उठेक फेर आक्रामक मुद्रा बनबैत बाजल, “सुनि ले बहिं, से सभ नइँहेतौ । गलती दुनू के छौ । पाँच-पाँच हजार दुनू केँ जुर्बाना देम’ पड़तौ, जातिनाम खाता मे।” नेताजीस्वाभाविक गति सँ पुन: एक बेर मोंछक लोली केँ चुटकी पर चढ़बैत मड़र कका दिस देखलनि, “की हौ मरड़ कका बजैत किऐ ने छहक?” मड़र कका बदहा जकाँ मूड़ी डोला देलकै ।
डोमन भाइ सँ बदला लैक धुन मे एखन धरि गुम्हरि रहल छल, मुदा नेताजीक बात सुनिते झमान भ’ खसल । एक मोन भेलै, कहि दै—जे भेलै से भेलै भैयारी मे । नइँ करेबाक य’ पंचैती । ई किन बात भेलै ! हमरे बहु मारियो खेलक आ जुर्बान सेहो हमहीं दियौ, मुदा चुप रहल । डरें बाजल नइँ भेलै । डोमन केँ देखल छै जे रामअधीन नेता पंचैती नइँ माननिहार केँ कोना ताड़क गाछ मे बान्हिक’ पीटै छै । एखन धरि जुर्बाना वला पचासो हजार टाका जातिनाम खाता मे गेल हेतै, मुदा हिसाब? ककर बेटी बियेलैहेँ जे रामअधीन नेता सँ हिसाब माँगत!
रामअधीन नेताक पी.ए. जकाँ हरदम संग रहनिहार मोहन सदाय बाजि उठल, “की रौ सोमना, हम दुनू भाइ स’ पुछै छियो; कहिया तक पाइ जमा क’ देमही ? एक सप्ताह स’ बेसीक टेम नइँ देल जेतौ । अहि पाइ स’ कोनो छिनरपन नइँ हतै, सारबजनिक काम हेतै । दीना-भदरीक गहबर बनतै ।”
“कतौ स’ चोरी कए क’ त’ नइँ आनबै हमर हालति बलू ककरो स’ नुकाएल त’ नइँ हय ।“ सोमन कलपल ।
मोहन सदाय केँ रामअधीनक कृपा सँ जवाहर-रोजगार वला ठिकेदारी सभ भेट’ लागल छै । सीओ, बीडीओ केँ चेम्बरे मे बंद क’ दैत अछि आ मनमाना दस्तखत करा लैत अछि तेँ ओकरा सभ टभजियायल छै जे घी किना निकालल जाइत छै । ओ सभक चुप्पी केँ तौलैत मड़रककाअक नाड़ी पकड़लक “की हौ मड़र कका! तोरा आरूक की बिचार छह? दीना भदरीक गहबर मे ओ पाइ लागि जाए त’ नीके किने ?”
मरड़ कका आइ दस साल सँ हरेक पंचैती मे अहिना दीना-भदरीक गहबर बनैत देखि रहलछै’ मुदा एखनो दीना-भदरीक पीड़ी पर ओहिना टाँग अलगा क’ कुकूर मुतिते छै । मड़रकका मने-मन कुकू केँ गरियेलक, “सार, कुकूरो केँ कतौ जगह नइँ भेटै हय, देबते-पितरक पीड़ी केँ घिनायत ।” खैनीक थूक कठ धरि ठेकि गेल रहै, पच्चा द’ फेकैत बाजल’ “जे तूँ सभ उचित बुझही !”
