भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल अखनो ५ जुलाई २००४ क पोस्ट'भालसरिक गाछ'- केर रूपमे इंटरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितिक रूपमे विद्यमान अछि जे विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,आ http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि।
भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति
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पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor:
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Wednesday, April 15, 2009
कथा-कनियाँ-पुतरा सुभाषचन्द्र यादव
जेना टांग छानै छै, तहिना ऊ लड़की हमर पएर पाँज मे धऽ लेलक आ बादुर जकाँ लटैक गेल। ओकर हालत देख ममता लागल। ट्रेनक ओइ डिब्बा मे ठाढ़ भेल-भेल लड़की थाइक कय चूर भऽ गेल रहै। कनियें काल पहिने नीचे मे कहुना बैठल आ बैठलो नै गेलै तऽ लटैक गेल ।
डिब्बा मे पएर रोपै के जगह नै छै। लोग रेड़ कय चढ़ै-ए, रेड़ कय उतरै-ए । धीया-पूता हवा लय औनाइ छै, पाइन लय कानै छै। सबहक जी व्याकुल छै। लोग छटपटा रहल-अय।
हम अपने घंटो दू घंटा सऽ ठाढ़ रही । ठाढ़ भेल-भेल पएर मे दरद हुअय लागल। मन करय लुद सिन बैठ जाइ । तखैनिये दूटा सीट खाली भेलै, जइ पर तीन गोटय बैठल । तेसर हम रही जे बैठब की, बस कनेटा पोन रोपलौं। ऊ लड़की ससैर कय हमरा लग चैल आयल । पहिने ठाढ़ रहल, फेर बैठ गेल । फेर बैठले-बैठल हमर टांगमे लटैक गेल । जखैन ऊ ठाढ़ रहय तऽ बापक बाँहि मे लटकल रहय । ओकरा हम बड़ी काल लटकल देखने रहिऐ । ओकर बाप अखैनियों ठाढ़े छै। छोट बहीन आ भाय ओकरे बगल मे नीचे मे बैठल औंघा रहल छै ।
ऊ जे टांग छानने ऐछ, से हमरा बिदागरी जकाँ लाइग रहल-अय । जाइ काल बेटी जेना बापक टांग छाइन लै छै, तेहने सन । ने ऊ कानै-अय, ने हम कानै छी । लेकिन ओकर कष्ट, ओकर असहाय अवस्था उदास कऽ रहल-अय । हम निश्चल-निस्पंद बैठल छी । होइए हमर सुगबुगी सऽ ओकर बिसबास, ओकर असरा कतौ छिना नै जाय । हाथ ससैर जाइ छै तऽ ऊ फेर ठीक सँ टांग पकैड़ लै अय ।
लड़की दुबर-पातर आ पोरगर छै । हाथ मे घड़ी । प्लास्टिकक झोरा मे राखल मोबाइल । लागै छै नौ-दस सालक रहय । मगर कहलक जे बारह साल के ऐछ । सतमा मे पढ़ै-अय आ ममिऔत भाइक बियाह मे जा रहल-अय ।
बेर-बेर जे हाथ ससैर जाइत रहै से आब ऊ हमर ठेंगहुन पर मूड़ी राइख देलक-अय। जेना हम ओकर माय होइ अइ । ओकर माय संग मे नै छै । कतय छै ओकर माय? जकर कनहा पर, पीठ पर, जाँघ पर कतौ ऊ मूड़ी राइख सकैत रहय । हम ओकर माथ पर हाथ देलिऐ । ऊ और निचेन भऽ गेल जेना ।
एक बेर गाड़ीक धक्का सऽ ऊ ससैर गेल; सोझ भेल आ ऑंइख खोललक। एक गोटय कहलकै- दादा कय कसि कय पकड़ने रह ।
अंतिम टीशन आइब रहल छै । सब उतरै लय सुरफुरा लागल-अय। अपन-अपन जुत्ता-चप्पल, कच्चा-बच्चा आ सामान कय लोग ओरियाबय लागल-अय । राइत बहुत भऽ गेल छै। सब कय अपन-अपन जगह पर जायके चिन्ता छै। बहुत गोटय ठाढ़ भऽ गेल ऐछ । ऊ लड़कियो। हमहूँ ठाढ़ भऽ कऽ अपन झोरा उतारै छी । तखनियें नेबो सन कोनो कड़गर चीज बाँहि सऽ टकरायल। बुझा गेल ई लड़कीक छाती छिऐ । हमर बाँहि कने काल ओइ लड़कीक छाती सऽ सटल रहल। ओइ स्पर्श सऽ लड़की निर्विकार छल; जेना ऊ ककरो आन संगे नै, बाप-दादा या भाय-बहीन सऽ सटल हो ।
ओकर जोबन फूइट रहल छै । ओकरा दिस ताकैत हम कल्पना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै ? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका घेरने जा रहल ऐछ ।
टीशन आइब गेलै। गाड़ी ठमैक रहल छै । लड़की हमरा देख बिहुँसै—अय; जेना रुखसत माइंग रहल हो । ई केहन रोकसदी ऐछ! ने ऊ कानै छै, ने हम कानै छी । ऊ हँसै-अय, हमहँ हँसै छी। लेकिन हमर हॅसी मे उदासी अय ।
1.मार्कण्डेय प्रवासी- आइ राजनीति : 2.नारायणजी- निरर्थक
1. मार्कण्डेय प्रवासी- आइ राजनीति
कोठाक बाइजी-सन
अछि आइ राजनीति,
भाड़ाक ताइजी- सन-
अछि आइ राजनीति!
जनताक सड़क खा-पचा
ई प्रसन्न अछि,
खादीक बहिन-भाइजी-
सन आइ राजनीति!
भकसैछ दूधमे-
माँछक खीर पका ई,
नवकी बिलाइजी-सन
अछि आइ राजनीति!
बेटी पुलस्त्य ऋषि-कुलक
रहितो असुरा अछि,
रावणक माइजी-सन-
अछि आइ राजनीति!
