भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
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Saturday, November 29, 2008
1. दही चूडा चीनी- हरिमोहन झा 2. बाजि गेल रनडंक-श्री आरसी प्रसाद सिंह 3.तारानंद वियोगी-नन्दीग्रामपर पंचक
हरिमोहन झा
दही चूड़ा चीनी
खट्टर कका दलान पर बैसल भाङ घाटैत छलाह । हमरा अबैत देखि बजलाह— हाँ...हाँ....ओम्हर मरचाइ रोपल छैक, घूमि कऽ आबह ।
हम कहलिऐन्ह।— खट्टर कका, आइ जयवारी भोज छैक, सैह सूचित करय आयल छी ।
खट्टर कका पुलकित होइत बजलाह...बाह बाह ! तखन सोझे चलि आबह । दु एकटा धङ्घेबे करतैक त की हैतैक ? ...हँ, भोजमे हैतैक की सभ ?
हम—दही चूडा चीनी ।
खट्टर कका— बस, बस, बस । सृष्टिगमे सभ सँ उत्कृ ष्टू पदार्थ यैह थीक । गोरसमे सभ सँ माँगलिक वस्तु— दही, अन्न मे सभक चूडामणि—चूडा, मधुरमे सभक मूल—चीनी । एहि तीनूक सँयोग बूझह तै त्रिवेणी—सँगम थीक । हमरा त त्रिलोकक आनन्दभ एहिमे बूझि पडैत अछि । चूडा...भूलोक, दही...भुवर्लोक, आ चीनी...स्वकर्लोक ।
हम देखल जे खट्टर कका एखन तरंगमे छथि । सभटा अद्भुते बजताह । अतएव काज अछैतो गप्पज सुनबाक लोभें बैसि गेलहुँ ।
खट्टर कका बजलाह— हम त बु झै छी जे एही भोजन सँ साँख्यक दर्शनक उत्पत्ति भेल अछि ।
हम चकित होइत पुछलिऐन्हु—ऐं ! दही चूडा चीनीसँ साँख्य दर्शन ! से कोना ?
खट्टर कका बजलाह...एखन कोनो हडबडी त ने छौह ? तखन बैसि जाह । हमर विश्वास अछि कपिल मुनि दही चूडा चीनीक अनुभव पर तीनू गुणक वर्णन कऽ गेल छथि । दही...सत्वकगुण, चूडा...तमोगुण, चीनी...रजोगुण ।
हम कहलियन्हि—खट्टर कका, अहाँक त सभटा कथा अद्भुते होइत अछि । ई हम कतह नहि सुनने छलहुँ ।
खट्टर कका बजलाह— हमर कोन बात एहन होइ अछि ने तों आनठाम सुनि सकबह ?
हम— खट्टर कका, त्रिगुणक अर्थ दही चूडा चीनी, से कोना बहार कैलियैक ?
खट्टर कका—देखह, असल तत्व दहिएमे रहैत छैक, तैं एकर नाम सत्व । चीनी गर्दा होइछ, तैं रज । चूडा रुक्षतम होइछ, तैं तम । देखै छह नहि, अपना देशमे एखन धरि “तमहा” चूडा शब्द प्रचलित अछि ।
हम—आश्चर्य ! एहि दिस हमर ध्यान नहि गेल छल ।
खट्टर कका व्याख्या करैत बजलाह—देखह, तमक अर्थ छैक अन्धकार । तैं छुच्छ चूडा पात पर रहने आँखिक आगाँ अन्हार भऽ जाइ छैक । जखन उज्जर दही ओहि पर पडि जाइ छैक तखन प्रकाशक उदय होइ छैक । तैं सत्व गुण कें प्रकाशक कहल गेलैक अछि । “सत्वं लघु प्रकाशकमिष्टम्” । तैं दही लघुपाकी तथा सभ कैं इष्टओ (प्रियगर) होइत अछि । चूडा कोष्ठघ कैं बान्हि् दैत छैक । तैं तम कैं अवरोधक कहल गेल छैक । और बिना रजोगुणे त क्रियाक प्रवर्तन हो नहि । तैं चीनीक योग बेत्रेक खाली चूडा दही नहि घोंटा सकैत छैक । आब बुझलहक ?
हम कहलिऐन्ह — धन्य छी खट्टर कका । अहाँ जे ने सिद्ध कऽ दी !
खट्टर कका बजलाह—देखह, साँख्यक मतसँ प्रथम विकार होइ छैक महत् वा बुद्धि । दहि चूडा चीनी खैला उत्तर पेटमे फूलि कय पसरैत छैक । यैह महत् अवस्था थिकैक । एहि अवस्थामे गप्प खूब फुरैत छैक । तैं महत् कहू वा बुद्धि...बात एक्के थिकैक । परन्तु एकरा हेतु सत्व गुणक आधिक्य होमक चाही अर्थात दही बेशी होमक चाही ।
हम—अहा ! साँख्य दर्शनक एहन तत्व् दोसर के कहि सकैत अछि ।
खट्टर कका बजलाह—यदि एहिना निमन्त्रण दैत रहह त क्रमशः सभ दर्शनक तत्व वुझा देवौह । त्रिगुणत्मिवका प्रकृति द्रष्टी पुरुष कैं रिझबैत छथि । एकर अर्थ जे ई त्रिगुणत्मवक भोजन भोक्ता पुरुष कैं नचवैत तथि । तैं—नृत्यकन्तिभोजनैर्विप्राः ।
हम कहलियन्हि—परन्तु् खट्टर कका ! पछिमाहा सभ त दही चूडा चीनी पर हँसैत छथि ।
खट्टर कका अङपोछा सँ भाँग छनैत बजलाह—हौ, सातु लिट्टी खैनिहार दधि—चिपटान्न क सौरभ की बुझताह ! पच्छिमक जेहन माटि बज्जर, तेहने अन्न बजरा, तेहने लोको बज्र सन । अपना देहक भूमि सरस, भोजन सरस, लोको सरस । चूडा पृथ्वी तत्वे...दही जल तत्व...चीनी अग्नि तत्व । तैं कफ पित्त वायु—तीनू दोष कैं शमन करबाक सामर्थ्य एहिमे छैक । देखह, अनादि काल सँ दही चूडा चीनीक सेवन करैत—करैत हमरा लोकनिक शोणित ठण्ढा भऽ गेल अछि । तैं मैथिल जाति कैं आइ धरि कहियो युद्ध करैत देखलहक अछि ?
हम— खट्टर कका, कहाँ सँ कहाँ शह चला देलहुँ । बीच—बीचमे तेहन मार्मिक व्यंग्य कऽ दैत छिऐक जे...
खट्टर कका—व्यंग्य नहि, यथार्थे कहैत छिऔह । देखह, भोजने सँ प्रकृति बनैत छैक । चाली माटि खा कऽ माटि भेल रहैत अछि । साँप बसात पीवि कऽ फनकैत अछि । साहेब सभ डवल रोटी खा कऽ फूलल रहैत अछि । मुर्गा खैनिहार मुर्गा जकाँ लडैत अछि । और हम सभ साग—भाँटा खा कऽ साग—भाँटा भेल छी । हमरा लोकनि भक्त (भात)क प्रेमी थिकहुँ, तैं एक दोसरा सँ विभक्त रहैत छी । ताहु पर की त द्विदल (दालि)क योग भेले ताकय ! तखन एक दल भऽ कऽ कोना रहि सकैत छी ?
हम—अहा ! की अलंकारक छटा !
खट्टर कका—केवल अलँकारे नहि, विज्ञानो छैक । कोनो जातिक स्विभाव बुझबाक हो त देखी जे ओकर सभ सँ प्रिय भोजन की थिकैक ? देखह, बँगाली ओ पच्छाँ हीक स्वभावमे की अन्तर छैक ?...जैह भेद रसगुल्ला ओ लड्डुमे छैक । रसगुल्ला सरस ओ कोमल होइछ, लड्डू शुष्क। ओ कठोर । रसगुल्लाल पूर्वक प्रतीक थीक, लड्डू पश्चिामक । तैं हम कहैत छिऔह जे ककरो जातीय चरित्र बुझवाक हो त ओकर प्रधान मधुर देखी ।
हम— खट्टर कका, अपना सभक प्रधान मधुर की थीक ?
खट्टर कका—अपना सभक प्रधान मधुर थीक खाजा । देहातमे मिठाइ कहने ओकरे बोध होइछ । खाजा ने रसगुल्ला जकाँ स्निग्ध होइछ, ने लड्डू जकाँ ठोस । तैं हमरा लोकनिमे ने बँगालीवला स्नेह अछि, ने पंजाबीवला दृढता ...तखन खाजामे प्रत्येक परत फराक—फराक रहैत छैक, से अपनो सभमे रहितहि अछि ।
हम—वाह ! ई त चमत्कािरक गप्प कहल ! मौलिक !
खट्टर कका—ऐंठ वा बासि बात हम बजितहिं ने छी ।
हम—वास्तवमे खट्टर कका ! अहाँ ठीक कहै छी । गाम—गाममे गोलैसी, घर—घरमे पट्टीदारी झगडा । कचहरीमे पागे पाग देखाइत अछि । से किऐक ?
खट्टर कका—एकर कारण जे हमरा लोकनि आमिल मरचाइ बेसी खाइत छी । तीख चोख भेले ताकय । तीतोमे कम रुचि नहि । नीम—भाँटा, करैल, पटुआक झोर... हौ, जैह गुण कारणमे हतैक सैह ने कार्यमे प्रकट हैतैक ! कटुता, अम्लता ओ तिक्ताता हमरा लोकनिक अंग बनि गेल अछि । स्वाइत हम सभ अपनामे एतेक कटाउझ करैत छी !
हम—परन्तु बंगाली सभमे एतेक प्रेम किऐक ?
खट्टर कका भाँगमे एक आँजुर चीनी मिलबैत बजलाह—ओ सभ प्रत्येक वस्तु मे मधुरक योग दैत छथि । दालिओ मीठ, तरकारिओ मीठ, माछो मीठ, चटनिओ मीठ ! तखन कोना ने माधुर्य रहतन्हि ? अपनो जातिमे एहिना मीठक व्युवहार होमऽ लागय तखन ने ! तैं हम कहैत छिऔह जे अपना जातिमे जौं सँगठन करबाक हो त मधुरक बेसी प्रचार करह । केवल सभा कैने की हैतौह ? —“भोज ने भात ने, हरहर गीत !“गाम सँ दुगोला दूर करबाक हो त “दही चूडा चीनी लवण कदली लड्डू बरफी”क भोज करह ।
ई कहि खट्टर कका भाङ्गक लोटा उठौलन्हि और दू—चारि बुँद शिवजीक नाम पर छीटि घट्टघट्ट कय सभटा पीबि गेलाह ।
2. बाजि गेल रनडँक
श्री आरसी प्रसाद सिंह
बाजि गेल रनडँक, डँक ललकारि रहल अछि
गरजि—गरजि कै जन जन केँ परचारि रहल अछि
तरुण स्विदेशक की आबहुँ रहबें तों बैसल
आँखि फोल, दुर्मंद दानव कोनटा लग पैसल
कोशी—कमला उमडि रहल, कल्लोोल करै अछि
के रोकत ई बाढि, ककर सामर्थ्यल अडै अछि
स्वीर्ग देवता क्षुब्धँ, राज—सिंहासन गेलै
मत्त भेल गजराज, पीठ लागल अछि म�ोलै
चलि नहि सकतै आब सवारी हौदा कसि कै
ई अरदराक मेघ ने मानत, रहत बरसि कै
एक बेरि बस देल जखन कटिबद्ध “चुनौती”
फेर आब के घूरि तकै अछि साँठक पौती ?
आबहुँ की रहतीह मैथिली बनल—बन्दिगनी ?
तरुक छाह मे बनि उदासिनी जनक—नन्दिुनी
डँक बाजि गेल, आगि लँक मे लागि रहल अछि
अभिनव विद्यापतिक भवानि जागि रहल अछि
3
तारानंद वियोगी
नंदीग्राम पर पंचक
एक
जनता जागल भूमि लए
बाजि रहल दू टूक
जनवादी के हाथ मे
एम्हदर छैन्ह बंदूक
एम्हदर छैन्ह बंदूक
दनादन गोली मारथि
टाटा बिड़ला के खड्ढा मे
जन के गाड़थि
जे छल जनता केर पहरुआ
सैह अधक्की भेल
सोभथि श्री बुशराज मुकुटमणि
देश भांड़ मे गेल
दू
जे जनता के गठित क'
बनल छलाह बदशाह
सएह कहै छथि कुपित भ'
जनता बड तमसाह
जनता बड तमसाह
सुनए नहि एको बतिया
बुश केर की छैन्हय दोख
एतुक लोके झंझटिया
छलहा मार्क्सझ के प्रबल प्रबंधक
आब बजाबथि झालि
आबह राजा तंत्र संभारह
गां मे रान्ह्' दालि
तीन
गां मे लोकक खेत अछि
खेते थिक अवलंब
सएह कहै छथि बादशाह
छोड़ै जन अविलंब
छोड़ै जन अविलंब
कंपनीक बैरक आबै
अपन मजूरी पाबि
देस के मान बढाबै
एहन देस ओ बनत
जतक जनता होअए नि:स्वोत्व
संसद बौक बनल अछि देखू
राजनीति के तत्वि
चारि
लोक छलिए चुप आइ धरि
देखि रहल छल खेल
जनता के जे रहए आप्तआ जन
सएह गिरह कट भेल
सएह गिरहकट भेल
आब ओ मैल छोड़ाओत
छोड़त ने क्योा खेत
भने सब प्राण गमाओत
टाटा बिड़ला के बस्तीय मे
जनता ने क्योक हएत
जे बसतै से कुली कबाड़ी
देस बेच क' खएत
पांच
सएह कहै छी
सुनह वियोगी
बूझह की थिक 'सेज'
तों छह ककरा पक्ष मे
गांधी कि अंगरेज
गांधी आ अंगरेज दुनू मे
बाझल झगड़ा
निर्दय नइ झट हएत
बुझाइ-ए जोड़ा तगड़ा
बचत कोना क' लोक
भूमि, से सएह झकै छी
गांधी आ अंगरेज एतहु छथि
साफ देखय छी।
Sunday, November 23, 2008
हर आ’ बरद
जोति बरद सोचिमे पड़लहुँ,
एतय-ओतय केर बात,
हर जोतने भेल साँझ,
हरायल बरद ताकी चारू कात।
कहबय ककरा ई गप्प,
सुनि हँसत हमरा पर आइ,
मोने अछि भोथियायल,
अप्पन सप्पत कहय छी भाय।
Friday, November 21, 2008
मिथिला विभूति 2- मिथिलाक महिला विभूति
(१९२४- )—समीक्षिका, अनुवादिका, सम्पादिका।प्रकाशन: मैथिली लोकगीत, वसवेश्वर (अनु.) आदि। लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज, कलकत्तामे पूर्व प्राध्यापिका।
लिली रे
जन्म:२६ जनवरी, १९३३,पिता:भीमनाथ मिश्र,पति:डॉ. एच.एन्.रे, दुर्गागंज, मैथिलीक विशिष्ट कथाकार एवं उपन्यासकार । मरीचिका उपन्यासपर साहित्य अकादेमीक १९८२ ई. मे पुरस्कार।मैथिलीमे लगभग दू सय कथा आ पाँच टा उपन्यास प्रकाशित।विपुल बाल साहित्यक सृजन। अनेक भारतीय भाषामे कथाक अनुवाद-प्रकाशित। प्रबोध सम्मान प्राप्त।
शांति सुमन
जन्म 15 सितम्बर 1942, कासिमपुर, सहरसा, बिहार, प्रकाशित कृति, “ओ प्रतीक्षित, परछाई टूटती, सुलगते पसीने, पसीने के रिश्त, मौसम हुआ कबीर, समय चेतावनी नहीं देता, तप रेहे कचनार, भीतर-भीतर आग, मेघ इन्द्रनील (मैथिली गीत संग्रह), शोध प्रबंध: मध्यवर्गीय चेतना और हिन्दी का आधुनिक काव्य, उपन्यास: जल झुका हिरन। सम्मान: साहित्य सेवा सम्मान, कवि रत्न सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान। अध्यापन कार्य।
शेफालिका वर्मा
जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),सम्प्रति: ए. एन. कालेज मे हिन्दीक प्राध्यापिका ।प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित कृति :विप्रलब्धा कविता संग्रह,स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह,एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत । ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह ।
इलारानी सिंह
जन्म 1 जुलाई, 1945, निधन : 13 जून, 1993, पिता: प्रो. प्रबोध नारायण सिंह सम्पादिका : मिथिला दर्शन, विशेष अध्ययन: मैथिली, हिन्दी, बंगला, अंग्रेजी, भाषा विज्ञान एवं लोक साहित्य। प्रकाशित कृति: सलोमा (आस्कर वाइल्डक फ्रेंच नाटकक अनुवाद 1965), प्रेम एक कविता (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विषवृक्ष (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विन्दंती (1972), स्वरचित: मैथिली कविता संग्रह (1973), हिन्दी संग्रह।
नीरजा रेणु
जन्म: ११ अक्टूबर १९४५,नाम: कामाख्या देवी,उपनाम:नीरजा रेणु,जन्म स्थान:नवटोल,सरिसबपाही ।शिक्षा: बी.ए. (आनर्स) एम.ए.,पी-एच.डी.,गृहिणी ।प्रकाशित रचना:ओसकण (कविता मि.मि., १९६०) लेखन पर पारिवारिक, सांस्कृतिक परिवेशक प्रभाव।मैथिली कथा धारा साहित्य अकादेमी नई दिल्लीसँ स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथाक पन्द्रह टा प्रतिनिधि कथाक सम्पादन ।सृजन धार पियासल कथा संग्रह,आगत क्षण ले कविता संग्रह, ऋतम्भरा कथा संग्रह,प्रतिच्छवि हिन्दी कथा संग्रह,१९६० सँ आइधरि सएसँ अधिक कथा, कविता, शोधनिबन्ध, ललितनिबन्ध,आदि अनेक पत्र-पत्रिका तथा अभिनन्दनग्रन्थमे प्रकाशित ।मैथिलीक अतिरिक्त किछु रचना हिन्दी तथा अंग्रेजीमे सेहो।
उषाकिरण खान
जन्म:१४ अक्टूबर १९४५,कथा एवं उपन्यास लेखनमे प्रख्यात।मैथिली तथा हिन्दी दूनू भाषाक चर्चित लेखिका।प्रकाशित कृति:अनुंत्तरित प्रश्न, दूर्वाक्षत, हसीना मंज़िल (उपन्यास), नाटक, उपन्यास।
प्रेमलता मिश्र ’प्रेम’
जन्म:१९४८,जन्मस्थान:रहिका,माता:श्रीमती वृन्दा देवी,पिता:पं. दीनानाथ झा,शिक्षा:एम.ए., बी.एड.,प्रसिद्ध अभिनेत्री दू सयसँ बेशी नाटकमे भाग लेलनि ।भंगिमा (नाट्यमंच) क भूतपूर्व उपाध्यक्षा, पत्रिकाक सम्पादन, कथालेखन आदिमे कुशल । ’अरिपन’ आदि अनेक संस्था द्वारा पुरस्कृत-सम्मानित।
आशा मिश्र
जन्म:६-७-१९५० ई.,प्रकाशित कथा मे मैथिकीक संग हिन्दी मे सेहो । सभसँ पैघ विजय मैथिली कथा संग्रह।
नीता झा
जन्म : २१-०१-१९५३,व्यवसाय:प्राध्यापिका । लेखन पर समाजक परम्परा तथा आधुनिकताक संस्कार सँ होइत विसंगतिक प्रभाव।प्रकाशित कृति : फरिच्छ, कथा संग्रह १९८४, कथानवनीत १९९०,सामाजिक असन्तोष ओ मैथिली साहित्य शोध समीक्षा।
ज्योत्स्ना चन्द्रम
मूल नाम: कुमारी ज्योत्स्ना ,उपनाम : ज्योत्स्ना आनन्द ,जन्मतिथि: १५ दिसम्बर, १९६३,जन्मस्थान : मरूआरा, सिंधिया खुर्द, समस्तीपुर,पिता: श्री मार्कण्डेय प्रवासी,माता: श्रीमती सुशीला झा,कार्यक्षेत्र : अध्ययनाध्यापन ।,रचना प्रकाशित : झिझिरकोना (कथा-संग्रह), एसगर-एसगर (नाटक),बीतक संग संकलन एवं सम्पादन।एकर अतिरिक्त दर्जनाधिक कथा ओ कविता विभिन्न पत्र-पत्रिका में प्रकाशित तथा आकाशवाणीक पटना, भागलपुर, दरभंगा केन्द्रसँ प्रसारित।शिक्षा : पटना विश्वविद्यालयसँ हिन्दी साहित्यमे एम.ए,।
सुस्मिता पाठक
जन्म:२५ फरवरी, १९६२,सुपौल, बिहार । परिचिति कविता संग्रह प्रकाशित । कथावाचक, कथासंग्रह प्रकाशनाधीन । राजनीति शास्त्रमे एम.ए.। संगीत, पेंटिंगमे रुचि । मैथिलीक पोथी पत्रिका पर अनेक रेखाचित्र प्रकाशित । समकालीन जीवन, समय, आ तकर स्पंदनक कवयित्री । अनेक भाषामे रचनाक अनुवाद प्रकाशित।
विभा रानी (१९५९- )लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता-बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा।
विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि।
'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि, जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि।
श्रीमति विभारानी सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि।
ज्योति
www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) ज्योतिकेँ भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी।
रूपा धीरू- जन्मस्थान-मयनाकडेरी, सप्तरी, श्रीमती पूनम झा आ श्री अरूणकुमार झाक पुत्री।स्थायी पता- अञ्चल- सगरमाथा, जिल्ला- सिरहा। प्रथम प्रकाशित रचना-कोइली कानए, माटिसँ सिनेह (कविता),भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक पुस्तकक धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँग मैथिलीमे सहअनुवाद,सङ्गीतसम्बन्धी कृति- राष्ट्रियगान, भोर, नेहक वएन, चेतना, प्रियतम हमर कमौआ (पहिल मैथिली सीडी), प्रेम भेल तरघुस्कीमे, सुरक्षित मातृत्व गीतमाला, सुखक सनेस। सम्पादन-पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादन-सहयोग,हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ आ कक्षा 9-10 क ऐच्छिक मैथिली विषय पाठ्यपुस्तकक भाषा सम्पादन), पल्लवमिथिला, प्रथम मैथिली इन्टरनेट पत्रिका,वि.सं. २०५९ माघ (साहित्यिक), सम्पादन-सहयोग।
Sunday, November 16, 2008
‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिकाक २२-२५ म अंक
पर ई-प्रकाशित भऽ चुकल अछि। "वि दे ह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका मासक १ आऽ १५ तिथिकेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि, ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। विदेहक सालाना २५ म अंक (०१ जनवरी २००९) प्रिंट फॉर्ममे सेहो आएत।
अहाँसँ सेहो "विदेह" लेल रचना आमन्त्रित अछि। यदि अहाँ पाक्षिक रूपेँ विदेहक हेतु अपन रचना पठा सकी, तँ हमर सभक मनोबल बढ़त।
२.कृपया अपन रचनाक संग अपन फोटो सेहो अवश्य पठायब। अपन संक्षिप्त आत्मकथात्मक परिचय, अपन भाषामे, सेहो पठेबाक कष्ट करब, जाहिसँ पाठक रचनाक संग रचनाकारक परिचय, ताहि प्रकारसँ , सेहो प्राप्त कए सकथि।
“विदेह” पढबाक लेल देखू-
http://www.videha.co.in/
आऽ अपन रचना-सुझाव-टीका-टिप्पणी ई-मेलसँ पठाऊ-
ggajendra@videha.com पर।
संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० दिसम्बर २००८) ७० देशक ६७३ ठामसँ १,३६,८७४ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.
