भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c)२०००-२०२५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur

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Saturday, April 04, 2009

विदेह २७ म अंक ०१ फरबरी २००९ (वर्ष २ मास १४ अंक २७)-part-i

विदेह २७ म अंक ०१ फरबरी २००९ (वर्ष २ मास १४ अंक २७)


एहि अंकमे विशेष:-
रामाश्रय झा "रामरंग" प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक १ जनवरी २००९ केँ निधन भऽ गेलन्हि। डॉ. गंगेश गुंजन मृत्युपूर्व हुनकासँ साक्षात्कार लेने छलाह। प्रस्तुत अछि ओ अमूल्य साक्षात्कार- पहिल बेर विदेहमे।
एहि अंकमे अछि:-
१.संपादकीय संदेश
२.गद्य
२.१. १. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता - कुमार मनोज कश्यप (कथा)
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल (आगाँ)
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी (आगाँ)
२.४. मैथिली भाषाक साहित्यी- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)
२.५.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी (आगाँ)अंक 1 दृश्य : 3
२.६. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.७. डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा -आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या
२.८. रामाश्रय झा "रामरंग" सँ डॉ. गंगेश गुंजन द्वारा लेल गेल साक्षात्कार
२.९. विवेचना: आशीष अनचिन्हार
३.पद्य
३.१.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (नवम खेप)
३.२. गजेन्द्र ठाकुर- 15 टा पद्य
३.३. सतीश चन्द्र झा- दू टा कविता
३.४.ज्योति- पनभरनी
३.५. पंकज पराशर - सत्तनजीब
३.६. मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल- बी.के कर्ण

४. मिथिला कला-संगीत- हृदयनारायण झा
५-मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी
६-लेखन - पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]
७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( तिरहुता आ देवनागरी दुनू लिपिमे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Tirhuta and Devanagari versions both ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक तिरहुता आ देवनागरी दुनू रूपमे
Videha e journal's all old issues in Tirhuta and Devanagari versions

१.संपादकीय

मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा गणतंत्र दिवसक अवसरपर कविता महोत्सवक आयोजन कएल गेल। मैथिलीमे रमण कुमार सिंह, सारंग कुमार, रवीन्द्र लाल दास, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कामिनी कामायनी आ गंगेश गुंजन जीक काव्य-पाठ भेल। मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा मैथिलीमे विद्यापति सम्मान आ भोजपुरीमे भिखारी ठाकुर सम्मान एक-एकटा, जे प्रत्येक 51-51 हजार टाकाक सम्मान राशिक होएत, साहित्यकार/ कलाकार/ संस्कृतिकर्मीकेँ देल जाएत। अकादमी द्वारा मैथिली आ भोजपुरीमे अलग-अलग पत्रिकाक सेहो प्रकाशन होएत जाहिमे कथा, कविता, लेख, निबन्ध, समीक्षा आ सर्जनात्मक टिप्पणी प्रकाशित कएल जाएत।
मैलोरंग सेमीनारमे सुभाषचन्द्र यादवजी फील्डवर्कक आधारपर लोककथा लिखबाक आग्रह कएने छलाह कारण अपन दादी-मैयाँसँ सुनल कथा क्षेत्रमे पसरल कथाक विभिन्न स्वरूपकेँ ग्रहण करबामे सक्षम नहि होइत अछि। विदेह द्वारा एहि सम्बन्धमे काज शुरू भ' गेल अछि आ शीघ्र एकर परिणाम ई-पत्रिकामे देखबामे आएत।
संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० जनवरी २००८) ७३ देशक ७११ ठामसँ १,४६,१६१ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in
२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल।
(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
२.गद्य
२.१. १. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता - कुमार मनोज कश्यप (कथा)
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल (आगाँ)
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी (आगाँ)
२.४. मैथिली भाषाक साहित्यी- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)
२.५.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी (आगाँ)अंक 1 दृश्य : 3
२.६. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.७. डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा -आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या
२.८. रामाश्रय झा "रामरंग" सँ डॉ. गंगेश गुंजन द्वारा लेल गेल साक्षात्कार
२.९. विवेचना: आशीष अनचिन्हार
१. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता - कुमार मनोज कश्यप
चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।

कबाछु
ओ बेंच पर बैसल ट्रेनक प्रतीक्षा करैत रहय ।
'शी-इ-इ।’ वला सिसकारी सुनिते ओकर छाती धक सिन उठलैक । बिन देखनहि ओकरा बुझा गेलैक, चम्पीवला आबि रहल छैक । आबिते नून—लस्सा जकाँ सटि जेतैक ।
चाहे अहाँ केहनो परिस्थितिमे रहू, ओ आबिते अहाँक हाथ या कनहा धऽ लेत। ओकर एहि चालि पर ओकरा खौंत नेस दैत छैक । एक दिन ओ बिख सनक बात कहि देने रहै । ओ तइयो अपन चालि नहि छोड़लकै ।
ई बुझितो जे चम्पीवला आबि रहल छैक ओ मटियेने रहल । पत्रिका पर आँखि गड़ौने सोचलक जे व्यस्त आ उदासीन देखि कऽ ओ चल जायत । लेकिन नहि । ओ आबि कऽ सोझा मे ठाढ़ भऽ गेलैक आ सिसकारी पाड़लकै--- 'शी-इ-इ !
आब अनठेनाइ असंभव छलै । ओ मूड़ी उठा कऽ चम्पीवला दिस तकलकै । चम्पीवला पुरान यार जकाँ रभसल दृष्टिएँ ताकि रहल छलैक आ नजरि मिलते नि:संकोच हाथ धऽ लेलकैक ।
बेंच पर ओकर दुनू कात संभ्रान्त आ परिचित व्य क्ति सभ बैसल रहैक । एहन अवस्थाआ में चम्पीचवलाक धृष्टपता बहुत अशोभनीय आ फूहड़ छलैक। चम्पीवला पर ओकरा बड्ड तामस उठलैक ।
'की कऽ रहल छेँ ?’— ओ टिरसलै ।
चम्पीवला कोनो परवाह नहि केलकै आ ओ जे टांग पर टांग चढ़ेने बैसल रहय तकरा अलग करबाक जेना आदेश दैत जाँघ पर हाथ राखि देलकै । देहकेँ ढील छोड़ि देने चम्पी करबामे ओकरा सुविधा होइतैक । 'बेहूदा नहितन !’ – जाँघ पर राखल चम्पीवलाक हाथकेँ जेना ओ काछि कऽ फेकलकै ।
ओकर एहि व्यवहारसँ चम्पीवला हतप्रभ नहि भेलै, बल्कि ढीठ जकाँ कहलकै—'एक बेर छूबल देहकेँ फेर छूबऽ मे कथीक संकोच ?'
चम्पीवला बहुत पैघ बात कहि देने रहैक जे साँच तऽ रहैक, किन्तु ओहिसँ ओ लजा आ खौंझा गेल । ओकरा बुझेलै जेना ओ स्त्री हो आ ई चम्पीवला ओकर पुरान यार । चम्पी आ मालिश करायब ओकरा बहुत अश्लीब बुझेलै ।
'देखै नहि छिही, कतेक गरमी छैक !’— चम्पीवलाक बातमे जे धार छलैक तकरा भोथरेबाक लेल ओ एकटा बहाना बनेलक ।
'हँ ठीके, गरमी तऽ बहुत छैक ।’— अपन निराशाकेँ नुकेबाक लेल चम्पीवला बजलै ।
चम्पीवलाक चलि गेला पर ओ अवग्रहसँ छूटल, मुदा चम्पीवलाक दीनताक लेल ओकरा अफसोस भेलैक । ठाम-कुठाम आ समय- कुसमय वला महीन समझ जँ चम्पीवला मे रहितिऐक तऽ एहनो गरमी मे ओ चम्पी करा सकैत रहय । लेकिन एहन बुधि सँ ओकर पेट नहि चलतैक ।
ओ एहिना फेर कहियो गाड़ीमे या स्टेशन पर भेटि जेतैक आ सिसकारी पाड़ि कऽ चम्पी करेबाक इशारा करतैक—शी-इ-इ ! जेना पटेबाक लेल कोनो छौंड़ा कोनो छौंड़ीकेँ कनखी मारैत हो । ई सोचिते चम्पीवलाक प्रति ओकर वितृष्णा बढ़ि गेलैक ।
लघुकथा-
कुमार मनोज कश्यप ।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

विवसता

अपन जन्मभूमि के प््राति मोह ककरा नहिं होईत छैक? जाहि धरा पर पहिल बेर पायर राखल, जकर धूरा-माटि मे खेल-खेल कऽ समर्थ भेलंहु, तकरा प््राति लगाव तऽ स्वभाविके आछ। अपन राज्यक सीमा मे प््रावेश कईयो कऽ गाम नहिं जाई से ने हमर मोन मानत आ ने गाम-परिवारक लोक। अहु बेर सरकारी यात्रा सँ मुस्किल सँ पलखति पाबि रातियो भरि लेल गाम जेबाक विचार कय बिदा भऽ गेलंहु बस धरबाक लेल। भोरे आपसे एबाक छल, तैं कोनो समान लऽ जेबाक दरकारे नहिं।

सभ गामक चौक पर अहाँ के ओहन रिक्सावला भेट जायत जे चौक सँ बस लग-पासक गामक सवारी उठबैत आछ - आर कतहुँ नहिं जायत ओ - कतबो बेगरता होऊक लोक कें। चौक पर बस रुकिते ओ सभ रिक्सा लऽ कऽ तेना दौड़ैत आछ सवारी लेवाक हेतु जेना कोनो तिर्थ-स्थानक पण्डा। जकरा सवरी भेटि गेलैक से विजयी आ आन सभ हारल - मुदा पेᆬर सँ आगला प््रातियोगिता लेल डाँड़ बन्हने।

कैकटा रिक्सावला हमरो पाछु दौड़ल, मुदा आई हमरा पायरे जेबाक मोन भऽ रहल छल, तैं मना कऽ देलियई। समान कोनो छलैहे नहिं आ साँझक सोहाओन मौसम, कियैक नहिं आनंद लेल जाय एकर। सभ सँ पैघ बात जे गामक एहि चिर-परिचित धुरियायल रस्ता पर चलि कऽ एक बेर पेᆬर हम अपन बितल दिन मोन पाड़ऽ चाहि रहल छलंहु। आततक स्मरण बड़ मनभावन भेल करैत छैक।

सड़क पार कय हम चलऽ लगलंहु गामक ओहि रस्ता पर जे कहियो बड़ आत्मीय छल हमर। किछु आभास भेला पर पाछाँ तकलंहु - एकटा रिक्सवला निरीह भावें रिक्सा लऽ कऽ चल अबैत हमरा पाछाँ। लऽग आबि बाजल -'' हाकीम! तऽ नहिंये करबै रिक्सा? जे मोन हुअय से दऽ देब खुशी सँ, मुदा बैस जाऊ हमर रिक्सा पर।'' हम कहलियै - ''बेकार मे हमरा पाछाँ नहिं पड़, आई हमरा पायरे जेबाक ईच्छा भऽ रहल आछ । घुरि जो तों।'' रिक्सावला के आँखि मरल माँछ जेना थिर भऽ गेलै हमरा उपर। कल्पैत स्वर मे बाजल- ''ऐं यौ हाकिम! अंहु सन हाकिम-हुक्काम जँ पयरे चलऽ लगतै, तऽ हमरा सभ गरीब-गुरबा अपन परिवारक पेट कोना पोसतै?''

हमर पैर एकाएक थमकि गेल। बिना किछु बजने हम बैसि गेलंहु ओकर रिक्सा पर।

वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्टीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि।
बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल

“ की होइतैक ? ओतयसँ तान्त्रिक धड़फड़ाइत सोझेँ राजदरबार गेलाह, राजाकेँ सम्पूणर्ण वृतान्त सुनोलन्हि । आ’ फेर तखन तान्त्रिकेक सलाहपर एहि खधियाक उत्खननक निर्णय भेल रहैक । ओहिमे महाभारत कालक योद्धासभक शरीरक कोनो हाड़ भेटतैक की से सोचि उ पाँच हजार जन छौ महीनातक एकरा खनिते रहि गेलैक । बहुतो हाड़खोर भेटलैक । सभकेँ गङ्गाजीमे अनुष्ठानपूर्वक प्रवाहित कयल गेल — जेना फुलाक बिर्सजन होइत छैक । तहियासँ ई खधिया उत्खननक कारणेँ एहन बड़का पोखरिक रुपमे परिणत भऽ गेल । किएक तऽ एहिमे बहुतो हाड़खोर भेटल रहैक तैं एकर नाम बादमे हड़ाहा पोखरि भऽ गलैक । ”
अत्यन्त उत्क ण्ठासँ हमर स्वर सुखा गेल छल — “ तखन ? ”
मोदिआइन बाजलि — “ इहए छैक अहि पोखरिक कथा । आब अहाँ खा पी कऽ सुतू । थाकल छी । ”
थाकल तऽ हम ठीके रही । भरि दिनक शहर प्रदक्षिणाक कारणेँ शरीर गलिकय क्लान्त भऽ गेल छल । थकानक कारणेँ बीच–बीचमे आँखि सेहो निन्नसँ मुना जाइत छल, मुदा मलाहिनक कथे एहन छलैक जे बेर–बेर उताहुल आ’ उत्तेजित कऽ दैत छल । ततबेमे सन्याेहो समाप्त कऽ मिसरजी दोकानमे प्रवेश कयलन्हि आ’ मोदिआइनकेँ कहलखिन्ह — “ मोदिआइन, बौआकेँ बढ़ियाँसँ खुआ–पिआकय सुता देबन्हि । हम ओम्ह‍रे खा लेब । राति अबेर कऽ फिरब । दू स्टेयशन आगाँधरि जएबाक अछि । गाड़ी सेहो आबक समय भऽ गेल छैक । तैं हम आब जाइत छी । ”
हम दौड़िकय हुनका लग पहुँच गेलहुँ आ’ जीद्द करय लगलहुँ — “ हमहुँ जायब । ”
मिसरजी एहिबेर कहुना तैयार नहि भेलाह । मोदिआइन सेहो समझओलकि — “ कहाँ जायब थाकल–ठेहिआयल शरीर लऽ कऽ रातिमे । चारि–पाँच घण्टाभमे मिसरजी चलिये अओताह । चलू, खा कऽ सुतू । भाँटाक तरुआ बना दैत छी, दूध आ’ भात खा लियऽ । ”
मिसरजी स्टेरशनदिसि बिदा भऽ गेलाह । मोदिआइन चुल्हिमे बैसिकय भाँटा तड़य लागलि । भितरका कोठरीमे मोदी बैसल खोंखि रहल छल । हम कनेक काल एकसरे चौकीपर बैसल अन्हामरमे डूबल दड़िभङ्गा शहरकेँ देखैत रहलहुँ । बीच–बीचमे सोझे मलाहिन ठाढ़ भऽ जाइत छलि । हम सोचय लगलहुँ अखन रातुक एहि निस्तब्ध अन्हा रमे जे पोखरि हेरायल विलीन अछि तकरे एक कातमे ओ बैसति छलि हएत अही दोकानक घराड़ी लग कतहु उ हम चौकीपर बहुत कालधरि नहि बैसि सकलहुँ । ससरिकय चुल्हिदिसि मोदिआइनलग पहुँचि गेलहुँ । मोदिआइन बाजलि — “ बौआ, भूख लागि गेल ? बैसू उ आब लगचिया गेलैक, कनेक्के देरी अछि । तुरत्ते सभ किछु तैयार भऽ जायत । ”
हम कहलिऐक — “ मोदिआइन, महाभारत कालक लोक कहुँ एतेक दिन तक जिअत ? साँचे रहैक ओ मलाहिन ?”
ओ बाजलि — “ किया नहि जीअत ? प्रेतात्माोक रुपमे जुगजुगान्तरतक जिबैत अछि लोक । अपन प्रियजनसभक लगमे रहय चाहैत अछि । कोनो ने कोनो पिआस, कोनो ने कोनो पूरा होमयसँ बाँकी कामना भीतरी आकांक्षा ओकरासभकेँ अमर जकाँ मृत्यु्लोकमे दृश्य–अदृश्य राखि घुमा रहल रहैत छैक । ”
हम धड़फड़ाकय पुछि बैसलिऐक — “ तऽ अखनो होयतैक ओ मौगी ?”
मोदिआइन तरकारी नीचा उतारैत बाजलि — “ होयतैक उ लिय, अहाँ खाऊ”
ओ उठिकय पीढ़ी अनलकि आ’ हमरा बैसयलेल देलकि । एकदम नया स्थान आ’ परिवेशमे अपरिचितसनक महिलाद्वारा देल गेल दूध, भात, गुड़ आ’ भाँटाक तरुआ खाइत हमरा किछु कोनादन आ’ असहज जकाँ लागल । असगरपन अनुभव भेल । घर मोन पड़ि गेल । माय–बाबु, भाय–बहिन सभ केओ याद आबि गेलथि । अखनतक तऽ सभ केओ खा कऽ सुति रहल होयताह । नहि जानि, मिसरजी कखन घुरताह ? आ’ कत्तहु नहि अयलाह तखन ? हमर मोन घबड़ाय लागल । हमरा सुतय लेल एकगोट कम्म लपर नील रङ्गक चद्दरि मोदिआइन ओछा देने छलि । एकटा मैल तकिया ओहिपर रखैति ओ चौकीये परसँ हमरादिसि तकलकि आ’ बाजलि — “ बौआ, खाउ ने उ किया ने खाइ छी ? जल्दी–जल्दी खाउ । भरिपेट खायब । याऽ देखू, ओछाओन ओछा देलहुँ अछि । अहाँक सुतयलेल ।”
हम जल्दीये खा कऽ उठि गेलहुँ आ’ हाथ धो कऽ ओछाओनपर पड़ि रहलहुँ । मोदिआइन भाडा़–वर्त्तन माँजि आङ्गनमे गोलियाकय राखि देलकि । तकराबाद ओ एकगोट डिबिया लेसिकय चुल्हि लग राखि देलकि आ’ लालटेनकेँ मिझा देलकि । आब ओहिठाम चुल्हि लगक एकगोट धुआँ उगलैत लाल धधड़ाबला डिबियाक क्षीण प्रकाश मात्रहिं रहैक । बाहर निर्जन निस्तब्ध रात्रि आ’ असंख्य कीरासभक तीख महींन आवाज व्या प्तब छलैक । मोेदिआइन एकबेर कोठरीमे चारुभर घुमिकय देखलकि । शायद सभ किछु ओकरा ठीकेठाक लगलैक । ओ बाजलि — “ हँ, तऽ आब सुतू । डर तऽ नहि लागत ने, बौआ ?”
हम भीतरसँ साहस बटोरिकय कहुना मुड़ी हिलबैत कहलिऐक — “ नहि, हमरा डर नहि लागत “
जाइत–जाइत ओ फेर बाजलि — “ हम सटले भीतुरका कोठरीमे छी । जरुरी बुझायत तऽ मोदिआइन कहि कऽ सोर करब । ठीक छ़ै ?”
ओकरा जाइते जेना राति आओर निस्तब्ध भऽ गेल होइक ।
डिबियाक लाल शिखा कखनो–कखनो हिलि जाइक तऽ कोठरीमे सभ किछु — सम्पूीर्ण छाँहसभ सेहो हिलय लगैक । भीतपरक छाँहसभ, ढ़कियाक, मोटरीक, लाठीक, बोराक छाँहसभ कखनो–कखनो दहिन–बाम करैक, हिलोरि मारिकय झुलैक तऽ कखनो एक्के ठाम थर्‌थराय लगैक । डिबियाक बाती कखनो चट–चट कऽ कऽ चरचराइक तथा बातीक मुँहपर कारी गिरह बनि जाइक । खाली धुआँक मोटगर रासि चारुदिसि चढ़ैत उठैत रहैक । धीरे–धीरे हमरा मोनमे डरक सञ्चाबर होमय लागल । एना एकसर हम कहियो नहि सुतल रही । मलाहिनक खिस्सा ओहिना स्पैष्ट– देखाय लागल । हमर हृदय डरसँ काँपय लागल । देहक सभ रोइयाँ काँट जकाँ ठाढ़ भऽ गेल । तखने लागल जेना बाहरक निस्तब्धता भङ्ग भऽ गेलैक आ’ पानिमे केओ छपाकसँ कुदलैक । हमरा बड्ड डर भऽ गेल आ’ हम जोड़सँ चिचिअयलहुँ — “ मिसरजी ऽऽऽ उ”
मोदिआइन भीतरेसँ पुछलकि — “ की भेल, बौआऽऽऽ ़ “
हम कहलिऐक — “ हड़ाहा पोखरिमे केओ छपाकसँ कुदलैक अछि । ”
ओ हमरा अन्ठाेकय सुतक लेल कहैति बाजलि — “ सुतू, सुतू । पानिमे माछ कुदलैक अछि “
मोदी एकभरसँ खोंखि रहल छल । बुझाइत छलैक जेना ओ अखने मरिये जयतैक । मोदिआइन नहि जानि कथी बाजलि आ’ मोदीक छातीपर मालिस करय लागलि । मोदी घेघिआइत बजलैक — “ ओह उ बाप रे उ एहिसँ तऽ मरियो जइतहुँ ऽऽऽ । ”
मोदिआइन कनेक पिताइत कहलकैकि — “ मोदी उ रातिमे ई की अमङ्गल बात बजैत छह । मालिससँ तोरा दम फुुलनाई कम भऽ जयतह । कहुना सुति रहह । ”
कनेक कालक बाद भीतर कोठरीक हलचल शान्त भऽ गेलैक । अन्ततः ओसभ शायद सुति रहल छल । मोदीक साँस भारी आ’ घेघिआइत चलि रहल छलैक । रातुक भयावह निस्तब्धता, डिबियाक प्रकाशक छोट घेराक बाहर चारुतरफकेर अन्हाआर गुजगुज परिवेश, निशाचरी कीरासभक तीख आ’ महींन ध्वानिक गुञ्जरन तथा एम्हेर–ओम्हरर हिलैत, डोलैत आ’ थर–थर करैत छाँहसभ । हम फेर भयभीत होमय लगलहुँ । मस्तिष्कमे बेरि–बेरि उत्पन्न होइत मलाहिनक प्रेतात्माजक कल्प‍नाक चित्रसँ हमर दम फुलय लागल । दिनभरिक बौअइनीक कारणेँ शरीर ओहिना थाकल आ’ मलीन छल, आँखि भारी छल, झपलाइत छलहुँ मुदा डरसँ निन्न भऽ नहि रहल छल । आँखि लगिते कनेक सपना जकाँ देखाइत छल आ’ फेर डरसँ िन्‍ान्न टुटि जाइत छल । जागलोमे आ’ सपनोमे एकहि रङ्गक डराओन आकारसभ आगाँ ठाढ भऽ जाइत छल । हम फेर एकबेर जोड़सँ डेराकऽ चिचियाऽ उठलहुँ — “ मिसरजी ऽऽऽ “
मोदिआइन ‘ की भेल ? की भेल ? ’ कहैत दौड़लि आयलि । मोदी खोंखिते रहय । मोदिआइन बाजलि — “ बौआकेँ डर लागि गेलन्हि । बेचारा उ अच्छाे कोनो बात नहि, हम अहीं लग बैसैति छी । ”
मोदिआइनक हमरालग अबिते हमर डर आब पूरे हेरा गेल छल । निन्न धीरे–धीरे जाँतय लागल छल कि मोदिआइन पुछलकि — “ बौआ, खिस्सा सुनक मोन करैत अछि ? सुनब तऽ सुनाऊ”
हम हुलसिकऽ कहलिऐक — “ सुनाउ ने, मोदिआइन “
मोदिआइन कथा सुनाबय लागलि । जेना कि ओकर आदत रहैक ओ एक्के सुरमे बजैति चलि जाइति छलि । हमरा बुझाय लागल जेना दूरसँ ककरो स्वर लगातार हमर कानमे पड़ि रहल होय । डर हेराऽ गेल छल तैं आब घरक भीतपरक हिलैत–डोलैत छाँहसभ खेल आ’ कौतुक जकाँ लागय लागल छल । दिनभरिक परिश्रम रग–रगमे निन्नक सञ्चायर कऽ रहल छल । हडा़हामे बीच–बीचमे छप–छप सेहोे होइत रहलैक जे हमरा दूरसँ अबैत पृष्ठपभूमिक आवाज जकाँ लगैत रहल । स्टे‍शनपरक भिनसुरका कोलाहल, हुलिमालिक दृश्य, लालदरबार, हथिसार, आ’ शहरक अन्यान्य दृश्यसभ हमर थाकल मस्तिष्कसँ रङ्ग जकाँ धोआइत मलीन्‍ा होबय लागल । बीच–बीचमे हम औंघाइयो जाइत छलहुँ । सपनामे चित्रसभ एकटापर दोसर–तेसर अबैत पड़ैत देखाय लगैत छल । आ’ अही बीचमे मोदिआइन निरन्तर अपन सुरमे हमरा खिस्सा सुना रहलि छलि । ओकर स्वरमे सम्मो–हन छलैक । बिहारिक पश्चात् जेना बर्षाक बुन्नसभ खसैत रमणगर लगैत रहैत छैक ठीक तहिना हमर कानमे ओकर कोमल महीन आवाज टप्टप् कऽ पड़ि रहल छलैक । ओ कहैति गेलि — “ बहुत पहिनेक गप्पत थिक । बहुतो पहिनेक ऽऽ भारतबर्षमे हस्तिनापुर नामक एकगोट बड़ीटा राज्यक राजधानी रहैक । ओतक राजा रहथि धृतराष्ट्रग — बूढ आ’ आन्हर उ आन्हर रहथि तैं गद्दीपर नहि बैसि सकलाह । परिणामस्वरुप राजा बनक प्र्रश्नकपर हुनक बेटा आ’ भातिजसभमे कलह मचि गेलन्हि । धृतराष्ट्ररक रानी गान्धाहरी अत्यन्त पतिव्रता रहथिन्ह । जहिना हुनक पति अपन आँखिसँ विश्वपक सुन्द‍र रचना देखयमे असमर्थ रहथिन्ह तहिना ओहो अपन आँखिक उपयोग नहिये करब उचित बुझलन्हि आ’ तैं सदैवक हेतु अपनोेेे आँखिमे पट्टी बान्हि लेलन्हि । हुनका एक सय बेटा भेलन्हि जे बादमे धृतराष्ट्र क पट्टी कौरव कहायल । जेठकाक नाम रहन्हि दुर्योधन । धृतराष्ट्रआक पाँचटा भातिज । सभसँ जेठ रहथिन्ह युधिष्ठिनर । ई पाँचो भाईँ पाण्डटव कहयलाह । बेटा आ’ भतिजामे राजक लेल कलह बहुत बढ़ि गेलाक कारणेँ धृतराष्ट्र् बूढ़–पुरानसभसँ सरसलाह कऽ भतिजासभक हेतु अलगे राज छुटियाकऽ दोसर राजधानीक बना देलखिन्ह, इन्द्रप्रस्थण “
“ हस्तिनापुरसँ उत्तर–पूूर्व खाण्डहवप्रस्थ् जङ्गलकेँ फाँड़िकऽ इन्द्रप्रस्थ–क स्थापना कयल गेल छल । ओहिसँ पहिने खाण्ड वप्रस्थ क जङ्गलमे विभिन्न जातिसभ अपन–अपन वस्तीणमे निवास करैत छल । ओहीमे बहुतो ठाम आर्य परिवारसभक वस्तीुसभ सेहो रहैक । इन्द्रप्रस्थनक स्थापनामे ई सभ वस्तीतसभ उजड़ि गेल । जङ्गलक आदिवासीसभ तऽ उत्तरभर भीतर आओर घनगर जङ्गलमे चलि गेल मुदा नया नगरक स्थापनासँ खेती–पाती कऽ कऽ बसल परिवारसभ बहुत कठिन परिस्थितिमे फँसि गेल । घरदुआर उजड़ि गेलैक । उजड़ल बेघर परिवारसभमे एकगोट क्षत्रिय परिवार सेहो रहैक । ओहि परिवारमे एकगोट बालिका छलि जकर नाम जकर नाम जकर नाम अच्छाप, राखि लियऽ रहैक नारी उ नारी माने बुझैत छिऐक , बौआ ?”
“ हम किया ने बुझबैक, नारीक अर्थ छिऐक — मौगी “
मोदिआइन बाजलि — “ हँऽऽ , नारी माने हमरे सनक मौगी उ बौआ, अहाँ तऽ बहुतो बुझैत जनैत छिऐक “
बड्ड संतोष भेल । मोदिआइनक प्रशंसा हमरा प्रफुल्लिित कऽ देलक । आँखि निन्नसँ भारी भऽ गेल छल । घरोमे मायसभ सुतय कालमे एहने खिस्सासभ कहैत रहय आ’ सुनिते–सुनिते हम निन्न पड़ि जाइत रही । अखनो हमरा घरे जकाँ नीक लागि रहल छल । जेना हम घरेमे खिस्सा सुनि रहल होइ । साँचे कही तऽ हमरा लागल जेना इएह कथा हमर माय हमरा कहियो सुनोने रहय । हमरामे आऽलादक निसा चढ़ैत चलि गेल, एकगोट अवर्णनीय आनन्दहमे सन्हियाइत चलि गेलहुँ । हम सभ किछु बिसरि गेलहुँ, खाली मोदिआइनक कोमल कण्ठेचटाक आवाज आ’ ओहि आवाजद्वारा चित्रित भऽ रहल कथाक दृश्यसभ मात्रहिं हमर चेतनामे बाँकी रहि गेल ।
“ नारी तहिया एकगोट छोटि नग्निआका बालिका छलि । इन्द्रप्रस्थ केँ राजधानी बनाबयलेल असंख्यम लोकसभ ओतय आबय लगलैक । भीड़ बढ़य लगलैक । रातिदिन एक कऽ काज आगाँ बढ़ैत गेलैक । धीरे–धीरे नम्हकर–नम्हेर विशाल भवनसभ ठाढ़ होमय लागल । फुलवारी–वाटिकासभ लगाओल सजाओल गेल । मूर्त्तिकारसभ सुन्द्र आ’ नीक–नीक आकर्षक मूर्त्तिसभ गढ़ि–गढ़ि कऽ विभिन्न स्थानसभपर ठाढ़ कयलन्हि । इन्द्रप्रस्थगक शोभा आ’ सुन्दररता इन्द्रपुरीकेँ सेहो मात करय लागल । नव निर्मित नगरमे नव–नव वस्त्रापभूषणधारीसभ आबिकय रहय लगलाह । गान–बाजानसँ नगर बजार रमणीय भऽ गेल । बहुतो हाथी, घोड़ा, सजल–बजल बड़का–बड़का रथसभ आयल । अस्त्रय–शस्र्ाजसँ सुसज्जित वीर रक्षकीसभ सेहो आयलि । बालिका नारी विस्मिसत भए आँखि फारि–फारिकय एहि सभ विराट परिवर्त्तनकेँ निहारति रहलि । सड़कपर नाङ्गटि कुदैति, अपनेसनक अन्य बाल–बालिकासभक हुलिमे एतएसँ ओतय दौड़ैति नयाँ–नयाँ चमत्कािरिक दृश्यसभक ओ अवलोकन करैति गिेल । मुदा ओकर माय–बापक स्थिति किछु भिन्न रहैक । ओसभ अत्यन्त दुखित रहथि । घर–घराड़ी सभ किछुक हरण भऽ गेल छलन्हि । नगर स्थापनाक क्रममे बहुतो लोक जन–मजूरीमे लागि गेल रहय आ’ कतेक दोसर पेशाकेँ अङ्गीकार कऽ नेने रहय । बहुतो महिलासभ गणिका वृतिमे चलि गेलि छलि ़ पेट तऽ कहुना येनकेन प्रकारेण पोसा जाइत रहैक मुदा अपन स्वतन्त्रन खेती–पातीमे लागि आयल ओतक पूर्वनिवासी खेतिहर वृतिबलासभ अत्यन्त दुखित आ’ क्षुब्ध छल । तथापि नियतिकेँ स्वी‍कारब छोड़ि दोसर कोनो उपाय बाँकी नहि रहैक ।
एक दिन अभूतपूर्व शोभा–सिन्दूधरक आयोजन भेलैक आ’ पाण्डडवसभ नगरमे प्रवेश कयलथि । ओही दिन ओसभ गृहप्रवेश सेहो कयलन्हि उ बड्ड हुलि, बड्ड लोक — बड्ड विशाल आयोजन रहैक उ अनेकन् यज्ञ भेल, ब्राऽमण आ’ पुरोहितसभ उच्चह कण्ठरसँ वेदक पाठ कयलन्हि ़ अस्त्र –शस्त्र क प्रदर्शन भेलैक । उपस्थित सैनिक आ’ नागरिकलोकनि पाडण्वओसभक जयजयकार कयलखिन्ह । यज्ञ–धूमसँ आच्छा्दित आकाश बड़ी कालधरि जयध्वतनिसँ प्रकम्पिउत होइत रहल । बालिका नारी अत्यन्त कौतुकमय भऽ उत्सुजकतासँ एहि सम्पूकर्ण आयोजन आ’ प्रदर्शनक अवलोकन कएलकि । ओ देखलकि जे पाण्डथवसभ अत्यन्त सुन्दनर रहथि आ’ द्रौपदीक रुपक वर्णन तऽ सम्भूवे नहि छल । ओहुना हरेक घरमे पहिनहिंसँ एकर चर्चा रहैक । बालिका नारी छलि तऽ बड्ड छोटि मुदा तैयो ओ भाँपि गेलि जे पाँच प्रतापी युद्ध–कुशल पुरुष–रत्नँसभक सिम्ा्ब लित प्रेमपात्री हएबाक कारणेँ द्रौेपदीक नाक, भृकुटि आ’ ग्रीवा गर्वसँ चढ़लि छलैक ।
पाण्ड वसभ इन्द्रप्रस्थदसँ दिनानुदिन अपन विस्ताएर होइत बढ़ैत राज्यपर शासन करय लगलाह । इन्द्रप्रस्था धीरे–धीरे एकगोट राजधानीक अपेक्षित गति धऽ लेलक । ओतक नागरिकसभ अपन–अपन वृति आ’ काजमे लागि गेल । नहुँए–नहुँए नगरक नूतनता समाप्त‍ होमय लगलैक । विस्थापित भऽ गेल परिवारसभ सेहो एक–एक कऽ अपनाकेँ स्थापित करैत स्थायी नागरिकक रुपमे परिणत होइत गेल । ओहोसभ क्रमशः पूर्ण रुपेण नागरिकताक नव स्वरुपकेँ ग्रहण करय लागल छल । नारी बालिकासँ नम्हनर होइत गेलि । डाँड़मे डराडोरि लऽ कऽ वस्त्र खण्डि बान्हय लागलि ।
एम्होर हस्तिनापुरक दुयोर्धनक दरबार आ’ इन्द्रप्र्रस्थिक युधिष्ठि रक दरबारमे भीतरे–भीतर नित्यप्रति प्रतिस्प–र्धा बढ़िते चलि गेलैक । दुयोर्धनकेँ पाण्ड्वक उन्नति असह्य होमय लगलन्हि ़ ओम्ह्र पाण्डथव सेहो प्रतिरक्षाक तैयारीमे जुटि गेलाह । दुनूूमे युद्धे तऽ शुरु नहि भऽ गेलैक मुदा सामरिक तैयारीसभ होमय लागल ़ हस्तिनापुर आ’ इन्द्रप्रस्थडक बीचमे एकप्रकारसँ शीतयुद्धक वातावरण बनि गेलैक । देखाबयलेल उपरसँ दुनू औपचारिकतामे नीके सम्बहन्धन रखने रहथि । दुनू परिवार सामाजिक एवम् धार्मिक अनुष्ठानसभ पारिवारिक रुपमे सम्मिपलित भऽ कऽ सम्प न्न करथि मुदा तरेतर दिनानुदिन बैर–भाव बढ़िते गेलन्हि । दुनू दिसक बूढ़–पुरानसभ एकरा शान्त करक अनेकन् प्रयत्नल कयलथि मुदा सफल केओ नहि भऽ सकलाह ।