टाका बिना दवाइ ई-
रोगीकेँ दैछ नहि,
डाक्टर दाइजी-सन-
अछि आइ राजनीति!
एखनो प्रवासी-
आयाची मिश्रेक साग छथि,
माखन-मलाइजी-सन-
अछि आइ राजनीति!
2.नारायणजी- निरर्थक
अंकुरि गेल अछि बीया
बढ़ैत अछि आकाश दिस
किछु कहबाक छैक ओकरा
दुनियामे, देखयबाक छैक रंग
पृथ्वीक तऽर दिस जे जाइत अच्हि
रसातलसँ पृथ्वी आनऽ जाइत अच्हि
गबैत अच्हि अपन च्हन्द आ प्राणराग
छहोछित भेल पड़ल अछि खोइया
अंकुरि गेलाक बाद
निरर्थक देखाइत अछि
निरर्थक देखल जयबाक चिन्तासँ मुक्त अछि
रखने अछि बीया सहेजि
सोमदेव: जकरे तकैत छी
जकरे तकैत छी-
जकरे तकैत छी सभ। अहीं सन लगैत अछि।
रसे रसे सभटा। बिन स्वादो अरघैत अछि॥1॥
एक आँखि काजर। आ’ एक आँखि नोरभरल।
कवि छी, तैं भाव जगा। हमरा ठकैत अछि॥2॥
ऐंठल सन पेट आर। चोटकल सरोज वैह।
गामक एकचारी पर सजमनि लगैत अछि॥3॥
नगरक सभ डगर डगर। डगर कात नगर नगर।
अहाँक सोह। आँखि पड़ल मारी लगैत अछि॥4॥
गामक सभ कास-कूस। मोन पड़ै धोन्हि बीच।
बिजुरीक राति। ‘सोम’ कते कन-कन लगैत अछि॥5॥
अनुप्रियाक दू गोट कविता- भगजोगनी आ देह
www.maithilimandan.blogspot.com
भगजोगनी
हमरा लग ने दीप अछि
ने बाती
आर ने तेल
तैयौ जरौने छी
दीप उमेदक अपन
आँखि मे
किछु एहेन घर
किछु एहेन डगर
किछु एहेन बस्ती जतय
ढीठ भ’ जीबैत अछि अन्हार
ओतय देखने छी हम
टिमटिमाइत भगजोगनी
जेना अपन मिरियैल इजोत सं
ओ काटि देबय चाहैत होई
घुप्प अन्हार
वैह भगजोगनी
हमरा मन मे
गहैत अछि विश्वास
जे आब एतहु
मनायल जायत दिवाली
आउ झक इजोत लेल
एक-एक टा दीप जराबी ।
00000000000000000
देह
अहां हमरा गहय चाहैत छलहुँ
अपन बाँहि मे
आ हम चाहैत छलहुँ
अहाँक संग
अहाँ छूबय चाहैत छलहुँ
हमरा
आ हम अहाँक हाथ पकड़ि
पूरा करय चाहैत छलहुँ
जीवन-जतरा
हमरा लेल तेँ अहां
हमर आत्मा बनि गेल छलहुँ
मुदा अहांक लेल
हम- मात्र एकटा देह ।
Tuesday, April 14, 2009
अटकन-मटकन- बाल-कविता-4
एक टा पुरान मैथिली फकरा प्रस्तुत क रहल छी. दाय आ नानी के मुहं स सुनैत-सुनाबैत ई फकरा के एखनो गाम-घर के बच्चा गाईव क खेलाइत-धुपाइत अछि।
अटकन मटकन
दहिया चटकन
केरा कुश
महागर जोहागर
पुर्णि पत्ता
हिलय डोलय
माघ मास
करैला फरय
ई करैला नाम की
आमुन गोटी
जामुन गोटी
तेतरी सोहाग गोटी
बांस कटय
ठाँय ठाँय
नदी गोगियायल जाय
कमलक फूल दूनु
अलगल जाय
छोटी रानी
जेठी रानी
गेली नहाय
इछुवा बिछुवा
लय गेल चोर
आब कि पहिरती
कौवा के ठोर
कौवा के ठोर में पिलुवा
विष्णु प्रभाकर जी क स्मृति मे

विष्णु प्रभाकर जी सादगीक प्रतिमूर्ति छलाह। .