'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि, आऽ एहिमे मैथिली, संस्कृत आऽ अंग्रेजीमे मिथिला आऽ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। विदेहक नवीन अंक सभ मासक ०१ आऽ १५ तिथिकेँ ई-प्रकाशित कएल जाइत अछि। ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।http://www.videha.co.in/
Saturday, November 15, 2008
अंधेर नगरी चौपट राजा - मदन कुमार ठाकुर

दोकानदार कहलकनि हम अहाँ दुनु आदमी सँ ५० - ५० पाई के हिसाब सँs भोजनक रेट लेब ! दुनु आदमी सोचलथि ई नगरी मेs बहुत महगाय छैक आगू जा के कुनू दोसर दोकान पर भोजन करब ! हुनका सभ केँ भूख बहुत जोर लागल छलनि ओ सभ दोसर दोकान पर पहुचला दोकानदार सँs पुछलखिन तँs दोकानदार कहलकनि जे हम अहाँ दुनु आदमीक २५ - २५ पाई केँ हिसाब सँs भोजन करायब !
गुरूजी आ चिंतामणिजी सोचलथि जे ई नगरी मे सबसँ सस्ता छैक अहि सँ सस्ता दोसर नगरी मे नञि भेटत हम भोजन एतहि करब ! अहिठामक भोजन सेहो बहुत स्वादिष्ट होइत अछि ! चिंतामणिजी गुरूजी सँs कहलखिन गुरूजी हम अहि नगरी मे रहब कियेकी अहिठाम सब किछ बहुत सस्ता भेटैत छैक आर भोजन सेहो बहुत स्वादिष्ट होइत अछि ! गुरुजी कहलखिन अहाँ अहिठाम नञि रहू कियेकी अहि नगरी मे भारी संकट आबय बला अछि ! अहाँ केँs अपन जानक बलिदान देबय पड़त ! चिंतामणि गुरुक बात नञि मान्अलथि ओ अपन गुरुजीक संग छोड़ि देलखिन ! चिंतामणि केँs अहिनगरी मे बहुत सुख आर आनंद आबय छलनि ! तहि सँs खा's पीs क' बहुत मोटाक' सिल भ's गेलथि !
समय बितलगेल भादव के महिना सेहो आबिगेल छल, कोसी नदी मेs बाढ़ि सेहो आबी गेल तहि सँs कतेक गाम सेहो दहा गेल छल, ओही नगरीमे सेहो पानि आबिगेल छल ! मंगला अपन जान बचबैक खातिर अपन घर - आँगन छोड़ि के भागिगेल आ बच्चा सभ के सेहो छोड़िक' चलि गेल छल ! ओकर घर - द्वार सभ खसि पड़ल ताहि सँ ओकर बेटाक मृत्यु भ's गेल छलय ! ई बात पूरा गाम मे सोर भ' गेलय जे मंगला अपन जान बचबै के खातिर अपन बेटाक बलिदान द् देलक ई बात ओही नगरी के राजा क's खबर भेलनि त's राजा अपन सेनापति सँs कहलखिन जे मंगला कs खोजि क's ला' हम ओकरा फाँसीक सजा देब ओ बहुत जुर्म केलक हन ! मंगलाक खोजि केs राजदरवार मेs पेस करल गेल ओकरा सँs राजा कहलखिन रोऊ मंगला तू ई गलती किये करले ? !
मंगला बजलथि .... हजूर हम त कुनू गलती नञि केलहुँ, हम त बच्चा केs छोड़िये टा क' भगलहुँ ई गलती तs राजमिस्त्री केलक जे हमर घर के छत ठीक सँs नञि बनेलक !
राजाक हुकुम भेलनि जे जल्दी सँs जल्दी राजमिस्त्री केँ दरवार मेs पेस कर'लए जे ओ बड गलती केलक जे कच्चा मकान बनेलक ........
दोसर दिन राज मिस्त्री राजदरवार मेs हाजिर भेलाह ओ राजा सँs कहलखिन हजूर गलती हम नञि केलहुँ, हम तँs छते टा बनेलहुँ, गिलेबा ख़राब त's हमर हेल्फर चुनचुनमा केलक आब अहीं कहू हमर कतय गलती अछि !
राजा फेर सेनापति केँs आदेश देलखिन जे चुनचुनमा केँs जल्दी बजा'क' लाऊ .......
तेसर दिन चुनचुनमा राजदरवार मेs हाजिर भेल... राजा हुनका सँ पुछलखिन जे रोऊ चुनचुनमा तू एहेंन गलती कियेक केलाह ...?
चुनचुनमा बाजल हजूर सभटा गलती हमही नञि केलहुँ गलती तँs ओही मईटो मेs छल जे ओ मईट बलुवाहा छल तैयो हम मज़बूरी मेs गिलेबा बनेलहुँ कियेकी हमरा पाई के बहुत जरुरत छल ! इहे हमरा सँs गलती भेल ! आब हजूर हमरा अहां जे सजा दी सभ हमरा मंजूर अछि !
राजा चुनचुनमा केs फाँसी के सजा सुनेल्खिन...........
राजा चंडाल केँs चुन्चुनमा के लेल फाँसीक फंदा तैयार करे के आदेश देलखिन चंडाल फाँसीक फंदा अपन हिसाब सँs तैयार केलक, चारिम दिन चुन्चुनमा केँ फाँसी के फंदा पर चढ़ाओल गेल ! फाँसीक फंदा लम्बा - चौरा छल .... चुन्चुनमा बहुत दुबर पातर ताहिसँs ससरिके फाँसीक फंदा सँs निचा उतरि गेल आ बगल मे जा's कएs ठाढ़ भ'sगेल....
सब कियो टकटक देखते रहि गेल ............
चंडाल चुन्चुनमा केँs दुबारा फाँसीक फंदा पर चढ्बए लागल...मुदा राजा ओकरा मना क' देलखिन ! राजा क हुकुम भेलनि जे चुनचुनमा केँs दुबारा सजा नञि हेतनि कियेकी राजदरवारक नियम होइत अछि जे एक आदमी केँs सजा एके बेर होइत छैक.... ताहि दुवारे अहि फंदा पर ओकरा सजा भेटतनि जकर गरदनि अहि फंदा मेs ठीक सँs बैसतैक..... सेनापति केँs राजा आदेश देलखिन जे अहाँ फंदा क हिसाब सँs कुनू आदमी पकड़ि क' लाऊ हम ओकरा फाँसीक सजा देबयs .......
सेनापति पूरा राज मेs घुमलाह हुनका चिंतामणिक गरदनि फंदाक हिसाबे सही बुझेलनि ! राजा केँ जे आदेश रहनि से ओ चिंतामणि सँs सुनेलखिन ! राजाक आदेश सुनि कएs चिंतामणि बहुत चिंतित भेलाह, ओ सोचए लगलाह की आब हम की करी चारू दिस हुनका किछ नञि सुझैत छनि ! तखने हुनका गुरूजीक बात याद परलनि ओ सोचलथि जे आब हमरा अपन जानक बलिदान सँs गुरुवेजी टा बचेताह दोसर कियो नञि !
चिंतामणि गुरुजीक ध्यान करए लगलाह.......
बनदे बोदमयंनितयंग गुरुर शंकर रूपनं !
यमासर्तोही बक्रोपि चन्द्रः सरबस्तर बन्देयेत !!
गुरुर साक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम: !!
अखंडमंडलाकारंग व्याप्त येनग चराचरम !
तत्पदं दर्शितंग तस्मै श्री गुरुवे नम: !!
अज्ञान तिमरामिराधस्य ज्ञानानां शलाकय: !
चक्षुरपितयेंग तस्मै श्री गुरुवे नम: !! इत्यादि .........
चिंतामणिक स्मरण केला सँs गुरूजी केँ अचानक याद अलयनि जे हमर चेला चिंतामणि काफी संकट मेs फसल छथि ! हुनका अहि संकट सँs उबारनाय हमर धर्म अछि ! गुरूजी फेर ओही नगरी मे वापस आबि गेलाह आ चिंतामणि सँs हुनकर वार्तालाप सेहो भेलनि ! गुरूजी सब बात सँ अवगत भेला के बाद चिंतामणि केँs बोल भरोस देलखिन जे अहाँ चिंता जूनि करू हम आबि गेल छी !
चारिम दिन चिंतामणि राज दरवार मेs हाजिर भेलाह ! राजा हुनका फाँसी के सजा सुनेलकनि .....
तखने गुरूजी राजा सँs अर्जी केलनि हे राजन चिंतामणि एखन नवयुवक छथि हम बृध सेहो भ's गेल छी ताहि दुवारे अहाँ हमरा फाँसी के सजा दिअ जे हम अहि फाँसी पर चढ़ि क's स्वर्गलोक चलि जायब जाहिसे हमर तीनो लोक मेs जय - जय कार होमए लागत !
ई बात सुनि कए राज दरवार मेs जतेक लोक सभ बैसल छल सब कियो बेरा - बेरी राजा सँs अर्जी आर विनती केलथि जे हे राजन अहि फाँसी पर चढ़ि क' हम स्वर्गलोक जायब जाहिसँ हमर जय - जय कार तिनोलोक मेs होयत !
ई बात सुनि क' राजा अपना मोन मेs विचार केलथि जे कियेक नञि हमही अहि फाँसी पर चढ़ि क' स्वर्गलोक चलि जाइ जे हमर जय - जय कार तीनो लोक मेs होयत ! राजा झटसं अपन गद्दी सँ उतरि क's फाँसी क फंदा मे जा's क's लटकि गेलाह आ चंडाल केँs आदेश देलखिन जे फाँसी केँ उठा दे .....
राजा यमलोक चलि गेलाह .....
अहि दुवारे कहल गेल अछि अंधेर नगरी चौपट राजा ......
मोबाईल +919312460150 , ईमेल - madanjagdamba@rediffmail.com
Thursday, November 13, 2008
मिथिलाक भोज - प्रवीण झा
भोजक यदि बात करी त', मिथिलाक भोजक होइछ और बाते ।
एहि बेर बनल एहन संयोग
ग्रह-नक्षत्रक उत्तम योग
परि लागल हमरो एक भोज
छलौ करैत जकर हम खोज
छुट्टी मे हम गेलहुँ गाम
निमंत्रण आयल पुरूषे-दफान
सब मे छलनि भोजक उत्साह
धीया-पुता मे आनंद अथाह
चिंटू-पिंटू के भोरे सॅ उमंग
जेबै हमहू लालकाका क' संग
सॉंझ होइत भ' गेल अनघोल
चलै चलू पुबारी टोल
सब जन चलला लोटा लेने
छला कतेको बूटी देने
पहिल तोर भ' गेल प्रारंभ
भोक्ता केलनि भोजन आरंभ
आब सुनू व्यंजनक लिस्ट
सभक भेल पूर्ण अभिष्ट
छल आगू मे केराक पात
ताहि पर छल गमकौआ भात
डलना, कदीमा, बर, बरी
घी के संग दालिक तरी
अन्न-तीमन छल केहन विशेख
सब तरकारी एक पर एक
झुंगनी, कटहर, भॉटा-अदौरी
पुष्ट दही-चीनीक संग सकरौड़ी
केहन खटतुरूस बरीक झोर
खेलैन सब कियो पोरे-पोर
भोक्ता सब क' देलैन सत्याग्रह
तैयो भेल आग्रह पर आग्रह
भ' गेल बूझू महोमहो
सकरौड़ी बहल दहोबहो
मिथिला मे प्रसिद्ध अछि दही-चूड़ा,
पूरी-तरकारीक भोज मध्यम ।
कियो पँचमेर करथु तें की,
दालि-भाते होइछ सब सॅ उत्तम ।
भोक्तागण के पूर्ण संतुष्टि भोज मे होई छै बारीकक हाथे ।
भोजक यदि बात करी त', मिथिलाक भोजक होइछ और बाते ।
बाहरो मे खेने छी भोज परन्तु,
भोज-भात की करत इ दुनियॉ ।
मिथिलाक भोज अछि जतए रूपैया,
बाहरक भोज होइत अछि चौअनियॉ ।
नै कोनो आग्रह नै कोनो पात
हर-हर गीत नै भोज आ भात
पहिने लाऊ टाका वा गिफ्ट,
तखने भेटत भोजनक लिफ्ट ।
मांगू खाउ लाईन मे जाऊ,
जौं छी अहॉ भोजनक इच्छुक ।
प्लेट मे अहॉंके भेटत सामग्री,
ठाड़े रहु, जेना अकिंचन भिक्षुक ।
प्लेट लीय' आ बढि़ क' आऊ,
लागल अछि "सिस्टम बफर" ।
पूरी, पोलाव लीय प्लेट मे,
ठाड़े खाऊ जेना "डकहर" ।
इ कोन आदर, इ कोन सम्मान ?
पीबू जल आ करू प्रस्थान
भोजनोत्तर नै भेटत पान-सुपारी
एहन नोत नै हम स्वीकारी
हमरा प्रिय "मिथिलाक भोज"
नोत मानी हम सोझे-सोझ
लक्ष्मीपति के छथि मिथिला मे, तकर प्रतीक अछि भोजे-भाते
भोजक यदि बात करी त, मिथिलाक भोजक होइछ और बाते ।
हमर आशानन्द भाई - प्रवीण झा
मास मे पन्द्रह दिन सासुरे मे डेरा ।
पबै छथि काजू-किशमिश, बर्फी-पेड़ा ।।
भोजन मे लगैत छनि बेस सचार ।
तरूआ, तिलकोर आ चटनी-अचार ।।
जेबी त गर्म रहबे करतैन, भेटैत रहै छनि गोरलगाई ।
हमर आशानन्द भाई, कमौआ ससुरक एकलौता जमाई ।
ससुर करैत छथिन ठीकेदारी ।
घटकैती मे छला अनारी ।।
जखन गेला ओ घटकैती मे ।
फँसि गेला बेचारे ठकैती मे ।।
आशानन्दक पिता कहलखिन- "सुनू औ मिस्टर !
हमर बेटा अछि "माइनेजिंग डाइरेक्टर" ।
के करत गाम मे हमर बेटाक परतर ।
के लेत इलाका मे हमरा बेटा सॅ टक्क्र ।।
तनख्वाह छैक सात अंक मे ।
कतेको लॉकर छैक "स्विस बैंक" मे ।।
कतेको लोक एला आ गेला, कियो ने छला लोक सुयोग्य ।
"बालक" देबैन हम ओही सज्जन के जे कियो हेता हमरा योग्य ।।
बीस लाख त द गेल छल, बूझू जे ओ कथा भ गेल छल ।
मुदा मात्र टाका खातिर बेटा के बेची हम नै छी ओ बाप कसाई" ।
हमर आशानन्द भाई, कमौआ ससुरक एकलौता जमाई ।
जोड़-तोड़ भेल, इ कथा पटि गेल ।
लगले विवाहक कार्ड बॅटि गेल ।।
दहेज भेटलनि लाख एगारह ।
आ आशानन्द भाईक पौ बारह ।।
शुभ-शुभ के भ गेलै ने विवाह ?
आब कनियॉक बाप होइत रहथु बताह ।
भेल विवाह मोर करबह की ?
आब पॉचों आंगुर सॅ टपकैत अछि घी ।
भले ही कनियॉ छैन कने कारी ।
मुदा विदाई मे त भेटलैन "टाटा सफारी" ।।
विवाहेक लेल ने छला बाहर मे ।
आब नौकरी-चाकरी जाय भाड़ मे ।।
आब जहन "बाबा" बले केनाई छनि फौदारी ।
तखन आब कियाक नै ओ ध लेता घरारी ।।
नै जेता ओ दिल्ली फेर, लगलैन हाथ ससुर के कमाई ।
हमर आशानन्द भाई, कमौआ ससुर के एकलौता जमाई ।
बिलास मे डूबल छथि आकंठ ।
सब दिन खेता रोहुएक "मुरघंट" ।
कुशल-क्षेम लेल हम पुछलियैन्ह- "की आशानन्द भाई ठीक" ?
ताहि पर कहला हमरा जे- "अहॉ के की तकलीफ ?
मुर्गा मोट फँसेलौ हम,
तें ने करै छी आइ बमबम" ।
कनियॉंक माई कपार पिटै छथि ।
"भाग्यक लेख" कहि संतोष करै छथि ।।
"हमर बुचिया के कपार केना एहन भेलै गे दाई !"