(अगिला अंकमे)
उपन्यास- चमेली रानी
जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर।
चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
पुजारीजीक जबाब सुनि दरोगा अइँठल मोछ केँ औरो अइँठलक, फेर अपनासंग आयल सिपाही केँ ताकीत केलक–”कृपलबा! तुम सावधानी से इन दो लोगन पर नजर रख। हम अंदर चेकीन करता हूँ।”
दरोगा मंदिरक पाछाँ बनल खोपरी दिस बिदा भेल। कृपलबा नामक सिपाही ससरि क’ पुजारीजी लग आयल। पुजारीजीक आगाँ थार मे राखल पेड़ा पर ओकर आँखि जेना गरि गेलैक। ओ ओहीठाम बैसि रहल, बाजल–”ई सरौं, अपनो मरिहें औरो हमरो जान खतम करिहें। पुजारी बाबा, थार मे की बा? बड़ा गम गम करेला।”
पुजारीजी स्वामी दिस ताकैत छलाह। दुनू केँ आँखिक भाषा मे गप भ’ रहल छल। सिपाहीक प्रश्न सुनि पुजारीजी हड़बड़ाइत पटिया पर बैसि गेलाह आ कहलनि–”परसाद थिकै सिपाहीजी। भोग लगाउ।”
पुजारी जी दूटा पेड़ा कृपलबा नामक सिपाहीक हाथ मे राखि देलथिन आ कान केँ दरोगाक गतिविधि पर पथने चुप भ’ रहलाह। हुनक माथ पर चिन्ताक सिकुरन स्पष्ट झलकै छल।
दरोगा पहिले दुनू खोपड़ी केँ बाहर घुमि जाँच-पड़ताल केलक। मूड़ि नमरा क’ चारू कातक हाव-भाव के निहारलक। फेर आयल ओहि कोठलीक दरबजा लग जाहि मे काके आ मैना छलीह।
दरोगा सटायल केबाड़ केँ भराम दए खोलि भीतर ढुकि गेल। अन्दर काके आ मैना कोन अवस्था मे छलीह, दरोगा की देखलक से दरोगा जानए। मुदा, दरोगा चिचियाति आ बफारि कटैत बाहर आयल आओर पलटनिया दैत पुजारीजी लग पहुँच गेल। हँफैत बाजल–”हे पुजारी बाबा, ई मंदिर बानु? ई भगवान का फ्लेट बानु? अन्दर कोन खेल होत बा। हम जे देखली, राम राम, आब अहाँ से का कहीं। हमार त’ नजरिए झौआ गेल बा।”
गर्मी आ उमस पराकाष्ठा पर छलै। दरोगाक शरीर मोट आ भारी-भरकम। ओ काके आ मैनाबला कोठली सँ भगैत आयल छल। ओकर सम्पूर्ण देह पसीना सँ लथपथ छलै।
पुजारीजी फेर हाथ जोड़ैत बजला–”सरकार, कोठली मे हमर बालक आ हुनकर कनिआँ। हमर बालक बिआहो ने करैत छल। कतेक परतारने त’ अहि बेर शुद्धक समय मे दिल्ली सँ एलाह। हुनकर बिआहक त’ दसो दिन ने भेलनि। कहू त’ अहाँ की कर’ भीतर गेलौं? छिया, छिया।”
–”अरे, हमनी का करब? हमनी के ड~यूटी बड़ा बेढंगा बा।” कहैत दरोगाबैसक उपक्रम कर’ लागल। ओ पहिने एक हाथ रोपलनि, फेर दोसर हाथ रोपि, देहक बैलेन्स ठीक केलनि। तखन लूद द’ बैसि गेलाह।
पुजारीजी अन्दाज केलनि जे दरोगाक वजन तीन, साढ़े तीन मन सँ कम नहि हेतैक।
कृपलबा दुनू पेड़ा केँ मुँह मे ठुसि नेने छल। पेड़ाक साइज बेस पैघ छलै। ओ कहुना क’ पेड़ा घोंटबाक प्रयास क’ रहल छल।
दरोगा पटिया पर बसैत देरी पेड़ाबला थार केँ दुनू आँंखिये निहार’ लागल। ओ बाजल–”पेड़ा बानु?”
–”हँ सरकार! अहीं सभहक लेल बाबाक परसाद थिक। भोग लगबियौ।”
कहैत पुजारीजी पेड़ाक थार घुसका क’ दरोगाक आगाँ मे क’ देलथिन।
–”सुगन्धी त’ बड़ा नीमन बा। गाय का दूध मे बनल ह’ तो?”
–”हँ सरकार! सामने देखिऔक मुसहर टोली। सदाय भाइ सभ महादेवक भक्त। सभहक दूरा पर मुलतानी गाय। तखन दूधक कौन कमी। खाक’ देखल जाए।”
दरोगा एकटा पेड़ा मुँह मे देलक–”वाह! वाह!! पुजारीबाबा। सबाद बड़ा अच्छा बा। बहुत दिनन के बाद अइसन पेड़ा खाई के मौका मिललबा।”
दरोगा थारक सभटा पेड़ा उदरस्त क’ लेलक। पेड़ा मे पुष्ट सँ नवका भांग मिलाओल रहैक। पुजारीक देल पानि सेहो दरोगा पीब गेल। तखने पुजारीजी पुछलथिन–”हाकिम, ई नट-नटिन बला की मजरा थिकै?”
दरोगा पहिने पूरा मुँह बाबि ढेकार केलक। फेर बाजल–”आब रौआ से का छिपायब। वायरलेस पर अरजेन्ट खबरि आयल बा। ओ नट-नटिन बड़का डकैत। कोनो मारवाड़ी के लाखो टाका का जेबर गहना लेके भागल बा। सोंचली, सरौं के पकड़ब त’ आधा माल डकार जायब, आधा माल जमा करब। के सार बुझिहेंए? बहुत दिन हो गेइल, कोनो बड़का माल हाथ नहिखे आईलबा।”
पुजारीजी मोने-मोन बजला–‘बस एक घड़ी आओर। भांग जखन भिजतौक तखन नट-नटिन केँ तकिहेंए रे सार।’
दरोगाक माथ सुन्द होबए लगलै। ओ डपोरशंख जकाँ चुपे एककात देख’ लागल। किछु काल पहिले काके आ मैनाबला दृश्य ओकर मानस पटल पर थिड़क’ लागल। ओकरा अपन बियाहक गप मोन पड़’ लगलै। जखन ओ पहिल बेर अपन कनिआँक मुँह देखलक–कारी, उठल आ मोटका थूथून। Åपरका दाँत निचला ठोरकेँ छपने, डिग्गासन पितरिया आँखि। ओकरा जिनगी सँ विरक्त भ’ गेलैक। ओ संन्यास लेबा लेल तैयार भ’ गेल।
मुदा, एखन जे दृश्य देखलक। वाह! छौकड़ी राधा रानी त’ छौकड़ा किसन-कन्हैया। मन केँ हर्षित क’ देलक।
रंग त’ अनलक नवका भांग। किछुए कालक बाद भिसिण्ड तोंदबला दरोगा पटिया पर चित पड़ल नाक सँ डिगडिगिया बजा रहल छल। थोड़बे हटल कृपलबा बीड़ी मुँह मे दबने बेहोश पड़ल, मोंछ के चिबा रहल छल।
ई सब कार्य पूर्ण अनुशासित आ पटुताक संग होशियार व्यक्तिक देख-रेख मे भ’ रहल छल। कनेक आओर सांझ जकाँ भेलै त’ कतहु सँ पाँच युवक आ पाँच युवती, कुल दस, कमरियाबला पिअरका वस्त्रा पहिरने कामर केँ कन्हा पर उठौने आयल। आगन्तुक युवक-युवतीक उमेर काके आ मैनाबला छलै। सब तहिना चुस्त-दुरुस्त आ शांत।
तुरंते पुजारीजी, स्वामीजी, काके एवं मैना कमरियाबला ड्रेस मे आ कामर केँ उठौने तैयार होइत गेलाह। डालरबला दुनू बोरा केँ छोट-छोट मोटरी बना क’ सब कमरियाक कामौर मे लटका देल गेलै। सब वस्तु ल’ क’ कमरिया टोली मे जोर सँ हुंकार देलक पाछाँ कमरियाक टोली ओहि मंदिर सँ प्रस्थान केलक। मंदिर मे रहि गेला फोंफ कटैत दरोगा आ टिटहीबसंत सिपाही कृपलबा।
कमरियाक टोली भरि राति चलैत रहल। टोलीक नेतृत्व केनिहार आ पुजारी बनल अमृतलाल। अमृतलाल जाहि जाति या संप्रदायक प्रतिनिधित्व करै छल ओ पुस्त दर पुस्त सँ चोरि विद्या मे पारगंत होइ छल। अमृतलाल भुखन सिंहक खास पियादा रहए। ओ चतुर आ भुखन सिंहक विश्वासी मातहत छल। कठिन अवसर पर भुखन सिंह अमृतलाल केँ खास किस्मक काज करक लेल नियुक्त करै छलाह। प्रस्तुत अभियान मे अमृतलाल अपन निपुणताक सहज परिचय द’ रहल छल।
अमृतलाल केँ ओहि इलाकाक पूर्ण ज्ञान छलैक। ताहि कारणे कमरियाक टोली कोनो गाँव वा शहर मे प्रवेश नहि केलक। बाघ-बोन, गाछी-बिरछी, मरचरही, धारक कछेर होइत भोरहवा मे निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचल। ओतए सभ तरहक इन्तजाम छलैक। भरि दिनक विश्रामक बाद कमरियाक टोली फेर दोसर राति अमृतलालक नेतृत्व मे चलैत रहल आ भोर होइत चमेलीरानीक अड्डा पर पहँुचि गेल।
स्वामीजी सभटा डालर सुरक्षित अर्जुन केँ सुपुर्द क’ चमेलीरानी सँ भेंटकरबाक उद्देश्य सँ बिदा भेलाह। रस्ते मे हुनका चमेलीरानी सँ भेंट भ’ गेलनि।
चमेलीरानी झुकिक’ दुनू हाथ जोड़ि स्वामीजी केँ प्रणाम केलनि आ कहलनि–”बज्जर काका, ददू अहाँ के अबिलम्ब बजौलनि अछि।”
ददू अर्थात~ भुखन सिंह, चमेलीरानीक धर्म-पिता। स्वामीजी अर्थात~ बज्जर कका भुखन सिंहक दाहिना हाथ। चमेलीरानीक आग्रह पर भुखन सिंह ठाकुर नांगटनाथ सिंह नामक अभियान मे बजz नाथ केँ पठौने छलाह।
चमेलीरानी बज्जर कका केँ बड़ आदर करैत छलि। सदिखन हिन्दी आ अँग्रेजी बाजैवाली चमेलीरानी भुखन सिंह, बज्जर कका एवं औरो पैघ हस्ती लग मैथिलीए टा बजैत छलीह। चमेलीरानीक व्यवहार मे नम्रता आ कोमलता बज्जर कका केँ बड़ सोहाइत छलनि।
बज्जर कका चमेलीरानीक प्रणामक प्रतिउत्तर मे हाथ उठा क’ आशीर्वाद देलनि आ कहलनि–”काके आ मैनाक संग काज करबा मे नीक लागल। फेर कहिओ हुनका संगे कोनो अभियान मे जेबा मे हमरा प्रसन्दता होयत। सब ठीक बिटिया, हम अबिलम्ब बिदा भ’ रहल छी।”
बज्जर ककाक प्रस्थानक बाद चमेलीरानी ओतए पहुँचली जतए काके आ मैना कमरियाबला ड्रेस मे चुपचाप मूड़ी गारने बैसल छलीह। किछु दिन पूर्व हुनका दुनू संगे बड़ पैघ अत्याचार भेल छलनि तकर वृत्तांत सेहो सुनि ली।
ठाकुर नांगटनाथ सिंहक अभियानक पहिने चमेलीरानीक संसार मे बहुत किछु परिवर्तन भेल छलै। पछिला ट्रेन डकैतीक बाद हुनक जे अर्जुन संगे वार्तालाप भेल छलै से हमरा ज्ञात अछि। तकर बादे चमेलीरानी खास किस्मक निर्णय लेलनि। ओ अर्जुन सँ विवाह केलनि। बिआहक अवसर पर कीर्तमुखक पाँचो बेटा उपस्थित छल। ओहि पाँचोंक समक्ष चमेलीरानी अपन योजनाक स्पष्टीकरण केलनि। सभहक विचार मे मेल-मिलाप भेलै। सब मिलि क’ सभहक सहयोगे कार्य करबाक हेतु तत्पर होइत गेलाह।
कलकत्ता आ मदzास सँ दूटा स्पेशल जपानी ट्रेनर केँ आनल गेल। अहि ट्रेनर केँ पैघ तनखाह आ सब तरहक सुविधा उपलब्ध कराओल गेल। आधुनिक युगक सब आधुनिक उपकरण आनल गेलै। खास स्थान पर ओइ दुनू जपानी ट्रेनरक देख-रेख मे अत्यधिक कठिन आ परिश्रमबला ट्रेनिंग आरंभ भेलै। ट्रेनिंग लेनिहार छल कीर्तमुखक पाँचो बेटा आ चमेलीरानी। ट्रेनिंग छह मास तक चलल। पाँचो भाइ अर्थात~ युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुलवा आ सहदेवा संगे चमेलीरानी अपनशरीर एवं मनक पूर्ण तैयारी केलनि जे अगिला योजना केँ क्रियान्वित करबा लेल जरूरी छलै।
अही छह मासक भीतरे पाँच सुरक्षित स्थानक चयन भेल। प्रत्येक स्थान मे दू बीघा जमीन कीनल गेल। फेर ओकर तैयारी कएल गेलै। करीब एक सय छात्रा-छात्राा केँ रहबाक लेल अलग-अलग हाWस्टल, व्यायामशाला, सुन्दर मैदान इत्यादिक संगे भवन पाँचों ट्रेनिंग कैम्प केँ लेल बनाओल गेल। पाँचो ट्रेनिंग कैम्प केँ नवीनतम उपकरणक संगे कम्प्यूटरीकरण कयल गेल। सम्पूर्ण प्रान्त मे चोरि, डकैती, रंगबाजी, अपहरण, गुटबाजी आदिक गृह-उद्योग पसरल छल। अत: पाँचो ट्रेनिंग सेन्टरक हेतु पाँच सय युवक-युवती केँ ताकए मे कोनो अरचन नहि भेलै। युवक-युवतीक चयन मे अति सावधानी राखल गेलै। सबहक उमेर चौदह सँ बीस वर्षक अन्दरे रहै तकर ध्यान राखल गेल।
आब ओहि पाँचो कैम्पक उद्देश्य, कार्यक्रम आ अपन प्रान्तक लेल समर्पण इत्यादिक बखान आगाँ कयल जायत। सम्प्रति काके अर्थात~ सहदेवा एवं मैनाक संग भेल अत्याचार केँ स्पष्ट करी।
सहदेवा जाहि कैम्पक इनचार्ज छल ओहि मे मैना ट्रेनिंग ल’ रहल छलीह। ओही ठाम दुनू केँ नैन-मटक्का भेलै। एकर सूचना तत्काल चमेलीरानी केँ देल गेल।
चमेलीरानी अबिलम्ब दुनूक बियाहक तिथि निश्चित केलनि। फलाँ तारीख क’ सहदेव वल्द कीर्तमुख निवासी मिरचैयाक मैना वल्द बेनाम निवासी अनामकक बियाह होयत। सभ केँ हकार, सभ केँ स्वागत।
पैघ मंडप बनल। सजाबट, खेबा-पिबाक नीक इन्तजाम, पाँच सयक लगभग गेस्ट। बियाह भेल। सहदेव आ मैना सभकेँ प्रणाम करैत आ आशीर्वादक मोटरी उठबैत कोहबर दिस प्रस्थान केनहिए छल कि नांगटनाथ बला योजनाक सूचना आयल–”सूटकेस बैंकाक से चलने वाला है।”
योजना मास पूर्वे बनि चुकल छलै। ओहि मे सहदेव केँ काके बनि क’ तथा मैना केँ भाग लेबाक छलैक। अस्तु, कोहबर मे जेबा लेल तैयार ओ दुनू बज्जरकका संग निर्मली पहुँच गेल। भेलै ने अत्याचार?
चमेलीरानीक इशारा पाबि सहदेव आ मैना हुनक सोझा मे आबि ठार भ’ गेल। हे भगवान! अब कोन हुकुमनामा चमेलीरानी सुनौती से नहि जानि।
चमेलीरानीक ठोर पर मृदुल हँसी। ओ हुकुम देलखिन–”अहाँ दुनू हमर कोठली मे जाउ। ओतए सब किछुक इन्तजाम छै। एक मास धरि अहाँ दुनू ओहिकोठली मे निवास करी से हमर आदेश।”
सहदेव चुपे रहला। मुदा, मैना दबले मगर देखार, खिखिया उठली। ओ दुनू चमेलीक स्पेशल कक्ष मे प्रवेश केलनि।