१९९० क वर्ष हमरा लेल आब एहन लगैत अछि काफी महत्वूर्ण छल। ओहि समय हमरामे सकारातमक उर्जाक प्रबल आवेग हिलोर ल’ रहल छल. हम जे किछु समाजकेँ देलहुँ या सामजिक ऋण सँ उरिण होएबाक लेल जाहि कार्यकेँ सम्पन्न कएल ओहिमे बहुतोक शुरुआत ९० सँ भेल।ठीकसँ मोन नहि आबि रहल अछि जे की हम कोना आ ककरा संग सबसँ पहिने मोहन पैलेसक छत पर चलए वाला काफी हाउस मे पहुँचलहुँ .शाइत प्रो. राजकुमार जैन जीक संग गेल रही। ओ शनिक दिन रहए. ओतहि दिल्लीक चर्चित लेखक आ कलाकार-मंडली लागल छल. ओहि उस मंडलीक मध्य वयोवृद्ध खादी धरी,गाँधी टोपी पहिरने विष्णु प्रभाकर जी सुशोभित भ’ रहल छलाह। ओहि वातावरणमे हमरापर गजबक असर भेल.फेर हम सभ साँझ शनिकेँ ओहि शनिवारी गोष्ठीमे बैस’ लगलहुँ। ई सिलसिला १९९५ तक चलल,जखन विश्वविद्यालय परिसरका रीड्स लाइन हमर निवास रहल. एहि वर्षो मे नहि जानि कतेक नामी -गिरामी लेखक,कवि,कलाकार आ पत्रकारक साहचर्य रहल.पता नहि कतेक साहित्यिक गोष्ठिमे समीक्षक या वक्ताक हैसियतसँ शामिल भेलहुँ.ओहि समयमे हम दाढी रखैत छलहुँ आ पाईप पीबैत छलहुँ। ओहि समयमे उप-कुलपति प्रो.उपेन्द्र बक्षी साहब सेहो पाईप पीबैत रहथि। अतः लोक हमरापर कखनो-कखनो व्यंग्य सेहो करैत रहथि। “एक बक्षी साहब हैं की एक झा साहब हैं-दूर से पहचाने जाते हैं”. हमहुँ खादीक कुर्ता पायजामा पहिरैत छलहुँ। से हमर कोनो बैठकमे उपस्थिति अलग अंदाजमे होइत रहए। पढबैत इतिहास छी ,परन्तु ओहि दिनमे सेहो लोक हमरा हिन्दीक शिक्षक बुझैत रहथि। काफी हाउस सेहो एकर अपवाद नहि छल। हमर कॉलेजक डॉक्टर हेमचंद जैन अक्सर हमरा कहैत रहथि –अहाँ अपन बौद्धिक लुकसँ आतंकित करैत छी .देव राज शर्मा पथिक सेहो कहैत रहथि- “झा साहब आपमें स्पार्क है” .खैर हम एहि सभ गपक आदी भेल जा रहल छलहुँ.लेकिन काफी हाउस हम बस साहित्यिक मंडलीक साहचर्य सुख लेबा लेल जाइत रही। ओतए हमर एहन अदना सन व्यक्ति बड्ड बजैत रहए परन्तु वाह रे विष्णुजीक महानता , हमरा हमर छोटपनक कखनो अहसास तक नहि होमए देलन्हि । वल्कि हमरा लगैत रहए जे हमरा काफ़ी गंभीरतासँ ओ सुनैत रहथि.बहुत गर्वोन्नत महसूस करैत छलहुँ हम। हम एक-दू बेर हाथ पकड़ि कए भीड़ भरल सड़क पार करेबाक बहने हुनकर स्नेहिल स्पर्श आ सान्निद्ध्य प्राप्त करबाक अवसर प्राप्त केलहुँ। एकर संतोष अछि .१९९४ मे भारतीय भाषा लेल संघर्ष करबाक क्रम मे संघ लोक सेवा क बाहर धरना-स्थल सँ पुष्पेन्द्र चौहान समेत कतेको साथीक संग हमरो पुलिस गिरफ्तार कए तिहाड़ जेल भेज देलक .ज्ञानी जेल सिंह,अटल बिहारी वाजपेयी विशानाथ प्रताप सिंह,मुलायम सिंह यादव आर अन्य कतेक पैघ नेता आ साहित्यकार-पत्रकार,समाज सेवि एवं आन्दोलनकारिक दबाब मे एक सप्ताहक बाद हमारासभ उपर लादल सभ केस हटा हमरासभकेँ बिना शर्त रिहा कएल गेल। एकर बाद तँ काफी हाउसमे सेहो हमरासभ प्रति साथिसभक आदर भाव बढ़ि गेलन्हि। मुदा अपन आवारा स्वाभावक कारण हम १९९५ क बाद काफी हाउस जएबाक सिलसिला चालू नहि राखि सकलहुँ. एकर हमरा आइयो अफ़सोस अछि .आवारा मसीहाक लेखक केँ एकर भान धरि नहि भेल होएतन्हि जे एक यायावरी आवारा कोनो दोसर धुन मे उलझि रहल हएत। आइ हमर बीच नहि रहबाक बादो हुनकर स्मृति एतेक मृदुल अछि जे लगैत अछि कि विष्णु जी अखनो काफी हाउसक मंडलीक बनेने छथि .हुनकर स्मृतिकेँ कोटि-कोटि प्रणाम।
दयो करबाक बेर होइत छैक- कुलानन्द मिश्र/
दयो करबाक बेर होइत छैक - कुलानन्द मिश्र
पोखरि बेश फुला गेल छैक दोसर बेर जाल फेकबा सँ पहिने
मोहना जाल केँ झाड़लक तऽ एकटा छोट-छिन पोठिया
छटपटाइत कूदि गेलै पोखरि मे
मोहनाक मोन मे खुशी भेलैक
ओकरा नीक लगलै जे ओ कूदि गेलै
पड़ा गेलै जाल सँ
ओकरा ठोर पर चाकर मुसकी पसरि गेलै
ओ फेर जाल केँ पोखरि मे पसारलक
आ एहिबेर पहिलुक खेपसँ
पैघ-पैघ आ पुष्ट-पुष्ट माछ
जाल सङ्गे खिचाकऽ बाहर आयल
मोहनाक आँखिक आगाँ
ओ पड़ाइत पोठिया फेर नाचि गेलैक
ओ फेर बिहुँसल
आ सोचलक
दयो करबाक बेर होइत छैक!
एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी(पाँचम कड़ी)

हम महदेव झा कs विषय में सोचति सोचति नहि जानि कतय ध्यान मग्न भs गेलहुं, अचानक हमर ध्यान खुजल तs देखति छी इ हमरा सोझां में ठाढ़ भs मुस्की दs रहल छथि। इ देखि कs हमरा लाज भs गेल, आ इ तुंरत हमरा दिस हाथ आगू कs कहलाह, " लिय, अहाँक लेल हम मुँह बजाओन अनलौंह अछि, ई हमरा दिस सs अहाँक लेल पहिल उपहार थिक। चतुर्थी दिन वाला तs दादक कीनल छलैन्ह, ई हमरा दिस सs अछि"। ई कहि हमरा दिस एकटा किताब आगू बढ़ा देलथि।
पँचमी दिन भोरे भोर दादी सभ गोटे कs उठा देलथिन। हिनको उठय परि गेलैन्ह, इहो भोरे भोर तैयार भs गेलाह, हिनको हमारा संग पूजा पर बैसय कs छलैन्ह। पूजा पर बैसैत बैसैत ९ बाजि गेलैक। दादी भरि गामक लोक कs हकार दियबोने रहथि मुदा पूजा काल गामक सभ गोटे नहि आयल छलथि हाँ, अपन दियादि महक सभ कियो अवश्य आयल रहथि। परंच भरि दिन लोकक एनाइ गेनाइ लागल छलय। पूजा आ कथा समाप्त होयत होयत १ बाजि गेलय। सब सs पहिने हिनकर भोजनक व्यवस्था कs हिनका खुआयल गेलैन्ह, तकर बाद अहिबाति सबहक खेनाइ कs ओरिओन कs हुनका सब कs बैसायल गेलैन्ह। हमरो हुनके सबहक संग बीच में बैसि कs खेबाक छलs। हमारा मिट्ठ खेबाक एको रत्ती इच्छा नहि होयत छलs। सब गोटे खेबाक लेल जिद्द कs देलैथ इ कहि जे बस एकर बाद आब मिट्ठ नहि खाय परत । दोसर साँझ भेला पर किछु नय खेबाक छल, कहुना कनि खीर खा कs उठि गेलहुँ
पूजा पर सs उठला पर ततेक नय थाकि गेल रहि जे होयत छलs जे चुप चाप सुति रहि मुदा कनि कनि काल पर कियो नय कियो आबि जायत रहथि आ हुनका सब लग बैसय लेल तुंरत बजाहटि आबि जायत छल। दुपहर में हम सब फेर फूल लोढ़य लेल गेलहुँ ओहि दिन हम बहुत थाकल रहि, तथापि जेना जेना सभ गोटे फूल पत्ति तोरथि तहिना हमहुँ तोरि कs राखने जाइ, ओहि दिन बुझ परैत छलs सब थाकल रहथि, ओहि दिन हम सभ जल्दिये आपस भs गेलंहु।
प्रतिदिन हमसब फूल लोढ़य लेल जाइ आ एक पथिया करीब रोज फूल पात आनि। बारहम दिन हमसब कनि जल्दी जाs कs फूल जाहि जूही लs अनलियय ओहि दिन बहुत लोकक ओतहि पाहुन कs अयबाक छलैन्ह, किनको ससुर कs अयबाक छलैन्ह तs किनको वर कs। बारहम दिन धरि करीब खिड़की तक फुल पातक टालि लागि गेलैक, ताहि पर उपर सs दूध, जल प्रसाद चढायल जायत छलैक। कोहबर घर में ओना तs धूप दीप जरति छलैक मुदा तइयो कनेक मनेक गंध रहति छलैक। बारहम दिन साँझ में पूजा वाला सबटा फूल पात हटाs कs ओहि ठाम साफ करायल गेलैक, कियैक तs मधुश्रावणी दिन फेर सs सभटा फूल पात हटेलाक बाद ओतहि साफ कs फेर सs अरिपन परैत छैक। जखैन्ह फूल पात हटायल जायत छलैक तखैन्ह बुझय में आयल जे हमसभ कतेक फूल पात आ जाहि जूही तोरने रहि, खत्मे नहि होयत छलैक ।
साँझ में हमर ससुर अपने, हमर एकटा पितिऔत दियोर कs संग भार लs कs अयलाह। तखैन्ह सs घर में सबगोटे आओर व्यस्त भs जाय गेल्थिन।हमर दादी आ माँ भार देखबा आ देखेबा में व्यस्त छलिह। बिधक की सब आयल अछि की सब नहि। हमर ससुर सेहो विवाहक बाद पहिल बेर आयल छलाह। हिनको अपन दादा (पिताजी) सs विवाहक बाद पहिल बेर भेंट भेल छलैन्ह, गप्प सप में देरी भs गेलैक।
हम सुनने रहि जे मधुश्रावणी दिन कनिया कs सासुर सs बिधक सामान संग टेमी सेहो अबैत छैक आ ओहि सs कनिया कs दुनु ठेहुन कs डाहल जायत छैक। टेमी सs डाहलाक बाद ओकरा पर पान आ सुपारी दs ओकरा रगरि देल जायत छैक जाहि सs फोका अवश्य होय। फोका भेला सs निक मानल जायत छैक। सब दिन फुल लोढ़य काल इ सब गप्प होयत रहैत छलैक। हम सांझे सs डरल रहि आ जखैन्ह सs हमर ससुर आबि गेलाह तखैन्ह सs दर्दक कल्पना कs आओर डरि जायत रहि। दादी कs गप्प मोन परि जाय जे "मधुश्रावणी लोकक एके बेर होयत छैक"। किनको सs किछु पुछबो नय करियैन्ह।