हमर आशानन्द भाई, कमौआ ससुर के एकलौता जमाई ।
बहुतो आशानन्द छथि एहि आस मे।
कहियो फँसबे करत कन्यागत ब्रह़मफॉंस मे ।।
कियो कहता जे हम "मार्केटिंग ऑफिसर",
कहता कियो हम छी कंपनीक "मैनेजर",
तड़क-भड़क द भ्रम फैलौने,
छथि अनेको "लाल नटवर" ।
ध क आडम्बर देने रहु, आशा क डोर धेने रहु ।
कोनो गरदनि भेटबे करत, अप्पन चक्कू पिजेने रहु ।।
भला करथुन एहन आशानन्द सभक जगदम्बा माई ।
हमर आशानन्द भाई, कमौआ ससुरक एकलौता जमाई ।।
Monday, November 10, 2008
उदाश मोन - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
अपन प्रेमीकाकेँ कहलापर उमेश विना विवाह भेनेमे ओ वावुजी सँ भिन– भिनाउजक वात करऽ लगलनि । सन्तान जाहिसँ खुस रहे वोहीमे अपन खुसी बुझिकऽ बाबुजी सबकिछ मे सँ हिसा लगाकऽ उमेशके अपना नामपर कऽ दैछथि । सम्पती उमेशकेँ नामपर देखिकऽ उमेशकऽ प्रेमिका आशाकेँ ओ सम्पती पर लोभ भऽ जाइछैन । उमेश सऽ करिब १० वर्ष जेठ विधवा प्रेमिका उमेश सँ सम्बन्ध तखन वनबैय जखन ओ कक्षा नौ मे बढैत रहैक । एकदिन उमेशकऽ माँ विमार भऽगेली आ हुनका जचाबऽ लेल जखन उमेशकेँ बाबुजी पटना लजाइत रहैथ त अपन परोशी विधवा आशाकेँ कैहगेली जे उमेशके भोजन वनादेबऽ लेल जाही सँ उमेशके कोनो प्रकारक दिकत नहि होइन । आशा उमेशकेँ लेल बडशासन भोजन बनाक खुएलनि आ ओही अंगनामे सतएली । आ कनेक वेर बाध आशा से हो ओही पलंगपर आविकऽ सुतिरहली । रातिमे उमेशके ओ भैर पाजकऽ पकरली । उमेशकेँ निन त टुटिगेलैक मुदा ओ अन्ठिआदेलन । दोसर दिन ई वात उमेशक दिमागपर नचैत रैह गेलैक । जे ई रातिमे डेरागेलनि कि केना ? कथिला ओ हमरा ओना पकरलनि ?" आ ई वात सोचैत उमेशके रातिमे निन सेहो नइ परैक । कर बदलवेरमे उमेशक हात आशाकऽ स्तन पर परिगेलैक । एतवेमे ओ उमेश दिश धुमिगेली । आ उमेशकेँ पैरपर अपन एकटा पैर धऽदेली फेरु ओ उमेशकेँ सहलाबऽ लगली आ............। फेर, ताही दिनसँ उमेशके आशाकेँ संग एकटा देहकेलेल गलत सम्बन्ध स्थापना भऽगेलैक । उमेशकें आशा सँऽप्रेम भऽगेलनि । आ तहिया सँ सबदिन उमेश सब निक बेजाय आशाकेंसुनाबऽ लगलनि आ आशाकेँ कहलपर चलऽ लगलाह । आशाके कहैछलनि वोहे उमेश करैछलाह । आ उमेश अपन लक्ष्य तक आशाके बुझिलेने रहैथ । आ ओ ईहो सोचिलेने रहैथ जे जीब संगैह आ मरब संगैह । जखन उमेशकऽ बाबजुी उमेशकेँ बखडा अदालत आ मालपोतमेँ जाक उमेशकनामपर कऽ देलनि । तखन किछे दिन बाद उमेश अपन नाम बाला सारा सम्पत्ती आशाके नामपर कऽदेलनि । तकदिरक लिखल आशा उमेशसँऽ बिना पुछने नैहर चैलगेली ताँही सँऽ दुनु गोटाके एकआपसमे मनमोटाब भऽगेलनि । उमेशक उझट बाली सुनि आशा हुनका सँऽ बाजब सेहो बन्द कऽ देलनि । ओ सोच आ चिन्तामे एहन भ गेला कि चञ्चल स्वभावके उमेशक मोन उदाश भ गेलनि ।उमेशकेँ ई दशा देखकऽ उमेशक बाबुजी आ माँ हुनका पुनः अपनालेलनि । भोरक भुतलायल जौ साँझक घर आबेतऽ ओकरा हेयायल नहि कहि बुझिक उमेशके निकसँ राखऽ लगलनि ।उमेशके उदाश रहब देखिकऽ हुनक माँ आ बाबुजी सब हुनका विवाहकेँ वातचित कर लगलनि । विवाहकऽ नाम सुनिते उमेश आशाकेँ वारेमे अनेक वात सोचाए लगलनि । मुदा, उमेश विवाहक बारेमे कनेक देर सोचलनि आ सोचिक पुनः ई दिमागमे अएलनि जे "विवाह जौ कलिअ त आशा त हमरा धोखा देलनि मुदा हम ओकरा किया धोखा दिए ।" ओ फेर सोचलनि हम जौ अखन विवाह कऽ लेब तऽ कल्हिखन जाकऽ हमर कनियाकऽ कोनो प्रकारक इच्छा जौ पुरा नहि कर सकबै त ओकरा मोनमे कतेक किसिमक वात अएतैक । ओ फेर ई सोचला जे "अपन हिस्सा सम्पती त हम बुरालेललहँु आ बाँकी लेल......नहि बाबुजी कि सोच्ता ?" आ, ई वात सोचिक उमेश सब किछ छोरिकऽ सबहक माया मोह त्यागीक घर सँऽ बहुत दुर जाएकें सोचिकऽ चैलदेलाह । जखन उमेश पटना स्टेशन पर पहुचलनि त आगुमे आशा ठाह–रहैक । उमेशकेँ देखक ओ हुनका आर नजदिक अएली आ कहलनि– "उमेश ! आहाँके मनमे होयत जे आहाँके हम बरबाद कऽदेलहँु मुदा ई बाते नहि छैक । आउ आहाँके हम अशल बात सुनबैतछि ,आ बिना सुनने हम आहाँके एतऽ सँऽजाहू नहि देब ।"ई सुनिक उमेश बजलनि "आब सुनला ...कि बाँकी छैक से ?"आशा उमेशके हाथ पकरिक कातमे लजाइछैक आ कहैछै "अहि के लेल .........आहाँके कने समय देबऽ परत ।"कनिक समय सोचैत उमेश कहलनि"— ठिक छै चलु कातमे ।"एकान्त ठाममे जाक दुनु बैसलनि तब आशा कहलनि "सुनु,.....हमरा एकटा परी सँ श्रापित भऽ ई मृत भुवनमे आबऽ परलअछि.....। हम एक दिन गगन—विहारभऽ स्वर्ग जातिरही । बाटमे सपन नामक ऋषि कमण्डलमे जल लऽकऽ पुजा करला जातिरहैथ । हम ऋषिके खौझाव लेल बाटपर आबिकऽ ठाह् भऽ गेलहु आ ऋषीके आखि पर ताकऽ लगलहुँ । हम ऋषी पर आ ओ हमरा पर बहुते देर तक एक आपसमे तकैत रहिगेलहूँ । ऋषी हमरा नजदिक आबऽ लगलनि आ ओ हमरा नजदिक आविक छुबऽ चाहलनि । मुदा हम ऋषी सऽछलिगेलहँु , आ ओ खसिपरला ।" ई ऋषी आ परीक वात उमेशकेँ सुनल नहि गेलनि आ ओ कहला "चुप,.....झुठफुस आ नौटकी कनेक कम बाजु बुझलहु कि नहि,......रे ई सत्ययुग, द्वापर आ त्रेता नहि न छैक ?" मुदा आशा कऽ आँखि आइ सच वाजिरहलछैक ओ फेर कहली " त आहाँ खाली बात सुनिलिअ.......विश्वास करु या नहि करु आहाँ पर अछि । तखन ऋषी हमरा कमण्डलमे सँ पानि लऽ श्राप देलाह " जो, हम तोरा श्राप दैछिऔक कि तोरा स्वर्गक सुख त्यागीकऽ एकटा नहि वल्की दुँटा पुरुशके साथ सम्भोग कर परतौक । जे एकटा तोहर पती रहतौक आ देसर एकटा तोहर परोशके बच्चा । ऋषी फेर कहलनि " ओ बच्चा जखन श्यान भऽ जतैक त तोरा द्वारा ओकर धन सम्पत्ती सबकिछ खतम भऽ जएतै आ जखन तोरा छोरिक ओ चैलजतौ तखन तोहर मृत्यु भऽ तोहर जीवन तृप्त भऽ जएतौ ।" ऋषीक कुवचन सुनिकऽ हम निराश भऽ गेलहु । बड कनलहु ।" आशा वजली ।ई वात सुनऽके इच्छामे आविकऽ उमेश वजलाह–"तव ...........कि भेल ?"उमेशक प्रश्नकेँ जबाब दैत आशा कहली – " हम मृत भुवन अएलहु । आ नदिकातमे आमक गाछलग बसिकऽ सोचऽ लगलहु जे आब कि करु । नदी कातक गाममे एकटा नँया फूसक घर रहैक । हम अप्पन दिव्य शक्ति सँ ओकरा वारेमे देखलहु । हुनका सबकेँ गाममे के ओ नहि चिन्हैत रंहनि । हम अप्पन मायाबी शक्ति सँ हुनका सबकेँ मन वदलीकऽ आ एकटा बच्चकऽ रुपमे प्रवेश कैलहँु । आ, ओ दुनुगोटा हमरा अप्पन बेटी जका मानऽ लगलनि । गामक स्कुलसँ एस.एल.सी. पास कैैलहु । आ तखन ओ सब हमरा कैम्पस मे पढला शहर पढादेलनि । मनोविज्ञानकेँ ज्ञानी तऽ हम रहबे करी । हम मनोविज्ञान सँऽ स्नातक कैलहु आ कैम्पसेमे हुनका हमरा सँऽ प्रेम भऽगेलीन । हुनक माँ विमार रहवाक कारण सँ ओ दुईए महिना वितलाक वाद हमरा सँ विवाह कऽ लेलनी आ साल वितिते हुनक मृत्यु भऽ गेलनी ई त होबहे के रहैक । श्राप अहि प्रकारक रहैक । बहुत दिन बाद हमरा आहाँ सँ सम्वन्ध बनल । ऋषीकऽ बचन अनुसार आँहा बरबाद भऽ गेलहु ।" एतेक बाजिकऽ ओ चुप भऽ गली । ओ फेर कहली– "हमर समयक अन्त भऽ गेल अछि, मात्र दु दिन वाँकि अछि हमर मृत्युकेँ ।ई वात त ओना किनको पचऽ बाला नहिरहैक । मृत्युकऽ नाम सुनिकऽ उमेश बजलाह ".............दु दिन मात्र वाँकीे कोनाक ?""जँऽ आँहा पतियाए चाहैतछि त.........मात्र दु दिन हमरा संगे रैहजाउ । "आशा कहली । उमेश झुठाकेँ नेङ्गराबकेँ विचारमे ओ "ठिक छै" कहला ।उमेश त पहिलदिन बड निकजका आशाक सगं वितएलाह आ एकबेर फेर आशा ओ राति उमेशपर समर्पित कऽ देलनि । उमेशके वस आशाके देह सँ प्रेम रहैक जेना वझाएल । मुदा दोसर दिन उमेशकेँ आशासँ डर लागऽ लगलनि । मँुहपर डर आ चिन्ता देखिक आशा बुझिगेली जे उमेशकेँ पक्का हमर मृत्यु सँ डर लागिरहल छनि । आ, ई देखिक आशा उमेशकेँ तखने ज्ञात करौलनि जे "काल्हिखन सूर्य जखन उदय भऽ जतएतैक तखने हमर समयकऽ अन्त भऽ जाएत ।" जखन हुनका आशा मृत्युक समयके बारेमे ज्ञात करौलनि तखन जाकऽ हुनका मोनमे संतोष भेलनि ।आ, आई राति आशा आ उमेश दुनुगोटा मे सँ किनको निन नहि परिलनि । राति भरि ओ दुनु बितल समय, आ साथे बितल राति सबकेँ वारेमे बतीयाति रहिगेलाह । जखन भोरकें पाँच बजलैक ओ जल्दीसँ जाकऽ नहाएली आ उमेशकेँ कहली– "दुनियामे आठटा मात्र चिरंजीवी पुरुश छथि । जै मे सँ हनुमानजी से हो छथि । हम हनुमान मन्दिर जाइतछी । आहाँ हमरा गेलाकऽ ठिक आधा घण्टाकऽ बाद मन्दिर तर्फ आएब ।"ई सुनिकऽ उमेश लाशकेँ बारेमे पुछला ।हुनका सम्झबित आशा कहली "ओ अपने जरि जएतै" बड अबेर भेल जाइत रहैक । ओ जल्दी सँ निकली । किछ समय बाद ओ एकवेर फेर आविक कहलनि–"उमेश भगवान अहाकेँ कल्याण करौथ ।"उमेशकेँ हुनक बात पर अखनो विश्वास नहि भेलनि ओ आधा घण्टा सँ पहिनही ओतऽ सँऽ निकललनि । जखन हनुमान मन्दिर लग पहुचलाह तँ लोक सवहक बाहरमे भिर लागल रहैक । एकटा आदमी सँ उमेश पुछला जे कि भेलैय ? ओ आदमी बडा उदाश भऽ कहलनि जे मन्दिरमे सँ दर्शन कऽकऽ निकलिते अपनेमने देहमे आगि लागि गेलन । ई सुनिक उमेश लोक सवहक भिरमे पसिक देखलनि त ओत मात्र छाउर बाँकी रहैक । उमेशक मोनमे एकटा अलग उदाशी पकरिललकनि । आ ओ ओत सऽ उदाश भऽकऽ पुनः घर आपस चलिअएलाह । ओ अखनो कतौ बसिकऽ मौन रहैछथि ।
अशल खिलाडी - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
एकटा देशमे कोचर नामक जादुगर रहे । कोचरकें जादुबाला चमत्कारी शक्तिकें देखकऽ गामक लोक हुनक प्रशंशक बनिगेल रहै । एकदिन कोचर सपनामे एकटा तलवार देखलनि जाहि तलबारमे एकटा अलौकिक शक्ति रहैछ । तलबार प्राप्त करै वाला व्यक्तिके कोनो प्रकारक इच्छा पूर्ण भऽ सकैत अछि । आब, कोचर ओही तलबारके पत्ता लगाबऽ लेलअपन प्रत्येक शक्ति लगादैछैक । अन्ततः ओ एकटा उपाय निकालैय जे ई तलवार राजा गोपाल सिंहक संग्राहालयमे राखलगेल अछि । ओइ तलवारक सुरक्षाके लेल अनेक प्रकार व्यवस्था कएलगेल अछि । आ, ई तलवार एकहि आदमी लाबि सकैय जेकर नाम सरोज खिलाडी थिक । कोचर खिलाडी लग जाकऽ अपन सब समस्या सुनौलनि । खिलाडी ओ तलबार जेनाक होई लाबऽकें लेल मनमे अठोट कैलनि । खिलाडी जखन सब किछ पार कऽ कऽ तलवार वाला कोठरीमे पहुचला त हुनका आगि, पानि आ पाथरि सवकिछ क सामना कऽरऽ परलनि । खिलाडी सामना करैत ओ तलवार प्राप्त कैलाह । जखन ओतऽ सँऽ ओ बाहर निकललनि त ओ एकटा चक्रव्यूहमे फसिगेलाह । निकलऽ कें लेल जखन ओ अकक्ष भऽ गेला तऽ ओतै माथ पर हाथ धऽ कऽ बसिगेलाह । खिलाडी अपन ईच्छा अनुसार रुप बदलिसकैय । मुदा तैंयो निराश भेलाक कारण सँऽ तलवारके भित्तर सँ एकटा चमत्कारी बालक निकललनि आ पुछलनि—"हे खिलाडी जी ! हम आहाँके कि सेवा कऽ सकैछि ?"एकाएक एहन आवाज सुनिक खिलाडी उपर देखलनि त एकटा शुन्दर बालक नजरि परलनि बालक के देखिकऽ खिलाडी पुछलनि –"अपने के छि ?""हम त आहाँक दाशछि । आज्ञा कएल जाँए ।"बालकके एहन नम्रता भरल आवाज सुनिक खिलाडी कहलनि "हम एतऽ सँऽ निकल चाहैत छि ।" एते मात्र बजिते खिलाडी बाहर निकलि गेलाह आ ओ बालक लोप भऽ गेल । तलवार लकऽ खिलाडी कोचरकें घर नहि गेला । ओ सिधा अपन घर पहुँचलनि । ओतऽ खिलाडीक माँ आ बाबुजी तिन दिन सँऽ भोजन नहि कैने रहैथ । जखन खिलाडी पहुचला त हुनको बड जोर सँऽ मुख लागल रहनि । सव गोटा चिन्तामे परल रहैथ । तखने फेर ओ चमत्कारी बालक आएला आ एकटा चौकी पर खुब निकजका सजाओल पकमानक थारी खिलाडीक सेवामे हाजीर कैलाह । एवं प्रकारके जते वातमे हुनका कोनो प्रकारक दिकत होयन त ओ चमत्कारी बालक आविक पुरा कऽ दै । एक दिन खिलाडीक घरक बाट दने एकटा राजकुमारी जातिरहैछैक । ओ राजकुमारी के देखकऽ खिलाडी मोहित भऽ जाइछ आ मनमे अहि राजकुमारी सँ विवाह करऽ कें वात सोचैय । राजकुमारीके देखला वाद खिलाडीक मोनमे एकटा अलग बेचैनी अबैछ ओ जखन तखन मात्र राजकुमारीके बारेमे सोचऽ लगैय । खिलाडी कें सोच मे परल देखिकऽ तलवारवाला चमत्कारी बालक पुनः उपस्थित होइय आ खिलाडीके लेल खुब शुन्दर गहना जेवर सँऽ भरल घर बनादैछ । खिलाडीक बाबुजी खुब बहुते गहना–जेवर लऽ कऽ राजकुमारीक हाथ मांग करऽ लेल तयारी से हो भऽ जाइछ । विवाह से हो बड निकजका सम्पन्न होइछैक । समय एतेक बितला बादो कोचर पिताएले छैक । आ ओ खिलाडीक पत्ता लगाबलेल अनेक प्रकारक बिधाके प्रयोग कऽरहल छैक । बहुतो बिधाक प्रयोग कएलाक बाद ओ खिलाडीक पत्ता लगाबमे सफल भेला । तखन ओ खिलाडीक घर लग एकटा छिट्ठीमे बहुते तलवार लऽकऽ पहुचल आ हल्ला करऽ लागल "पुरान एकटा तलबारके नयाँ दुटा तलबार । "ई बात खिलाडीक माँक कान तक गेलै ओ घरमेका जाँदू बाला तलबार लऽकऽ नयाँ तलबार लेबऽ पहुचैछथी ।कोचरके हाथमे तलबार पैरते कोचर ओतऽ सब तलबार छोरिकऽ गायबभऽजाइय । घरसँऽ तलबार के जाइते खिलाडी पुनः पहिलके स्थितीमे पहुचजाईय । आहे पुरान घर, भोजन करऽमे दिकत आदी ।खिलाडी अपना इक्षानुसार रुप बदलके क्रममे ओ एक दिन कोचरके कनिया बनिकऽ हुनक घरमे पैसलनि । कनियाके देखते कोचर मदिरा देबऽला कहलनि । खिलाडी मदिरा संगैह किछ आर मिलाक कोचरकें पिया देलनि । कोचर बेहोश भऽगेल आ खिलाडी अपन तलबारके खोजमे लागल । तलबार बहुत खोजला बाद भेटलनि । बादमे खिलाडी एहन ढंग सँ ओ तलबारके रखलनि जैके केओ देख नहि सकैय ।
मुमफली बाली - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