(अगिला अंकमे)
डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।
कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
मैथिली भाषाक साहित्य२
मैथिली भाषाक अधिकांश साहितय मानक मैथिली मे उपलब्ध३ अछि जकरा ‘साहित्यिक भाषा’, ‘साधुभाषा अथवा शिष्टा भाषा’ सेहो कहल जाइत अछि। अधिकांश समयधरि ई एकमात्र साहित्यिक अभिव्य’क्ति क भाषा छन जाहि आधार पर एकरा ‘मानक मैथिली’ कहल जाइत अछि। ई दरभंगा आमघुबनी जिला मे बाजल जाइत अछि। ‘दक्षिणी मानक मैथिली’ समस्तीइपुर, बेगूसराय, खगडिया, सहरसा, मेधपुरा आ सुपौल जिला आदि मे बाजल जाइत अछि। एहि मे मानक मैथिली सँ किछु अन्तमर अछि। पूर्वी मैथिली पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, करिहार आदि जिला क केन्द्रीनय आर पश्चिमी भाग मे अशिक्षित वर्ग सभ मे चलैत अछि तथा महानन्दाा सँ पूव सेहो हिन्दू लोकति बजैत छथि जतय मुसलमान मुख्य त: बाडव्लाा बजैत अछि। छिकाछिकी बोली गंगाक दक्षिण भाग मे बाजल जाइत अछि। एहि मे खगडिया आ बेगूसराय जिला क पूर्वी भाग, बॉंका जिलाक पश्चिम भाग केँ छोडि क’ संथाल परगनाक उत्तजरी आ पश्चिमी भाग मे बाजल जाइत अछि। पश्चिमी मैथिली मुजफफरपुर, पूर्वी चम्पा’रण आ पश्चिमी चाचारण जिलाक पूर्वी भाग मे बाजल जाइछ। चम्पा।रण आ उत्तलर मुजफफरपुर क बोली भोजपुरी सँ प्रभावित अछि। जोलही बोली दरभंगा जिलाक अधिकांश इस्‍लाम धर्मविलम्बीफ अपन पडोसी हिन्दूप क भाषा मैथिली बजैत अछि, मुदा ओकर बोली थोडे क विकृत आर अरबी-फारसी शब्दीऍं ूिज्ञित रहैत अछि।
वर्तमान समय मे मैथिलीक दू उपभाषाक नव नामकरण आ नवजागरण भेल अछि जाहि मे प्रथम थिक अंगिका अद्वितीय थिक बज्जिका। अंगिका भाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पूर्वी मैथिली कहल अछि आ डा. सरजार्ज अब्राहम ग्रियर्सन छिकाछीकी गॅवारी कहलनि।एकर क्षेत्र भागलपुर, गोडा आ देवधर तथा संथाल परगना मानल जाइत अछि। बज्जिका ओहि उपभाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पश्चिमी मैथिली कहलहुँ अछि। ई नामकरण बज्जी। आलिच्छिवी क इतिहास क आधार पर कयल गेल अछि, किन्तु आधुनिक परिप्रेक्ष्यन मे एहि जातिक नामनिशान नहि भेटैत अछि।
मैथिली व्याककरणक अपन निजी विशेषता अछि। एकर विशिष्टआताक प्रसंग मे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ‘लिग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया (खण्ड -5, भाग-2) (1902), ‘एन इण्ट्रोगडक्शलन टू द मैथिली लैंग्वे ज ऑफ नौश विहार (1800) तथा ‘सेभन ग्रामर्स ऑफ द डायलेक्ट्से एण्डस सब डायलेक्टय ऑफ द विहारी लैंग्वेकज (1883) मे विस्ता रपूर्वक विचार क’ ई प्रमाणित क’ देलनि अछि जे ई विश्ष्टिता अन्य भारतीय भाषादि मे नहि उपलब्धस भ’ रहल अछि। मैथिली व्याककरण मे सर्वनामक तीन रूप प्रयुक्मज होइत अछि-‘अपने’, ‘अहॉं’ आ ‘तों’ वा मोरा, मुदा बाडव्लाय मे दू ‘आपनी’ आ ‘भूमि’ वा ‘तुइ’ आ हिन्दी मे सेहो दूइए रूप प्रयुक्तग होइत अछि ‘आप’ आ ‘तुम’। मात्र भषा-शास्त्रमक दृष्टिऍं सँ नहि, प्रत्युफत व्या‘करण आ शब्दा वलीक विभन्न ताहि आ विशेषतादि कारणेँ नहि, अन्य‘ भाषा-भाषी लोकतिक द्वारा सरलता सँ बुझबाक कारणेँ नहि, प्रतयुत अपन एक स्वेतन्त्रि साहित्यिक आ सांस्कृातिक परम्पीरा हैबाक कारणेँ मैथिली भाषाक स्व तन्त्रत अस्तित्व‘ अछि। मैथिली भाषा आ व्यााकरणक सम्ब न्धस मे अनेक कार्य भेल अछि। ओहुना संस्कृथत आ अंग्रेजी व्या्करणक आधार मानिक’ मैथिली मे छोट-पैध अनेक व्या करण लिखल गेल अछि, मुदा महावैयाकरण दीनबन्धु् झा (1878-1955) क ‘मिथिला भाषा विद्योतन’ (1945) क ऐतिहासिक महत्वव अछि जकरा सूत्र-शैली मे ओ लिख लनि जे संस्कृ त-प्राकृतक श्रेष्ठय व्याककरणादि सँ तुलना कयल जा सकैछ। एहि व्या करण केँ आधार मानिक’ गोविन्दल झा (1923) ‘लघुविद्योतन’ (1963) आ ‘उच्चजतर मैथिली व्यासकरण’ (1979) क रचना कयलनि। हिनक अन्यं कृति मे ‘मैथिलीक उद्गम ओ विकास’ (1968) आ ‘मैथिली भाषा’ (1909-2000) ‘द फारमेशन ऑफ मैथिली लैग्वे ज (1960) सर्वाधिक उल्ले6खनीय कार्य कयलनि अदछ।
अन्यल स्वितन्त्रा साहित्यिक भाषाक समान मैथिली भाषाक अपन स्वकतन्त्रस प्राचीन लिपि थिक जकरा ‘तिरहुता’ वा ‘मिथिलाक्षर’ वा मैथिलाक्षर’ वा ‘मैथिली लिपि’ कहल जाइत अछि। तिरहुता नाससँ ज्ञात होडत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक अछि जकर विकास ‘तीरमुक्तस’ वा ‘तिर्हुत’ नामक व्यजवहार हैबाक बाद पूर्णत: प्राप्तफ कयल गेल अछि। बौद्ध ग्रन्थत ‘ललित-विस्तमर’ मे एहि लिपि केँ ‘वैदेही लिपि’ क नाम पर अभिहिस कयल गेल अछि। घुमा क’ लिखनिहार पूर्वी वर्णमाला साक्षात बाडव्लीत असमिया, मैथिली आ ओडिया लिपिक स्रोत थिक। वस्तुुत: मिथिलांचल मे उपलब्धा प्राचीन संस्कृलत ग्रन्थि एही लिपि मे उपलब्ध अछि जकरा बाडव्लास, असमिया आ ओडियाक पण्डित लोकति केँ पढबा मे सुविधा होइत छवि। पटना सँ प्रकाशित ‘मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास’ (1960-61) मे अनेक किस्मक मे एहि लिपिक तात्विक अघ्यियन प्रस्तुोत कयलनि, किन्तुफ दुर्योग रहल जे पुज्ञतकाकार प्रकाशित नहि भ’ सकल। एहि दिशा मे राजेश्वमर झा (1923-1977) ‘मिथिरलाक्षरक उद्भव आ विकास (1971) लिखिक’ एकर ऐतिहाकिसकता, प्राचीनता, शास्त्री यता प्रमाणित कयलनि अछि जे भाषा-पैश्राानिक दृष्टिसँ एकर सर्वातिशायी महत्व थिक। उनैसम शमाब्दी(क मल्य,चरि ई लिपि जीवित छल, मुदा वर्तमान सन्दषर्भ मे एकरा लोक बिसरि गेल अछि आ ओकरा स्थैन पर देवनागरी लिपि व्यिवहार कयल जाय लागल अछि।
मैथिली साहित्यह क इतिहासकार लोकति एकरा सामान्यएत: तीन काल आदिकाल, मघ्यिकाल आ आधुनिककाल मे विभक्तह क’ अघ्यएयन कयलनि अछि। किन्तु ओंकर समय सीमाक निर्धारण से इतिहासकार लोकति मे मनैक्य क सर्वथा अभाव अछि। इतिहास-लेखनक आधार-भूत प्रक्रियाकेँ घ्याीन मे रासिक’ एकरा निम्नास्थव काल खण्ड् मे विभाजित करब श्रेयस्कसर प्रतीत होइत अछि:
i. आदिकाल 800 ई. सँ 1350 ई. धरि।
ii. मघ्याकाल 1351 ई. सँ 1857 ई. धरि।
iii. आधुनिक काल
i. ब्रिटिशकाल 1857 ई. सँ 1947 ई. धरि।
ii. स्वाटतन्त्र योत्त.र काल 1947 सँ अर्द्यपर्यन्ता।
सन् 1857 ई. का सिपाही विद्रोहक पश्चा त् मैथिली साहितय मे आधुनिक कालक सूत्रपात मानल जा सकैछ। ई विशाल मुगल साम्राज्याक अन्तिम वर्ष थिक। मुगल शासनक अवसानोपरान्तम ब्रिटिश शासन काल मे जाहि सामाजिक चेतनाक उदय भेल ओहि मे सन् 1857 ई. पश्चापत् क्षिप्रताअबैत अछि। एहि सामाजिक चेतनाक प्रतिनिधित्वन नवीन शिक्षित बुद्धि जीवी वर्ग कयलक ले एक भाग अपन प्राचीन संस्कृपति क सुरक्षाक प्रति उत्सुिकतिा देखौलक आ दोसर भाग युग क आलोकक स्वा्गत कयलक। एहि सांस्कृ तिक अनुष्ठाकन मे भारतीय भाषादिक विकास भेल आ ओकर साहित्या सम्पकन्न‍ आ समृद्ध होइत अछि।
पश्चिमी शिक्षक प्रचार, रेल-तारक व्य‍वहार, रचायत शासनक व्यकवस्था मुद्रण कलाक आविष्काेर आ सामाजिक चेतनाक प्रभाव साहित्यभ पर पडल आ ओ स्ढत परम्पनरादिकेॅा तोडि क’ नव दिशाक दिस चलि पडल। मैथिली साहित्यपक इतिहास मे नव-युगक निर्माण मे कमीश्पहर चन्दाा झा (1831-1907) आ पण्डित लालदास (1856-19) अवदान सर्वाधिक महत्व-पूर्ण अछि। हुनक राजनीतिक.सामाजिक रचनादिक आधार पर अनुमान कयल जा सकैछ जे सन् 1857 ई. क पश्चारत् परिवर्तित परिस्थितिक सहल प्रक्रिया छल। वस्तु त: चन्दा झा आ लालदास मैथिली साहितय मे नवयुग अनबा मे समर्थ भेलहि। अपन गद् रचनादि द्वारा ओ लोकति आधुनिकता क द्वार खोललनि। फेर जहिना-जहिना मिथिलान्चरल से नव आलोक पसरल साहितय सेहो नव-नूतन किसलयक संग पल्ललवित भेल।
सर्वप्रथम तँ ओ रहस्यलवादी गीत एवं कवितादिक थिक जकर अन्वे‍षण नेपाल मे तथा प्रकाशन बंगाल मे भेल। एकर रचयिता सिद्ध लोकति छथि। एहि सिद्ध लोकतिक सम्ब न्ध‍ बौद्ध लोकतिक महायान शाखाऍं छलनि। एहि रचना-संग्रहक नाम ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ देल गेल अछि। सन् 1323 बंगाब्दन अर्थात् सन् 1916 ई. मे महामहोपाघ्यादय डा. हरप्रसाद शास्त्री (1853-1931) सर्वप्रथम एकर प्रकाशन करौने छलाह। एहि मे संग्रहीत कविता सभक भाषा अति प्राचीन अछि मथा एहि मे ओ विशेषता दि अछि जे बाडव्ला्. मैथिली, मगाही आदि पूर्वीय भषादि मे अछि। एहि कारणसँ एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे रारबल जाइत अछि। एहि कारण सॅा एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे राखल जाइत अछि। वस्तु त: ई कवितादि तहिया लिखल गेल जखन आधुनिक पूर्वीय भाषादि अपन प्रारम्भिक अवस्था: मे छल। भाषा वैज्ञानिक लोकति एहि विषय मे एकमत छथि। अत: एहि कवितादिक भाषा पूर्वीय अथवा मागधी अपभं्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्त अछि। तथापि ई स्वा्भाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्वस उपलबध अछि जे मागधी अपभ्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्तत अछि। तथापि ई स्वामभाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्वि उपलब्धस अछि जे मागधी अपभ्रंश सँ विकसित वर्तमान भाषादि मे सेहो पाओल जाइत अछि। एकरा संगहि ई मानबाक लेल प्रचुर साधन अछि। ई संग्रह प्राचीन मैथिलीक रूप थिक। एकर रचयिता अधिकांश मिथिलाक निवासी रहल हैताह।
बौद्ध गान ओ दोहा मे तीन न्रकारक साहित्यर उपलब्ध भ’ ीहल आछि, जकरा मैथिलीक प्रारम्भिक रूप कहल जा सर्कैछ। ओ अछि: दोहा कोश, चर्चाचर्च विनिश्च य आ डाकार्णव। एकर स्वईचिता बौद्ध सिद्ध आ तान्त्रिक रहथि। हिनक भाषा मिभिलाक पूर्वी भागक प्राचीन रूप थिक। एहि सामग्री आदिक आधार पर एकर रचयिता लोकतिक समय आठम शताब्दीक सँ तेरहस शताब्दीर धरि निश्च्य कयल जाइत अछि। विषयक दृष्टि सँ एहि रचनादिक ओतेक महत्वब नहि जतेक की भाषाक दृष्टिऍं अछि। एकर भाषा एहन अछि जकरा आधार पर एकरा मैथिली, बाडव्लात, असमिया, हिन्दीा, मगही आ भोजपुरी आदि प्रत्येरक भाषा-भाषी अपन सम्परत्ति घोषित करैत छथि। एहि समय भारतीय आर्य भाषा निर्माणक स्थिति मे छल। इएह कारण अछि जे भाषा-वैज्ञानिक लोकति एहि रचना-समूह मे भारतीय पूर्वान्चतलक सभ भाषादिक रूप भेटैत अछि। संगहि-संग ई मानबाक लेल सेहो प्रचुर साधन अछि जे एहि संग्रह केँ प्रधानत: मैथिलीक रूप थिक। ज्योअतिरीश्व र (1280-1340) वर्णरत्ना्कर (1940) मे एकर सम्पूचर्ण नामावली द’ देलनि अछि। पूर्वीय भाषादि मे सर्वप्रथम मैथिलीक प्रयोग गम्भीतर साहित्य क रूप मे कयल गेल छल। बाडव्लाै आ आसमी मे तँ साहित्यि-रचनाक प्रयास एक शताब्दीम पाछॉं जा क’ प्रारम्भय भेल तथा एकरा लेल मैथिलीक महान कवि विद्यापति प्रेरक सिद्ध भेलहि। एकर अतिरिक्त प्राचीन अप्रपभं्रश मे कविता लिखबाक परम्प रा मात्र मिथिला मे छल आ ई परम्प्रा चौदह म शताब्दीत धरि चलैत रहस। विद्यापति अपन दू पुस्तकक-‘कीर्तिलता’ (1924) आ ‘कीर्तिपताका (1960) तथा अनेक छोट कवितादिक रचना मे कयलनि जे देश्यप-मिश्रित अपभ्रंश शिला ‘प्राकृत पैडालम’ टीकाकर वंशीधर एहि मे संगृहीत अपभ्रंश कवितादिक भाषाकेँ अवहट् कहलनि। डा. सुभद्र झा एकरा आदिकालीन मैथिली कहलनि। ओ लिखैत छथि. ‘प्राकृत पैड;लम मे उदाहरण स्वररूप अनेक शब्द2 एवं पद देल गेल अछि जकरा विषय मे कहल जा ाकैछ जे ओ प्राक् मैथिली मे रचित थिक ओहि मे एहन किछु नहि अछि जकरा आदिकालीन मैथिली कहबासँ वंचित क’ सकी।‘ राधाकृष्णि चौधरी (1924-1984) ‘मिथिलाक सांस्कृ तिक इतिहास’(1961) क परिशिष्टी-ग मे प्राकृत पैडलम मे व्यपवहृत 115 शब्दाादिक सूची देलनि अछि तथा एहरा आदिकालीन मैथिलीक ग्रन्थ1 मानलनि अछि। तथापि एहि प्राचीन भाषाक विषय मे सुनिश्चित एवं अन्तिम रूपसँ विचार करब आवश्यकक अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यए मे एकरा प्राक् मैथिली मानव तर्क संगत अछि।
दोसर प्रकारक साहित्य1 जे उपलब्धप भ’ रहल अछि ओ थिक ‘डाकवचनाबली’। एहि वचनाबली मे स्थाानीय लोक प्रसिद्ध विज्ञाता, ज्यो तिष एवं कृषि सम्बेन्धी वचन, जीवन आ विविध विषयक समालोचना भेरैत अछि। ई जनसामान्यध मे प्रचलित अछि तथा एकर विस्तावर आसामसॅ ल’ कए राजस्थारन धरि सम्पूआर्ण आर्यवर्त मे विस्तृमत अछि। एकर रचयिताक सम्बतन्ध् मे विद्वान लोकति मे मतैक्या नहि अछि तथा अनेक जनश्रुति आदि प्रचलित अछि। देशक भिन्नर भिन्ना भाग सब मे एकर रचयिता लोकतिक भिन्नय-भिन्न नाम अछि। मिथिला मे डाक, घाघ, भण्डनरी एवं डंक आदि प्रचलित आदि। एम्ह र आबिक’ देशक विभिन्नि भागसॅ एहि वचनावलीक कतिपय संग्रह प्रकाया मे आयल अछि, परन्तुं एहि मे सँ कोनो, कोनो प्राचीन हस्तिलिखित प्रति पर आधारित नहि भ’ कए ओहि भू-भाग मे प्रचलित अनेक मौखिक रूप पर अछि। एकर फलस्विरूप प्रत्येतक संस्कररणक भाषा आधुनिक भ’ गेल अछि। मैथिलीक हेतु ई सौभाग्यपक बात थिक जे डाकक नाम पर प्रचलित अनेक वचन मैथिल विद्वान द्वारा रचित ज्योैतिषक प्राचीन ग्रन्थापदि मे उद्घृत अछि। जाहि मे किछु तँ चौदहम-पन्द्ररहम शताब्दीिक थिक। एहि उद्धरणादिक भाषा अत्यकन्त् प्राचीन अछि तथा ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ क भाषासँ साम्यश रखैत अछि। ओना तँ मिथिला सँ जे वचनाबली प्रकाशित भेल अछि ओकर भाषा आधुनिकताक छाप नेने अछि। मात्रमिथिला आचार्यगण कोनो महान आचार्यक वचन सदृश प्रमाणक हेतु डाक वचनादि केँ जे उद्घृत कयलनि अछि ओहिसँ ओकर मैथिल उद्भव आ प्राचीनता सिद्ध होइत अछि। अत: ई कहब पूर्णत: संगत सिद्ध होइत अछि जे डाक मैथिल रहथि आ हुनक लोक प्रसिद्ध सारबी आदिक भाषा प्राचीन मैथिलीथिक। कालान्तछर मे ई सम्पूैर्ण भारत मे प्रचलित भ’ गेल तथा अपन मौखिक परम्प्रा मे नूतन रूप धारण क लेलक अछि।
मात्र डाके एहन व्य क्ति नहि रहथि जे एहि प्रकारक लोक प्रसिद्ध वर्णनक रचना प्राचीन मैथिली मे कयलनि। एतबा तँ निश्चित अछि जे सबसँ विख्यारत इएह छथि। सप्त रत्नाणकरकर्ता महामहोपाहसाय चण्डेलश्वूर अपन ‘कृतचिन्तािमणि’ नामक ज्योएतिष निबन्धतक प्रशानग्रन्थह मे अवहद्ध भाषाक अनेक पद म्रमाण रूप मे उदृत कयलनि अछि, जकरा क्षपणक जातक भृगुसंहिंता तथा कापलिक जातक प्रभृत ग्रन्थनसँ उदृत कहलनि अछि। यद्यपि ई ग्रन्थ आब अनुपलब्धभ अछि, अतएंव ई नियिचत रूप सँ नहि कहल जा सकैछ जे उक्ति ग्रन्थद ओही भाषा मे लिखल गेल अथवा ओहि मे कतहु सँ अदृत कयल गेल अंछि। परन्तुई डाकवचनावली क रचनाक समानहि ई सब सेहो जनसाधारण केँ प्रभावित करबाक लेल विद्वान लोकति हुनके भाषाक आश्रय लैत रहथि आ चाण्डे श्वरर सदृश विद्वान् सेहो प्रमाण स्वारूप ओंकरा उदृत करबा मे कनेको कुण्ठित नहि भेलाह।
तेसर प्रकारक जे साहित्यज उपलब्धद अछि ओ लोक प्रसिद्ध आख्यातन आ गीतक थिक। एहि मे किछु तँ साहित्यिक थिक। गोपीचन्दशक गीत एही श्रेणी मे अबैत अछि। ई गीत ओही समयक थिक जाहि समयक डाकक वचन थिक। ई गीत भीखमॉंगनिहारक एक वर्ग द्वारा गाओल जाइत अछि जकरा गुदरिया गोसांईक नाम देल गेल अछि। एहि गीतक अतिरिक्तए लोरिक, सलइेस. बिहुला, मरािया आदिक गीत कथादि एही वर्गक थिक। ई सभ रचनादि प्राचीन कालक थिक। एहि कथादिक विशेषता ईहो अछि जे एकर कथानायक कोनो अवतारी देवता वा अंशी पुरूष नहि छथि। डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन एकर संकलनक प्रयास कयने रहथि। युग-युगसँ ई जनकण्ठि मे पीढी-दर-पीढी गुंजित होइत आवि रहल अछि। एकर भाषाक परिशुद्धता क विषय मे कयों दावा नहि क’ सकैछ। अपन मौखिक परम्पगरा सँ एकर भाषा मे निश्चित रूपेण परिवर्तन भेल हैत। एहि रचनाहि केँ देखि क’ ई स्पकष्टख प्रमाण भेटैत अछि जे मैथिली अपभ्रंश भाषाकेँ लोकप्रिय रचनाक लेल प्रयोग करबाक परम्प रा मात्र उपयोगी साहित्यखक लेल नहि, प्रत्युभत मनोरंजनक लेल सेशे-मिथिला मे पूर्व भारतीय अपभ्रंश भाषाक आरम्भिक स्थिति मे जकर समय भाषा वैज्ञाानिक एक हजार ई. निधारित करैत छथि।
डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन सर्व प्रथम एहन गीतादि केँ ‘इण्डियन एण्टीकक्वेरटी’ खण्डल-10 मे प्रकाशित करौलनि। एकर अतिरिक्ता ‘समबिहारी फोक सॉंग्स ’ (1884), ‘टू भरसन्सल ऑफ द सांग्सक आफ गोपी चन्दक’ (जे. ए. एस. बी. खण्ड‍ 54, भाग-1 अर ‘द वर्थ आफ लोरिक’ (कैम्ब्रिज 1929) आदि मे प्रकाशित अछिणे उल्लेेखनीय अछि। एम्हतर आबि क’ लोकगीतक कतिपय संग्रह प्रकाश मे आयल अछि जाहिसॅा एकर विकास मे गति आयल अछि। मिथिलान्चमलक विभिन्नथ जनपद मे मैथिलीक करीब तीस लोक नाट्यक प्रस्तुरति इस देखल अछि जाहि मे लोक जीवनक स्वामभाविक अभिव्यनक्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्यिक त्रिवेणी प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक जीवनक स्वाछभाविक अभिव्य क्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्यजक त्रिवेणी प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक-जीवनक सार-गर्वित भावसँ सम्पतन्ने, तत्काृलीन युग क प्रवृतिक मनोरंजकता प्रदान करबाक हेतु नव-नव आयामक व्यरवस्था कयलक। कालन्तयर मे इएह साहित्यिक विधादिक रूप मे विकसित भेल। विविध मांगलिक अवसर जेना व्रत-त्यौ-हार, धार्मिक, सांस्कृ्तिक लोकोतसव इत्यािदिक विशेष परिस्थिति मे विभिन्नव प्रक्रियादि सँ उद्भूत सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृातिक आ साहित्यिक चेतनाक परिणाम थिक मैथिली लाक-नाट्य।
मिथिला और मैथिली साहित्यसक ऐतिहासिक ग्रन्थों के अवगाहन सँ ज्ञान होइछ जे मिथिला पर अनेक राजवंश शासन कयलक जाहि मे तीन राजवंश क शासक लोकति मे कर्णाट राजवंश (1097-1324), ओइनवार राजवंश (1353-1526) आ खण्डट वला राजवंश (1556-1947) प्रमुख छथि। कर्णाटवंशीय राजा लोकतिक छत्र-छाया मे मैथिली साहित्यिक साहित्यआकार लोकति केँ प्रोत्‍साहन भेटबाक प्रक्रिया प्रारम्भ भेल। ज्यो तिरीश्वार ठाकुर एही राजवंशक छठम राजा महाराज हरिसिंह देवर (1443-1444) क सभासद रहथि। ओइनवार वंशक शासनकाल मे मैथिली साहित्यरक विकास अत्यडन्तत दुतगतिऍं भेल, कारण एहि राजवंशक राजा लोकति केँ साहित्यलक प्रति अधिक अभिरूचि छलनि जकर फलस्व रूप साहित्ये मनीषी लोकतिकेँ कतेक राजा लोकति प्रोत्सातहित कयलनि जाहि मे उल्ले खनीय छथि कवीश्वँर चन्दाे झा आ महाकविलास दास आ साहित्यि रत्नािकर मुंशी रघुनन्दमनदास (1860-1945)। ई साहित्यप मनीषी लोकतिक रचनादि मे सर्वथा आधुनिकताक शुभारम्भर होइत अछि।
सर्व प्रथम प्रामाणिम पुस्तिक जे खॉटी मैथिली मे अछि आ थिक ज्योितिरीश्व र ठाकुरक ‘वर्णरत्नाककर’ आ ‘धूर्तसमागम’ (1960)। ई दुनू पुस्त क चौदहम शताब्दी‍क आरम्भ मे लिखल गेल छल। वर्णरत्नािकरक विषय मे सन् 1901 ई. मे बंगाल एशि।यारिक सोसायटीक सचिव केँ महामहोपाघ्याकय डा. हरप्रसाद शास्त्री सूचना देने रहथि। प्रथमे प्रथम एकर प्रकाशन डा. सुनीतिकुमार चटर्जी (1890-1977) आ पण्डित बबुआजी मिश्र क संयुक्त। सम्पा दक ख मे एकर प्रकाशन भेल छल। अपन रिपोर्ट मे महामहोपाघ्यामय डा. हरप्रसाद शास्त्री कहने रहथि, ‘ई ग्रन्थ काव्यश नहि, काव्योोपयोगी ग्रन्थम कहि सकैत छी। यदि ज्यो्तिरीश्वरर वास्त्व मे इच्छारपूर्वक काव्यग ग्रन्थथ लिखितथि तँ एकर स्वटरूप आन रूपक रहैत, मुदा वर्णनक अवसर पाबि ग्रन्थयकारक सहज कवित्व प्राय: नहि मानलक आ लाख रोकनहु पर सेहो कस्तु‍री मोदक समान प्रकटभ’ गेल। स्थ ल-स्थ लक वर्णनकेँ देखिक’ कादम्बखरी प्रभृति संस्कृवत गद्य-काव्य क स्मलरण भ’ जाइत अछि। एहि प्रकाश्क उन्न त गद्य-साहित्यण केँ देखिक’ अनुमान होइत अछि जे एहि सँ चारि-पॉंच शताब्दी‍ पूर्व मिथिला भाषा मे नियचये साहित्यत रचना प्रारम्भे भ’ गेल छल। अनेक अनुच्छिट उपमादिक संग्रह. भाषा-उपभाषाक उल्लेिख द्वारा भाषा-विज्ञान सम्ब‍न्धीर अनेक सामग्री, ओहि समयक सामाजिक तथा साहित्यिक विचारक भण्डाीर, ओहि समयक वर्णन-शैली इतयादि विशेषताक विशद रूप एहि ग्रन्थ, मे उपलब्धम अछि।
प्रतिपाद्य गद्य ग्रन्थि भावी कवि आ कत्थ क लोकतिक क हेतु एकपथ प्रदर्शक ग्रन्थच बनायब छल जेना जँ नायकक वर्णन करबाक होतॅ कोन-कोन विषयक उल्लेथख करब उचित, जँ नायिका वर्णन करबाक होतँ कोन-कोन विषयक निरूपण करब आवश्यशक अछि। ई ग्रन्थ् सातकल्लोिल मे विभाजित अछि जेना नगस्व र्णन, नायिका वर्णन, आस्था न वर्णन, ऋतु-वर्णन, प्रयानक वर्णन, भट्टादि वर्णन आ श्म्शान वर्णन। सबसँ महम्व क बातईथिक जे ई पुस्तरक गद्य मे अछि तथा उत्तथर भारतक कोनो भाषा साहित्या मे एतेक प्राचीन ग्रन्थन नहि भेहैत अछि। जखन दोसर-दोसर प्रान्तथ अपन भाव प्रकाशनक लेल कोनो साहित्यिक माघ्येमक अभाव मे अन्धतकार मे टापर-टोइया द’ रहल छल, तखन मैथिली एक पूर्ण भाषा क रूप मे विकसित भ’ गेल छल जाहि सँ समाजक स्वमरूप केँ प्रकट कयल जाय सकय। ई कोनो लोकप्रिय भाषाक प्रधान विशेषता है। वर्णरतनाकर एकर सटीक उदाहरण थिक।
ज्योरतिरीश्वदरक दोसर रचना संस्कृकत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाटक थिक ‘धूर्त समागम’ । ई नाटक जतय मैथिली कविता आ नाटकीय परम्प राक द्योतक थिक, ओतहितत्काधलीन समाजक चित्र अंकित कयलनि अछि जनिक चातु:शालक चारू भाग कतहु महींस बान्हकल अछि, कतहु बाछा-बाछीक संगपुष्टत थन्वाट ली गाच एम्हजर-ओम्हूर जा रहल अछि, कतहु दासी सुन्दकर भवनक प्रागंण मे मन्दन-मन्द‍ गति सँ अवगार्हन क’ रहल अछि।
वर्णरत्नाचकर आ धूर्तसमागम क रचना नोकभाषाक आलोकमय भविष्युक सूचक छल। भाषा-साहितयक एहि अभ्युतदय आ विकासक कोनो साहित्यिक प्रेरणाक परिणाम नहि कहल जा सकैछ, प्रत्यु त ई तँ साहित्यिक जडवाद सँ असन्तुयष्ट जनताक स्वाेभाविक प्रवृतिक प्रकाशन छल। भाषा मे फूटैत कवि-प्रतिभा जरमन राजा लोकति केॅा चमत्कृआत कयलक तखन हुनक संरक्षण एवं प्रोत्साकहनक फलस्वनरूप भाषा-काव्यतक विकास भेल। ई विकास एहि बातकद्योतक जे लोक भाषा केँ साहित्यिक गौरव सॅ विशेष अवधि धरि वंचित नहि कयल जा सकैछ। जे सामान्यो जनमानसक व्यािपक भाषा बनिगेल ओहि मे व्यिवहारोपसोगी एवं ललित दुनू प्रकारक साहित्यिक सृष्टि अवश्य हैत। मैथिली साहित्याक इतिहासक इतिहासक अवलोकन कयला सँ एकर स्पवष्टू बोध होइछ। वस्तुित: ज्योीतिरीश्पकरक रचनादि मैथिली गंगाक ‘हरद्वार’ थिक जतय ओ लोक भाषाक सामान्यँ धरातल पर उतरि क’ पूर्ण वेग सँ प्रवाहित होमच लागल एकर पश्चाचत् उमापति उपाघ्या्य सर्वाधिक लोकप्रिय नाटककार भेलाह जनिक ‘पारिजातहरण’नाटकऍं असमक शंकरदेव (1499-1568) आत्याधिक प्रभावित भेलाह।
मैथिली साहित्यज केँ ई सौभाग्यह अछि जे ओइनवार वंशक शासनकाल मे एक एहन प्रतिभासम्प्न्न‍ व्याक्तित्व क प्रादुर्भाव भेल जनिक काव्यईप्रतिभा अमर भ’ गेल आ ओ मात्र मिथिला धरि सीमित नहि रहल ; प्रत्युकत पूर्वान्चाल मे बंगाल, आसाम आ ओडिसा धरि ख्याेति अर्जित कयलक आ समस्तह भारतवर्ष मे लोकप्रियता अर्जित कयलनि ओ रहथि विद्यापति। हिनक ग्थ्न्ामक विषय-वैविघ्य केँ देखला सँ ज्ञात होइत अछि जे ओ केवल कविए नहि, प्रत्युहत सर्वतोमुखी प्रतिभासँ समलंकृत सच्चिन्त्क रहथि। ओ एकहि संग शास्त्रतकार, राजनीति-विशारद, इतिहासकार, भूवृतान्तक लेखक, अर्थशास्त्रा विद्, नीतिशास्त्रन विचक्षण, धर्म-व्यूवस्थािपक, निबन्ध-कार, शिक्षक, कथाकार, संगीतज्ञ आपुरूषार्थ पुजारी रहथि। ई निम्नतस्थन संस्कृतत ग्रन्थानदिक रचना कयलनि यथा- भूपरिक्रमण (1976), शैवसर्वस्वचसार (1815), लिखनावली (1969), दुर्भाभक्तिरडि;णी (1902), शैवसर्वस्वकसार (1980), शैव सर्वस्वञसार पुराण-भूतसंग्रह (1981), गंगावाक्याावली (अप्रकाशित), संस्कृ0त-प्राकृत-मैथिली मिश्रित रचनादि मे त्रिभाषिक नाटक गोरक्षविजय (1960) आ मणिमन्ज9री (1966) आ अवहटट् रचनादि मे कीर्तिलता (1924) एवं कीर्तिपताका (1960) थिक । विशुद्ध मैथिली मे ई पदावलीक रचना कयलनि जकर उपलब्धतताक स्रोत थिक नेपाल, मिथिलाम्पकलक अन्तजर्गत रामभद्रपुर, तरौनी एवं राग तरडि;णी आ बंगालक अन्तधर्गत क्षणदा गीत चिन्ता्मणि, पदामृतसमुद्र, पदकल्पुतरू, कीर्तनालल्दृ आ संकीर्तनामृत तथा लोककण्ठअक पद। एहि पदक संख्याच एक हजार पॉंच सयक लगधक अछि। यद्यपि हिलक अधिरकांश रचनादि प्रकाश मे आबि गेल अछि तथापि गंगावाक्याकवली, गयापतलक आ वर्षकृत्यल पुस्तअकाकार प्रकाशन नहि भ’ पाओल अछि। ई पीडा दायक स्थिति अछि जे हिनक रचनादि एतेक लोकप्रिस मेल तथापि हिलक समग्र रचनादिक प्रकाशन ग्रन्थापवली वा रचनावलीक रूप मे अद्यापि प्रकाशित नहि भ’ पाओल अछि।