राति में सुतय में देर तs भs गेल छलैक, भगवान भगवान कs सुतय लेल गेलहुं। हम ओनाहों कम बाजति छलौंह ओहि दिन आओर किछु नय बाजति छलियs इ हमरा सs दू तिन बेर पुछ्लाह किछु भेल अछि, हम सब बेर नय कहि दियनि मुदा हिनका बुझs में आबि गेलैन्ह कि किछु गप्प अवश्य छैक। जखैन्ह इ हमरा बहुत पुछ्लथि तs हम धीरे सs कहलियैन्ह, "हमरा डर होयत अछि"। हिनका किछु बुझय में नय अयलैन्ह, अचानक हमरा डर कियैक होयत छलs। इ हमरा बहुत निक सs बुझा कs पुछ्लाह "डरबाकs आखिर कोन गप्प छैक", अहाँ पहिने डरु नय आ हमरा कहु की गप्प छैक"? हम डरैत हिनका कहलियैन्ह "हमरा टेमी सs डर होयत अछि"। "टेमी... कियाक टेमी सs डर होइत अछि"? हम हुनका तुंरत सभटा कहि देलियैन्ह जे काल्हि कs लेल डरि रहल छलन्हु। इ हमरा कहलाह "अहाँ जुनि डरु एकतs हमरा बुझलि अछि जे हमारा ओतय टेमी नहि होयत अछि, दोसर जाओं होयतो होयत तs अहाँ कs नहि होमय देबैक, हमर गप्प के कियो नय काटतिह "। ओहि दिन पता नहि कोना आ कियाक, तुंरत हिनका पर पूर्ण रूपेण विश्वास भs गेल, हम निश्चिंत भs गेलहुं जे आब हमरा टेमी नहि परत। ओकर बाद हमरा मोन में कोनो डर नहि छलs।
भोरे उठी कs तैयार भेलन्हु मुदा मोन में कनिको डर नहि छलs। मधुश्रावणी दिन पूजा में कनेक आओर बेसी समय लगलैक, जखैन्ह टेमी देबाक भेलs तs जहिना हमर बिधकरि उठलथि इ तुंरत कहि देलथिन हमरा सब में टेमी नय होयत अछि। इ सुनतहि हमरा ततेक नय खुशी भेल जकर वर्णन नहि कयल जा सकति अछि। बिधकरि उठि कs एकटा टेमि आनि कहलथिन ठीके हिनका सभके शीतल टेमि होयत छैन्ह। एकटा टेमि में चंदन लगा ओहि सs हमर दुनु ठेहुन में लगा देल गेल।
ओहि दिन फेर अहिबातिक संग खेबाक छलs। हमर ससुरक सौजनि सेहो छलैन्ह। पाबनि सs उठलाक बाद हिनकर भोजनक व्यवस्था आ हमर ससुरक सौजनि भेलैन्ह आ हम खेलाक बाद जहिना सोचलौन्ह आब आराम करैत छि कि माँ आबि कs कहलैथ तैयार होयबाक अछि हमर ससुर, दादा जी आबैत होयताह। दादा जी कs आदेश छलैन्ह जे ओ हमरा भगवति घर में देखताह। हम फेर तैयार भs भगवति घर चलि गेलंहु । दियोर आ दादा जी दुनु गोटे भगवति घर अयलाह आ कनि दूर ठाढ़ भs गेलाह। हमरा संग जे छलिह ओ हमरा जाs कs गोर लागय लेल कहलैथ, हम ठाढ़ भs दादा जी लग जा हुनका गोर लागि लेलियैन्ह आ ओहि ठाम बैसि गेलंहु, ओ तुंरत देखेबाक लेल कहलैथ आ हुनका जहिना देखा देल गेलैन्ह हमरा हाथ में एकटा गहना दs ओतय सs चलि गेलाह।
दादा जी साँझ में चलि गेलाह। हमारो सबके दू दिन बाद जेबाक छलs। हमर छोट भायक मुंडन छलैन्ह अरेराज मंदिर में, हुनकर मुंडन करा हमरा राँची में छोरति, छोटका भाय आ तिनु बहिन के संग माँ बाबुजी कs अरुणाचल जयबाक छलैन्ह बाबुजी कs छुट्टी से ख़तम भs गेल छलैन्ह। । हिनका सेहो मुंडन में उपस्थित रहबाक लेल माँ बाबुजी सब कहैत रहथि।
राति में इ हमरा सs हमर मोन जांचय लेल पुछ्लथि अहांक माँ बाबुजी हमरो मुंडन में उपस्थित होयबाक लेल कहैत छथि, हम की करि । हम पहिने त चुप रहि मुदा टेमी वाला बातक बाद स हमर कनि धाख टुटि गेल छल। हम धीरे सs कहलियनि छुट्टी अछि त अहुँ हमरे सब संग चलु , मुंडन कs बाद अहाँ मुजफ्फरपुर चलि जायब आ हम सब राँची चलि जायब। इ हमरा कहलथि हमर कॉलेज में हरताल चलैत अछि। जाहि दिन शुरू भेल छलैक ओहि दिन अहाँक बाबुजी पहुँचि गेलाह , हम सोचिते छलहुँ अयबाक लेल ताधरि हमरा बाबुजी कहि देलैथ छुट्टी अछि तs अहि ठाम कि करब चलु हमरा संग आ हम चलि आयल रहि। दोसर अहाँ चिट्ठी जे लिखने रही, हमरा ततेक नय ख़ुशी भेल जे हम तुंरत आबय चाहति रहि।
हम हिनकर गप्प सुनी कs मोने मोन बड खुश भेलहुँ , मुदा इ हमर मोनक गप्प कोना बुझि गेलाह से नहि जानि। इ हमरा अपने मोने कहय लगलाह राँची तs अहि ठाम स दूर छैक परंच हम कोशिश करब जखैन्ह छुट्टी होयत हम आबि जायब अहाँ चिंता जुनि करब, खूब मोन स पढ़ब। हम इ सुनतहि उदास भ गेलौहुं, तखनि हमरा लागल जे आब हमरा हिनका सs अलग रहय में निक नय लागत।
तेसर दिन हम दुनु गोटे, माँ बाबूजी, हमर भाय बहिन सब दादी बाबा कs संग गाम सs अरेराज कs लेल बिदा भs गेलहुँ। राति सबगोटे मोतिहारी में रुकि भोरे भोर हमसब मन्दिर पहुँची गेलहुँ आ मुंडन भेला पर सबगोटे मन्दिर दर्शन करय लेल जाय गेलियय, हम आ ई बाहरे सs भोला बाबा कs गोर लागि लेलियैन्ह। दादी कहने छलथि विवाहक एक बरख धरि लोग मन्दिर कs भीतर नहि जायत छैक। सबगोटे वापस फेर मोतिहारी आबि गेलहुँ, दादी बाबा गाम चलि गेलाह आ हमसब ओहि दिन मोतिहारी रुकि गेलहुं , दोसर दिन हमारा सब के मुजफ्फरपुर सs राँची के लेल रेल गाड़ी छलs।
क्रमशः ........