काठमाण्डूकेँ टुंडीखेलमे हम आ दुटा आओर हमर साथी बैसल छलहुँ । ताबते एकटा छौरी आबिकऽ हमरा सबके मुमफली खाएला कहलक । जेना मंगनीए दऽदेतै तहिना ओ हमरा आगुमे दु डिबा ममफली धऽ देलक । हम पाइकेँ लेल पुछली त बिस रुपैया कहलक । ममफली खाएवाक इच्छा त नहि, रहे मुदा साथी सबलग प्रतिष्ठाके देखकऽ जेबसँ पाइ निकालिकऽ दऽ देलहँु । करीब एक–डेढ घण्टाक बाद ममफली खतम भऽ गेल त हमसब ओतऽ सँ उठिकऽ रौदमे वैसऽ चैल गेलहु । फेर, एकटा दोसर छौरी आबिकऽ कागज निकालिकऽ ममफली छोटका डिब्वा सँ एक डिब्वा धऽ देलकै । हमहुँ सब ममफली खाए लगलहँु । ओ छौरी हमरा सवहक नजदिक बैसिकँ गीत गाबऽ लागल "यो मायाको सागर.....।" हमर साथी ओकरा भऽगाब केँ लेल "तो बड सुन्दर गीत गवैछ"े कह लगलैक । ई सुनिकऽ ओ छौरी कहैछै "एह, हम त........ गीते नहि नेपाली, हिन्दी, अंग्रेजी गीतमे डान्सो करैछी ।"फेर ओ अपन कुर्तीके उपरका बट्टम खोलिकऽ कहैय "आई कते गर्मी छै.........।"ई देखकऽ हमर साथी पुछलकै "एक दिनमे कते.......कमालैछही ।"ओ ढिठेसँ जाबाव देलक "मुला जौ फसिगेल त........हजारो भऽ जाइए ।"हम व्यंग करित कहलि " तब त हम अपनो घरवालीके ममफलीके व्यपार कऽ देबै.....।"फेर ओ कहली "आँहा सब तिन आदमी छि ..........मात्र तिन सय रुपैया जँ खर्च करब तऽ आइ राति आँहा सब साथे हम चैल सकैत छि ।"हम फेर व्यंग कैलिए "तोहर वाप कमाकऽ धऽ गेलछौ से......... ।"ओ हसऽ लगली आ फेरु थेथरियाएल जका बसिगेली । हमरा त बुझले नहि छल जे ओकर ई व्यपार होतैक । आ ओकर पहिरन–ओढ्न सँऽ बुझाय परैक जेना ओ कानो सेठकेँ वेटी होतैक । हमर साथी रामबाबु अपन जेबमे हाथ दैत कहैय "हे यो......हमरा लग त दु सय टका अछि.......आँहा लग एक सय अछि त दिअनै पैचे सही.....।"मुदा हम बड डटली ओ ओतऽ सँ उठिक तिनु आदमी भद्रकाली दने जाइत रही । भद्रकाली मन्दिर सँऽ कनिकें आगु आवीक रामबाबु कहलनि "अाँहा सब बढु ...........हम एक आदमी सँ भेटने अवैछी ।" हम आ संजय त बुझिगेलहु कि ई कतऽ गेल होएत ।करिब एक महिना वाद जखन हम ओहि दकऽ जाइत रही त ओही छौरी पर नजरि परल ओकर कपडा फटल रहैक मुदा ठोह् मे लाली बड. मोटसँऽ लगौने रहैक । आ जतेक आदमी ओइ दऽ कऽ जाइक सबके मुह पर तकै । ओही साँझमे हमर साथीरामबाबूकें फोन आयल आ कहलनि "हमर मोन खराब अछि ।"भोरमे हम ओकर डेरालग जाक ओकरा टिचिङ्ग अस्पताल जचाव लऽ गेलहु । डाक्टर बोखारक दवाइ दऽ पठादेलनि आ कहलनि जे एक हप्तावाद भेट करला । ओ, दवाइ खाइ, मुदा ओकर वोखार त ठिके नहि होइक । दिनदिने कमजोर भेल जाइक । फेर ओकरा लऽकऽ हम अस्पताल गेलहुँ । डाक्टर खुन, दिशा, पेशाब जचाबऽ लेल कहलनि । दिशा आ पिसाबक रिर्पोट तऽ तुरते दऽ देलक मुदा खुनक रिर्पोट ४२ दिनक वाद देबऽ कहलनि । ४२ दिन बाध हम रिर्पोट लऽकऽ डाक्टर लग गेलहुँ । वै दिन डाक्टर सब सँ अन्तमे हमरा बजौलनि । मितकेँ पकरिक डाक्टर लग लगेलियन । डाक्टर मित सँऽ पुछलनि "आहाँ बजारक लैरकी सँ..........सम्बन्ध रखैछी ।"किछ नहि बाजिकऽ ओ मुरी निचा कैने रहि गेलैक । आ, ई, सुनिक हम कहलियनि "डाक्टर साहेब,..................."डाक्टर हमरा किछ बाजऽ नहि देलनि आ हमरा कहलनि कृपया बिचमे नई, बाजल करी ।"फेर डाक्टर आवेशमे आविक कहलनि "हिनका छैन एड्स लागीगेल ।"ओ पुनः हमरा पर ताकिक कहलनि "ओना त एड्सकेँ इलाज त नहि छैक मुदा जौ संयम सँ रही त किछ दिन बाचि सकैछी । आँहा सब नयाँ उमेरक लरिका सब एना कर लगबै त कोना हेतैक ।"डाक्टर हाथमे कलम आ, आगामे सँ पुर्जी लैत कहलनि "देखु, आहाकेँ चित बुझावलेल किछ दवाई लिख दैछि ।"डाक्टर पुर्जी हमरा हाथमे देलाह । आ हम सब ओतऽ सँऽ निकलँहु । हमर मितत वड उदाश रहे भऽ गेल । ई देखक हम कहलियनि "चल वल्की गामे पर रहब ।"तखन त ओ हमरा हँ कहलक मुदा जखन हम तैयारी भऽ ओकरा डेरामे पहुचलहु त देखलहँु ओकरा खिरकी केवार चारु तर्फसँऽ लोक भरल । हमर मन धबरागेल । जखन हम नजदिक पहुचलहुँ त देखलहुँ एकटा हवलदार ओकरा गरदनिमे सँ डोरी खोलैतरहै । ओकरा शव बाहनमे धऽ कऽ अस्पताल लऽ गेलैक । आ हम ओकरा गामपर फोन कऽ कऽ ओकर बावुजीकँ खवर कऽ बजालेलियनि ।
विवाहक—प्रतिक्षा - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
अमरकेँ माँ आ भाई अमरके विवाहक चर्चा करैत रहैत अछि । आ हाथमे फोटो लऽक केओ बजैय –"लैरकी त सिनेमाक हिरोनी सनकें छैक"फेर के ओ बजैय "लाखौ कि..... करोरोमे एक छै ।"ई वातक चर्चा करिते बेरमे अमर घरमे प्रवेश करैत अछि । केवारक आवाज सुनिकऽ अमरकेँ माँ केवारदिश तकैत अछि आ अमरके देखिक पुछैछथि "कि रौ आइ त...... सवेरे कलेज सँ चैलएलही ।"अमर जुत्ता खोलैत कनी स्तीरे सँ जवाब दैत अछि "हँ, आइ कलेजमे दुनु पाटीवाला छौरा सब झगरा झंझट कैलकै ताहीसँ......... कलेज अनिश्चित कालके लेल बन्द भगेलैक ।"ई सुनिक माँ बजैछठि "ई छौरा सब कौलेज पढ.ऽ जाइतछै कि राजनितीकरऽ ...किछ बुझ्वे नहि करैछी ।"अमर फेर कहैय "तो सब कथीके चर्चा करैत छलेह ?"प्रश्न सुनिते अमरके भाई सुवोध बजैय "भैया .......ई फोटो देखीयौ ने ।"अमर भाइकेँ हाथस फोटो लऽकऽ देख लगैछैक ।फेर ओ फोटो उल्टवै छैक । फोटोक पाछामे लिखल पत्ता अमर पढिकऽ ओ फोटो द दै छैक ।दोसर दिन अमर भोजन कऽकऽ तैयार होइछै आ अपनमाँ के कहैछै–"माँ, हम कने मधुबनी जाइतछि ।"माँ ई सुनिक जवाब दैत छथि "परसु तोरा ओमहर सँ देखऽ अबैत छौ आ तो......""नहि माँ हम कल्हिए चैल अवौ ।"माँ कहैत छथि "ठिक छै जो ........मुदा वातमे फरक नहि परबाक चाही ।"अमर अपनसाथी रंजीतके साथमे लऽकऽ फोटोपर लिखल वाला पतापर चैलजाइए । गाँउमे जखन ओ सब पहुचैय तँऽ ओत देखैय कि लोक सब केओ केमहरो, कओकेमहरो भगैत रहैछ । अमर आ रंजीत दनूु ओमहरे जाइए जेमहर आगि लागल रहैत छैक ।ओहीठाँम एकटा विधवा, दुटा महिला आ एकटा स्यान लैरकी खुब कनैत रहैतछैक । ओकरा सबहक मुहसँऽ "बौआ रौ बौआ" निकलैत रहैक छै । ई देखिक रंजीत बुदिया सँऽ पुछैत अछि "कि भेलैय जे वौआ, वौआ कहैछि ।"बुदिया कनैत जवाव दैय "वौआ...... रे हमर पोता ओहिमे.....।"ई सुनिते अमर पहिनही दौरजाइत अछि । आ पाछा सँ रंजीत हल्ला करैय "रुक !!! रुकिजो अमर........ ।"अमर आगि आगल घरमे पैस जाइय । रंजीत पाछु सँ दौरैत अछि मुदा पैसऽ सँऽ पहिनही केवार खसिपरैछैक । करिब तिन–चारि मिनटककेँ वाद अमर वच्चाकेँ लऽकऽ खिरकी दने कुदैत छैक । ई देखक रंजीत कने नमहर श्वाश लैय । जखन पुरा आगि मिझा जातिछै त अमर आ रंजीत अपन घरकेँ लेल चैलदैय मुदा बुदिया वड आग्रह करऽलगैछै "बौआ आई एतै रैहजाउ ।"वुदियाके आग्रह देखकऽ रंजीत अमरकेँ रुकिए जाएला कहैछै । केओ गोटा अमर आ रंजीत सँ परिचय सेहो नहि पुछै छैक । किया त ई सब अमर परिचय वच्चाकेँ जान बचाक दऽदेनेरहैछैक । घर जरिगेलाक वादो वुदिया अमर पाहुनके दलानपर वैसबैय आ वुढि. ओतऽ सँ चलिजाइए ।पोखरिदिश जाएके बहाना बनाकऽ दुनुसाथी घुमऽ केँ लेल निकलैय किया त हुनका सबके एकटा दोसर काज सेहो छैन । ओमहरसँऽ एकटा मर्द हाथमे लोटा लेने अबैत रहै छथि । हुनका बजाकऽ रंज्ीत पुछैय—"भाईजी व्रज मोहनजीक घर केमहर छैक ।"ओ वटोही जवाब दैय "ओ हुनकरे घरमे त आइ .........आगि लागीगेल छलैय ।"अमर विचार करऽ लगैय ओ लैरकी कें बारेमे किया कि ओहे लैरकी सँ बिबाहक बात रहैछै । दुनुसाथी चिन्तामे पैरजाइए । आ चुपचाप अपन दलान पर आबिक बैसजाइए । के ओ किनको सँ वजितो नहि रहैछैक । कनिके देरके वाद ओ लैरकी खाना लकऽ अबैय । भोजनक साज देखक रंजीत कहैय "एतेक करऽकेँ कोनो जरुरीए नहि छलैक ।"मुदा ओ लैरकी कोनो प्रकारक जबाब नहि दैत कहैछैक "आहाँसबकेँ भुख लागिगेल होयत जल्दिसँऽ .....भोजन कलिअ ।"दुनु गोटा भोजन कएलाकवाद रंजित अमरकेँ लैडकी केँ आगातक अरीयाति देवऽ ला कहैतछै । अमर वै लैरकीके अरीयातऽ चैलजाइए । रंजीत तऽ मोनेमोन खुसी रहैय कि अमर ओकरा सँऽ किछ नहि किछ त पछबे करतै । मुदा अमरकेँ ओकारासँ किछ पुछवाक लेल हिम्मत काजेनहि करेछैक । किछ आगु अएलाक वाद ओ लरकी कहैछैक –"आँहा जाउ, आरम करु ।"अमर दलानपर फिर्ता भऽ जाइए ।प्रातःकाल सूर्योदय होबऽ सँऽ पहिनही रंजीत आ अमर ओतऽ सँऽ चैलजाइय । अमर घर पहुंचकऽ माँ आ बाबुजीकें दहेजक बिक्रीतीके बारेमे चर्चा सुनबैय । मुदा अमरके बाबुजी ई सब सुनलाक वाद जवाब दैछथि–"रे तो सब नहिने वुझबे जे कतेक आशा राखिक तोरा सबमे खर्च कैलि आ अखनो करैछी ।" पोर साल जे तोरा वहीनक बिबाहमे तिन लाख तिलक गनलहुँ से । ओइ समयमे दहेगकऽ विक्रिती त केओ नहि सुनैलनि ।"ई सुनिक" अमर वावुजीक विचारकेँ वारेमे नहि सोचैछ कि मुदा ओ लैरकि वाला सवकेँ वारेमे सोचऽ लगैछय जे ओ सब पहिने घर पर ध्यान देता कि तिलक गन्ता । ई वात सोचिते अमरकेँ बाबुजी सऽ सहमति नहि भऽ ओही साझँ घर सँ कतौ भागिजाइय ।लैरकी देखाबऽ के लेल जानकी मन्दिरमे अबैय । अमर नइ होबऽके कारणसँऽ अमरके माँ अमरके फोटो लऽकऽ पहुचैय । जलपान आदी भेलाकवाद आब सबगेटा लैरका के बजाबके लेल कहैय । ई सुनिकऽ अमरकेँ माँ कहैछथि "अमर त कने कौलेजके काजसँऽ काठमाण्डौ गेलअछि ।"फेर अमरके फोटो वेगमेसँ निकालिकऽ दैत कहैछथी "हे, लिअ ...........फोटो लैरकाकेँ ।"लैरकि वाला सव फोटो देखिते एकआपसमे कानफुस्की करऽ लगैय । सवगोटा फोटो देखिते–देखित फोटो लैरकीके हातमे परैय । फोटो देखिते ओ चिन्हलैय । अमर के प्रतिक्षा करऽ केँ क्रममे विवाहक वात कतेकवेर पक्का भभऽ कऽ टुटिजाइछनि । एक–डेढ वर्ष तक अमरके वाट तकिकऽ लैरकिक बाबुजी विवाहकऽ वात दोसर ठाम करैछथि मुदा ओ लैरकी अपन बाबुजीकेँ कहैय "बाबुजी, जौ हम विवाह करब त..................अमर सँ नहि त अहिना रहब । बल्कि हम अमरके प्रतिक्षा करब मञ्जुर अछि ।"अपन संतान त केकरो भारी नहि होइछैक । बाबुजी किछ जवाव नहि देलाह । आ ओ अमरसँऽ विवाह करव कैहक प्रतिक्षा करऽ लगली । बिश वर्ष त बितगेलै मुदा बिभा अखनो अमरके संग होबऽबाला बिबाहक प्रतिक्षा करैय ।
धोबीकेँ गदहा - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
सुबोधकेँ बच्चे सँ माँ आ बाबुजीक निक स्नेह भेटलनि । सुवोध हसिते, खेल्ने मेट्रिक पास भेलाह । गामसँ लगे पर वाला कौलेज मे आ.ए. पढैत रहैथ ।एकदिन हुनक बाबुजी हनका बजाक कहलनि "अपना खेत कते छौक से त बुझले छौक......... आब हम तोरा खर्च नहि द सकैछि आब तो अपने किछ आर्जन कर केँ कोषीश कर.....।"ई बात सुनिक सुवोधकें मनमे दुःख लगलनि आ ओ अपना बाबुजीके कहलनि "हम एते पाइ कमासकैत छि जे अाँहा पुते कहियो खर्च ककऽ खतम नहि कएल पार लागत ।"आ, ई वात कहिक ओ बाहर जाएकें लेल तयारी करऽ लगैय । ताबतें किछ दिन बाद सुवोधके वास्ते अगुवा एलनि आ हुनक बाबुजी तिलक लक सुवोध केँ विवाह क देलनि । विधी विद्यान सँ सुवोधक विवाह सु–सम्पन्न भेलनि । तिकममेका जे पाई बैचगेलरहनि ताहिसँ ओ छोटमोट व्यापार क'र केँ सोचलनि । ओ पटनासँ दवाई आ अन्य किछ लाविक वेचैछलैथ । एक दिन जखन ओ पटनाक गोविन्द मित्रा रोड पहुँचैछथ लखने हुनका ३ आदमी घेरक चाकु देखाक –"जते पाइ छौ निकाल नहि त मारिक नालीमे फेक देवौ ।"ई धमकी द सुवोधसँ सवटा पाई छिन लैछनि । सुवोधक जेवीमे एकटा फूटलो कौडी नई होब के कारण स ओ वड कष्ट कक अपन घर पहुँचैछथि । तिन दिन वाद भुखले सुवोध अपना घरपर पहुँचैय । मुदा ई घटनाक वात किनको नहि सुनवैछथि । मुदा ई वात ओ अपना मनमे से हो नहि दवाब सकैय । आ ई कारण ओ एकदिन आधा रातिएमे उठिकऽ घर घेरिक चैलजाइछैक । आगा पहुचक जइ वस पर चढ लनि ताही वसक स्टाफसँ पुछलनि "ई बसमे ......यात्री विमा अछि कि नहि ?"एहन वात सुनिकऽ लोक कहैक "ई छौरा त ....पागल लगैछैक ।"मुदा सुवोधकें मनमे ई छलैक जे हम मरियोजाएब त विमा वाला पाइ हमर बाबुकेँ भेटऽ जाइतै जै सँऽ किछ निमहि जएतै । मुदा ओकरा अपन घरवालीके चिन्ता कनिको छैहे नहि । सुवोध मुम्बई पहुँचैय । मुम्बईमे सुवोध करिब २० दिन पाथरि फोडवाला काज करैय आ पुनः ओ दोसर काज करकेँ तैयारीमे लगैय । काज ताकँऽके क्रममे एकदिन सुवोध देखैय एक आदमी आगु–आगु भागिरहल आ चारिगोटें ओकरा खेहारैत । हाथमे तलवार लऽकऽ खेहारैवाला सब बड क्रुर लगैत रहैत छैक । भागऽ वाला आदमी सुवोध ठाह् भेल वाला गल्लीमे नुकारहैछैक । बाँकी खेहारवाला सब चारुतर्फ ताकिक ओ फिर्ता चैल जाइए । तखन ओ नुकायल अदमीलग जाकऽ अपन परिचय दैछैक आ काजक तलाशमे छि से हो कहैय । ओ आदमी सुवोधकें अपन मालिक लग लऽजाइतछै । खाँन पोशाक पहिरने दाह् िवाला आदमी सुवोधके एकटा काज सोपैछै"ई वेग लऽकऽ समुद्र किनारमे पहुचादही तोरा ओतै हमर अदमी भेटतौ आ तोहर परिश्रमिक ओतै दऽ देतै ।"सुवोध बेगलक समुद्रकात पहुचैय ओत ओकरा कहल अनुसारकेँ आदमी भेट जाइछैक । ओ वेग सुवोध ओकरा द'क अपन परिश्रमिक पच्चिस हजार रुपैया पबैय । हातमे पाई परिते ओ सबसँ पहिने जीवनविमा करबैय आ पुनः अपन काजमे लागि जाइय । एक दिन जखन सुवोध वेग लऽकऽ समुद्रकात जातिरहैय त पुलिश पाछा आब लगैछैक । सुवोध अपन मोटर–साइकल छोरिक लगैय गलिदने भाग । सुवोध आगा आ पुलिशपाछा । ई क्रम चलैत चलैत पुलिश सुवोधपर गोली–चलवैछैक । सुवोधके पिठपर गोली लागिजाइछैक । सुवोध लगैय छटपटाय । हाथसँ वेग खैस परैछै । गोलीके आवाज सुनिक लोक लगैछै भागऽ । पुलिश वेग खोलिक देखैय त ओकरा वेगमे मात्र उजरा पाउडर रहैछैक । पुलिश पुनः दोसर गोली ओकरा माथपर मारिदैछैक । सुवोधकेँ प्राण ओतै छुटिजाइछैक । पुलिश ओकरा लाशके समुद्रकात मे लजाक फेकदैछै । मुदा सुवोधके माथ–बाबु आ कनियाके अखनो प्रतिक्षा छै सुवोधके ।