वस्तुअत: एहन प्रतिभासम्पान्नी महाकविक कृतिकेँ घ्या्न मे राखि अद्यापि साहित्यु चिन्तकक लोकति जतेक अपुसन्धा‍न आ आलोचना प्रज्ञतुत कयलनि अछि ओकरा एकांगी कहल जा सर्केछ ले ओ पुरूषार्थ कवि रहथि जे अपन कृति आदि मे कोनो-ने-कोना रूप सॅ ‘पुरूषार्थचतुष्ट य’क प्रतिपादण कयलनि अछि। हिनक सम्पूलर्ण कृतिक मुख्य उद्देश्य् अछि पौरूष। विद्यापति अपन कृति सभ मे मानवक उदारता, वीरता, धीरता, साहसिकता, निर्भीकता, स्पौष्टतता, कर्तव्य्परायणता, बुद्धि आ ज्ञानवर्द्धक सभ साधन पर बल देलनि अछि जे सामाजिक आ सांस्कृेतिक वातावरणक निर्माण मे समान रूपसँ सहयोग प्रदान क’ समय। जाहि मानव मे पर्युक्तआ गुणक अभाव अछि जे हुनका दृष्टि मे अयलनि तकर ओ अपहास कयलनि। पुरूषार्थ चतुष्टसय क दृष्टिएँ हिनक समग्र कृति हिनक नवोन्सेनषशालिनी प्रतिभाक विपुल-वैठुण्य्क परिचय दैत अछि। लोक मे स्वध-धर्म आ राष्ट्रस-धर्म क सुरक्षा क भावना ओ संचारित आ ओकरा पल्ल्वित पुष्पित करय चाहैत रहथि। अपन समग्र पदावली मे ओ अतीव मृदुलता, जनजीवन मे सुसुप्त मधुर-भाव केँ जगयबाक क्षमता मिथिलाक जनमानस मे अभिहिंत हैबाक कारणेँ ई सर्वाधिक लोकप्रिय भेल।

विद्यापति अपन साहित्या-साधनाक माघ्यि मे मैथिली-साहित्य भंडार केॅा भरबाक लेल अनेक विधा करचनाकयलनि। हिनक एक-एक रचना मैथिलीक अमूल्य -निधि थिक जाहि मे एक भाग श्रंृखगारिकताक आभास भेटैछ तँ दोसर भाग भक्तिक, मुदाविद्यापतिक समग्र कृति पर जखन प्रत्येक्ष रूप सॅ विचार करैत छी तखन स्पटष्टा भ’ जाइठ जे भारतीय-चिन्तपन-धारासँ प्रभावित भ’ कए ओ पुरूषार्थ-चतुष्टअयक उदेदश्यचसँ समग्र रचनादि कयते रहथि।

एहि प्रकारेँ विद्यापति मैथिली-साहित्या मे जे परम्प राक शुभारम्भा कयलनि ओकरा परवर्ती कवि लोकति अपनाक’ रचना कयलनि। विद्यापतिक समसायिक उवं यपरवर्ती कविलो‍कति एहि साहित्य्क बहुमूल्यष सेवा कयलनि। हिनक समसामयिक कवि लोकति मे भवानीनाथ (1375-1450), अमृतकर (1450-1500), चन्द्र कला (1400-1475), कंसनारायण (1475-1528), गोविन्द0 कवि (1450-1530), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), नवकवि यशोधर (1500-1550), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), सदानन्दक 1550), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्या1म सुन्द4र (1500), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्या)म सुन्दभर (1500), हरिदास (1609-1950), गंगाधर (1600) श्रीनिवास मल्लग (1640) इत्या5दि उल्लेषखनीय छथि।
(अगिला अंकमे जारी)

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

Friday, April 03, 2009

कुंडलिया- आशीष अनचिन्हार

कुंडलिया
बाप मरल अन्हार मे पूतक नाम पावर-हाउस
नोर-माँड़ पिबए माए कनिञा खाए माउस
कनिञा खाए माउस ताहि पर दही चाहबे करी
बिनु सेब-समतोलाक वज्र खसए हरहरी
कह अनचिन्हार कविराय कनिञा चंडीक अंश
भुखले नहि रखथिन्ह त बढ़तैन्ह कोना वंश

Thursday, April 02, 2009

हमर प्रेम- कृष्णमोहन झा


हमर ठोरक पपड़ी पर जे एकटा मर्म सुखा रहल अछि
हमर जिह्वा पर जे धूरा उड़ि रहल अछि
हमर सोनितक धार सँ जे धधरा उठि रहल अछि
हमर देहक शंख सँ जे समुद्रक आवाज आबि रहल अछि
हमर आत्माक अंतरिक्ष मे जे चिड़ै-चुनमुनी कलरव क’ रहल अछि
हमर स्मृतिक गाछ पर जे झिमिर-झिमिर बरखा भ’ रहल अछि
तकरा सभक चोट आ खोंच केँ
टीस आ मोंच केँ
रूप आ रंग केँ
स्वर आ गंध केँ
कोना पानक एकटा बीड़ा बनाक’
हम अहाँक आगू राखि दी आ कही-
लिअ’ ग्रहण करू
ई थिक अहाँक प्रति हमर प्रेम…

जखन कि हमरा बूझलए
जे हमर प्रेम
गुड़ियाम मे बान्हल एक टा पियासल बरद अछि
जे खाली बाल्टी केँ देखि-देखिक’ भरि राति हुकरैत अछि

हमर प्रेम अछि
छिट्टा सँ झाँपल एक टा छागर
जे बन्द दुनिया सँ बहरयबाक बेर-बेर चेष्टा करैत अछि

हमर प्रेम धूरा-गर्दा मे जनमल एक टा टुग्गर चिलका अछि
जे दीने-देखार हेरा गेल अछि
बीच बाजार मे

तखन अहीं कहू
कोना हम अपन आत्माक फोका केँ
एक टा मृदुल भंगिमाक संग अहाँक सम्मुख तस्तरी मे राखि दी
आ कही-
लिअ’ ग्रहण करू…

हमर प्रेम जँ किछु अछि तँ एक टा फूजल केबाड़
हमर प्रेम जँ किछु अछि तँ एक टा कातर पुकार
कि आउ
अइ दुनियाक सभ सँ कोमल आ सभ सँ धरगर चीज बनिक’
आबि जाउ

अहाँक स्वागत मे
हमरा ठोर सँ ल’क’ अहाँक ओसार धरि जे ओछाओल अछि
ओ कोनो कालीन नहि
अहाँक तरबा लेल व्यग्र
खून सँ छलछ्ल करैत हमर ह्रदय अछि

आ हमर हड्डीक प्राचीन अंधकार मे
ओसक एक टा बुन्न सन कोमल
अनेक युग सँ अहाँक बाट ताकि रहल अछि हमर प्राण…

हमर प्राण अछि अहाँक आघात लेल आतुर
अहाँक आघात एहि जीवनक एक मात्र त्राण


1.नहि सोभैया रंगदारी-2.हे नेता जी अहाँ के प्रणाम: दयाकान्त

1.नहि सोभैया रंगदारी

अहॉं विदेहक छी संतान
राखु याज्ञवल्क्यक मान
नहि बिसरू मंडन, ंअयाची
वाचस्पति, विद्यापति केर नाम
गौरब-गाथा सॅ पूर्ण धरा पर
नहि करू एकरा संग गद्दारी
नहि सोभौया रंगदारी

हमर ज्ञान संस्कृतिक चर्चा
हाई छल जग में सदिखन
छल षिक्षाक केन्द्र बनल
पसरल नहि षिक्षाक किरण जखन
आई ठाड़ छी निम्न पॉंतिमें
नहि करू षिक्षाक व्यपारी
नहि सोभौया रंगदारी

कियो बनल स्वर्णक पक्षघर
किया बनल अवर्णक नेता
आपस में सब ‘ाडयंत्र रचिके
एक-दोसराक संग लड़ेता
अहॉं सॅ मिथिला तंग भ गेल
छोरू आब जातिक ठीकेदारी
नहि सोभौया रंगदारी

बाढिंक मारल रौदीक झमारल
जनता के आब कतेक ठकब
गाम-घर सब छोरी परायल
अहॉ आब ककरा लुटब
भलमानुश किछु डटल गाम में
नहि फुकु घर में चिंगारी
नहि सोभौया रंगदारी

आबो जागु आबो चेतु
कहिया धरि अहॉं सुतल रहब
देखु दुनियॉ चांद पर चली गेल
अहॉं आबों कहिया उठब
अहीं सनक भायक खातिर
कनैत छथि वैदेही बेचारी
नहि सोभौया रंगदारी


2.हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

एक बेर नहि  सत्त-सत्त बेर
करैत छी अहाँ के नित्य प्रणाम
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

दू अक्षर सँ बनल ई नेता
देशक बनल अछि भाग्यविधाता
आई-काल्हि ओहा अछि नेता
जकरा लग अछि गुंडाक ठेका
जाल-फरेब फुसि में माहिर
घोटाला में सतत प्रधान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

खादी कुरता नीलक छीटका
मुंह में चबेता हरदम पान
मौजा ऊपर नागरा जूता
उज्जर गमछा सोभय कान्ह
जखन देखू चोर-उच्चका
भरल रहै छैन सतत दलान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