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kusumthakur1956@gmail.com/
Monday, April 13, 2009
1. पूर्वजक जन्मभूमिकेँ शत-शत प्रणाम 2.आचार्य पंकज
३५० बरस पहिल हमर पूर्वज मिथिला जरूर छोड़ने छला किंतु मैथिल होबाक गर्व हम सब सब दिन महसूस केने छि.हम सब ओतने गर्वोन्नत मैथिल छि जेतना कौनो दोसर मैथिल होता।लगभग ३५० बरस स हमर परिवार आधुनिक झारखण्ड क देवघर जिला अंतर्गत सारथ थाना के खैरबनी ग्राम में रही रहल छे
३०० साल पहिने एक सिद्ध ज्योतिषी मिथिला सँ चलि आज के देवघर जिलाक सारथ ,जकरा पहिने सरहद कहल जाइत छल ,क राजदरबार मे राज ज्योतिषीक स्थान ग्रहण केलन्हि .ध्यान देबा योग्य बात ई अछि जे राज दरबार मुस्लिम नबाबक रहए आ राज ज्योतिषी मैथिल ब्राह्मण बनलाह.तखनसँ आइ धरि ओ परिवार ओतहि रहि गेल जेना आइ हम दिल्लीक भेल जा रहल छी। मुदा ई तँ एक सामजिक आर ऐतिहासिक प्रक्रिया अछि .विस्थापन तथा परिभ्रमण इतिहासक अति महत्त्वपूर्ण घटना रहल अछि .लेकिन अपन धरती अपन देश--देसिल बयना ,सब जन मिट्ठा--क स्मृति हमरा आइयो मैथिल बनेने अछि .हमसभ अपन इलाकामे अपनाकेँ मैथिल ब्राह्मण कहैत छी मुदा एहिमे ब्राह्मण गौण रहैत अछि मैथिल प्रमुख भ' जाइत अछि। दोसर लोक हमरा सभक लेल मैथिल शब्दक प्रयोग करैत छथि। माने मैथिल शब्द हमर अस्मिता हमर अस्तित्वक द्योतक अछि .
2. आचार्य पंकज
पंकज जी
हम अमरनाथ झा,दिल्ली विश्वविद्यालयक स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज मे इतिहास विभाग मे अससोसिएत प्रोफ़ेसर छी । हम अहाँकेँ संताल परगना (झारखण्ड) मे हिंदी साहित्य आ हिंदी कविताक अलख जगेनिहार सैकड़ामे साहित्यकार पैदा करएवला ओहि महान साहित्यकार एवं हुनकर रचनासँ अवगत कराबए चाहैत छी जे अपन बहुमुखी प्रतिभाक बलपर समस्त संताल परगनाकेँ शिक्षाक लौ सँ रौशन केलन्हि। १९१९ मे जन्म लेल श्री ज्योतींद्र प्रसाद झा "पंकज" नामक एहि महामना द्वारा १९३४ मे देवघरक हिंदी विद्यापीठमे अध्यापनक कार्य शुरू कएल गेल आ अपन प्रकांड विद्वताक बलपर तत्कालीन हिंदी जगतक धुरंधरक ध्यान अपन दिस खिचलन्हि। १९४२ क भारत छोड़ो आन्दोलनक कमान एक शिक्षकक हैसियतसँ सम्हारलन्हि १९५४ मे ओ संताल परगना महाविद्यालय दुमका (ओहि समय भागलपुर विश्वविद्यालयक अंतर्गत )क संस्थापक शिक्षक एवं हिंदी विभागक अध्यक्ष बनि गेलाह। एहि बीच तत्कालीन पत्र-पत्रिकामे ओ "पंकज" क उपनामसँ कविता ,समीक्षा आ एकांकी लिखैत रहलाह ,जकर चर्चा होइत रहल। १९५८ मे हुनकर कविता संग्रह "स्नेहदीप" क नाम सँ छपल। १९६४ मे हुनकर दोसर कविता संग्रह"उदगार" क नामसँ छपल। १९६५ मे संताल परगनाक साहित्यकार सभ मिलि क’ एक बहुत पैघ साहित्यिक संगठनक निर्माण कएलन्हि जकर अध्यक्ष "पंकज"जी केँ बनाओल गेल आ एहि संगठनक नाम सेहो हुनके नाम पर "पंकज-गोष्ठी" राखल गेल। १९६५ सँ १९७५ धरि पंकज गोष्ठी संपूर्ण संताल परगनाक असगर आ सबसँ पैघ साहित्यिक आन्दोलन छल। सत्य तँ ई अछि जे ओहि दौर मे ओतए पंकज गोष्ठीक मान्यताक बिना कोनो साहित्यकारहि नहि कहाइत रहथि। पंकज गोष्ठी द्वारा प्रकाशित कविता संकलनक नाम छल "अर्पण" तथा एकांकी संकलनक नाम छल "साहित्यकार"। लक्ष्मी नारण "सुधांशु ",जनार्धन प्रसाद मिश्र "परमेश",बुद्धिनाथ झा"कैरव" क समकालीन एहि महान विभूति--प्रोफ़ेसर ज्योतींद्र प्रसाद झा "पंकज' क विद्वता,रचनाधर्मिता एवं क्रांतिकारिता सँ तत्कालीन महत्त्वपूर्ण हिंदी रचनाकार जेना--रामधारी सिंह"दिनकर",द्विजेन्द्र नाथ झा "द्विज",हंस कुमार तिवारी,सुमित्रानंदन"पन्त',जानकी वल्लभ शास्त्री नलिन विलोचन शर्मा आदि भली भांति परिचित छलाह । आत्मप्रचारसँ कोसो दूर रहए वाला "पंकज"जी केँ भले आइ हिंदी जगत बिसारि देलक अछि परन्तु ५८ साल कि अल्पायु मे १९७७ मे दिवंगत एहि आचार्य कविकेँ मृत्यक ३२ वर्षो बादो संताल परगनाक साहित्यकारे टा नहि वरन लाखों लोक अपन स्मृतिमे आइयो महान विभूतिक रूपमे जिन्दा रखने छथि। संताल परगनाक एहन कोनो गाम या शहर नहि अछि जतए "पंकज"जी सँ सम्बंधित किम्वदंति नहि प्रचलित होअए। की अहाँ हुन्अका आ हुनकर कृतिक ब्रिहद्तर हिन्दी जगतक समक्ष प्रस्तुत करबामे हमर सहायता करब ? अहाँक प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित अछि। अभिवादनक संग -उत्तरापेक्षी,अमरनाथ ।