पंचैती मे रामधीन नेता आ मोहन सदाय बजैत जा रहल छल । बाकी सभ पमरियाक तेसर जकाँ हँ मे हँ मिलबैत । सोमन पंच सभक मुँह ताकि रहल अछि, मुदा दिन भरिक हट्ठाक थाकल-ठेहियायल पंच सभक मुँह स्पष्ट कहै छै जे कतेक जल्दी रामअधीन नेता निर्णय दै आ ओ सभ निद्राक कोरा मे बैसि रहय । मड़र ककाक हुँहकारी सँ मोहन सदायक मनोबल एक इँच आरो उपर उठलै । ओ बाजल, “नगदी ई दुनू भाइ जमा क’ सकत से उपाय त’ नइँ छै तहन पाइ कोना एकरा सभ केँ हेतै, तकरो इन्तिजाम त’ आइए भ्’ जेबाक चाही । आब अहि ले’ दोसर दिन त’ बैसार नइँ हेतै । हम्र एक टा प्रस्ताब छै जे दुनू भाइक साझिया दसकठबा खेत ताबत केओ दस हजार मे भरना ल’ लौ । जहिया दुनू भाइ पाइ जमा क’ देतै तहिया खेत घुरि जेतै ।”
बिना ककरो विचार लेनहि मोहन सदाय डाक शुरु क’ देलक, “बाज’के लेबहक! जमीन अपने टोला मे रहतै बभनटोली मे नइँ जेनाय छै खपटा ल’क”
सभ चुप्प!
फेर मोहन सहाय बाजल, “जँ नइँ कियो लेबहक त’ नेताजी सोचतै, टोलक इज्जति त’ बलू बचाब’ पड़तै ओकरे किने ।” अंतिम श्ब्द बजैत मोहन सदायक आँखि नेताजीक आँखि सँ टकरा गेलै । मड़रकका आँखि मुनने भरिसक कुकूरे केँ खिहारि रहल छलाह । खैनीक सेप मुँह मे एतेक भरि गेल रहनि जे कने घोँ टाइयो गेलनि । खूब जोर सँ खखसैत बजलाह, :सुनि ले’ बहिं पिछला बेर जकाँ एहू बेर नइँ पजेबा खसि क’ उठि जाइ ।“ मड़र ककाक शंका मे आरो एक-दू गोटा अपन हामी भरलक । मोहन सदाय पहिनहि सँ तैयार रहय, झट द’ बाजि उठल, “नइँ हौ। दसक हहास बलू अपना कपार पर के लेत? जुर्बानाक पाइ देबते-पितर मे जेतै । दीना-भदरी संगे जे सार फ़द्दारी करत, तकरा घर पर खढ़ो बचतै ? घटतै त’ एक-दू हजार नेताजी अपन जेबियो स’ लगा देतै । कोनो अंत’ जेतै? धरम-खाता मे जमा रहतै । बभना आरू जेहन डीहबारक गहबर बनेलकै, ओहू स’ निम्मन दीना-भदरीक गहबर बनतै।”
महरैलवाली बड़ी काल सँ मुँह दबने रहय । आब ओकर धैर्य जबाव द’ देलक, “हइ के हमर जमीन लेतै? दीना-भदरीक गहबर बनै ले’ हमरे जमीन हइ । मोंछवला सभ बेहरी द’क’ बनेतै से नइँ।” रेवाड़ीवाक्लीक हृदय सेहो आब बर्फ भ’ गेल रहय । दियादनीक बात मे ओकरो मौन समर्थन रहै ।
रामअधीन नेता केँ कहियो-कहिओ दिन तका क’ तामस उठै छै जहन ओकरा मोनक विपरीत कोनो काज होइत छै। एहन परिस्थिति मे नेताजी टोल भरिक छौड़ी-मौगी सँ गारिक माध्यम सँ लैंगिक संबंध स्थापित क’ लैत छथि । “छिनरी केँ तूँ बीच मे बजनाहर के? हम सोमना नइँ छी, ततारि देब ।“ नेताजी मारैक लेल हाथ उठेलनि । महरसिलवली नेताजीक लग मे आरो सटैत बाजल, “माय दूध पियेने हइ त’ मारि क’ देख लौ ।” नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’ बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ । आगि-पानि बारि देबौ, देखै छी कोना गाम मे तूँ रहि जाइत छें।”
“है केहन-केहन गेलै त’ मोछवला एलै । बहरा गाम मे रहि जेबै तें जमीन पर नइँ ककरो चड़ह’ देबै । ई नेताबा आरू गुरमिटी क’क जमीन हड़प चाहै हय । जमीन भरना लेनिहार केँ त’ खपड़ी स’ चानि फोड़ि देबै । दीना-भदरी गरीबेक जमीन लेतै । अइ नेताबा आरूक कपार पर हरहरी बज्जर खसतै । घुसहा पंच सभ केँ मुँह मे जाबी लागि गेल हय । निसाफ बात बजैत लकबा नारने हइ ।“