हमरा याद अछि - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
हम आठमे पढैतछलहु बात त तहिएके थिक । दोसर–दोसर स्कूलसँआयल नयाँ–नयाँ विद्यार्थी तिनटा साथी स परिचय भेल । आ, ई, तिनु सँ परिचय भेलाक बाद हमहु पहिल–दोसर ब्रिन्चि पर बैसनाइ छोरिक अन्तिम ब्रिन्चि पर ओकरा सब साथे बैस लगलहुँ । अन्तिममे वैसकऽ अनेक प्रकारक गप होइछलै । ताहिक्रममे लैरकी सबकेँ बात बेशी होइक । ई सब हमरो सुनऽ मे बड निक लागे । एक दिन हमरा सबकेँ क्लाशमे चौथी ब्रिन्चिपर बसैल भाटारंगकऽ कपडा पहिरने लैरकिकेँ वारेमे गप चलऽ लगलैक । शिक्षक चैलअएलनि सब चुप मुदा शिक्षककेँ गेलाक बाध फेरु ओकरे बारेमे गप । ओ रहवो करै एते सुन्दर जे लगै चन्द्रमा मेँ स टुटल टुक्रासँ ओकर मुह बनल होइक । क्लाशक प्रायः लैरका सब ओकरेपर तकै । आब ओकर नाम कि थिक ? पत्ता लगाब परलैक । मुदा हम अपन साथी सबके हम कहलहु "आहा सब ई काज...... हमरापर छोरिदिअ"सब नाम पत्ता लगाब बाला काज हमरापर छोरिदेलक जखन टिपिन भेलैक । सबगोटा बाहर चैलगेलैक त ओकर किताब–कापी उल्टाकऽ देखलहु । आ ई पत्ता लागलजे ओकर नाम मनोरमा छैक । आब बात रहल ओकर घर पत्ता लगाबकेँ । त आनदिन जैतहु त अबेर भजाइत । ताहि सँ हम आ हमर साथी जगत शुक्र दिनक ओकरा पाछा करैत गेलहँ । घर पत्ता लागिगेल । अहि सब किछ केँ बारेमे हम संजयके सुनैलहूँ । ई सब त हम करैछलहुँ हमर मित संजय ला मुदा मनोरमाकेँ धीरे–धीरे हमरा सँ लगाब होबऽ लगलैक । मनोरमा के हमरा सँऽ लगाब देखिकऽ संजय हमरा सँऽईर्शा करऽ लागल ।मनोरमाकें नजरिमे हमरा गीराबऽ लेल आ अपने निक बनऽलेल अर्धवार्षिक परिक्षाक अन्तिम दिन हमरा पर हात उठेलक अपना साथीमे सबसँ कमजोर हमही रही ताही सँ हमरा माइर खाए परल आ कपार से हो फूटिगेल । बाबुजीक डर सँ घर नहि जाकऽ हम मन्दिरपर वैसल छलि । करिब १५–२० मिनटकेँ बाद मनोरमा ओत पहुचली आ हमरा कहलगली "एना डरपोक भऽ कऽ नहि चलत,.......... आहाँ कँराटे सिखु आ....... किछ करु ।"ई वात सुनिकऽ , हम बड सोचलँहु । कि, ओ ठिक कहलीअ कि बेजाय । ओहि दिन साँझ सँऽ हमहुँ कराँटे खेलगेलहँु । आ, ३ महिना पहुचैत– पहुँचैत हम अपना क्लबके एकटा निक खेलाडी बैनगेलहु । दशमी आएल । स्कुलमें सबसाथी एकआपसमे शुभकामना आदन–प्रदान केओ मुह सँऽ आ केओ पोष्टकार्ड आ ग्रिटीङ्ग कार्ड सँ । हमरो एकटा ग्रिटीङ्ग कार्ड मनोरमाके तर्फ सँ भेटल । जे कार्ड सायत संजय के कहलापर अरुण चोरालेलक । मुदा, फेर छुट्टी कालमे संजय अपनाके हिरो बनाबऽकेँ लेल हमरा पर हाथ उठौलक मुदा हम ओते आब आशान नइ रैहगेलरही । हमरा दुनुके बराबर माइर चलल आ, पुनः हमरा कपार फुटिगेल । तावते स्कुलकें एकटा शिक्षिका आबिक झगडा छोरादलनि । आ ओ ई हो कहलनि जे एहन जँ आदत रहतौ तऽ जीवनमे कहियो आगु बढल पार नहि लगतौ । ई आठ –दश वर्गक विधार्थी कही एहन भेल । फेर, विद्यालय खुजल । सबगोटाके तँऽ बुझले छलैक हमर आ मनोरमाक प्रेमके बारेमेँ ई चर्चा कने बेशिए भऽ गेलैक । एक दिन मनोरमा हमरा स्कुल छोरिकऽ सिनेमा देखला कहलनि । हम आ मनोरमा आशा हलमे अमानत फिल्म देख गेलहु । वै के वाद ई क्रम चलैत रहलै । समय वितते गेलैक । हम सब एस.एल.सी. दैत रही त हमरा मालुम भेल कि मनोरमाके विवाह फागुनमेँ छैक । ई सुनिक हमरा शारीरक रक्त सञ्चार बन्द भऽगेल । हमर सोचन शक्ति हेरागेल । आ एकटा एहन अवस्था चैलआयल जतऽ नहि त हम कानि सकतछी नहि हम हसिसकैत छि । मुदा एतऽ कि करु हम बुझऽ नहि सकलहुँ । ई सुनिकऽ हमरा हृदयके से हो कने चोट पहुँचल किछ दिन बाध ओकर सहेली संकटमोचन लग भेटलनि आ कहलनि "कल्हि खन ३ बजे आँहा राम मन्दिर अवियौ ।"हमरा किछ अवेर भऽगेल करिब पौने चारि बजे ओत पहुँचलहु । ओ सब तिनो बजेसँ पहिले आएल रहैक । हमरापर ओ खुब जोइ सँ खिसएली । मुदा हम किछ जबाब नहि देलियनि । अन्ततः ओ एतवे कहलनि जे हम सब किछ लऽकऽ चैल आएल छि आ अपने सब भागु । हिम्मत काज नहि केलक जे दुनु अदमी भागी जाई । हम नहि छोरिक आइ किछ जबाब नहि देबऽ सकलहुँ । ओना तखन तऽ हम पुरा होशमें छलहुँ । भागीकऽ विवाह करऽ बालाकऽ तिन पुस्ता बखाद भऽ जाइतैछक । ताही सँ ई मनक बातमे हम दिमागक प्रवेश कऽ कऽ हम अन्तोतक नहि मात्र जबाब देलीयनि । एतेक बात मात्र भेलैक मुदा साँझके सात कोना बाजिगेल बुझ नहि सकलहु । जाए कालमे ओ कहली "अमर ............... हम आहाके श्राप त नहि दऽ सकैतछि मुदा एकटा शिख जरुर देब जे.................. एहन काज कहियो नहि करब जै सँ केकरो मनमे दुःख लगै ।"आ ई बात हमरा अखनो याद अछि ।
दाग लागल स्नेहमे - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
आई.ए. प्रथम वर्षमे अध्यनरत सुनिताकेँ एकटा बड निक विद्यार्थी दिपक सँ भेट होइछैक । बात–बिचार मिलऽ केँ क्रममे सुनिताकेँ । दिपकसँ प्रेम भऽ जाइछैक । सुनिताक घरसँ नजदिकेँ के घरमे भाडा लक रहबाला दिपक से हो सुनिता सँ प्रेम कर लगैछैक । आ, सुनिताक साथी रुबी सेहो जखन भेटभेल तखने दिपककेँ बारेमेँ पुछ लगैछैक । दिपक, रुबि आ सुनिताकेँ पढमे से हो बड मदत करैछैथि । समय–समय पर दिपकसंग सुनिता सिनेमा देखऽ सेहो जाय लगैय । दुनु एक आपसमे कहियो मन्दिर लग आ कहियो पार्कलग भेटघाट करके बात सुनिताक बाबुजीकेँ कान तक पहुँचजाइछैक । सुनिताक बाबुजी बड दुखी भऽ सुनिता लेल वर ताक लगैछथि । ई वात सोचिकऽ जे बेटी अपन प्रतिष्ठा सेहो बुरादेत । संचयकोष सँऽ पाई छोराक बेटीलेल गहना–गुरिया से हो वनाब लगैछथि । सुनिता ई सब बात अपन सहेली रुबिकेँ सुनबैय । ई सुनिकऽ रुबि दिपककें संग भागिक विवाह कर ला आ मिथिलाक दुर्दशा दहेज आ महिला अधिकारके बारेमे निक जका पाठ पढादैछैक । दोसर दिन सुनिता अपन साथी दिपककेँ भेट कऽकऽ भागिकऽ विवाह करऽला कहैछैक । सब किछ सुनलाक बाद दिपक भागऽके लेल समय सेहो निश्चितक सुनिताके कहैय । प्रातः काल सुनिता आपन माँके मंगलशुत्र, तिलहरी आ अनवारीमे राखल रुपैया लऽ दिपक संग भागिजाइय । आ दुनू सब मुम्बइ पहुँचैय । दिपक रहऽकेँ लेल अपन मितकेँ डेरामे व्यवस्था मिलबैय । आ, सुनिताकेँ डेरामे छोरिकऽ दिपक ओमहरे रैहजाइय, जाँहि कारण सँऽ सुनिता बड चिन्तित भजाइय । मुदा साँझमे दिपक केँ देखिते सुनिताके चन्द्रमा सनक मुहसँ इजोत निकलैछैक । आ, ओइ राति सुनिता दिपकपर पूर्ण रुपे समर््िर्पत भऽ जाइय । भोर मे जखन सुनिताक आँखि खुलैछै त दिपक ओतऽ नहि रहैछैक । दिपक नितक्रिया मे गेलहोयत सोचिक सुनिता जल्दि सँ उठिक अपन कपडालता पहिरक तैयार होइय । मुदा एमहर–ओमहर तकैत सुनिताक नजर चिठ्ठी पर परैछैक । ओ चिठ्ठी खोलिक देखैय, लिखल रहैछैक "हमरा माफ क दिअ सुनिता ।"
ई पढिक सुनिता अपन माथ कपार पिट लगैय आ सोच लगैय जे कि भगेल । सुनिताक छाती धर धर धर धर काप लगैछैक । तावते केवार खुलैछैक । आ, एकटा महिला पान खैने दुटा मर्दके लक पहुँचै छै । पहिने ओ महिला सुनिता सँ पुछैछैक "तम्हारा नाम.... सुनिता है ।""हाँ, हाँ, मगर क्यो ?" सुनिता डेराक जवाफ देछै । ओ महिला फेर कहैछै "चलो हमारे साथ ।""क्यो ?""हमने तुमको ....खरिदा है ।""नही ए झुठ है ।" ओ महिला अपन साथमे आयल मर्दकेँ कहैछै "ए ! उठालो सालीको,...... बहोत बोलरलिए ।"दुनु मर्द सुनिताके उठाक लजाइय । सुनिताके देह व्यापार कर ला कहलजाइछ । मुदा अस्विकार कएला पर सुनितकेँ लगैछै पिटाइ आ दऽ देओल जाइछ निशा के सुई । निशाकेँ सुई दकऽ देह व्यापार कराबके कारण स ओ विमार भऽ जाइछ । ताहि सँऽ ओकरा जचाँबऽ लेल डाक्टरलग लगाइछ । ओ सौचालय जायकेँ बहाना सँऽ ओतऽ सँऽ भगैय । आ भागऽमे सफल सेहो भऽजाईछ । सामने अवैत रिक्सापर बैसकऽ ओ रेलवे–स्टेशनपर पहुँचैय । रिशसाबाला जखन पाई मगैछैक त सुनिताकेँ सबकिछ सुनाब परैछैन । किया त सुनिताक सबपाई ल क दिपक चैलगेल रहैय । सुनिताक दुःख भरल खिस्सा सुनिक रिक्सावाला सुनिताकेँ अपन डेरा लजाइय । आ दु–तिन दिनमेँ अपन गाम पहुँचादेवकेँ बचन से हो दैय । रिक्शावालाक वात सँऽ सुनिताकेँ विश्वास होइछ । सुनिताकेँ संग परिचयपात होबऽ के क्रममे रिक्शावालाकेँ घर सेहो परोशकें गाउँमे छैक से ओ वतवैय । दु–तीन दिन बाद सुनिताक संगे रिक्शावाला अपन गामकेँ लेल निकलैय । रेलबे स्टेशनपर सुनिता पुरा एमहर–ओहमर देखैत सावधानी सँऽ चलैय मुदा जहिना टे«न आगा बढैछै, सुनिताक घरकैत करेज स्थिर होब लगैछैक । सुनिता ताक लगैय रिक्शावालापर आ सोच लगैय ओ दुनुकेँ फरककेँ बारेमे ।रिक्शावाला सुनिताकें लकऽ जखन सुनिताकऽ घर पहुँचैय तऽ सुनिताक बाबुजी सुनिताके देखक कहैछथि "आब कि लेब अएले.................., ओतै सँ चैलजो नइ त हमहि सब बिख खा लेब ।"सुनिता विना किछ बाजिकऽ मुरी गोतने बाहर निकलैय । सुनिताकऽ हाथ रिक्शावाला पकरिलैछ आ ओ अपन घर चलऽ ला कहैछ । जखन ओ दुनु बाटमे परऽवाला दिपककेँ डेरा लग पहुचैय । कोठरी भितरसँ बन्द रहैछैक । सब दिन खिरकी दने वजाबकेँ आदत सुनिता खिरकी दने पुनः बजाबलेल तकैछ । मुदा सुनिता जखन खिरकि दने तकैछै त सुनिताक साथी रुबि दिपक के कोरामे बैशल प्रेमरसकेँ वात करैत रहैछ । ई देखक, सुनीताक पैर तर सँऽ जमीन जेना निकलिजाई तहिना भऽजाइछ । आ ओ अपना पर भेल अत्याचार दोशर पर नहि होउक से सोचिकऽ नजदिक कें थानामे जाक दिपक के बारेमे लिखवैय । सुनिताकेँ स्थीती परिस्थिति देखक आब ओ कत जएती सोचिक रिक्शावाला सुनिताकेँ कहैछ "एक बात कहु, .........पिताएब न नहि ?"उत्सुक्ता जनबैत सुनिता, कहैछ " ह ! कहु ..........!"तब रिक्शावाला कहैछ "आहा हमरा सँ ............विवाह करब ।"
ई सुनिक सुनिता हसऽ लगैछ ।
Wednesday, November 05, 2008
भाग्य अप्पन अप्पन- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
सर्वेक्षणक क्रममे जखन ओ एकटा आङन पहुँचलनि त देखलखिन दू भाइमे झगडा होइतछल । जाहिमेसँ एकटा भाइ जे जेठ छल ओ रहैथ केश कटौने जेना किनको स्वर्गबास भऽगेल छलैन । आ, दोसर भाइ जे छोट छलैथ ओ लाल धोती पहिरने छलाह जे देखिकऽ लगै नव बियौहती बर । राजकुमार ई देखिकऽ हरान भऽगलैथ जे एकहि आङनमे एना किए छै ? आङनमे ओ दूनु राजकुमारके देखियोकऽ चुप नहि भेल । हँ, स्वभाविक छै, कहाँदोन पित्तमे लोक आन्हर भऽजाइछ । राजकुमार लगलैथ दूनुमे भऽरहल बातचित सुनऽ । बड़का भाइ बेर–बेर कहै —‘रे तोरा लेल हम नौह–केश करालेली..हमरालेल तो मरिगेले ।’ एहन किसीमके बात सुनिकऽ हुनको बरदास नहि भेलनि माय ओ जोरसँ कहलैथ–‘अहाँसब चुप होएब कि जेल अखने पठादिअ ।’बास्तवमे लोक कहैछै –‘माइरके डरसँ भुत पराए’, ठिक ओहने भेलै । दूनु भाइ चुप भगेल तखन राजकुमार छोटका भाइसँ पुछलखिन –‘अहाँ कहु अहाँ एहन कोन गलती कएलहुँ जे घरमे एहन कल्लह भऽरहल अछि ? कि अहाँके एते बुझल नहि अछि जे कलहके कारणसँ घरक सब किछु कमजोर भऽजाइछ ?’ राजकुमारक प्रश्न सुनिकऽ बड़ विनम्र भऽओ जवाब देलनि –‘हम आठ बर्ष पहिनेसँ जाँहि लड़कीसँ प्रेम करैछलहूँ ओकरेसँ हम बियाह कएलहूँ अछि । ताहिलेल ओ हमरा पर खिसियाएल छथि ।...हुनका तिलकके माध्यमसँ आबऽवाला आम्दनी नहि भेटलनि ते ओ बिभिन्न बहन्ना बनाकऽ हमरासँ झगडा कऽरहल छथि ।’
भाइके मुँहसँ एहन बात सूनिकऽ ओ पिताकऽ कहलैथ –‘बियाहमे सबसँ पहिने देखलजाइछ लड़कीक खन्दान, जाति आदि ।’ जातिके नाम सुनिते छोटका भाइ कहलकै –‘हम जातिके बाह्मण होइतो जँ चौकपर जाकऽ जुत्ता सियब त लोक हमरा चमार कहत, अर्थात मतलव साफ छै आदमी अप्पन कर्मसँ नमहर आ छोट होइछ ,... किनको माथपर नहि लिखल रहैछनि कि ओ कोन जाति छथि ।....रैहगेल खन्दानक बात त थाल आ कमलके फूलवाला कहाबत अहाँ पक्का सुनने हाएब ठिक तहिना जँ हम बाहरमे कतौ फेकल पथ्थरपर भगवानक मूर्ति गढ़िक मन्दिरमे राखि दिऐ त लोक ई नहि पुछ अएतै जे ई पथ्थर कतऽके छै ओ सिधा पूजा करतै ......लोक डुबैत सूरजके एकहि दिन प्रनाम करैछैक मुदा उगैत सूरजके सब दिन ।’ एते बातक बादो जेठ भाई फेर कहलखिन –‘रे, कमसे कम ओकर संस्कृती पर त बिचार करऽके चाही ।’ संस्कृतीक नाम सुनिते छोटका भाइ हसिकऽ बाजल –‘महाभारतमे भिम सेहो एकटा राक्षसनीसँ बियाह कएलकै जेकर पुत्र घटोत्कच छलैक ।....आप करे त रास लिला आ हम करे त कैरेक्टर ढिला, नहि ।’ फेर ओ शान्त भऽकऽ कहलखिन–‘देखु भैया, बियाह आदमीक सोचला आ कएलासँ नहि होइछ ...ई त भाग्यक खेल थिक ।’
दूनु भाइमे भऽरहल बातचित सुनिकऽ राजकुमारके सेहो किछु नहि फुराति छलैन । उदाहरण एकहुटा काटऽवाला नहि रहैक । ते ओ बिचमे किछु बाजऽ सेहो नहि चाहलखिन । ते ओ हुनकासभसँ बिनाकिछु पुछने –‘अहाँसभ झगड़ा नहि करु’ कैहकऽ बिदा भऽगेलैथ ।
राजकुमार ओतऽसँ कनिके आगु बढ़लैथ त देखलखिन एकटा बोर्डपर लिखल रहै “भविश्यवाणी” । बहूतो लोकसभक ओतऽ भिड़ लागल रहै । लोक सबहक भिड़भाड़ देखिकऽ ओ आश्र्यमे परिगेलैथ । केओ अनाज, केओ किछु– केओ किछु केओ रुपैया दऽकऽ भविश्यवाणी सुनऽ आएल रहे । राजकुमार पण्डितजी लग जाकऽ पहिने ओ अप्पन सर्वेक्षणक सम्बन्धमे आय–ब्यय सभ किछु पुछिलेलाक बाद ओ भविश्यवाणीक सम्बन्धमे सेहो किछु पुछलखिन किए त हुनका दिमाग पर नचैत छलैन एकहिटा बात जे ओतऽ छोटका भाइ बाजल छल –‘ बियाह आदमीक सोचला आ कएलासँ नहि होइछ ...ई त भाग्यक खेल थिक ।’