केने छैथ ई भीष्म प्रतिज्ञा
झूठ छोडि  नहिं बाजब सत्य
हाथी दांतक प्रयोग कय के
मुंह पर बजता सबटा पद्य
कल-बल-छल के वल पर सदिखन
जीत लैत छैथ अप्पन मतदान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

गाम विकाशक परम विरोधक
होबय नहि देता एकोटा काज
बान्ह-धूर स्कूल  पाई सँ
बनबैत छैथ ओ अप्पन ताज
स्त्री शिक्षाक जँ बात करू तँ
मुईन लैत छैथ अप्पन कान
हे नेता जी अहाँ के प्रणाम

कविता- भूतःवर्तमानःभविष्य- आशीष अनचिन्हार

कविता
भूतःवर्तमानःभविष्य

अकबर के जोधाबाइक संग
विआह करबाक लेल परामर्श के देने रहैक
भूत बाजि ने रहल


रोमिला थापरक तर्क संपूर्ण रुपे सत्त
नागेश ओकक फूसि
लोक के गोधरे किएक देखाइत छैक
कश्मीरी पंडित आ राजौरी किएक नहि
वर्तमान नहि बाजि रहल


तुष्टीकरण के
कहिआ धरि भारत मे
धर्मनिरपेक्षता मानल जेतैक
भविष्य बाजि ने रहल

Wednesday, April 01, 2009

समीक्षा श्रृंखला-३ गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोशपर- उदय नारायण सिंह "नचिकेता"

जखन सैमुअल जॉनसनक अ डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिश लैंगुएज (१७५५) प्रकाशित भेल तखन जाऽ कऽ अंग्रेजी विद्वान आ विद्यार्थीकेँ यथार्थमे अपन भाषामे एकटा विश्वसनीय आ परिष्कृत कोश भेटलन्हि। अंग्रेजीक अधिकांश पहिलुका प्रयास गंभीरतासँ रहित छल। १६०४ ई.क रॉबर्ट काउड्रेक कोश जकर नाम अ टेबल अल्फाबेटिकल आ कतेक आन कृति आ तकर अनुकरण केनिहार आन कृति सभ ओहि मानदण्डक अनुरूप नहि छल जे शेष यूरोपमे कोश निर्माणक परम्पराक अनुरूप होअए। मुदा पहिलुका द्विभाषी कोश सभ जाहिमे विदेशज फ्रेंच, इटालवी वा लैटिन शब्द सभ अंग्रेजीमे परिभाषाक संग सम्मिलित छल एहि सभसँ नीक छल आ ताहिमे १५९२क रिचर्ड मुलकास्टरक ग्लॉसरी एकर एकटा उदाहरणक रूपमे राखल जा सकैत अछि। ई सभ तखनहु अरबी कोश सभक समकक्ष नहि छल जे ८म् आ १४म शताब्दीक बीचमे संग्रहित भेल विशेषतः सामान्य काजक लेल रचित कोश सभ जेना लिसान अल अरब (तेरहम शताब्दी)।

अंग्रेजी जेना एकरा हम आइ देखैत छी, भाषाक वैश्विक इतिहासमे एकटा सापेक्षतया नूतन घटना अछि संभवतः मैथिलीसँ किछुए पुरान। ई एहि लेल किएक तँ जखन मैथिलीक सभसँ पुरान उपलब्ध ग्रन्थ ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखल जा रहल छल ओ समय रहए अंग्रेजीमे चौसरक। पाश्चात्य कोशमे सभसँ पुरान कोश तखुनका अक्कादी साम्राज्यमे रचित भेल जाहिमे सुमेरी-अक्कादी शब्द सूची रहए (आधुनिक सीरियाक एबलामे प्राप्त) आ एकर समय छल लगभग २३०० ई.पू.। मुदा सभसँ प्राचीन ग्रीक कोश एपोलोनियश द सोफिस्ट प्रथम स्शताब्दीक, ई होमरयुगीन शब्दपरिभाषा आ अर्थ सूचीबद्ध करैत अछि आ एकटा उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। द्वितीय सहस्राब्दी ई.पू. उर्रा= हुबुल्लु शब्दार्थसूची जे एहने द्विभाषी शब्द सूचीक संग पुरान कोशीय लेखाक उदाहरण एकटा आर उदाहरण अछि जेकर तुलना तेसर शताब्दीक चीनी परम्परे सँ कएल जा सकैत अछि। प्रारम्भिक जापानी प्रयास ६८२ ई.क चीनी अक्षरक नीना ग्लॉसरी आ सभसँ पुरान उपलब्ध जापानी कोश तेनरेइ बान्शो मैगी (८३५ ई.) सेहो महत्त्वपूर्ण प्रयास छल। भारतमे वैदिक साहित्यक संरक्षण व्याकरण आ कोशीय रचनाक लेल सभसँ पैघ उत्प्रेरक छल। संस्कृतक पाणिनीय आ दोसर वैयाकरणिक परम्परामे ई एकटा सामान्य आ पूर्णतः आधारभूत कार्य रहए- वैदिक वाक्यकेँ शब्दमे खण्ड-खण्ड करब आ शब्दकेँ खण्ड करब धातु-प्रत्ययगघतकमे। एहि क्रममे शाब्दिक संरचना, भाषायी ध्वनि तन्त्रक संग संरचनात्मक-ध्वन्यात्मक सिद्धांत सभ सेहो विकसित भेल। ई विश्वास कएल जाइत अछि जे निघण्टु (७०० ई.पू.) पर यास्क एकटा निरुक्त नाम्ना भाष्य लिखलन्हि जे आइ सभसँ पुरान ज्ञात कृति अछि आ ई परम्परा सेहो पाली परम्परा धरि चलल। ओ सभटा कोशीय सामग्रीकेँ समानार्थी आ समानह्रिजए-ध्वनि अनुसार सजेलन्हि। शास्त्रीय संस्कृतमे सभसँ लोकप्रिय कृति अछि अमरसिंहक अमरकोष (६ठम धताब्दी)। कटालोगस कैटालोगोरम मात्र अमरकोषपर कमसँ कम ४० टा भाष्यक सूची दैत अछि जे प्राचीन भारतमे एहि समानार्थी कोशक महत्व आ लोकप्रियता देखबैत अछि। एहि तरहक आर कोश जे कम-बेशी अमरकोषक आधारपर रचित भेल आ एहिमे सम्मिलित अछि (संदर्भ मल्हार कुलकर्णी- TDIL अन्तर्जालपर):-

१. भोजक कृत नाममालिका (११म शताब्दी)
२. सहजकीर्तिक सिद्धशब्दार्नव (१७म शताब्दी)
३. हर्षकीर्तिक शारदीयाख्यानाममाला (१७म शताब्दी)
४. धनन्जय भट्टक पर्यायशब्दरत्न
५. कोशकल्पतरु
६. नानार्थरत्नमाला- इरुगप दण्डाधिनाथ (१४म शताब्दी)
७. राघवक नानार्थमञ्जरी
८. धरनीदासक धरणीकोश (१२म शताब्दी)
९. शिवदत्त मिश्रक शिवकोश
१०. सौभरीक एकार्थनाममाला-द्वक्षारनभमाला
११. मकरन्ददासक परमानन्दीयनाममाला


पहिल अधुनातन युगक संस्कृत कोश जे पाश्चात्य सिद्धांतकेँ प्रयुक्त कए बनाओल गेल से अछि प्रोफेसर एच.एच.विल्सन द्वारा संगृहीत आ १८१३ ई. मे प्रकाशित संस्कृत-अंग्रेजी कोश। दू टा भारतीय कोश तकर बाद आएल पं. सर राजा राधाकान्त देवक शब्दकल्पद्रुम आ पं. ताराकान्त तर्कवाचस्पतिक वाचस्पत्यम् ।

हमर विचारमे प्रयुक्त शब्दकोशशास्त्र आकि कोश संग्रहक विज्ञान वा कला जे अछि कोश सभकेँ विभिन्न कार्यक लेल लिखब आ संपादन करब आ ई सेहो ततबे महत्वपूर्ण अछि जतेक सैद्धांतिक कोशशास्त्र महत्वपूर्ण अछि। शब्दकोशशास्त्र शब्द एकटा कथ्यक रूपमे १६८० ई.मे आबि कए प्रयुक्त भेल जखन कि कोश शब्द अंग्रेजी भाषामे १५२६ ई. मे आबि कए प्रयुक्त भेल जेनाकि मेरिअम-वेब्सटर कोश कहैत अछि। हमरा सभकेँ कहल जाइत अछि जे कोशमे ई सभ सम्मिलित होएबाक चाही:-

१. प्रिंत वा इलेक्ट्रॉनिक रूपमे संदर्भ स्रोत जाहिमे वर्णमालाक आधारपर सजाओल शब्द रहए, जाहिमे ओकर रूप, उच्चारण, कार्य, व्युत्पत्ति, अर्थ आ वाक्य रचना आ कहबी युक्त प्रयोग होअए।
२. एकटा संदर्भ ग्रंथ जाहिमे संबंधित कार्य-विषयक महत्त्वपूर्ण पदबंध आ नामक वर्णानुसार सूची होअए- संगमे ओकर अर्थ आ अनुप्रयोगक चर्चा सेहो रहए।
३. एकटा संदर्भ ग्रंथ जाहिमे एक भाषाक शब्दक लेल दोसर भाषामे समानार्थ देल रहए।
४. एकटा संगणकीय संशोधित सूची (दत्तांशशब्द वा शब्द पदक) जे सूचना प्राप्ति वा शब्द संसाधकक लेल संदर्भक रूप उपयोग कएल जा सकए।


एहि असाधारण आ समय साध्य कलाक अनुप्रयोगमे सम्मिलित कार्य सभमे ई सभ आवश्यक रूपमे सम्मिलित अछि:-

*प्रयोक्ताक निर्धारण आ ओकर आवश्यकताक निर्धारण
*सामान्यजनक शब्दशक्तिक आधारपर भाषिक शब्दक संख्याक निर्धारण आ एकटा निश्चित सीमित परिधिमे ओकर निर्णय
*परिभाषा आ विवरणक सज्जाक विषयमे निर्णय
*कोशक संदर्भमे सूचना संचरण आ विचार-क्रियाक निर्धारण
*कोशक विभिन्न अंगक निर्धारण दत्तांशक संग्रह आ प्रदर्शनक लेल उचित संरचनाक चयन (जेना आवरण-संरचना, संवर्गीकरण, वर्गीकरण, प्रसारण आ एकसँ दोसर अंशमे सन्दर्भ-संकेत)
*प्रधान शब्द आ जोड़एवला शब्दक चयन- पारिभाषिक शब्द बनएबाक लेल
*समानधर्मिता आ संधिकेँ चिन्हित करब
*अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आइ.पी.ए.) आ ब्लॉच एण्ड ट्रैगर चिन्हक प्रयोगसँ शब्द उच्चारणक निर्देश
*सुरुचिपूर्ण आ वर्ग-स्थान-विशेष बोली स्वरूपक योग
*बहुभाषिक कोशक लक्ष्य भाषाक लेल समानार्थी शब्दक चयन
*छपल आ इलेक्ट्रॉनिक दुनू तरहक कोशमे उपयोक्ताक लेल प्रवेशमार्ग बटन आ आन सुविधा

बिहारक गंगाक मैदान आ नेपालमे हिमालयक निचुलका पहाड़ीक तराइ क्षेत्र मिलि कऽ मैथिली आ मिथिलाक सांस्कृतिक क्षेत्रक निर्धारण करैत अछि, जे बहुत पहिने १९०८ ई. मे जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा चर्चित भेल, ओना ओ मुख्यतः भारतमे स्थित मिथिला क्षेत्रपर केन्द्रित रहल। एहि क्षेत्रमे बहुत रास परिवर्तन आ सीमाक पुनर्निर्धारण भेल। २०म शताब्दीक प्रारम्भमे ग्रियर्सन मैथिली भाषाक क्षेत्र सम्पूर्ण दरभंगा आ भागलपुर जिलाकेँ मानलन्हि। एकर अतिरिक्त ओ मैथिलीकेँ मुजफ्फरपुर, मुंगेर, पूर्णियाँ आ संथाल परगनाक बहुसंख्यक लोक द्वारा बाजल जाएवला भाषाक रूपमे चिन्हित कएलन्हि। मुदा आइ-काल्हि एहिमे सँ किछु अंश झारखण्ड राज्यक अंग भऽ गेल अछि।

एतए ई तथ्य आनब सेहो समीचीन होएत जे एहि बीच राज्यक मान्यताक क्रममे मात्र १७ मे सँ ५ जिला (ई अछि भागलपुर, पूर्णियाँ, सहरसा, दरभंगा आ मुजफ्फरपुर) बिहारक मैथिली भाषी क्षेत्रक रूपमे सामान्य रूपमे अभिहित भेल। पॉल ब्रास (१९७४) मैथिली आन्दोलनक अपन वृहत् अध्ययन उत्तर भारतमे भाषा,धर्म आ राजनीति मे एकरा सामान्य रूपमे परिभाषित भौगोलिक क्षेत्रक रूपमे लेलन्हि। १९८० क दशकमे बिहारक ३१ जिलामे भेल विभाजनक बाद एकटा प्रोजेक्ट रिपोर्टमे (द मैथिली लैंगुएज मूवमेन्ट इन नॉर्थ बिहार: अ सोशियो लिंगुइस्टिक इन्वेस्टीगेशन नामसँ) संयुक्त रूपसँ हमरा आ एन.राजाराम आ प्रदीप कुमार बोस बनाओल गेल, हम सभ एहि निर्णयपर पहुँचल छलहुँ जे ३१ मे सँ ई सभ १० जिलाकेँ मैथिली भाषी क्षेत्र मानल जएबाक चाही: भागलपुर, कटिहार, पूर्णियाँ, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर आ वैशाली। से एहि भौगोलिक सीमाक परिवर्तन प्राकृतिक परिवर्तन (कोशी धार २०० बरखमे सात बेर अपन दिशा बदलने अछि) आ जिलाक पुनर्गठनक परिणामस्वरूप भेल अछि।


ई ककरो लेल एकटा पैघ चुनौती होएत जे मैथिलीक एकटा भीमकाय कोश बनेबाक प्रयास करताह जेना गजेन्द्र ठाकुर कएने छथि। ई परिस्थिति आर ओझरा जाइत अछि कारण मैथिलीक शब्द चयन अंशतः वा अधिकांशतः एहि सांस्कृतिक क्षेत्रमे बाजल जाएवला १२ टा आन भाषासँ संभवतः प्रभावित होइत अछि। एतए एहि लगभग १२ टा दोसर भाषाक वर्णन सेहो वर्णन योग्य अछि। मैथिलीक आस-पड़ोसमे भोजपुरी आ मगही अछि आ हिन्दी एहि सभपर ऊपरसँ आच्छादित अछि जे एहि तीनू भाषा समूहक लोक द्वारा बाजल जाइत अछि। मुदा बिहार एकटा बहु-भाषी राज्य अछि आ नेपाली आ बांग्ला भाषी सेहो एतए प्रचुर मात्रामे देखल जा सकैत छथि। एकर अतिरिक्त किएक तँ मैथिली भाषी झारखण्ड क्षेत्रमे सेहो पर्याप्त मात्रामे छथि, ई बुझबाक थिक जे ओराँव, मुण्डारी, हो, बिरहोर, धांगर, संथाली आ संख्यामे कम ऑस्ट्रिक भाषा समूहक वक्ता सेहो हुनका संग निवास करैत छथि। ओना तँ मिथिला क्षेत्रक बहुत रास मुस्लिम अपन मातृभाषा मैथिली देखबैत छथि मुदा बहुत रास एहनो छथि जे अपनाकेँ उर्दूभाषी घोषित करैत छथि। एहि सभ भाषामे मात्र चारि टा केँ सांवैधानिक मान्यता भेटल अछि- हिन्दी, उर्दू, बांग्ला आ नेपाली (पछाति संथालीकेँ सेहो)। हमरा विचारेँ मैथिलीक वाक्य-रचनापर ऑस्ट्रिक भाषा समूह सहित विभिन्न कोणसँ प्रभाव पड़ल अछि। मुदा कोशीय स्तरपर योग आ अनुकूलन सीमित स्रोतसँ भेल अछि जेना उर्दू, हिन्दी, भोजपुरी आ मगहीसँ। कोश आत्मसात करैत अछि देशी शब्दावलीकेँ देशज शब्दावलीक संग। ई एहि कारणसँ कारण हमरा विचारेँ बेशीसँ बेशी २५-३०% वक्ता मैथिलीकेँ एकभाषीय रूपमे बजैत छथि। कारण शेष दोसर भाषामे सेहो नीक पइठ रखैत छथि। ओ मथिली भाषी जे बिहारक पश्चिमी सिमानपर रहैत छथि, भोजपुरी सेहो बजैत छथि आ पटना-राँची-गया-मुंगेर-क्षेत्रमे रहनिहार मगही जनैत छथि आ सेहो हिन्दीक अतिरिक्त। मुदा एकटा अत्यल्प प्रतिशत कहू जे ३-५ % सँ कम्मे, एहन मैथिल छथि जे अंग्रेजीमे सेहो प्रभावी रूपमे बाजि सकैत छथि। मुदा अंग्रेजीसँ मैथिलीमे शब्दक आगम ततबे वृहत अछि जेना ई कोनो दोसर नव भारतीय भाषा (न.भा.भा.) सभमे अछि।

बहुत गोटे ई शंका व्यक्त कऽ सकैत छथि जे कतेक गोटे एहन होएताह जिनका गजेन्द्र जी सनक प्रयाससँ लाभ भेटतन्हि ? ओना तँ मैथिली भाषीक संख्याक आधिकारिक आँकड़ा स्थिर नहि रहल अछि मुदा एहि तथ्यक विस्तारसँ वर्णन आवश्यक अछि। जनसंख्याक आँकड़ा वास्तविक नहि अछि जेना २००१ ई.क जनसंख्याक ई आँकड़ा: १,२१,७९,१२२. एकरापर अविश्वास पक्का अछि। जखन हम देखैत छी जे मैथिली भाषीक संख्याक संदर्भमे दस बरखक अंतरालमे लेल जनसँख्या आँकड़ामे बहुत बेशी परिवर्तन अछि। ई १८९१ सँ दस बरखक अंतरालमे जनसंख्याक आँकड़ामे बढ़ल आ घटल संख्याक तुलनासँ स्पष्ट अछि:

१९०१-११: +३.१२%
१९११-२१: -०.७७%
१९२१-३१: +७.६८%
१९३१-४१: +९.१३%
१९४१-५१: गणना नहि भेल
१९५१-६१: +२२.३५%
१९६१-७१: +२०.८९%
१९७१-८१: +२४.१९%

तार्किक रूपेँ वास्तवमे मैथिली वक्ताक संख्या स्थिर रूपेँ बढ़ल अछि। हमर अनुमानसँ किछु संकेत देल जा सकैत अछि जे अनिमानित ४ करोड़ धरि पहुँचैत अछि। १८९११ मे ग्रियर्सन (१९०८) अनुमान कएलन्हि जे मैथिली भाषीक संख्या ९२,८९,३७६ अछि। एकर विरुद्ध १९६१क जनसंख्या आँकड़ा एकरा ४९,८२,६१५ कऽ दैत अछि। निश्चयरूपेण १९६१ क जनसंख्या आँकड़ा वास्तविक नहि अछि। ओना ग्रियर्सनक (१९०९) जनसंख्या आकलन जे हुनकर १८९१ ई. मे कएल सर्वेक्षणपर आधारित अछि, सभक द्वारा सम्मति प्राप्त नहि अछि। वर्तमान शताब्दीक प्रारम्भमे मैथिली निम्न क्षेत्रमे बाजल जाइत छल:-

(i) सम्पूर्ण दरभंगा आ भागलपुर
(ii) मुजफ्फरपुरक ६/७ भाग
(iii) मुंगेरक १/२ भाग
(iv) पूर्णियाँक २/३ भाग
(v) संथाल परगनाक ४/५ भाग जे जनगणना आँकड़ामे वर्णित हिन्दी भाषी छथि।


१८१६ ई. मे उत्तर दिसुका भाषायी क्षेत्र नेपाल राजशाही द्वारा स्थायी रूपसँ नेपालमे सम्मिलित कए लेल गेल। ताहि द्वारे भाषा बजनिहारक संख्या पर पहुँचबाक लेल नेपालक जनसंख्याक १४% हिस्सा आर जोड़ए पड़त। पॉल ब्रास (१९७४:६४-६) गेटक गणना (जनसंख्या वर्ष १९०१ ई.) १८८५ ई.सँ उपलब्ध विभिन्न दस्तावेजक आधारपर करैत छथि आ १,६५,६५,४७७ संख्यापर पहुँचैत छथि। ई गणना ग्रियर्सनक आकलनकेँ आधार लए आ तकर बादक ८ दशकमे बिहारमे जनसंख्या वृद्धिकेँ आधार लए कएल गेल अछि। १९८१ क जनसंख्या आँकड़ाक आधारपर आ मिथिला क्षेत्रक बाहर पसरल मैथिलक संख्याकेँ जोड़ि कऽ आ १० जिलाक जनसंख्याकेँ (३१ जिलामेसँ) ध्यानमे राखि हम आ हमर सहयोगी १९८० क दशकक मध्यमे २,२९,७२,८०७ (सिंह, राजाराम आ बोस १९८५) क संख्यापर पहुँचलहुँ। ई संख्या हमर विचारमे जनसंख्याक दसवर्षीय वृद्धिकेँ ध्यानमे रखैत ४ करोड़ धरि पहुँचल अछि आ ताहि द्वारे बहुत रास लोक कोशक एहि भीमकाय प्रयाससँ लाभान्वित होएताह। ई सामान्यतः मानल जाइत अछि जे मैथिली मिथिला क्षेत्रक ब्राह्मण द्वारा बाजल जाइत अछि। ई एकटा पहिलुका कुप्रचार छल जे एकरा हिन्दीक बोलीक रूपमे सिद्ध कए चाहैत रहथि मुख्यतः हिन्दी भाषीक आधिकारिक संख्यामे वृद्धिक उद्देश्यसँ। मुदा उत्तरी बिहारक जाति संरचनाकेँ देखैत मैथिलीक जनसंख्या संबंधी आँकड़ा एकर सत्य कथा कहत। सापेक्षतया मैथिलीक बेस संख्या जे जनगणना रिपोर्टमे आएल, केँ एहि तथ्य मात्रसँ व्याख्यायित कएल जा सकैत अछि जे ओना तँ मैथिली भाषी जिलाक कतोक क्षेत्रमे ४६.८४% धरि मुस्लिम आ ३१.०६% धरि हिन्दू निवास करैत छथि, मैथिलीक लेल जे सहयोग आएल अछि से एहिमे सँ एकटा पैघ संख्या द्वारा मैथिलीकेँ अपन मातृभाषा घोषित कएने बिना संभव नहि छल।

मिथिलामे भाषा प्रयोगक एकटा सर्वेक्षण ई देखा सकैत अछि जे ओना तँ भाषाक औपचारिक क्षेत्र सभमे प्रयोग कम भेल अछि मुदा ई सेहो सत्य अछि जे एकर साहित्यिक उत्पादकता आ उपलब्धि आइ अखिल भारतीय स्तरपर बेशी नीक जकाँ सोझाँ आबि रहल अछि तुलनात्मक रूपेँ जतेक ई आइसँ २० बरख पूर्व अबैत छल। मधुबनी चित्रकला वा मिथिला कला आइ भरि भारतमे सुप्रसिद्ध भऽ गेल अछि आ विश्व-बजार धरि पहुँचि गेल अछि। मात्र तखने जखन मैथिली भाषी नव-पीढ़ी अपन सांस्कृतिक भाषायी बोधसँ हटबाक निर्णय करताह तखने एकरा कोनो खतरा सोझाँ अएतैक। हमरा विचारेँ सांवैधानिक अधिकार नहि भेटनाइ अप्रत्यक्ष रूपमे मैथिलीक लेल वरदान साबित भेल कारण ई साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधिकेँ बल देलक। ई पहिनहियेँ बहुत रास सांवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषा सभकेँ पाछाँ छोड़ि देलक, जेना मणीपुरी, कोंकणी, नेपाली आ सिन्धी सेहो। आ आब जखन की ई अष्टम सूचीमे अछि एकरा सभटा आधिकारिक आ आन तरहक संरक्षण भेटबाक चाही जकर ई अधिकारी अछि। एकरा एकर उपयोगकर्ताक सहयोग सेहो भेटबाक चाही जे आब आधुनिक अओजार सभक ताकिमे छथि जेना ऑनलाइन पत्रिका, ई-कोश, सुविधाजनक जंगम परिभाषा-कोश सभ आ स्वचालित प्रश्नोत्तर प्रणाली इत्यादि। ताहि स्तरपर ई मैथिली कोश जे अन्तर्जाल आ छपल दुनू संस्करणमे उपलब्ध होएत, से संग्रहकर्त्ता द्वारा एकटा महत्वपूर्ण योगदान होएत। मैथिली भाषी समुदाय आ आन भाषाक अनुवादक-विद्वान द्वारा गजेन्द्र ठाकुर आ प्रकाशक विशेष प्रशंसाक पात्र छथि। ई सत्य अछि जे मैथिली कोश-विज्ञान बहुत बादमे विकसित भेल, म.म. दीनबन्धु झाक प्रयासक बहुत बाद आ आब जा कए हमरा सभक सोझाँ महत्त्वपूर्ण कार्य सभ आएल अछि जेना पं गोविन्द झा द्वारा कल्याणी कोश वा जयकान्त मिश्रक वृहत् मैथिली शब्दकोश, मतिनाथ मिश्र ‘मतंग’ क मिथिला शब्द प्रकाश वा अलाइस डेविसक बेसिक कलोक्विअल मैथिली : अ मैथिली-नेपाली-अंग्रेजी वोकाबुलरी। संक्षिप्त मैथिली शब्दकोश आ द्विभाषी मैथिली शब्दकोश जे मैथिली अकादमी द्वारा संकल्पित अछि, अयनाइ एखन बाकी अछि। राष्ट्रीय अनुवाद मिशन द्वारा संकल्पित (देखू www.ntm.org.in) लांगमैन- सी.आइ.आइ.एल. बेसिक इंगलिश- इंगलिश- मैथिली जे कॉर्पोरापर आधारित अछिसेहो एकटा रुचिगर उत्पाद होएत। मुदा सभटा कहला आ केलाक बाद एहि कार्यक महत्त्व समय बितलाक संगे अनुभूत कएल जाएत।

२८.०२.२००९ प्रोफेसर उदय नारायण सिंह
मैसूर
निदेशक
केन्द्रीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.)