शुभकामना सहित
अमरनाथ झा
कविता- हे हमर प्रेयसी- आशीष अनचिन्हार
हे हमर प्रेयसी
जहिना
फूल झहरि-झहरि खसैत अछि
माटि पर
ओकरा सजबए लेल
मेघ हहरि-हहरि
बुन्नी बनि जाइत छैक
फसिलक लेल
सुगंध उड़ि-उड़ि
बसात मे मीलि जाइत छैक
ओकर सौन्दर्यक लेल
तहिना
हे हमर प्रेयसी, हे हमर सोन
आउ
हम दूनू मीलि जाइ
एक दोसरा मे
नव जिनगी , नव चेतनाक
लेल
अकाल- कीर्तिनारायण मिश्र
सड़क पर हड्डी चिबबैत
छौंड़ा सभ
कुकूर आ पुलिसकें
डण्डा देखा रहल अछि
ऐंठल अंतड़ी वाली जनता
भूक-हड़तालक धमकी दऽ रहलि अछि।
आ
बाँझ सरकार
विदेशक आश्वासन सँ
विवाह रचा रहलि अछि
’लूप’ लागल धरती
तथा निवीर्य्य अकाशक बीचमे
देशक नपुंसकता जोरसँ दहड़िमारि रहलि अछि।
आऽ समय एहि सभसँ असम्पृक्त्त
नशामे मातल
मैदानमे जा कए सूति रहल अछि।
कुमार सौरभक टटका आलेख : प्रायश्चितक क्षण
प्रायश्चितक क्षण
1952 सॅ एखन धरि मिथिलाक कोनो समस्या,कोनो आकांक्षा प्रखर रूपें चुनावी मुद्दा बनि नहि उभरि सकल अछि । अशिक्षा, निजी स्वार्थ, जातिगत द्वेष आदि एकर प्रमुख कारण मानल जा सकैछ । एखन धरि मुख्यतः दलगत पूर्वाग्रह, जाति-पाति, व्यक्तिगत सम्बन्ध आ लाभ, दबंगइक दबाव, स्त्री उम्मीदवार केर देहक आकर्षण आदिक प्रभाव वा विकल्पक अभाव मे मतदान कयल जाइत रहल छैक । बिकासक मामला मे अहि क्षेत्रक उपेक्षाक लेल अहि तरहक प्रवृत्ति सबसं बेसी जिम्मेदार अछि । अहू से बेसी दुर्भाग्यपूर्ण थिक अहि क्षेत्र मे, विकासक काज आ आकांक्षा पूर करबाक प्रयास करय वाला व्यक्ति आ दल केर घनघोर उपेक्षा । चिर प्रतीक्षाक उपरांत मैथिलीक अष्टम् अनुसूची मे प्रवेश आ कोसीक पूब आ पच्छिम मे बंटल मिथिला के जोड़बाक महत्वाकांक्षी योजना- कोसी रेल सेतुक निर्माण लेल स्वीकृति देबय वाला गठबंधन सरकारक अहिठामक चुनाव मे चित बजार खसब, एकर उदाहरण थिक । अहि तरहक अनुभव सॅ नेता सबहक अकर्मण्य चरित्र बहुत बेसी प्रोत्साहित होइत छैक । कोनो क्षेत्रक प्रति ई धारणा जे अहिठाम काज करब नहि करब कोनो मुद्दा नहि थिक ओहि क्षेत्र लेल कतेक घातक भ सकैछ, सहजे अनुमान लगायल जा सकैत अछि । यैह कारण थिक जे मैथिल जनमानसक एकटा मान्य नेता बिहारक मुख्यमंत्री बनलाक बाद उचित अधिकारिणी मैथिली के कात क’, उर्दू के द्वितीय राज भाषा घोषित करबाक अक्षम्य कृत्य क’ पबैत छैथि । समाजवादी आंदोलनक पृष्ठभूमि मे उपजल जातिगत राजनीतिक धुरंधर एकटा गप्पी नेता मैथिली के बी.पी.एस.सी. सॅ बाहर करबाक दुस्साहस करैत छैथि । वैह नेता क्षेत्रक एकटा जाति विशेष के मोन भरि गरियाबैत छैथि आ निर्लज्जताक हद देखू जे बदलैत राजनीतिक परिदृश्य मे ओहि जाति के समाजक सबसॅ सज्जन जाति कहि आशीर्वाद मांगैत छैथि आ गप्पक राजनीति कतेक प्रभावी भ सकैत से देखा दैत छैथि ।
जूझि रहल अछि मिथिला
1.बाढि सॅ तबाही आ विस्थापनक समस्या.
2.कोसी क्षेत्र मे पीबाक पानिक समस्या (आइरनक अधिकता- स्वास्थ्य लेल सबसॅ पैघ संकट).
3 गरीबी आ भूखमरी.
4.खेतिहरक बदतर स्थिति.
5.अराजक सरकारी शिक्षा व्यवस्था आ विश्वविद्यालयी शिक्षाक कंडम हालत.
6.व्यापक बेकारी आ बेगारीक समस्या.
7.माछ-मखान उद्यमक अधोगति. कोनो तरहक लघु आ कुटीर उद्यम के प्रोत्साहनक घोर खगता.
8.बेमार स्वास्थ्य सेवा.
9.लचर पुलिसिया तंत्र..
10.जर्जर परिवहन व्यवस्था.
11.बिजली संकट.
12.दबंगई आ रंगदारी वसूली.