राजकुमार अप्पन बिवाहक सम्बन्धमे पण्डितजीसँ पुछलखिन कहु –‘हमर बियाह केकरासँ कोन जातिमे होएत ?’ पण्डितजी हुनक माथक रेखा देखिकऽ पहिनही बुझिगेल छलैथ कि ओ एहि देशक भावी राजा छथि । मुदा बियाहक सम्बन्धमे ओ देखलथिन त हुनका भेटलनि कि हुनक बियाह ओही गाँमक चमनिके संग । पण्डितजी राजकुमारसँ कहलखिन–‘अहाँक बियाह एहि गाँमक चमनिसङ होएत ।’ ई बात सुनिते राजकुमार पितागेलैथ आ पुछलखिन –‘जँ नहि भेलै त ?’ राजकुमारक प्रश्नके ओ हसैत उत्तर देलैथ–‘जँ नहि भेल त अहाँ हमरा जे कहब मानिजाएब ।’ राजकुमार सर्वेक्षणक काज छोड़िकऽ दरवार फिर्ता भऽ चिन्तीत भऽ अप्पन कक्षमे जाकऽ सुतिरहलैथ ।
देशक प्रधान सेनापत्ति राजकुमारक एकटा बहुत निक मित सेहो छलखिन । राजकुमारके चिन्तीत मुद्रामे देखि ओ हुनकाँसँ पुछलखिन –‘मित, अहाँके कि भेल, अहाँ एना चिन्तीत किए छी ?’ राजकुमार सेनापत्तिलग अप्पन मनक बात पूर्ण रुपसँ निकजकाँ सम्पूर्ण घटना सुनौलखिन । ओहि गाममे एकहि घर चमनि होबऽके कारणसँ सेनापत्तिके ओकरा सबहक बारेमे सेहो निकजकाँ बुझलरहे । सेनापत्ति अप्पन बिचार प्रस्तुत कएलानि –‘चमनिके एकहिटा जे बेटी छैक ओकरा मारिकऽ नदिमे फेक देल जाए ।
राजकुमारक आज्ञा अनुसार सेनापत्ति अप्पन किछु सेनासहित जाकऽ ओइ लड़कीके जंगल दिश लगेल । बिच जंगलमे जे एकटा नदि परै ओतै ओकरा लऽजाकऽ एकटा सेना ओकरा पाछुसँ एक तलवार मारिदेलकै । ओ लड़की ओतै बेहोस भऽगलै । मरलसन देखिकऽ ओकरासभके भेलै जे ओ लड़की मरिगेल ते ओकरा नदिमे फेककऽ सेनासभ अप्पन देश फिर्ता चलिआएल ।
ओ लड़की दहाकऽ एकटा दोसर राज्यमे पहुचगेल । नदिक किनारके ओहि देशक राजा रहैथ स्नान करैत तखने हुनका ओ बेहोस लड़कीपर नजड़ि पड़लनि । राजा अपनेसँ जाकऽ ओ लड़कीके कोरामे उठाकऽ लैलथि । श्वास त ओकर चलिते रहै ते राजा अप्पन दरवार लऽजाकऽ ओकर ईलाज राजबैद्यसँ करौलनि । राजाके अप्पन कोनो सन्तान नहि होबऽके कारण राजा ओइ लड़कीके अप्पन राजकुमारी घोषणा कएलनि । किछु समयक बाद राजकुमारीके बियाहक प्रशंगमे राजा एकटा सभाक आयोजना कएलनि । आ, आहि सभामे बिभिन्न राज्यक राजा तथा राजकुमारसभके आमन्त्रित सेहो ।
शभामे उपस्थित राजा–महाराजा लग घोषणा कएलगेल –‘राजकुमारीके जे लड़िका पसन्द एतै, ओ ओहि लड़काके वरमाला पहिरादेत आ ओहि लड़कासँ राजकुमारीक बियाह सेहो कएलजाएत । घोषणा पश्चात राजकुमारी शभामे वरमाला लऽकऽ उपस्थित भेली । राजकुमारी कोनो स्वर्ग परीसँ कमजोर नहि बुझाई । राजकुमारीके देखिकऽ सबहक मोनमे रहे –‘हम राजकुमारीसँ बियाह करितहुँ ।’ ओ चारु दिश घुमिकऽ ओही राजकुमारक गरदनिमे माला पहिरादेली । राजकुमार सेहो बड़ खुस भेल किए त हुनका भविश्यवाणी कैनिहार पण्डितके जबाव देबऽके छलनि ।
बियाह भेलनि । राजकुमार राजकुमारीके लऽकऽ अप्पन राज्य अएलनि । बियाहक सब बिध समाप्त भेलाक बाद ओ अप्पन सेनापत्तिके बजाकऽ ओ भविश्यवाणी कैनिहार पण्डितसँ भेटवाक इच्छा प्रगट कएलनि । मित तथा राजकुमारक इच्छा अनुसार ओइ पण्डितके राजकक्षमे उपस्थित कराओल गेल । राजकुमार आदेश देलनि –‘ई पण्डित दोसरके मात्र ठकैय । भविश्यवाणीक नाम पर सभके धोखा दैय ते एकरा सजाय मृत्यु देल जाए ।...... जँ हिनका अप्पन सफाइके लेल किछु कहऽके छनि त कैह सकैछथि ।’ राजकुमारक बात सुनिकऽ ओ कहलखिन–‘राजा साहेब आइ तक किनको हम नहि ठकलीयनि । रहल बात अपनेके त अपने जाकऽ ई देखलजाए कि अपनेक रानीक गरदनिके पाछु कातसँ अपनेक सेनापत्ति द्वारा मारलगेल तलबारक निसान अछि कि नहि ।’ ई बात सुनिक राजकक्षमे रानीके सेहो उपस्थित कराओलगेल आ ओतै सभक सामनेमे जखन ओ माथ परसँ नुवा हटाकऽ पाछुतकलखिन त बास्तवके तलबारक निसानी रहबे करै । सभगोटेके छक्क पड़ैत देखिकऽ पण्डितजी कहलनि–‘होइहे वही जो राम रचि राखा ....।’
दाग- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
अरुणक प्रश्नके बिना कोनो जबाब देने ओ कहलीह –‘हम भागिकऽ अएलीए ।’
तैयो अरुण किछु नहि बुझल जकाँ ओ ओकर आओर लग घुसकिकऽ ओकरे दिश ताकय लागल । रानीके लगमे बसिते ओकरा पुरान बातसभ मोन परऽलगलै; रानी, जे पहिलबेर कैम्पसक पहिल सांस्कृतीक कार्यक्रममे भेटल छलीह । निक कलाकार होबऽके कारणसँ रानी अरुणसँ परिचय करऽगेलीह । परिचय भेलै । आ, साथमे आओर किछु बात सभ । आ एतहि दूनुके एक–दोसरसँ मुक प्रेम भऽगेलनि । ताहिके बाद दूनु कहियो कतौ त कहियो कतौ भेटऽके सिलसीला जारी राखऽलागल । एहिके बारेमे किनको किछु बुझल नहि छलनि । एहि क्रममे अरुण रानीसँ बियाहक प्रस्ताव आगु बढ़ौलनि । आ, रानीक सहमति पाबि ओसभ भागिकऽ बियाह कएलाह । एहि बियाहके ओना रानीक जातिके लोक बिरोध आ अरुणक जातिक लोक स्वागत कएने रहै । आ, दूइए बर्षक बाद ई .......... दोसर संगे ।
जेकरासंगे ओ चलिगेलछली अरुणके बुझल नहि छलनि जे ओ के छैक । किए त अरुण एकटा कुशल कलाकार होबऽके कारणसँ बहुतो लोकके हुनका आंगनसँ आबाजाही लागल रहैछलनि । ओना त ओ रानीके गेलाक बाद ओ बहुत दिन धरि गुमसुम रहय लगलाह । मुदा एखनि ओ अप्पन मोनके बुझालेने छलाह । गाम आ टोलक लोकसभ कहैछलै –
‘केहन छै , लाजो नहि । बहुभागिगेलै ...... ।’
मुदा समाजमे एहन घटना घटब त आम बात भऽगेल छैक । एकटा अकल्पनीय घटनाके प्रश्नवाचक दृष्टीसँ देखते रहैथ ताबते ओ बजलीह–
‘हम अहाँसँ मात्र भेट करऽ आएलछी ......... एगारहे बजे अएली मुदा अहुँ नोकरी करऽलगलीए से मालुम भेल । ...... एखनो धरि अहाँ हमरालेल चिन्ता लैतरहैछी से बात सिरसियावाली काकी कहैछलखिन । .......कि आब अहूँ बियाह कऽलेब त नहि होएत .......... आ नोकरीवालाके बियाह होनाइ सेहो कठिन नहि ।’
मुदा अरुण हुनक प्रश्नक कोनो जवाफ बिना देने पुछलखिन –
‘अहाँ एतऽ कि करऽ अएली ?’
अरुणक एहि प्रश्नक जवाफमे ओ कहली –
‘हम बिमार भऽगेली ...... दिनानुदिन कमजोर भऽरहलछी ....... जखन–तखन माथ दुखाइत रहैय .... घुरमी लागल जकाँ बुझाइतरहैय । ......... हम ओ छठठूकसंग जाकऽ बड नमहर पाप कएली आ पापक परिणाम कतहूँ निक नहि होइछैक । हमरा ओ ठगिलेलक, अरुण ?’
एते सुनलाक बाद अरुण पुछलखिन– ‘किए ? आब कि भेल ?’
बड गम्भिर भऽकऽ रानी जबाब देली– ‘हमरा ओ कहने रहे घरमे असगरे छी, एकटा माय मात्र छथि, नमहर घर अछि .. अन्न किनऽनहि परैए । मुदा सब झूठ छै । ....... एक्कहूटा बात साँच नहि ।’
एते बजलाके बाद ओकरा आखिमेसँ नोर खसऽलगलै आ आवाज सेहो थरथराए लगलै । ओकर बातक बिना कोनो प्रतिक्रिया देनहि ओ पुछलाह –‘आब कि समस्या अछि ?’
ओ फेर कहली – ‘ओ कहैए हमरो होटलमे गीत गाबऽपरत .......... नहि त ओना पालऽ नहि सकत । नमहर शहरमे एसगर कमाकऽ पेट नहि भरैछैक कहाँदोन । .....हम कि करु ?’
एते बजला बाद ओ भोकासी पारिकऽ कानऽ लगलीह । अरुण बिना कोनो प्रतिकृयाके पुछैछथि– ‘ओ अपने कि करैए ?’
‘ओ अपने होटलमे डान्स करैए ।’
आँखिसँ खसल नोरके आँचरसँ पोछैत ओ अरुण दिश ताकऽ लागलीह मुदा हुनका सहजहि किछुनहि फुरैलनि तथापि ओ रानीके धैर्यता धारण करबाक अश्वासन दैत कहलनि –‘जे भेलै भऽ गेलै मुदा अहाँके बिना सोंच बिचार कएने ओना भागऽके नहि चाही । आब अहाँ कि चाहैछी, कहू ।’
‘हमर जीनगी बरवाद भऽगेल, ..... हम कतऽ जाउ, ..... फाँसी लगाकऽ मरियो नहि सकैछी ।’ हुनक नोरक गंगा बहिरहल छलनि कनिक देर चुप भऽ ओ फेर बजलीह– हम बहुते पैघ गलती कऽलेली, आब हम जीबियोकऽ कि करब । आ हमरासन रोगीके केओ नोकरनीमे सेहो नहि रखतै ....... हम कि करु ..... ?’ एते कहिकऽ ओ भोकासी पारिकऽ कान लगलीह ।
अरुणलग कोनो प्रकारक जबाब नहि छलनि तैयो ओ रानी दिश तकैत बजलाह –‘किछु नहि भेलैए, ..... अहाँ किछु दिन अप्पन माय–बाबुजीलग जाक रहु । आ, बितल समयके बिसरऽके कोशिस करु । आ, ओही लफंगासँ नहि डेराउ ।’
‘केना जाउ नैहर, माय–बाबुजीके कोन मूहँ देखबियनि ...... हमरा सहास नहि अछि ....... ओतहूसँ सेहो हम भागिएकऽ आएल रही । ....... आ अहाँसंगे भागऽसं पहिनहि ई सोचिलेने रही जे मरिजाएब मुदा माय–बाबुजी लग हारिकऽ नहि जाएब । ..... सच त ई छैक जे हमरा अहाँसँ सेहो क्षमा मागऽके छल .... किए त हमरा बड़ निक जकाँ बुझल अछि जे हमरा चलते अहाँके प्रतिष्ठापर पड़ल । ....... तैयो हम अहाँक समक्ष आबऽके सहास कैली । ...... माय बाबूजी त हमरासँ तहिए हाथ धो लेलखिन जहिया हम अहाँसंगे बियाह कएली । .... सहेलीसभ कहैत रहे जे जहिना सुनलखिन हमर बियाहक बात तखने केश कटालेलखिन आ कहलखिन– जो बेटीके नामके नौहकेश करालेली । ....... अहाँ सेहो हमरासँ मन मारिलेने होएब ।’ एते कहऽ धरि रानी मात्र हिचैक रहल छली सायद नोर सुखागेल छलैक ।
अरुण उदास भऽ कह लगलखिन– ‘हम कि करी... हमरा त अहाँके देखिकऽ आओर दुख लागि रहल अछि । बल्कि जा धरि अहाँके नहि देखने रही ता धरि मन शान्त छल, बिसरऽके प्रयास करैत छलीए ।’ किछु देर चुप्प भऽ ओ फेर कहलखिन – ‘अहाँके कि भेल अछि ? .... अहाँ हमरासँ कि चाहैछी ?.... अहाँके मुँह देखिकऽ हमरा डर लागिरहल अछि । दबाईबिरो सेहो नहिए करौने होएब ? ...... मुदा अहाँक एहन हालत देखिकऽ ओ कि कहैए..................’
अरुणक बात बिचेमे कटैत ओ सिसकैत बजलीह– ‘आब हमरा ईलाज कराबऽके नहि अछि । अहाँसँ भेटलाक बाद माय–बाबुजीसँ भेटवाक चाहना पुरा भऽगेल ।’ एते कहि ओ उठिकऽ केवार दिश आगु बढ़लीह ।
केवारलग पहुचते काल अरुण उठैत बैसऽलेल कहलखिन – ‘रानी, बैसु ने ।’ मुदा एते कहवासँ पहिने बिना किछु बजने ओ केवारसँ बाहर भऽगेल छलीह ।
बाहर अन्हार रहै । ‘आब ई नौ बजे कतऽ जाएब ? रुकु । .... हमहु अबैछी ... रुकु ।’ एते कहिते ओ जुत्ता पहिरऽलागल । आ जखन बाहर निकलल त रानी केम्हरो नजरि नहि परलनि । अन्हार सड़क पर ओ पूर्ब गेली वा पच्छिम देखऽमे नहि अबनि । ओ किछु आगु पाछु देखलखिन आ जखन भेट नहि भेलनि त फेर घरमे फिर्ता आबिगेलाह ।
किछु दिन बाद केओ कहलकनि जे रानी आत्महत्या कऽलेलीह । ई सुनिकऽ अरुणक पैरतरसँ जमिन निकलिगेलनि । शायद मुत्युसँ दाग धुवागेल होए मुदा किछु कऽसकैछलीह ।
डाक्टर- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
ठाँम–ठाँमके पुल टुटल । सड़क काटल । आ, गाछसभ काटिकऽ सड़केपर राखल होयवाक कारणसँ कोनो सवारी साधनक सुबिधा नहि रहैक । माय, करिब पन्द्र घन्टा पैदले चलिकऽ ओ ओहि गाम तक पहुँचलैथ । सभसँ पहिने त ओ रहऽके ब्यवस्था मिलौलैथ । एकटा कोठरीक ब्यवस्था भेलैक, सायद घरबला पुरे परिवार किछुए दिन पहिने मरिगेल छलैक । घरो एहन जाहिके भितरसँ दिनमे आकास आ रातिमे तारा निकसँ देखाजाइक ।
ओना त डाक्टर साहेब अपना हाथे कहियो भानस बनौने नहि रहथि माय हुनका एकटा भानस बनौनिहारक आवश्यक्ता रहैन । अशोरा पर बैसिकऽ किछु सोंचिते रहैथ कि एकटा भलादमी ओतऽदने जाइत नजड़ि परलैन । ओ, हुनका बजाकऽ पुछलखिन–“भाइ साहेब एतऽ एकटा आदमीके ब्यवस्था नहि भऽसकैय ? जे भानस बनादे आ बरतनि साफ कऽलेअ ।” अनचिन्हार आदमीके देखिकऽ ओ पुछलखिन “पहिने अहाँ ई कहुँ जे कहाँसँ अएलहुँ आ अहाँ के छी ?” हुनको पुछब उचित छलनि किया त ओ घटना अखन पुरान नहि भेल अछि । डाक्टर साहेब अपन पुरा परिचय कहलखिन तखन जाकऽ ओ सेहो अपन परिचय दैत कहलखिन–“हमर नाम रतन अछि, आ अहाँ एतऽ जे हमरा सभकलेल अएलहुँ ताहिकेलेल धन्यवाद । रहि गेल बात अहाँक लेल आदमी त हम देखैछी । ” एते कहिकऽ ओ ओतऽसँ बिदा भऽगेलथि ।
करिब एक घण्टाक बाद ओ एकटा बाह्–तेह् बर्षक बचियाके लेनेअएलखिन । आ डाक्टर साहेबके बचियाके देखाकऽ कहलखिन–“हे ई टुगर छै, ईहे करिब एक महिना पहिने एकर माय आ बाप दूनु एकहि दिनक आगा–पाछा मरिगेलै ।” बचियाके देखिकऽ ओ सेहो चिन्तित भऽगेलखिन आ, ओकरा अपना लग राखिलेलखिन । काज सेहो बेशी करऽके नहि रहै जे कनिको दिक्कत होइतै ।
दोसर दिन डाक्टर साहेब अपन औजार लऽकऽ गाममे रोगक परिक्षण करऽलेल बिदा भेलैथ । हुनक नजड़ि जेमहर पड़ैन, एकहिटा चिज सगरो देखऽमे अबैन – गामक सभक कपड़ा मैल, अधिक्तर बच्चा सभक मुहँसँ एकहिटा बात–“गे माय भुख लागल अछि । ” कतौ सुनऽमे अबै–“दादा हो दादा मरिगेली । ” आदि ।
डाक्टर साहेब बिमारीके जाँचऽगेल रहथि भुख सन पैघ बिमारीक ईलाज हुनकालग नहि रहैन –जे गामक प्रमुख समस्या रहै । जतऽ डाक्टरसाहेब ठाह् भऽजाथिन त लगै जेना कौआ सभक बिचमे बकुला । गाम भरिमे एकहिटा हुनके कपड़ा साफ छलनि, मुदा कते दिन ? एकटा बात त निश्चित छलै जे ई गामक एहन दशा गरिबीक कारणे भेल छल । ताँहूमे किछुलोक ओकर गरिबीक नाजाएज फाएदा लेबऽचाहै ।
गाममे घर–घर जाकऽ ईलाज करऽके क्रममे एकबेर जखन ओ बाटपर चलैत रहैथ त अबाज अएलै–“माय गे मरिगेली .....। ” बड जोरसँ ओ अबाज जे अएले सें सोचियोकऽ डर लागिसकैय । डाक्टर अबाज आएल दिश दौड़ला । घरमे पैसिकऽ देखलखिन त एकटा बाह्–तेह् कर्षक बच्चा पेट पकरिकऽ कनैत रहै । ओ एमहर–ओमहर सगरो तकलखिन मुदा शियान ओतऽ केओ नहि रहै । ताबते मधिम–मधिम खोकीके अबाज सुनाय पड़लै । ई सुनिकऽ ओ अबाज लगौलखिन “घरमे के छी ?” केश बगराके खोता सन रखने एकटा बुढ़िया अएलै त डाक्टर साहेब एकटा गिलासमे पानि लाबिदेबऽलेल कहलखिन । बुढ़िया पानि लाबिकऽ देलकै । एकटा गोटी ओहि बच्चाके ओहि पानि संगे खुवेलखिन । पाँच–सात मिनटके बाद ओ ठिक भऽगेलै । फेर ओतऽसँ ओ बिदा भेला । साँझमे ओ जखन अपन घर पहुँचलखिन त ओ टुगरी बड़ सुनरि भानस बनाकऽ धएने रहै । ओ हाथ–पएर धोकऽ भोजन करऽ लेल बैसिगेलखिन । ओ चिन्तिते अवस्थामे भोजन कऽकऽ आराम करऽ गेलखिन । हुनका निने नहि परैन । दिनमे जाँच कएल बिमारीसभ हुनक नजरिके सामने घुमैत रहैन । आ, एकहि दिनमे एकहि परिवारक चारि–चारिगोटेके मृत्यु । ओ एहि बिमारीसभक बारेके सोंचऽलगलखिन ।