महरैवालीक ई हस्तक्षेप सोमनक पक्ष केँ आरो कमजोर क’ देलकै । पंच सभ सोमन केँ धुरछी-धुरछी कर’ लगलै । फौदार कहलकै, “त’ रौ बहिं सोमना, ई मौगी ठिके झँझटिक जड़ि छियौ । एकरा अँगना क’ बइलेबेँ से नइँ? गाइरे सुनबै ले’ पंच आरू केँ बजेलही हें ।” सोमन केँ भरल सभा मे ई बेइज्जती बड़ अखड़लै “जहन मरदा-मरदी बात होइ हय त’ ई मौगी किऐ बीच मे टपकै हय ।” सोमन, महरैलवालीक ठौठ पकड़ि क’ अँगना मे जा क’ धकेलि देलक । महरैवाली आँगने सँ गरियाबैत रहल, “अइ मुनसा केँ त’ जे नइँ ठकि लइ । बोहा दौ सभ टा । नेतबा सभ त’ तौला मे कुश द’क’ रखनै हय।”
आब नेताजीक तामस मगजो सँ उपर चढ़ि गेल, “ई सार सभ ओना नइँ सुधरत । एखने बभना आरू दस टा गारि दैतनि आ चारि डंटा पोन पर मारितन्हि त’ तुरते पंचैती मानितय । कोन सार पंचैती नइँ मानत से हमरा देखनाइ यए ।” नेताजीक ठोरक लय पर मोंछो थरथरा रहल छल ! “सरबे सभ केँ हाथ-पयर तोड़िक’ राखि देबनि । घर मे आगि लगा क’ भक्सी झोंकान झौकि देबनि । देखै छी कोन छिनरी भाइ दरोगा हमरा खिलाफ एन्ट्री लैयए ।” चारू भर श्मशानक नीरवता पसरि गेल छल । पंच सभ आगाँक बातव् केँ रोकबाक लेल डोमन आ सोमन दिस याचक दृष्टएँ ताकि रहल छल । मोहन सदाय कागत-कजरौटी निकालैत सोमनक कान मे बाजल, “की विचार छौ, फसाद ठाढ़ करबें?” आ फेर सोमनक थरथराइत औंठा पकड़िक’ कजरौटी मे धँसा देलक ।
अही बीच महरैलवाली वसात जकाँ हहाइत आयल आ दुनू हाथ सँ कागत आ कजरौटी केँ पकड़ि क’ ओहि पर सूति रहल! ओ बाजय चाहैत रहय, मुदा मुँह सँ आवाज नहि निकलि रहल छलै । रामअधीन नेता कागत आ कजरौटी महरैलवालीक हाथ सँ छीन’ चाहैत छल, मुदा महरैलवाली पाथर भ’ गेल रहय । जेना ओ कागत नहि, ओ दसकठवा खेत हो जकरा ओ अपना छाती सँ अलग नहि कर’ चाहैत रहय ।
“छिनरी केँ तू एना नहि मानवें ।” महरैलवालीक मुँह पर घुस्सा मारैत ओकर मुट्ठी केँ हल्लुक कर’ चाहलक ।
एम्हर रेवाड़ीवालीक चेहरा तामसे लाल भ’ गैल रहै । ओकर सभ टा चिद्रोह नेता सभक कूटनीति केँ बुझिते पिघलि गेल रहै । ओ डोमनक देह झकझौरैत बाजल, “बकर-बकर की ताकै छ’ । नार’ ने पूतखौका नेताबा आरू केँ । जब खेते नहि बचत’ त’ बाँटब’ की?” रेवाड़ीवालीक ई रूप देखि नेताजीक हाथ ढील हुअ’ लागल । पंच सभ हतप्रभ रेवाड़ीवाली दिस ताक’ लागल
Thursday, February 26, 2009
बाल कविता-१ जीवकान्तक दू टा कविता
अक्षर कवितामे अँकुसी- जीवकांत
नेना सभ लेल फूजल स्कूल
बड़का देबाल वला
बड़का बस वला स्कूल
अक्षर सभ
बनाओल जा रहल कटगर
पेंसिलक खपत बढल अछि
विद्यालयक देबाल होइत जाइत मोट
अक्षरक काट भेल सुरेब
शिक्षक भेलाह छोट
बहुत न्एना बकरी लए जाइए खेत दिस
देबाल दिस नहीं तकैए
फेकि देल खराँत वला सिलेट
अक्षर सभमे देखाइत चैक अँकुसी
विचित्र आकार
ओहिसँ नीक आकारमे
जन्म लैत अछि बकरीक बच्चा
शिक्षक सभकेँ अभिनन्दन
अभिनन्दन ह्रस्व इकारक मात्राकेँ
अभिनन्दन स्कूलक घड़ीकेँ
रजिस्टर सभक गेँटल अभारकेँ
नमस्कार
2.