हम लिखैत छी कविता- उदय चन्द्र झा "विनोद"

उदय चन्द्र झा "विनोद"

हम लिखैत छी कविता
सूर्यकेँ अर्घ्य दैत छी
ककरो किछु फर्क भने नइँ पड़ौक
हमरा पड़ैत अछि
अहाँ पढ़ू वा नहि
हमरा लिखय पड़ैत अछि
हमरा लेल कविता लिखब
आइयो अछि आवश्यक
परमावश्यक अछि जीवाक लेल।

गजल- आशीष अनचिन्हार

इ गजल रचना प्रियंका झा के समर्पित छैन्ह, मुदा गजल मे लिखल रचना शब्द सँ हुनकर कोनो तालमेल नहि। आनंद जी खुशी भेल जे अपने रुपकांत जीक पोथी चाही, मुदा इ मात्र छायाप्रति केर रुप मे भेटि सकैए, जँ केओ चाहए त। ओना हमरा लग हुनक सभ पोथी अछि मुदा अफसोच, हम अपन पोथीघर सँ बहुत दूर छी।तएँ हमरा दिस सँ सहयोगक आशा कम्म। धन्यवाद आशीष अनचिन्हार (09968989527)
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गजल
रचना कतेक टका लगतै सपना किनबाक लेल
जूटल घर सरदर अँगना किनबाक लेल


हम मुक्त छी राग-विराग प्रेम-घृणा सँ
रचना कतेक टका लगतै भावना किनबाक लेल


सत्त मानू हम काज करै छी लोकतंत्रक पद्धतिए
रचना कतेक टका लगतै पटना किनबाक लेल


पत्रकारिता गुलाम छैक टी.आर.पीक
रचना कतेक टका लगतै घटना किनबाक लेल

अप्रैल फूल

बाल कविता-३ माटिक बासन- जीवकान्त

माटिक बासन

लाल-लाल अछि
गोल-गोल अछि कटगर

माटिक छाँछी दही जमओलनि

उज्जर, कठगर, सोन्हगर


छथि कुम्हार ओ धन्य-धन्य

जे भारी चाक घुमाबथि

माटि-पानिसँ चाकक ऊपर

नाना रूप बनाबथि


आंगुर छुआ, इशारा देलनि

माटि धयल नव रूप

लाल सुराहीमे जल झाँपल

घरमे छोटकी कूप

माटिक मुरुत बनइ सल्हेसक
कहबइ गामक देब

बड़ पवित्र अछि

माटिक बासन
सुन्दर आर सुरेब

Tuesday, March 31, 2009

मैथिली मे चित्रकथा श्रृंखलाक शुरुआत

मैथिली मे नेना-भुटकाक प्रिय विधा चित्रकथाक खगता देख 'नताशा' चित्रकथा श्रृंखलाक संकल्पना हमरा मोन मे करीब एक दशक पहिने आयल छल. प्रकाशनक माध्यम आ प्रसार साधन केर अभाव मे हमर कल्पना हिंदी मे अनुदित भ' विभिन्न पत्र-पत्रिका मे छपय लागल आ' शनै:-शनै: ई हिंदिये के भ' गेलै.
'मैथिल आ मिथिला' से जुडलाक बाद दशकक दबल कामना पूर हेबाक लेल हिलकोर लेबै लागल अछि. अहि क्रम मे 'नताशा' केर मूल मैथिलीक अलावे एकर हिंदी संस्करणक अनुवाद मे लागल छी. अहि कार्य मे अनुज मित्र कुमार सौरभक सहयोग उल्लेखनीय अछि.
अगला सप्ताह सं दर सप्ताह अहि श्रृंखलाक एक गोट चित्रकथा प्रस्तुत कयल जायत. अहि सन्दर्भ मे दू टा बिंदु स्पष्ट क' देब आवश्यक अछि-
१. श्रृंखलाक चित्रकथा मे किछु प्रचलित चुटक्काक अलावे किछु मौलिक कथ्यक उपयोग कयल गेल अछि.
२. अहि श्रृंखलाक अनेको चित्रकथा बालहंस, चकमक, बच्चों का देश, प्रभात खबर, अंग्रेजी पत्रिका TINKLE आ रविवारीय जनसत्ताक यात्रा क' चुकल अछि.
हमर प्रयास सकारथ होयत जं' किछुओ धीया-पुता अहि माध्यमे मातृभाषाक साहित्यिक पक्ष सं जुड़ता.

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (चारिम कड़ी)


चतुर्थी दहनयी s बाद सब गोटे चलि गेलाह। हिनको कॉलेज खुजल छलैन्ह, इहो( हमर घर वाला) मुजफ्फरपुर, अपन कॉलेज चलि गेलाह। आन के गेला पर ओतेक सुन नय लागल, मुदा जहिया गेलाह ओहि दिन बड़ सुन लागल। कियाक होइत छैक नहि जानि, विवाह होइते s संग एतेक प्रगाढ़ सम्बन्ध कोना s जायत छैक जे एक दोसरा s अलग रहनाइ निक नय लागैत छैक। दादी हिनका s करार करवा लेलथिन जे मधुश्रावणी में अवश्य अओताह। दादी s s हँ कहि देलैथ मुदा हमरा s कहलैथ नहि आबि सकताह। हमर मोन s छोट s गेल मुदा फेर सोचलौं हमर s क्लास छूटिये रहल अछि हिनकर कियाक छूटैंह। हम कहलियैन्ह किछु नय, ओहि समय में हम हिनकर बात s हँ वा नय में जवाब दैत रहियैन्ह। ओनाहुं हम कम बाजति रहि, हिनका s s निक जकां बाजय में हमरा एक साल लागि गेल।


गाम पर बाबा दादी के छोरिकs घर में, हमर माँ बाबुजी हम छहु भाय बहिन रहि। ओहि समय में असगरो जे सभ गाम पर रहैत छलाह वा छलिह, किनको नय बुझैन्ह जे असगर छथि हमर घर में s विवाह भेल छलs रोज भोर साँझ गाम घरक लोकक अयनाइ गेनाइ लागल रहैत छलैक। एक s अहुना जहिया जहिया हम सब गाम जाइ, लोक सबहक एनाइ गेनाइ लागल रहैत छलैक अहि बेर s हमर विवाह भेल छलs अहि बेर कनि बिशेष लोकक एनाइ गेनाइ रहैत छलs, हमर कनि विशेष मान दान सेहो होइत छलs कहियो कतो s खेनाइ आबय कतो s खोइंछ भरय s लेल कियो कहय लेल आबथि , सभ कियो एतबा अवश्य कहैथ, ठाकुरजी बड़ जल्दी चलि गेलैथ। दादी सभ s कहथि फेर जल्दिये अओताह, पंचमी s मधुश्रावणी धरि रहताह। हुनका सभ s की बुझल जे ठाकुर जी नय आबि रहल छथि, हम सुनि s चुप रहि, किनको किछु नय कहियैन्ह, माँ तक s नय कहने रहि, मुदा जखन हिनकर एनाइ गेनाइ s गप्प सुनि मोन उदास s जाय।


हमर जहिया विवाह भेल हम ओहि समय फ्राक या स्कर्ट ब्लाउज पहिरति रहि। अचानक हमरा साड़ी पहिरय परि गेल। जहाँ कियो आबैथ, ख़ास s मौगी महाल महक s हमरा बजायल जाय। हमर बहिन सभ दौड़ s हमरा लग अबैथ कहय s लेल, ओकर बाद हम जल्दी s ककरो s साड़ी ठीक करवाबी तखैन्ह हम हुनका सभ लग जाइ। दियादि महक काकी पीसी सभ गोटे में s बराबरि कियो नय कियो रहैत छलिह, सभ ठीक s देथि, तइयो कैक बेर हमर पैर साड़ी में फँसल होयत हम खसल होयब जे कियो आबथि एतवा अवश्य कहथि, " देखिये कुसुम केहेन लागति छथि" देखलाक बाद कहथि "बड़ सीरी चढ़ल छैक" कतेक निश्छल भावना कतेक अपनापन रहैत छलैक हुनका लोकनि में।


हमर दु तीन टा पीसी सेहो ओहि समय में ओतहि रहति छलिह, जिनकर सबहक विवाह ओहि बरख भेल छलैन्ह सभ हमर संग तुरिया छलिह। भरि दुपहरिया घर भरल रहैत छलs हुनका सभ संग ओहिना समय बीति गेल पंचमी आबि गेल। पंचमी s एक दिन पहिने भोरे भोर हमर सासुर s भार आयल, ओहि में सब किछु बिधक ओरिओन s आयल छलs भरि गामक लोक के दादी हकार दियवा देलथिन, सभ भार देखैक लेल आबथि जे देखथि से कहथि, एतेक निक भार किनको ओतहि s नय आयल छलैक, गाम पर सभ गोटे भार देखि s बड़ प्रशंसा करथि, हमरा सुनि बड़ निक लागय। जिनका हम कहियो देखने सुनने नय हुनकर प्रशंसा सुनि हम खुश होइ। हमर दादी सेहो खुशी s सबके कहथि अरे महादेव झा ओतय s भार आयल अछि। हमरा ओहि समय में किछु नय बुझाय, हम सोचि हमर ससुरक नाम s हीरानंद ठाकुर छैन्ह, दादी बेर बेर कियाक कहैत छथि महादेव झा ओतय s आयल अछि। हम पुछs चाहि किनको s मुदा एम्हर ओम्हर में बिसरी जाइ।


कॉलेज s हमरा प्रतिदिन एकटा चिट्ठी लिखैथ, ओहि में सब दिन जवाब देवाक लेल लिखैत छलैथ, मुदा हमारा जवाब देबय में लाज होयत छल।एक दिन हमर भाय बाबुजी कोनो काज s मुजफ्फरपुर जायत छलाह। ओहि दिन हम पहिल चिट्ठी लिखि s भाय के देलियैन्ह जे हुनका s देबाक लेल।


पंचमी s एक दिन पहिनहि भोर में भार आयल छलs, साँझ में बाबुजी सब के सेहो अयबाक छलैन्ह। हमरा अपन संगी पीसी सब संगे फूल लोढ़य लेल जयबाक छलs दादी सब ट्रेन s हिनकर बाट ताकथि अंत में हमर बहिन सब s कहि पुछौल्थिन, हम बहिन सब s कहि देलियैन्ह हमरा किछु नय लिखने छथि। दादी तकर बाद s निश्चिंत s गेलिह तखनि s कहथि जे तोहर बाबुजी सब संग अवश्य अओताह।


साँझ में सब घान्जि बांधि s हमरा ओतहि आयल देखलियय सबहक हाथ में फूल डालि पथिया छलैक कियो कियो अपन खबासिनी कs सेहो संग में s लेने छलथि किछु कुमारि सब सेहो संग में छलथि हमरो संग हमर एकटा पितिऔत बहिन छलीह, हमर फूल डालि पथिया s लेलथि।हमसब पूरा टोलक सब गोटे गीत गाबति हँसी मजाक करैत अपन अपन फूल डालि पथिया लेने पहिने गाछी दिस गेलौन्ह। दादी हमरा हिदायति देने रहथि, जे बाँस वा अन्य पैघ गाछक पात कियो तोरय, जाहि जूही s पात फूल सभ हम अपने तोड़ी हमरा बड़ पोल्हा s कहलथि "हे मधुश्रावणी लोक के एकय बेर होयत छैक जहिना कहैत छी कयने जाउ" हमहु निक बच्चा जकां मुरी हिला s हँ कहि देलियनि


हम सब, सब s पहिने बंसबट्टी दिस बिदा भेलौंह बाँसक पात तोरलाक बाद हम सब जाहि जूही अन्य अन्य पात फुलक खोजि में सबहक बाड़ी बाड़ी जाइ सभ तरि s फूल सभ बटोरति जाइ हमरा तs बुझलो नय छलs जे कोन - कोन फूल कोन-कोन पात चाहि जेना जेना सभ कियो तोरथि हमहु तोरति जाइ दादी s हिदायति हमरा मोन छलs हम पथिया टा नहि उठा पाबति रहि सेहो हमर पितिऔत बहिन, देयादि महक छलिह से उठा दैथ। जखैन्ह हमरा सभ गोटे कहलथि जे आब s गेल, हमहु हुनका सभ संगे आपस हेबाक लेल चलि देलियैन्ह हमरा देखि s ततेक आश्चर्य भेल, हमसभ एक एक पथिया भरि s पात जाही जूही s लेने रहि


आब हमरा बसक नहि छलैक जे हम उठा s एको डेग आगू बढितौंह हमर पितिऔत बहिन ओकरा अपन माथ पर s s चललिह रास्ता भरि हँसी मजाक होइत छलैक, ओही में s बेसि मजाक हम नहि बुझति रहि बिच बिच में बटगभनी सेहो होयत छलैक इहो गप्प होयत छलैक जे किनकर सभहक वर आयल छथि किनकर सभहक बाद में अर्थात मधुश्रावणी s पहिने अओताह हमारो s सब पुछथि, हम किछु नय बाजि हमरा लाज होइत छलs नहि बजला पर सभ हमर आर मजाक उराबथि, हम अहिना दुखी छलौंह ताहि पर सभ मजाक करथि कखनो मोन होयत छल बेकारे सभ संग अयलौन्ह हमरा होयत छलs हम कहुना घर पहुँची, हम मजाक s तंग आबि s अपन बहिन s जे पथिया लेने रहथि, कहलियैन्ह अपना सब आगु चलु हम सभ आगु जल्दी जल्दी बढि रहल छलियैक मुदा कथि लेल हमरा कियो जल्दी जाय देत पकरि s बिच में हमरा सभ गोटे s लेलथि


ओहिना करैत हम सब मुखिया बाबा s घर लग पँहुची गेलौंह। हमर घर ओकर बाद छलैक हम हाथ में फुलक डालि लेने सभ संग बिच में चलति रहि घर लग पहुँच सभ गोटे जोर जोर s हंसैथ हमरा कहि आगु s देलथि जे आब हमर दादी देख लितथि तs हुनका सभ s डाँटि परतैंह हम आगु आबि जहिना बरामदा दिस बढलौंह देखैत छी कुर्सी पर बाबा आर बाबुजी कs संग बैसल छथि तिनु गोटे चाय पीबि रहल छथि हम लाज s जल्दी-जल्दी आँगन दिस भागि गेलौंह


आँगन पहुँचि देखैत छि दादी माँ व्यस्त छथि एक s पाबनि s ओरियोनि होयत छलैक, दोसर जमाय विवाहक बाद पहिल बेर आयल छलैथ, तेसर समधियोनि s पाहुन भार s s से आयल छलखिन्ह हमरा देखितहि दादी कहय छथि "यै अहाँ बिना माथ झपने अहिना बाबा बाबुजी s सोंझा s आबि गेलौंह" हम किछु नय बजलियैन्ह, हम हमर बहिन चुप चाप कोहबर घर जाय s फुल डालि पथिया राखि देलियैक ओहि समय में हमरा माथ झांपय में बड़ लाज होयत छलs हम बाहरि आबि s माँ s पुछलियैक," बाबुजी मुजफ्फरपुर s कखैन्ह एलैथ" जकर जवाब दादी s भेटल, "अहांक बाबुजी कॉलेज s ठाकुर जी s पकरि s s अनलैथ "


साँझ में किछु किछु बिधक ओरिओन गीत भेलैक दादी कहलथि सब गोटे जल्दी सुतय जो भोरे उठय परत। राति में सुतय काल पता नय हमरा कोना मोन छलs, हम हिनका s पुछलियैन्ह "भार कतय s आयल छैक "? हिनका किछु बुझय में नय अयलैन्ह, हमरा कहलाह "मतलब... कोन भार"? फेर मुस्कुरैत हमरा कहलाह "अहाँ के हमारा देखि s खुशी नय भेल जे अहाँ हमारा s भारक विषय में पुछैत छी " हम मुरी हिला s हाँ कहि देलियैन्ह मुदा फेर धीरे s कहलियैन्ह " दादी सब s कहति छथि महादेव झा ओतय s भार आयल छैक। सुनतहि जोर s ठट्ठा s हँसैथ हमरा कहलाह ".., अच्छा..., महादेव झा, हमर सबहक पाँज़ि अछि ताहि लेल बाजति होयतिह" तकर बाद हमरा पाँज़ि s विषय में सेहो बता देलैथ। हमरा अपना पर हँसी लागल कहु तs भोर सs हम इ सोचि कs परेशान छलौंह जे महादेव झा के छथि।


क्रमशः ..............

Saturday, March 28, 2009

समीक्षा श्रृंखला---२। रुपकांत ठाकुर पर आशीष अनचिन्हार।

अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि (आलोचना)

शीर्षक पढैते देरी पाठक लोकनि एकर रचियता के निराशावादी घोषित कए देताह आ फतवा देताह जे समाज के एहन -एहन वकतव्य सँ दूर रहबाक चाही।मुदा हमरा बुझने पाठक लोकनि अगुता गेल छथि,आ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि। मुदा इहो एकटा सुपरिचित तथ्य थिक जे लोक के जतेक उपदेश दिऔक ओ ओतबे तागति सँ ओकर उन्टा काज करत।मुदा तैओ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि आ ता धरि नहि अगुताथि जा धरि शीर्षक पूर्ण वाक्य नहि भए जाए।आब अहाँ सभ टाँग अड़ाएब जे शीर्षक त अपना आप मे पूर्ण छैहे तखन अहाँ एकरा अपूर्ण कोना कहैत छिऐक ? मुदा नहि, कोनो वस्तु बाहर सँ पूर्ण होइतो भीतर सँ अपूर्ण होइत छैक। इहए गप्प एहि शीर्षकक संग छैक। अच्छा आब हम अपन विद्वताक दाबी छोड़ी आ आ अहाँ सभ के पूर्ण वाक्य के दर्शन कराबी - "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि, सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"।
मैथिली साहित्य मे बहुत रास बिडंबना छैक, प्रवंचना छैक, वंदना छैक अर्थात सभ किछु छैक मुदा तीन गोट वस्तु के छोड़ि--
१) मैथिली मे व्यंग प्रचुर मात्रा (गुण एवं परिमाण) मे नहि लिखाइत अछि,
२) जँ झोंक- झाँक मे लिखाइतो छैक त स्तरीय आलोचना नहि होइत छैक ,
३) आ जँ भगवान भरोसे स्तरीय आलोचना अबितो छैक त हरिमोहन झा के शिखर मानि सभ के भुट्टा बना देल जाइत छैक ।
एहि तीन टा के छोड़ि एकटा आर महान बिडंबना छैक जे आलोचक आलोचना करताह फल्लाँ बाबूक अथवा हुनक कृति के मुदा समुच्चा मैथिली अलोचना मे हरिमोहन बाबू तेना ने घोसिआएल रहता जे पाठक एहन आलोचना के हरिमोहने बाबूक आलोचना बूझैत छथि।
आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "ली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि--1) मोमक नाक (कथा संग्रह)
2) धूकल केरा (कथा संग्रह)
3) लगाम (नाटक)
4) वचन वैष्णव (नाटक)
5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक।
आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । इ शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मतलब जे लेखक भविष्यक संकेत कए गेल छथि।
आब किछु गप्प करी मैथली व्यंग मे राजनीतिक व्यंग पर। कोन चिड़ियाक नाम छैक राजनीतिक व्यंगइ हमरा जनैत मैथिली व्यंगकार नहि जनैत छथि। ओना व्यंग केकरा कहल जाइत छैक सेहो बूझब कठिन। हमरा जनैत मैथिली मे 93% व्यंग लिखल जाइत छैक मुदा 93% आलोचक ओकरा हास्य मानि आलोचना करैत छथि। सभ व्यंगकार ओहीक मारल छथि, चाहे शिखर-पुरुष हरिमोहन बाबू होथि वा रुपकांत ठाकुर। सुच्चा व्यंग लिखला पछातिओ हरिमोहन बाबू कहेलाह हास्य-व्यंग सम्राट। अर्थात हास्यकार पहिने आ व्यंगकार बाद मे। बाद बाँकी 7% हास्य लिखाइत अछि जकर प्रतिनिधि छथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" ।
हँ त फेर आबी हम राजनीतिक व्यंग पर। हमरा जनैत जाहि व्यंग मे अपन समकालीन अथवा पूर्वकालिक राजनीति, शासन-व्यवस्था, ओकर संचालक आदि पर निशाना साधल गेल हो ओकरा राजनीतिक व्यंग कहाल जाइए। ओना इ अकादमिक परिभाषा नहि अछि।
त फेर हम अहाँ सभ के रुपकांत ठाकुर लग लए चली, आ हुनक एक गोट पोथीक परिचय करा हुनक राजनीतिक चेतना के देखाबी। जाहि पोथी सँ हम अहाँ के परिचय कराएब ओकर नाम छैक "मोमक नाक"। एहि व्यंग-संग्रह मे नौ गोट कथा थिक। परिचय शुरु करेबा सँ पहिनहि कहि दी जे इ कोनो जरुरी नहि छैक जे हम अहाँ के नओ कथा कहब आ ने जरूरी छैक जे संग्रहक पहिल कथा सँ हम शुरू करी। इ निर्णय हमर व्यत्तिगत अछि आ अहाँ एहि सँ सहमत भइओ सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। हँ त हम शुरू करी संग्रहक अंतिम कथा "मर्द माने की" सँ। जेना की शीर्षके सँ बुझाइत छैक लेखक अवस्स एहि मे मर्दक परिभाषा देने हेथिन्ह। से सत्ते, लेखक जखन शुरुए मे कहैत छथिन्ह जे " लोटा ल' क' घरवालीक लहटगर देह पर गदागद ढोल बजौनिहार एहन सुपुरुष कत' भेटत?"। त सभ अर्थ स्पष्ट भए जाइत छैक। मुदा लेखक एतबे सँ संतुष्ट नहि भए आगू कहैत छथि " मर्द माने कमौआ, आ कमौआ माने वियाहल,आ वियाहल माने बुड़िबक आ बुड़िबक माने बड़द"। सुच्चा मैथिल अभिव्यत्ति। एखनो अर्थात 2009 धरि मैथिल समाजक इ धारणा छैक जे कमौए मर्द होइत अछि, आ जहाँ कहीं कोनो मर्द देखाइ पड़ल लोक ओकर विआह करबाइए कए छोरैए। आ जहाँ धरि गप्प रहल बियाहल माने बुड़िबक से त हम नहि कहब मुदा बुड़िबक माने बड़द अवश्य होइत छैक। खाली खटनाइ सँ मतलब। अधिकारक प्रति निरपेक्ष। आब हम एहि सँ बेसी नहि कहब एहि कथाक प्रसंग। बस एतबे सँ लेखकक चेतनाक अनुमान कए लिअ।
"ठोकल ठक्क" मे लेखक ओहन भातिज आ जमाएक दर्शन कराबैत छथि जनिकर काजे छन्हि कमीशन खाएब आ एहि लेल ओ अपन पित्ती एवं ससुरो के नहि छोड़ैत छथिन्ह। आ जँ एही कथाक माध्यमे अहाँ तात्कालीन रजनीतिक देखए चाहब त रुपकांत एना देखेताह-"सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"। अर्थात बेशर्म, निर्लज्ज, हेहर,थेथर सरकार।
भारतक समकालीन विकास जँ अहाँ देखबाक इच्छा होइत हो त रुपकांत ओहो देखेताह। कनेक पढ़ू "जय गंगा जी" जतए रेलगाड़ी के बढैत देखि लेखक टिप्पणी करैत छथि-"कांग्रेसी नेता जकाँ लोक के अपन पेट मे राखि क' ओकर सुख-दुख अथवा उन्नति-अवनति के बिसरि गाड़ी मात्र आगू बढब जनैत छल। अपना बले नहि कोइला आ पानिक बलें। परन्तु पवदान पर चढ़ल यात्री कतऽ छलाह?" ई सवाल जतेक भयावह लेखकक समय मे छल ततबे भयावह एखनो अछि। लेखक सरकारक डपोरशंखी योजनाक लतखुर्दन एही कथा मे करैत छथि-" कोन टीसन केखन बितलैक से मोन राखब पंचवर्षीय योजना सभ मे उन्नतिक कागजी आकड़ा मोन राखब थिक"।
बेसी प्रशंसात्मक उद्धरण देब हमरा अभीष्ट नहि मुदा तैओ एकटा उद्धरण देबा सँ हम अपना के रोकि नहि पाबि रहल छी। एही संग्रहक दोसर कथा थिक "फूजल ऊक"।बेसी अपन वक्तव्य नहि कहि उद्धरण सुनाबी-"मात्र सुधारवादी दृष्टि रखला मात्र सँ सुधार कथमपि नहि भए सकैछ"। जँ लेखकक भावना के बचबैत हम लिखी जे "प्रगतिशील विचार लिखला मात्र सँ प्रगतिशीलता कथमपि नहि आबि सकैछ" त इ स्पष्ट भए जाएत जे रुपकांत कतए व्यंग कए रहल छथिन्ह आ केकरा पर कए रहल छथिन्ह।
ठाकुर जी एकपक्षीय व्यंगकार नहि छथि। ओ दूनू पक्ष के हूट सँ मानसिक आ बूट सँ शारिरिक प्रताड़ाना दैत छथिन्ह। तकर प्रमाण ओ एहि संग्रहक पहिल कथा जे पोथीक नामो छैक अर्थात " मोमक नाक" मे देखेलैन्ह अछि। हुनकहिं शब्द मे " आजुक युग मे भला आदमीक परिभाषा उनटि गेल छैक। जनता जनता अछि जे से सभ मोमक नाक जकाँ लुजबुज। जखन जाहि दिस नफगर रहै छैक तिम्हरे लोक घूमि जाइछ" स्वतंत्रे भारत नहि हमरा विचारे जम्बूदीपक जनता सँ लए कए एखुनका भारतीय जनताक चारित्रिक विशेषता ई उद्धरण देखबैत अछि। आ एतेक देखेलाक पछातिओ आलोचक रुपकांतक नाम बिसरि गेल छथि।
भने आलोचक नाम बिसरि गेलखिन्ह मुदा पाठकक मोन मे एखनो धरि रुपकांत ठाकुरक रचना खचित छैन्ह। हमरा जनैत कोनो लेखकक प्रथम आ अंतिम सफलता इएह छैक। आ रुपकांत इ सफलता अपन रचनाक माध्यमें प्राप्त केलन्हि ताहि मे संदेह नहि।