बिमारी किछु नव किशिमक भेटल रहैक । किछु जल्दिसँ करऽके अवस्था नहि रहैक किया त ओहि गामसँ शहर धरि पहुँचऽलेल कमसँ कम पन्द्र घण्टा चलऽपरै । ओतऽ नहि त प्याथोलोजिक समानरहै जे किछु जाँच कएल जएतै । बिमारीसभक बारेमे सोचैत–सोचैत, ओतै बोरा पर सुतल ओहि बचियासँ पुछलखिन–“बौआ, नाम कि छो तोहर ? ” ओकरो निन त नहिए पड़ैत रहै, ते ओ उठिकऽ बैसिगेली आ जबाब देली –“जी हमर नाम सेहन्ता अछि । ” ओ फेर पुछलखिन–“ तोहर माय–बाबुके कि होइत छलौ ? ” सेहन्ता हुनका पएरलग जाकऽ बैसिगेली आ गम्भिर भऽ कहऽलगली–“ किछो नहि ......, करिब डेढ़ दू महिना पहिने बहुते लोक सभ बन्दुक लऽकऽ अएलै आ सभके घरे–घर लोकसभके कहै काज करऽ जाएला ।.....जे नइ जाइ ओकरा धमकी दै जे नहि जएतै ओ घिसरी काटिकऽ मरतै । .......बहुतो लोक त ओकरा सभसंगे चलिगेलै मुदा किछु लोक जाएके लेल तैयार नहि भेलै । सभगोटेके चलिगेलाक बाद एकटा आदमी एकटा बम फेकलकै जाहिके आबाजसँ बहुते घर टुटिगेलै आ छ–सात दिन धरि अन्हारे रहै । एतऽके लोक सभके श्वासलेबऽमे सेहो दिक्कत होइ । एतऽ एकहिटा ईनार छै जतऽके पानि सभ पिबैछै ओहूमे किछु खसादेलकै । .........एतऽ पानिके लेल आओर ब्यवस्था नहि छैक । ” एते बात कहिकऽ ओ बच्चा लगलै डाक्टर बाबुके पएर जाँतऽ ।
पएर जाँतब देखकऽ ओ सेहो उठिकऽ बैसिगेलाह आ कहलखिन “ जो तहूँ सुतऽ । ” ओ बच्चा फेर ओहि बोरापर सुतऽ चलिगेली । भोरमे सबेरे उठिकऽ एकटा आदमीके चिठ्ठी दऽकऽ स्वास्थ मन्त्रालय पठौलखिन । आ संगहि किछु दबाई आ गैससभ सेहो पठादेबऽलेल ओहि चिठ्ठीमे लिखलनि । ओकरा बिदा कएला बाद हुनका जे किछु टोल छुटिगेल छलनि ओमहर बिदा भेला ।
साँझमे जखन ओ सूचि उल्टाकऽ देखलनि त किछु बच्चा मात्र एहन छलै जेकरा कोनो प्रकारक रोग नहि लागल छलैक । आ, एकटा बात निश्चित रहै
जे रोगीसभ मरबेटा करतै आओर कोनो उपाय नहि रहै । रोगीक श्वाससँ फैलऽवाला रोगक नियंत्रन बड़ कठिन माय ओकरा सभके मरनाइए उचित बुझि ओ अपन झोरासँ बिषक सूइ निकाललैथ । आ, पहिने तैयार कएल सूचिके देखिकऽ फेर एकटा नव सूचि तैयार कएलनि जे केकरा –केकरा बिषक सुई देबाक अछि ।
प्रातः फेर ओ आओर दिन जकाँ बिमारीक देखभाल करऽ बिदाभेलखिन । मुदा ओइ दिन हुनका छटपटाति मुर्दाके मुक्ति देबऽके छलनि । आ, साँझ धरि ओ करिब अस्सिगोटेके मुक्ति दऽदेलखिन ।
साँझखन जखन ओ निबासस्थान फिर्ता अएलथि त सेहन्ता भोजन बनाकऽ हुनके बाट तकैत छली । ओ झटसँ झोरा धऽकऽ हाथ पएर धोकऽ भोजन करऽलेल बैसिगेलखिन । सेहन्ता भोजन लाबिकऽ देलकै मुदा भोजन करऽसँ पहिने हुनका उल्टी होबऽलगलनि । पेट–माथ सभमे दर्द सेहो होबऽलगलनि । ओना हुनको ओहे बिमारीक लक्षण छलनि मुदा ओ अपनेसँ बिषक सूइ त नहि न लऽसकैछलथि ।
राति भरि दर्दसँ छटपटाति, बोकरैत । मात्र तिन पहरके राति कतेको बर्ष जका अनुभव होइ । भोरमे करिब नौ बजे बहुते डाक्टर, नर्स आ पुलिससभ सेहो अएलै । डाक्टर आ नर्ससभ पहिने डाक्टर मुरली प्रसाद शर्माके देखभाल कएलखिन । हुनका निशाक सूइ दऽकऽ मात्र आराम भेटलनि ।
दोसर दिश पुलिससभके गाममे ई समाचार भेटलनि जे डाक्टरसाहेब काल्हिखन जिनका–जिनका सूइ देलखिन ओ सभ मरिगेलै । माय पुलिससभ हुनकासँ पुछऽअएलै कि एते लोक एकहिबेरमे केना मरिगेलै । ओ निसंकोच अपन समस्या कहिकऽ कहलखिन–“............माय हम काल्हिखन अस्सिगोटेके बिषक सूइ दऽदेलीऐ । ”
एमहर सेहन्ता डाक्टरबाबुके रातिभरि सेवामे लागलछली । आ, भोरमे जखन ओ पुरा ओछायनपरके बोकरल साफ कऽकऽ बैसली तखने एकटा पुलिस डाक्टरबाबुके कहलकनि–“हम अहाँके हपन हुकुमतमे लैछी । ” ई बात सुनिकऽ ओ जबाब देलखिन–“जँ अहाँके उचित लगैय त हम तैयारछी । ओ फेर कहलखिन – “अपन आवलोकन सभगोटेके समझादैछी आ एकटा बात आओर किछु बच्चा छै जेकरा कोनो रोग नहिछैक ते ओकरा सभके सेहो लऽचलऽके ब्यवस्था सेहो करु । ” सूचिअनुसार रोग नहि लागल बच्चासभके लेबऽ किछु पुलिससभ गेल । आ एमहर डाक्टर बाबु लगलखिन सभके अपन आबलोकन सम्झाबऽ । ओमहरसँ जखन ओसभ निरोग बच्चासभके लऽकऽ आबिगेलखिन तखन धरि हिनको काज समाप्त भऽगेल छलनि । तखन ओ कहलखिन –“आब चलि सकैछी । ”
दशगोटे पुलिस, बच्चासभ आ डाक्टरसाहेब ओतऽसँ बिदा भेलथि । थाकल बच्चासभके पुलिससभसेहो कोरामे उठाकऽ शहर तक पहुचौलैथ । रातिके दश बाजिगेल छलै माय बच्चासभ संगे डाक्टरबाबुके सेहो थानामे राखऽके ब्यब्स्था कएलगेलै । डाक्टरबाबु त गल्ति बड नमहर कएनेछलाह किया त जियाबऽ लेल पठाओलगेल छलनि मुदा ओ ..........., माय हुनका भोरमे अदालत मे उपस्थित कराओल गेलनि ।
अदालतमे हुनकासँ पुछलगेलनि –“डा. मुरली प्रसाद शर्मा, अहाँ एना किए कैलीऐ ? ” ओे किछु देर चुप भेलखिन तखन फेर जबाब दैत कहलखिन–“आइ तक हमर एस.एल.सी.के रेकर्ड केओ नहि तोरऽसकल अछि । तइयो बाबुजीके बड मेहनति करऽ परलनि हमर रुशमे एम.बि.बि.एसके लेल । आइ.एससी सँ एम.डी धरि टौप कऽकऽ पि.एचडी.मे स्वर्णपदकसँ विश्वबिद्यालय सम्मान कएने रहे । बहुतो अस्पतालसँ प्रस्ताव सेहो आएल मुदा हमर सोंच ई छल जे हमरा सनके डाक्टरके हमरा देशमे आवश्यक्ता अछि । सायद माय हमरा अबिते ओतऽ पठादेलगेल जतऽ पन्द्र घण्टा चलिकऽ पहुचऽपरैछैक । ......हम ओतऽ गेलहुँ ईलाज करऽ, ठिक छै , ईलाज कऽदेबै, मुदा जतऽ खाएके लेल रोटीयो नहि छैक ओतऽ दबाइ कतऽसँ अएतै । ......सरकारके सुरक्षामे खर्च करऽसँ फुरसते नहिछै आ, दबाइ त दूर जाउक ......... ओकरासभके एहन रोग छै जे एकटासँ दोसरके आ दोसरसँ तेसरके होइतजएतै । आ, धिरे–धिरे ओइ श्म्सानमे के बाँकि रहत......? ”
एते सुनिलेलाक बाद, न्यायधिस डाक्टरके प्रमाण–पत्र रद्द कऽदेबऽके फैसला सुनौलखिन । न्यायधिसक फैसला सुनिते हुनका मुँहसँ गाउज निकलऽलगलनि । ओ बेहोस भऽ खसिपरला । जाबे लोक दौड़े– दौड़े ताबे ओ ई देश नहि दुनियासँ बिदा भऽगेलाह ।
सिपाही- सन्तोष मिश्र,काठमाण्डू
ई सुनिकऽ सन्तोष हसऽ लगलै आ कहलकै “एह, माय तहुँ कि नहि .......।”
एते बजीते जखन सन्तोष अपन मायके मूहँपर तकलकै त आँखिमे नोर नजड़ि परलै ताहि बातपर ध्यान बिना देनहि कहलकै– “अच्छा, माय ..... चल हमरा बड जोरसँ भुख लागिगेल अछि ।”
माय भितर जाकऽ जाबे नास्ता लबैक ताबे सन्तोष कलपर जाकऽ हाथपएर धोकऽ बैस गेल रहै । माय चुरा आ दही लऽकऽ सन्तोषके देलखिन आ ओ खायलगलै । माय सेहो सन्तोषक कातमे बैसिकऽ कहलीह “हो, तहुँ निके समयपर अएलेह..... काल्हिखन सुकराति छै...........तो एतऽ सँ परसु भोजन कैलाक वाद बहिन गाम जाकऽ नौत लेबऽ चलिजो ।” बहिनगाम जएबाक नामपर सन्तोष खुस होइय आ सोचऽ लगैय अपन ओझाक पिसियौत बहिनके बारेमे जे दुरागमनमे भेटल रहैक । ओना दुनुके टोका चाली त भेल नहिए रहैक मुदा ताकाताकी खुब भेल रहैक । ओ रहबो करै एते सून्दर जे किनका नहि एकबेर नजड़ि पड़िजाई त बेर–बेर देखऽ चाहितै ।
सुकराति बड़ निकजका मनौलनि । आ प्रातः भोजन कऽकऽ सन्तोष बहिनगाम जएवाकलेल तैयार भेला । माय एकटा चंगेरीमे किछु खजुरिया, किछु पिरुकिया, आर कि दोन कहाँ दोन धकऽ एक चंगेरी पुरा देलनि । चंगेरी उठाबके चलते सन्तोष कहैछ “एहँ माय, कि धऽ देलही.........हम ओम्हरे मिठाई ललितिऐ ।”
ई छिछ कटनाई देखिक माय कहलीह– “हमरा ई सोचिकऽ दुःख लागल ........जे सबहे सिपाहि छिछकट किया भऽजाइछ ।”
सिपाहिक बारेमे एहन वात सुनिते सन्तोष जल्दिसँ हाथमे चंगेरी उठबैत चलिदैछथि । बाटमे सैनिक बसके चेक (तलाश) करैतरहै छैक । ताही तलाशक क्रममे सन्तोषक जेबसँ एकटा बन्दुकक गोलीके खोका भेटैछनि । सन्तोषके बसमेसँ उतारिक सैनिक सब पुछताछ करऽ लेल लजाइछनि । ओमहर बसक खलासी हुनक समान निचा उतारिकऽ चलिजाइ छैक । जखन सन्तोषसँ काजक बारेमे पुछलजाइ छनि तखन हुनका अपना बारेमे कहवाक मौका भेटैछनि आ कहैछथि “हम एहि देशक सिपाहिमे असई छि........आ ई खोका त हालेमे आतंकवादीसभसँ द्वन्द भेलछल ताही वेरके छै ।” एते वात कहीकऽ ओ अपन परिचय–पत्र देखबैछथि । परिचय–पत्र देखला बाद सैनिक सब हुनका छोडैछनि । बसक समय सेहो समाप्त भऽगेल छलैक । ताहीसँ हुनका चंगेरी माथपर धऽकऽ करिब तिन कोष पएरे चलिक जाए परैछनि । अन्हरिया राति, कच्ची सडक भऽसन्तोष रातिकेँ करिब दश बजे वहिनगाम पहुँचैछथि ।
तखन धरि घरक सब लोक भोजन कऽकऽ आराममे चलि गेलरहै । मात्र ओकर बहिन आंगनमे बरतन मजैत रहै तखने ओ केवार ढकढऽकौलनि ई सुनिकऽ ओ केवार खोलऽ गेलिह । सन्तोषके देखिकऽ बहिन बड खुसी भेलीह किए त हुनको सुनऽ पड़ल रहैछनि “एक साल होबऽ लगलै आ नैहर सँ केओ नहि अएलै । “ओ पुनः भोजन बनाबऽके सुरसार जँ करऽ लगलीह त ओ बहिनके हरान कराबऽ नहि चाहलकै आ कहलकै –‘भोजन कऽ लेने छी मात्र सुतऽके ब्यवस्था कऽदे ।’ हुनका आरामक ब्यवस्था भेलनि ओ आराम करऽ गेलाह ।
भोरमे सन्तोष प्रातः काल उठिक नित्य क्रियामे चलिगेल । नित्य क्रियाक वाद जखन सन्तोष स्नान करऽलेल बाल्टीन लऽकऽ दलानबाला कलपर पहुँचैछथि त नजड़ि पड़लनि हुनक ओझाक पिसियौत बहिनपर जे कल पर कपडा खिचैत छलिह । झुलि–झुलिकऽ कपडा खिचऽके क्रममे हुनक ओढनी निचा खसिपड़ल छलनि जाहिके कारणसँ हुनक गोर आ शिकार करला तानल बन्दुक सनक स्तनपर सन्तोषक नजड़ि पड़िगेलै । ओकर नजरि ओही सुन्दर स्तनपरसँ हटिते नहि रहैक । आ ओ कन्या विना केम्हरो तकैत मात्र अपन कपडा खिचऽ पर ध्यान देनेछलिह । कपडा धोब केँ क्रममे जखन ओ कन्या दोसर कपडा बाल्टीनमेसँ निकालऽलगलीह त सन्तोष पर नजड़ि पड़लनि । हुनका देखिते ओ जल्दीसँ अपन ओढनी सरियबैत कहलिह–“पाहुन, .....नहाय अएलीए ?” प्रश्न सुनिते सन्तोष कन्याक मुहपर तकैत घबराएल जका कहैछथि “....एह, हँ, हँ ।”
“ठिक छै पहिने अहाँ नहालिअ तखन हम कपडा खिचब ।” एते कहिक ओ आँगनदिश चलिगेलीह । सन्तोष नहेलाक वाद जखन आँगन पहुचैय त ओ कन्या सन्तोषक बहिन लग बैसल रहै । सन्तोषकेँ ओतऽ देखिकऽ ओ कन्या पुनः कपडा धोब चलिगेलीह । कन्याक गेलाबाद सन्तोष अपन बहिनसँ पुछलकै “ आँइ गे बहिन ..........ई के छथिन ?” बहिन हँसिकऽ जबाब दैछ “ ई तोरे ओझाक पिसियौत बहिन....... कञ्चन ।” नाम सुनिक सन्तोष बजैछथि “बाह ! एकर मुहसँ सुन्दर त .....एकर नाम छैक ।”
बहिन हसऽ लगैय । सन्तोष पुनः अपना बहिनके आगंनमे देखाक कहैए “जा, अखन धरि आगंनमे अरिपन सेहो नहि देलही ।” बहिन कने खेखैनकऽ कहलिह “कनिके देर रुकिजोनऽ .........कि ?”
“हेतै !” कहिकऽ सन्तोष अशोरापर धएल कुर्शीपर बैसिजाइछथि ।
कनिए समयक वाद कञ्चन पुनः आगंनमे अबैछथि हाथमे भिजल कपडा सँ भरल बाल्टीन आ दोसर हाथमे साबुन रहैछनि । सन्तोष पुनः कञ्चनपर ताकऽ लागैछथि । मुदा कञ्चन के अपन काजसँ मतलब रहैछैक । ओ असगनि पर कपडा पसारिरहल छथि । सन्तोष विचारैत रहैछथि जे कखन कञ्जनसँ परिचय करि । ताबते एकटा बुढिया कञ्चन के अढादैछनि आगंनमे अरिपन धरऽलेल । ओ अरिपन धर लगलीह । ओना त कञ्चन सेहो सन्तोष पर तकित रहैए मुदा एहि किसिमसँ जे केओ बुझ नहि सकै ।
रातिमे भोजन करऽला कञ्चन सन्तोषके बजाबऽ दलानपर पहुचैछथि । सन्तोष दलानपर लालटेमक टिमटिमाइत इजोतमे उपन्यास पढैतरहे मुदा पएरकें पायलक आवाज सुनिते सन्तोष उपन्यास छोड़िक बाहर ताकऽलागल । आ,
कञ्चनके देखिते ओ पूनः मुरी गोतिकऽ पढऽलागल । कञ्चन नजदिक आविक कहैछथि “पाहुन............. चलु भोजन करऽ लेल ।”
उपन्यासपर तकिते सन्तोष कहैय “कनिए देर रुकुने......., कनिके बाँकी छै ।”
कञ्चन ई सुनिकऽ सन्तोषक दहिनाकात बैसजाइय । कञ्चनके वैसैत देखिकऽ ओ मोनेमोन बड खुशी होइय आ सोचैय कि आबो जरुरे बात करबाक मौका भेटत ।
कञ्चन पुनः पुछैय “अच्छा, पाहुन ........कोन उपन्यास अछि ?”
“ई सुस्मीता उपन्यास कें मैथिली अनुवाद छै ।”
ओ पुनः पुछैछथि “आहाँक नाम कि अछि,.... पाहुन ?”
“हमर नाम आहाँके बुझल होएत ।”
“नहि, कहुने ।”
“हमर नाम सन्तोष कुमार झा अछि ।”
“आ शिक्षा ?”
“छोरु, शिक्षा बड कम अछि ।”
“कहुने”
“हम स्नातक प्रथम वर्षमें नामांकन कराक छोड़िदेलहु ।”
कञ्चन फटाफट प्रश्न पुछनेजारहल अछि मुदा सन्तोष प्रश्न करऽबाक हिम्मत जुटाक व्यंग करैत पुछैछथि “ओना .........आहाँक नाम कि अछि, कञ्चनजी ?”
“हमर नाम............।” एतबे कहिते कञ्चन चुप भऽ जाइछ ।
आ दुनुगोटे हँसऽ लगैय । तखन हँसिते दूनु गोटे आंगन दिश प्रस्थान
करैत अछि । सन्तोष भोजन करऽ ला बैसैय । ओत, कञ्चन, ओकर माय आ सन्तोषक दिदी सेहो बैसल रहैछथि । कञ्चनकेँ माय बजैछथि “कि करबै पाहुन, ...............बहिनोइ नोकरी परसँ आयल रहितनि त संगे बैसतनि मुदा...।”
सन्तोष कोनो प्रकारक प्रतिक्रिया नहि व्यक्त करैछथि आ ओ चुप चाप मुरी निहुराकऽ भोजन करैतरहै छै । ताबते बुढ़ी पुनः पुछैछनि “पाहुन, आहाँक विवाह त.......अखन नहि भेल होएत ?”