तकैत अछि चिड़ै - जीवकांत
रातिक अंतिम पहरमे
चिड़ै जगैत अछि
राजमार्ग पर घोदिआइत अछि
छोट-छोट जानवर सभक देह
टुटैत अछि गाड़ीक पड़िया तर
छोट-छोट घौदामे
तकैत अछि चिड़ै
आंगनमे बाँस पर बैसल अछि छिड़ै
कुड़िअबैत अछि अपन पाँखि लोलसँ
तकैत अछि चिड़ै
चार सभक दुनू कात
झीलक कछेरमे सिम्मरक गाछ पर
बैसल चिड़ै गबैत अछि गीत
तकैत अछि पानि दिस
झीलक पानि दिस
की सभ दहाइत छैक पानिमे
तकैत अछि चिड़ै
भाइजी काका- डॉ. जयकान्त मिश्रक स्मरण- विद्या मिश्र
हम बहुत छोट रही, भरिसक स्कूलक दिन छल, जखन कखनहु हमर घरमे अंग्रेजीक विद्वान, कवि, मैथिली लेखकक चर्चा होइत रहए, लोक सदिखन डॉ. जयकान्त मिश्रक चरचा करिते रहथि। ओ ओहि समयमे हमर सभसँ पैघ मामाजीक साढ़ू रहथि। नेनपनमे हम मैथिल आर मिथिलाक विकास आ उन्नतिक प्रति हुनकर समर्पण आ साहित्यमे हुनकर योगदानसँ बड्ड प्रभावित रही। ओ हमरा लेल आदर्श रहथि..प्रशंसा करी आ सदैव हुनकासँ भेंट करबाक आ देखबाक लेल लालायित रही।
हम अपन स्नातक विज्ञानक द्वितीय वर्षमे रही जहिया डॉ. जयकान्त मिश्रक सभसँ छोट बेटा अपन पितियौतक घरपर धनबाद आएल रहथि। आ हमर बाबूजी तहिया ओतहि पदस्थापित रहथि, से ओ सभ हमरो सभक अहिठाम भेँट करबाक लेल आएलाह। हमरासँ भेँट कएलाक बाद, गप कएलाक बाद ओ हमर बाबूजीसँ कहलन्हि...अहाँ किए नहि हमर पितियौत हेमकान्त मिश्रसँ बिन्नी (हम) क विवाहलेल प्रस्ताव अनैत छी। आ एतए देखू.. हमर डैड हुनका सभ लग प्रस्ताव रखैत छथि आ एक मासक भीतरे हम हेमक संग विवाहित भऽ जाइत छी।
जखन हम सुनलहुँ जे हमर विवाह डॉ. जयकान्त मिश्रक भातिजक संग होमए जा रहल अछि..हम बड्ड प्रसन्न भेलहुँ आ शीघ्रहि हुनकर संग हमर सम्बन्ध परिवर्तित भऽ गेल किएक तँ हम आब ओहि परिवारक पुतोहु रही, विद्वान आ लेखकक परिवारक।
हम डॉ. हरिवंश राय बच्चनसँ बहुत नजदीक रही, पत्राचार माध्यमसँ, हुनकर परामर्श अवसरपर भेटए आ पारस्परिक रुचि हमरा सभ बाँटी। ओना तँ ओ हमरासँ बड्ड पैघ रहथि मुदा तैयो हमरा सभ एक दोसारासँ गप बाँटी आ एक-दोसराक चिन्ता करी, से हम हुनका कहलहुँ जे अहाँ प्रसन्न होएब जे हम इलाहाबादक डॉ. जयकान्त मिश्रक भातिजक संग विवाहित होमए जा रहल छी। हमरा जवाब भेटल जे हमर विवाह एकटा विद्वानक परिवारमे होमए जा रहल अछि, ई वैह छथि जिनका हम इलाहाबाद विश्वविद्यालयक अंग्रेजीक विभागाध्यक्षक अपन प्रभार देने रहियन्हि आ ओ सर्वदा हमरा अपन गुरु मानैत छथि। आ हुनकर पिता डॉ. उमेश मिश्रकेँ हम अपन गुरु मानैत छियन्हि। ओहि परिवारक ओ जे प्रशंसात्मक वर्णन कएलन्हि से आह्लादकारी रहए आ तकरा सोचैत एखनो हम उत्फुल्लित भऽ जाइत छी।