विदेह ई पत्रिकामे http://www.videha.co.in/ पर पूर्वप्रकाशित।

सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा : मैथिली अनुवाद रमानन्द झा 'रमण' : भाषा सम्पादन गोविन्द झा

सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा
UNIVERSAL DECLARATION OF HUMAN RIGHTS
MAITHILI TRANSLATION
(राष्ट्रसंघक साधारण सभा 10 दिसम्बर, 1948 के ँ एक सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा स्वीकृत आ‘
उद्घोषित कएलक जकर पूर्णपाठ आगाँ देल गेल अछि। एहि ऐतिहासिक घोषणाक उपरान्त साधारण
सभा समस्त सदस्य देशसँ अनुरोध कएलक जे ओ एहि घोषणाक प्रचार करए तथा मुख्यतः, अपन देश
आ‘ प्रदेशक राजनैतिक स्थितिक अनुरूप बिनु भेदभावक, स्कूल आ‘ अन्य शिक्षण संस्था सभमे एकर
प्रदर्शन, पठन-पाठन आ‘ अनुबोधनक व्यवस्था करए।)
एहि घोषणाक आधिकारिक पाठ राष्ट्रसंघक पाँच भाषामे उपलब्ध अछि-अंग्रेजी, चीनी, फ्रांसीसी, रूसी आ,
स्पेनिश। एहिठाम एहि घोषणाक मैथिली रूपान्तरण प्रस्तुत अछि।)


उद्देश्यिका
जे ँ कि मानव परिवारक सकल सदस्यक जन्मजात गरिमा आओर समान एवं अविच्छेद्य अधिकारके ँ
स्वीकृति देब स्वतन्त्रता, न्याय आ‘ विश्वशान्तिक मूलाधार थिक,
जे ँ कि मानवाधिकारक अवहेलना आ‘ अवमाननाक परिणाम होइछ एहन नृशंस आचरण जाहिसँ मानवक
अन्तःकरण मर्माहत होइत अछि आओर अवरुद्ध होइत अछि एक एहन विश्वक अवतरण जाहिमे
अभिव्यक्ति आ‘ विश्वासक स्वतन्त्रता तथा भय आ‘ अकिंचनतासँ मुक्ति जनसामान्यक सर्वोच्च आकंाक्षा
घोषित हो;
जे ँ कि विधिसम्मत शासन द्वारा मानवाधिकारक रक्षा एहि हेतु परमावश्यक अछि जे केओ व्यक्ति
अत्याचार आ‘ दमनसँ बँचबाक कोनो आन उपाय नहि पाबि, शासनक विरुद्ध बागी नहि भए जाए;
जे ँ कि राष्ट्रसभक बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बढ़ाएब परमावश्यक अछि;
जे ँ कि राष्ट्रसंघक लोक अपन चार्टर मध्य मौलिक मानवाधिकारमे, मानवक गरिमा आ‘ मूल्यमे तथा स्त्री
आ‘ पुरुषक बीच समान अधिकारमे अपन निष्ठा पुनः परिपुष्ट कएलक अछि आओर व्यापक स्वतन्त्रताक
संग सामाजिक प्रगति आ‘ जीवन स्तरक समुन्नयन हेतु कृत संकल्पित अछि;
जे ँ कि सदस्य राष्ट्रसभ राष्ट्रसंघक सहयोगसँ मानवाधिकार आ‘ मौलिक स्वतन्त्रताक सार्वभौम आदर
तथा अनुपालन करबाक हेतु प्रतिबद्ध अछि;
जे ँ कि एहि प्रतिबद्धताक पूर्ति हेतु उक्त अधिकार आ स्वतन्त्रताक सामान्य बोध परम महत्त्वपूर्ण अछि,
ते ँ आब,
साधारण सभा
निम्नलिखित सार्वभौम मानवाधिकार घोषणाके ँ सभ जनता आ‘ सभ राष्ट्रक हेतु उपलब्धिक सामान्य
मानदण्डक रूपमे, एहि उद्देश्यसँ उद्घोषित करैत अछि जे प्रत्येक व्यक्ति आ‘ प्रत्येक सामाजिक एकक
एहि घोषणाके ँ निरन्तर ध्यानमे रखैत शिक्षा आ‘ उपदेश द्वारा एहि अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक प्रति
सम्मान भावना जगाबए तथा उत्तरोत्तर एहन उपाय-राष्ट्रीय आ अन्तरराष्ट्रीय-करए जाहिसँ सदस्य

राष्ट्रसभक लोक बीच तथा अपन अधीनस्थ अधिक्षेत्रहुक लोक बीच एहि अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताके ँ
सार्वभौम आ‘ प्रभावकारी स्वीकृति प्राप्त भए सकैक। ष्
अनुच्छेद 1
सभ मानव जन्मतः स्वतन्त्र अछि तथा गरिमा आ‘ अधिकारमे समान अछि। सभके ँ अपन-अपन बुद्धि आ‘
विवेक छैक आओर सभके ँ एक दोसराक प्रति सौहार्दपूर्ण व्यवहार करबाक चाही।
अनुच्छेद 2
प्रत्येक व्यक्ति एहि घोषणामे निहित सभ अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक हकदार थिक आओर एहिमे नस्ल,
लिंग, भाषा, धर्म, राजनैतिक वा अन्य मत, राष्ट्रीय वा सामाजिक उद्भव, सम्पत्ति, जन्म अथवा अन्य
स्थितिक आधार पर कोनहु प्रकारक भेदभाव नहि कएल जाएत। आओर ओ व्यक्ति जाहि देशक थिक
तकर राजनैतिक अधिकारितामूलक वा अन्तरराष्ट्रीय आस्थितिक आधार पर कोनो भेदभाव नहि कएल
जाएत-भनहि ओ देश स्वाधीन हो, ट्रस्ट हो, परशासित हो वा सम्प्रभुताक कोनो अन्य परिसीमाक अधीन
हो।
अनुच्छेद 3
सभके ँ जीवन-धारण, स्वातन्त्र्य आ‘ व्यक्तिगत ़सुरक्षाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 4
केओ व्यक्ति दासता वा बेगारीमे नहि रहत आओर सभ प्रकारक दासप्रथा आ‘ दासक खरीद-बिकरी
वर्जित होएत।
अनुच्छेद 5
ककरहु क्रूर, अमानुषिक वा अपमानजनक दण्ड नहि देल जाएत आ‘ ककरोसँ एहन व्यवहार नहि कएल
जाएत।
अनुच्छेद 6
प्रत्येक व्यक्तिके ँ सभठाम कानूनक समक्ष एक मानव रूपमे अपन मान्यताक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 7
सभ केओ कानूनक समक्ष समान अछि आ‘ बिना कोनो भेदभावक कानूनक संरक्षणक हकदार अछि।
अनुच्छेद 8
सभके ँ एहन कार्यक विरुद्ध जे संविधान वा विधि द्वारा प्रदत्त ओकर मौलिक अधिकारक हनन करैत हो
सक्षम राष्ट्रीय न्यायालयसँ उचित उपचार (न्याय) पएबाक हक छैक।
अनुच्छेद 9
केओ स्वेच्छासँ ककरो गिरफ्तार, नजरबन्द वा देश निर्वासित नहि करत ।

अनुच्छेद 10
सभ व्यक्तिके ँ अपन अधिकार आ‘ दायित्वक अवधारणार्थ तथा अपना पर लगाओल गेल कोनो
आपराधिक आरोपक अवधारणार्थ कोनो स्वतन्त्र आ‘ निष्पक्ष न्यायालय द्वारा पूर्ण समानताक संग उचित
आ‘ सार्वजनिक विचारणक हक छैक।
अनुच्छेद 11
1. दण्डनीय अपराधक आरोपी प्रत्येक व्यक्ति ताधरि निर्दोष मानल जएबाक हकदार अछि जाधरि
कोनो सार्वजनिक विचारणमे, जाहिमे ओकरा अपन समुचित सफाइ देबाक सभ गारंटी प्राप्त
होइक, विधिवत् दोषी सिद्ध नहि कए देल जाए।
2. जँ केओ व्यक्ति एहन कोनो दण्डनीय कार्य वा लोप करए जे घटनाक कालमे प्रचलित कोनो
राष्ट्रीय वा अन्तरराष्ट्रीय कानूनक दृष्टिमे दण्डनीय अपराध नहि थिक तँ ओ व्यक्ति एहि हेतु
दण्डनीय अपराधक दोषी नहि मानल जाएत।
अनुच्छेद 12
केओ व्यक्ति कोनो आन व्यक्तिक एकान्तता, परिवार, निवास वा संलाप (पत्राचारादि) मे स्वेच्छया हस्तक्षेप
नहि करत आ‘ ने ओकर प्रतिष्ठा आ‘ ख्याति पर प्रहार करत। प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन हस्तक्षेप वा
प्रहारसँ कानूनी रक्षा पएबाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 13
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन राष्ट्रक सीमाक भीतर भ्रमण आ‘ निवास करबाक स्वतन्त्रता छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन देश वा आनो कोनो देश त्यागबाक आ‘ अपना देश घूरि अएबाक
अधिकार छैक।
अनुच्छेद 14
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ उत्पीड़नसँ बँचवाक हेतु दोसर देशमे शरण मङबाक अधिकार छैक।
2. एहि अधिकारक उपयोग ओहि स्थितिमे नहि कएल जाए सकत जखन ओ उत्पीड़न वस्तुतः
अराजनैतिक अपराधक कारणे ँ भेल हो अथवा राष्ट्रसंधक उद्देश्य आ‘ सिद्धान्तक विरुद्ध कोनो
काज करबाक कारणे ँ े।
अनुच्छेद 15
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ राष्ट्रीयताक अधिकार छैक।
2. कोनो व्यक्तिके ँ राष्ट्रीयताक अधिकारसँ अथवा राष्ट्रीयता -परिवर्तनक अधिकारसँ अकारण
वंचित नहि कएल जा सकत।
अनुच्छेद 16
1. सभ वयस्क स्त्री आ‘ पुरुषके ँ नस्ल, राष्ट्रीयता वा सम्प्रदायमूलक केानो प्रतिबन्धक बिना, विवाह
करबाक आ‘‘ परिवार बनएबाक अधिकार छैक। स्त्री आ पुरुष दूनूके ँ विवाह, दाम्पत्य-जीवन
तथा विवाह-विच्छेदक समान अधिकार छैक।
2. विवाह, तखनहि होएत जखन इच्छुक पति आ‘पत्नीक स्वच्छन्न आ पूर्ण‘ सहमति हो।

3. परिवार समाजक एक सहज आ‘ मौलिक एकक थिक आओर एकरा समाजक आ‘ राज्यक
संरक्षण पएबाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 17
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ एकसरे आ‘ दोसराक संग मिलि सम्पत्ति रखबाक अधिकार छैक।
2. केओ स्वेच्छया ककरहु सम्पत्तिसँ वंचित नहि करत।
अनुच्छेद 18
प्रत्येक व्यक्तिके ँ विचार, विवेक आ धर्म रखबाक अधिकार छैक। एहि अधिकारमे समाविष्ट अछि धर्म आ
विश्वासक परिर्वतनक स्वतन्त्रता, एकसर वा दोसराक संग मिलि प्रकटतः वा एकान्तमे शिक्षण, अभ्यास,
प्रार्थना आ अनुष्ठानक स्वतन्त्रता।
अनुच्छेद 19
प्रत्येक व्यक्तिके ँ अभिमत एवं अभिव्यक्तिक स्वतन्त्रताक अधिकार छैक, जाहिमे समाविष्ट अछि बिना
हस्तक्षेपक अभिमत धारण करब, जाहि कोनहु क्षेत्रसँ कोनहु माध्यमे ँ सूचना आ‘ विचारक याचना, आदान
प्रदान करब।
अनुच्छेद 20
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँशान्तिपूर्ण सम्मिलन आ संगठनक स्वतन्त्रताक अधिकार छैक।
2. कोनहु व्यक्तिके ँ संगठन विशेषसँ सम्बद्ध होएबाक लेल विवश नहि कएल जाए सकैछ।
अनुच्छेद 21
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन देशक शासनमे प्रत्यक्षतः भाग लेबाक अथवा स्वतन्त्र रूपे ँ निर्वाचित
अपन प्रतिनिधि द्वारा भाग लेबाक अधिकार छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपना देशक लोक-सेवामे समान अवसर पएबाक अधिकार छैक।
3. जनताक इच्छा शासकीय प्राधिकारक आधार होएत। ई इच्छा आवधिक आ‘ निर्बाध निर्वाचनमे
व्यक्त कएल जाएत आओर ई निर्वाचन सार्वभौम एवं समान मताधिकार द्वारा गुप्त मतदानसँ
होएत अथवा समतुल्य मुक्त मतदान प्रक्रियासँ।
अनुच्छेद 22
प्रत्येक व्यक्तिके ँ समाजक एक सदस्यक रूपमे सामाजिक सुरक्षाक अधिकार छैक आओर प्रत्येक
व्यक्तिके ँ अपन गरिमा आ‘ व्यक्तित्वक निर्बाध विकासक हेतु अनिवार्य आर्थिक, सामाजिक आ‘
सांस्कृतिक अधिकार-राष्ट्रीय प्रयास आओर अन्तरराष्ट्रीय सहयोगसँ तथा प्रत्येक राज्यक संघठन आ‘
संसाधनक अनुरूप-प्राप्त करबाक हक छैक।
अनुच्छेद 23
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ काज करबाक, निर्बाध इच्छाक अनुरूप नियोजन चुनबाक, कार्यक उचित आ‘
अनुकूल स्थिति प्राप्त करबाक आ‘ बेकारीसँ बँचबाक अधिकार छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ समान काजक लेल बिना भेदभावक समान पारिश्रमिक पएबाक अधिकार छैक।

3. काजमे लगाओल गेल प्रत्येक व्यक्तिके ँ उचित आ‘ अनुरूप पारिश्रमिक ततबा पएबाक अधिकार
छैक जतबासँ ओ अपन आ‘ अपन परिवारक मानवोचित भरण-पोषण कए सकए आओर प्रयोजन
पड़ला पर तकर अनुपूरण अन्य प्रकारक सामाजिक संरक्षणसँ भए सकैक।
4. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन हितक रक्षाक हेतु मजदूरसंघ बनएबाक आ‘ ओहिमे भाग लेबाक अधिकार
छैक।
अनुच्छेद 24
प्रत्येक व्यक्तिके ँ विश्राम आ‘ अवकाशक अधिकार छैक जकर अन्तर्गत अछि कार्य-कालक उचित सीमा
आ समय-समय पर वेतन सहित छुट्टी।
अनुच्छेद 25
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन जीवन-स्तर प्राप्त करबाक अधिकार छैक जे ओकर अपन आ‘ अपना
परिवारक स्वास्थ्य एवं कल्याण हेतु पर्याप्त हो। एहिमे समाविष्ट अछि भोजन, वस्त्र, आवास आ
चिकित्सा तथा आवश्यक सामाजिक सेवाक अधिकार आओर जँ अपरिहार्य कारणवश बेकारी,
बीमारी, अपंगता, वैधव्य, वृद्धावस्था अथवा अन्य प्रकारक दुरस्था उपस्थित हो तँ, ओहिसँ सुरक्षाक
अधिकार ।
2. परसौती आ‘ चिल्हकाके ँ विशेष परिचर्या आ सहायताक अधिकार छैक। प्रत्येक बच्चाके ँ, चाहे
ओ विवाहावधिमे जनमल हो वा ताहिसँ बाहर, समान सामाजिक संरक्षणक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 26
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ शिक्षा प्राप्तिक अधिकार छैक। शिक्षा कमसँ कम आरम्भिक आ‘ मौलिक
अवस्थामे निःशुल्क होएत। आरम्भिक शिक्षा अनिवार्य होएत। तकनीकी आ व्यावसायिक शिक्षा
सामान्यतया उपलभ्य होएत तथा उच्चतर शिक्षा सेहो सभके ँ योग्यताक आधार पर भेटतैक।
2. शिक्षाक लक्ष्य होएत मानव व्यक्तित्वक पूर्ण विकास आओर मानवाधिकार आ‘ मौलिक स्वतन्त्रताक
प्रति आदरभाव बढ़ाएब। शिक्षा राष्ट्रसभक बीच तथा जातीय वा धार्मिक समुदायसभक बीच
पारस्परिक सद्भावना, सहिष्णुता आ‘ मैत्री बढ़ाओत तथा शान्तिक हेतु राष्ट्रसंधक प्रयासके ँ गति
देत।
3. माता पिताके ँ ई चुनबाक तार्किक अधिकार छैक जे ओकर सन्तानके ँ कोन प्रकारक शिक्षा देल
जाए।
अनुच्छेद 27
1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ समाजक सांस्कृतिक जीवनमे अबाध रूपे ँ भाग लेबाक, कलाक आनन्द लेबाक
तथा वैज्ञानिक विकासमे आ‘ तकर लाभमे अंश पएबाक अधिकार छैक।
2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन सृजित कोनहु वैज्ञानिक, साहित्यिक अथवा कलात्मक कृतिसँ उत्पन्न,
भावनात्मक वा भौतिक हितक रक्षाक अधिकार छैक।
अनुच्छेद 28
प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन सामाजिक आ अन्तरराष्ट्रीय आस्पद प्राप्त करबाक अधिकार छैक जाहिसँ
एहि घोषणामे उल्लिखित अधिकार आ‘ स्वतन्त्रता प्राप्त कएल जाए सकए।

अनुच्छेद 29
1. प्रत्येक व्यक्ति ओहि समुदायक प्रति कत्र्तव्यबद्ध अछि जाहिमे रहिए कए ओ अपन व्यक्तित्वक
अबाध आ‘ पूर्ण विकास कए सकैत अछि।
2. प्रत्येक व्यक्ति अपन अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक उपयोग ओहि सीमाक अभ्यन्तरे करत जकर
अवधारण दोसराक अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक आदर आ‘ समुचित स्वीकृतिके ँ सुनिश्चित करबाक
उद्देश्यसँ तथा नैतिकता, विधिव्यवस्था आ जनतान्त्रिक समाजमे सामान्य जनकल्याणक अपेक्षाक
पूर्तिक उद्देश्यसँ कानून द्वारा कएल जाएत।
3. एहि स्वतन्त्रता आ‘ अधिकारक प्रयोग कोनहु दशामे राष्ट्रसंधक सिद्धान्त आ‘ उद्देश्यक प्रतिकूल
नहि कएल जाएत।
अनुच्छेद 30
एहि घोषणामे उल्लिखित कोनो बातक निर्वचन तेना नहि कएल जाए जाहिसँ ई घ्वनित हो जे कोनो
राज्यके ँ वा जनगणके ँ एहन गतिविधिमे संलग्न होएबाक वा कोनो एहन काज करबाक अधिकार
छैक जकर लक्ष्य एहि घोषणाक अन्तर्गत कोनो अधिकार वा स्वतन्त्रताके ँ बाधित करब हो।

Thursday, March 26, 2009

बिहार पर एकटा कार्टून

महाभारत- बिलट पासवान 'विहंगम'

अहंकार
आ महत्त्वाकांक्षा
जखन
विवेकक सीमामे नहीं अँटैछ,
महाभारत-
तखने मचैछ।

पुत्र-मोहमे पड़िक'
आनक हिस्सा हड़पैए
जखन आन्हर धृतराष्ट्र
द्रोपदीक अपमानसँ
लज्जित होइत अछि;
जखन सम्पूर्ण राष्ट्र;
सम्पत्ति
आ शक्तिक मदमे
जखन दुर्योधन
नँगटे नचैछ;
महाभारत-
तखने मचैछ।

समीक्षा श्रृंखला-1 विनीत उत्पलक मैथिली कविता संग्रह "हम पुछैत छी"- समीक्षक डॉ.गंगेश गुंजन

कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन



विश्व बजारी एहि समाज मे, भाषा-साहित्य सभक संसार मे सेहो बजारे जकां मंदी पसरल अछि। लगभग इएह परिस्थिति बेसी कला-विधाक बुझाइछ। साहित्यमे किछु आर विशेषे। ताहू मे कविताक विधा आओरो अनठिआएल अछि, किछु स्वयं कात करोट भेल आ किछु कएल जा रहल अछि। प्रकाशके टा द्वारा नहि, स्वयं संबंधित भाखा-भाखी अधिसंख्य लोक समाज द्वारा सेहो। जतए स्वयं कविक द्वारा, से अवश्य खेद करवाक विषय। कविता व्यक्ति कें अपन समाज मे एकटा आओर प्रतिष्ठा मात्र दिअयबाक मूल्य पर बेशी दिन जीवित नहि रहि सकैत अछि। अर्थात् कोनो सम्भ्रान्त व्यक्तिक भव्य ड्र्ाइंग रूम मे एक टा आओर इम्पोर्टेड दामी वस्तुक प्रदर्शनीय नमूनाक माल कविता नहि बनाओल जा सकैत अछि, जे कि दुर्भाग्य सं भ’ रहल अछि। भाषा वैह टा ओतबे जीवित अछि वा रह’वाली बुझा रहल अछि जे मात्र अपन भाषिक उपयोगिता बा कही अपन क्रय-विक्रय-मूल्यक बलें जीवित रहि सकय। ग्लोबल बजार मे भाषा अपन प्रवेश- जतेक दूर आओर गंहीर धरि करवाक क्षमता रखने अछि, ताही सामर्थ्यक उपयोगिते पर, ओतवे दुआरे जीवित राखल जा रहल अछि, कोनो अपन काव्य-सम्पत्ति, सांस्कृतिक अस्मिता आ भाषाक प्राचीनता बा महानताक जातीय स्वाभिमानक आधार पर नहि। तें दुर्भाग्यवश ई समय अपन-अपन भाषाक महानता ल’ क’ आत्म गौरव सं भरब तं फराक, जे मुग्ध पर्यन्त होयबाक समय नहि बांचि गेल अछि। हॅं, भाषाक ‘दाम’ ल’ क’ निश्चिन्त रहवाक बा कम बिकाएब ल’ क’ चिन्तित होयबाक समय अछि। मुदा कविता मे भाषाक आशय आ अस्तित्व कें एहन तात्क्षणिक बूझि लेब कोनो भाषा-साहित्यक मूल सं छूटि क’ आगां बढ़वाक बुद्धि कें अवसरवाद छोड़ि, दोसर किछु ने मानल जा सकैत अछि। समकालीन समस्त कवि कें, नवागन्तुक के तं अनिवार्यतः बजार आ कविता भाषाक बीचक एहि भेद कें नैतिक बुद्धियें बूझि’ए क’ एकर बाट चलवाक प्रयोजन । अन्यथा ई कविता सेहो एक टा नव पैकेटक नव उत्पाद बनि क’ दोकान मे रहत। पोथीक दोकान मे नहि। साज-शृंगारक कोनो मॉल मे, जत’ जनसाधारण लोकक पहुंचबो दुर्लभ! आब से बजार आ कविताक भाषाक एहि द्वन्द्व सं निकलैत भाषाक ई यात्रा कोन नीति-बुद्धि सं कएल जयवाक प्रयोजन ताहि विषय पर गंभीरता सं मंथन कर’ पड़त। स्वविवेक। ई त्वरित चाही। उत्पल जीक एहि कविता-पाण्डुलिपिक लाथें, ई चर्चा हमरा अभीष्ट भेल आ संभव, एकर श्रेय तें हम हिनके दैत छियनि। कारण बतौर काव्य-प्रवेशार्थी भाषा-व्यवहारक ई दायित्व हिनको वास्ते प्राथमिकताक डेग छनि। कविता भाषाहिक सवारी पर लोक धरिक अपन यात्रा करैत छैक। जेहन सवारी, जेहन सवार तेहन यात्रा। ताही मे गन्तव्य, काव्यबोध, युग आ जीवन-दर्शन समेत बहलमानी कही, कोचमानी कही, बा ड्र्ाइभरी-पॉयलटी तकर कर्म कुशलता, ई सभ तत्व अंतर्निहित छैक। बल्कि कएटा अन्यान्यहुं विषय जे कोनो कवि अपना साधनाक प्रक्रिया आ स्वविवेक सं निरन्तर अपने विकसित करैत जाइत अछि। मुदा तकरा यथावत “शब्द मे कहि सकब, प्रायः एखनो हमरा बुतें संभव नहि। कए दशक सं कविता लिखि रहल छी।

हिन्दी सन व्यापक भाषाक स्थापित नीक-नीक स्वनामधन्य कवि पर्यन्त अपन कविता-पोथी अपने छपा रहल छथि। बिकाइ छनि तं बेचि रहल छथि। कोनो ब्रांड प्रकाशक सं खामखा छपवहि चाहैत छथि तं ओकरा पुष्ट मात्रा मे धन दैत छथिन। सरकारी पुस्तकालय सभ मे थोक मात्रा मे ‘खपबा’ देबाक वचन दैत छथिन, तखन अपन गुडविल दैत छनि। वा अपने अर्थ सक्षम कवि-लेखक अपना पुस्तकक संपूर्ण प्रकाशन-व्यय स्वयं करैत छथि। तें पाठक आइ धनिके कवि टा कें, ब्रांड प्रकाशन सभ मे पढ़ि सकवाक सौभाग्य पबैत अछि । मैथिलीक स्थान निरूपण तं सहजहिं कएल जा सकैए। मैथिली मे तं ओहिना प्रायः सभ टा साहित्ये लेखक-कवि कें अपना अपनी क’ अपने छपबाव’ पड़ैत छैक। महाकवि यात्रीजी पर्यन्त विशय आबहु जीवित अति पुरना किछु लोक आ यात्रीजीक स्नेही-श्रद्धालु पाठक समेत हमरा खाढ़ीक हुनक स्नेह-समीपी किछु रचनाकार कें बिसरल नहि हेतनि। पोथीक प्रसार आ विक्रय सं मैथिल लेखकक केहन उद्यम जुड़ल रहलैक अछि! प्रकाशक कत’? अर्थात् कविता आ साहित्य कवि आ साहित्यकारहिक संसार मे जीवित अन्यथा मृत नहियों तं अनुपस्थित तं अनुभव कएले जा रहल अछि। ई युग यथार्थ एकदम देखार अछि।

एहना मे क्यो एक टा मैथिल युवक अपन समस्त ऊर्जा-उत्साहक संग दिल्ली मे कोनो संध्या बा प्रात अपन मैथिली कविताक पाण्डुलिपि दैत अपने कें ‘भूमिका’ लिखि देवाक आग्रह करथि तं केहन लागत ? मतलब जे प्रथम दृष्टया केहन अनुभव हएत? हमरा तं युवक दुस्साहसी आ किंचित गै़रजवाबदेह बुझयलाह। ओना जकरा साहस नहि हेतैक से कविताक बाट धइयो कोना सकैये !

अपन कुल अड़तालीस पृष्ठक अड़तीस कविताक पाण्डुलिपि दैत श्री उत्पल विनीत जखन से कहलनि तं किंचित असमंजस तं भेवे कएल। भूमिका-लेखन-काज सेहो एहि युग मे अपन धर्मान्तरण कए लेलक अछि। हमर प्राथमिकता सं तें बाहरे अछि। तथापि यदि कोनो मैथिली कविताक भविष्य एना सोझां उपस्थित हो तं स्वागत कोना नहि हो ! ताहू मे भागलपुरक नवतूर !

पाण्डुलिपि पढ़वाक क्रम मे हमरा कचकोही कविता ;मैथिली कवि विनोद जीक “शब्द मे कंचकूहद्धहोयवाक अनुभव भेलाक बादहु-कवि प्रतिभाक छिटकैत सूक्ष्म किरणक सेहो अनुभव, प्रिय आ आश्वस्तिकारक बुझाएल। स्वागत तें कहल अछि। उत्पलजीक प्रतियें उद्गार मे।

कविक प्रस्तावना हिनक कविताक संसार कें बुझबा मे विशेष सहायक अछि जे ई बड़ स्पष्ट बुद्धियें आ पूर्ण मनोयोग सं लिखलनिहें। हिनकर रचनाक बुनियादी वर्तमान आ सरोकारक उद्घोश जकां छनि। से मात्र वयसोचित उच्छ्वास नहि, बल्कि अपन वचनबद्धताक स्वरूप मे कहल गेल छनि।

सभ समयक नवीन पीढ़ी रचनाकारक सम्मुख अपन वर्तमाने प्रायः सब सं प्रखर चुनौती रहैत छैक। अतीत आ भविष्य तं अ’ढ़ मे रहैत छैक। रचनाकारक रूप मे अतीतक वास्ते ओकर नीक-बेजायक वास्ते ओकरा उत्तरदायी नहि बनाओल जा सकैए। यद्यपि ताही तर्क सं भविष्यक लेल ओकरा छोड़ि सेहो नहि देल जा सकैए। कारण समाजक भविष्य निर्माणक प्रक्रिया मे अन्य सभ सामाजिक कारण आ प्रेरक परिस्थिति सभ समेत, समकालीन रचनाकारहुक परोक्ष मुदा प्रमुख भूमिका रहबे करैत छैक। तें कविक दायित्व ल’ द’ क’ अपन समकालीनताक ज्ञान आओर अनुभव के विवेक सम्मत सम्वेदनाक रूप मे विकसित करैत अग्रसारितो कर’ पड़ैत छैक। जाहि सघनता आ व्यापकता सं कवि युगक “अतीत-ताप अर्थात् जीवनक दुःख-द्वन्द्व आ यथार्थ कें बूझि-पकड़ि पबैत अछि आ तकरा अपन रचना मे दूरगामी प्राणवत्ताक कलात्मक शिल्प द’ पबैत अछि, सैह ओकर प्रतिभाक सामर्थ्यक रूप मे दर्ज कएल जाइत छैक। कोनो रचनाकार अपना कृति मे बहुत युग धरि रहवाक सहज आकांक्षी होइतहिं अछि। तें हमरा जनैत मनुक्खक जिजीविशा आओर कविताक जिजीविशा मे तात्विक किछु भेद नहि। कवि जे अंततः मनुक्खे होइत अछि। तें दुनूक “आशक्ति अन्योनाश्रित होइछ।

विनीतजीक कविता मोटामोटी हमरा तीन अर्थछाया सं वेष्ठित अनुभव भेल। कविता मे अपन कथनक कोटि, तकर पकड़ आ प्रयोगक विधि। कएटा रचना तें कंचकोह जे कहल, से छैक एखन। कएटा भावानुभूति मे संवेदनशील मुदा कथन मे अपेक्षाकृत बेजगह। “कविताक विषय कथात्मक सांच मे कहि देल गेलैक अछि, जे स्वाभाविके, ओ कविता विशेष अपन जाहि अनुभव-निष्पत्तिक योग्य सक्षम रहैक आ उपयुक्तो, से नहि भ’ सकलैक अछि। से आगां सकुशल सफलता पाबि जाइक तकर सामर्थ्य कविता मे अवश्ये झलकैत छैक। से साफ-साफ। तें ओतहु निराशा नहि, आस्वस्ति छैक। कवि आ कविता दुनू अपना प्रकृतियें बनिते-बनिते बनैत छैक। तेसर जे अति ज्वलंत अतः कविताक प्राणानुभूति वला अनुभव कें पर्यन्त कवि किछु तेहन अंदाज मे कहि जाइत छथि जे ओकर वांछित प्रभाव पाठकक मन पर ओएह नहि पड़ैत छैक जे स्वयं कविक अभीष्ट छनि। अगुताइ मे कहल गेल सन आभास होइत छैक। कारण जे कविता मात्र कन्टेंटे नहि, कहवाक छटा आ व्यंजनाक कलात्मक स्तर पर काज करवाक कविक समुचित भाषिक क्षमता सेहो थिक।

बहुत सोचला उतर आधार भेटल जे, तकर यदि कोनो एकटा कारण देखल जाय, तं भाषाक अवरोध बुझाएल। कोनो भाषा स्वयं मे मात्र ओ भाषा टा नहि अपितु पूरा संस्कृति होइत छैक। भाषा मात्र ओकर बोध बा ज्ञाने नहि, ओकर संवेदना सेहो होइत अछि। अर्थात कोनो प्राचीन समृद्ध संस्कृतिक अभिव्यंजना लेल ओहि संस्कृतिक भाषाहुक प्रवाह मे प्रवेश चाही। से प्रवेश हमरा बुद्धियें भाषाक नाव टा सं संभव होइत छैक। नाव एकहि संग खेबैया सं ओकर स्वस्थ बल समेत कएटा अन्यान्य कुशलताक मांग करैत छैक। कवि सं कविता-विषय, तहिना। तें भाषाक साधना, कोनो कविक काव्य-यात्रा कें सुगम बनवैत छैक।सुचारु करैत छैक। दोसर जे, जेना जीवन आओर युग यथार्थ परिवर्तनशील होइत अछि , तहिना भाषाक भूमिका सेहो बदलैत छैक। अर्थात् भाषाक मिज़ाज।

उत्पल विनीतजी कें भाषाक रूप मे एखन मैथिलीक संग बहुत बेशी आयन-गेन करवाक प्रयोजन। तखनहि मैथिलीक सहज स्वाभाविक “शक्ति सं आत्मीयता आ परिचय विकसित भ’ सकतनि। भाषा कें अपन काव्य प्रयोगी अभियान मे विश्वसनीय संगी बनब’ पड़तनि। सभ कें बनब’ पड़ैत छैक। मातृ भाषा हएब, कविक सामर्थ्य तं होइछ मुदा काव्य सामर्थ्यो सेहो भ‘ जाइक, से आवश्यक नहि। तें कोनो कविक वास्ते काव्यभाषाक सिद्धि अभीष्ट।अनुभव तं जीवनक निरंतर अंतरंगता आओर सरोकार सं अपना स्वभावें चेतनाक अंग बनैत चलैत छैक। सैह रचनाकार कें श्रेय तथा प्रेयक विवेक भरैत रहैत छैक।

एहि टटका, उूर्जावान-संवेदनशील कविक पथ प्रशस्त हेतनि से विश्वास अछि। बहुत-बहुत स्नेह-“शुभाशंसाक संग, कालजयी कविताक आशा मे।

Tuesday, March 24, 2009

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (तेसर कड़ी)


गामक
समय हम कहियो नय बिसरि सकैत छी ओहि समयक गप्प थिक जखनि कि हमर बहिनक विवाह s गेल छलैन्ह सभ चलि गेल छलिहहमर बाबूजी छोटका काका हमारा लेल वर ताकय लेल गेल छलैथ आई कालिक हिसाब s s हम ओहि समय एकदम बच्चा रहि आ शहर में रहलाक कारणे हम गाम घरक बहुत किछु नहि बुझैत छलौं। सब s बेसी विवाह बैसाख, जेठ आषाढ़ में होयत छैक, अर्थात शुद्ध रहैत छैक ओहि ज़माना में, अर्थात १९७२ ईस्वी में गामक रौनक किछु और रहैत छलै प्रतिदिन कतो नय कतो विवाह होयत छलैक जाहि में दादी हमरा लय जयबाक आग्रह अवश्य करैत छलीह हमहूँ कहियो विवाह नय देखने छलौं, पहिल विवाह हम अपन दीदी (पितिऔत ) कs देखलियैन्ह।


ओही समय में बेसी विवाह सभा s ठीक भेलहा सब रहैत छलैक जाहि कारणे हरबरी वाला विवाह हमरा देखय s ओतेक इच्छा नय होयत छल, मुदा दादी केs मोन रखबाक लेल हुनका संग कतो कतो चलि जायत छलौंह ओहि समय हम परीक्षा फलक प्रतीक्षा में रही आर कोनो काजो तs हमरा नहि छलाह


एक दिन हम, माँ दादी आंगन में बैसल छलियै कि एकटा खबासनी आयल दादी के कहलकैन्ह " मलिकैन कनि एम्हर आयल जाओ " सुनतहि दादी ओकरा लग चलि गेलिह, पता नय हुनका कि कहलकैन्ह कनि कालक बाद दादी हमरा कहलैथ "चलs हम तोरा एकटा सोलकनि सबहक विवाह देखाबैत छियौक" हमरा आश्चर्य
भेल जे आई दादी केs की भेलछैन्ह जे हमरा सोलकनि s विवाह देखय लेल कहैत छथि हम आश्चर्य सs पुछलियैन्ह "अहाँ सोलकनि s विवाह देखय लेल जायब "? दादी मुसकैत हमरा कहलैथ "चलहि नय अहि ठाम, ब्रम्ह स्थान लग बरियाती छैक, दूरे s खाली बरियाती देखि चलि आयब दूनू गोटे"


हमारा मोन s नहि होइत छलय बरियाती देखबाकs, मुदा हम दादी s संग जएबाक जयबाक लेल तैयार भs गेलियैन्ह ब्रम्ह स्थान लगे छलय, हम दुनु गोटे जखन ओतहि पहुँचलौं तs देखलियय जे ओतहि बीच में पालकी राखल ढोल पिपही बाजैत छलैह, जों आगु बढ़लौं तs देखैत छी जे ओहि पालकी में वर मुंह पर रूमाल देने बैसल छैथ एकटा बच्चा हुनका आगू में बैसल छलैन्ह, बरियाती सब सेहो बैसल छलैक खैर हम सब आगू बढिकs बरियाती लग पहुँच गेलिये हमरा निक भलहि नय लागैत छल मुदा पहिल बेर अहि तरहक बरियाती देखैत रही हम आश्चर्य s बरियाती देखैत रही कि कनिये कालक बाद सब बरियाती ठाढ़ s गेलैथ पिपही ढोल जोर बाजय लगलय हम सब कनि पाछू s गेलौं, जहिना पालकी उठलय कि हमरा माथ पर कियो पानी ढ़ारि देने छलs हम हक्का बक्का s s एम्हर ओम्हर ताकय लगलौं, देखैत छी दादी s हाथ में गिलास छलैन्ह हम कानय लगलियय देखि s दादी हमरा तुंरत हँसैत कहलैथ गर्मी छलैक ताहि द्वारे ठंढा देलियौक हमरा
बड़
तामस भेल


हम सब जखैन घर पहुँचलौं, हम कानैत माँ s कहलियय हम कहियो दादी संग विवाह देखैक लेल नय जायब हमर एकटा पीसी ओहि ठाम बैसल रहैथ, कहि उठलीह, " नय कानि तोहरे निक लेल केलथुन" हमरा किछु नय बुझय में आयल बकलेल जकां हुनकर मुंह देखैत पुछलियैन्ह "कि निक भेल, सभटा कपड़ा भीजि गेल"? सुनि s कहलैथ "गय बरियाती s जेबा काल पानि माथ पर देला सs लोकक विवाह जल्दि होयत छैक ताहि लेल तोरा पानि देलथुन " हम आर जलि भुनि s ओतहि s चलि गेलौंह ओकर कनिये दिनक बाद हमर विवाह भs गेल



जहिया हमर विवाह भेल ओहि समय हमर घरवाला श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर इंजीनियरिंग के अन्तिम बरख में पढैत छलाह हम मैट्रिक के परीक्षा देने रहि परीक्षा फल सेहो निकलि गेल छलs हमर विवाह आषाढ़ मास में, (दिनांक १३ जुलाई) भेल छलs विवाहक तुंरत बाद मधुश्रावणी छलैक ताहि द्वारे हम गाम पर रही गेलौं हमर काका मधु(हमर पितिऔत बहिन) के संग रांची चलि गेलाह काका हमरा कहैत गेलाह जे हमर परीक्षा फल आदि स्कूल s s कॉलेज में हमर नाम लिखवा देताह तैं हम निश्चिन्त रही हमर काका नाम लिखवेलाक बाद हमरा खबरि सेहो s देलाह हमर नाम "निर्मला कॉलेज रांची" में लिखायल छल


दादी के आग्रह पर हमरा गाम पर रहि मधुश्रावनी करवा के छलs, बहिनक विवाह सs अपन विवाह मधुश्रावनी धरि करिब दू मास सs बेसी रहय परल छलs हम पहिल बेर अपना होश में एतेक दिन गाम पर एक संग रहल रहि ओना तs हम सब, सब साल गाम जायत रही, मुदा एक संग एतेक दिन नय रहैत रहि पहिल अन्तिम बेर छलs जे हम गामक मजा निक जकां s सकलियैक

-कुसुम ठाकुर-

क्रमशः ........

Monday, March 23, 2009

RECESSION यानि मंदी

RECESSION यानि मंदी
मंदी जे नए कराबे...सुनए में बर आसान शब्द लागे ये मुदा बर खतरनाक शब्द छी इ RECESSION.
अमेरिकी आर्थिक मंदी (US recession) के असर भारत पर भी भ गेल आ धीरे-धीरे जटिल भा रहल ये । अखबार, न्युज चैनल (हिन्दी, अंग्रेजी) सब में अए सा जुरल न्युज के भरमार ये। अही कारण कतेक रास कंपनी सब बंद भ रहल ये, सब सा बेस छेाट कंपनी के मंदी झटका लागल ये। कतेक युवा छन में रेाजगार साँ बेरेाजगार भ गेल आ भ रहल ये, कतेक चुल्हा बंद हेाए के कगार पर ये, कतेक लाखपति धरातल पर आबि गेल ये । देश के अरबपति के कमाई पर मंदी जबरदस्त सेंध लगालक ये आ लगभग सब के संपत्ति में करीब 61 परसेंट तक के गिरावट आएल ये। रेाज कुनु नए कुनु कंपनी पींक स्लीप या रिलेाकेशन थमा रहल ये । सच पुछु ता हमरेा डर लागे ये, आए के समय में किछ भी भा सके ये अखन तक ता बिरला ग्रुप आ किछ ढंग के कंपनी एहि तरह के एकसन ने ल रहल ये लेकिन भबिस्य के नए पता। एही मामले में सरकारी नेाकरी बाला बृन्द सब ठीक अैछ ।

हमर दू टा कविता 1.नाव आ जीवन 2.मौनक शब्द -सतीश चन्द्र झा

1.नाव आ जीवन


नाव नदी मे चलल सोचि क’
दूर नदी के अंत जतय छै।
देखब आई ठहरि क’ किछु छण
नदी समुद्रक मिलन कतय छै।
छै संघर्ष क्षणिक चलतै जौ
जल धारा विपरीत दिशा मे।
चलब धैर्य सँ भेटत निश्चय
छै आनंद मधुर आशा मे।
कखनो अपने पवन थाकि क’
मंद भेल चुपचाप पलटतै।
फेक देब पतबार अपन ई
जल धारा के दिशा बदलतै।
छोट नाव के एतेक घृष्टता
सुनि क’ भेल नदी के विश्मय।
नाचि रहल अछि जल मे तृणवत
बुझा रहल छै जीवन अभिनय।
की बुझतै ई नाव नदी मे
जीवन पथ धारा अवरोधक।
केना चीर क’ निकलि जाइत अछि
नहि छै भय ओकरा हिलकोरक।
तेज धार छै प्राण नाव के
जीवन छै सागर अथाह जल।
नदी किनारक छाँह मृत्यु छै
जल विहीन जीवन के प्रतिपल।
नहि होइ छै किछु भय जीवन मे
मृत्यु देखि सोझा मे प्रतिक्षण।
अपने चलि क’ नाव मनुख के
सिखा रहल छै जीवन दर्शन।
क्रुद्ध नदी के जल प्रवाह मे
उतरि गेल जे ‘तकरे जीवन’।
भय संघर्ष,निराश,कष्ट सँ
ठहरि गेल ओ ‘जड़वत जीवन’।


2. मौनक शब्द


हेरा गेल अछि शब्द अपन किछु
तैं बैसल छी मौन ओढ़ि क’।
वाणी जड़वत, जिह्वा व्याकुल
के आनत ग’ ह्नदय कोरि क’।
के बूझत ई बात होइत छै
मौन शब्द,वाणी सँ घातक।
राति अमावश के बितला सँ
जेना इजोत विलक्षण प्रातक।
अछि सशक्त जीवन मे एखनो
ई अभिव्यक्तिक सुन्दर साध्न।
एकर चोट छै प्रखर-उचय अग्नि सन
शीतलता चंदन के चानन।
नहि छै आदि -उचयअंत मे समटल
अंतर मे विश्राम वास छै।
आनंदक अतिरेक ह्नदय मे
नव अनुभूतिक महाकाश छै।
अछि अव्यक्त मौन अक्षर सँ
ज्ञान दीप के प्रभा प्रकाशित
दृष्टिबोध् सँ दूर मौन अछि
शब्द अर्थ सँ अपरिभाषित।
वाणी अछि ठहराव झील के
मौन नदी के निश्छल धार।
उठा देत हिलकोर हृदय मे
जखने बान्हब धार किनार।
छै संगीत मधुर स्वर झंकृत
नै छै अर्थ मौन के जड़ता।
कोलाहल सँ दूर मौन के
वाणी सँ छै तिव्र मुखरता।
कतेक विवस अछि शब्द जगत के
वर्तमान के व्यथा देखि क’।
असमर्थ अछि सत् चित्राण मे
की लिखू हम शब्द जोड़ि क’।

11000 PALM LEAF PANJI INSCRIPTIONS (VOLUME I TO XXII)

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