एते सुनिते सन्तोषके वाजसँ पहिनही हुनक बहिन कहैछथि “नहि त ...... मुदा आब त कर परतै ....... गाँमपर माय असगर भ जाइछथि ।”
सन्तोष भोजन कऽकऽ आराम कर दलानपर चलिजाइछथि । रातिमे सन्तोषक बारेमे कञ्चनक माय सब किछु पुछैछथी मुदा ओ ई त पुछबेनहि करैछथि कि सन्तोष कोन काज करैछथि । सब किछु पुछलाक वाद बड गम्भीरता पूर्वक ओ सन्तोषक बहीनसँ कहैछथि “ए कनिया.......जौ अाँहा पाहुन सँ कञ्चनियाकेँ विवाह करबा दितहु त बड गुन होएत । जे जेना तिलक गनऽ परतैक हम त गनबेकरबैक ।” एमहर कञ्चन अपन विवाहक बारेमे सुनिकऽ खुशी होइय आ रातिमे सन्तोषके बारेमे सपना से हो देखलीह ।
भोरमे सन्तोष अपन गाम जाएलेल तैयार होइए मुदा हुनक बहिन एकदिन रहऽला आदर करैछनि ।” गामपर छठि सेहो अछि ।” कहिकऽ वातकेँ टारैत सन्तोष अपन झोड़ा लऽकऽ निकलैय । कञ्चन हुनका अरियातऽ लेल हातसँ झोड़ा लऽकऽ आगुबढैय । दलान सँ कनिक आगु गेलाक वाद कञ्चन गम्भिरता पूर्वक सन्तोषके कहैय –“आब अपना दुनुकेँ कहिया भेट होएत से ठेकान नहि अछि मुदा माय कहै छलीह जे छठिके परात त भदवा रहैछैक आ तकर बाद बाबुजी अहाँक गाम पहुँचता से ध्यान देबै ?”ऐते कहलाक बाद जे ओकरा अाँखि जे कहैत रहैछै से ओकर मुह कहि नहि पबै ।
माय, ई सुनिक सन्तोष कहैय “देखु ! भगवान की कराबऽ चाहैय । तैयो ठिके छै हम प्रतिक्षा करबनि ।”
कनि आगु चलिक कञ्चन रुकलीह आ कहलीह– “आब आँहा जाउ, .............हम एतै सँ विदा होइछि ।” सन्तोष कनेक मुसैक कञ्चनके हातसँ झोरा लकऽ गम्भीर भऽ जाइछैक आ दुनु एक आपसमे आगु बढैत पाछु तकैत अपन–अपन दिशातर्फ चलिदैछ ।
कञ्चनकेँ माय जखन ओकर बाबुजीलग वियाहक चर्चा करैछथि त बाबुजी सेहो सहमति जनबै छथि । ओना हुनको इच्छा रहैछनि जे बेटीक वियाह नेपालमे करी । ओ पुरा तैयारी भऽ असगरे नेपालक सर्लाही जिल्लाक खैरवा गाम पहुँचैछथि ।
बाटमे एक आदमी माथपर धानक बोझा लऽकऽ अवैत रहैछथि । ओ आदमी आर केओ नहि सन्तोष अपने रहैए ओ सन्तोषके रोकिकऽ पुछैछथि “हे यौ भाइसाहेब .....सन्तोष झाके घर कोन थिकै ?”
सन्तोष झा हुनकापर ताकिक कहैछथि “चललजाए हमरे संग,......कनिके आगा छैक ।” दुनु गोटा चुप्पेचापे कनिक आगुतक चलैय आ पुनः कञ्चनके बाबुजी पुछैछथि “अच्छा, एकटा चिज कहल जाए .......हुनका कतेक जमिन–जत्था हैतनि ?”
“इहे करिब ३ विग्घा जते छैक ।”
कने सोचल जका करैत कहैत छथि “ऐ ... आ सन्तोष कोन काज करैय ।”
“ओ नेपालक पुलिसमें असइ छथि ।”
ओना त ओ असइके अर्थ नहि बुझलनि मुदा पुलिसक अर्थ बुझिगेलाह । आ पुलिसक नाम सुनिते ओ रुकिक कहलनि “भाई साहेब, अपने चललजाय ........हम अबैत छी ।”
माथपर धानक बोझा धएने सन्तोष इहो नहि कहऽ सकल कि सन्तोष ओहे छथि । कञ्चनके बाबूजी ओतै सँ अपन घर फिर्ता भऽ जाइछथि । गाम पहुचिकऽ निराश भ बैसिजाइछथि । कञ्चन बाबुजीके देखिक काकाक अगनासँ माय के बजाबऽ गेलीह । माय जल्दिसँ अबिकऽ कञ्चनके बाबुजी सँ पुछैछथि “कि भेल वात पटल कि नहि ।”
ई सुनिते कञ्चनके बाबुजी आवेशमे आबिजाइछथि आ कहैछथि “जखन भोरे–भोर रेडियो खोलैछि त समाचार मे नेपालके वारेमे सब दिन एक्कहिटा वात सुनैछि फल्ना ठाम माओवादी सिपाहिके द्वन्द भेलैक । फल्ना ठाम एते सिपाहि मरिगेलैक । फल्ना ठामक चौकीमे बम फेक देलकै । मतलब अखनकेँ समयमे सिपाहिके माय कखन निपुत्र भऽ जाएत सिपाहिक कनिया कखन विधवा भजाएत कोनो ठेकान नहि ।”
ओ पित्त सँ थुक घोट लगलनि, आँखिमे नोर भरि जाइछनि आ मन्द स्वरमे पुनः कहलनि –“ए, कञ्चनके माय ! एतेक सम्पत्ति अछि, एते सुन्दर बेटी, कोनो हम अपन बेटी सँ स्नेह नहि करैछी हम बेटी के निक ठाम वियाह करब मुदा नेपालक सिपाहि सँ नहि करब ।”
बाबुजीक एहन बात सुनिकऽ कञ्चन दू–तिन दिन तक खान–पिअन त्यागिक बैसिगेलीह । माय ई वात हुनक बाबुजीकेँ सुनौलीह त ओ बेटीके कतबो सम्झझौलनि मुदा बेटी त वात बुझ्बेनहि करै । ओ मात्र एते कहैछथि “प्रित त किछ नहि देखैछैक ।” ओ बड जीद करऽ लगलीह त हुनक बाबूजी पुनः सन्तोषक घर जाएवाक लेल तैयार होइछथि । ओ पुनः सन्तोषक गाम पहुँचलनि । ओ जखन सन्तोषक दलान पर पहचैछथि त सन्तोष खह् लऽकऽ वैललग जाइत रहथि । कञ्चनके बाबुजी हुनका कहलनि– “सुनलजाय ।”
सन्तोष हाथमे पोआर लेनहि रुकिकऽ हुनकापर ताकिकऽ कहैछथि “जी कहलजाय, ...हम कि सेवा कऽ सकैछि ?”
“अपने सन्तोषजी, छिए कि ?”
“जी ! मुदा अपने ?”
“हमर घर हाटी, हम कञ्चनके.......बाबुजी ।”
सन्तोष खह् आतै छोड़िकऽ हुनक नजदिक अबैछथि आ जल्दी सँ पैर छुकऽ प्रणाम करैत हात पकरिकऽ भितर बैसाबऽ लजाइछथि । सन्तोष आँगन जाकऽ पाहुनके बारेमे अपन माय के कहैय । माय जलपान आदी बनाबमे लागिजाइछथि । माय पाहुनके लेल जखन जलपान लऽकऽ अबैछथि त जलपान खाइत ओ सन्तोषक मायके सुनाकऽ कहैछथि– “हम त सन्तोषक घटक बनिकऽ अएलहु ।”
ई वात सुनिते सन्तोषक मुरी निचा निहुरि जाइछनि आ ओ भितरे भितर एते खुस भऽ जाइछथि जैके केओ नापि नहि सकैय आ नहि त ओइके केओ लेखक लिखऽ सकैय ओ पुनः कहलाह –
“अपने सब जे किछ कहब हम दऽ देव मुदा एकटा आग्रह जे सन्तोषजी के सिपाहि क नोकरी छोड़ऽ पड़तनि बरु ओ गाममे बैसिक व्यापार आदि करौथ जे जेना करऽपरतै हम कऽ देबनि ।”
नोकरी छोड़ऽ के नाम सुनिते सन्तोष सोच लागल– “वाप रे ! जौ एहने सब व्यक्ति भऽ जाइ त देशके कि हालत हेतैक.................. कि हालत हेतै ?”
Tuesday, November 04, 2008
जखन कनिञा भेलखिन बिमार - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू
हँ मैथिलके मात्र कि कहू, एतऽ सब ऐरे–गैरेक बियाह होइते छैक । चाहे ओकर मुँह थुराएल अल्हुवा सन होइक चाहें शिताएल नढ़ियासन । खैर, बियाह त भऽ जाइ छनि मुदा किछु बातक लेल जिनगि भरि सेहन्ता लागले रहि जाइ छनि । मोनमे बेर–बेर होइत रहै छनि –
‘हमरो एहन होइत....’
मुदा कि ? भाग्य अप्पन–अप्पन । ठिक ओहिना, हमरो बियाहक एते बर्ष बित गेल । मुदा .......। संगीसभ भेट हुए त सब अप्पन–अप्पन कनिञाक बिमार होबऽ बला खबरि बैसख्खा घेरा जकाँ मूँह बनाकऽ सुनाबऽ लागै । हमहुँ सेहो बैसख्खा सजिमन सन थुथुर बनिकऽ सुनऽ लागी । कतबो धाहसँ सिद्ध होबऽ के बाते नहि । किए त हमर कनिञा कहियो बिमार पड़बे नहि करथिन्ह । ओ त अपने पहलवान, पुलिसमे असइ रहथिन्ह । संगीसबहक बात सुनिकऽ एकहि बातक सेहन्ता लागए आ मने मने एकहि बात कही-
"रुक ! भगवान एक दिन हमरो दिन सुदिन करथिन्ह , हमरो कनिञा बिमार परथिन्ह ।"
आ, एक दिन भगवान हमर मनक बात सुनि लेलखिन । जखन हम अफिससँ घर अएलहुँ त जुत्ता खोलिते समय मे मधुर–मधुर आवाज आएल –
"माइ गे माइ ....... बाबुहो बाबु’
के मधुर अवाज सुनिकऽ हमर मोन गदगद भऽगेल आ, हम खुसी भऽ जल्दीसँ घरमे पैसलहुँ । आ, हुनकासँ पुछलियनि –
"कि मोन खराब भऽगेल ।"
कुहरैत उठली आ कहली-
"मोन खराब होए दुसमनके, हमरा त पिठमे कि नहि कि भऽ गेल से दुखाइए, यौ ।"
ई बात सुनिते हमरा लागल जेना हमरा लौटरी परि गेल । मन त खुसीसँ गदगद भऽगेल। हमहूँ कलाकार, कला प्रस्तुत कऽ कऽ ई जरुर अनुभव करा देलियनि जे हम दुःखी भऽ गेली । आ, दुःखी मुद्रामे कहलियनि –
"कोनो निक डाक्टरसँ जचाँ लेव त......?"
ओ कुहरैत हमरा मुहँ पर ताकि बजलिह –
"डाक्टरके घरेमे बजा लेब त नहि होएत ?"
घरमे त डाक्टरके बजालेब ..... ठिके छैक, एकटा डाक्टरके नंम्बर त डायरीमे अछि हुनके बजा लै छियनि । फोन डाएल कएल मुदा फोनक लाइन त कटल छलैक । एकटा डाक्टरक लाइन कटल देखकऽ किछु नहि फुराएल । हम चुप्पेचाप किछु देर धरि ओतै बैसल रहि गेलहुँ ओ हमरा बैसल देखकऽ कने झसकिकऽ कहली–
"सुनै नै छी, जल्दी जाउ न, ............नहि त हम मरि जाएब ।"
ई सुनिकऽ हम आओर हर्षित भऽ गेलहुँ, मुदा कि करु ओहन शुभ दिन अप्पन भागमे कहाँ लिखल छैक ? हम त खुसी भऽकऽ सोचऽ लगलहुँ जे बात किछु आओर रोचक भऽ जएतै जखन हम अप्पन संगी सभके ई खुसीक खबरि सुनएबै । ताबते जेना केओ अनचेकेमे लुत्ती सटा देए तेहने आवाज आएल –
"कथि मुँह तकै छी......जलदीसँ जाउने आ सप्तरीवाला डा. रोबिन मिश्रके टिचिङ्गसँ बजौने आउ ।"
हम कहलियनि –
"हँ, हँ हम तुरत्त गेली आ अएली ।" कहऽ लेल त एते कहि देलियनि ।
बाबूजी कहै छलखिन–
"बचने किए दरिद्रता ।"
मुदा मोन तऽ गदगदाकऽ फटकार लगौलक–
"डाक्टर त बादमे पहिने संगी सबके खुसीक खबरि त सुना दिऐ ।"
आंगनसँ जखन बाट पर अएलहूँ त सोंचऽ लगलहुँ –
"केम्हर जाउ ... एम्हर कि ओम्हर ....."
हम त बड़ मुसकिलमे पड़ि गेलहुँ जे आखिर केम्हर जाउ ? खैर, एक बेर ओकरो बकैस दै छी .... पहिने डाक्टरेके बजा दै छी । बिभिन्न बात सभ कल्पना करैत जखन डाक्टरक घरपर पहुचलहुँ त ओ घरे पर रहथि । ओ हमरा देखिते पुछलैथ –
"कि होइए कहू ?"
हुनका जखन सभ किछु कहलियनि त हुनको जेना लौटरी परि गेलन्हि तहिना ओ अप्पन झोड़ा लऽकऽ हमरोसँ आगु–आगु दौरय लगलैथ किए त काज त भेटबे नहि करै छनि । कारण ई कि डाक्टर सबहक पेटपर लात मारनिहार बाबा रामदेब जे जिबते छथि । हम हुनकर सर्ट पकड़िकऽ तनैत कहलियनि –
"हे भाइसाहेब, बिमारी कोनो खासे सिरियस नहि छैक ....... कने आरामसँ चलु ।"
हमहुँ मोट आदमी,ओते जल्दी चलब आ कहुँ हम अपने बिमार पड़ि गेली त कि होएत ? ..... मोनक ललसा कहियो पुरा नहि होएत । डाक्टर संगे जखन घर पहुँचलहुँ त देखै छी पड़ोसी सभमे केओ भरि–भरि गिलास चाहे लऽ कऽ बैसल त केओ भन्सा घरसँ अबैत । हाल–चाल पुछनिहारके आदर–भाव देखकऽ किछु नहि फुराए । किनका रोकियनि आ किए रोकियनि ? भगवान बहुत दिन बाद ई मौका देखऽ देलनि अछि । एकटा कहबी छैक–
"खुसी बटलासँ बढ़ै छै ।"
डाक्टर साहेब रोगीके खुब निक जकाँ तकलनि मुदा रोगी त भेटऽके बाते नहि, किए त रोगी आह–उह, गे माय गे माय, उहुहु’ करैत चाह बनाबऽपर लागल रहथिन । ओना सच्च जौ कहऽ पड़े त एते परोशी सभ हमरा बियाहमे सेहो नहि आएल रहथिन । नहि जानि ई किए ? माय त हमर नंगटीनी नहि छथि ............. मुदा कनिञा सूनरि जरुर छथि । ताबते एकटा परोशी बाजल –
"कि रे घनचक्कर दास ! आइ सबेरे चलि आएल छे ?"
मोनेमन सोचलहुँ सबेरे नहि आएल रहितहुँ त तोरा सन चोट्टासँ केना भेटघाट होइत । सरबा रहे हमरे कनिञा लग सटिकऽ बैसल । माय हमर मुँह दुसैत कहलनि–
" हँ, आई एहि घनचक्कर दासके तकदीरमे चक्कर लगाबऽके लिखल छैक त कि करौक ?"
एते दुःखीक अभिनय करैत बाजल आवाज सुनिकऽ ओ बाजल –
"मुदा , अहाँ एना किए बजैछी ?"
चोट्टा, सायद ई बुझि गेल जे हमर शुभश्री मुँहसँ ओकरे लेल आर्शीवाद निकलैए । खैर, हमरा त अप्पन कनिञाके जनाबऽके छल, ते हम अप्पन खुसीके मगरकच्छके नोरमे भिजाकऽ कहलीए–
"किए नहि बाजु, आइ हमर प्राण प्रिय बिमार भऽगेली ।"
चाहक घुट लऽकऽ लोल चटपटऽबैत फेर पुछलक–
"ई केना भेलै ? कहियासँ ? किया भऽगेलै ?"
गुरुजी बेर–बेर कहै छलखिन–
"प्राक्टीस मेक्स परफेक्ट द मैन ।"
एहि प्रश्नसँ हमरो पूर्णता आबि सकैय ते हम कला प्रस्तुत करैत जबाब देलीए–
"अरे, जखने हम अफिससँ अएलहुँ कि .....................।"
बात पूरा भेलो नहि रहे कि एकटा परोशी बिचेमे बाजल –
"लिअ सर हम जाइछी ।"
ओकरा जाइत देखिकऽ हमरो मोन अपनामे पूर्णता आबऽके अनुभव कैलक ताहि कारण ओ भाइ साहेब एतऽसँ बिदा भेलथि । सबहे दिन एकर सबहक बात सुनिकऽ हमहुँ थाकि गेल रहि । आब मुदा तराजुक दूनु पलरा बराबर भऽ गेलै । ताबे डाक्टरसाहेब जोरसँ कहलखिन –
"कहाँ गेली .... ई दबाई कने जल्दीसँ लाबिकऽ दिअ ......साँझ धरि सभ ठिक भऽ जएतै ।"
डाक्टरसाहेबक बात सुनिकऽ हमरा मुँहसँ निकलिगेल –
"कोनो जल्दी थोरहे छै ।"
ताबते चाहक चुस्की लैत परोशनी बाजलीह–
"देर करब उचित नहि ।"
हमहुँ ओकरे आबाज निकालिकऽ मुँह दुसैत कहलिऐ –
"हमर कहबाक मतलब छल जे दू मिनट आराम कऽ लै छी ।"
एते कहिते ओ कप टनटनऽबैत निचा राखिकऽ- "हुँह" कहलीह आ बिदा भऽगेलीह । कनिञा त पलंगपरसँ जेना हमरा घोटि जएती तेना परल परल देखऽ लगली । हम दबाइ लेबऽ बिदा भेलहुँ । हमरा ओम्हरसँ अबिते गामबाली दाइ पुछलखिन–
"कनिञा, मोन केहन बुझाइए ?"
हँ एहनेके छुछ दुलार कहै छै । नकारात्मक संकेत करैत ओ मुरी हिलऽएली । मतलब साफ रहै-
"ठिक नहि अछि ।"
कनिञाके कुहरैत छटपटाति देखिकऽ मजा लैत रही । ताबते हमर परम मित्र रंजित पहुँचि गेल । चारु दिश ताकिकऽ ओ पुछलक–
"कि भेलै भौजीके रे ? केओ जे ई प्रश्न पुछए त मोन त गदगद भऽ जाए । मुदा ओतै रही । आ, ओहुना पुलिस सभके मुँह आ हाथ दूनु छुटल रहै छै । माय हम सुखाएल भन्टासन मुह बनाकऽ कहलनि–
"बिमार भऽगेली रे हे"
आ जाबे किछु बाजे ताबे ओकर हाथ पकरि कऽ बाहर लऽ गेलीए । ओ हमर हाथ छोराकऽ पुछलक –
"डाक्टर कोन बिमारी कहलकै ?"
हमरा ओकरासँ कोनो बात करऽके मोन नहि करे माय। हम कहलीए–
"रे हमरा याद त नहि अछि कथि दोन संस्कृतमे कहने छलैए ।"
ओ पिताकऽ बाजल–
"केना नहि बिसरबे ............ तोरा त ध्यान रहै छौ रिसेप्सनिष्ट छौरीपर ।"
हम चारु दिश ताकि कऽ कहलीए –
"चुप..चुप ।"
कने देर चुप भेला बाद, मोनक बात निकलि गेल । ओहुना बहुत देरसँ मोनमे छटपट्टी रहे जे ई बात ककरा सुनाउ । ते ओकरा सुनाबऽ लगलीए–
"सच्च पुछैछे त रंजित भाइ, दबाइ किनलाक बादो मोन होइ छल जे फेकदी । कहुँ ओ चोट्टी ठिक नहि भऽ जाए ।"
एते बतियाति जहिना घरमे पैसलहुँ त ओकर बड़का भैया पलंगपर बैसिकऽ परौठा आ भुजीयाक प्लेट हाथमे लेने बकरी जकाँ पाउज करैत रहे । हम ई देखि कऽ थकमका गेलहुँ, आखिर ओ साहबनी गेली कतऽ ? ताबते पाछुसँ हमरा डाड़पर एक छोलनी लागल, छोलनी धिपल सेहो रहै । हम छिलमिलाइते बाहर भगलहुँ आ आब मात्र प्रतिक्षा करऽ लगलहुँ कि ओ अफिस कखन जएतीह ।
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