हम सभ १९९९ ई. मे संयुक्त राज्य अमेरिकामे बसि गेलहुँ मुदा हमरा सभक हृदय, आत्मा आ मस्तिष्क सर्वदा इलाहाबादमे रहैत छी आ त्रिवेणीपर भेल सभ कर्मकेँ अनुभव करैत छी हमरा सभ ओ सभ छोट-छीन काज करैत छी जे परिवारक प्रति आदर आ प्रेमक भाग अछि। हुनकर समर्पण, परम्परा, सरलता आ संस्कृतिक प्रति लगाव अनुकरणीय अछि। हम सभ हुनकर परिवारक मुखिया, गुरु आ भाइजी काकाक रूपमे क्षति सदैव अनुभव करब। ई परिवार आ समाजक लेल एकटा पैघ क्षति अछि।
Wednesday, February 25, 2009
चिकन टिक्की (ग्रिल्ड) हरियर चटनीक संग
बोनलेस चिकन- १/२ किलो
पियाजु- २ टा मध्यम आकारक
लहसुन- चारि झाबा
आदी (भुजबी कएल)- एक चम्मच
सौंस धनी- एक चम्मच
जीर- एक चम्मच
नून- इच्छानुसार
तेल- २ चम्मच
हरियर मरचाइ (काटल)- एक चम्मच
हरियर धनिया पात (काटल)- २० चम्मच
बोनलेस चिकनकें ग्राइन्डर/ मिक्सरमे पीसि कऽ बट्टामे राखू। जीर आ धनीकें लोहियामे भूजि कऽ मिक्सरमे बूकि लिअ आ बटामे धऽ दियौक। पियाजु,आदी आ लहसुनकें पीसिकें मिला कऽ बटामे काटल हरियर मेरचाइ आ धनियापात संग मिला दियौक।
दू चम्मच तेल आ नून (जेहन रुचए) बटामे दए चारि घण्टा रसबाक लेल छोड़ि दियौक।
ओवन/ ग्रिलरकें ३२५ एफ.पर धऽ दियौक
Chicken Tikki ( grilled ) with green chutni
Boneless chicken - 500 gm
Onion - 2 medium
garlic - 4 cloves
ginger ( grated ) - 1 table spoon
Whole coriander - 1 table spoon
Cumin seeds - 1 table spoon
salt ( as per choice )
Veg oil - 2 table spoon
green chillies ( cut ) - 1 table spoon
Green coriander leaves ( cut ) - 20 table spoon
Grind boneless chicken in a grinder / mixer and keep that in a large bowl .
Dry roast coriander and cumin seeds on a pan and crush in grinder and put it in the same bowl .
Paste onion , ginger and garlic in the same grinder and mix all of them in the same bowl along with cut green chillies and coriander leaves .
Add 2 table spoon of oil and salt as per requirement in the same mixture and keep aside for 4 hrs to marinate properly .