13.जड़ि तक पसरल भ्रष्टाचार.
14.मैथिली के समुचित इज्जति नहि भेटब.
15.किछु अहिन्दी भाषी राज्य मे एम्हुरका लोक सबहक संग अशोभनीय आ अमानुषिक व्यवहार.
16.नेपाल सीमा सॅ सटल क्षेत्र मे अंधाधुंध तस्करीक माध्यमे घटिया आ अहितकर भोज्य पदार्थ आ समान सॅ अंटल बजार.
17.बंगलादेशी घुसपैठिया सबहक पूर्वोत्तर सीमान्त मिथिला मे
गुपचुप ढ़ंगे पसरैत पैर.
18.पर्यटन क्षेत्रक रूप मे विकसित हेबाक संभावनाक अछैतो
सरकारी उदासीनता.
19. हिटलरी प्रशासनिक व्यवस्था.
20. बिकास काजक काउछ चैलि.
अहि सबहक अतिरिक्त आनो कतेक समस्या प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपें मुंह बाबि ठाढ़ अछि जे हमर वैयक्तिक सीमाक कारणें इंगित नहि भ सकल अछि । अहि तरहक गंभीर समस्या सबहक निदान लेल हमरा सब कहिया राजनीतिक दृष्टि सॅ संगठित होयब ????????
मित्र, कमजोरी हमरे सबहक आत्मा मे पैसल अछि । जतय जैतुक (दहेज) सन निकृष्ट व्यापारक खुलल मंडी (Open Market) होइ, ओहि ठामक लोकक नैतिक चरित्रक केहेन आकलन कयल जा सकैत अछि ???? मौस, दारू, आ सौ-सौ केर एक दूइ टा नोट पर बिकि जाइ वाला हमसब बदलावक अपेक्षो कोन मुंहे करी ????
ब्लाग धरि पहुंच राखय वाला अपना सब एहेन तथाकथित बुधियार सबहक लेल यैह प्रायश्चित भ सकैत अछि जे अपन गामक आ प्रभावक लोक सबके हाथ जोड़ि जोहारि करी - “ भैया, कका, ददा बहुत भ गेले !!!! कम सॅ कम अहू बेर अपन चुनावी दायित्व बुझियौ !!!!!!!!!!!!!! ”
नीक होयत जे हम सब अहि बेर (लोकसभा चुनाव-2009 मे) सब तरहक पूर्वाग्रह सॅ उपर उठि , उम्मीदवारक व्यक्तिगत छवि आ विकास लेल प्रतिबद्धताक आधार पर मतदान करी आ बेसी सॅ बेसी संख्या मे मतदान लेल निकली ।
Sunday, April 12, 2009
मच्छर चलिसा- मदन कुमार ठाकुर
मच्छर चलिसा
दाेहा
अति आबस्यक जानी के हाेके अति लचार
बरणाे मच्छर सक्ल गुणाे दुख दायक ब्यबहार ।
बिना मसहरि दिन हॅू सुन्हूॅ सकल नर्रनार
मक्ष्छर चलिसा लिखक पढ़उ साेइच बिचैर ।।
चाैपाइर्
जय मच्छर भगवान उजागर ।
जय अर्नगिणित हे राेग के सागर ।।
नदियाॅ पाेखैर गंगा सागर ।
सबठाम रहते छी अही उजा गर ।।
नीम हकिम के अही रखबारे ।
डाक्टर के भेलाे अतिश्य प्यारे ।।
मलेरिया के छी अहा दाता ।
छी खटमल के प्यारे भा्रता ।।
जरी बुट्टी से काज नऽ बनल ।
अंग्रेजी दबाइर् जलदी फीट करल ।।
आउल आउट गुडनाइर्ट अपनेलाे ।
फेर अपन अहा जान बचेलाे ।।
दिन दुखि सब धुप में जरैत छैथ ।
राइर्ताे में बेचैन रहैत छैथ ।।
संझ – भाेर अहा राग सुनाबी ।
गॅु र् गॅु कऽ के नाम कमाबी ।।
राजा छैथ या रंक फकिरा ।
सब के केलाे अपनेही मत धिरा ।।
रूप कुरूप न अहा मानलाे ।
छाेटका बऱका नै अहा जनलाे ।।
नर छैथ या स्वगाेर्कऽ नारी ।
सब के समक्ष बनलाे अहा भारी।।
भिन्न भिन्न जे राेग सुनेला ।
डाकटर कुमार फेर शर्मेला ।।
सब दफ्तर में आदर पेलाेे ।
बिना इजाजत के अहा घुस गेलाे ।।
चाट परल जिन्गी से गेलाे ।
कनिते खिजते परिवार गमेलाे ।।
जर्यजर्यजय हे मक्ष्छर भगवाना ।
माफ करू सबटा जुर्माना ।।
छी अहा नाथ साथ हम चेरा ।
जल्दी उजारारू अहा अपनेही डेरा ।।
दाेहा
निश बंाशर शंकर करण मालिन महा अति कुर
अपन दल बल सहित अहा बसाे कहि जा दुर
मदन कुमार ठाकुर
पट्टिटाेल ह्यभैरर्बस्थान हृ
झंझारपुर ़ मधुबनी
बिहार – 847404
माेर् 09312460150
SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE
SOME NEW BOOKS FROM VIDEHA EJOURNAL ARCHIVE I.A PARALLEL HISTORY OF MITHILA & MAITHILI LITERATURE [TOME 1-4; VOLUMES 1-100] BY GAJENDR...
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"भालसरिक गाछ" Post edited multiple times to incorporate all Yahoo Geocities "भालसरिक गाछ" materials from 2000 onwards as...
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डाॅ. देव शंकर नवीन (जन्म: 2 अगस्त 1962) मैथिली तथा हिन्दी मे एम.एण्, पी-एच.डी., भौतिकी मे एमए स-सी. तथा पुस्तक प्रकाशन एवं अनुवाद मे पी.जी. ...
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उमेश मंडल कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फ...