Put oven / griller on 325F
जंगल दिस !- रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'
सूर्य उगल, फाटल कुहेस
तरुणी-तरुणक एकटा जोड़ा
घूमि रहल छल गुफा एलोड़ा
चश्मा साजल दुनू केर माथ
रखने एक दोसरक हाथ मे हाथ
हिप्पी देखि लागल तरुण अपाटक
जूता छलैक फोरेन हाटक
जिंस लगौने आओर टी शर्ट
देखि मोन कहलक बी एलर्ट
तरुणीक केश बॉब कटक
खाइत चलैत छल चटक-मटक
बढ़ैत चलि जाइत छल सीना तनने
तरुण प्रेमीक संग गप्प लड़ौने
तरुणी देह पर छलैक वस्त्र कम
तकर ने छलैक ओकरा गम
चलैत-चलैत भेल ठाढ़ दुनू
मोने सोचल एना लोक चलैछ कुनू
धेलक एक दोसर केँ भरि पाँज
देखि कऽ हमरा भऽ गेल लाज
मुँह घुमा पुछलियैक-जेबऽ कोन दिस
बाजल दुनू एक संग-जंगल दिस!
Monday, February 23, 2009
मैथिली के ल क किछु असुविधाजनक प्रश्न...
अगर एकर तह में जाई त एहि भाषाके संग सबसं पैघ अन्याय ई भेलैक जे एकरा किछु खास इलाका के मैथिली बनयबा के आ किछु खास लोकक भाषा बनयबाके प्रयास कयल गैलैक। मैथिली के दरभंगा मधुबनी आ खासक ओतुक्का ब्राह्मण के भाषा बनाक राखि देल गेलैक। मधेपुरा-पूर्णिया के बात त दूर दरभंगो मधुबनी के विशाल जनसमुदाय ओ भाषा नहि बजैत अछि जे किताबी मैथिली के रुप में दर्ज छैक। ओना ई बात दोसरो भाषा के संगे सत्य छैक लेकिन कमसं कम ओतय ओहि भाषा के स्थानीय रुप के हिकारत या हेय दृष्टि सं नहिं देखल जाई छैक। मैथिली में एहि तरहक कोनो प्रयोग के बर्जित कय देल गेलैक। मिथिला के खेतिहर,मजूर, मुसलमान आ निम्नवर्ग ओहि भाषा में तस्वीर कहियो नहि देखि सकल। जखन मिथिला राज्य के मांग उठल त हमसब मुंगेर तक के अपना में गनि लैत छी, लेकिन जखन भाषा के बात हेतैक त ओ सिर्फ मधुबनी के पंचकोसी या मधुबनी झंझारपुर तक सिमटि कय रहि जाईछ।
हमरा याद अछि जे कोना सहरसा या पूर्णिया के लोकके भाषा के मधुबनी के इलाका में एकटा अलग दृष्टि स देखल जाई छैक। इलाकाई भिन्नता कोनो भाषा में स्वभाविक छैक लेकिन यदि ओ अहंकारवोध सं ग्रस्त भ जाई त ओहि भाषा के भगवाने मालिक। फलस्वरुप जखन भाषाई आधार पर राज्यके मांग उठलैक त मिथिलांचलक विराट जनसमुदाय ओहि स अपना के नहि जोड़ि सकल आ ओ आन्दोलन लाख संभावना के बावजूद नहि उठि सकल। रहल सहल कसरि राज्यसरकार क मैथिली विरोधी रवैया पूरा कय देलक। मैथिली के बीपीएससी स हटा देल गैलैक, आ मैथिली अकादमी के निर्जीवप्राय कय देल गेलैक। लेकिन एहि के लेल सत्ता के दोष कियेक देबै, जखन जनता के दिस सं कोनो प्रवल प्रतिरोध नहि छलैक त सत्ता त अपन खेल करबे करत।
ओना त ई कहिनाई मुनासिब नहि जे मैथिली में आम जनता के लेल या प्रगतिशील चेतना के स्वर नहि मुखरित भेलैक लेकिन ओ ओहि तरीका सं व्यापक नहि भ सकलै जेना आन भाषा में भेलैक। मैथिली के रचना में ओ मुख्यधारा नहि भ सकलै। दोसरबात ई जे कहियो मिथिला में कोनो समाजसुधार के आंदोलन नहि भेलैक जेना बंगाल वा महाराष्ट्र में देखल गेलैक। तखन ई कोना भ सकैछ जे सिर्फ भाषा के त विकास भय जाय लेकिन समाज के दोसर क्षेत्र में ओहिना जड़ता पसरल रहैक। मिथिला के इतिहास के देखियौक त एतय येह भेलैक। दोसर बात ई जे मिथिला या मैथिली के लेल जे संस्था सब बनल ओकर कामकाज के समीक्षा सेहो परम आवश्यक। मैथिली के विकास के लेल दर्जनों संस्था बनल जाहि में चेतना समिति के नाम अग्रगण्य अछि। लेकिन ओ चेतना समिति की कय रहल अछि आ जनता सं कतेक जुड़ल अछि एकर विशद विवेचना हुअक चाही। सालाना जलसा आ सेमिनार के अलावा एकर मैथिली भाषा के लेल की योगदान छैक तकर विशद समीक्षा हुअके चाही। मैथिली के बजनिहार भारते में नहि नेपालों में छथि, लेकिन दूनू दिसके भाषाभाषी के जोड़य के कोनो ठोस उपाय एखन तक दृष्टिगोचर नहि।
एखन जहिया सं मैथिली के संविधान में मान्यता भेटलैक अछि तहिया सं साहित्य अकादमी के किछु बेसी गतिविधि देखय में आबि रहल अछि। लेकिन मैथिली के जखन तक आम जनता आ ओकर सरोकार सं नहि जोड़ल जायत एकर आन्दोलन धार नहि पकड़ि सकैत अछि। एकर सबसं पैघ जिम्मेवारी ओहि बुद्धिजीवी लोकनि पर छन्हि जे मैथिली के पुरोधा कहबै छथि। हुनका सं ई उम्मीद त जरुर कयल जा सकैछ जे ओ एकर ठोस, सर्वग्राही आ समीचीन समाधान सामने लाबथु आ ओहि पर समग्र रुपे चर्चा हो।
Saturday, February 21, 2009
प्रबोध सम्मान 2009 / फरबरी 22, 2009 केँ 4 बजे अपराह्नमे देल गेल / कंप्यूटर आ मैथिली

मैथिलीक सभसँ प्रतिष्ठित प्रबोध सम्मान 2009 क लेल श्री राजमोहन झाकेँ स्वास्ति फाउंडेशन द्वारा पटनाक विद्यापति भवनमे 22 फरबरी 2009 केँ 4 बजे अपराह्नसँ शुरु भेल कार्यक्रममे देल गेल। एहिमे स्मृति चिन्ह आ एक लाख टाका देल जाइत अछि। श्री भीमनाथ झा, उदय नारायण सिंह, विजय बहादुर सिंह, अभय नारायण सिंह आ ढेर रास गणमान्य लोक एहि अवसरपर उपस्थित छलाह।

मैथिलीक भारतीय ओपेन ऑफिस, मल्टी प्रोटोकोल मेसेंजर,कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम, स्क्राइबस, सनबर्ड कैलेंडर, ई-मेल क्लाइंट, की-बोर्ड ड्राइवर, फॉंट, वेब ब्राउसर, आ द्विभाषीय डिक्शनरी आब आबि गेल अछि। ई सम्भव भेल अछि टेक्नोलोजी डेवेलपमेंट फॉर इंडियन लैंगवेजेज प्रोग्राम, सेंटर फॉर डेवेलोपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्युटिंग आ साहित्य अकादमीक सहयोगक परिणाम स्वरूप।
मैथिली साफ्टवेयर अओजार आ फान्ट नाम्ना एहि सी.डी.पर विद्यापतिक फोटो लागल अछि।
ई सोफ्टवेयर मैथिली साफ्टवेयर अओजार आ फान्ट लिंकपर उपलब्ध अछि।
मैथिली-अंग्रेजी/ अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोशक ms-sql server आधारित सर्च डिक्शनरी, जाहिमे अंतर्राष्ट्रीय फोनेटिक अल्फाबेट आ मिथिलाक्षरक प्रयोग देवनागरी आ रोमनक संग भेल अछि विदेह कोश एहि लिंकपर उपलब्ध अछि। एहिमे कम्प्यूटर आ इंटरनेट शब्दावलीक सेहो अटाबेश भेल अछि।
Help Alexa Learn Maithili
Helping Alexa Learn Maithili: Cleo Skill: Amazon has a skill called "Cleo" that allows users to teach Alexa local Indian lang...
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उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...